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22 अगस्त : अपने निम्नतर स्तर पर परमेश्वर को पाना

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22 अगस्त : अपने निम्नतर स्तर पर परमेश्वर को पाना
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“यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया . . . पर यहोवा यूसुफ के संग-संग रहा और उस पर करुणा की, और बन्दीगृह के दारोगा के अनुग्रह की दृष्‍टि उस पर हुई।” उत्पत्ति 39:20-21

जब पोतीपर की पत्नी ने यूसुफ पर झूठा आरोप लगाया, तो एक बार फिर से वह अपने जीवन के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया। इस बार उसे किसी गड्ढे में नहीं, बल्कि अन्धेरे कारागार में डाल दिया गया। उसका संसार पूरी तरह बिखर।

फिर भी, एक परमेश्वर-भक्त और सिद्धान्तों पर चलने वाले व्यक्ति के रूप में यूसुफ ने धैर्य बनाए रखा। उसने पोतीपर की पत्नी के प्रलोभन से भागने का निर्णय अपने धार्मिक विश्वास और शुद्धता के आधार पर लिया था। यूसुफ के लिए परमेश्वर का भय जेल के भय से कहीं बड़ा था। वह पोतीपर की पत्नी के साथ सम्बन्ध नहीं बना सकता था, क्योंकि ऐसा करना परमेश्वर के विरुद्ध पाप होता। यह तथ्य यूसुफ के लिए किसी भी आन्तरिक संघर्ष का अन्त था और निर्णय लेने के लिए पर्याप्त था।

ऐसा ही दृष्टिकोण हमें भी संकीर्ण मार्ग पर बनाए रखेगा। सच्ची निष्ठा व्यवहारिक सोच से नहीं, बल्कि सिद्धान्तों से आती है। यह जीवन के कोलाहल से दूर, एक शान्त स्थान पर निर्णय लेने की प्रक्रिया है। यह परिणामों की परवाह किए बिना आज्ञाकारिता है। यह परमेश्वर का जन बनने के लिए इतना दृढ़ निश्चय करना है कि जब पाप करने का दबाव सबसे अधिक हो या जब जीवन पूरी तरह से टूट जाए, तब भी हमें पता हो कि हमें कैसे प्रतिक्रिया देनी है।

जब यूसुफ ने अन्यायपूर्ण पीड़ा सही, तब परमेश्वर ने अपने प्रेम का प्रदर्शन किया और उसे जेल के अधिकारी की दृष्टि में अनुग्रह प्रदान किया। कहानी में कहीं भी ऐसा संकेत नहीं है कि यूसुफ ने परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की थी—और यदि वह किसी मित्र या सहायक की तलाश में भी होता, तो उसे कभी उम्मीद नहीं होती कि जेल का अधिकारी ही उसका सहायक बन जाएगा! लेकिन परमेश्वर की योजनाएँ कुछ और ही थीं। प्रभु की उपस्थिति उसके लोगों के साथ सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बनी रहती है।

समय-समय पर हम सभी को ऐसा लगता है कि हम भी किसी “कारागार”—जीवन के एक नए निम्न स्तर पर में हैं, जहाँ हमें ठण्डे एकान्त ने जकड़ लिया हो। शायद आज आप भी वैसा ही महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आप भी यूसुफ की तरह झूठे आरोपों के शिकार हुए हों, या प्रभु के प्रति आपकी आज्ञाकारिता की कीमत चुका रहे हों, या फिर कोई और भारी बोझ आपकी आत्मा को थका रहा हो। लेकिन चाहे जो भी हो, प्रभु सब कुछ जानता है। वह कभी किसी चीज़ से चौंकता नहीं है, और वह आपसे अनन्त प्रेम करता है। उसका प्रेम अटल है और परिस्थितियों से नहीं बदलता। उसने आपसे इतना प्रेम किया कि उसने मृत्यु की काल-कोठरी और नरक की यातना को सह लिया ताकि आपको ऐसा कभी न करना पड़े। इस सच्चाई में शान्ति पाएँ कि जैसा भविष्यवक्ता जकर्याह ने कहा, “जो तुम को छूता है, वह [परमेश्वर की] आँख की पुतली ही को छूता है” (जकर्याह 2:8)।

लूका 8:22-39

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 110–112; 2 कुरिन्थियों 1 ◊

21 अगस्त : अब और तब

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21 अगस्त : अब और तब
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“क्योंकि मेरे लिए जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है। पर यदि शरीर में जीवित रहना ही मेरे काम के लिए लाभदायक है तो मैं नहीं जानता कि किसको चुनूँ। क्योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूँ; जी तो चाहता है कि कूच करके मसीह के पास जा रहूँ, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है, परन्तु शरीर में रहना तुम्हारे कारण और भी आवश्यक है।” फिलिप्पियों 1:21-24

क्या आपको याद है जब बचपन में आप अपने रिश्तेदारों से मिलने जाया करते थे? शायद कुछ मुलाकातें ऐसी थीं जिनका आपको डर रहता था क्योंकि जिनसे आप मिलने जा रहे थे, वे आपके करीबी नहीं थे या आप उनके साथ सहज महसूस नहीं करते थे। लेकिन फिर कुछ विशेष मुलाकातें भी थीं, उन लोगों के साथ जिन्हें आप वास्तव में प्यार करते थे। शायद उनके दरवाजे पर पहुँचकर आपका स्वागत आपको गले से लगाकर किया जाता हो या ताज़ा बेक किए हुए कुकीज़ की खुशबू से किया जाता हो। आप उनसे मिलने के लिए उत्साहित रहते थे! वे आपके लिए अनमोल थे, और आप उनकी उपस्थिति में रहने के लिए उत्सुक रहते थे।

प्रेरित पौलुस के लिए ऐसा व्यक्ति स्वयं यीशु था। पौलुस कैद में रहते हुए भी आनन्दित रहता था, क्योंकि मसीह उसके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था। वह उस समय की प्रतीक्षा में था, जब उसे यीशु की उपस्थिति में बुलाया जाएगा। यीशु उसके लिए सब कुछ था।

क्या आप और मैं यीशु के बारे में ऐसा कह सकते हैं? या फिर हमारी खुशी केवल सांसारिक चीज़ों पर आधारित है—जैसे हमारी शादी, बच्चे, आजीविका, या प्रभाव? यदि आपकी आत्मा की सारी उत्तेजना और आपकी पहचान केवल सांसारिक चीज़ों में ही बंधी हुई है, तो यीशु के साथ होने की चाहत फीकी पड़ जाती है। इसलिए यह याद रखना बुद्धिमानी होगी कि हमारी असली पहचान उसी में है, क्योंकि एक दिन हमें बाकी सब कुछ पीछे छोड़ना होगा।

आपने शायद यह कहावत सुनी होगी कि कोई व्यक्ति इतना अधिक स्वर्गिक विचारों में लीन हो सकता है कि वह पृथ्वी पर किसी काम का न रहे। लेकिन हम इतने सांसारिक विचारों में भी उलझ सकते हैं कि स्वर्ग के लिए बेकार हो जाएँ। कई बार, हमें यह इच्छा होती है कि हमें अभी और यहीं पर सम्पूर्ण स्वास्थ्य, दुखों का अन्त और एक निश्चिन्त जीवन मिल जाए। लेकिन वास्तविकता यह है कि हमें प्रियजनों को खोना पड़ेगा, अस्पतालों से डरावनी रिपोर्टें मिलेंगी, और हमें निराशा व आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। यह सब हमारे “अभी” का हिस्सा है। इस पत्र में पौलुस की दुविधा थी कि “अभी” और “आगे” के बीच सन्तुलन कैसे बनाए रखा जाए। हालाँकि वह इस संसार से जाने की लालसा रखता था, लेकिन यह इसलिए नहीं था कि वह अपनी वर्तमान परिस्थितियों से भागना चाहता था। निस्सन्देह उसने कई कठिन परीक्षाओं का सामना किया, लेकिन उसके लिए स्वर्ग केवल सांसारिक पीड़ा से राहत नहीं था। वह जीवन से बचकर मृत्यु की ओर भाग नहीं रहा था, बल्कि वह यीशु के साथ रहने की अभिलाषा कर रहा था क्योंकि वह जानता था कि वह अनुभव कितना अद्‌भुत होगा।

वर्तमान में विश्वासयोग्य जीवन जीते हुए यीशु के साथ होने की वास्तविकता की प्रतीक्षा करना हम सभी के लिए सीखने योग्य बात है। पौलुस जानता था कि जब तक उसके भीतर साँस थी, तब तक उसे अपने सांसारिक कार्यों को निष्ठापूर्वक पूरा करना था, जब तक कि मसीह उसे स्वर्ग में अपने पास न बुला ले। इसलिए कुछ समय निकालकर यीशु को उसकी सम्पूर्ण प्रेमपूर्ण महिमा में देखते हुए चिन्तन करें। फिर इस महान सच्चाई का आनन्द लें कि एक दिन वह अपनी महिमा में आपका स्वागत करेगा। और फिर यह विचार करें कि उस क्षण तक पहुँचने का द्वार मृत्यु ही है। यही आपका भविष्य है। एक दिन, यह आपका वर्तमान होगा। और तब तक, आप वही कर सकते हैं जो पौलुस ने किया—मसीह के लिए पूर्ण समर्पण के साथ जीवन जीएँ, यह जानते हुए कि मृत्यु केवल लाभ ही होगी।

2 तीमुथियुस 4:6-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 107–109; गलातियों 6

20 अगस्त : चुनाव का क्षण

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20 अगस्त : चुनाव का क्षण
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“विश्‍वास ही से मूसा ने सयाना होकर फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इनकार किया। इसलिए कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्‍वर के लोगों के साथ दुख भोगना अधिक उत्तम लगा।” इब्रानियों 11:24-25

हम एक ही समय में संसार के दोस्त और परमेश्वर के दोस्त नहीं हो सकते (याकूब 4:4)। जो लोग इस मध्य मार्ग पर चलने की कोशिश करते हैं, वे एक न एक दिन अवश्य समझ जाते हैं कि यह कितना निरर्थक और व्यर्थ है: और क्रिस क्रिस्टोफर्सन के शब्दों में यह हमें “एक चलता-फिरता विरोधाभास” बना देता है।[1]

फिरौन की बेटी के दत्तक पुत्र के रूप में मूसा को सामाजिक स्थिति, शारीरिक आराम और भौतिक सम्पत्ति का आनन्द मिला। एक इस्राएली के रूप में फिरौन के दरबार से बाहर उसे केवल गुमनामी, दरिद्रता और गुलामी ही मिलती। मूसा जानता था कि फिरौन के दरबार में रहना उसके लिए हर सांसारिक दृष्टिकोण से बेहतर होता। वह यह सोच सकता था कि इससे उसे परमेश्वर के लोगों के पक्ष में प्रभाव डालने का मौका मिलेगा, जो तब सम्भव नहीं होगा यदि वह दरबार को छोड़कर उनके साथ जा मिलता है।

लेकिन मूसा फिरौन के परिवार में नहीं रुका। इसके बजाय, उसने मिस्र की नागरिकता के लाभों को त्याग दिया और एक दीन-हीन, तिरस्कृत, उत्पीड़ित समूह के साथ एक हो गया, जिनके पास कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे। क्यों? कोई क्यों इतने कम को अपनाने के लिए इतने अधिक को छोड़ देगा?

उत्तर यह है कि मूसा ने महसूस किया कि वह परमेश्वर के लोगों और मिस्रियों के साथ एक ही समय में एक नहीं हो सकता। वह जान गया था कि वह या तो अपने लोगों के साथ गुलाम होगा या फिरौन के दरबार में समझौता करने वाला बनकर रहेगा। यह नहीं हो सकता था कि एक ओर तो वह कहे कि वह एक इस्राएली था जो अपने पूर्वजों के परमेश्वर में विश्वास करता था और साथ ही एक मिस्री के रूप में भी जीवन जीए।

हमें बताया गया है कि मूसा ने “मसीह के कारण” अपमान और कठिनाई को चुन लिया (इब्रानियों 11:26)—उस एक के लिए, जो हव्वा के वंश और अब्राहम के परिवार से आने पर था और जो उनके लिए परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने पर था (उत्पत्ति 3:16; 12:1-3)। उसका यह निर्णय वही था जैसा एक सहस्राब्दी के बाद प्रेरित पौलुस ने लिया था, जिसकी पृष्ठभूमि बिल्कुल “सही” थी—शिक्षा, सटीकता, और वंश—फिर भी उसने कहा, “मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ” (फिलिप्पियों 3:8)।

मूसा ने एक क्रान्तिकारी निर्णय लिया—ऐसा निर्णय जो हम में से कुछ लोगों को भी लेने की आवश्यकता है। शायद आपकी पृष्ठभूमि मूसा के समान है; बचपन से ही आपकी सारी भौतिक जरूरतें बड़ी आसानी से पूरी हुई हैं और इस संसार में आपके पास बहुत बड़ी सफलता की सम्भावनाएँ हैं। हालाँकि, हम जो भी हैं और जहाँ से भी आए हैं, हम सभी को उसी निर्णय का सामना करना पड़ता है जिसका सामना मूसा ने किया था। क्या हम संसार के दोस्त होंगे या परमेश्वर के दोस्त? कोई मध्य मार्ग नहीं है। क्या आज आप संसार के मापदण्डों से जीएँगे, संसार के हँसी-ठट्ठे पर हँसेंगे, संसार की विधियों का पालन करेंगे, और संसार की प्राथमिकताओं को अपनाएँगे? या क्या आप यीशु मसीह के साथ खड़े होंगे, पूरी तरह से विरोध का सामना करेंगे, अपना ध्वज लहराएँगे, और शब्दों तथा कामों से यह स्वीकार करेंगे कि वह आपका प्रभु है? शायद आज वह दिन है जब आपको पहली बार, या लम्बे समय के बाद “विश्वास के द्वारा” जीने और वह क्रान्तिकारी निर्णय लेने की जरूरत है।

लूका 18:18-30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 105–106; गलातियों 5 ◊


[1] “द पिलग्रिम, अध्याय 33” (1971).

19 अगस्त : सच्चा राजा

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19 अगस्त : सच्चा राजा
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“यह कटोरा मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है नई वाचा है।” लूका 22:20

यीशु ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा किया है और उनके हरेक आशीर्वाद को वितरित किया है। उसने नए वाचा का आरम्भ कर दिया है और असली राजा के रूप में अपनी लम्बे समय से प्रतीक्षित भूमिका ग्रहण कर ली है। यीशु से ही हरेक आशीर्वाद बहता है। उसके माध्यम से हर प्रतिज्ञा पूरी होती है। उसे ही सारी महिमा दी जाती है।

मसीही लोग इन सत्यों को प्रभु भोज की मेज पर स्वीकार करते हैं, जब हम प्याला लेते हैं और याद करते हैं कि यीशु ने अपना रक्त बहाया। यह नई वाचा का रक्त था, जो हमारे पापों की माफी के लिए बहाया गया था। क्रूस पर यीशु ने वह दण्ड अपने ऊपर ले लिया जो हमें मिलना चाहिए था, ताकि पापी लोग, जो उसकी दया और कृपा के पात्र नहीं हैं, क्षमा के आशीर्वाद का आनन्द ले सकें।

इसका अर्थ है कि जब हम यीशु में विश्वास करते हैं, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उसने हमारे पाप और उसके न्याय को अपने ऊपर ले लिया है और बदले में हमें अपनी सारी धार्मिकता दे दी है। यीशु उस मृत्यु से मरा, जो हमें मिलनी चाहिए थी। उसने वह सम्पूर्ण जीवन जीया, जो हम नहीं जी सकते थे। परमेश्वर ने अपने पुत्र के माध्यम से हमें अपनी क्षमा की चादर में लपेट लिया है। हमें कभी भी यह सच नहीं भूलना चाहिए कि हमारे बारे में ये बातें विश्वास के द्वारा सच हैं।

पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा था: एक राजा आएगा जो दाऊद का वंशज होगा, और वह परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा करेगा। वह परमेश्वर का राज्य स्थापित करेगा, एक नया युग लाएगा, और बुराई के प्रभावों से निपटेगा। क्रूस पर लटका हुआ यीशु किसी राजा जैसा नहीं दिखता था, लेकिन यह उसकी महानतम विजय का क्षण था। और जब यीशु कब्र से बाहर आया, तो उसके पुनरुत्थान ने यह घोषणा की कि वह सिर्फ दाऊद का पुत्र नहीं था, बल्कि परमेश्वर का पुत्र था, जो मृत्यु को भी पराजित कर सकता था।

सारा अधिकार उसी के पास है और अनन्त कृपा और दया की धारा उसी के माध्यम से बहती है। जो इस शक्ति का स्रोत है, केवल वही दिलों को बदल सकता है और हमारी आत्माओं के प्रेम के योग्य सिद्ध हो सकता है।

यीशु अभी पिता के दाहिने हाथ विराजमान होकर राज्य करता है, लेकिन वह उन लोगों के दिलों में भी राज्य करता है जो उस पर विश्वास करते हैं। आज का दिन खोए हुए लोगों के लिए सबसे अच्छा दिन है कि वे अपने विद्रोही हथियारों को नीचे रख दें, इस योग्य राजा के सामने विनम्रता से झुकें, स्वीकार करें कि वह वही उद्धारकर्ता है जिसकी उन्हें इतनी अधिक आवश्यकता है, और उससे अपने जीवन की राजगद्दी पर राज्य करने का अनुरोध करें। क्या मसीह आपका राजा है? तो उसके अनुयायी के रूप में उसकी आराधना और स्तुति करें, और उसके राजदूत के रूप में जाएँ और दूसरों को इस आशा के बारे में बताएँ जिसे आपने पाया है।

1 कुरिन्थियों 15:12-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 103–104; गलातियों 4

18 अगस्त : एक चिन्ता का विषय

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18 अगस्त : एक चिन्ता का विषय
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“जिस रेंड़ के पेड़ के लिए तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?” योना 4:10-11

योना ने खुद को एक पीड़ित माना। उसे इस बात में पूरी तरह से यकीन था कि नीनवे को न्याय मिलना चाहिए था और यह कि उस नगर को बचाकर परमेश्वर ने गलत किया था। उसे इस बात में भी यकीन था कि छाँव देने वाले पौधे को मुरझा कर परमेश्वर ने गलत किया था, जिसके कारण उसे गर्मी में कष्ट भोगना पड़ रहा था।

इस पर परमेश्वर ने भविष्यवक्ता से उसकी दुख भरी आपत्ति पर बात नहीं की, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया: “तेरा क्रोध, जो रेंड़ के पेड़ के कारण भड़का है, क्या वह उचित है?” (योना 4:9)। परमेश्वर ने छोटे से बड़े तक तर्क किया: यदि योना एक पौधे के लिए इतना चिन्तित हो सकता है, जो 24 घण्टे में आकर चला गया, तो क्या परमेश्वर को नीनवे के लोगों के बारे में चिन्ता करने का अधिकार नहीं था? परमेश्वर योना को अपनी प्राथमिकताओं का पुनः मूल्यांकन करने के लिए कह रहा था।

परमेश्वर ने जो सवाल योना से पूछा था, वह सवाल हमारे सामने भी आता है। क्या हमारे जीवन में ऐसी कोई चीज़ है जो हमें इससे अधिक चिन्तित करती हो कि अविश्वासी लोग यीशु मसीह के समर्पित अनुयायी बन जाएँ? यदि हम अपने दिलों को लेकर जागृत हैं, तो हम देख पाएँगे कि हमारे समय, पैसे, वरदानों, और स्वतन्त्रता को लेकर हमारा जो रवैया पहले “बस इतना ही काफी है” वाला था, वह जल्दी ही बदलकर “मुझे और चाहिए” वाला हो जाता है। शायद हमें देखने वाले लोग सोचें कि जिन लोगों ने अभी तक सुसमाचार नहीं सुना है, उनके बारे में चिन्तित होने के बजाय हम अपने आराम की स्थिति के बारे में कहीं ज्यादा चिन्तित हैं।

परमेश्वर के सवाल पर योना का उत्तर क्या था? हम नहीं जानते। योना की पुस्तक इसी दिव्य सवाल के साथ खत्म हो जाती है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि योना ने क्या उत्तर दिया होगा। इस पुस्तक का पूरा जोर परमेश्वर की दया पर है। सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यह है: हम, जो इस पुस्तक को पढ़ते हैं, परमेश्वर के अनुग्रह को कैसे देखते हैं? क्या उसका उदाहरण हममें दूसरों के लिए एक चिन्ता की पद्धति स्थापित करेगा, जिससे हम उनके पाप से फिरने और परमेश्वर पर विश्वास करने की कामना करेंगे? क्या हमारे दिल योना के जैसे होंगे या परमेश्वर के जैसे?

समय आ गया है कि हम अपनी किसी भी सांसारिक चिन्ता को उन खोई हुई आत्माओं के प्रचार के ऊपर न रखें, जो हमारे समुदायों में मसीह को नहीं जानते। हमें यीशु के माध्यम से अपने जीवन में परमेश्वर की दया का अनुभव करने का आनन्द मिला है। और इस महान विशेषाधिकार का उपयुक्त उत्तर यही है कि हम अपने आप को इस प्रकार दें ताकि अन्य लोग भी उसे जान सकें। आप सबसे ज्यादा किस बात की चिन्ता करते हैं? आपके घर की? आपकी सम्पत्ति की? आपके तकनीकी गैजेट्स की? या आपकी गली के उन लोगों की, जो यीशु को नहीं जानते?

मत्ती  28:16-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 100–102; गलातियों 3 ◊

17 अगस्त : रहस्यमयी प्रावधान

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17 अगस्त : रहस्यमयी प्रावधान
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“तब यहोवा परमेश्‍वर ने एक रेंड़ का पेड़ उगाकर ऐसा बढ़ाया कि योना के सिर पर छाया हो, जिससे उसका दुख दूर हो। योना उस रेंड़ के पेड़ के कारण बहुत ही आनन्दित हुआ। सबेरे जब पौ फटने लगी, तब परमेश्‍वर ने एक कीड़े को भेजा, जिस ने रेंड़ का पेड़ ऐसा काटा कि वह सूख गया।” योना 4:6-7

नीनवे को बचा लिया गया था, लेकिन जब भविष्यवक्ता योना वहाँ से बाहर निकला, तो वह नाखुश था। उसने प्रभु से कहा, मुझे पहले ही पता था कि तू उन्हें उनके सारे बुरे कर्मों के बावजूद क्षमा कर देगा। अब अपने शत्रुओं को क्षमा होते हुए देखने से अच्छा है कि मैं मर जाऊँ (योना 4:2-3)।

योना ने सम्भवतः पत्थरों या मिट्टी की ईंटों से अपने लिए एक छोटा-सा छप्पर बनाया (पद 5)। उस चिलचिलाती धूप में खुले आकाश के नीचे बैठना उसके लिए बहुत ही असहज होता। कल्पना करें कि वह अपनी छोटी-सी झोंपड़ी में बैठा मृत्यु की इच्छा कर रहा था, और फिर उसने देखा कि उसके पास एक पौधा उगकर बड़ा हो रहा है। अचानक उस पौधे की छाया से दिन की गर्मी कम हो गई—और योना बहुत, बहुत खुश हुआ।

लेकिन उसकी यह खुशी क्षणिक थी। जिस परमेश्वर ने योना के आराम के लिए वह पौधा प्रदान किया था, उसी परमेश्वर ने एक कीड़ा भी भेजा जिसने उस पौधे को नष्ट कर दिया। यह पौधा किसी अस्वाभाविक कारण से नहीं सूखा, बल्कि यह सब परमेश्वर के दिव्य नियन्त्रण के तहत सामान्य प्रक्रियाओं के कारण हुआ।

सृष्टिकर्ता परमेश्वर अपनी बनाई हर चीज़ पर सम्प्रभु है। अपने रहस्यमयी प्रावधान के माध्यम से वह अपने सेवक के साथ अपनी इच्छा के अनुसार काम कर रहा था। योना की पुस्तक में एक वाक्यांश बार-बार दोहराया गया है: “यहोवा ने . . . ठहराया था।” उसने एक बड़े जल-जन्तु, एक पौधे, एक कीड़े और पुरवाई से बहने वाली लू को ठहराया था—उसने यह सब अपने सेवक के प्रति अपने प्रेम और चिन्ता को प्रकट करने के लिए किया था (योना 1:17; 4:8)। चाहे वह एक विशाल जल-जन्तु हो या एक छोटा कीड़ा, परमेश्वर अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर चीज़ को नियन्त्रित कर रहा था, जैसा कि वह आज भी कर रहा है।

हम प्रावधान की इस शिक्षा को हीडलबर्ग कैटेकिज़म के प्रश्न 27 में भी देखते हैं: “आप परमेश्वर के प्रावधान को कैसे समझते हो?” उत्तर मिलता है: “परमेश्वर का प्रावधान उसका सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी सामर्थ्य है, जिसके द्वारा वह आकाश और पृथ्वी और सभी सृजित वस्तुओं को मानो अपने हाथ से सम्भाले रखता है, और उन्हें इस प्रकार नियन्त्रित करता है कि हर पत्ता और घास, वर्षा और सूखा, फलदायक और अकाल के वर्ष, भोजन और पेय, स्वास्थ्य और बीमारी, धन और गरीबी—वास्तव में, सब कुछ किसी संयोग से नहीं, बल्कि उस पिता के प्रेमी हाथ से आता है।”[1]

अपने जीवन की यात्रा में जब आप “पौधों” को देखते हैं जो आपको आराम और खुशी देते हैं और जब आप “कीड़ों” को देखते हैं जो उस आराम को छीन लेते हैं, तो यह जानकर उत्साह प्राप्त करें कि आप किसी अंधे, भाग्यवादी बल के नियन्त्रण में नहीं हैं। बल्कि आपका स्वर्गिक पिता, जो आपको अपने प्रेमपूर्ण आलिंगन में रखता है, हर चीज़ को इस प्रकार व्यवस्थित कर रहा है कि वह आपके जीवन में अपने परम उद्देश्य को पूरा कर सके—ताकि आपको अपने पुत्र के समान बनाए और आपको अपने पास ले आए।

तो अपने जीवन पर विचार करें। आपके जीवन में कौन से “पौधे” हैं? कौन से “कीड़े” हैं? और क्या आप यह जानते हुए दोनों के लिए धन्यवाद देंगे कि ये सब एक प्रेमी पिता द्वारा आपके अनन्त कल्याण के लिए दिए गए हैं?

याकूब 1:9-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 97–99; गलातियों 2


[1] हीडलबर्ग कैटेकिज़म, प्र. 27.

16 अगस्त : अयोग्य सेवक

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16 अगस्त : अयोग्य सेवक
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“[योना] ने यहोवा से यह कहकर प्रार्थना की, ‘हे यहोवा, जब मैं अपने देश में था, तब क्या मैं यही बात न कहता था? इसी कारण मैं ने तेरी आज्ञा सुनते ही तर्शीश को भाग जाने के लिए फुर्ती की; क्योंकि मैं जानता था कि तू अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्‍वर है, और विलम्ब से कोप करने वाला करुणानिधान है, और दुख देने से प्रसन्न नहीं होता’ . . . यहोवा ने कहा, “तेरा जो क्रोध भड़का है, क्या वह उचित है?’” योना 4:2, 4

जब बच्चे कुछ गलत करते हैं, तो वे अक्सर अपने माता-पिता से क्षमा मांगते हैं, उसे प्राप्त करते हैं, और फिर कहते हैं, “मुझे पता है कि मैं गलत था, लेकिन . . . जो कुछ मैंने किया उसके पीछे एक बहुत अच्छा कारण था।” हम कुछ ऐसा ही भविष्यवक्ता योना के साथ देखते हैं। परमेश्वर ने उसे क्षमा किया, उसे उठाया, और उसे सही मार्ग पर वापस रखा—फिर भी उसने अपनी पिछली अवज्ञा को उचित ठहराने की कोशिश की। वह एक ही समय में क्रोधित हो रहा था, तर्क कर रहा था, और प्रार्थना कर रहा था—जो आसान कार्य नहीं है!

ध्यान दें कि योना के इस तर्क-वितर्क में “मैं” शब्द कितनी बार उभरकर आता है। उसकी बातचीत में बहुत अधिक “योना” था—और इसलिए उसके हृदय में भी—क्योंकि वह इस पूरे विषय को अपनी इच्छा और परमेश्वर की इच्छा के बीच की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। उसने मूर्खतापूर्वक यह मान लिया था कि उसकी योजना परमेश्वर की योजना से बेहतर थी।

योना की शिकायत एक दोहरे मापदण्ड पर आधारित थी। हालाँकि हाल ही में वह स्वयं परमेश्वर की करुणा और दया का पात्र बना था, फिर भी उसने उसी दया को नीनवे के लोगों पर प्रकट करने के लिए परमेश्वर को दोषी ठहराया, जिन्हें वह उद्धार के योग्य नहीं समझता था।

योना के लिए सबसे बड़ी समस्या थी परमेश्वर का सम्प्रभु अनुग्रह। वह इस बात से क्रोधित था कि परमेश्वर ने उस तरीके से कार्य किया था जिसे वह न तो समझता था और न ही स्वीकार करता था। लेकिन बहुत पहले ही प्रभु ने घोषणा कर दी थी, “जिस पर मैं अनुग्रह करना चाहूँ उसी पर अनुग्रह करूँगा, और जिस पर दया करना चाहूँ उसी पर दया करूँगा” (निर्गमन 33:19)। पापियों के प्रति परमेश्वर का अनुग्रह कभी समझाया नहीं जा सकता। इसका कोई कारण नहीं होता; यह केवल परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाता है।

योना की प्रतिक्रिया के उत्तर में प्रभु ने उससे यह नहीं पूछा कि क्या वह क्रोधित है, बल्कि यह पूछा कि क्या उसे क्रोधित होने का कोई अधिकार है। यही असली मुद्दा था: क्या योना को परमेश्वर की दया पर आपत्ति करने का कोई उचित कारण था—जो स्वयं एक ऐसे राष्ट्र का प्रतिनिधि था जिसे परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक आशीषित किया था, भले ही वे पथभ्रष्ट हो गए थे, और जिसने अपनी अवज्ञा में व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के उद्धारक हाथ का अनुभव किया था? उत्तर स्पष्ट है: नहीं। और न ही हमारे पास यह अधिकार है कि हम परमेश्वर से प्रश्न करें कि वह किस पर और कैसे अपनी दया प्रकट करता है या वह अपने लोगों को बचाने के लिए और अपने पुत्र की महिमा करने के लिए सभी चीज़ों को कैसे संचालित करता है।

यदि हम स्वयं को परमेश्वर से नाराज़ पाते हैं और उसके द्वारा अपनी योजनाओं को पूरा करने के तरीके पर शिकायत करते हुए पाते हैं, तो यह इसलिए है क्योंकि हम यह भूल गए हैं कि हम स्वयं उसकी दया और अनुग्रह के अयोग्य हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है: कि हम अपनी अवज्ञा के इतने आदी हो जाएँ कि हम स्वयं को परमेश्वर की कृपा और आशीष के योग्य समझने लगें। लेकिन प्रतिदिन सब कुछ केवल अनुग्रह से ही प्राप्त होता है। केवल जब हम इस अनुग्रह से पूरी तरह प्रभावित होंगे, तब ही हम परमेश्वर की उस असीमित दया में आनन्दित हो सकेंगे जो वह अपने अयोग्य संतों पर लुटाता है।

योना 4

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 94–96; गलातियों 1 ◊

15 अगस्त : परमेश्वर की योजना के साथ सामंजस्य में

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15 अगस्त : परमेश्वर की योजना के साथ सामंजस्य में
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“जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया। यह बात योना को बहुत ही बुरी लगी, और उसका क्रोध भड़का।” योना 3:10 – 4:1

यहाँ तक कि भविष्यवक्ताओं को भी कभी-कभी बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता होती है।

जल-जन्तु के पेट में समय बिताने के बाद योना अब परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर रहा था, लेकिन अपनी आज्ञाकारिता में अब वह उलझन में था। वह अभी भी परमेश्वर की सम्प्रभु कृपा को समझने के लिए संघर्ष कर रहा था। पहले, जब उसने परमेश्वर की योजना से भागने की कोशिश की थी, तब उसकी अवज्ञा स्पष्ट थी; लेकिन अब, जब उसने वह किया जो उसे करने के लिए कहा गया था और वहाँ गया जहाँ उसे भेजा गया था, तब भी वह नीनवे के लिए परमेश्वर की दयालु योजना के साथ पूरी तरह सामंजस्य में नहीं था। एक ऐसे नगर में आत्मिक जागृति आ गई थी जो इस्राएल के परमेश्वर के प्रति पूरी तरह कठोर हो चुका था—और परमेश्वर का भविष्यवक्ता इस पर क्रोधित हो गया!

फिर भी, भले ही योना कठोर और संकीर्ण दृष्टिकोण वाला था और परमेश्वर की भलाई पर गलत प्रतिक्रिया दे रहा था, फिर भी परमेश्वर ने उसे त्यागा नहीं। जिस परमेश्वर ने उसे अवज्ञा से बचाने के लिए एक बड़ी जल-जन्तु भेजा था, वह उसे उचित रूप से दण्ड देने के लिए एक बड़ा सिंह भी भेज सकता था! लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह अनुग्रहकारी और दयालु है। परमेश्वर ने उसे धैर्य और कोमलता से सम्भाला, ताकि वह यह समझ सके कि सबसे बड़ी समस्या उसकी परिस्थिति नहीं, बल्कि उसका अपना मनोभाव था।

नीनवे के लोगों के पश्चाताप पर योना की प्रतिक्रिया एक प्रचारक के लिए अजीब थी। हमें उससे यह अपेक्षा करनी चाहिए थी कि वह इस बात के लिए आभारी होगा कि परमेश्वर ने उसे त्यागने के बजाय अपनी सेवा में उपयोग होने का सौभाग्य दिया था। लेकिन इसके बजाय, पूरे नगर के पश्चाताप से योना का “क्रोध भड़का।” इस पद का एक शाब्दिक अनुवाद इसे और भी आगे ले जाता है: “योना की दृष्टि में यह बुरी बात थी, बहुत बुरी बात।” जिस विपत्ति की उसने नीनवे पर गिरने की आशा की थी—जिसका उसने अनुमान लगाया था और जिसकी उसने कामना की थी—उसकी अनुपस्थिति स्वयं उसके अपने मन और विचारों में एक विपत्ति बन गई।

यद्यपि यह सुनने में कटु लगता है, हम योना की भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को अपने जीवन में भी प्रतिबिम्बित देख सकते हैं। हम वहाँ जा सकते हैं जहाँ हमें जाने के लिए कहा गया है, हम वह कह सकते हैं जो हमें कहने के लिए कहा गया है, हम बाहरी रूप से परमेश्वर की सभी आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं . . . और फिर भी, अपने जीवन के मूल में हम वास्तव में उसके उद्देश्य के साथ सामंजस्य में नहीं हो सकते हैं। हम न्याय की कामना कर सकते हैं, जबकि परमेश्वर दया दिखाना चाहता है। हम इस बात से बेचैन हो सकते हैं कि परमेश्वर दूसरों को उस तरीके से आशीषित कर रहा है जैसा उसने हमें नहीं किया—या दूसरों को बिना किसी प्रतिबद्धता के आशीष दे रहा है, जबकि हमें लगता है कि हमने उसके लिए अधिक प्रयास किया है। हम स्वयं परमेश्वर को बताने लग सकते हैं कि उसे अपने संसार को कैसे संचालित करना चाहिए!

फिर, हमें उसकी दया के साथ सामंजस्य में लाने और खुशी-खुशी उसके मिशन में भेजने के लिए क्या आवश्यक है? केवल यही: यह समझना कि हम किसी से भी बेहतर नहीं हैं—हम उसकी दया के उतने ही अयोग्य हैं जितने अन्य लोग हैं और हम उसके क्रोध के उतने ही योग्य हैं जितने अन्य लोग हैं। परमेश्वर की दया को प्रकट करते हुए क्रूस हमारे हृदयों को नम्र करता है और इसमें वही करुणा तथा अनुग्रह भरता है, जिसने उसके पुत्र को कलवरी तक पहुँचाया। क्या आप दूसरों के प्रति ऐसी करुणा दिखाने में संघर्ष कर रहे हैं? क्रूस की ओर निहारें और प्रभु से प्रार्थना करें कि वह आपको वही सिखाए जो योना को भी सीखने की आवश्यकता थी।

कुलुस्सियों 1:21-29

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 91–93; 1 पतरस 5

14 अगस्त : हमारा अपरिवर्तनीय परमेश्वर

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14 अगस्त : हमारा अपरिवर्तनीय परमेश्वर
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“जब परमेश्‍वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्‍वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।” योना 3:10

बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि परमेश्वर अपरिवर्तनीय है। साथ ही, योना की पुस्तक यह पुष्टि करती है कि वह लोगों के प्रति अपने दृष्टिकोण और उनके साथ व्यवहार करने के अपने तरीके को बदल सकता है और बदलता भी है। हम इस स्पष्ट विरोधाभास को कैसे समझें?

हम इस प्रकार के विरोधाभास को अन्य स्थानों पर भी पाते हैं। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर ने राजा शाऊल के साथ व्यवहार किया, तो उसने कहा, “मैं शाऊल को राजा बना के पछताता हूँ; क्योंकि उसने मेरे पीछे चलना छोड़ दिया, और मेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया” (1 शमूएल 15:11)। लेकिन कुछ ही पदों बाद कहा गया है, “जो इस्राएल का बलमूल है वह न तो झूठ बोलता और न पछताता है; क्योंकि वह मनुष्य नहीं है कि पछताए” (पद 29)। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर को अपने निर्णय पर पछतावा हुआ, फिर भी यह कहा गया कि वह पछताता नहीं है।

फिर भी, इन दोनों प्रकार की अभिव्यक्तियों में कोई परम असंगति नहीं है। जब परमेश्वर को पछताने या मन बदलने वाला कहा जाता है, तो यह वर्णनात्मक भाषा हमारी सीमित मानव समझ के अनुरूप होती है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर बदल गया है, लेकिन वास्तव में जो बदला है, वह हमारा मानवीय आचरण है। सरल शब्दों में, शाऊल अब वह व्यक्ति नहीं रहा जो वह पहले था। वह निरन्तर अवज्ञाकारी हो गया था, और परमेश्वर ने उस बदले हुए हालात का जिस प्रकार उत्तर दिया, वह पूरी तरह उसके चरित्र के अनुसार था।

इसी तरह, योना के प्रचार के परिणामस्वरूप नीनवेवासियों ने अपना व्यवहार बदल लिया—इस बार विपरीत दिशा में, अर्थात वे बुराई से दूर हो गए। परमेश्वर सदा पाप के विरुद्ध और पश्चाताप तथा विश्वास के पक्ष में रहता है; उसका चरित्र नहीं बदलता। उसकी चेतावनियाँ भटके हुए लोगों को सचेत करने और उन्हें पश्चाताप की ओर ले जाने के लिए होती हैं—और जब पश्चाताप होता है, तो परमेश्वर उसी के अनुसार उत्तर देता है।

चूंकि परमेश्वर इस प्रकार उत्तर देता है, इस कारण यीशु पर विश्वास करने वाला पापी उसकी स्वीकृति को प्राप्त कर सकता है। क्योंकि “यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है” (इब्रानियों 13:8), हम यह निश्चयपूर्वक जान सकते हैं कि जब हम पश्चाताप और सरल विश्वास के साथ उसके पास आते हैं, तो वह हमें करुणा और दया के साथ ग्रहण करता है। यही उसका वास्तविक स्वभाव है, और वह कभी नहीं बदलेगा। हमारे दृष्टिकोण से यह प्रतीत हो सकता है कि उसने अपना मन बदल लिया है—परन्तु परमेश्वर सदा अपने प्रत्येक वचन के प्रति सच्चा रहता है। एक ऐसे संसार में, जो निरन्तर बदल रहा है और जहाँ हममें से सर्वश्रेष्ठ लोग भी हमेशा अपने वचन को निभाने में असफल हो सकते हैं, यही आपके आत्मविश्वास और आनन्द का महान आधार है।

योना 3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 89–90; 1 पतरस 4 ◊

13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक

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13 अगस्त : पश्चाताप का एक अनुस्मारक
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“तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया।” योना 3:5-6

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आपके देश का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री एक राष्ट्रीय प्रसारण में पूरे राष्ट्र से आग्रह करे कि वे अपनी हिंसक गतिविधियाँ छोड़ दें, अपनी बुराइयों से विमुख हों, और परमेश्वर की दया की याचना करें ताकि वह आकर अपने न्याय से उन्हें बचा सके? वास्तव में, योना की आँखों के सामने नीनवे में यही हुआ।

यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि नीनवेवासियों ने परमेश्वर पर इतनी शीघ्रता और पूर्णता से विश्वास किया। जब उन्होंने योना द्वारा दिए गए न्याय के सन्देश को सुना, तो उनकी प्रतिक्रिया व्यापक और सच्चे हृदय से हुई थी, जिसे उनके पश्चाताप के वस्त्रों से देखा जा सकता था। और इस सार्वजनिक प्रतिक्रिया के अनुरूप ही राजा ने भी प्रतिक्रिया की थी। राजा ने अपने वस्त्र बदले और अपने राजसी वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिए; उसने अपनी जगह बदली और अपने सिंहासन को छोड़कर धूल में बैठ गया; और उसने अपने शब्द बदले और पश्चाताप की घोषणा जारी कर दी।

यह यीशु के समय के लोगों, और शायद हमारे अपने समय के लोगों से बिल्कुल विपरीत है। स्वयं यीशु ने सिखाया कि नीनवेवासियों ने “योना का प्रचार सुनकर मन फिराया,” जबकि जिनसे यीशु ने बात की, उनमें से बहुतों ने यह पहचानने से इनकार कर दिया कि “देखो, यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है”—अर्थात स्वयं मसीह (लूका 11:32)। उन्होंने वह अस्वीकार कर दिया जो नीनवे के राजा ने समझ लिया था जब उसने कहा, वे . . . पश्चाताप करें। सम्भव है, परमेश्‍वर दया करे और अपनी इच्छा बदल दे, और उसका भड़का हुआ कोप शान्त हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ (योना 3:8-9)। राजा समझ गया था कि नीनवेवासियों के पश्चाताप का अर्थ यह नहीं था कि परमेश्वर अनिवार्य रूप से उन्हें क्षमा कर देगा। वह अब भी अनिश्चित था कि उनके पश्चाताप के साथ परमेश्वर भी अपना निर्णय बदलेगा या नहीं।

यह हमें एक महत्त्वपूर्ण सत्य की याद दिलाता है: यहाँ तक कि पश्चाताप करने वालों के पास भी परमेश्वर की स्वीकृति के लिए कोई दावा नहीं है। वे पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर होते हैं। पश्चाताप क्षमा के लिए आवश्यक है, लेकिन यह उसे अर्जित नहीं करता। जैसे कि उड़ाऊ पुत्र ने कहा था, वैसे ही सच्चा पश्चाताप करने वाला व्यक्ति भी कहता है, “पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्‍टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊँ” (लूका 15:18-19)। सच्चा पश्चाताप यह स्वीकार करने से आरम्भ होता है कि हम वास्तव में परमेश्वर के न्याय के योग्य हैं और हमें उसकी दया की अत्यन्त आवश्यकता है।

चूंकि “यहाँ वह है जो योना से भी बड़ा है,” इसलिए हम जान सकते हैं और घोषित कर सकते हैं कि पश्चाताप के उत्तर में हमेशा क्षमा ही मिलेगी, क्योंकि “जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा” (रोमियों 10:13)। लेकिन हमें इस गैर-यहूदी राजा से यह सीख लेना चाहिए कि हम अपने पश्चाताप या आज्ञाकारिता के द्वारा परमेश्वर को नियन्त्रित नहीं कर सकते, और यह कि सच्चा पश्चाताप केवल बाहरी नहीं बल्कि हृदय से होता है, जिसमें हमेशा हमारे दृष्टिकोण और व्यवहार में परिवर्तन शामिल होता है। यह एक ऐसा पाठ है जिसे हमें अपने मसीही जीवन के हर दिन अपनाना चाहिए—क्योंकि, जैसा कि मार्टिन लूथर ने कहा था, “जब हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह ने कहा, ‘पश्चाताप करो,’ तो उसका आशय था कि विश्वासियों का पूरा जीवन पश्चाताप होना चाहिए।”[1]

  लूका 11:29-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 87– 88; 1 पतरस 3


[1] द नाइनटी-फाईव थेसिस, फर्स्ट थेसिस