“यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया . . . पर यहोवा यूसुफ के संग-संग रहा और उस पर करुणा की, और बन्दीगृह के दारोगा के अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई।” उत्पत्ति 39:20-21
जब पोतीपर की पत्नी ने यूसुफ पर झूठा आरोप लगाया, तो एक बार फिर से वह अपने जीवन के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया। इस बार उसे किसी गड्ढे में नहीं, बल्कि अन्धेरे कारागार में डाल दिया गया। उसका संसार पूरी तरह बिखर।
फिर भी, एक परमेश्वर-भक्त और सिद्धान्तों पर चलने वाले व्यक्ति के रूप में यूसुफ ने धैर्य बनाए रखा। उसने पोतीपर की पत्नी के प्रलोभन से भागने का निर्णय अपने धार्मिक विश्वास और शुद्धता के आधार पर लिया था। यूसुफ के लिए परमेश्वर का भय जेल के भय से कहीं बड़ा था। वह पोतीपर की पत्नी के साथ सम्बन्ध नहीं बना सकता था, क्योंकि ऐसा करना परमेश्वर के विरुद्ध पाप होता। यह तथ्य यूसुफ के लिए किसी भी आन्तरिक संघर्ष का अन्त था और निर्णय लेने के लिए पर्याप्त था।
ऐसा ही दृष्टिकोण हमें भी संकीर्ण मार्ग पर बनाए रखेगा। सच्ची निष्ठा व्यवहारिक सोच से नहीं, बल्कि सिद्धान्तों से आती है। यह जीवन के कोलाहल से दूर, एक शान्त स्थान पर निर्णय लेने की प्रक्रिया है। यह परिणामों की परवाह किए बिना आज्ञाकारिता है। यह परमेश्वर का जन बनने के लिए इतना दृढ़ निश्चय करना है कि जब पाप करने का दबाव सबसे अधिक हो या जब जीवन पूरी तरह से टूट जाए, तब भी हमें पता हो कि हमें कैसे प्रतिक्रिया देनी है।
जब यूसुफ ने अन्यायपूर्ण पीड़ा सही, तब परमेश्वर ने अपने प्रेम का प्रदर्शन किया और उसे जेल के अधिकारी की दृष्टि में अनुग्रह प्रदान किया। कहानी में कहीं भी ऐसा संकेत नहीं है कि यूसुफ ने परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की थी—और यदि वह किसी मित्र या सहायक की तलाश में भी होता, तो उसे कभी उम्मीद नहीं होती कि जेल का अधिकारी ही उसका सहायक बन जाएगा! लेकिन परमेश्वर की योजनाएँ कुछ और ही थीं। प्रभु की उपस्थिति उसके लोगों के साथ सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बनी रहती है।
समय-समय पर हम सभी को ऐसा लगता है कि हम भी किसी “कारागार”—जीवन के एक नए निम्न स्तर पर में हैं, जहाँ हमें ठण्डे एकान्त ने जकड़ लिया हो। शायद आज आप भी वैसा ही महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आप भी यूसुफ की तरह झूठे आरोपों के शिकार हुए हों, या प्रभु के प्रति आपकी आज्ञाकारिता की कीमत चुका रहे हों, या फिर कोई और भारी बोझ आपकी आत्मा को थका रहा हो। लेकिन चाहे जो भी हो, प्रभु सब कुछ जानता है। वह कभी किसी चीज़ से चौंकता नहीं है, और वह आपसे अनन्त प्रेम करता है। उसका प्रेम अटल है और परिस्थितियों से नहीं बदलता। उसने आपसे इतना प्रेम किया कि उसने मृत्यु की काल-कोठरी और नरक की यातना को सह लिया ताकि आपको ऐसा कभी न करना पड़े। इस सच्चाई में शान्ति पाएँ कि जैसा भविष्यवक्ता जकर्याह ने कहा, “जो तुम को छूता है, वह [परमेश्वर की] आँख की पुतली ही को छूता है” (जकर्याह 2:8)।
लूका 8:22-39
पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 110–112; 2 कुरिन्थियों 1 ◊