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25 दिसम्बर : आओ, घुटने टेककर आराधना करो

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25 दिसम्बर : आओ, घुटने टेककर आराधना करो
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“‘आओ, हम बैतलहम जाकर यह बात जो हुई है, और जिसे प्रभु ने हमें बताया है, देखें।’ और उन्होंने तुरन्त जाकर मरियम और यूसुफ को, और चरनी में उस बालक को पड़ा देखा।” लूका 2:15-16

बैतलहम आओ और देखो

जिसका जन्म स्वर्गदूत गाते हैं;

आओ, घुटने टेककर आराधना करो,

मसीह प्रभु की—नवजात राजा की।[1]

जब हम क्रिसमस के गीतों में ऐसे शब्द गाते हैं, तो हममें से अधिकतर लोग वास्तव में घुटने नहीं टेकते। हम जानते हैं कि यह निमन्त्रण एक रूपक है। फिर भी, यदि हम सचमुच मसीह को देखना चाहते हैं, तो हमें अपने हृदय की स्थिति में झुके हुए घुटनों के साथ आना पड़ेगा। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है—विनम्रता और प्रत्याशा के साथ आना, और इस पहचान के साथ कि यह व्यक्ति—यीशु—ऐसी आराधना के योग्य है।

चरवाहों की तरह ही, हम भी परमेश्वर की ओर आकर्षित होते हैं क्योंकि वह एक खोजने वाला परमेश्वर है। जन्म-कथा में हम देखते हैं कि परमेश्वर ने अद्‌भुत पहल की—उसने अपने पुत्र को एक असहाय बालक के रूप में संसार में भेजा और स्वर्गदूत के माध्यम से चरवाहों से बोला: “मत डरो; क्योंकि देखो, मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूँ जो सब लोगों के लिए होगा, कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिए एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है” (लूका 2:10–11)।

परमेश्वर ने अनुग्रह में पहल की, और चरवाहों ने विश्वास में प्रत्युत्तर दिया। उन्होंने स्वर्गदूत के सन्देश पर विश्वास किया और आत्मीय उत्साह के साथ उस चरनी की ओर निकल पड़े। उन्होंने अपनी जीविका और परिचित संसार की बातों से ऊपर उद्धारकर्ता को जानने की लालसा रखी। यह हमारे लिए एक सुन्दर उदाहरण है कि हम परमेश्वर के सन्देश पर किस प्रकार प्रतिक्रिया करें।

कुछ लोग इन चरवाहों को मूर्ख समझ सकते हैं और उनके साधारण से विश्वास और प्रत्युत्तर को तुच्छ जान सकते हैं। लेकिन जो बात मनुष्य को परमेश्वर पर भरोसा करने से रोकती है, वह केवल यह है: अहंकार। यही अहंकार चरवाहों को खेत में ही रोके रख सकता था—लेकिन ऐसा होने पर स्वर्गदूत का सन्देश तो उनके पास होता, परन्तु मसीह के साथ सम्बन्ध नहीं। यही अहंकार हमें भी मसीह के पास आकर घुटने टेकने से रोकता है और इस सच्चाई से अन्धा कर देता है कि परमेश्वर को जानने के लिए एक टूटे और नम्र हृदय की आवश्यकता होती है (भजन 51:17)।

बैतलहम के “चर्च ऑफ द नेटिविटी” में आप सीधे नहीं चल सकते। उसका द्वार इतना नीचा है कि प्रवेश करने के लिए आपको झुकना ही पड़ता है। यदि आप उस स्थान में प्रवेश करना चाहते हैं जो प्रभु यीशु के जन्म का प्रतिनिधित्व करता है, तो एक ही तरीका है: झुकिए, नीचे आइए, और घुटनों के बल आइए। यह एक सुन्दर चित्र है—और हमें आत्म-जाँच के लिए प्रेरित करता है: क्या मैं मसीह के सामने स्वयं को दीन करने के लिए तैयार हूँ? क्या मैं उन चरवाहों की तरह अपने पूर्व विचारों और योजनाओं को त्यागने को तैयार हूँ ताकि इस उद्धारकर्ता को जान सकूँ और उसका अनुसरण कर सकूँ?

इस क्रिसमस दिवस पर अपने हृदय को जाँचें: क्या इसका झुकाव परमेश्वर की महिमा के सामने झुकने का है? क्या यह उस बालक राजा की आराधना करता है, जिसने पहले स्वयं को नम्र किया और हमारे पास आया?

  लूका 2:1-20

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मीका 4–5; लूका 22:1-20


[1] जेम्स चैडविक, “एंजल्स व्ही हैव हर्ड ऑन हाई” (1862), पारम्परिक फ्रेंच क्रिसमस गीत “लेस एंजेस डैंस नोस कैम्पेनेस” का अनुवाद।

24 दिसम्बर : क्रिसमस का सेवक

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24 दिसम्बर : क्रिसमस का सेवक
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“मैं तुझे प्रजा के लिए वाचा और जातियों के लिए प्रकाश ठहराऊँगा; कि तू अन्धों की आँखें खोले, बन्दियों को बन्दीगृह से निकाले और जो अन्धियारे में बैठे हैं उनको काल-कोठरी से निकाले।” यशायाह 42:6-7

क्रिसमस पर, जब हम उस परिचित जन्म-कथा पर मनन करते हैं, तो हममें से बहुतों के मन में एक सुखद और आत्मीय भावना भर जाती है। इस कथा से हमारी भावनाएँ जुड़ी होती हैं, लेकिन यह भी सम्भव है कि इस परिचित दृश्य से हमारी दृष्टि इतनी ढक जाए कि हम परमेश्वर की महान योजना के विस्मयकारी सत्य को न देख पाएँ: कि जब हम बैतलहम की चरनी में लेटे हुए उस शिशु को देखते हैं, तो हम परमेश्वर के सेवक को देख रहे होते हैं।

यह सेवक यीशु एक उद्देश्य के साथ आया था। मरियम और यूसुफ को भी शायद पूरी तरह से यह ज्ञात नहीं था कि वह क्या-क्या पूरा करेगा। लेकिन यीशु के आने से सैकड़ों वर्ष पहले, परमेश्वर ने यह घोषित कर दिया था कि वह अपनी योजना को कैसे पूरा करेगा (यशायाह 42:1–4)।

यीशु उन लोगों की आँखें खोलने आया था जो आत्मिक रूप से अन्धे हैं। अपने पृथ्वी के सेवाकाल में उसने शारीरिक अन्धों को दृष्टि देकर इस सत्य का एक अद्‌भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात शरीर नहीं, आत्मा की थी। वह परमेश्वर के सत्य के प्रति अन्धे मनुष्यों की आँखें खोलने आया था।

यह सेवक बन्दियों को बन्दीगृह से छुड़ाने भी आया था। हममें से कई ने दोष और अपराध-बोध की जंजीरों को महसूस किया है—और हमने अनगिनत उपायों से उसे धो डालने की कोशिश की है। परन्तु यीशु के अलावा और कुछ भी काम नहीं आता। वही हमारी बेड़ियाँ तोड़ता है और हमें स्वतन्त्र करता है। हम जो पाप के दास थे, अब छुड़ाए गए हैं। हमारा उद्धारकर्ता उन्हें अन्धकार की काल-कोठरी से बाहर लाता है जो वहाँ बैठे हुए हैं—लेकिन तभी यदि वे उसकी ज्योति को देख लें।

इस सेवक की कथा इस बारे में नहीं है कि हमें क्या करना है, बल्कि इस बारे में है कि यीशु ने क्या किया है। वह हमारे अन्धकार में, हमारी बेड़ियों में, हमारी असफलताओं में उतर आया और कहा: तुम विफल हो गए हो, तुमने व्यवस्था-विधान को तोड़ा है, और तुम अपनी दशा को स्वयं ठीक करने में असमर्थ हो। परन्तु मैं पापियों को उद्धार देता हूँ। मैं अन्धों को दृष्टि देता हूँ। मैं बन्दियों को मुक्त करता हूँ। मैं प्रकाश लाता हूँ। मैंने तुम्हारे लिए वह सब कुछ कर दिया है जो आवश्यक था। मुझ पर सरल विश्वास और बालक-समान भरोसा रखो—और तुम देखोगे, तुम स्वतन्त्र हो जाओगे, और तुम्हारा अन्धकार उजाले में बदल जाएगा।

वह जिसने यह सब किया है, वही है जिसे आप उस परिचित क्रिसमस दृश्य में निहारते हैं। यह दृश्य आपको हर बार प्रेरित करे—आराधना करने के लिए, धन्यवाद देने के लिए, और परमेश्वर के पुत्र की महिमा के लिए, जो हमारे लिए सेवक बनकर आया।

लूका 1:26-56

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: मीका 1–3; लूका 21:20-38 ◊

23 दिसम्बर : प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है

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23 दिसम्बर : प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है
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“उसने तीसरी बार उससे कहा, ‘हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?’पतरस उदास हुआ कि उसने उससे तीसरी बार ऐसा कहा, ‘क्या तू मुझ से प्रीति रखता है?’और उससे कहा, ‘हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है; तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।’” यूहन्ना 21:17

मसीही विश्वास का मूल किसी व्यवस्थित थिओलॉजी के कोर्स को पूरा करने या सैद्धान्तिक शिक्षाओं को याद करके दोहराने में नहीं है। इसका केन्द्र बिन्दु यीशु मसीह के साथ एक जीवन्त सम्बन्ध है—अर्थात उसे जानना और उससे प्रेम प्राप्त करना, और बदले में उससे प्रेम करना।

यह हमें प्रत्यक्ष रूप से उस समय दिखाई देता है जब पुनरुत्थित यीशु ने अपने चेलों के साथ झील के किनारे भोजन करने के बाद पतरस से एक निजी बातचीत आरम्भ की। इस बातचीत के परिणाम में पतरस के मन में अपराध-बोध आया और उसे एक बुलावा मिला। परन्तु सर्वोपरि, यह मसीह के उन लोगों के प्रति गहन ज्ञान और देखभाल को प्रकट करती है जो उससे प्रेम करते हैं। मसीह की सबसे बड़ी चिन्ता थी पतरस द्वारा इस प्रश्न का उत्तर: “क्या तू मुझ से प्रेम करता है?”

इस संवाद में यीशु ने पतरस से यह प्रश्न बार-बार पूछा। यह केवल भावुकता को उकसाने के लिए नहीं था; इसने एक निर्णय की माँग की। इस प्रश्न की पुनरावृत्ति पतरस के उन तीन बार इनकार की कठोर याद दिलाती है जब उसने कहा था कि वह यीशु को नहीं जानता (यूहन्ना 18:15–18, 25–27)। इससे पतरस को यह स्वीकार करना पड़ा कि उसके हाल के कार्य मसीह के प्रति उसके प्रेम को सिद्ध नहीं करते थे। वह अपने कामों के द्वारा अपने प्रेम का प्रमाण नहीं दे सका था।

जब हम अपने जीवन में ठोकर खाते हैं, तब हम भी इसी सच्चाई पर पहुँचते हैं। जब मसीह हमसे वही प्रश्न पूछता है, तो हमारे पास ऐसा कुछ नहीं होता जिसे दिखाकर हम अपने प्रेम का प्रमाण दे सकें। पतरस परमेश्वर पिता के सामने और मसीह के सामने केवल एक बात का सहारा ले सकता था: परमेश्वर का सर्वज्ञ होना—“प्रभु . . . तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।” वैसे ही, हम भी केवल यीशु के समझने वाले हृदय की ओर देख सकते हैं।

हमारे कार्य हमें हतोत्साहित कर सकते हैं, हमारी परिस्थितियाँ हमें झकझोर सकती हैं, और परमेश्वर के प्रति हमारा प्रेम क्षीण हो सकता है—लेकिन हम इस सत्य में दिलासा पा सकते हैं कि यीशु हमारे हृदयों को जानता है! वह जानता है कि हमारा हृदय असफल हो सकता है। वह जानता है कि हमारा विश्वास कमज़ोर हो सकता है। लेकिन यही असफलताएँ तो हैं जिनके कारण वह इस संसार में आया, क्रूस पर मरा, और फिर जी उठा।

यदि हम अपने जीवन में पुनः स्थापन की आवश्यकता महसूस करें, परन्तु हमारे पास अपनी सफाई में कहने को कुछ न हो, तो हमारी अद्‌भुत आशा यह है कि हम कह सकते हैं, “प्रभु, तू जानता है।” और यदि हमें लगे कि हमारा प्रेम ठण्डा पड़ गया है और उसे पुनः प्रज्वलित करने के लिए हमारे अन्दर कुछ नहीं बचा है, तो अद्‌भुत सत्य यह है कि हम उस मसीह की ओर देख सकते हैं जो हमारे लिए क्रूस पर टंगा रहा: “हम इसलिए प्रेम करते हैं, कि पहले उसने हम से प्रेम किया” (1 यूहन्ना 4:19)।

एक क्षण ठहरकर परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम की महानता और निकटता पर मनन करें। यीशु ने आपके सारे अपराधों को क्रूस पर उठा लिया, ताकि आप पाप के लिए मरकर उसके लिए जीवित रहें (1 पतरस 2:24), और वह आज भी आपके सारे दोषों के बावजूद आपसे सम्बन्ध बनाए रखना चाहता है। वह आपको पूर्णतः जानता है, और फिर भी पूरी रीति से प्रेम करता है।

क्या आप उससे प्रेम करते हैं? क्योंकि निश्चित ही, उससे अधिक योग्य और कोई नहीं है।

1 यूहन्ना 3:16-24

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 12–13; लूका 21:1-19

22 दिसम्बर : आलस्य के विरुद्ध चेतावनी

“मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास से होकर जाता था,तो क्या देखा कि वहाँ सब कहीं कंटीले पेड़ भर गए हैं;और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है;और उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है . . . छोटी सी नींद,एक और झपकी,थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के और लेटे रहना. . .नीतिवचन 24:30-31, 33

कल्पना करें कि आप सड़क पर गाड़ी चला रहे हैं और एक ऐसे घर के पास से गुजरते हैं जो पूरी तरह से टूटा-फूटा है और जहाँ हर ओर झाड़ियाँ उग आई हैं। पहले तो आप यही सोचेंगे कि शायद यहाँ कोई नहीं रहता। लेकिन फिर आप एक टूटी खिड़की से किसी व्यक्ति को देखते हैं। आप सोचते हैं, शायद मालिक बीमार है और अपने घर की देखभाल नहीं कर पा रहा। फिर वह व्यक्ति बाहर आता है—और पूर्णतः स्वस्थ दिखाई देता है। तब आप समझ जाते हैं: वह केवल आलसी है।

इस नीतिवचन में इसी दृश्य को वर्णित किया गया है: एक आलसी व्यक्ति उस भूमि पर रहता है, और उसकी दाख की बारी उसके आलस्य की गवाही देती है।

आलसी लोग गरीबी और अपमान में जीने की इच्छा लेकर नहीं उठते। बल्कि जब उन्हें परिश्रम करने की चुनौती मिलती है, तो उनका रवैये में कुछ ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं, जो हममें से कई लोग अपने भीतर पहचान सकते हैं यदि हम परमेश्वर के वचन के दर्पण में झाँकने को तैयार हों।

एक आलसी व्यक्ति केवल अपने बिस्तर का आनन्द नहीं लेता—वह मानो एक किवाड़ के समान उस पर झूलता रहता है। वह हिल-जुल तो बहुत करता है, परन्तु किसी वास्तविक कार्य की ओर कोई प्रगति नहीं करता (नीतिवचन 26:14)। वह किसी कार्य को करने से सीधे मना नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे, एक क्षण से दूसरे क्षण तक, उसे टालता जाता है—और अपने आप को धोखा देता है कि वह कभी-न-कभी उसे कर ही लेगा।

आलसी व्यक्ति बहाने बनाने में निपुण होता है। कार्य करने की इच्छा न होने के कारण, वह हमेशा कुछ न कुछ कारण खोज लेता है ताकि वह अपनी निष्क्रियता को जारी रख सके। कूड़ेदान बाहर फेंकना कोई कठिन कार्य नहीं है, परन्तु आलसी व्यक्ति उस सरल कार्य को भी टालने के लिए कोई-न-कोई तर्क गढ़ ही लेता है।

आश्चर्यजनक रूप से, आलसी व्यक्ति हमेशा तृप्ति की भूख में रहता है, क्योंकि उसकी आत्मा की स्थिति के कारण उसे वह कभी नहीं मिलती। वह सन्तोष को कहीं दूर “बाहर” खोजता है, परन्तु उसे कभी प्राप्त नहीं करता। आलसी व्यक्ति लालसा तो बहुत वस्तुओं की करता है, परन्तु प्राप्त कुछ भी नहीं करता, इसलिए नहीं कि वह इसमें सक्षम नहीं है, बल्कि इसलिए कि वह इसके लिए अनिवार्य परिश्रम नहीं करता। विश्राम की अधिकता में भी वह बेचैन रहता है।

जब आलस्य हमारे जीवन की पहचान बन जाता है, तो हम स्वयं को यह समझाने लगते हैं कि हम दस मील दौड़ने के लिए तैयार हैं, उस लेख को लिखना आरम्भ करने जा रहे हैं, या उस परियोजना को पूरा करने ही वाले हैं—लेकिन जब तक परमेश्वर का सामर्थ्य और अनुग्रह हमारी वास्तविकता को नहीं बदलते, तब तक ये बातें केवल कल्पनाओं में ही रहती हैं।

आलस्य को कभी छोटा या तुच्छ दोष समझने की भूल न करें। आलस्य कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि एक पाप है। धीरे-धीरे यह हमारे पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है, और बिना हमें महसूस कराए, अपनी शक्ति में बढ़ता जाता है—और शैतान यही चाहता है कि हम निष्क्रियता में हार मान लें। आप किन क्षेत्रों में आलस्य के प्रति आकर्षित होते हैं? क्या कोई ऐसा कार्य है जिसे आप टाल रहे हैं या जिसके लिए आप बहाना बना रहे हैं? क्यों? क्या आप इस पाप का सामना करेंगे और परमेश्वर से माँगेंगे कि वह आपकी सहायता करे कि आप इस पाप से निर्दयता, अनिवार्यता और निरन्तरता के साथ निपटें?

2 थिस्सलुनीकियों 3:6-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 10–11; लूका 20:27-47 ◊

21 दिसम्बर : अधीनता और दीनता

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21 दिसम्बर : अधीनता और दीनता
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“सदा सब बातों के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्‍वर पिता का धन्यवाद करते रहो। मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।इफिसियों 5:20-21

जब लोग एक ऑर्केस्ट्रा का हिस्सा बनते हैं, तो वे अपनी व्यक्तिगत पहचान का कुछ अंश पीछे छोड़ देते हैं। एक सिम्फनी एक एकल प्रस्तुति नहीं होती। यद्यपि संगीतकार अपनी पहचान नहीं खोते, फिर भी वे स्वयं को उस समूह में समाहित कर देते हैं। एक समूह का सामूहिक स्वरूप किसी एक व्यक्ति की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण होता है, और वह सामूहिक रूप से ऐसा कुछ उत्पन्न करता है जिसे कोई एकल संगीतज्ञ कभी उत्पन्न नहीं कर सकता।

पौलुस भी कुछ ऐसा ही विचार व्यक्त करता है जब वह लिखता है: “एक दूसरे के अधीन रहो”—हालाँकि यहाँ समूह कोई ऑर्केस्ट्रा नहीं, बल्कि कलीसिया है।

हालाँकि अधीनता जैसे शब्दों के प्रति हमारी प्रतिक्रियाएँ भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, तौभी हमें यह स्वीकार करना होगा कि बाइबल इसे सीधा-सीधा और बार-बार उपयोग करती है। पौलुस के लिए कलीसिया की एकता और स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करते हैं कि मसीही विश्वासी अधीनता को सही रूप से समझें और इसे एक-दूसरे के प्रति व्यवहार में लाएँ।

विश्वासियों के परस्पर अधीन होने को गम्भीरता से लेना कैसा दिखता है? आंशिक रूप से इसका अर्थ यह है कि हम में से हर एक यह समझे कि हमारे पास अपने आप पर गर्व करने या किसी अन्य से श्रेष्ठ समझने का कोई कारण नहीं है। दूसरे शब्दों में, हम नम्रता धारण करके परस्पर अधीनता को प्रदर्शित करते हैं। यह कार्य हमारे अहंकार के कारण कठिन अवश्य होता है—जो हम सभी के लिए एक बड़ी चुनौती है, और जो उस संस्कृति में और अधिक तीव्र हो जाती है जो हमें लगातार अपने आपको सबसे आगे रखने के लिए उकसाती है।

परन्तु कलीसिया को ऐसी संस्कृति में भी अलग दिखना चाहिए। परमेश्वर की प्रजा के रूप में, हम जानते हैं कि परमेश्वर की सहायता के बिना तो हम सुबह को उठ भी नहीं सकते। सत्य यही है कि हम पूरी तरह से उस पर निर्भर हैं (प्रेरितों 17:24-25)। सुसमाचार ही सच्ची नम्रता की कुंजी है, क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर ने यीशु में हमारे लिए वह कार्य किया है जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता थी और जिसे हम स्वयं कभी कर ही नहीं सकते थे।

सच्ची नम्रता आत्म-निन्दा नहीं है; यह स्वयं से स्वतन्त्रता है। यह स्वयं को भूलकर भी स्वयं होने की स्वतन्त्रता है। यह वह स्वतन्त्रता है जो इस सच्चाई से आती है कि हम अपनी दुनिया का केन्द्र नहीं हैं। जब आप इस प्रकार की नम्रता को ध्यान में रखते हैं, तो आप दूसरों के अधीन होने के लिए तैयार होते हैं—अपनी सम्पूर्णता को लेकर, दूसरों के हित को प्राथमिकता देते हुए, दूसरों के मार्गदर्शन में सेवा करने को तत्पर होते हैं। तब आपकी कलीसिया कुछ सुन्दर उत्पन्न कर सकती है—एक ऐसी मण्डली जो सुसमाचार को प्रकट करती है। इसलिए इस प्रतीक्षा में न रहें कि आपकी कलीसिया के अन्य लोग पहले ऐसे मसीही बनें। आज ही, नम्रता से संकल्प लें कि आप वह मसीही होंगे।

इफिसियों  4:1-16

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 7–9; लूका 20:1-26

20 दिसम्बर : अंगीकार और राहत

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20 दिसम्बर : अंगीकार और राहत
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“दाऊद ने [बतशेबा को]बुलवाकर अपने घर में रख लिया, और वह उसकी पत्नी हो गई, और उसके पुत्र उत्पन्न हुआ। परन्तु उस काम से जो दाऊद ने किया था यहोवा क्रोधित हुआ . . . तब यहोवा ने दाऊद के पास नातान को भेजा।” 2 शमूएल 11:27; 12:1

यदि हम अपने पाप को स्वयं ढाँकने की कोशिश करना छोड़ दें, तो परमेश्वर उसे ढाँकने के लिए तैयार रहता है।

दाऊद का बतशेबा के साथ व्यभिचार (या सम्भवतः बलात्कार) का पाप और फिर उस पाप को छिपाने के लिए ऊरिय्याह की हत्या की योजना, एक के ऊपर एक पाप थे। परन्तु ऐसा प्रतीत होता था कि उसकी योजना सफल हो गई थी। दाऊद ने बतशेबा से विवाह कर लिया और सब कुछ सामान्य लगने लगा। एक समय तक धोखे और मौन का वातावरण रहा। दाऊद सोचता था कि उसने सब कुछ सम्भाल लिया था। पाप अक्सर हमें इसी प्रकार धोखा देता है। परन्तु लोग जो हमारे विषय में सोचते हैं और परमेश्वर जो हमारे विषय में जानता है, वे दो भिन्न बातें होती हैं।

परमेश्वर वह जानता था जो लोग नहीं जानते थे। उसने नातान भविष्यद्वक्ता को राजा के पास भेजा। परन्तु नातान सीधे जाकर दाऊद पर दोषारोपण नहीं करता। वह उसे एक कहानी सुनाता है—एक धनी व्यक्ति ने, जिसके पास बहुत सी भेड़ें थीं, एक निर्धन व्यक्ति की एकमात्र भेड़ को छीन लिया। यह कहानी सुनकर दाऊद को उस निर्धन व्यक्ति के प्रति सहानुभूति और उस धनी व्यक्ति पर क्रोध आया। तब नातान ने वह घातक वाक्य कहा: “तू ही वह मनुष्य है!” (2 शमूएल 12:7)

“यहोवा ने दाऊद के पास नातान को भेजा।” यह छोटा सा वाक्य परम अनुग्रह के शब्दों से भरा है! यहोवा ने अपने सेवक दाऊद को उसके पाप में आराम से बसने नहीं दिया। यद्यपि अपने पाप का सामना करना राजा के लिए कठिन और अप्रिय था, फिर भी परमेश्वर ने नातान को इसलिए भेजा क्योंकि वह दाऊद से प्रेम करता था। परमेश्वर ने दाऊद को वह अनुग्रह दिया जिसकी वह पात्रता नहीं रखता था, और दाऊद ने नातान के वचनों के प्रति नम्रता और पश्चाताप के साथ प्रतिक्रिया दी। क्योंकि परमेश्वर ने हस्तक्षेप किया और दाऊद ने स्वीकार किया, इसलिए यह कहानी अपराध-बोध और निराशा में नहीं, बल्कि उद्धार और अनुग्रह में समाप्त हुई (भजन संहिता 32:5-6 देखें)। डेरिक किडनर लिखते हैं, “नीचे उतरने का हल्कापन और जो अनुग्रह वहाँ मिलता है . . . वह उस कीमत से कहीं अधिक है जो चुकानी पड़ी।”[1]

यह बात हमारे लिए भी उतनी ही सत्य है जितनी दाऊद के लिए थी। हमें डर लग सकता है कि यदि हमने अपने पाप को छिपाना छोड़ दिया, तो हमारी प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचेगी। लेकिन यदि आप अपने जीवन में किसी प्रकार के अनैतिकता को जगह दे रहे हैं, तो यह कोई मायने नहीं रखता कि आप उसे दुनिया से कितनी अच्छी तरह छिपा सकते हैं। अन्ततः यह दुनिया कोई महत्त्व नहीं रखती: परमेश्वर आपके हृदय को जानता है। अपनी विश्वासयोग्यता के कारण ही परमेश्वर हमें खोजता है और हमें हमारी अवज्ञा और विद्रोह में शान्ति से बसने नहीं देता। यद्यपि हमारे पास नातान जैसा कोई भविष्यद्वक्ता नहीं है, हमारे पास परमेश्वर का वचन है, जो हमारे सामने खुला है: यह “जीवित, और प्रबल, और हर एक दोधारी तलवार से भी बहुत चोखा है . . . मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है। सृष्टि की कोई वस्तु उससे छिपी नहीं है” (इब्रानियों 4:12-13)। इसमें इन शब्दों को लिखने वाला भी शामिल है और इन्हें पढ़ने वाला भी शामिल है। परमेश्वर हमारे पापों को उजागर करता है, ताकि हम उन्हें उसके पास ले आएँ और वह अपने पुत्र के लहू से उन्हें ढाँक सके।

अब वह आपको किस बात की ओर इंगित कर रहा है? क्या आप उसके लिए कोई बहाना बना रहे हैं, उचित ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, या छिपा रहे हैं? अब समय है कि आप नीचे उतर आएँ और इसे छिपाना बन्द कर दें। पाप की कीमत जितनी भी हो, क्षमा के लाभ उससे कहीं अधिक हैं।

2 शमूएल 11:1 – 12:25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 4– 6; लूका 19:28-48 ◊


[1] साम्स 1-72, किडनर क्लासिक कॉमैण्ट्रीज़ (1973; पुनः प्रकाशित आई.वी.पी., 2008), पृ. 151.

19 दिसम्बर : भविष्य की महिमा

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“विश्‍वास ही से यूसुफ ने, जब वह मरने पर था, तो इस्राएल की सन्तान के निकल जाने की चर्चा की, और अपनी हड्डियों के विषय में आज्ञा दी।” इब्रानियों 11:22

उत्पत्ति की पुस्तक यूसुफ की मृत्यु के साथ समाप्त होती है, लेकिन वह कहानी का अन्त नहीं था। बल्कि यह परमेश्वर के प्रावधान और उद्धार की कहानी का आरम्भ था, जो पूरी बाइबल में और आज हमारे जीवनों में भी जारी है।

यूसुफ ने इस पर विशेष ध्यान दिया कि उसकी मृत्यु के बाद उसके अवशेषों के साथ क्या होगा। यह किसी विकृत रुचि के कारण नहीं था, बल्कि यह दिखाने के लिए था कि परमेश्वर ने अतीत में कैसा प्रावधान किया था और भविष्य में छुटकारे की प्रतिज्ञा की थी। उसके अवशेष इस्राएल की भावी पीढ़ियों को उन प्रतिज्ञाओं की ओर इंगित करते थे, जो तब तक पूरी नहीं हुई थीं।

यूसुफ का जीवन कई अद्‌भुत परीक्षाओं और अनुभवों से भरा था—अपने भाइयों द्वारा विश्वासघात किया जाना, पोतीपर की पत्नी द्वारा झूठा आरोप लगाया जाना, फिरौन द्वारा सम्मानित किया जाना, मिस्र की राजसभा में ऊँचा स्थान पाना, अपने परिवार से पुनर्मिलन होना इत्यादि—लेकिन इब्रानियों की पत्री के लेखक ने इनमें से किसी को भी मुख्य रूप में नहीं चुना, बल्कि उसने उसके उस विश्वास को रेखांकित किया जो उसने भविष्य की आशा के लिए रखा था। क्यों? क्योंकि वह विश्वास अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था।

यूसुफ नहीं चाहता था कि उसका परिवार मिस्र में अपनी जड़ें बहुत गहराई तक जमाए। वह जानता था कि प्रतिज्ञात देश आने वाला है। इसलिए उसने कोई भव्य अन्तिम संस्कार नहीं माँगा—केवल यह कहा कि उसके मृत शरीर पर लेप लगाकर मिस्र में एक पेटी में संरक्षित किया जाए (उत्पत्ति 50:22-26)। क्यों? क्योंकि वह नहीं चाहता था कि उसके मृत शरीर को दफनाया जाए। वह चाहता था कि उसका शरीर तैयार रहे कि जब समय आए, तब उसे प्रतिज्ञात देश में ले जाया जाए। वह जानता था कि वह पेटी अपने आप में यह स्मारक होगी कि प्रतिज्ञात देश की आशा उतनी ही निश्चित थी, जितनी परमेश्वर की कोई अन्य प्रतिज्ञा। जब भविष्य में कठिन दिन आएँगे—जैसा कि उसने कल्पना भी की होगी—तो वह चाहता था कि आने वाली पीढ़ियाँ उस प्रतिज्ञा की ओर देख सकें। वे उसके अवशेषों की पेटी की ओर देख सकते थे और कह सकते थे: यूसुफ निश्चय जानता था कि हम यहाँ से निकलेंगे। यदि वह निश्चित न होता, तो वह अपनी हड्डियों को इस प्रकार हमारे साथ न रखता।

आज, आपके पास यूसुफ के अवशेषों की पेटी नहीं है—आपके पास एक खाली कब्र है, जो आपको परमेश्वर के पिछले प्रावधान और आपके भविष्य की आशा की याद दिलाती है। मसीह ही “हमारे अतीत की सहायता और आने वाले वर्षों की आशा है।” वही “हमारा शाश्वत निवासस्थान” है।[1] उसी के कारण हम कठिन दिनों में जीवित रह सकते हैं, और अपने अन्तिम दिन में विश्वास के साथ और स्वर्ग की सुनिश्चित आशा के साथ मर सकते हैं, जो हमारा महान प्रतिज्ञात देश है।

  लूका 23:32-43

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: नहेम्याह 1–3; लूका 19:1-27


[1] आईज़क वॉट्स, “ओ गॉड, आवर हेल्प इन एजेस पास्ट” (1719).

18 दिसम्बर : इसकी सुनो

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18 दिसम्बर : इसकी सुनो
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“पतरस ने यीशु से कहा, ‘हे रब्बी, हमारा यहाँ रहना अच्छा है : इसलिए हम तीन मण्डप बनाएँ; एक तेरे लिए, एक मूसा के लिए, और एक एलिय्याह के लिए।’ क्योंकि वह न जानता था कि क्या उत्तर दे, इसलिए कि वे बहुत डर गए थे। तब एक बादल ने उन्हें छा लिया, और उस बादल में से यह शब्द निकला, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, इसकी सुनो।’” मरकुस 9:5-7

पतरस के लिए यीशु के रूपान्तरण से पहले के दिन भावनाओं के उतार-चढ़ाव से भरे थे। एक क्षण वह घोषणा कर रहा था, “तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है” (मत्ती 16:16), और अगले ही क्षण यीशु उसे डाँटते हुए कह रहा था, “हे शैतान, मेरे सामने से दूर हो! तू मेरे लिए ठोकर का कारण है; क्योंकि तू परमेश्‍वर की बातों पर नहीं, परन्तु मनुष्यों की बातों पर मन लगाता है” (पद 23)। पतरस उस ऊँचाई तक उठ चुका था जहाँ उसने उस पुरुष की सच्ची पहचान प्रकट की थी, जिसने उसे मनुष्यों का मछुआरा बनने के लिए बुलाया था; परन्तु फिर वह ऐसी गहराई तक गिर पड़ा कि जीवते परमेश्वर के पुत्र ने उसे यह कहकर ताड़ना दी कि वह दुष्ट से प्रेरित हो रहा है और पुत्र के कार्य में बाधा बन रहा है। लेकिन वह इससे भी नीचे गिरने वाला था और फिर उससे भी ऊँचा उठने वाला था (मत्ती 26:69-75; प्रेरितों 4:5-20)। यदि मेरे समान आपका मसीही जीवन भी उतार-चढ़ाव से भरा हुआ लगता है, तो पतरस का उदाहरण आपके लिए एक उत्साहजनक प्रेरणा हो सकता है।

मत्ती 17 में, पतरस अचानक खुद को एक पहाड़ पर रूपान्तरित और तेजोमय यीशु के साथ पाता है, जो मूसा और एलिय्याह के साथ बातचीत कर रहा था। स्वाभाविक रूप से, पतरस “न जानता था कि क्या उत्तर दे” क्योंकि वह और उसके दो साथी “बहुत डर गए थे” (मरकुस 9:6)। वह नहीं जानता था कि वह क्या कह रहा है (लूका 9:33)—लेकिन फिर भी वह बोल पड़ा!

उस महिमा की एक झलक ने पतरस को स्तब्ध कर दिया। वह प्रभु और पुराने नियम के इन दो महान भविष्यवक्ताओं के लिए झोंपड़ियाँ बनाने का सुझाव दे ही रहा था कि अचानक, जैसे यीशु के बपतिस्मा के समय हुआ था, स्वर्ग से एक स्वर आया जिसने उसे यह बताया कि इस दर्शन पर सही प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए: बस, पतरस! अब यीशु की सुनने का समय है। यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं प्रेम करता हूँ; इसकी सुनो।

यह परमेश्वर की लगातार पुकार है—हर समय, हर स्थान पर, हर व्यक्ति के लिए। परमेश्वर का वचन आज भी पवित्रशास्त्र के माध्यम से उतना ही जीवित और प्रभावी है, जितना तब था जब पतरस ने उसे रूपान्तरण पर्वत पर सुना था। जब हम बाइबल पढ़ते हैं और पवित्र आत्मा हमारे हृदयों में कार्य करता है, तो हमें वैसे ही स्वर्गिक वैभव की झलक और महिमा की अनुभूति मिल सकती है, जैसी पतरस, याकूब और यूहन्ना को मिली थी।

हम, पतरस की तरह, अपने मसीही जीवन को “कभी गहराइयों में डूबा हुआ . . . और कभी ऊँचाइयों को छूता हुआ पाते हैं।”[1] लेकिन जब परमेश्वर का अटल और शाश्वत वचन हमारे जीवन में प्रवेश करता है, तो वह हमें यीशु की ओर मोड़ता है—उस प्रिय पुत्र की ओर जो सदा पिता को प्रिय था और जो स्वयं को हमारे लिए प्रकट करता है। प्रश्न यह है: क्या हम उसकी सुनेंगे?

2 पतरस 1:16-21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 22–24; लूका 18:18-43 ◊


[1] ओक्टेवियस विनस्लो, सोल-डेप्थ्स ऐण्ड सोल-हाईट्स (बैनर ऑफ ट्रुथ, 2006), पृ. 1.

17 दिसम्बर : आवश्यक परीक्षाएँ

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17 दिसम्बर : आवश्यक परीक्षाएँ
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“हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यह जानकर कि क्लेश से धीरज . . . उत्पन्न होता है।” रोमियों 5:3

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सही दृष्टिकोण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। कला के क्षेत्र में, यह कलाकार को एक ऐसी छवि बनाने में सहायता करता है कि उसके द्वारा बनाया गया प्याला इतना वास्तविक लगता है कि मानो उसे अभी पानी से भर दिया जाए, या उसके द्वारा बनानी गई कुर्सी इतनी वास्तविक लगती है कि वह हवा में झूलती हुई नहीं बल्कि जमीन पर टिकी हुई प्रतीत होती है। इसी प्रकार, जीवन की परीक्षाओं में भी सही प्रतिक्रिया देने के लिए सही दृष्टिकोण आवश्यक है। यदि हम इनका सही अर्थ नहीं समझते, तो हम इनका सामना भी सही तरीके से नहीं कर सकते।

परीक्षाएँ हमारे विश्वास को परखने का साधन हैं जिनके द्वारा यह परखा जाता है कि क्या हम केवल यीशु में भरोसा रखते हैं या नहीं। ये यह भी निर्धारित करने में सहायता करती हैं कि हमारा विश्वास सच्चा है या दिखावटी? जब जीवन सुचारू रूप से चलता है, तो आत्मविश्वास महसूस करना आसान होता है। लेकिन जब समस्याएँ सिर उठाती हैं—जब परिवार बिखरने लगता है, जब शरीर या मन कमजोर हो जाता है, जब हमारी आशाएँ टूट जाती हैं—तब हमें पता चलता है कि हमारा विश्वास कितना दृढ़ है। और जब परीक्षाओं में हमारा विश्वास सच्चा सिद्ध होता है, तो हमें आनन्द होता है, क्योंकि ऐसा विश्वास “आग से ताए हुए नाशवान सोने से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है” (1 पतरस 1:7)।

कठिनाइयाँ हमारे विश्वास की वृद्धि को परखने में भी सहायता करती हैं—कि हम बढ़ रहे हैं या रुक गए हैं। निराशाएँ और आँसू अक्सर हमें आत्मिक रूप से आगे बढ़ाते हैं, क्योंकि तब हम परमेश्वर के वचन को उन तरीकों से लागू करने लगते हैं, जिनकी हमने पहले कल्पना भी नहीं की थी। हम मसीह के अतुलनीय मूल्य को उन तरीकों से समझने लगते हैं, जिन्हें हम पहले कदाचित नहीं समझते थे। एक लेखक ने लिखा है, “कष्टों की आँधी मिथ्या विश्वास, कपट और सन्देह की भूसी को उड़ा देती है, और केवल वही बचता है जो सच्चा और शुद्ध चरित्र होता है।”[1]

परीक्षाएँ हमें सहनशीलता विकसित करने में भी सहायता करती हैं। मसीही जीवन कुछ सौ मीटर की दौड़ नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली मैराथन है। मैराथन धावकों को कई कठिन मीलों से गुजरना पड़ता है, जहाँ वे थकान और पीड़ा महसूस करते हैं, लेकिन वे दौड़ जारी रखते हैं। उन्हें आश्चर्य नहीं होता कि यह कठिन क्यों है; वे पहले से जानते हैं कि ऐसा होगा। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि इन कष्टों के पार ही विजय का मुकुट है। इसी तरह, जीवन में हमें मिलने वाली परीक्षाएँ हमें आत्मिक रूप से मजबूत बनाती हैं, ताकि हम अपनी दौड़ अच्छी तरह पूरी कर सकें।

यदि आप किसी ऐसे मसीही को देखें, जिसकी आँखें कोमल और हृदय दयालु है, तो आपको लगभग निश्चित रूप से यह पता चलेगा कि उन्होंने यह विनम्रता और करुणा कठिन परीक्षाओं के माध्यम से प्राप्त की है। हम अक्सर बिना परिश्रम के अच्छे परिणाम चाहते हैं, लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। परमेश्वर आमतौर पर हमारे विश्वास को दुखों की मिट्टी में ही उगने देता है।

प्रश्न यह है: “क्या मैं इस पर विश्वास करता हूँ?” यदि आपका उत्तर हाँ है, तो यह आपके दृष्टिकोण और जीवन की कठिनाइयों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया को पूरी तरह बदल देगा। परीक्षाएँ अब भी आपको पीड़ा, भय और अनिश्चितता से भर सकती हैं, लेकिन साथ ही, आप उन्हें आनन्द के साथ स्वीकार कर पाएँगे, यह जानते हुए कि वे आपके आत्मिक धैर्य को विकसित कर रही हैं और आपको अन्त तक पहुँचने की शक्ति दे रही हैं।

1 पतरस 1:3-9

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 19–21; लूका 18:1-17


[1] जेम्स बी. ऐडमसन, दि एपिस्टल ऑफ जेम्स, द न्यू इण्टरनैशनल कॉमैण्ट्री ऑन द न्यू टेस्टामेण्ट (अर्डमंस, 1976), पृ. 54.

16 दिसम्बर : दया वहाँ महान थी

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16 दिसम्बर : दया वहाँ महान थी
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“क्योंकि हम भी पहले निर्बुद्धि, और आज्ञा न मानने वाले, और भ्रम में पड़े हुए और विभिन्न प्रकार की अभिलाषाओं और सुख-विलास के दासत्व में थे, और बैर भाव, और डाह करने में जीवन व्यतीत करते थे, और घृणित थे, और एक दूसरे से बैर रखते थे। पर जब हमारे उद्धारकर्ता परमेश्‍वर की कृपा और मनुष्यों पर उसका प्रेम प्रगट हुआ, तो उसने हमारा उद्धार किया; और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने आप किए, पर अपनी दया के अनुसार नए जन्म के स्नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ।” तीतुस 3:3-5

यदि आपके घर में आग नहीं लगी है, तो आपको अग्निशमन दल की जरूरत नहीं है; उसी प्रकार, यदि आप पूरी तरह स्वस्थ हैं, तो कोई डॉक्टर आपको बेवजह ड्रिप नहीं लगाएगा। यह निरर्थक होगा! इसी तरह, जब तक हमें वास्तव में यह एहसास नहीं होता कि हमें क्षमा की आवश्यकता है, तब तक परमेश्वर के अनुग्रह और दया की कहानी हमारे लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखती। हमें यह अप्रासंगिक लगती है।

कई बार हम यह गलती कर बैठते हैं कि दूसरों की स्थिति देखकर तो हम महसूस करते हैं कि उन्हें क्षमा की बहुत अधिक आवश्यकता है, लेकिन वहीं हम क्षमा की अपनी जरूरत को अनदेखा कर देते हैं। हम मन ही मन सोचते हैं (चाहे हम इसे स्वीकार न करें), “धन्यवाद परमेश्वर, मैं उनके जैसा नहीं हूँ।” लेकिन परमेश्वर के अनुग्रह से, हमें जल्दी ही यह एहसास होता है कि हम भी कभी-कभी कठोर हो जाते हैं, हम भी ऐसी बातें बोल देते हैं और ऐसे काम कर देते हैं जो नहीं करने चाहिएँ, या हम वे काम करने में चूक जाते हैं, जो हमें करने चाहिएँ। जब हम इस अपराध-बोध को महसूस करते हैं, तब हमें अपने लिए क्षमा की आवश्यकता समझ में आती है, और जब हमें वे लोग क्षमा करते हैं, जिनका हमने अपमान किया था, तो हम कृतज्ञता से भर जाते हैं।

क्षमा का आनन्द प्राप्त करने से पहले हमें अपने पाप की वास्तविकता को स्वीकार करना आवश्यक है। सबसे पहले, हमें स्वयं को सही दृष्टिकोण से देखना होगा: हम स्वभाव से खोई हुई भेड़ें हैं, परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हैं, और खाली पात्र हैं जिन्हें भरने की आवश्यकता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि चाहे हम मसीही जीवन में कितना भी आगे क्यों न बढ़ जाएँ, और चाहे परमेश्वर का आत्मा हमें कितना भी बदल दे, हम कभी भी अनुग्रह की आवश्यकता से परे नहीं हो सकते, क्योंकि हम अपनी पापमय प्रकृति से कभी पूरी तरह मुक्त नहीं होते। जब तक हमें यह एहसास नहीं होता कि हमारे पापों के लिए हमारा क्या परिणाम होना चाहिए था, तब तक हम इस अद्‌भुत सत्य के आगे नहीं झुकते कि एक सिद्ध उद्धारकर्ता ने हमारे स्थान पर प्राण दिए और हमारे समस्त ऋण को चुका दिया ताकि हम परमेश्वर की पूर्ण क्षमा प्राप्त कर सकें।

हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम निरन्तर विश्वास और पश्चाताप के साथ मसीह की ओर मुड़ते रहें। हम चाहे मसीही जीवन में कहीं भी हों, हम सभी को प्रार्थना करनी चाहिए कि परमेश्वर हमें स्वयं के बारे में और हमारे उद्धारकर्ता के बारे में सत्य प्रकट करे। फिर, जैसे-जैसे हम यह समझते जाएँगे कि हम वास्तव में क्या पाने के योग्य थे, वैसे-वैसे हम अपने उद्धारकर्ता से और अधिक प्रेम करने लगेंगे। हम परमेश्वर के प्रेम और यीशु के कार्यों से विस्मित होते रहेंगे।

अतः अभी एक क्षण रुकें। परमेश्वर से प्रार्थना करें, “मुझे मेरा वास्तविक स्वरूप दिखा,” और अपने पापों पर विचार करें। फिर प्रार्थना करें, “मुझे मेरा उद्धारकर्ता दिखा,” और उसकी दया और अनुग्रह की वास्तविकता में आनन्दित हों। तब उसकी करुणा और दया आपके हृदय को पूरी तरह भर देगी, और आप आनन्दपूर्वक इस गीत को गा पाएँगे:

दया वहाँ महान थी, और अनुग्रह भरपूर था;

क्षमा वहाँ मुझ पर अपार थी;

वहाँ मेरे बोझिल हृदय को स्वतन्त्रता मिली

कलवरी पर।[1]

इफिसियों  2:1-10


[1] विलियम आर. न्यूएल, “ऐट कैलवरी” (1895).