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23 अप्रैल : जीवन सभी के लिए प्रवाहित होगा

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23 अप्रैल : जीवन सभी के लिए प्रवाहित होगा
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“नगर के चारों ओर का घेरा अठारह हज़ार बाँस का हो, और उस दिन से आगे को नगर का नाम ‘यहोवा शाम्मा’ रहेगा।” यहेजकेल 48:35

सर्वश्रेष्ठ अभी आना बाकी है।

इस्राएलियों को निर्वासन में रहते हुए छः दशक बीत चुके थे, जब छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व में फारस के कुस्रू ने सत्ता सम्भाली। जल्द ही, राजा ने कुछ इस्राएली बन्दियों को उनके स्वदेश लौटने की अनुमति दे दी। बड़ी आशा और प्रत्याशा के साथ एज्रा और नहेम्याह ने वापसी की यात्रा करते हुए लोगों का मार्गदर्शन किया और यरूशलेम के मन्दिर और दीवारों के पुनर्निर्माण में उनका नेतृत्व किया।

वापस लौटने वाले निर्वासितों की संख्या कम थी और उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। वे अपनी कोशिशों में सफल रहे, लेकिन वे बिल्कुल भी विजयी नहीं थे। वास्तव में, जो वृद्ध और सयाने लोग थे, वे मन्दिर की नींव रखते समय रोने लगे, क्योंकि वे जानते थे कि यह भविष्यद्वक्ताओं की बड़ी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगा (एज्रा 3:10-12)।

जो लोग रो रहे थे, उनकी लालसाएँ यहेजकेल की अन्तिम भविष्यवाणी को प्रतिबिम्बित करती थीं, जिसमें यह बड़ी आशा थी: एक दिन एक बड़े यरूशलेम में एक नया मन्दिर बनाया जाएगा। वह पहले मन्दिर से कहीं अधिक भव्य होगा, और विशाल संरचना में परमेश्वर विराजमान होगा, जहाँ से एक नदी बहेगी, जो सारे संसार को अनन्त जीवन देगी (यहेजकेल 40–48 देखें)।

इस्राएलियों को यह पता था कि जो वे बना रहे थे, वह उस मन्दिर जैसा बिल्कुल भी नहीं था, जिसकी यहेजकेल ने भविष्यवाणी की थी। वह उससे बिल्कुल भी मेल नहीं खाता था। और न ही बेबीलोन से घर वापसी वह महान कूच था जिसके बारे में भविष्यवक्ताओं ने बात की थी। वे तो अपने स्वयं के नगर और पुनर्निर्मित मन्दिर से परे देख रहे थे। अन्ततः, यहेजकेल परमेश्वर के आने वाले राज्य के बारे में भविष्यवाणी कर रहा था, जो उसकी अपनी समझ से परे था।

प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में यूहन्ना ने स्वर्ग का एक ऐसा दर्शन वर्णित किया है, जो एक अलग ही दृश्य को प्रस्तुत करता है: परमेश्वर के राज्य में कलीसिया। परमेश्वर की योजना कभी भी केवल इस्राएलियों तक ही सीमित नहीं थी; इसमें और भी बहुत कुछ अधिक शामिल है। वह पाप के प्रभावों को पूरी तरह से नष्ट करने और सम्पूर्ण संसार का नवीनीकरण करने के लिए दृढ़ संकल्पित है। एक बार फिर, मनुष्यजाति यह जान पाएगी कि परमेश्वर की उपस्थिति में लगातार जीने का क्या अर्थ है, उस नगर में जिसे “प्रभु वहाँ है” कहा जाएगा। परमेश्वर हमारे बीच होगा, और उससे जीवन सभी तक पहुँचेगा: “मैंने पवित्र नगर नए यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से उतरते देखा . . . मैंने उसमें कोई मन्दिर न देखा, क्योंकि सर्वशक्तिमान प्रभु परमेश्‍वर और मेमना उसका मन्दिर है। उस नगर में सूर्य और चाँद के उजियाले की आवश्यकता नहीं, क्योंकि परमेश्‍वर के तेज से उस में उजियाला हो रहा है, और मेमना उसका दीपक है” (प्रकाशितवाक्य 21:2, 22-23)।

हमसे पहले के इस्राएलियों की तरह हम भी भविष्य की ओर देख कर जीते हैं। हम राजा के आगमन और उसकी मुक्ति की पूर्णता की अपेक्षा में भविष्य की ओर झुके रहते हैं। हम यीशु के राज्य में उसके साथ रहेंगे और उस आनन्द का अनुभव करेंगे, जो उसके साथ होने से आता है। इस जीवन में जो कुछ भी है, उससे सन्तुष्ट न हो जाएँ, और यहाँ तथा अब की निराशाओं के कारण हताश न हो जाएँ। हमारे सर्वश्रेष्ठ दिन हमारे सामने हैं, परमेश्वर के नगर में।

यहेजकेल 47:1-12

22 अप्रैल : अविश्वास का मार्ग

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22 अप्रैल : अविश्वास का मार्ग
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“उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उनके साथ खड़ा था।” यूहन्ना 18:5

गतसमनी के बग़ीचे में जब सैनिक उस व्यक्ति को पकड़ने के लिए पहुँचे, जिसे यहूदी नेताओं के फैसले के अनुसार अब मरना होगा, तो केन्द्रीय पात्र निस्सन्देह प्रभु यीशु था। लेकिन यहूदा ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई— और हमें एक कठोर पाठ सिखाया।

यहूदा के द्वारा मसीह का विश्वासघात गहरे इनकार में निहित गहरे पाखण्ड को प्रकट करता है। उसका विश्वासघात यह दर्शाता है कि कैसे एक हृदय, जो दिखने में तो परमेश्वर के निकट प्रतीत होता है, अविश्वास के मार्ग पर चलते हुए कठोर हो जाता है— वह मार्ग जो विश्वासघात और भ्रष्ट साथियों से भरा पड़ा है।

गतसमनी का बग़ीचा कोई साधारण बग़ीचा नहीं था। शिष्य इसे भली-भाँति जानते थे। यीशु और बारह शिष्यों के लिए यह स्थान संगति करने, विश्राम करने, और निस्सन्देह कई खुशहाल यादों का स्थान था। और फिर भी, इसी सुन्दर स्थान में यहूदा ने मसीह के साथ विश्वासघात किया। यह काफी चौंकाने वाली बात है कि उसने ऐसा घिनौना काम करने के लिए ऐसे स्थान को चुना जो इतनी घनिष्ठता का प्रतीक था। यह ऐसा था मानो कोई व्यभिचारी अपने शयनकक्ष में व्यभिचार करके अपने जीवनसाथी के साथ विश्वासघात करता है।

कल्पना कीजिए कि यहूदा रास्ते पर चल रहा है और सैनिकों और यहूदी अधिकारियों का एक समूह उसके पीछे-पीछे आ रहा है (यूहन्ना 18:3)। जो व्यक्ति आत्मिक रूप से पूरी तरह खो चुका था, अब एक मार्गदर्शक बना हुआ था: एक अंधा दूसरे अंधे को मार्गदर्शन कर रहा था। अविश्वास का मार्ग ऐसा अकेलेपन का स्थान है, जो अक्सर निराशाजनक साथियों के झूठे आराम को खोजता है।

बग़ीचा एक सुन्दर और शान्त स्थान था, लेकिन फिर भी वह एक घृणित घटना का साक्षी बना। जब हम उन स्थानों के बारे में सोचते हैं, जहाँ हमें मसीह के साथ विश्वासघात करने के लिए ललचाया गया—एक खूबसूरत छुट्टी पर, अपने घरों की आरामदायक स्थिति में, यहाँ तक कि उन स्थानों पर जहाँ पहले मसीह से हमारी मुलाकात हो चुकी है, जहाँ उसने हमें आशीर्वाद दिया, हमें आकर्षित किया, और हमारे दिलों को जीता—तो हम स्पष्ट रूप से अपने हृदय की विकृति को देख सकते हैं, जब हम यहूदा के विश्वासघात में उसके साथ एक हो जाते हैं।

यहूदा का उदाहरण हमें याद दिलाता रहे कि हमें हमेशा सतर्क रहना चाहिए। मसीही जीवन में लापरवाही की कोई जगह नहीं है, फिर चाहे आपने जो भी किया हो, जो भी देखा हो, और आपकी कलीसिया में आपकी स्थिति जो भी हो। आखिरकार, यहूदा ने यीशु के साथ तीन साल बिताए थे, उसके चमत्कार देखे थे, और उसकी शिक्षा सुनी थी। फिर भी उसने उसे धोखा दिया। “इसलिए जो समझता है, ‘मैं स्थिर हूँ,’ वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।” (1 कुरिन्थियों 10:12)।

हम कैसे शिष्य बने रह सकते हैं और यहूदा द्वारा अपनाए गए दुखद मार्ग से बच सकते हैं? जैसे परमेश्वर का वचन बार-बार हमें चेतावनी देता है, हमें धीरे-धीरे कठोरता की ओर बढ़ते हुए हृदय से सावधान रहना चाहिए, जो हमें अविश्वास के मार्ग पर ले जाता है। इसके बजाय, हमें पवित्र आत्मा की सुननी चाहिए, जब वह हमारा मार्गदर्शन करता है। हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारे हृदयों में कोमलता, हमारे मनों में खुलापन, और हमारी आत्माओं में एक प्रेरणा आए जो हमसे कहे, “अब, आगे बढ़ो और इस मसीह को अपनाओ!”

यहूदा का कठिन पाठ यह है कि केवल परमेश्वर की कृपा से ही हम खड़े रह सकते हैं। इसलिए प्रार्थना करें कि आप कभी भी विश्वासघातियों में न पाए जाएँ: प्रभु, मुझे शंका और इनकार के असली प्रलोभनों से बचाइए। मुझे आपकी सुरक्षा और प्रावधान की अद्‌भुत आशिषें को दिखाइए, और मेरे आश्वासन का नवीनीकरण कीजिए कि आप उनमें से किसी को खोने नहीं देंगे जिन्हें पिता ने आपको दिया है।

यूहन्ना 10:11-30

21 अप्रैल : परमेश्वर द्वारा चुने गए

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21 अप्रैल : परमेश्वर द्वारा चुने गए
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“जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिए पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों, कि उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो, जिसे उसने हमें उस प्रिय में सेंतमेंत दिया।” इफिसियों 1:4-6

विलियम शेक्सपियर के दि मर्चेण्ट ऑफ वेनिस नाटक में पात्र पोर्शिया एक भाषण देती है, जो नाटककार की दया और माफी के सिद्धान्तों के प्रति भावना को दर्शाता है:

हालाँकि तुम न्याय के लिए पुकारते हो, तौभी याद रखो:

कि जब न्याय होगा, तो हममें से कोई भी उद्धार को नहीं देख पाएगा।

हम दया के लिए प्रार्थना करते हैं।[1]

जब हम चुनाव के सिद्धान्त पर विचार करते हैं—कि परमेश्वर ने “पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों”— तो हमें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि “परमेश्वर ने सभी को क्यों नहीं चुना?” बल्कि हमें यह पूछना चाहिए, “परमेश्वर ने किसी पर भी दया करने का निर्णय क्यों लिया?” सच यह है कि यदि केवल न्याय ही लागू होता, तो हम सभी अपराधी ठहरते, क्योंकि हमारी पापों का परिणाम यही तो है। फिर भी, हमसे अपने प्रेम के कारण परमेश्वर ने यह चुना कि हम “नाश न हों, बल्कि अनन्त जीवन पाएँ” (यूहन्ना 3:16)। उसने हमें हमारी किसी भी अच्छाई के कारण नहीं चुना (जो हमारे लिए गर्व का कारण बनता), बल्कि सिर्फ अपने प्रेम के कारण चुना (जो हमें उसकी स्तुति और आराधना करने के लिए प्रेरित करता है)।

हमारे चुनाव को समझने का एक प्रभाव यह है कि यह हमें हमारे पापों को और अधिक गम्भीरता से लेने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि उसने हमें इस उद्देश्य के लिए चुना कि “हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों” (इफिसियों 1:4)। दूसरे शब्दों में, जबकि उसने हमें इस कारण से नहीं चुना कि हम पवित्र हैं, हमें इसलिए चुना गया है कि ताकि हम पवित्र बनाए जाएँ। जब परमेश्वर के चुनावी प्रेम में विश्वास करने का यह परिणाम निकलता है कि हम जैसे चाहें वैसे जीने का अधिकार रखते हैं, तो कुछ गम्भीर रूप से गलत है। वास्तव में, जो लोग लगातार पाप में जीते हैं और फिर भी उद्धार पाने का दावा करते हैं, वे यह दिखाते हैं कि उन्होंने परमेश्वर या उसके सुसमाचार को समझा ही नहीं है।

इसके विपरीत, यह प्रमाण कि हमें परमेश्वर द्वारा चुना गया है, उसके लिए अलग किया गया है, और परमेश्वर ने अपने पवित्र आत्मा के माध्यम से हममें अपना कार्य किया है, यह अन्ततः इस रूप में दिखाई देता है कि हम धीरे-धीरे उसके पुत्र के स्वरूप में रूपान्तरित हो रहे हैं। नैतिक पवित्रता में वृद्धि यह सबसे बड़ा संकेत है कि हम यीशु मसीह के प्रति गहरे समर्पण में जी रहे हैं। परमेश्वर के चुनावी प्रेम में वास्तविक रुचि और आश्चर्य हमें यीशु की सुन्दरता के अनुरूप ढालता जाता है।

हम उन लोगों के जीवन में क्या देखने की उम्मीद करेंगे जो इसे वास्तव में समझते हैं? शायद ढिठाई, आत्म-केन्द्रित बातचीत, या मसीही विश्वास की खाली रक्षा नहीं। नहीं—हम विनम्रता के साथ सुरक्षा, उनकी बातचीत में खुद के बजाय मसीह की बातें, और आनन्द तथा बलिदान से भरे जीवन देखेंगे। आपके अपने जीवन में भी आपको यह दिख सकता है और दिखना चाहिए, चाहे अपूर्ण रूप से ही लेकिन लगातार वृद्धि करते हुए। यही है जो आप में वृद्धि करेगा और आप मुस्कुराते हुए और आश्चर्य की भावना से अपने आप से कह पाएँगे, “वास्तव में मैंने उसे  नहीं चुना; उसने मुझे  चुना है।”

निर्गमन 20:1-21

20 अप्रैल : सर्वशक्तिमान प्रभु, कोमल चरवाहा

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20 अप्रैल : सर्वशक्तिमान प्रभु, कोमल चरवाहा
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“देखो, प्रभु यहोवा सामर्थ्य दिखाता हुआ आ रहा है, वह अपने भुजबल से प्रभुता करेगा; देखो, जो मजदूरी देने की है वह उसके पास है और जो बदला देने का है वह उसके हाथ में है। वह चरवाहे के समान अपने झुण्ड को चराएगा, वह भेड़ों के बच्चों को अँकवार में लिए रहेगा और दूध पिलाने वालियों को धीरे-धीरे ले चलेगा।” यशायाह 40:10-11

संयुक्त राज्य अमेरिका कभी भी सम्प्रभुओं या उनकी सम्प्रभुता के प्रति उत्साही नहीं रहा है। हम ऐसे व्यक्ति को पसन्द करते हैं, जिसे हम एक पद पर वोट देकर चुन सकें और आवश्यकता पड़ने पर उसे पुकार सकें—और जब चाहें तो उसे हटा भी सकें! और यदि हम ईमानदारी से कहें, तो हमारे परमेश्वर के प्रति भी हमारा दृष्टिकोण प्रायः ऐसा ही होता है। हम नियन्त्रण करना पसंद करते हैं, न कि नियन्त्रित होना।

हालाँकि, परमेश्वर को न तो हम अपने नियन्त्रण में रख सकते हैं और न ही उसे अपने स्वरूप में ढाल सकते हैं। वह सर्वशक्तिमान प्रभु है, जिसका अस्तित्व हमारी मानव दुर्बलता और सीमित स्वभाव के ठीक विपरीत है। हम घास और बसन्त के फूलों की तरह हैं, जो मुरझा जाते हैं और झड़ जाते हैं। परमेश्वर के साथ ऐसा नहीं होता, जो सभी कालों से सब कुछ पर शासन और राज्य करता है। यहाँ तक कि उसका वचन भी हमेशा के लिए स्थिर है (यशायाह 40:6-8)।

अपनी सम्प्रभुता में परमेश्वर ने एक अद्‌भुत विजय प्राप्त की है: पाप और मृत्यु पर विजय। अपनी विशाल बुद्धिमत्ता में, वह जो विधाता है, एक मानव रूप में यीशु बनकर आया, उस व्यवस्था-विधान का पालन किया और उसे पूरा किया जो उसने स्वयं दिया था, और फिर पापियों की जगह मरकर हमारे ऋण का भुगतान किया और हमें शाश्वत जीवन दिया। जैसा कि पतरस ने अपने प्रचार में कहा, “उसी को परमेश्‍वर ने मृत्यु के बन्धनों से छुड़ाकर जिलाया; क्योंकि यह अनहोना था कि वह उसके वश में रहता” (प्रेरितों 2:24)। यही है उसकी  विजय।

हालाँकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान प्रभु है, वह हमारा कोमल चरवाहा भी है। वह अपनी प्रजा के पास ऐसे नहीं आता, जैसे एक कड़क जनरल युद्धभूमि में जाता है; इसके बजाय वह अपनी भेड़ों को अपने पास रखते हुए दया के साथ उनका मार्गदर्शन करता है। जो लोग पहले उदास, पराए और दोषी थे, और मृत्यु के डर में जी रहे थे, वे अब स्वतन्त्र किए गए हैं। विजय-घोष के साथ वह कहता है, “मैंने तेरे उस नाम से, जो तू ने मुझे दिया है उनकी रक्षा की। मैंने उनकी चौकसी की, और विनाश के पुत्र को छोड़ उनमें से कोई नष्ट नहीं हुआ” (यूहन्ना 17:12)।

हम परमेश्वर की सम्प्रभुता में आनन्दित हो सकते हैं, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान और कोमल है, वह चरवाहा है जो खोई हुई भेड़ों को लाने और अपना उद्देश्य पूरा करने में व्यस्त है। जब वह काम करता है, तो उसकी आवाज़ सुनाई देती है और बहरे सुनने लगते हैं, उसकी रोशनी चमकती है और अंधे देखने लगते हैं। हम इस कोमल चरवाहे के दिल में समेटे गए हैं और यह विश्वास रख सकते हैं कि यह संसार हमारे सर्वशक्तिमान पिता का है।

मसीही जीवन में एक चुनौती यह है कि परमेश्वर के बारे में हमारा दृष्टिकोण इतना बड़ा हो कि हम उसे “प्रभु परमेश्वर” के रूप में जानें, जो “शक्ति के साथ आता है” और जिसके सामने हम श्रद्धा और सम्मान के साथ आते हैं, जो “एक चरवाहे के समान अपनी भेड़ों की चरवाही करेगा” और जिसका अनुसरण हम घनिष्ठ मित्रता में करते हैं। प्रभु यीशु शेर और मेमना दोनों है (प्रकाशितवाक्य 5:5-6)। आपको इनमें से किसे याद रखना और उसके अनुसार जीना सबसे कठिन लगता है? दोनों को याद रखें और आप अपने सम्प्रभु और अपने चरवाहे के रूप में उसका आज्ञापालन करेंगे और उसमें आनन्दित होंगे।

यहेजकेल 34:11-24

19 अप्रैल : छुटकारे के लिए चेतावनियाँ

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19 अप्रैल : छुटकारे के लिए चेतावनियाँ
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“इसलिए जो समझता है, ‘मैं स्थिर हूँ,’ वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।” 1 कुरिन्थियों 10:12

एक जीवनी में, लेखक जब लिखते हैं और पाठक जब पढ़ते हैं, तो उन्हें मुख्य पात्र के दोषों को छुपाने का एक बड़ा प्रलोभन होता है। इसके विपरीत, पवित्रशास्त्र अपने नायकों के दोषों, असफलताओं और पापों को छुपाने का कोई प्रयास नहीं करता। और आत्मिक विजय के बाद ही प्रायः पराजय का खतरा सबसे अधिक महसूस होता है।

विश्वास की एक विजय में नूह ने आज्ञापालन करते हुए जहाज बनाना जारी रखा, जबकि अभी बारिश की एक बूँद भी नहीं गिरी थी। लेकिन हम पढ़ते हैं कि बाढ़ के बाद नूह ने अपनी नशे की स्थिति में क्या-क्या होने दिया (उत्पत्ति 9:20-27 देखें)। अब्राम विश्वास के मार्ग पर चला, लेकिन बाद में उसने मिस्र में जाने पर अपने झूठ के कारण अपने को और अपने परिवार को शर्मिन्दा किया (12:10-20)। दाऊद ने गोलियत पर विजय प्राप्त की, लेकिन बाद में वह व्यभिचार (और सम्भवतः बलात्कार), हत्या और अराजकता जैसे कुकृत्य कर बैठा (2 शमूएल 11 से आगे)।

ये सभी पात्र महान व्यक्ति थे, जिन्होंने परमेश्वर के कार्य में बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, और जिन्होंने असफलताएँ भी झेलीं। वे ऊँचे पर खड़े हुए, और फिर जोर से गिरे। बाइबल हमें इन उदाहरणों को बहाने बनाने के लिए नहीं, बल्कि चेतावनी देने के रूप में देती है, ताकि जब सब कुछ ठीक चल रहा हो, तो हम आत्म-सन्तुष्ट न हो जाएँ, दूसरों से बहुत अधिक उम्मीद न करें—और वास्तव में, खुद से भी ज्यादा उम्मीद न करें!

थियोलॉजियन ए. डब्ल्यू. पिंक हमें याद दिलाते हैं, “परमेश्वर इसे इस प्रकार होने की अनुमति देता है कि श्रेष्ठ से श्रेष्ठ मनुष्य भी केवल मनुष्य ही होते हैं। चाहे वे कितने ही प्रतिभाशाली क्यों न हों और परमेश्वर की सेवा में कितने ही समृद्ध और महान क्यों न हों, यदि परमेश्वर की सहायक शक्ति एक क्षण के लिए भी उनसे हटा ली जाए, तो यह शीघ्र ही स्पष्ट हो जाएगा कि वे ‘मिट्टी के बर्तन’ मात्र हैं। कोई भी व्यक्ति तब तक नहीं खड़ा रहता जब तक उसे दिव्य अनुग्रह का समर्थन प्राप्त न हो। सबसे अनुभवी संत भी, यदि उसे अपने हाल पर छोड़ दिया जाए, तो वह तुरन्त पानी की तरह कमजोर और चूहे की तरह डरपोक दिखाई देगा।”[1]

दयालु परमेश्वर हमें अकेला नहीं छोड़ता: वह हमें धार्मिकता, उद्धार, सत्य, और उसका वचन प्रदान करता है, ताकि हम हर परीक्षा और प्रलोभन को न केवल सहन कर सकें, बल्कि उनमें मजबूत खड़े रह सकें। जब हम अपने अन्दर उन्हीं कमजोरियों और असफलताओं को पहचान लेते हैं, जो नूह, अब्राम, और दाऊद जैसे नायकों ने अनुभव की थीं, तब हम परमेश्वर की कृपा और शक्ति पर निर्भर हो जाते हैं, जो हमें हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के द्वारा सहारा देती है, जो हमारा एकमात्र सच्चा “मुक्ति का मार्ग” है (1 कुरिन्थियों 10:13)। यह हमारे लिए एक अनुस्मारक के रूप में काम करे कि आप अपनी विश्वास-यात्रा में आगे बढ़ रहे हैं, पवित्रता में वृद्धि कर रहे हैं, या परमेश्वर के राज्य के लिए संसार को प्रभावित करने में अपनी शक्ति, बुद्धि या चरित्र के कारण नहीं, बल्कि परमेश्वर के अनुग्रह के कारण सफल हो रहे हैं। जो व्यक्ति इसे सच में जानता है, वह आत्म-सन्तोष को एक गम्भीर खतरा मानता है और प्रार्थना को अनिवार्य समझता है, क्योंकि वह जानता है कि केवल प्रभु ही है जो उसे हर दिन, हर क्षण खड़ा रख सकता है। क्या आप यह जानते हैं?

1 कुरिन्थियों 10:1-13

18 अप्रैल : परमेश्वर बेहतर जानता है

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18 अप्रैल : परमेश्वर बेहतर जानता है
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“हे यहोवा, न तो मेरा मन गर्व से और न मेरी दृष्‍टि घमण्ड से भरी है; और जो बातें बड़ी और मेरे लिए अधिक कठिन हैं, उनसे मैं काम नहीं रखता। निश्चय मैं ने अपने मन को शान्त और चुप कर दिया है, जैसा दूध छुड़ाया हुआ लड़का अपनी माँ की गोद में रहता है, वैसे ही दूध छुड़ाए हुए लड़के के समान मेरा मन भी रहता है।” भजन 131:1-2

एक बच्चे से उसकी माँ का दूध छुड़ाना उसके लिए पीड़ादायी हो सकता है, लेकिन यह स्वस्थ विकास और परिपक्वता के लिए आवश्यक होता है। आज के पश्चिमी समाज में यह प्रक्रिया बहुत छोटी उम्र में उसका व्यक्तित्व पूरी तरह से विकसित होने से पहले ही हो जाती है। जब यह भजन लिखा गया था, तब बच्चे से उसकी माँ का दूध छुड़ाने की प्रक्रिया आमतौर पर तीन वर्ष की उम्र के आसपास होती थी।

इसलिए बच्चे के लिए यह एक उलझन भरा संघर्ष हो सकता है, क्योंकि वह कुछ ऐसा छोड़ने की कोशिश कर रहा होता है, जिससे उसे पहले आनन्द मिलता था। लेकिन एक बार जब बच्चा दूध छोड़ देता है, तो वह “शान्त और स्थिर” हो जाता है; अब वह यह समझ जाता है कि उसकी जरूरत अब भी पूरी होगी, और अब वह अपनी माँ के साथ समय का आनन्द ले सकता है, और अब ऐसा वह उससे कुछ पाने के लिए नहीं करेगा, बल्कि इसलिए क्योंकि वह उसकी माँ है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि दूध छुड़ाया हुआ बच्चा यह भी सीख लेता है कि उसकी माँ जानती है कि उसके लिए सबसे अच्छा क्या है, भले ही उससे एक आरामदायक चीज़ को ले लिया गया हो और यह फैसला उसके तीन साल के नजरिए से उलझन भरा लग रहा हो।

दूध छुड़ाए हुए बच्चे के समान हमें भी आध्यात्मिक बच्चों के रूप में यह समझ लेना चाहिए कि हम हमेशा अपने लिए यह फैसला नहीं कर पाते कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। हमें भरोसा रखना चाहिए कि हमारा स्वर्गिक पिता बेहतर जानता है। फिर भी, बहुत बार हमारे गर्वीले हृदय हमें परमेश्वर के रहस्यमय तरीके पर सवाल उठाने के लिए उकसाते हैं। हम जानना चाहते हैं कि हम क्यों दर्द, परेशानी या हानि का सामना कर रहे हैं, लेकिन हम यह पहचान नहीं पाते कि हमारे सवाल हमारे अहंकार को प्रकट कर सकते हैं।

सवाल अवश्य होंगे; ये हमारी यात्रा का हिस्सा होते हैं। लेकिन सच्चा सन्तोष तब मिलता है, जब हम अपने सवालों को संयमित करना सीख लेते हैं। सन्तोष कहता है, “भले ही मैं समझ न सकूँ, फिर भी मैं भरोसा करूँगा।” हमें इसका ध्यान रखना चाहिए कि अपने अहंकार में हम यह न माँगने लग जाएँ कि कुम्हार हमें बताए कि उसने बर्तन को इस तरह से क्यों बनाया (यशायाह 45:9)। परमेश्वर की सिद्ध इच्छा और तरीके रहस्यमय होते हैं, लेकिन वे हमेशा अच्छे होते हैं, क्योंकि वह हमारा पिता है।

प्रभु की सहायता से, हम खुद को यह सिखा सकते हैं कि हम उसके प्रावधान पर ध्यान केन्द्रित करें और खुद को याद दिलाएँ कि हमारी परिस्थितियाँ अस्थाई हैं, कि हमारा पिता जानता है कि वह इनमें क्या कर रहा है, और यह भी कि ये परिस्थितियाँ हमारे आनन्द और महिमा को हमसे छीन नहीं सकतीं, जो अन्ततः मसीह में हमारे लिए हैं। इस प्रकार, हमारी आत्मा शान्त हो सकती है।

मसीही जीवन में, सन्तोष अक्सर भ्रम और असुविधा के अनुभव के माध्यम से पाया जाता है, जब हम यह कहना सीख जाते हैं, “मेरा पिता यहाँ प्रभारी है और मेरे अच्छे के लिए काम कर रहा है क्योंकि मैं उसकी सन्तान हूँ। मुझे समझने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं उस पर भरोसा कर सकता हूँ। मेरे पास वह है, और वह मेरे लिए पर्याप्त है। इस तूफान में भी मेरी आत्मा शान्त है।” यह कितनी अद्‌भुत सच्चाई है जिसे आज कहा जा सकता है!

भजन 34

17 अप्रैल : डर से विश्वास की ओर

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17 अप्रैल : डर से विश्वास की ओर
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“मरियम मगदलीनी ने जाकर चेलों को बताया, ‘मैं ने प्रभु को देखा, और उसने मुझ से ये बातें कहीं।’” यूहन्ना 20:18

वह क्या है जो डर को विश्वास में बदल डालता है?

यीशु की क्रूस पर मृत्यु के बाद उसके चेले पूरी तरह से टूट चुके थे, और निराश तथा उत्पीड़न के डर से एक साथ इकट्ठे थे। उनमें से एक, यहूदा, पहले ही आत्महत्या करके मर चुका था। एक और, पतरस, दबाव में आकर अपने अगुवा और शिक्षक यीशु को नकार चुका था, जिसे उन्होंने निर्दयता से मारे जाते हुए देखा था। ऐसा लग रह था मानो उनकी आशाएँ और सपने उसी के साथ मर गए थे। फिर भी, कुछ ही सप्ताह बाद ये निराश लोग यरूशलेम की सड़कों पर खड़े होकर साहस के साथ ऐलान कर रहे थे कि यीशु मसीह मृतकों में से जी उठा है। इन लोगों का भयावह डर साहसिक विश्वास में कैसे बदल गया था? क्या हममें भी वही बदलाव आ सकता है? इसका उत्तर केवल मृतकों में से जी उठा यीशु है।

चेलों की यहूदी पृष्ठभूमि ने उन्हें यह विश्वास दिलाया था कि मसीह प्रकट होगा और हमेशा के लिए रहेगा। इस मान्यता के कारण आरम्भ में वे यीशु की मृत्यु से न केवल निराश हो गए थे, बल्कि यह उन्हें प्रतापी विजय के स्थान पर सम्पूर्ण पराजय प्रतीत हो रहा था। किन्तु यीशु की मृत्यु के बाद अब अचानक साहस के साथ यह प्रचार करने का, कि यीशु ही वास्तव में मसीह है, एक ही सम्भव कारण हो सकता था: उन्होंने मृतकों में से जी उठे मसीह को देख लिया था। यदि ऐसा न हुआ होता, तो वे या तो स्नेही भाव से या फिर कटु भाव से केवल इतना ही याद रखते कि यीशु उनका प्यारा शिक्षक था। एक मृत व्यक्ति में कैसी माफी और आशा प्राप्त की जा सकती है? लेकिन मृतकों में से जी उठे मसीह के साथ अब अचानक सब कुछ बदल जाता है।

बाइबल हमें प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ बताती है कि चेलों ने मृतकों में से जी उठे मसीह से मुलाकात की (जैसे यूहन्ना 20:11–21:23 में)। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि चेलों ने उनके ऊपर हावी हो चुके उनके विश्वास के कारण पैदा हुए भ्रम में यीशु को देखा था। लेकिन याद रखें कि आरम्भ में उन्होंने उसके जी उठने पर विश्वास नहीं किया था! वास्तव में, पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि वे बन्द दरवाजों के पीछे डर और निराशा में बैठे थे (20:19)। और यदि उन्होंने मृतकों में से जी उठे और शासन करते हुए मसीह की कल्पना कर भी ली होती, तो वे शायद ऐसे यीशु के बारे में नहीं सोचते, जो झील के किनारे पर मछली पका कर खा रहा था, जिसके शरीर पर क्रूस पर मारे जाने के निशान अभी भी थे, और जो सड़कों पर चलता था और कई तरीकों से उनसे मिलता था। न ही वे खुद को इतने डरपोक व्यक्तियों के रूप में चित्रित करते, और न ही उस समय के समाज में महिलाओं की गवाही को शामिल करते (जिसे उस संस्कृति में मान्य नहीं माना जाता था)। इसके बजाय, वे अपने को बहादुर और प्रमुख व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करते, जो खाली क़ब्र के पहले गवाह थे। खाली क़ब्र के लिए कोई भी वैकल्पिक व्याख्या उस विश्वास से भी अधिक “विश्वास” की माँग करती है, जो हमें परमेश्वर के वचन में प्रकट किया गया है।

पुनरुत्थान सब कुछ बदल देता है। हमें यीशु के मृतकों में से जी उठने के आस-पास के तथ्यों पर विचार करना चाहिए—लेकिन यह हमें जो शानदार शुभ समाचार देता है, उस पर भी हमें विचार करना चाहिए। यीशु के शारीरिक पुनरुत्थान के बिना मसीही आस्था निरर्थक है; “तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है” (1 कुरिन्थियों 15:17)। लेकिन चूंकि यीशु सचमुच मृतकों में से जी उठा है और सचमुच शासन कर रहा है, तो फिर माफी केवल उसी में मिलती है और किसी में नहीं, और आशा केवल उसी में मिलती है और किसी में नहीं। क्या आपने विश्वास की आँखों से प्रभु को मृतकों में से जी उठे हुए और शासन करते हुए देखा है? तो फिर आप, मरियम और चेलों के समान अपने सन्देहपूर्ण डर को विश्वास में बदलते हुए देखेंगे, क्योंकि आप इस आशा को अपने हृदय में और इस डरे हुए संसार में साहसिक रूप से घोषित करेंगे।

यूहन्ना 20:1-18

16 अप्रैल : कोई सामान्य मृत्यु नहीं

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16 अप्रैल : कोई सामान्य मृत्यु नहीं
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“जब यीशु ने वह सिरका लिया, तो कहा, ‘पूरा हुआ’; और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिए।” यूहन्ना 19:30

यीशु की मृत्यु के आस-पास की घटनाएँ मुख्य रूप से रोमी न्याय क्षेत्र के लिए सामान्य बात थी।

मुकद्दमे, पिटाई, अपमानजनक जुलूस, और दर्दनाक तरीके से क्रूस पर चढ़ाना, ये सभी अपराधियों को मृत्युदण्ड देने में शामिल सैनिकों के लिए सामान्य कार्य थे। फिर भी, जो सामान्य नहीं था, वह था वह अंधकार जो भरी दोपहर को पूरे घटनाक्रम पर छा गया (मत्ती 27:45), मानो परमेश्वर ने इस दुखद दृश्य पर अपनी आँखें बन्द कर ली हों। यह एक सामान्य मृत्युदण्ड होने के साथ-साथ सम्पूर्ण शाश्वतता में सबसे बड़ा मोड़ भी था।

इसे इतना महत्त्वपूर्ण बनाने वाली बात यह थी कि उस मध्य क्रूस पर लटका हुआ व्यक्ति कौन था: कोई और नहीं, बल्कि स्वयं देहधारी परमेश्वर। हमें इस पर कभी भी आश्चर्यचकित होने से नहीं रुकना चाहिए:

सूरज ने कैसे अंधकार में अपना चेहरा छिपा लिया,

और अपनी महिमा को बन्द कर लिया,

जब मसीह, महान सृष्टिकर्ता, मरा,

मनुष्य के पापों के लिए।[1]

पवित्रशास्त्र क्रूस पर मसीह की शारीरिक पीड़ा पर ज्यादा बल नहीं देता। उसने निश्चित रूप से भयानक शारीरिक दर्द सहा, लेकिन “उसके शरीर की पीड़ा उसके आत्मिक दुखों के सामने कुछ भी नहीं थी; यही उसके दुखों का वास्तविक रूप था।”[2] यीशु ने परमेश्वर पिता से सम्बन्ध के दृष्टिकोण से दूर हो जाने की पीड़ा और दर्द को पूरी तरह से अनुभव किया—शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से। आप अपने जीवन में जो भी अनुभव करते हैं, यह बात जान लीजिए कि यीशु ने इससे भी बुरा अनुभव किया है और इस प्रकार वह समझता है कि आप कैसा महसूस करते हैं। केवल इतना ही नहीं, उसने आपके लिए अकल्पनीय वेदना को भी सहा। जब समय सही आया, तब मसीह ने विजयपूर्वक कहा, “यह पूरा हुआ”—tetelestai : कर्ज चुका दिया गया और अब समाप्त हो चुका है।

मसीह की क्रूस पर मृत्यु को अक्सर ऊँचा उठाए गए क्रूस के साथ दिखाया जाता है, जिसके सामने एक भीड़ खड़ी है। जबकि वास्तविकता में, एक बार जब क्रूस को गड्ढे में खड़ा कर दिया गया था, तो उसके पैर ज़मीन के बहुत करीब रहे होंगे। इसी तरह, मसीह का जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान हमारे जीवन के ऊपर ऊँचा नहीं है, बल्कि हमारे जीवन से नजदीकी रूप से जुड़ा हुआ है। नहीं, यीशु की मृत्यु कोई सामान्य मृत्यु नहीं थी, बल्कि एक ऐसी मृत्यु थी जो विश्वास के माध्यम से सच्चा जीवन देने की प्रतिज्ञा करती है। सब कुछ बदल जाता है, जब हम उस क्रूस पर हुई सभी घटनाओं पर विचार करते हैं और अपने आप से कहते हैं:

मेरे लिए घायल, मेरे लिए घायल,

वह वहाँ क्रूस पर मेरे लिए घायल हुआ;

मेरे पाप समाप्त हो गए, और अब मैं स्वतन्त्र हूँ,

सिर्फ इसलिए क्योंकि यीशु मेरे लिए घायल हुआ।[3]

लूका 22:7-20

15 अप्रैल : एक चुनाव

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“पिलातुस ने एक दोष–पत्र लिखकर क्रूस पर लगा दिया, और उसमें यह लिखा हुआ था, ‘यीशु नासरी, यहूदियों का राजा।’” यूहन्ना 19:19

जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, तो उसके क्रूस के ऊपर एक दोष-पत्र लिखकर लगाया गया, जिसमें उसे “यहूदियों का राजा” घोषित किया गया। यद्यपि यह दोष-पत्र एक व्यंग्य के रूप में लगाया गया था, तौभी यह एक सत्य को प्रकट कर रहा था, जिसे सभी देख पा रहे थे: यीशु वास्तव में एक राजा था और आज भी राजा है! फिर भी हमें स्वयं से यह सवाल पूछना चाहिए: क्या मैं सच में अपना जीवन ऐसे जीता हूँ जैसे यीशु मेरे  जीवन का राजा है?

पवित्रशास्त्र बताता है कि यह दोष-पत्र तीन भाषाओं में लिखा गया था—अरामी में, जो पहली सदी में यरूशलेम में और उसके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश यहूदियों की भाषा थी; लातिनी में, जो रोमी साम्राज्य की आधिकारिक भाषा थी; और यूनानी में, जो व्यापार और संस्कृति की लोकप्रिय भाषा थी (यूहन्ना 19:20)। इन तीन भाषाओं में, उस समय के ज्ञात संसार के गवाहों को यह पढ़ने का अवसर मिला कि यीशु राजा है। इस चिह्न को पढ़ने के बाद सारे संसार को यह निर्णय करना पड़ा कि यीशु उनके लिए कौन था।

हम यीशु की मृत्यु की कहानी में लोगों के विभिन्न रूपों में उस संसार का और हमारे अपने संसार का एक छोटा सा दृष्टिकोण देखते हैं। पिलातुस में हम गर्वीले, संकोची और गणनात्मक राजनेता को देखते हैं। उन सैनिकों में जो यीशु को क्रूस पर कीलों से जड़ रहे थे, हम उन्हें देखते हैं जो अपने नियमित कारोबार को अंजाम देने में लगे हुए हैं। उन लोगों में जो प्रभु का उपहास कर रहे थे, हम ऐसे लोगों को देखते हैं, जिनका ईश्वर से सम्पर्क सिर्फ इतना है कि वे उसका मजाक उड़ाते हैं। दर्शकों की उस भीड़ में, हम उन लोगों को देखते हैं जिनकी किसी भी शाश्वत बात में कोई रुचि नहीं है। लेकिन फिर, अंधेरे के बीच, पास के एक क्रूस पर हम एक निराश और मरते हुए चोर को देखते हैं, जो उद्धारकर्ता की ओर आशा से देखता है—और उसे पा लेता है। और यीशु के पास खड़े उसके परिवार और दोस्तों में हम शोकित लेकिन वफादार अनुयायी देखते हैं, जो मसीह और उसके दावों के साथ खड़े हैं—और जो उसके शव को एक कब्र में रखा जाते हुए देखते हैं, जो जल्द ही खाली होने वाली थी।

इन सभी लोगों ने उस चिह्न को देखा: “यीशु नासरी, यहूदियों का राजा।” सभी ने उस चिह्न के नीचे क्रूस पर उस व्यक्ति को भी देखा। चाहे घृणा से या आशा से, सभी ने इस ऐतिहासिक घटना को देखा, और उन सभी को इसके और मसीह के व्यक्तित्व के प्रकाश में अपने जीवन को देखना था। जैसे वह चिह्न मसीह के राजत्व की घोषणा करता था, वैसे ही यीशु संसार के सर्वाधिक शक्तिशाली प्रेम की घोषणा कर रहा था।

सवाल अब भी बना हुआ है: हम इस प्रेम के साथ क्या करेंगे? हममें से प्रत्येक व्यक्ति उस भीड़ में उपस्थित चेहरों में से किसी एक के समान है, चाहे वह गर्वीला हो, निष्क्रिय हो, या वफादार हो। हम सभी को यीशु मसीह के जीवन बदलने वाले व्यक्तित्व से सामना करना पड़ता है।

क्रूस और खाली कब्र आपके रिश्तों, आपके काम, आपके उद्देश्य या आपकी पहचान को कैसे प्रभावित करते हैं? यदि यीशु आप पर राज्य करता है, तो उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान आपके जीवन जीने के तरीके और आपके जीवन के अर्थ को पूरी तरह से बदल देता है। इस व्यक्ति को देखने और उस चिह्न से सहमत हो जाने से हमें अनन्तकाल के लिए आशा और आज के लिए उद्देश्य मिल जाते हैं। “यीशु राजा है”—यहूदियों और अन्यजातियों का राजा, सारे संसार का राजा, और आपके तथा मेरे जीवन का राजा।

लूका 23:32-56

14 अप्रैल : कायरतापूर्ण समझौता

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“जब प्रधान याजकों और प्यादों ने उसे देखा, तो चिल्लाकर कहा, ‘उसे क्रूस पर चढ़ा, क्रूस पर!’ पिलातुस ने उनसे कहा, ‘तुम ही उसे लेकर क्रूस पर चढ़ाओ, क्योंकि मैं उसमें कोई दोष नहीं पाता।’ यहूदियों ने उसको उत्तर दिया, ‘हमारी भी व्यवस्था है और उस व्यवस्था के अनुसार वह मारे जाने के योग्य है, क्योंकि उसने अपने आप को परमेश्‍वर का पुत्र बनाया।’ जब पिलातुस ने यह बात सुनी तो और भी डर गया।” यूहन्ना 19:6-8

आप किसकी प्रशंसा के लिए जीएँगे?

जब पिलातुस के सामने मसीह पर मुकद्दमा चलाया गया, तो रोमी राज्यपाल ने बार-बार उसकी निर्दोषता की घोषणा तो की, किन्तु इस घोषणा के बावजूद उसने यीशु के खिलाफ भयानक कृत्य किए।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—और फिर यीशु को बर्बर तरीके से कोड़े मारे जाने के लिए सौंप दिया, एक ऐसी मार जो इतनी भयंकर होती थी कि कभी-कभी इससे नसें, धमनियाँ और आन्तरिक अंग बाहर आ जाते थे।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—और फिर सैनिकों को अनुमति दी कि वे यीशु का मजाक उड़ाने के लिए उसे एक दिखावटी राजगद्दी पर बैठाएँ, उसके सिर पर काँटों का मुकुट रखें, उसे एक राजा जैसे कपड़े पहनाएँ और उसका उपहास करते हुए उसके आगे “दण्डवत” करें।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—लेकिन क्या उसने यीशु को रिहा किया? नहीं, उसने यीशु को मृत्युदण्ड देने वाले एक निर्दयी दस्ते के हवाले कर दिया।

पिलातुस सम्भवतः मसीह से मिलने वाला ऐसा व्यक्ति था, जो सबसे अधिक पीड़ित था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जिसके पास बड़ी ताकत तो थी, लेकिन जो अपनी कायलता पर खड़ा होने का साहस नहीं रखता था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जिसने बड़ी सफलता तो हासिल की थी, लेकिन जिसने अपने पद की शोभा में समझौता किया था और खुद को एक कायर के रूप में दिखाया था। वह एक ऐसा राज्यपाल था, जो अपनी खुद की कमजोरियों के अधीन था।

हम इस बारे में निष्क्रिय या उदासीन नहीं हो सकते कि मसीह हमारे लिए कौन है। क्या वह उद्धारकर्ता हैं या क्या वह कोई नहीं हैं? पिलातुस के समान यह फैसला लेने से बचने का अर्थ है कि हम मसीह को पूरी तरह से अनदेखा कर रहे हैं।

पिलातुस हमारे लिए एक चुनौती के रूप में खड़ा है। उसका आचरण हमें यह पूछने के लिए मजबूर करता है: किन परिस्थितियों में मैं, पिलातुस की तरह, जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए, फिर भी मैं डरता हूँ कि यदि मैंने ऐसा किया तो लोग क्या कहेंगे? क्या मेरे शब्द या आचरण उन लोगों की अपेक्षाओं और प्रतिक्रियाओं, या सम्पत्ति, स्थिति, या पदोन्नति के विचारों से अधिक प्रभावित हैं, बजाय इसके कि वे मसीह के आदेशों से प्रभावित हों?

आइए हम मसीह के बारे में अपने दृष्टिकोण पर समझौता न करें। यदि हम अपने साथियों, पड़ोसियों या परिवार की राय की चिन्ता में बहुत ज्यादा खो जाते हैं, तो हो सकता है कि हम पाएँ कि हम माफी, शान्ति, स्वर्ग और स्वयं मसीह को त्याग कर एक आसान जीवन चुन रहे हैं। इसके बजाय, आइए हम साहस दिखाएँ।

फिर से मसीह को देखें: पीटा गया, उपहासित हुआ, और आपके लिए प्रेम के कारण मारा गया। फिर उन लोगों को देखें, जो शायद विरोध के साथ या शायद शालीनता के साथ उसके सत्य का मजाक उड़ाते हैं। आप किसे नाराज करना चाहेंगे? आप किसकी “शाबाशी” को सुनना चाहेंगे?

मसीह हमें अपने पास बुला रहा है, ताकि हम जाएँ और उसके लिए जीएँ। क्या आप आएँगे, और क्या आप जाएँगे?

यूहन्ना 19:1-16