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16 फरवरी : तुम मुझे क्या कहते हो

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16 फरवरी : तुम मुझे क्या कहते हो
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“शमौन पतरस ने उत्तर दिया, ‘तू जीवते परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है।’ यीशु ने उसको उत्तर दिया, ‘हे शमौन, योना के पुत्र, तू धन्य है; क्योंकि मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है।’”  मत्ती 16:16-17

जब हम सुसमाचारों को पढ़ते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जब लोग नासरत के यीशु के सम्पर्क में आते थे, तो शायद ही कभी वे सभ्य उदासीनता के साथ प्रतिक्रिया दे पाते थे। उसके शब्द और कार्य गूढ़ प्रेम और भक्ति को, परन्तु साथ ही भय और घृणा को भी प्रेरित करते थे। प्रतिक्रियाओं की ऐसी विविधता के लिए सम्भवतः क्या कारण हो सकता है?

कैसरिया फिलिप्पी के मार्ग पर, जैसा कि अक्सर ही होता था, इस बातचीत में उत्तर देते हुए पतरस बोल पड़ा, “तू मसीह है।” और यह उत्तर उसने केवल अपने लिए नहीं परन्तु दूसरों के लिए भी दिया था। यीशु की पहचान के लिए उसने जिस शब्द का प्रयोग किया, वह था ख्रीस्तोस,  जिसका यूनानी में अर्थ था “मसीह” या “अभिषिक्त।” पुराने नियम में परमेश्वर ने राजाओं, न्यायियों और भविष्यद्वक्ताओं का अभिषेक किया था, किन्तु वे सभी भविष्य में आने वाले मसीह, या उद्धारकर्ता, अर्थात् परमेश्वर के अभिषिक्त की ओर संकेत करने वाले प्रतिनिधि और प्रवक्ता थे। इस कारण पतरस ने जो घोषणा की वह विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। वह यीशु से कह रहा था कि तू ही वह है। तू वही है जिसके बारे में भविष्यद्वक्ताओं ने बात की है।  

पतरस की इस बात पर यीशु का स्पष्टीकरण और भी अधिक आश्चर्यजनक है। पतरस अपने इस निष्कर्ष पर इसलिए नहीं पहुँचा था, क्योंकि वह बुद्धिमान था या उसके पास तार्किक और तर्कसंगत सोच की उन्नत क्षमता थी या क्योंकि किसी प्रेरक प्रचारक ने उसे यह बताया था। उसका यह उत्तर इसलिए सम्भव हुआ था, क्योंकि परमेश्वर पिता ने ही सचमुच उस पर यह प्रगट किया था।

हमारे विश्वास के अंगीकार के समान ही पतरस के विश्वास का अंगीकार भी उसकी अपनी क्षमता में कभी नहीं हो सकता था। विश्वास एक वरदान है, जो हमें दिया जाता है। पतरस और यीशु के बीच का यह वार्तालाप परमेश्वर के आत्मा द्वारा परमेश्वर के वचन को लेने और उसे किसी के मन और हृदय में इस प्रकार लेकर आने का एक ठोस उदाहरण है, जिससे वह यीशु के मसीह होने की घोषणा कर पाता है।

पतरस के समान यीशु को प्रभु और मसीह के रूप में घोषित करने की हमारी क्षमता हमारा अपना काम नहीं है; यह तो “परमेश्‍वर का दान है, और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे” (इफिसियों 2:8-9)। यदि हमारा विश्वास हमारी अपनी बौद्धिक क्षमता या भावनात्मक बुद्धिमत्ता या नैतिक भलाई का परिणाम होता, तो हम अपने में ही भरोसा रख सकते थे और इस कारण हम अपने पर घमण्ड कर सकते थे। परन्तु ऐसा होने पर अपने अच्छे दिनों में यह हमें घमण्डी बना देगा और बुरे दिनों में यह हमें निर्बल बना देगा। कदापि नहीं, हमारा विश्वास पूरी तरह से परमेश्वर के वरदान पर आधारित है और इसलिए हम अपना भरोसा उस पर रखते हैं और इस प्रकार हम अपने सबसे उत्कृष्ट दिनों में दीन रहते हैं और अपने सबसे बुरे दिनों में भरोसा रख पाते हैं। तो फिर आज कृतज्ञता के साथ आनन्दित हों, क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा हृदयों और मनों को बदलने से प्रसन्न होता है, जिससे कि हम पतरस के साथ मिलकर यह घोषणा कर सकें, “तू ही मसीह है।”      

इफिसियों 2:1-10

15 फरवरी : प्रायश्चित्त का दिन

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15 फरवरी : प्रायश्चित्त का दिन
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“क्योंकि शरीर का प्राण लहू में रहता है; और उसको मैंने तुम लोगों को वेदी पर चढ़ाने के लिए दिया है कि तुम्हारे प्राणों के लिए प्रायश्चित्त किया जाए; क्योंकि प्राण के कारण लहू ही से प्रायश्चित्त होता है।”  लैव्यव्यवस्था 17:11

जब परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिस्र से छुड़ाया, तो उनके छुटकारे ने परमेश्वर के साथ उनका एक सम्बन्ध स्थापित कर दिया। परमेश्वर की प्रभुता के अधीन रहते हुए लोगों ने मिलाप वाले तम्बू के माध्यम से उसकी उपस्थिति का आनन्द उठाया। परन्तु प्रारम्भ से ही इस्राएली लोग परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं कर सके थे। इससे एक दुविधा उत्पन्न हुई कि एक पवित्र परमेश्वर पापी मनुष्यों के साथ कैसे वास कर सकता था?

प्रत्येक वर्ष एक विशिष्ट दिन, जिसे प्रायश्चित्त का दिन कहा जाता था, इस्राएल के महायाजक को परमेश्वर द्वारा परम पवित्र स्थान में प्रवेश करने का निर्देश दिया गया था, अर्थात् मिलाप वाले तम्बू में वह स्थान जहाँ परमेश्वर की उपस्थिति वास करती थी कि वह लोगों के पापों के लिए बलिदान चढ़ाए। महायाजक दो निष्कलंक बकरे लेता था। पहले बकरे को वह लोगों के लिए पापबलि के रूप में बलिदान करता था और फिर उसके लहू को प्रायश्चित्त के ढक्कन पर छिड़कता था, जिसे ‘दया आसन’ के नाम से भी जाना जाता है। इस्राएली अपने पाप के कारण मृत्यु के पात्र थे, किन्तु परमेश्वर ने अपने अनुग्रह में होकर उनके स्थान पर मरने के लिए एक विकल्प के रूप में यह बकरा रखा था। लोग अब जीवित रह सकते थे, क्योंकि वह पशु मारा गया था। और दूसरे बकरे के साथ जो होता था, उसमें इस प्रायश्चित्त का परिणाम देखा जा सकता था। याजक उसके सिर पर हाथ रखता, लोगों के पापों को उस पर लाद देता और फिर उसे मरुभूमि में दूर कहीं छोड़ आता। तब महायाजक लोगों के सामने आकर यह कह सकता था कि तुम्हारे पापों का प्रायश्चित्त हो चुका है। लहू बहाया गया है, और लहू के बहाए जाने से पापों की क्षमा होती है। दूसरे बकरे को मैं मरुभूमि में दूर छोड़ आया हूँ और उसी तरह तुम्हें भी अपने पापों के बारे में चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है और न ही उन्हें अपनी पीठ पर बोझ की तरह ढोना है।  एक बहुत ही विशिष्ट तरीके से परमेश्वर इस महत्त्वपूर्ण सत्य को स्थापित कर रहा था कि वह पापी लोगों को अपनी उपस्थिति में लाने के लिए जो भी आवश्यक है, वह करने को तैयार है।  चूंकि उसके लोग उद्दण्ड थे (और आज भी हैं!), इसलिए उसे ही उनके पापों के लिए एक बलिदान प्रदान करना पड़ा, जिससे वे उसके द्वारा पूरे किए गए कार्य के आधार पर उसके पास आ सकें। और वह प्रत्येक बलिदान अपने आप से परे उस सिद्ध बलिदान की ओर इशारा करता था, जिसे मसीह क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा एक बार और सदा के लिए पाप के समाधान के रूप में चढ़ाने वाला था। परिणामस्वरूप हम परमेश्वर के समक्ष हियाव से आने का आनन्द उठा सकते हैं। परन्तु यह हियाव हमारे अपने कारण नहीं है; बल्कि “हमें यीशु के लहू के द्वारा उस नए और जीवते मार्ग से पवित्रस्थान में प्रवेश करने का हियाव हो गया है, जो उसने परदे अर्थात् अपने शरीर में से होकर हमारे लिए अभिषेक किया है” (इब्रानियों 10:19-20)।

जब भी आपको दुविधा और सन्देह हो, या अपने स्वयं के कार्यों को आश्वासन के आधार के रूप में देखने का प्रलोभन हो, तब उन दो बकरों को स्मरण करें, जो आपको क्रूस पर किए गए यीशु के कार्य की ओर दिखाते हैं। आपके पाप का दाम चुका दिया गया है और आपके पाप को हटा दिया गया है। आपका कोई भी कार्य हमारे पवित्र परमेश्वर के सामने आपकी अवस्था में न तो कुछ बढ़ाता है और न ही घटाता है। यह है वह स्थान, जहाँ पर आपको अपने लिए हियाव मिलता है:

एक ऐसे जीवन पर जो मैंने नहीं जिया,

एक ऐसी मृत्यु पर जो मुझे नहीं मिली,

दूसरे के जीवन पर, दूसरे की मृत्यु पर,

मैं अपना पूरा अनन्त काल दाव पर लगाता हूँ।
इब्रानियों 10:11-25

14 फरवरी : मसीह का एक चेला

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14 फरवरी : मसीह का एक चेला
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“दमिश्क में हनन्याह नामक एक चेला था, उससे प्रभु ने दर्शन में कहा, ‘हे हनन्याह!’ उसने कहा, ‘हाँ, प्रभु।’”  प्रेरितों के काम 9:10

आप प्रतिदिन अपने यश को आकार दे रहे हैं। और एक मसीही व्यक्ति के रूप में आप प्रतिदिन मसीह के यश को भी आकार दे रहे हैं। जब हम उसके चेलों के रूप में इधर-उधर चलते-फिरते हैं, तब हमारा जीवन मसीह के बारे में क्या कह रहा होता है?

सम्भवतः हनन्याह बाइबल का एक कम जाना-पहचाना पात्र हो, किन्तु पौलुस के जीवन पर और इस कारण कलीसिया के पूरे इतिहास पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। यह मसीह के एक चेले के रूप में उसकी दैनिक समर्पित विश्वासयोग्यता का परिणाम था। जबकि हम परमेश्वर के राज्य में उपयोग किए जाने का यत्न कर रहे हैं, तो उसकी शिष्यता के तीन ऐसे गुण हैं जो हमारे अपने चरित्र और मसीह के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को आकार देने में सहायता कर सकते हैं।

सबसे पहला, जैसा कि पवित्र बाइबल में कहा गया है कि हनन्याह “एक विशेष  चेला था” (तिरछे अक्षर में लिखा गया शब्द जोड़ा गया है)। वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसे विशेष रूप से चुना गया था। पौलुस (तब शाऊल के नाम से जाना जाता था) को दमिश्क में लाने या हनन्याह को बुलाने से भी पहले, परमेश्वर ने यरूशलेम में पिन्तेकुस्त के दिन के बाद कलीसिया के बढ़ने को सम्प्रभुता में होकर व्यवस्थित किया, ताकि कलीसिया कम से कम 200 मील उत्तर में दमिश्क तक पहुँच सके जहाँ हनन्याह सहित विश्वासियों का एक समूह स्थापित किया गया। फिर इस समूह में से परमेश्वर ने विशेष रूप से हनन्याह को चुना कि वह पौलुस का मन-परिवर्तन हो जाने के बाद उसके पास जाए। परमेश्वर की सम्प्रभुता के ऐसे प्रगाढ़ प्रदर्शन से हमें यह भरोसा करने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलना चाहिए कि शायद परमेश्वर अपनी इच्छा को पूरा करने के उद्देश्य से हमें तैयार करने और उपयोग करने के लिए ऐसे तरीकों से काम कर रहा हो जो अभी तक दिखाई न दिए हों।

दूसरा, हनन्याह एक साहसिक  चेला था। उसने अपना परिचय प्रभु के अनुयायी के रूप में दिया, अर्थात् दमिश्क के उसी समूह का होने के रूप में जिसे पौलुस अपने मन-परिवर्तन से पहले घात करने जा रहा था (प्रेरितों 9:1)। हनन्याह की निष्ठा किसी स्थानीय कलीसिया, किसी एक पंथ या किसी एक धार्मिक दृष्टिकोण के प्रति नहीं थी, बल्कि प्रभु यीशु मसीह के प्रति थी। इसी प्रकार यदि यीशु ने हमारे जीवन को थाम लिया है और हमें बदल दिया है, तो हमें भी इस जीवन को बदल देने वाले तथ्य को अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। जैसे हम मसीह के उद्धार को प्राप्त करने पर पाप को न कहते हैं, वैसे ही हमें अपने विश्वास के बारे में गोपनीयता को भी न कहना है। या तो हमारी शिष्यता हमारी गोपनीयता को नष्ट कर देगी, या फिर हमारी गोपनीयता हमारी शिष्यता का अन्त कर देगी।

अन्त में, हनन्याह एक समर्पित  चेला था। आगे चलकर पौलुस हनन्याह के बारे में इस प्रकार से स्मरण करता है कि वह दमिश्क में रहने वाला एक ऐसा व्यक्ति था जो “व्यवस्था के अनुसार एक भक्त मनुष्य, जो वहाँ रहने वाले सब यहूदियों में सुनाम था” (प्रेरितों 22:12)। ऐसा यश पाँच मिनट या पाँच दिन में नहीं मिलता, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ावों में से होकर जाते हुए धीरे-धीरे मिलता है। हनन्याह ने अपना पूरा जीवन परमेश्वर और उसके वचन का पालन करने के लिए समर्पित करने के द्वारा ही ऐसा यश उन्नत किया था। उसने अपने इस समर्पण को निश्चित रूप से अपने दैनिक व्यवहार और दूसरों के साथ बातचीत के माध्यम से प्रदर्शित किया होगा।

हनन्याह का जीवन हमें साधारण दिनों में छोटे-छोटे तरीकों से विश्वासयोग्य बने रहने की चुनौती देता है। सम्भव है कि एक दिन हमें प्रभु के लिए कुछ असाधारण करने के लिए बुलाया जाए, किन्तु हमें उसके लिए पूरे मन से जीने के लिए उस समय के आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। चेले यही काम करते हैं कि साहसपूर्वक, समर्पित रूप से और दीनता के साथ वे परमेश्वर के पीछे चलते हैं और उस पर पूरी तरह से भरोसा करते हैं। चाहे आप पढ़ाई कर रहे हों, बच्चों की परवरिश कर रहे हों, अपना व्यावसायिक जीवन बनाने में लगे हों, या फिर अपना जीवन सेवानिवृत्ति और बुढ़ापे में क्यों न बिता रहे हों, परमेश्वर की महिमा के लिए यह सब विश्वासयोग्यता के साथ करने का प्रयास करें। अपना लक्ष्य बनाएँ कि आप हनन्याह के समान, अर्थात् यीशु मसीह के एक चेले के रूप में ही जाने जाएँगे।      

प्रेरितों के काम 9:1-19

13 फरवरी : परम वास्तविकता

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13 फरवरी : परम वास्तविकता
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“परमेश्‍वर जो आकाश का सृजने और तानने वाला है, जो उपज सहित पृथ्वी का फैलाने वाला और उस पर के लोगों को साँस और उस पर के चलने वालों को आत्मा देने वाला यहोवा है, वह यों कहता है : ‘मुझ यहोवा ने तुझको धर्म से बुला लिया है, मैं तेरा हाथ थामकर तेरी रक्षा करूँगा।’”  यशायाह 42:5-6

1932 में ऐल्बर्ट आयनस्टाइन ने कहा था, “इस धरती पर हमारी परिस्थिति अजीब लगती है। हम में से हर कोई यहाँ अनजाने में और बिना बुलाए थोड़े समय के लिए आता है, बिना यह जाने कि ऐसा क्यों और किस उद्देश्य से होता है।”[1] निस्सन्देह आप यह बात आमतौर पर ही सुनते रहते होंगे कि हम संयोग से भरे संसार में जी रहे हैं, जहाँ इतिहास केवल अपने को दोहराता रहता है और ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में कोई व्यापक उद्देश्य नहीं है। यदि यह सच बात है, तो जीवन में अभिप्राय पाना कठिन है। फिर तो हमें जीने और मर जाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करना है।

वास्तविकता के इस दृष्टिकोण से उत्पन्न उद्देश्य की अनुपस्थिति में होकर परमेश्वर बात करता है। वह उस परम वास्तविकता की उद्‌घोषणा करता है, जो सब कुछ बदल देती है। वह अपने बारे में बतलाता है। परमेश्वर अपना परिचय देता है, अपनी पहचान प्रकट करता है। “मैं यहोवा हूँ।” यहाँ परमेश्वर का नाम (“यहोवा”) केवल वह नाम नहीं है, जिससे हम उसे पुकारते हैं; अपितु यह उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। बाइबल में परमेश्वर के कई नाम इस बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं कि वह कौन है, जैसे कि अनन्तकालीन, आत्म-निर्भर, सम्प्रभु . . . और भी बहुत कुछ!

बोलते समय परमेश्वर अपनी सामर्थ्य भी प्रकट करता है। आकाश उसकी रचना है और वही है जिसने पृथ्वी को बनाया और उस पर के लोगों को आकार और जीवन दिया है। सृष्टि की स्थिरता और उत्पादकता उसी सृष्टिकर्ता में निहित है। हम अपने आप से घटित होने वाले किसी क्रम-विकास की लहर के उत्पाद नहीं हैं, बल्कि एक रचयिता के प्रत्यक्ष कार्य के फल हैं। परमेश्वर से हटकर हम अपने अस्तित्व को नहीं समझ सकते। न ही हमें कभी ऐसा करना था।

परमेश्वर ने जो कुछ भी रचा है, उसके पीछे उसका उद्देश्य क्या है? उद्धार के द्वारा पृथ्वी पर धार्मिकता स्थापित करना। “मुझ यहोवा ने तुझ को धर्म से बुला लिया है, मैं तेरा हाथ थामकर तेरी रक्षा करूँगा; मैं तुझे प्रजा के लिए वाचा और जातियों के लिए प्रकाश ठहराऊँगा।” वह यहाँ हमसे नहीं परन्तु अपने पुत्र, अर्थात् उस सेवक से बात कर रहा है, जिसका परिचय यशायाह ने दिया है। जब कभी हमें परामर्श की आवश्यकता होती है, मित्रता की आवश्यकता होती है, क्षमा की आवश्यकता होती है, उद्धार की आवश्यकता होती है, तो ऐसे सभी अवसरों के लिए परमेश्वर ने कहा है, “मेरे दास को देखो जिसे मैं सम्भाले हूँ” (यशायाह 42:1)।

हम जीवन में कभी भी उतने सन्तुष्ट नहीं होंगे जितना कि तब होंगे, जब हम मसीह में अपनी परम वास्तविकता को खोज लेंगे। उस वास्तविकता के धाराप्रवाह में हमें हमारा उद्देश्य मिल जाता है, अर्थात् “परमेश्वर की महिमा करना, और उसमें अपने परम आनन्द को समर्पित करना।”[2] यदि आप जीवन में उद्देश्य को जानना चाहते हैं और परिपूर्णता प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको केवल परमेश्वर की महिमा करते हुए प्रभु के दास को ग्रहण करना है और उसमें आनन्दित होना है, जैसा कि शमौन ने किया था जब उसने इस प्रकार कहा था, “मेरी आँखों ने तेरे उद्धार को देख लिया है, जिसे तू ने सब देशों के लोगों के सामने तैयार किया है कि वह अन्यजातियों को प्रकाश देने के लिए ज्योति और तेरे निज लोग इस्राएल की महिमा हो” (लूका 2:30-32)।  यशायाह 42:1-13

12 फरवरी : एकता की कुंजी

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12 फरवरी : एकता की कुंजी
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“जिस (यीशु मसीह) में तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाए जाते हो।”  इफिसियों 2:22

जब कोई व्यक्ति विश्वास के द्वारा मसीह के पास आता है, तो उसकी पहचान में व्यापक रूप से परिवर्तन हो जाता है। इफिसियों 2 में पौलुस ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, उसके अनुसार एक मरा हुआ पापी अब मसीह में जीवित है; कोप की सन्तान अब परमेश्वर की सन्तान है। परन्तु यह नई पहचान केवल व्यक्तिगत नहीं है। हम में से कोई भी मसीह में अकेला नहीं है; हम सभी परमेश्वर के लोगों के साथ  उसमें हैं। यही कारण है कि इफिसियों 2 में पौलुस अनुग्रह के हमारे व्यक्तिगत अनुभव से परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले सामूहिक कार्य की ओर आगे बढ़ता है। पौलुस हमें बताता है, “तुम अब विदेशी और मुसाफिर नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्‍वर के घराने के हो गए हो” (पद 19)। मसीह द्वारा निर्मित किया जा रहा यह “एक नया मनुष्य” (पद 15) अनुग्रह के संगी वारिसों की भीड़ के साथ महिमामय रीति से घिरा होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारी व्यक्तिगत मानवीय पहचान व्यर्थ हो जाती है। हमारी पृष्ठभूमि और हमारा स्वरूप, अर्थात हमारा लिंग, जाति और व्यक्तिगत इतिहास मसीह में विलुप्त नहीं हो जाते। हम वही रहते हैं जो हम हैं, अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए तथा उसके उद्देश्यों के अनुसार गढ़े गए हैं। परन्तु जो बात हमें मसीह में  एक करती है, अर्थात् मसीह के साथ  हमारी एकता, वह शेष सभी बातों से बढ़कर है।

हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं हम यह न भूल जाएँ कि हमारी यह एकता किस कारण से हमें मिली है। कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान के तत्वों को बाधाओं में—प्रतिष्ठा, वर्ण, वर्ग, व्यक्तित्व के प्रकार या व्यक्तिगत प्राथमिकताओं की बाधाओं में—बदल देने के प्रलोभन में गिर सकता है। मसीही होने के नाते हमें यह स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए कि ऐसी भूल हो जाना कितनी सरल बात है। यदि हम स्वयं को ऐसी गलती के लिए दोषी पाएँ, तो हमें पश्चाताप करने और उस बात के विषय में शोक करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो परमेश्वर को पसन्द नहीं आती।

मसीही एकता की कुंजी सुसमाचार है। पौलुस जानता था कि केवल परमेश्वर ही कठोर हृदयों को नरम कर सकता है, केवल परमेश्वर ही अन्धी आँखें खोल सकता है और केवल परमेश्वर ही अलग-अलग लोगों को एक साथ लाकर उन्हें कुछ ऐसा बना सकता है, जो वास्तव में महिमामय रीति से एक हों। परमेश्वर “एक नया मनुष्य” निर्मित कर रहा है और वह उस नए मनुष्य को अपनी कलीसिया के रूप में निर्मित कर रहा है। मसीह में परमेश्वर एक “पवित्र मन्दिर” (इफिसियों 2:21) निर्मित कर रहा है, जो “आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाया जाता है।” जाति, वर्ग या प्रतिष्ठा के आधार पर पक्षपात के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है, जहाँ परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा वास करता है। एक दिन आप अनन्त काल के लिए मसीह और उसके लोगों के साथ अपने मिलन की पूर्णता का अनुभव करेंगे; परन्तु उस काम को अभी प्रारम्भ होना आवश्यक है और होना भी चाहिए। जिस तरह से आप अपने समय का उपयोग करते हैं और जिस तरह से आप अपनी कलीसिया में अपने भाइयों और बहनों के बारे में सोचते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं और उनसे बात करते हैं, इन सब बातों के द्वारा आज आपके पास उस एकता को पोषण देने का विशेषाधिकार है।

हम दिन-प्रतिदिन निर्मित होते जा रहे हैं,

जैसे-जैसे क्षण बीतते जा रहे हैं,

हमारा मन्दिर, जिसे शायद संसार न देख सके;

अनुग्रह से प्राप्त होने वाली प्रत्येक जीत

अनन्त काल के लिए किए जा रहे हमारे निर्माण में

अपना स्थान अवश्य पाएगी।

1 कुरिन्थियों 13

11 फरवरी : राज्य के वारिस होना

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11 फरवरी : राज्य के वारिस होना
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“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे?”  1 कुरिन्थियों 6:9

विश्वासियों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यीशु मसीह के राज्य में हमें सदस्यता मिल चुकी है। यही वह बात है जो मसीहियों को अद्वितीय बनाती है। अब हम एक बिलकुल नए राज्य के सदस्य हैं। हो सकता है कि हम काले या गोरे, अमीर या गरीब, पुरुष या स्त्री हों, किन्तु जो बात हमें एक करती है, वह है एक ही राजा, अर्थात् यीशु के प्रति हमारी निष्ठा। हम उसके निर्देशों पर चलते हैं, हम उसके दल के साथ आनन्दित होते हैं और हम उसकी आज्ञा का पालन करने में प्रसन्न होते हैं।

परमेश्वर का राज्य एक धर्मी राज्य है। उसका चरित्र सिद्ध है, उसके मानक उत्कृष्ट हैं और वह पाप को नहीं देख सकता। इसलिए पौलुस चेतावनी देता है कि जो लोग उसके चरित्र को नकारते हैं और उसके मानकों को अस्वीकार करते हैं “वे परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।” दुष्टता, विद्रोह और आत्मनिर्भरता से चिह्नित जीवनशैली मसीह की प्रभुता के साथ मेल नहीं खाती और इस कारण इस तरह से जीवन बिताने का निर्णय उसके राज्य की सीमाओं से बाहर रहने का निर्णय है।

हमें ध्यान देना है कि पौलुस यहाँ अधर्म के छोटे-मोटे कामों का उल्लेख नहीं कर रहा है। मसीह के राज्य का कोई भी सदस्य अनन्त महिमा के इस पार पाप रहित जीवन नहीं जीता। इसके विपरीत, पौलुस किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख कर रहा है, जो निरन्तर पाप में लगा रहता है या उससे घृणा नहीं करता। वह ऐसे जीवन की बात कर रहा है जो घोषित करता हो कि “मैं नहीं चाहता कि परमेश्वर मेरी इच्छाओं में हस्तक्षेप करे, फिर भी मैं इस धारणा के साथ जीना चाहता हूँ कि मैं उसके राज्य का हूँ और उसके सभी लाभ भी चाहता हूँ।”

परमेश्वर अपने राज्य की सीमाओं का निर्धारण करता है। यह बात पूर्णतः सत्य है कि सारे मनुष्य उसके राज्य के नागरिक नहीं होगे, फिर चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उनका विश्वास चाहे कुछ भी क्यों न हो, या वे चाहे कुछ भी क्यों न चाहते हों! यह धारणा बहुत ही स्वीकार्य लग सकती है, परन्तु परमेश्वर का वचन ऐसा कदापि नहीं सिखाता। केवल परमेश्वर यह निर्धारित करता है और उसके अतिरिक्त कोई अन्य यह तय नहीं कर सकता कि उसके राज्य में कौन होगा।

परमेश्वर कहता है कि न्याय का एक दिन आएगा। निस्सन्देह, यीशु अपनी महिमा में वापस आएगा और “सब जातियाँ उसके सामने इकट्ठा की जाएँगी; और वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा” कि वे या तो परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें या अनन्त विनाश में भेजे जाएँ (मत्ती 25:32)। परमेश्वर का राज्य ऐसा कुछ नहीं है, जिसे यीशु पुरातन से चली आ रही प्रणाली में मौजूद किसी दोष को ठीक करने के लिए लेकर आया हो। इसकी योजना अनन्तकाल से थी।

आने वाले न्याय के कारण सुसमाचार प्रचार में तत्परता की भावना उत्पन्न होनी चाहिए और इससे हममें हमारे पाप के प्रति सच्चरित्रता और निर्दयता उत्पन्न होनी चाहिए। हमें संसार के सामने यीशु के रूप में एक ऐसा जीवित उद्धारकर्ता प्रस्तुत करना चाहिए, जो ठीक वही करेगा जिसे करने के बारे में उसने कहा था और हमें स्वयं को भी यही प्रचार करना चाहिए। केवल अपने पाप को पहचानने और उद्धारकर्ता की हमारी आवश्यकता को पहचानने के द्वारा ही यह सम्भव है कि हम परमेश्वर के इस अनन्त राज्य के वारिस बन सकेंगे।      लूका 13:22-30

10 फरवरी : परमेश्वर ने विश्राम किया

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10 फरवरी : परमेश्वर ने विश्राम किया
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“और परमेश्‍वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने सृष्टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया।”  उत्पत्ति 2:3

मानवता सृष्टि का चरमोत्कर्ष है। हम केवल उच्च श्रेणी के वानर नहीं हैं; परमेश्वर की सारी सृष्टि में से केवल हम ही उसके स्वरूप में बनाए गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। हम एक सृष्टि हैं क्योंकि हमें एक सृष्टिकर्ता ने बनाया है, किन्तु हम सारी सृष्टि में अद्वितीय भी हैं क्योंकि हमें परमेश्वर की समानता में बनाया गया है। मनुष्य के पास वह गरिमा है, जो उससे अलग नहीं की जा सकती और परमेश्वर चाहता है कि हम अपने सृष्टिकर्ता का आदर करें और उसके साथ सम्बन्ध में बने रहें।

यदि मनुष्य सृष्टि का चरमोत्कर्ष है, तो विश्राम सृष्टि का चरम लक्ष्य है। जब परमेश्वर ने अपना सृजनात्मक कार्य पूरा किया, तो उसने विश्राम किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसने अपने बनाए संसार में उपस्थित रहना या सक्रिय रहना बन्द कर दिया, अपितु इसका अर्थ यह है कि उसने सृजन के कार्य से विश्राम किया। उसमें आगे को कोई संशोधन करने या जोड़े जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किसी भी वस्तु को किसी कमी के कारण खोलकर फिर से बनाने की आवश्यकता नहीं थी। और परमेश्वर की महान योजना, अर्थात् मनुष्यों के लिए उसकी इच्छा यह है कि हम भी उसके साथ विश्राम के अद्‌भुत, निरन्तर बने रहने वाले दिन में रह सकें।

उत्पत्ति 1 में दिया गया सृष्टि के सृजन का विवरण पहले छः दिनों में से प्रत्येक के लिए “साँझ हुई फिर भोर हुआ” वाक्यांश को दोहराता है। लेकिन जब सातवें दिन की बात आती है, तो इस चक्र में बदलाव आता है। दूसरे शब्दों में, सातवाँ दिन तो एक निरन्तर चलते रहने वाला वह दिन है जिसमें परमेश्वर अपने लिए एक प्रजा को पा लेने का यत्न कर रहा है। वह मानवजाति को अपने साथ एक सम्बन्ध में लेकर आ रहा है, उनके लिए प्रावधान कर रहा है, उनकी रक्षा कर रहा है, उन्हें एक-दूसरे के साथ संगति प्रदान कर रहा है और उन्हें अपनी सृष्टि पर अधिकार दे रहा है।

जैसा कि दस आज्ञाओं में निर्देश दिया गया है कि विश्रामदिन का एक उद्देश्य इस्राएलियों को जीवन के लिए परमेश्वर के सर्वोच्च अभिप्राय के बारे में समझ प्रदान करना था (निर्गमन 20:8-11)। विश्राम करने और चिन्तन करने के द्वारा उन्हें विचार करना था कि परमेश्वर के लोगों के रूप में परमेश्वर की प्रभुता और आशीष में होकर जीने का अर्थ क्या-क्या हो सकता है।

जब यीशु लोगों को अपने पास बुलाता है, तो वह कहता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा . . . और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। इब्रानियों का लेखक इस विचार को लेता है और घोषणा करता है कि “परमेश्‍वर के लोगों के लिए सब्त का विश्राम बाकी है” (इब्रानियों 4:9)। जो अदन की सुन्दरता में रचा गया और पतन की घटना में नष्ट हो गया, वह एक दिन पुनः स्थापित हो जाएगा जब हम परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करेंगे। अभी हम अपने पापों को यीशु के पास लाने के विश्राम का अनुभव करते हैं जिससे कि हम उनसे छुटकारा पा सकें और अपनी चिन्ताओं को यीशु के पास लाने के विश्राम का अनुभव करते हैं जिससे कि हम उनमें सहायता पा सकें। हम एक दिन अपने सिद्ध परमेश्वर की पवित्रता से भरे हुए एक पुनर्स्थापित संसार में पुनरुत्थान के जीवन के सिद्ध विश्राम का अनुभव करेंगे। हमारे ताकते रहने को सन्तुष्टि प्रदान करने और इस संसार में हमारे सबसे अच्छे और सबसे बुरे दिनों में हमारे हृदयों के ध्यान को फिर से उन्मुख कर देने की आशा यही है। एक दिन हम वास्तव में शान्ति में विश्राम करने पाएँगे।

जैसे-जैसे हम इस भविष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं, तो परमेश्वर का आदर्श ही वह आदर्श होना चाहिए जिसका हम अनुकरण करते हैं। जैसा कि परमेश्वर ने आज्ञा दी है, हमें विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिए स्मरण रखना है और उन सभी बातों पर विचार करने के लिए समय निकालना है जो वह हमारे लिए चाहता है, उसके साथ सहभागिता के जीवन का आनन्द लेने के लिए समय निकालना है और उसके साथ उस कार्य में लगना है जब वह सक्रिय रूप से ऐसे लोगों को पा लेने का यत्न कर रहा है जिसे वह अपनी प्रजा कह सके।      

भजन संहिता 8

9 फरवरी : हियाव के साथ प्रार्थना करना

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9 फरवरी : हियाव के साथ प्रार्थना करना
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“क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है; और जो ढूँढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाएगा … अतः: जब तुम बुरे होकर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा!”  लूका 11:10, 13

जब कोई किशोरी, जिसको अभी-अभी अपना ड्राइविंग लाइसेंस मिला हो, अपनी माँ या पिता से गाड़ी की चाबियाँ माँगती है, तो सामान्यतः वह कोई अस्पष्ट, आधे-अधूरे मन से किया गया निवेदन नहीं होता। इसके विपरीत, उसका मन उसमें लगा हुआ होता है और उसकी इच्छा साफ दिखाई दे रही होती है, मानो वह कह रही हो, “कृपया मुझे गाड़ी की चाबियाँ दें। मुझे गाड़ी चाहिए। मैं गाड़ी ले जाना चाहती हूँ। मुझे यह आपसे अभी चाहिए।”

इसी प्रकार, यीशु अपने चेलों को प्रार्थना में परमेश्वर से निवेदन करने के तरीके सिखाने के लिए जिन क्रियाओं का उपयोग करता है, अर्थात् माँगना, ढूँढना, खटखटाना, वे तीव्र इच्छा, अनुरूपता और स्पष्टता को व्यक्त करते हैं। ऐसा लगता है, जैसे वह कह रहा हो कि मैं चाहता हूँ कि तुम इस प्रकार प्रार्थना करो जिसमें विनयपूर्ण, हठी संकल्प हो। मैं चाहता हूँ कि तुम ढूँढो और ढूँढते रहो, और मैं चाहता हूँ कि तुम आग्रहपूर्ण सत्यता के साथ खटखटाओ।

वह आपको और मुझे हमारे स्वर्गिक पिता के सामने आने और केवल अपनी माँग रखने के लिए आमन्त्रित कर रहा है।

हालाँकि हमें इस बारे में सावधान रहना चाहिए कि हम क्या  माँग रहे हैं। जब हम प्रभु के समक्ष अपने निवेदन प्रस्तुत कर रहे हों, तो उन्हें आत्मा द्वारा संयमित किया जाना चाहिए, जिसे जॉन कैल्विन “परमेश्वर के वचन की लगाम” कहते हैं।[1] दूसरे शब्दों में, बाइबल सिखाती है कि हम उन बातों को पूरे हियाव के साथ माँग सकते हैं जिन्हें परमेश्वर भली और उचित कहता है,  जैसे कि उसकी सहायता, जिससे कि हम अपने शरीरों को जीवित बलिदान के रूप में चढ़ा सकें, सुसमाचार के साक्षी के रूप में बढ़ सकें, या आराधना करने की अपनी अभिलाषा बढ़ा सकें। परन्तु हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम परमेश्वर से चालाकी से काम निकलवा सकते हैं, यह माँग करते हुए कि वह हमें वह सब कुछ दे, जो हमारे जीवन को सुगम या समृद्ध बनाए। यह भी सम्भव है, “माँगो और . . . पाओ नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो” (याकूब 4:3)।

हमें साहसपूर्वक तो माँगना है, किन्तु हमें दीनता के साथ भी माँगना है। हमें परमेश्वर से महान कार्य करने के लिए कहना है, और फिर हमें उसका उत्तर स्वीकार करना है। यह पहले से ही प्रमाणित हो चुका है कि परमेश्वर सदैव हमें वह नहीं देगा जो हम माँगते हैं, तब भी जब हम जो माँगते हैं वह अपने आप में भला और ईश्वरीय हो। हमारी प्रार्थनाएँ सदैव उसकी भली और सम्प्रभु इच्छा के अनुसार नहीं होती हैं। हम सदैव यह निर्धारित नहीं कर सकते कि हमारे लिए क्या भला है, किन्तु परमेश्वर सदैव जानता है कि उसकी सन्तानों के लिए सर्वोत्तम क्या है। इसलिए जब हम परमेश्वर के सामने अपनी विनतियों को लाते हैं, तो हमें उसके वचन को अपने मार्गदर्शक के रूप में देखना चाहिए और स्मरण रखना चाहिए कि वह हमारे जीवन के लिए अपनी योजनाओं को पूरा करने और हमें अपने पुत्र के स्वरूप के अनुरूप बनाने के लिए काम कर रहा है।

इसलिए परमेश्वर के सामने आएँ और केवल अपनी माँग रखें। आपके निवेदन विशिष्ट होने चाहिएँ, साहसिक होने चाहिएँ और परमेश्वर के वचन के अनुकूल होने चाहिएँ और तब आप आशा कर सकते हैं और निस्सन्देह चाहत रख सकते हैं कि परमेश्वर उनका ठीक वैसा ही उत्तर देगा, जैसा उसे उचित जान पड़ता है।
कुलुस्सियों 1:9-12

8 फरवरी : हमारा स्वर्गिक मित्र

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8 फरवरी : हमारा स्वर्गिक मित्र
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“तुम में से कौन है कि उसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास जाकर उससे कहे, ‘हे मित्र; मुझे तीन रोटियाँ दे। क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।’ … मैं तुम से कहता हूँ, यदि उसका मित्र होने पर भी उसे उठकर न दे, तौभी उसके लज्जा छोड़कर माँगने के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा। और मैं तुम से कहता हूँ कि माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा।”  लूका 11:5-9

शायद हम सोचें कि परमेश्वर के बारे में बात करना उसके साथ हमारे सम्बन्ध की मुख्य अभिव्यक्ति होती है। तौभी हमारे लिए यह सम्भव है कि परमेश्वर को घनिष्ठता से जाने बिना भी, कि वह वास्तव में है कौन, हम उसके बारे में बात करते रह सकते हैं। परमेश्वर के साथ हमारे व्यक्तिगत सम्बन्ध का प्रमाण प्रायः हमारे सार्वजनिक शब्दों में नहीं, बल्कि हमारी निजी प्रार्थनाओं में पाया जाता है, अर्थात् इसमें नहीं कि हम उसके बारे में  क्या कहते हैं, अपितु इसमें कि हम उस से  क्या कहते हैं। निस्सन्देह, जैसा कि रॉबर्ट मुर्रे मैकाएन ने कहा था, “एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने घुटने टेकते समय जो होता है, वह वास्तव में वही होता है—उससे अधिक वह कुछ नहीं है।”

यहीं पर एक चुनौती भी है! क्योंकि यदि हम सच कहें, तो हमारी कई प्रार्थनाएँ एक गतिहीन या दूरस्थ सम्बन्ध को दर्शाती हैं, न कि उस गतिशीलता को जो एक स्नेह से भरी मित्रता की पहचान होनी चाहिए। परन्तु यदि यह हमारी सच्चाई है, तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि हम इस बात में अकेले नहीं हैं। यीशु के चेले भी अपने स्वर्गिक पिता के साथ घनिष्ठता बढ़ाना चाहते थे, किन्तु उन्हें पता था कि ऐसा कैसे करना सिखाने के लिए उन्हें प्रभु की आवश्यकता है (लूका 11:1)। और उत्तर के रूप में यीशु ने उन्हें वह प्रार्थना सिखाने के बाद, जिसे हम “प्रभु की प्रार्थना” कहते हैं, उन्हें एक मित्र के साहसिक निवेदन के बारे में एक दृष्टान्त सुनाया।

यीशु अपनी कहानी में दोनों व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध को स्थापित करते हुए अपना दृष्टान्त आरम्भ करता है। वह बताता है कि वे मित्र हैं। फिर वह आगे समझाता है कि कैसे पहला व्यक्ति, यात्रा करके आए एक अतिथि का आतिथ्य करने की इच्छा रखते हुए आधी रात को दूसरे के घर रोटी माँगने जाता है। यहाँ यह सम्भावना भी थी कि उसके निवेदन के कारण उसके मित्र का पूरा परिवार जाग जाता। यीशु कहता हैं कि उसके साहसिक हठ के कारण दूसरा व्यक्ति उठता है और पहले व्यक्ति को वह दे देता है, जिसकी उसे आवश्यकता होती है।

यीशु की कहानी से हमें यह समझने की आवश्यकता है कि यदि एक सच्ची मानवीय मित्रता ऐसी उदार प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि जब हम प्रार्थना में परमेश्वर के पास आते हैं, तो वह हमें कभी भी वह वस्तु देने से मना नहीं करेगा जिसकी हमें सच में आवश्यकता है। उस व्यक्ति का निवेदन साहसिक तो है, किन्तु बोझ डालने वाला भी है, तौभी उसका मित्र उसकी सुनता है और उसके हठ के कारण स्वीकार भी करता है। तो फिर हम कितना अधिक आश्वस्त हो सकते हैं कि जब हम सच्चे, दीन हृदय से अपने स्वर्गिक पिता के पास जाएँगे, तो वह उत्तर देने के लिए तत्पर होगा।

परमेश्वर के सामने आश्वासन रखने का अर्थ गुस्ताखी करना नहीं है। इसके विपरीत, यीशु के द्वारा उसने हमारे साथ जो मित्रता स्थापित की है, उसके कारण हम उसके सिंहासन के सामने हियाव रख सकते हैं। यीशु के कारण हम अपने सृष्टिकर्ता से एक घनिष्ठ मित्र के समान “लज्जा छोड़कर” बात कर सकते हैं। कितना अद्‌भुत विचार है यह! परमेश्वर के लिए कोई भी समय आधी रात का समय नहीं होता और न ही कभी ऐसा क्षण आएगा, जब हमारे मित्र के रूप में उसके पास जाने से उसे असुविधा होगी। हमें केवल खटखटाना है।

इफिसियों 1:15-23

6 फरवरी : क्षमा करने का स्वभाव

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6 फरवरी : क्षमा करने का स्वभाव
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और हमारे पापों को क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने हर एक अपराधी को क्षमा करते हैं।”  लूका 11:4

पहली बार देखने पर यह विनती एक आदान-प्रदान की तरह लग सकती है, मानो दूसरों को क्षमा करने से हमें क्षमा किए जाने का अधिकार प्राप्त हो जाता हो। तथापि, पवित्रशास्त्र इतना स्पष्ट है कि हम पहचान लेंगे कि सत्य वास्तव में इसके उलट है। परमेश्वर केवल प्रायश्चित करने वालों को क्षमा करता है, अर्थात् उनको जो ईश्वरीय पछतावा महसूस करते हैं और अपने पापों से पश्चाताप करते हैं। और प्रायश्चित करने का एक मुख्य प्रमाण कौन-सा है? क्षमा करने का स्वभाव! दूसरे शब्दों में, जब हम एक-दूसरे को क्षमा करते हैं, तो हम क्षमा किए जाने का अधिकार अर्जित नहीं करते हैं; इसके विपरीत हम यह दर्शाते हैं कि परमेश्वर के क्षमा करने वाले अनुग्रह के कारण हममें बदलाव हो चुका है।

यीशु ने सिखाया कि यह एक अकल्पनीय बात है कि हम, जिन्हें इतना अधिक क्षमा किया गया है, दूसरों द्वारा हमारे विरुद्ध किए गए अपराधों को क्षमा करने के लिए तैयार न हों (मत्ती 18:21-35)। फिर भी, हम अब भी द्वेष रखने, क्रोधित रहने और “क्षमा तो कर देंगे किन्तु भूलेंगे नहीं” जैसे स्वभाव के लिए प्रलोभित होते रहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि डी.एल. मूडी ने इस विचार की तुलना किसी ऐसे व्यक्ति से की, जो कुल्हाड़ी तो जमीन में गाड़ देता है किन्तु उसका हत्था बाहर ही छोड़ देता है।

सम्भवतः क्षमा न करने का स्वभाव सच्चे आत्मिक जीवन का सबसे बड़ा हत्यारा होता है। यदि हम अपने हृदय में अपने भाइयों और बहनों के विरुद्ध सक्रिय रूप से शत्रुता रखते हैं, तो हमें परमेश्वर के पीछे चलने का दावा नहीं करना चाहिए। यह मसीही आनन्द की लौ को बुझा देगा और बाइबल की शिक्षाओं से लाभान्वित हो पाना लगभग असम्भव बना देगा। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि यीशु यह कह रहा है कि क्षमा करने के स्वभाव के बारे में मैं जो कह रहा हूँ वह विश्वास के साथ की गई प्रार्थना का एक मौलिक तत्व है। इसके प्रति अपने जीवन को परखो।

क्या आप किसी से द्वेष रखते हैं या अपने मन में किसी के द्वारा आपके विरुद्ध किए गए अपराधों को दोहराते रहते हैं? क्या कोई ऐसा है जिसे क्षमा करने में आप विफल रहे हैं? आपको मिली क्षमा पर चिन्तन करें और परमेश्वर से आपको क्षमा करना सिखाने और ऐसा करने में सक्षम बनाने के लिए कहें, क्योंकि दूसरों के द्वारा आपके विरुद्ध किए गए पापों को क्षमा करके आप प्रकट करते हैं कि आप उसके अनुग्रह को समझते हैं और वास्तव में उसके द्वारा क्षमा किए गए हैं।

कैसे आपकी क्षमा उस व्यक्ति तक पहुँच सकती है,

और उसे आशीष दे सकती है, जो दूसरों को क्षमा नहीं करता,

जो अपराधों के विचारों को अपने में पनपने देता है

और पुरानी कड़वाहट को दूर नहीं होने देता?

चमकदार ज्योति में तुम्हारा क्रूस उस सत्य को प्रकट करता है,

जिसे हम धुंधले ढंग से जानते थे,

मनुष्यों का हम पर कितना छोटा सा ऋण है,

हम तुम्हारे प्रति कितने बड़े ऋणी हैं।

हे प्रभु, हमारी आत्माओं के भीतर की गहराइयों को साफ कर दो,

और आक्रोश का अन्त कर दो;

तब, परमेश्वर और मनुष्य के साथ हमारा मिलन हो जाने पर,

हमारा जीवन तुम्हारी शान्ति को फैलाएगा। [1]

मत्ती 18:21-35