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26 नवम्बर : दान क्यों दें?

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26 नवम्बर : दान क्यों दें?
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“तुम हर बात में सब प्रकार की उदारता के लिए जो हमारे द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद करवाती है, धनवान किए जाओ।” 2 कुरिन्थियों 9:11

परमेश्वर कोई स्वर्गिक मनोरंजन-विरोधी नहीं है। वह हमें ऐसा निराशाजनक जीवन जीने को नहीं कहता, जिसमें हमें बैठकर झूठी प्रसन्नता का दिखावा करना पड़े। इसके विपरीत, वह हमें सब कुछ भरपूरी से प्रदान करता है। हमें उसकी दी हुई आशिषों के लिए माफी माँगने की ज़रूरत नहीं है; लेकिन हमें उन्हें दूसरों के साथ बाँटना अवश्य है।

परमेश्वर हमें हमारी आवश्यकताओं के लिए जो कुछ भी देता है (और अक्सर उससे भी अधिक देता है), तो उसमें उसका उद्देश्य यही है कि हम दूसरों को भी दें। जब हम “धनवान किए” जाते हैं, तो पौलुस कहता है कि यह “सब प्रकार की उदारता के लिए होता है, जो हमारे द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद करवाती है।” हमने जो कुछ परमेश्वर से उपहार स्वरूप पाया है, उसे हमें दूसरों को भी परमेश्वर के उपहार स्वरूप देना है। याकूब इस विचार को चुनौतीपूर्ण रूप में आगे बढ़ाता है जब वह पूछता है: “यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो इससे क्या लाभ?” (याकूब 2:14)। उत्तर स्पष्ट है: ऐसे विश्वास का कोई लाभ नहीं है! जब हम जरूरतमंदों की मदद करने की अपनी ज़िम्मेदारी को निभाते हैं, तब हम न केवल परमेश्वर की स्तुति को प्रेरित करते हैं, बल्कि अपने विश्वास की वास्तविकता का प्रमाण भी देते हैं।

परमेश्वर हमें संसाधनों के साथ-साथ वह अनुग्रह भी देता है जिसकी जरूरत हमें सच्ची उदारता दिखाने के लिए होती है—यहाँ तक कि स्वयं का त्याग करने के लिए भी, ताकि औरों को आशीष मिल सके (2 कुरिन्थियों 8:1-3)। वही परमेश्वर है जो “सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है जिस से हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे; और हर एक भले काम के लिए तुम्हारे पास बहुत कुछ हो” (2 कुरिन्थियों 9:8)।

एक उदार मन हमें स्वार्थ से और अधिक धन इकट्ठा करने की इच्छा से बचाता है। परमेश्वर की आशीष का आनन्द कोई मजबूत आर्थिक नींव रखने में नहीं है, जिससे हम किसी शानदार जगह पर रिटायर हो सकें, बड़ी विरासत छोड़ सकें, या बचत खाते में सुकून पा सकें। बल्कि हमें जो सम्पत्ति अभी दी गई है, उसे दूसरों के साथ साझा करने के लिए बुलाया गया है, ताकि जब दूसरे उसमें सहभागी हों, तो वे परम दाता परमेश्वर में सच्चा सन्तोष पाएँ।

यदि हम ईमानदारी से कहें, तो अक्सर हम इसलिए उदारता से नहीं देते, क्योंकि हमें डर होता है कि दान दे देने के बाद कहीं परमेश्वर हमें अकेला और खाली न छोड़ दे। लेकिन पवित्रशास्त्र हमें आश्वस्त करता है कि वही परमेश्वर, जिसने हमारे बचपन में हमारी देखभाल की, वह बुढ़ापे में भी हमारी आवश्यकता पूरी करेगा (यशायाह 46:4 देखें)।

सच्चा आनन्द तब पाया जाता है जब हम अपने स्वामित्व के बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। यह हमारा सौभाग्य और उत्तरदायित्व है कि हम भले कामों में धनवान हों और दूसरों के साथ बाँटने में तत्पर हों, चाहे हमें बहुत कुछ मिला हो या थोड़ा ही। परमेश्वर से यह अनुग्रह माँगें कि आप बिना संकोच और खुशी-खुशी दे सकें, और यह कभी न भूलें: आप परमेश्वर से अधिक नहीं दे सकते।

1 कुरिन्थियों 9:6-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 15–16; लूका 7:24-50 ◊

25 नवम्बर : सत्य को जीना

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25 नवम्बर : सत्य को जीना
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“तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो।” यूहन्ना 13:17

क्या आपको कभी ऐसा समय याद आता है जब कोई अजनबी अचानक आपके पास आया हो और आपसे पूछा हो कि आप यीशु मसीह और मसीही विश्वास के बारे में क्या मानते हैं? शायद आपके ऐसे अनुभव बहुत कम या बिल्कुल नहीं हुए होंगे। निश्चय ही, हमें ऐसे अवसरों के लिए तैयार रहना चाहिए; प्रेरित पतरस हमें बताता है कि हमें उस आशा का कारण बताने के लिए तैयार रहना चाहिए जो हमारे भीतर है (1 पतरस 3:15)। लेकिन हमारे विश्वास को समझाने के अवसर अक्सर अजनबियों से हुई आकस्मिक मुलाकातों से नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन के उस तरीके से उत्पन्न होते हैं, जिसे हम अपने परिचितों के सामने प्रतिदिन जीते हैं।

हम कैसे जीते हैं और क्या मानते हैं, यह हमारे मसीह से जुड़े होने को प्रतिबिम्बित करना चाहिए। इसी कारण पतरस कहता है कि मसीही “[परमेश्‍वर की] निज प्रजा” हैं (1 पतरस 2:9)। यीशु से हमारा सम्बन्ध व्यापक और सम्पूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि हमें अब अपनी इच्छानुसार कुछ भी मानने की स्वतन्त्रता नहीं है; अब हम विवाह, लैंगिकता, धन-सम्पत्ति, या किसी भी अन्य विषय में अपने विचार नहीं बना सकते। अब हमारे विचार हमारे मसीह और गुरु, यीशु, के विचारों को प्रतिबिम्बित करने चाहिएँ। परन्तु यीशु केवल इतना नहीं चाहता कि उसके शिष्य सत्य को केवल जानें, वह यह भी चाहता है कि वे सत्य को जीएँ: “तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो।” अतः विश्वास का परिणाम कार्य में प्रकट होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी है कि अब हमें अपनी इच्छानुसार आचरण करने की स्वतन्त्रता नहीं है। हमारा व्यवहार हमारे बलिदानी उद्धारकर्ता यीशु के समान होना चाहिए।

आज की बहुत-सी आधुनिक धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष मान्यताएँ आपकी जीवनशैली से कुछ नहीं माँगतीं; वे आपको अपनी इच्छा से जीने की पूरी आज़ादी देती हैं। (वास्तव में, कई विचारधाराएँ इसी सिद्धान्त को प्राथमिकता देती हैं: “जो तुम्हें ठीक लगे वही करो।”) लेकिन मसीही शिष्यता का बुलावा बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि इसके केन्द्र में यह बुलावा है: एक ऐसे राजा का अनुसरण करना जो आप स्वयं नहीं हैं। मसीही जीवन का बुलावा केवल सुसमाचार पर विश्वास करने का नहीं, बल्कि यह भी है कि “तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो” (फिलिप्पियों 1:27)। हम सभी इसमें पीछे रह जाते हैं। क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो आपको यह पहचानने में मदद करता है—और जिसकी आप भी मदद कर सकते हैं—कि आपके व्यवहार के कौन-कौन से क्षेत्र अभी भी सुसमाचार के योग्य नहीं हैं? मसीह में एक भाई या बहन के साथ साझेदारी करें, परमेश्वर के वचन का प्रकाश एक-दूसरे पर डालें, और सत्य को जीवन में लाने का प्रयास करें!

इस संसार में परमेश्वर के सुसमाचार को पहुँचाने का परमेश्वर द्वारा निर्धारित प्राथमिक साधन कलीसिया है। आप इसका हिस्सा हैं। लेकिन यदि आप स्वयं सुसमाचार के अनुसार नहीं जीते, तो दूसरों से यह अपेक्षा मत करें कि वे आपसे सुसमाचार के बारे में पूछेंगे—और उससे भी कम यह कि वे पश्चाताप करें और विश्वास करें:

आप एक सुसमाचार लिख रहे हैं,

हर दिन एक अध्याय,

अपने कामों के द्वारा,

अपनी बातों के द्वारा।

आप जो लिखते हैं उसे लोग पढ़ते हैं,

चाहे यह बिना विश्वास के हो, या सच्चा हो।

आपके अनुसार सुसमाचार क्या है?[1]

यूहन्ना 13:31-35

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 13–14; लूका 7:1-23


[1] सामान्यतः इसका श्रेय पॉल गिलबर्ट को दिया जाता है।

24 नवम्बर : आओ, धन्यवाद करने वाले लोगो

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24 नवम्बर : आओ, धन्यवाद करने वाले लोगो
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हर बात में धन्यवाद करो … शान्ति का परमेश्‍वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे-पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें। तुम्हारा बुलाने वाला सच्चा है, और वह ऐसा ही करेगा।” 1 थिस्सलुनीकियों 5:18, 23-24

धन्यवाद देना हमेशा आसान नहीं होता, भले ही अमेरिका एक राष्ट्र के रूप में इसके लिए विशेष अवकाश निर्धारित करता है। इस अवकाश के दौरान हममें से कई लोग जीवन की ऐसी परिस्थितियों से अवगत होते हैं, जो धन्यवाद की भावना उत्पन्न नहीं करतीं। कुछ लोग अपने सबसे अकेले दिनों का सामना कर रहे होते हैं, तो कुछ लोग किसी प्रियजन के सुसमाचार से भटक जाने के भारी बोझ से दबे होते हैं। कुछ लोग इस मौसम में किसी असफलता के कारण बहुत निराश होते हैं—जैसे नौकरी का छूटना, किसी सम्बन्ध का टूटना, या एक और पदोन्नति चूक जाना। कभी-कभी हम खुद को पूरी तरह से फँसा हुआ पाते हैं, निराशा से बाहर निकलने में असमर्थ होते हैं, और कृतज्ञता से उतना ही दूर महसूस करते हैं जितना पूरब से पश्चिम दूर है।

जब हम ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं और पढ़ते हैं, “हर बात में धन्यवाद करो,” तो हम अक्सर सोचते हैं कि इसका पालन कैसे करें। फिर भी, बाइबल कभी भी किसी आज्ञा को सहायता के बिना नहीं देती।

इस प्रश्न का उत्तर कि हम निरन्तर धन्यवाद कैसे दे सकते हैं, परमेश्वर के हमारे अन्दर पवित्रीकरण के कार्य में छिपा है। “पवित्रीकरण” का अर्थ है “परमेश्वर के लिए अलग किया जाना।” जब प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवन में शासन करने आता है, तो पवित्र आत्मा हमारे अन्दर प्रवेश करता है ताकि आत्मिक विकास के लिए आवश्यक निरन्तर शुद्धिकरण कर सके। यही परमेश्वर का कार्य है जो हमें वह बनने की शक्ति देता है जो यीशु हमसे चाहता है: “क्योंकि परमेश्‍वर ही है जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलिप्पियों 2:13)।

जब हम मसीह में बने रहते हैं—“उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते” जाते हैं (कुलुस्सियों 2:7)—अपना बाइबल का अध्ययन करते हैं, प्रार्थना करना सीखते हैं, परमेश्वर के लोगों के साथ संगति रखते हैं, और दूसरों को उसके बारे में बताते हैं—तो हमें याद दिलाया जाता है कि वह हमारे लिए क्या है और उसने हमारे लिए और हमारे भीतर क्या-क्या किया है। हम भजनकार के साथ गाना सीखते हैं: “हे परमेश्‍वर, हम तेरा धन्यवाद करते, हम तेरे नाम का धन्यवाद करते हैं; क्योंकि तेरा नाम प्रगट हुआ है, तेरे आश्चर्यकर्मों का वर्णन हो रहा है” (भजन 75:1)।

हमारे अपने पछतावों और निराशाओं के बावजूद, जब हम उसके अद्‌भुत कामों—उसका क्रूस, उसका पुनरुत्थान, उसका स्वर्गारोहण, और उसके पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे अन्दर किया गया कार्य जो हमें विश्वास में लाता है और विश्वास में बनाए रखता है—को याद करते हैं, तो हम कृतज्ञता से भर सकते हैं।

हमारी परीक्षाएँ कठिन और उदास हो सकती हैं। हो सकता है हम हर क्षण में आभारी न महसूस करें। यह ठीक है, क्योंकि बात यह नहीं है कि हम क्या महसूस कर रहे हैं—मुद्दा यह है कि परमेश्वर हमें आभारी बनने का सामर्थ्य देता है। वही हमें पौलुस की शिक्षाओं को पूरा करने की शक्ति प्रदान करता है।

यदि आप इस समय अपने जीवन में कृतज्ञता की कमी महसूस कर रहे हैं, तो कम से कम एक क्षण के लिए अपनी परिस्थितियों से ध्यान हटाएँ और परमेश्वर के प्रेम के उपहार पर मनन करें। जब आप मसीह में बने रहते हैं और परमेश्वर के आत्मा को उसका पवित्रीकरण का कार्य जारी रखने देते हैं, तो वह आपको भीतर से जागृत करेगा, ताकि आँसुओं, पीड़ा और निराशा के बावजूद, जब वह पुकारे, “आओ, हे कृतज्ञ जनो, आओ,”[1] तो आप उसका उत्तर दे सकें।

  भजन 149

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 10–12; लूका 6:27-49 ◊


[1] हेनरी एलफर्ड, “कम, ये थैंकफुल पीपल, कम” (1844).

23 नवम्बर : पीड़ा का सवाल

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23 नवम्बर : पीड़ा का सवाल
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“भूमि तेरे कारण शापित है। तू उसकी उपज जीवन भर दुख के साथ खाया करेगा।” उत्पत्ति 3:17

कोई भी व्यक्ति पीड़ा से अछूता नहीं है। चाहे वह किसी प्रियजन की मृत्यु हो, कोई दर्दनाक निदान, कार्यस्थल पर संघर्ष, टूटा हुआ रिश्ता, या कोई अन्य कष्टदायक परिस्थिति—परीक्षाएँ केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होतीं। पूरे पवित्रशास्त्र में हमें पीड़ा के अनेक उदाहरण मिलते हैं।

जैसे-जैसे हम जीवन जीते हैं और बाइबल पढ़ते हैं, यह बात निर्विवाद रूप से स्पष्ट हो जाती है कि पीड़ा मानव अस्तित्व का एक स्वाभाविक हिस्सा है।

जब हम इस सच्चाई को स्वीकार कर लेते हैं, तब एक सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न हमारे मन में उठता है: “क्यों?” लोग पीड़ा क्यों सहते हैं? सभी विश्वदृष्टियाँ और धर्म इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते हैं: “दर्द केवल एक भ्रान्ति है।” “कोई परमेश्वर नहीं है; दर्द व्यर्थ है।” “दर्द परमेश्वर के नियन्त्रण से बाहर है।” “दर्द वर्तमान या पूर्व जीवन के कर्मों का फल है।” इन सभी उत्तरों में एक बात समान है: ये कोई आशा नहीं देते। लेकिन परमेश्वर स्वयं हमें एक बेहतर उत्तर देता है।

हालाँकि परमेश्वर शैतान को धोखा देने से, या आदम और हव्वा को धोखा खाने से, या यहाँ तक कि पीड़ा को पूरी तरह रोक सकता था। फिर भी परमेश्वर ने पीड़ा का उपयोग करने का मार्ग चुना, ताकि मनुष्य प्रेमपूर्वक आज्ञाकारिता और उद्धारकर्ता की आवश्यकता का अर्थ सीख सके। यह हमारी स्वतन्त्रता ही है, जो इस पाठ को सीखने को सम्भव बनाती है। परमेश्वर ने हमें रोबोट की तरह नहीं बनाया; वह चाहता था कि हम स्वेच्छा और प्रेम से उसकी सेवा-उपासना करें, न कि मजबूरी या डर से। दुख की बात यह है कि उसी स्वतन्त्रता में मानवता ने परमेश्वर से अलग जीवन चुन लिया, जिसके भयानक परिणाम हुए। और जब भी हम पाप करते हैं, हम दिखाते हैं कि हम आदम और हव्वा से अलग नहीं हैं।

परमेश्वर जानता था कि पुरुषों और महिलाओं को इस सच्चाई का सामना करना होगा कि उसके विरुद्ध विद्रोह करना मूर्खता है। इसी कारण उसने आदम और हव्वा को जीवन के वृक्ष से दूर कर दिया (उत्पत्ति 3:22–24)। इसी कारण यह संसार और हमारे शरीर भी अब वैसे काम नहीं करते, जैसा इन्हें बनाया गया था (उत्पत्ति 3:16–19)। जैसे कोई विद्रोही बच्चा अपनी गलती समझ कर स्वेच्छा से घर लौट आता है और अपने परिवार की अधिक सराहना करता है, वैसे ही हम भी परमेश्वर के प्रेम की लालसा करते हुए उसके पास लौट सकते हैं। परमेश्वर ने पाप को उसकी समस्त भयानकता के साथ संसार में आने की अनुमति दी, ताकि हम अपने चुनावों के परिणामों को महसूस कर सकें और जब वह बुराई से भरी इस दुनिया में अपने प्रेम की सुन्दरता प्रकट करता है, तब हम उसे और भी अधिक प्रेम करना सीखें।

सी.एस. लुईस ने इस प्रकार कहा: “परमेश्वर हमारे सुख में फुसफुसाता है, हमारी अन्तरात्मा में बोलता है, परन्तु हमारे दर्द में चिल्लाता है। यह एक बहरे संसार को जगाने के लिए उसका मेगाफोन है।”[1]

परमेश्वर बुराई का रचयिता नहीं है, लेकिन वह बुराई पर सम्प्रभु हैं। इसलिए हमें यह आशा है: एक दिन वह सारी बुराई को समाप्त कर देगा। फिलहाल, वह सब कुछ वैसा ही रहने देता है, ताकि हमारी परीक्षाओं के बीच हम उस दुखी सेवक को थामे रहें जो हमारा उद्धारकर्ता है। इस पतित संसार के जीवन में आपके निराशा भरे अनुभव आपको यह सोचने पर मजबूर न करें कि परमेश्वर मौजूद नहीं हैं या उसे कोई परवाह नहीं है। बल्कि ये अनुभव बार-बार आपको आपके उद्धारकर्ता की ओर लौटाएँ—जो यह प्रतिज्ञा करता है कि वह एक दिन हर बुराई का अन्त करेगा और आपके सामने एक ऐसा अनन्त भविष्य रखेगा जिसमें सब कुछ ठीक होगा।

  लूका 15:11-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 7–9; लूका 6:1-26


[1] द प्रोब्लम ऑफ पेन (हार्पर कोलिंस, 2001), पृ. 91.

22 नवम्बर : स्वर्ग का चित्र

“मैंने दृष्‍टि की, और देखो, हर एक जाति और कुल और लोग और भाषा में से एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था, श्वेत वस्त्र पहने और अपने हाथों में खजूर की डालियाँ लिए हुए सिंहासन के सामने और मेमने के सामने खड़ी है, और बड़े शब्द से पुकारकर कहती है, ‘उद्धार के लिए हमारे परमेश्‍वर का, जो सिंहासन पर बैठा है, और मेमने का जय–जय कार हो!’” प्रकाशितवाक्य 7:9-10

स्वर्ग के बारे में हमारे कई विचार और गीत वास्तव में बाइबल कम आधारित हैं और विक्टोरियन युग के ईसाई धर्म तथा यूनानी दार्शनिक प्लेटो की शिक्षा पर आधारित ब्रह्मांड-दृष्टिकोण पर अधिक आधारित हैं। कुछ कलाकारों ने जैसा दिखाया है कि हम बादलों पर बैठकर वीणा बजाते रहेंगे—ऐसा स्वर्ग में नहीं होगा। हम इससे कहीं अधिक बेहतर काम करेंगे। पवित्रशास्त्र हमें दिखाता है कि हम परमेश्वर की स्तुति और मेमने की आराधना करेंगे।

प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें मेमने के चारों ओर के प्रशंसा के सतत बढ़ते हुए घेरे को देखने के लिए आमन्त्रित करती है। पहले घेरे में हम चार जीवित प्राणी और चौबीस प्राचीनों को देखते हैं, जो धूप चढ़ाते हैं और स्तुति का नया गीत गाते हैं (प्रकाशितवाक्य 5:8-9)। दूसरे घेरे में, पद 11-13 में, हजारों-हजार स्वर्गदूत उसे आदर देते हैं, और फिर समस्त सृष्टि के सारे प्राणी इस गीत में सम्मिलित हो जाते हैं।

इसके बाद, प्रकाशितवाक्य की पुस्तक उन लोगों को उजागर करती है, जो मेमने के लहू से छुड़ाए गए हैं (7:4, 9)। उन्हें 1,44,000 की निश्चित संख्या में और एक ऐसी भीड़ के रूप में दर्शाया गया है, जिसे कोई गिन नहीं सकता। वे एक ओर इस्राएल की बारह जातियों से हैं, और दूसरी ओर हर जाति और भाषा के लोगों का समूह हैं। ये विवरण एक-दूसरे के विरोधी लग सकते हैं, लेकिन परमेश्वर के दृष्टिकोण से यह बिल्कुल संगत है। निश्चित संख्या पूर्णता और समाप्ति को दर्शाती है; परन्तु मनुष्य की दृष्टि से वह भीड़ इतनी विशाल है कि उसे गिना नहीं जा सकता।

परमेश्वर की दृष्टि में, जो लोग छुड़ाए गए हैं, वे उसके चुने हुए बेटे और बेटियाँ हैं, और हर जाति का प्रतिनिधित्व करते हुए। वह हर एक को व्यक्तिगत रूप से जानता है। फिर भी, उसकी प्रजा सभी लोगों में से बुलाई गई है। यह परमेश्वर की पूर्ण और सम्पूर्ण विजय का दृश्य है—और उसकी प्रजा उसकी जयजयकार करते हुए उसकी विजय में आनन्दित होती है।

इसलिए, हालाँकि इस दृश्य का आरम्भ चार जीवों और चौबीस प्राचीनों से होता है, लेकिन यह हजारों-हजारों की भीड़ तक पहुँचता है, जैसा कि पौलुस कहता है: “जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे हैं, वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें” (फिलिप्पियों 2:10, विशेष बल दिया गया है)। हमारी स्तुति उस अनगिनत भीड़ की स्तुति से जुड़ जाएगी, और हम सभी यह घोषणा करेंगे कि मसीह वह मेमना है जो बलिदान हुआ, कि उसके लहू से हमारे पाप धो दिए गए हैं, कि हम धार्मिकता को धारण किए हुए हैं, और कि उसकी संगति में हम अनन्तकाल तक जीवित रहेंगे।

एक दिन हम मसीह के चारों ओर इस स्तुति के घेरे में शामिल होंगे, और हमारा प्रिय दूल्हा विजयी सिंह और दीन मेमने के रूप में आगे बढ़ेगा। लेकिन हमें तब तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम अभी भी उसकी ओर अपनी दृष्टि लगाए हुए आराधना का गीत गा सकते हैं। एक दिन आप उसके सामने खड़े होंगे और उसे देखेंगे! और तब तक, आप प्रतिदिन उस दिन की ओर बढ़ते जा रहे हैं।

प्रकाशितवाक्य  7:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 4– 6; लूका 5:17-39 ◊

21 नवम्बर : चुप रहो और सुनो

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21 नवम्बर : चुप रहो और सुनो
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“हाय उस पर जो काठ से कहता है, जाग, या अबोल पत्थर से, उठ! क्या वह सिखाएगा? देखो, वह सोने चाँदी में मढ़ा हुआ है, परन्तु उसमें आत्मा नहीं है। परन्तु यहोवा अपने पवित्र मन्दिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहे।” हबक्कूक 2:19-20

हबक्कूक के समय का संसार उथल-पुथल अवस्था में था और ऐसा प्रतीत होता था कि अब उसकी कोई सुध नहीं ली जा सकती। उसका अपना हृदय भी बहुत व्याकुल था, जिससे वह परमेश्वर से यह पूछने को प्रेरित हुआ कि जो कुछ हो रहा है, वह उसे क्यों होने दे रहा है (हबक्कूक 1:2-3)। भविष्यवक्ता चाहता था कि कुछ किया जाए। वह उत्तर चाहता था। वह परिवर्तन चाहता था। और परमेश्वर ने हबक्कूक से कहा, याद रखो कि मैं अब भी राज्य करता हूँ। याद रखो कि मैं कौन हूँ, और तुम कौन हो। परमेश्वर अब भी “अपने पवित्र मन्दिर में” उपस्थित था, और सम्पूर्ण पृथ्वी पर सम्प्रभुता के साथ शासन कर रहा था। उसने पहले ही उस योजना को निश्चित कर दिया था जिसके द्वारा उसकी इच्छा पूरी होनी थी। इस सच्चाई को स्वीकार करना हबक्कूक के लिए नम्रता और मौन का बुलावा था। यद्यपि उसके पास प्रश्न और शिकायतें थीं, और यद्यपि परमेश्वर ने उसे उन्हें उठाने की अनुमति दी थी, परन्तु उससे भी अधिक आवश्यक यह था कि वह परमेश्वर की बातों को सुने और उन पर विचार करे।

हम इस मौन के बुलावे को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में देखते हैं। परमेश्वर भजनकार के माध्यम से कहता है, “चुप हो जाओ, और जान लो कि मैं ही परमेश्‍वर हूँ” (भजन संहिता 46:10)। नए नियम में, जब यीशु अपनी स्वर्गिक महिमा में रूपान्तरण पर्वत पर पतरस, याकूब और यूहन्ना के सामने प्रकट हुआ और पतरस ने डर के कारण जो पहली बात मन में आई, कह दी, तब यह दिव्य वाणी शिष्यों ने सुनी: “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रसन्न हूँ : इसकी सुनो” (मत्ती 17:5, विशेष बल दिया गया)।

जब समय कठिन होता है, तो हम में से कुछ लोग अपने स्वभाव के अनुसार एक कार्यकर्ता की तरह प्रतिक्रिया करते हैं: समस्या को हल करना है, इसलिए हम स्वयं को समाधान खोजने में झोंक देते हैं। हममें से कुछ निराशावादी हो जाते हैं: इस समस्या का कोई समाधान नहीं है, इसलिए हम उसके नीचे दब जाते हैं या उससे बचने के लिए व्यर्थ की गतिविधियों में लग जाते हैं। दोनों ही प्रतिक्रियाएँ इस कारण होती हैं कि हम परमेश्वर के सामने शान्त होकर उसकी बातों को सुनने और विचार करने के लिए रुकते नहीं हैं। हम एक शोरगुल से भरी दुनिया में जीते हैं: शब्द, शब्द, शब्द—विशेषज्ञों, प्रोफेसरों और नेताओं की निरन्तर बकबक। लेकिन यदि हम परमेश्वर की नहीं सुनेंगे, तो अन्ततः हम किसी ऐसी मूरत पर भरोसा कर बैठेंगे जो बोल ही नहीं सकती (हबक्कूक 2:18-19)। मूरतें न हमारे जीवन के बारे में, न ही हमारे संसार की परिस्थितियों के बारे में कोई सत्य बात कह सकती हैं।

जब कठिन दिनों का सामना होता है, तो हबक्कूक हमें स्मरण कराता है, “समस्त पृथ्वी उसके सामने शान्त रहे।” हमारे पास सभी उत्तर नहीं हैं, और न ही विशेषज्ञों के पास हैं। प्रश्न करना या समाधान खोजना गलत नहीं है, परन्तु यदि ऐसा करते हुए हम परमेश्वर के वचन को सुनने और उसकी आवाज़ पर ध्यान देने को अनदेखा कर दें, तो यह गलत है। हमारे चारों ओर चाहे जो कुछ भी हो रहा हो, हमें सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि हम याद रखें कि प्रभु अपने पवित्र मन्दिर में है, और वह अपने सिंहासन से अपने लोगों की भलाई के लिए इतिहास का संचालन कर रहा है। यही वह नींव है, जिस पर हम इस संसार में परमेश्वर के कार्य को समझने की समझदारी की रूपरेखा बना सकते हैं।

क्या आपको ऐसा लगता है कि राष्ट्र क्रोधित हो रहे हैं और राज्य हिल रहे हैं? क्या पर्वत डगमगा रहे हैं और लहरें उछाल मार रही हैं (भजन 46:2-3, 6)? शान्त हो जाएँ, जान लें कि परमेश्वर ही परमेश्वर है, और उसकी सुनें।

भजन 46

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 1–3; लूका 5:1-16

20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना

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20 नवम्बर : धन्यवाद से अभिभूत होना
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“उसी में चलते रहो, और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्‍वास में दृढ़ होते जाओ, और अधिकाधिक धन्यवाद करते रहो।” कुलुस्सियों 2:6-7

यदि हम एक भरे हुए गिलास को लेकर चल रहे हों और अचानक कोई हमसे टकरा जाए, तो जो कुछ भी उस गिलास में है, वही बाहर निकलेगा। यही सिद्धान्त हमारे चरित्र पर भी लागू होता है: यदि हमारे भीतर कड़वाहट, कृतघ्नता, ईर्ष्या या जलन भरी हुई है, तो थोड़ा-सा “धक्का” ही इन भावनाओं को बाहर लाने के लिए पर्याप्त होता है।

जब पौलुस ने कुलुस्से के मसीही विश्वासियों को लिखा, तो उसने उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे एक आभारी हृदय से पहचाने जाएँ—जो कि मसीही जीवन की एक प्रमुख विशेषता है। पौलुस ने इस धन्यवाद को व्यक्त करने के लिए जिस शब्द का उपयोग किया है, “अधिकाधिक” (कुलुस्सियों 2:7), वह यूनानी शब्द perisseuo है, जिसका अर्थ होता है “बहकर निकलना” या “उफन पड़ना।” पौलुस का तात्पर्य स्पष्ट है: जब लोग इन विश्वासियों से “टकराएँ,” तो जो बाहर निकले वह कृतज्ञता होनी चाहिए।

जब स्त्री-पुरुष मसीह द्वारा परिवर्तित नहीं होते, तो उनके जीवन में अक्सर कृतघ्नता का ही शासन होता है—और उसके फलस्वरूप कड़वाहट, शिकायत, क्रोध और द्वेष भी उनमें भरा रहता है। परन्तु मसीह में विश्वासियों का जीवन इस प्रकार बदलता है कि वे कृतघ्नता की जगह धन्यवाद, कड़वाहट की जगह आनन्द, और क्रोध की जगह शान्ति को अपनाते हैं। हमने परमेश्वर की सम्पूर्ण सच्चाई में प्रकट हुए अनुग्रह की खुशखबरी को सुना है और मन फिराकर तथा विश्वास करके उसकी ओर लौटे हैं। हमारे पाप क्षमा कर दिए गए हैं। हमारे भीतर उसका आत्मा वास करता है। हम परमेश्वर की कलीसिया में एक नए परिवार का हिस्सा हैं। हमारे सामने अनन्त जीवन है। हम प्रार्थना के द्वारा स्वर्गिक सिंहासन तक पहुँच सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, हमारे पास आभारी होने के लिए काफी कुछ है। कृतज्ञता मसीही जीवन का गीत बन जाती है—जो भीतर से उफनता रहता है।

इस प्रकार की कृतज्ञता के गहरे प्रभाव होते हैं। यह हमारी दृष्टि को परमेश्वर की ओर मोड़ देती है और हमें स्वयं पर तथा अपनी परिस्थितियों पर केन्द्रित रहने से हटा देती है। यह हमें शैतान की कानाफूसी से बचाती है, जो हमें निराशा की ओर खींचती है और परमेश्वर की कही बातों पर अविश्वास करने को प्रेरित करती है। यह हमें घमण्ड से भी सुरक्षित रखती है, और हमारे शब्दकोश से ऐसे वाक्य मिटा देती है जैसे—“मुझे इससे ज्यादा मिलना चाहिए था” या “मेरे साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था।” और यह हमें इस सच्चाई में विश्राम करने देती है कि परमेश्वर अपनी प्रेमपूर्ण योजना को केवल सुखद और उत्साहवर्धक अनुभवों में ही नहीं, बल्कि अस्थिर और पीड़ादायक परिस्थितियों में भी पूरा करता है। केवल अनुग्रह के द्वारा ही हम यह सीख सकते हैं: “हर बात में धन्यवाद करो” (1 थिस्सलुनीकियों 5:18, अतिरिक्त बल दिया गया है)।

कृतघ्नता का एकमात्र इलाज मसीह के साथ मेल में ही पाया जाता है। क्या आप अपने भीतर यह अनुभव करते हैं कि परमेश्वर ने आपको जो नहीं दिया, उसके लिए कोई कड़वाहट या असन्तोष अब भी बाकी है? तो उस भावना को मसीह के चरणों में ले आएँ, मसीह से क्षमा माँगें, और उससे यह प्रार्थना करें कि वह आपको दिखाए कि उसने अपने सुसमाचार में आपको कितना कुछ निशुल्क दे दिया है। हर दिन कुछ समय निकालें और परमेश्वर से प्राप्त आशिषों को लिखें और उन्हें स्वयं को याद दिलाएँ। तब आप वास्तव में कृतज्ञता से उफनने लगेंगे।

भजन 103

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 28–29; लूका 4:31-44 ◊

19 नवम्बर : आत्म-सन्तोष पर एक चेतावनी

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19 नवम्बर : आत्म-सन्तोष पर एक चेतावनी
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“मैं तुमसे सच कहता हूँ कि ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिए घर या भाइयों या बहिनों या माता या पिता या बाल–बच्चों या खेतों को छोड़ दिया हो, और अब इस समय सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहिनों और माताओं और बाल–बच्चों और खेतों को, पर सताव के साथ और परलोक में अनन्त जीवन। पर बहुत से जो पहले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, वे पहले होंगे।” मरकुस 10:29-31

यीशु की प्राथमिकता यह नहीं है कि हम आरामदायक जीवन जीएँ।

जब एक धनी युवक ने यीशु से अनन्त जीवन पाने की बात की, लेकिन अपनी सम्पत्ति को त्यागने को तैयार न होकर दुखी होकर चला गया, तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा: “परमेश्‍वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है।” (मरकुस 10:25) इसके उत्तर में पतरस ने—जो ऐसे अवसरों पर अक्सर तुरन्त बोल पड़ता था—यह इंगित किया कि उसने और बाकी शिष्यों ने यीशु का अनुसरण करने के लिए बहुत कुछ त्याग दिया है (पद 28)।

सम्भवतः पतरस इस बात की पुष्टि चाहता था कि वह और अन्य शिष्य यीशु की उस चेतावनी से “सुरक्षित” हैं, क्योंकि उन्होंने अपनी सम्पत्ति छोड़ दी है। और वास्तव में, यीशु ने उत्तर में उन्हें उत्साहवर्धक आश्वासन दिया कि जो कोई भी उसके और सुसमाचार के लिए बहुत कुछ त्याग देता है, वह भरपूर प्रतिफल पाएगा। दूसरे शब्दों में, इस जीवन में और आने वाले युग में भी परमेश्वर उनकी देखभाल करेगा। लेकिन यीशु केवल अपने शिष्यों को अच्छा महसूस कराने में रुचि नहीं रखता था। इसलिए उन्होंने इसके साथ एक गम्भीर चेतावनी भी जोड़ दी: “बहुत से जो पहले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, पहले होंगे।”

हम कल्पना कर सकते हैं कि पतरस ने ये शब्द सुनकर स्वयं की तुलना उस धनी युवक से की होगी और राहत महसूस की होगी। लेकिन शायद यीशु का उद्देश्य यही नहीं था। धन के विषय में तो वह पहले ही बात कर चुका था। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि यीशु अपने शिष्यों को चेतावनी दे रहा था: सावधान रहो कि कहीं आत्म-सन्तुष्टि तुम्हें न घेर ले। ऐसे लोग हैं जो अपने आप को “पहले” समझते हैं—ऐसे बहुत सारे लोग हैं, जिन्हें या तो संसार या फिर कलीसिया कहती है कि वे “पहले” हैं—परन्तु एक दिन यीशु का न्याय उन्हें चौंका देगा। वे लोग जो चुपचाप, बिना मान्यता पाए, अपना सब कुछ यीशु के लिए अर्पित करते हैं, उन्हीं के लिए यीशु सबसे ऊँचा सम्मान सुरक्षित रखता है।

शायद हम भी पतरस की तरह अपने आप को यीशु की सम्पत्ति सम्बन्धी चुनौती से सुरक्षित मानते हैं—या तो इसलिए कि हमारे पास सम्पत्ति है ही नहीं, या फिर इसलिए कि हमने पहले ही बहुत कुछ त्याग दिया है। हमें हमेशा कोई न कोई ऐसा जरूर मिलेगा जो हमसे अधिक धनी है या जिसने हमसे कम त्याग किया है—और फिर हम अपनी आत्मिक सुरक्षा की भावना उसी तुलना पर आधारित कर देते हैं। लेकिन यीशु का उद्देश्य हमें आरामदायक महसूस कराना नहीं है। बल्कि वह हमें आत्म-सन्तोष से बाहर बुलाता है और समर्पण के साथ उसका अनुसरण करने के लिए बुलाता है। सापेक्ष गरीबी कोई गुण नहीं है, वैसे ही जैसे कि सापेक्ष सम्पन्नता कोई दोष नहीं है। यीशु ने हमें यह प्रतिज्ञा दी है कि वह हमारी देखभाल करेगा, और हमें बुलाया है कि हम अपनी सुरक्षा उस कार्य में खोजें जो उसने हमारे लिए पूरा किया है—न कि उस कार्य में जो हम उसके लिए कर रहे हैं। दूसरों से तुलना करके उत्पन्न आत्म-सन्तोष के आगे मत झुकें। बल्कि यीशु के उस बुलावे को सुनें जो उसने बाद में पतरस को तब दिया जब पतरस ने पूछा कि यूहन्ना का जीवन उसके जीवन से अलग होगा या नहीं: “तू मेरे पीछे हो ले!” (यूहन्ना 21:22)।

भजन 73

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 25–27; लूका 4:1-30

18 नवम्बर : मूल बात का सार

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18 नवम्बर : मूल बात का सार
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“जैसे मनुष्यों के लिए एक बार मरना और उसके बाद न्याय का होना नियुक्त है, वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिए एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं उनके उद्धार के लिए दूसरी बार बिना पाप उठाए हुए दिखाई देगा।” इब्रानियों 9:27-28

अन्तिम और निश्चित आँकड़ा यही है कि हर एक व्यक्ति को मरना है। मृत्यु जीवन की एकमात्र सुनिश्चितता है। एक मसीही के रूप में, यद्यपि हम मृत्यु की घटना से डर सकते हैं, परन्तु हमें उसके परिणाम से डरने की आवश्यकता नहीं है।

हमें डरने की ज़रूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि यीशु केवल हमारे सुखों में वृद्धि करने, हमें जीवन में सफलता या सांसारिक समृद्धि देने के लिए नहीं आया, बल्कि वह पापियों को उद्धार देने और न्याय से बचाने के लिए आया।

बाइबल सिखाती है कि जिन लोगों के नाम जीवन की पुस्तक में नहीं पाए जाते, उन पर परमेश्वर का न्याय और अनन्त दण्ड आएगा (प्रकाशितवाक्य 20:11-15)। तो फिर हम कैसे सुनिश्चित हो सकते हैं कि हमारे नाम उस पुस्तक में लिखे होंगे? इसका केवल एक ही उपाय है: प्रभु यीशु में विश्वास करना। हमें मसीह की ओर देखना है, जो खुले हृदय से उन सब को क्षमा करता है और धर्मी ठहराता है, जो मन फिराकर और विश्वास से उसके पास आते हैं। और यीशु के पास आना केवल बौद्धिक सहमति देना नहीं है—यद्यपि वह आवश्यक है। केवल मसीही सिद्धान्तों को समझना ही पर्याप्त नहीं है। हमें यह पहचानना होगा कि हमने परमेश्वर के साथ सही व्यवहार नहीं किया है। हमने उसे अस्वीकार किया है और उसका विरोध किया है। हमें अपने जीवन को उसकी प्रेमी प्रभुता के अधीन कर देना है और पूरी तरह उस पर निर्भर होना है जो मसीह ने क्रूस पर हमारे लिए किया, ताकि हम परमेश्वर के सामने स्वीकृत हो सकें।

मूल प्रश्न यह नहीं है कि क्या हम यीशु या बाइबल के बारे में कुछ तथ्य मानते हैं, या क्या हमने अपनी जीवनशैली को सुधार लिया है। असली सवाल यह है: क्या हम कभी आत्मिक रूप से इतने प्यासे हुए हैं कि हमने पुकारा हो, “हे प्रभु यीशु मसीह, मुझे अपना जीवन जल दे ताकि मैं फिर कभी प्यासा न रहूँ”?

लेकिन क्या होगा यदि यीशु हमें ठुकरा दे? क्या होगा यदि हमारा नाम जीवन की पुस्तक में दर्ज होने ही नहीं वाला? यीशु ने स्वयं यह प्रतिज्ञा करते हुए इस डर का उत्तर दिया: “जो कोई मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूँगा।” (यूहन्ना 6:37)

क्या आपने परमेश्वर के इस बुलावे की करुणा को पहचाना है? क्या आपने यीशु में शरण लेने के लिए परमेश्वर का बुलावा सुना है? क्या आप उसे हर दिन नए सिरे से सुनते हैं और उसके पंखों की छाया में शरण लेते हैं (भजन 57:1)? हम भजन लेखक के साथ कह सकें:

मैं जैसे था वैसे ही यीशु के पास आया,

थका हुआ, बोझिल और दुखी;

मैंने उसमें विश्राम का स्थान पाया,

और उसने मुझे आनन्दित कर दिया।[1]

क्योंकि यदि हमने पुत्र में शरण ली है, तो हम यह निश्चित तौर पर जान सकते हैं कि उसने हमारे पापों को अपनी मृत्यु में उठा लिया है, और जब वह लौटेगा, तब हमें भयावह दण्ड नहीं, बल्कि महिमामय स्वागत मिलेगा। और फिर हम यह सत्य सुन सकते हैं कि “मनुष्यों के लिए एक बार मरना नियुक्त है”, और फिर भी हमारा हृदय शान्त बना रह सकता है।

  भजन 49 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 22–24; लूका 3 ◊


[1] होराटियस बोनार, “आई हर्ड द वोयस ऑफ जीज़स सेय” (1846).

17 नवम्बर : आशिषें और श्राप

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17 नवम्बर : आशिषें और श्राप
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“फिर अपने परमेश्‍वर यहोवा की सुनने के कारण ये सब आशीर्वाद तुझ पर पूरे होंगे … परन्तु यदि तू अपने परमेश्‍वर यहोवा की बात न सुने, और उसकी सारी आज्ञाओं और विधियों के पालने में जो मैं आज सुनाता हूँ चौकसी नहीं करेगा, तो ये सब शाप तुझ पर आ पड़ेंगे।” व्यवस्थाविवरण 28:2, 15

मोआब के मैदानों में यरदन नदी के किनारे इस्राएली लोग अन्ततः उस देश में प्रवेश करने पर थे, जिसे परमेश्वर ने उन्हें देने की प्रतिज्ञा की थी। मूसा ने लोगों को अन्तिम बार सम्बोधित किया, यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हुए कि वे पिछली पीढ़ी की तरह अवज्ञा करके परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को खराब न करें। उसने उन्हें स्मरण कराया कि परमेश्वर ने अतीत में क्या कहा और क्या किया, और उसने उन्हें परमेश्वर के महान हस्तक्षेप के और वाचा निभाने वाली विश्वासयोग्यता के आधार पर परमेश्वर के लिए एक अलग किए हुए लोग बने रहने का आग्रह किया।

मूसा की शिक्षाओं के माध्यम से परमेश्वर ने अपने लोगों के सामने दो स्पष्ट विकल्प रखे—और अपेक्षाएँ बहुत ऊँची थीं। उसने उन्हें आशीर्वाद की एक प्रतिज्ञा दी और फिर एक चेतावनी दी। उसने उनसे एक सरल प्रश्न किया: वे कैसा जीवन जीने वाले हैं? क्या वे वाचा का पालन करेंगे और देश में आशीर्वादों का आनन्द लेंगे, या वे अवज्ञा करेंगे और उस देश से निकाल दिए जाएँगे?

जो लोग उस देश की सीमा पर एकत्रित हुए थे, उन्होंने शायद परमेश्वर के वचनों को सुनकर कहा होगा, अरे नहीं, ऐसी अवज्ञा तो हमसे कभी नहीं होगी! लेकिन कुछ सौ वर्षों के बाद हम उन्हें कहाँ पाते हैं? “बेबीलोन की नहरों के किनारे हम लोग बैठ गए, और सिय्योन को स्मरण करके रो पड़े . . . हम यहोवा के गीत को, पराए देश में कैसे गाएँ?” (भजन 137:1, 4)। विदेशी लोगों के बन्दी बनकर इस्राएली पीछे मुड़कर देखते हैं और सोचते हैं कि वे इस दशा तक कैसे पहुँच गए।

एक पतित संसार में जीते हुए प्राणी के रूप में आप और मैं बहुत ही असुरक्षित, प्रलोभन के खतरे में, और बार-बार परीक्षा में पड़ने के खतरे में बने रहते हैं। हम अवज्ञा से और परमेश्वर से दूर हो जाने से केवल एक निर्णय की दूरी पर होते हैं। हमें परमेश्वर की सहायक कृपा की अत्यन्त आवश्यकता है। दुख की बात यह है कि बहुत से लोग जो कभी समर्पित, प्रतिबद्ध और प्रतिज्ञा किए हुए देश की ओर बढ़ते प्रतीत होते थे, वे सिर्फ लड़खड़ाए नहीं, बल्कि अविश्वास में गिर पड़े। और हमारी सबसे बड़ी गलती यह सोच है, “अरे नहीं, यह तो मेरे साथ कभी नहीं होगा!”

दुष्ट एक झूठ फैलाना पसन्द करता है—कि परमेश्वर ने हमें अपना व्यवस्था-विधान और आज्ञाएँ इसलिए दी हैं ताकि वह हमारे जीवन को फीका बना दे, हमें आनन्द से वंचित कर दे, और हमारे दिन दुखों और पीड़ाओं से भर दे। यह सब झूठों में सबसे बड़ा झूठ है। परमेश्वर ने अपना वचन हमारे भले के लिए दिया है! पवित्रशास्त्र की सभी चेतावनियाँ इसलिए दी गई हैं कि जब हम विनाश के कगार पर खड़े हों तो हमें चेताएँ और हमें नियन्त्रण में रखें; पवित्रशास्त्र की सभी प्रतिज्ञाएँ इसलिए दी गई हैं कि जब हम भयभीत और अनिश्चित हों तो हमें सम्भालें; और पवित्रशास्त्र की सभी आज्ञाएँ इसलिए दी गई हैं कि हमें परमेश्वर के संसार में, परमेश्वर की उपस्थिति में, परमेश्वर की आशिषों से भरे जीवन में ले जाएँ। हमारी भलाई के लिए उसकी प्रतिबद्धता सबसे पूर्ण रूप से उसके पुत्र में प्रकट होती है, जो हमारी अवज्ञा के शाप को सहने के लिए आया, ताकि हम वह आशीष पा सकें जो केवल वही पाने के योग्य था।

क्या आप परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर आपसे प्रेम करता है? तो फिर उसकी चेतावनियों पर ध्यान दें, उसकी आज्ञाओं का पालन करें, और उसकी प्रतिज्ञाओं की सान्त्वनाओं को संजो कर रखें।

गलातियों 3:10-14

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 1 इतिहास 19–21; लूका 2:22-52