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11 सितम्बर : परमेश्वर के प्रावधान की कहानियाँ

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11 सितम्बर : परमेश्वर के प्रावधान की कहानियाँ
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“यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिए बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्‍वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं।” उत्पत्ति 50:20

जो बच्चे अपने दादाओं से प्यार करते हैं, वे अक्सर उनकी कहानियाँ भी पसन्द करते हैं। यूसुफ के दादा इसहाक ने निश्चित रूप से उसके साथ बैठकर उसे परमेश्वर के प्रावधान की अनेक कहानियाँ सुनाई होंगी, ताकि वह अपने पोते के जीवन में सत्य बोले। आप और मैं केवल कल्पना कर सकते हैं कि यूसुफ ने इसहाक की कहानियों और शिक्षाओं को कितना संजोया होगा। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि बीते समय में उनके परिवार को परमेश्वर की जो भलाई मिली, उसने यूसुफ को उनके सबसे दुखद क्षणों में भी स्थिर बनाए रखा, क्योंकि इस व्यक्ति की एक महत्त्वपूर्ण सच्चाई यह है कि वह हमेशा जानता था कि सारा नियन्त्रण परमेश्वर के हाथ में है। निश्चय ही यूसुफ यह कहना सीख रहा था, जैसा कि बाद में भजनकार ने गाया, “यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूँगा, तो मैं मूर्छित हो जाता!” (भजन 27:13)।

वास्तव में, यूसुफ को परमेश्वर के प्रावधान का अनुभव प्राप्त करने के लिए एक के बाद एक अवसर मिले। 17 साल के किशोर के रूप में उसने देखा कि उसके भाइयों की घृणा के बीच भी परमेश्वर काम कर रहा था। रूबेन का यह सुझाव कि उन्हें यूसुफ को गड्ढे में डाल देना चाहिए, अन्ततः उसकी जान बचाने में मददगार साबित हुआ, लेकिन यह परमेश्वर का हस्तक्षेप था जिसने रूबेन को यह विचार दिया और यूसुफ के भाइयों को उसकी योजना के अनुसार करने के लिए प्रेरित किया।

कुछ समय बाद, एक इश्माएली कारवाँ ठीक समय पर वहाँ पहुँचा, जैसे कि कोई दिव्य नियुक्ति हो (जो कि थी भी!) वे अपने सामान्य तरीके से व्यापार कर रहे थे; वे यूसुफ को देखकर कह सकते थे, नहीं, हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। फिर भी, परमेश्वर के प्रावधान ने यह निश्चित किया कि वे यूसुफ को खरीदें।

हर मामले में, परमेश्वर ने दूसरों के स्वार्थी हितों और इच्छाओं को यूसुफ की जान बचाने के लिए उपकरण के रूप में उपयोग किया, और अन्ततः कई अन्य लोगों की जानें बचाईं।

उत्पत्ति 50:20 का सत्य यूसुफ के जीवन का आधार है: हालाँकि उसके भाइयों ने बुराई की योजना बनाई, परन्तु परमेश्वर भलाई की योजना बना रहा था—और परमेश्वर का इरादा हमेशा विजयी होता है। यूसुफ का पार्थिव पिता चाहे पीछे कनान में छूट गया था, लेकिन उसका स्वर्गिक पिता उसके साथ मिस्र जा रहा था। चाहे उसका रास्ता उसके भाइयों की ईर्ष्या, पोतीपर की पत्नी की वासना, पोतीपर का क्रोध और पिलानेहार के स्वार्थ द्वारा बार-बार मोड़ा गया था, लेकिन सर्वोच्च रूप से यह उसके परमेश्वर द्वारा निर्देशित था, ताकि वह अपनी प्रजा का भला कर सके।

क्या यूसुफ के अनुसार हम भी परमेश्वर के बारे में इस सत्य को संजोते हैं? परमेश्वर अपने उद्देश्यों को पूरा करेगा, भले ही हमें यह न पता हो कि हम कहाँ जा रहे हैं या वह क्या कर रहा है। हर परिस्थिति में यही हमारी आशा है। जब परीक्षाएँ आती हैं, तब हमें उन्हें नकारना नहीं चाहिए, क्योंकि हम जानते हैं कि वे एक दयालु पिता के हाथ से आती हैं और वे किसी न किसी तरह से उसकी योजनाओं को पूरा करती हैं, ताकि वह अपनी प्रजा को बचा सके और उन्हें स्थिर बनाए रख सके। हम परमेश्वर की भलाई को अपने आध्यात्मिक परिवार के जीवन में देख सकते हैं, जो बीते समय में पवित्रशास्त्र और कलीसिया के इतिहास में देखने को मिलती है। आप यह निश्चित रूप से जान सकते हैं कि आपके सभी दिनों और सन्देहों, आपके सभी डर और असफलताओं, आपके सभी टूटे रिश्तों और अधूरे सपनों में, आप अपने स्वर्गिक पिता की देखभाल में बने रहते हैं।

उत्पत्ति 49:28 – 50:21

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 11–12; यूहन्ना 4:31-54 ◊

10 सितम्बर : हमारा महान महायाजक

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10 सितम्बर : हमारा महान महायाजक
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“इसलिए जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से होकर गया है, अर्थात् परमेश्‍वर का पुत्र यीशु, तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामे रहें . . . इसलिए आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बाँधकर चलें कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे।” इब्रानियों 4:14-16

पुराना नियम बार-बार यह बताता है कि इस्राइल के महायाजकों पर कितनी बड़ी जिम्मेदारी होती थी (उदाहरण के लिए, निर्गमन 29 और लैव्य. 16 देखें)। महायाजक के पद को हल्के में नहीं लिया जा सकता था। केवल वही परम पवित्र स्थान में प्रवेश कर सकता था, जो यहूदी मन्दिर का भीतरी कक्ष था। केवल वही “लोगों की भूल-चूक के लिए” रक्त बलि अर्पित कर सकता था (इब्रानियों 9:7)। हालाँकि वह स्वयं निष्पाप नहीं होता था, फिर भी वह अपने समुदाय के लिए परमेश्वर के सामने एक अभिभावक के रूप में कार्य करता था।

लेकिन जैसा कि इब्रानियों का लेखक हमें बताता है, एक महान महायाजक हुआ है—अर्थात यीशु—जिसने वह किया जो कोई अन्य याजक नहीं कर सका और जिसने उस जिम्मेदारी को उठाया जिसका भार कोई अन्य मनुष्य नहीं उठा सका।

यीशु ने यरूशलेम के मन्दिर में पर्दे के पीछे परम पवित्र स्थान में प्रवेश नहीं किया। इसके बजाय, परमेश्वर के पुत्र के रूप में वह स्वर्गों में से होकर गया, ताकि वह अब हमारे लिए पिता के सिंहासन के सामने प्रकट हो सके। हमें पृथ्वी पर उसकी शारीरिक अनुपस्थिति का शोक नहीं करना चाहिए, केवल इसलिए नहीं कि वह पवित्र आत्मा के माध्यम से हमारे साथ है, बल्कि इस कारण से भी कि उसकी शारीरिक अनुपस्थिति का अर्थ है कि वह अब भी हमारे लिए परमेश्वर पिता से सीधे बात कर रहा है (इब्रानियों 7:25)।

इसीलिए नए नियम में सेवाकार्य को उन याजकों के लिए अलग नहीं किया गया है, जो रक्त बलियाँ अर्पित करते हैं। जिन्हें परमेश्वर ने बुलाया है और जिन्हें अपने लोगों का मार्गदर्शन करने और शिक्षा देने की जिम्मेदारी दी है, उन्हें परमेश्वर के सामने अपने लोगों के लिए वैसे याजकों की तरह मध्यस्थी करने की आवश्यकता नहीं है, जैसे पुराने नियम के याजकों को थी। क्योंकि हमारे महान महायाजक ने पापों के लिए एक महान बलि अर्पित कर दी है, इसलिए अब किसी और मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में, उसका याजक पद न तो स्वर्ग में और न ही पृथ्वी पर पाप के लिए किसी और बलि की आवश्यकता छोड़ता है। केवल वही हमारे लिए मर सकता था और हमारे लिए बोल सकता था, और केवल वही ऐसा कर चुका है।

मसीह के याजक पद की महानता इस तथ्य में निहित है कि उसने हमारे पापों के लिए एक बार और हमेशा के लिए स्वयं को बलि चढ़ा दिया। हमें और कुछ नहीं चाहिए, सिवाय इसके कि हम यह पहचानें कि “यह युगानुयुग रहता है, इस कारण उसका याजक पद अटल है” (इब्रानियों 7:24)। केवल यीशु ही हममें से उन लोगों को बचा सकता है, जो अपनी नहीं बल्कि उसकी योग्यताओं के आधार पर परमेश्वर के पास आते हैं। वह अपने लोगों के लिए मध्यस्थी करने के लिए हमेशा जीवित है। वह अभी, इस समय, आपके लिए यही कर रहा है। इसलिए आप आत्मविश्वास के साथ यह जानकर जी सकते हैं कि जब भी आप प्रार्थना करते हैं, आपको स्वर्ग के सिंहासन कक्ष में पहुँच प्राप्त होती है—और आपकी मृत्यु के बाद आपकी आत्मा को भी वहाँ प्रवेश मिलेगा। आज आपको बस इतना करना है कि आप अपने महान महायाजक में अपने विश्वास के अंगीकार को बनाए रखें, जिसने सारा आवश्यक कार्य पूरा कर दिया है।

इब्रानियों 7:23-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 9–10; यूहन्ना 4:1-30

9 सितम्बर : विनम्र सेवक

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9 सितम्बर : विनम्र सेवक
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“तुम मुझे गुरु और प्रभु कहते हो, और ठीक ही कहते हो, क्योंकि मैं वही हूँ। यदि मैं ने प्रभु और गुरु होकर तुम्हारे पाँव धोए, तो तुम्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए।यूहन्ना 13:13-14

एण्ड्रू मार्टिनेज गोल्फ के इतिहास के सबसे महान सहायकों में से एक थे, जो जॉनी मिलर, जॉन कुक और टॉम लेहमन जैसे महान खिलाड़ियों के साथ सहायक रहे। वह स्वयं भी एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे। एक बात जो उन्हें गोल्फ खिलाड़ी का एक असाधारण सहायक बनाती थी, वह था उनका अपने बॉस के प्रति समर्पण, जो तब तुरन्त आरम्भ हो जाता जब वह प्रतीक्षा कक्ष में कदम रखते और सफेद वस्त्र पहनते। अपनी भूमिका में वह स्वयं को खो देते थे। वह अभी भी मार्टिनेज थे, लेकिन उनके पीछे का नाम अलग था; वह केवल किसी और की सेवा करने के लिए अस्तित्व में थे, भले ही उनके पास अपनी स्वयं की प्रतिभा और क्षमताएँ थीं।

यीशु ने अपनी मृत्यु से पहले की उस यादगार रात को अपने शिष्यों के पाँव धोए। इसका एक कारण यह था ताकि वह विनम्र सेवा का आदर्श प्रस्तुत कर सके, क्योंकि पाँव धोने का कार्य दास का था, न कि राजा का। हम सभी उसके आदर्श का अनुसरण करके लाभ उठा सकते हैं: सृष्टिकर्ता ने अपनी सृष्टि के पाँव धोए और ऐसा करते हुए उसने न केवल अपने झगड़ते शिष्यों की सेवा की बल्कि अपने विश्वासघाती शिष्य, यहूदा की भी सेवा की। यह विशिष्ट कार्य सामान्य अतिथि-सत्कार की इस परम्परा से कहीं अधिक था।

यीशु के कार्य हमारे लिए आदर्श थे (“तुम्हें भी एक दूसरे के पाँव धोना चाहिए”), लेकिन वे केवल आदर्श ही नहीं थे—और यदि हम इस घटना में केवल यीशु के विनम्र व्यवहार की नकल करने के बुलावे पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, तो हम नैतिकतावाद के शिकार हो सकते हैं और मसीह के पूरे एवं महिमामयी उद्देश्य को खो सकते हैं। जब यीशु अपने शिष्यों के पाँव धो रहा था, तब भी वह यह जानता था कि भविष्य में क्या होने वाला था। वह पूरी तरह से जानता था कि एक बड़ी दुखभरी घड़ी—क्रूस पर उसकी मृत्यु—निकट थी। उसका कार्य यह दर्शाता है कि भविष्य हमेशा पिता के प्रेमपूर्ण हाथों में होता है। अपने शिष्यों के पाँव धोने से उसका उद्देश्य उनके पापों के धोने का प्रतीक प्रस्तुत करना था—और यह धुलाई उसके कटोरे के पानी से नहीं, बल्कि क्रूस पर बहने वाले उसके लहू से आने वाली थी। परमेश्वर का पुत्र अपनी विनम्रता में हमारे पापों के दाग से हमें शुद्ध करने का प्रस्ताव देता है, और उसकी विनम्रता को हमें अपनी विनम्रता से स्वीकार करना चाहिए और अपनी आवश्यकता को स्वीकार करते हुए उसे कहना चाहिए कि वह हमें भी धो दे।

जब हम यह समझ जाएँगे कि हमारे उद्धारकर्ता ने किस प्रकार हमारी सेवा की है, केवल तभी हम उसी प्रकार दूसरों की सेवा कर पाएँगे। पतरस, जो उस समय यह नहीं समझ पा रहा था कि यीशु क्या कर रहा है (यूहन्ना 13:6-8), एक दिन अपने प्रभु के सन्देश को समझने पर था। सालों बाद, वह अपने सह-विश्वासियों को यह कहकर प्रेरित करने वाला था, “परमेश्‍वर के बलवन्त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिससे वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए” (1 पतरस 5:6)। उसे पता था कि मसीह का आदर्श केवल हमारा व्यवहार सुधारने के लिए नहीं था; बल्कि यह हमें विनम्र करने के लिए था और फिर हमें हमारी क्षमा का आश्वासन देने के लिए था।

आज किस प्रकार आपको दूसरों के पाँव धोने के लिए बुलाया गया हैं? आप अपने समय या आराम को किस प्रकार बलिदान कर सकते हैं ताकि आप उन लोगों की सेवा कर सकें जो आपके आस-पास हैं, और यह सेवा केवल विनम्र प्रेम से प्रेरित हो? और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आप दूसरों की सेवा किस प्रकार कर सकते हैं जो उन्हें सबसे बड़ी सेवा के कार्य की ओर ले जाए—अर्थात उस शुद्धता की ओर जो क्रूस पर बहा हुआ मसीह का लहू प्रदान करता है?

यूहन्ना 13:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 7– 8; यूहन्ना 3:16-36 ◊

8 सितम्बर : सदा आनन्दित रहो

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8 सितम्बर : सदा आनन्दित रहो
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“प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनन्दित रहो।” फिलिप्पियों 4:4

हम सदा आनन्दित कैसे रह सकते हैं? क्या यह सम्भव है? या क्या हमें पौलुस के “प्रभु में सदा आनन्दित रहो” की चेतावनी को एक प्रकार के अतिशयोक्ति के रूप में समझना चाहिए, जिसे पौलुस ने कभी हमें हमारे मसीही जीवन में वास्तविक अनुभव करने का इरादा नहीं किया था? नहीं, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए! पौलुस ने जो कहा, पूरी गम्भीरता से कहा। विश्वासियों के रूप में, हमें वास्तव में सदा आनन्दित रहना है।

इस अपील को लेकर हमें जिस कठिनाई का सामना करना पड़ता है, उसका एक कारण यह है कि हम आनन्द को उसी गलत तरीके से सोचते हैं जैसे हम प्रेम को सोचते हैं— अर्थात्, यह कि हम इसे अपनी इच्छा के दास के बजाय अपनी भावनाओं का उत्पाद मानते हैं। जब इसे इस तरह देखा जाता है, तो आनन्द हमारी परिस्थितियों और भावनाओं का उत्पाद बन जाता है; और उस दृष्टिकोण से हम केवल तभी आनन्दित हो सकते हैं, जब हम अच्छा महसूस कर रहे हों, जब सूरज चमक रहा हो, और जब सब कुछ हमारे तरीके से हो रहा हो।

लेकिन बाइबल जब हमें सदा आनन्दित रहने के लिए कहती है, तो वह पूरी गम्भीरता से ऐसा कहती है, यहाँ तक कि तब भी जब जीवन वैसा नहीं होता जैसा हम चाहते हैं, जब बादल घिर आते हैं, और जब हम उदास हो जाते हैं। इसलिए हमें आनन्द को समझने का प्रयास करना चाहिए।

हबक्कूक 3 में हम पढ़ते हैं कि भविष्यद्वक्ता आने वाली मुसीबत के दिन के बारे में सुनकर काँप उठा (3:16)। भावनाओं के सन्दर्भ में सब कुछ हबक्कूक को घबराहट की ओर ले जा रहा था। लेकिन उसने चिन्ता का शिकार होने के बजाय अपनी भावनाओं को अपने प्रदाता के बारे में जो वह जानता था, उसके अधीन कर दिया। सही सोच की शक्ति से हबक्कूक ने निष्कर्ष निकाला, “चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाखलताओं में फल लगें, जलपाई के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए और खेतों में अन्न न उपजे, भेड़शालाओं में भेड़–बकरियाँ न रहें, और न थानों में गाय बैल हों, तौभी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा” (पद 17-18, अतिरिक्त बल दिया गया)। वह यह दिखाता है कि सदा आनन्दित रहना सम्भव है—यहाँ तक कि गहरे संघर्ष और दर्द के बीच भी—जब हमारा आनन्द बाहरी कारकों पर निर्भर न होकर केवल परमेश्वर पर निर्भर करता है।

परमेश्वर का यह उद्देश्य रहा है कि हमारी सोच को उसके प्रकट किए हुए सत्य के द्वारा मार्गदर्शन और आकार मिले—जो उसने अपने वचन और सृष्टि के माध्यम से स्वयं के बारे में प्रकट किया है। 16वीं सदी के वैज्ञानिक जोहानस केपलर के शब्दों में, हमें “परमेश्वर के विचारों को उसकी पद्धति के अनुसार ही सोचना” चाहिए। जैसे-जैसे हम सही ढंग से सोचना सीखते हैं, वैसे-वैसे हम अपनी भावनाओं को सही सोच के अनुसार लाने में सक्षम होंगे।

जब आपका आनन्द परमेश्वर के अपरिवर्तनीय चरित्र में निहित होता है, तब आपका आनन्द आपके स्वयं की और आपकी परिस्थितियों की कैद से मुक्त हो जाता है। हाँ, आपका आनन्द आपके दिन की कठिनाइयों और निराशाओं से चुनौती प्राप्त कर सकता है, लेकिन वह पलट नहीं जाएगा। आज जब भी आपके आनन्द को चुनौती मिले, इन शब्दों को अपने होंठों पर लाएँ:

जो मैं तेरे बारे में जानता हूँ, मेरे प्रभु और परमेश्वर,

वह मेरी आत्मा को शान्ति से और मेरे होंठों को गीतों भर देता है;

तू मेरी सेहत है, मेरा आनन्द है, मेरी लाठी है, मेरी छड़ी है;

मैं तेरे आसरे खड़ा होकर अपनी निर्बलता में मजबूत होता हूँ।[1]

  भजन 20

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 4– 6; यूहन्ना 3:1-15


[1] होराटियस बोनार, “नॉट व्हाट आई ऐम, ओ लोर्ड, बट व्हाट दाओ आर्ट” (1861).

7 सितम्बर : परमेश्वर की प्रजा

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7 सितम्बर : परमेश्वर की प्रजा
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“यहूदी वह नहीं जो प्रगट में यहूदी है; और न वह खतना है जो प्रगट में है और देह में है। पर यहूदी वही है जो मन में है; और खतना वही है जो हृदय का और आत्मा में है, न कि लेख का।” रोमियों 2:28-29

हर राज्य के नागरिक होते हैं, और परमेश्वर का राज्य भी अलग नहीं है। फिर, परमेश्वर के राज्य में नागरिक कौन हैं? परमेश्वर की प्रजा कौन हैं?

परमेश्वर की प्रजा वे लोग हैं, जिन्होंने यीशु मसीह में अपना विश्वास रखा है। ये लोग परमेश्वर के राज्य का हिस्सा अपनी बुद्धि, शक्ति, या किसी अन्य बाहरी कारण से नहीं हैं, बल्कि केवल और केवल इसलिए हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उनसे प्रेम किया और उन्हें अपने पुत्र में विश्वास का उपहार दिया। यीशु ने फरीसियों को डाँटे क्योंकि वे सोचते थे कि अपने वंश के कारण वे परमेश्वर के परिवार का सदस्य हैं: “यीशु ने उनसे कहा, ‘यदि तुम अब्राहम की सन्तान होते, तो अब्राहम के समान काम करते’” (यूहन्ना 8:39)। और अब्राहम ने क्या किया? उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास किया; उसने “परमेश्वर पर विश्वास किया और यह उसके लिए धार्मिकता गिनी गई” (गलातियों 3:6)।

तो फिर, हम परमेश्वर के परिवार के पूर्ण सदस्य हमारे द्वारा किए गए किसी काम के कारण नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर के आत्मा के कार्य से हैं, जो हमारे हृदयों को कायल करता है, हमें विश्वास करने के लिए प्रेरित करता है, और हमें पश्चाताप की ओर ले जाता है। हमें परमेश्वर की प्रजा में शामिल होने के लिए यहूदी कानून के आनुष्ठानिक नियमों का पालन करने या अब्राहम के शारीरिक वंशज होने की आवश्यकता नहीं है। रोमियों 2:29 में, पौलुस मूल रूप से यह पूछता है, अब्राहम की सन्तान कौन हैं? इसका उत्तर है: वही जो हृदय का खतना करवाता है।

जब हम इन सत्यों पर ध्यान करते हैं, तो हम यह सवाल कर सकते हैं कि क्या पौलुस को यहूदी होने का कोई लाभ लगता था। पौलुस ने यह स्पष्ट किया कि वास्तव में इसका एक अद्‌भुत लाभ था, क्योंकि यहूदियों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले प्राप्त किया, जिससे उन्हें मसीह में पूरे होने वाली भविष्यवाणियों को समझने का एक अद्वितीय अवसर मिला (रोमियों 3:1-2)। लेकिन इस समझ से कोई भी परमेश्वर के राज्य का नागरिक नहीं बनता। यह अवसर केवल उन लोगों के लिए खुला और आरक्षित है, जो उसके राजा के अधीन होते हैं। चाहे हम यहूदी हों या अन्यजाति—हमारी पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, हम चाहे जहाँ भी पैदा हुए हों, और चाहे जैसे भी पले-बढ़े हों— परमेश्वर मसीह में विश्वास करने वाले सभी लोगों को उद्धार प्रदान करता है। परमेश्वर के राज्य में हमारी नागरिकता जाति या बाहरी बातों से नहीं जुड़ी होती, बल्कि मसीह में विनम्र, बालक जैसे विश्वास से जुड़ी होती है।

संसार भर में लोग यह जानने के लिए संघर्ष करते हैं कि उनका सही स्थान कहाँ है और वे किसी कम्पनी, समाज, मित्र मण्डल, या यहाँ तक कि अपने परिवार में अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करते हैं। परमेश्वर आपसे संघर्ष करने या प्रयास करने को नहीं कहता, बल्कि केवल आनन्द लेने को कहता है। यदि आप यीशु में विश्वास करके परमेश्वर की प्रजा के लोग हैं, तो आप उसके नाम से उद्धार पाए हैं, आप लज्जा से मुक्त हो गए हैं, और आप उसकी प्रजा हैं। यहीं पर आपको आपका सही स्थान मिलता है, यहीं पर आपको अपना घर मिलता है।

इफिसियों 2:11-22

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 1–3; यूहन्ना 2 ◊

6 सितम्बर : ईर्ष्या के परिणाम

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6 सितम्बर : ईर्ष्या के परिणाम
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“शान्त मन, तन का जीवन है, परन्तु मन के जलने से हड्डियाँ भी जल जाती हैं।” नीतिवचन 14:30

ईर्ष्या आत्मिक कैंसर के समान है, जो व्यक्ति को भीतर से नष्ट कर देती है।

ईर्ष्या के परिणाम गम्भीर होते हैं। राजा सुलैमान इस घातक रोग के बारे में हमें स्पष्ट शब्दों में सचेत करता है और इसके स्थान पर हमें स्वास्थ्य और शान्ति का जीवन अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

ईर्ष्या हमें नुकसान पहुँचाती है। भले ही यह दूसरों को प्रत्यक्ष रूप से कोई हानि न पहुँचाए, लेकिन यह ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देती है। यह दूसरों के प्रति हमारे दृष्टिकोण को प्रभावित करती है। यह एक नकारात्मक तथा आलोचनात्मक दृष्टिकोण को जन्म देती है, जिससे हम अपने पड़ोसियों को अनुचित सन्देह और क्रोध की दृष्टि से देखने लगते हैं। यह हमें दूसरों की खुशी में सहभागी होने से रोकती है और हमारे सन्तोष को छीन लेती है, क्योंकि हमेशा कोई न कोई ऐसा होगा जिसके पास हमसे अधिक होगा और जिससे तुलना करके हम असन्तोष में घिर सकते हैं। ईर्ष्या हड्डियों को गला देती है।

ईर्ष्या अचानक और चुपचाप हमारे मन में घर कर सकती है। प्रेरित पतरस इसका एक उदाहरण है। क्रूस पर यीशु की मृत्यु से ठीक पहले उसने मसीह का तीन बार इनकार कर दिया और परिस्थितियों को और बिगाड़ दिया। यूहन्ना अपने सुसमाचार में बताता है कि पुनरुत्थान के बाद यीशु ने पतरस और अन्य चेलों के लिए समुद्र के किनारे नाश्ता तैयार किया और पतरस से बातचीत की। इस मुलाकात में यीशु ने पतरस के साथ अपने सम्बन्ध को पुनः स्थापित किया, उसे फिर से अपने पीछे चलने के लिए बुलाया, और उसे अपने लोगों की चरवाही करने की ज़िम्मेदारी सौंपी। यदि उससे एक दिन पहले पतरस से पूछा जाता कि उसके हृदय की सबसे बड़ी लालसा क्या है, तो वह यही होती। लेकिन जब यीशु ने कहा कि पतरस को भविष्य में उसके लिए अपना जीवन देना होगा, तो पतरस की क्या प्रतिक्रिया थी? उसने यूहन्ना की ओर देखकर पूछा, “हे प्रभु, इसका क्या हाल होगा?”

यीशु, जो ईर्ष्या के खतरों को भली-भाँति जानता था, उत्तर देता है, “यदि मैं चाहूँ कि वह मेरे आने तक ठहरा रहे, तो तुझे इससे क्या? तू मेरे पीछे हो ले!” (यूहन्ना 21:22)।

यह कितनी सरलता से हो जाता है कि जब हम आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ रहे होते हैं, तब भी ईर्ष्या हमें जकड़ लेती है और हमें यह भुला देती है कि यीशु ने हमारे लिए क्या किया है और हमें क्या दिया है! तो फिर, इस आत्मिक बीमारी का कोई इलाज कैसे सम्भव है?

जो कार्य हम सबसे आखिर में करना चाहते हैं, वही हमें सबसे पहले करने की आवश्यकता है: ईर्ष्या को पाप के रूप में पहचानना और इसे परमेश्वर की उपस्थिति में अंगीकार करके प्रकाश में लाना। इसके बाद, हम प्रार्थना के द्वारा ईर्ष्या को हर क्षण में त्यागने का संकल्प लें, और पवित्र आत्मा से सहायता माँगें कि वह हमें स्मरण कराए कि मसीह में हमें कितना कुछ प्राप्त हुआ है। जब तक हमारे हृदय ईर्ष्या से नहीं, बल्कि आनन्द से भर न जाएँ, तब तक हमें सतत प्रयास करते रहना है। जो लोग अपनी आशिषों को गिनते हैं, वे दूसरों को मिली आशिषों के लिए परमेश्वर की स्तुति करने में अधिक सक्षम होते हैं। और एक शान्त चित्त जीवन प्रदान करता है।

अपनी ईर्ष्या को अनियन्त्रित रूप से आपको खोखला न करने दें। यह किस रूप में आपको जकड़े हुए है? इसे स्वीकार करें, इसके लिए प्रार्थना करें, और सुसमाचार के सत्य से इसका विरोध करें।

यूहन्ना 21:15-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 148–150; यूहन्ना 1:29-51

5 सितम्बर : पतियों के लिए एक सन्देश

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5 सितम्बर : पतियों के लिए एक सन्देश
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“हे पतियो, अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया कि उसको वचन के द्वारा जल के स्नान से शुद्ध करके पवित्र बनाए।” इफिसियों 5:25-26

परमेश्वर के अनुग्रह से प्रत्येक मसीही विवाह केवल विवाह तक सीमित नहीं रहता।

मनुष्य के विवाह का उद्देश्य स्वयं विवाह से आगे संकेत करना है, उस परम विवाह की ओर जो स्वर्ग में ठहराया गया है—अर्थात जिसमें दूल्हा मसीह है और कलीसिया उसकी दुल्हन है। दूसरे शब्दों में, विवाह परमेश्वर की परम योजना को दर्शाने के लिए है, जिसके अन्तर्गत “जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र” करेगा (इफिसियों 1:10)। यही कारण है कि पौलुस पतियों के लिए विशेष निर्देश देता है, ताकि उनके विवाह उस मिलन को प्रकट कर सकें जिसे परमेश्वर ने ठहराया है।

विवाह में पति का मुख्य उद्देश्य केवल अपनी पत्नी की शारीरिक और भावनात्मक देखभाल करना नहीं है। हाँ, यह भी आवश्यक है, लेकिन उसका परम उद्देश्य यह होना चाहिए कि उसकी पत्नी यीशु से मिलने के लिए तैयार हो।

इसीलिए पौलुस यहाँ जिस “प्रेम” शब्द का उपयोग करता है, वह महत्त्वपूर्ण है। यूनानी भाषा में “अगापे” प्रेम आत्म-त्याग और आत्म-न्यूनता को व्यक्त करता है। यह प्रेम पाने के बारे में नहीं, बल्कि देने के बारे में है। यह इस बात पर केन्द्रित नहीं कि हमें क्या मिलना चाहिए, बल्कि इस पर कि हमें क्या देना है। यह स्वार्थी हितों की खोज नहीं, बल्कि अपनी पत्नी के वास्तविक हित के लिए स्वयं को समर्पित करने का प्रेम है, जिससे वह “पवित्र और निर्दोष हो” (इफिसियों 5:27)। यही कारण था कि मसीह ने अपने जीवन को अपनी कलीसिया के लिए दे दिया, और पति के रूप में यही प्रेम हमें अपनी पत्नियों के लिए रखना चाहिए।

लेकिन एक पति अपने दैनिक जीवन में इस प्रेम को कैसे व्यक्त कर सकता है? इसका एक व्यावहारिक तरीका यह है कि पति शारीरिक, भावनात्मक और आत्मिक रूप से अपनी पत्नी की उपेक्षा न करें—और यदि आपका पेशा, या सामाजिक या कलीसियाई जिम्मेदारियाँ किसी भी प्रकार की बाधा बनती हैं, तो आपको अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा। आपको अत्याचार का त्याग भी करना होगा, जिसमें न केवल गम्भीर पाप शामिल हैं, बल्कि इसमें अपनी पत्नी को नीचा दिखाना, उस पर हुक्म जमाना, उसे नज़रअन्दाज़ करना, या ऐसा व्यवहार करना जैसे वह आपसे विवाह करके बहुत सौभाग्यशाली है—ये सब भी शामिल हैं। और अन्त में, आपको यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आप अपनी शादी को कभी भी हल्के में न लें, जो कि समय के साथ होना सम्भव हो सकता है।

फिर भी, ये व्यावहारिक सुझाव चाहे जितने भी सहायक हों, असली मापदण्ड और प्रेरणा का स्रोत क्रूस पर मसीह का अपनी कलीसिया के प्रति प्रेम है। यदि हम स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते कि यीशु ने अपनी कलीसिया से कैसा प्रेम किया है, तो हमारी अच्छी इच्छाएँ भी असफल हो जाएँगी, और हमारी कमियाँ हमें तोड़ देंगी। इसलिए हमें मसीह की ओर देखना चाहिए, जिसे स्वयं किसी व्यक्ति या वस्तु की ज़रूरत नहीं थी, तौभी उसने अपने आपको दे दिया ताकि हम—जो ज़रूरतमन्द हैं, विद्रोही हैं, और खाली हैं—उसकी बाँहों में समा सकें, उसके हृदय में स्वागत पा सकें, उसके परिवार में शामिल हो सकें, और उसकी दुल्हन का हिस्सा माने जा सकें।

क्या आप यह सोचकर चकित होते हैं, “उसने मुझसे इतना प्रेम क्यों किया?” यदि हाँ, तो आप समझ सकते हैं कि पतियों के लिए यह आदेश कि “अपनी-अपनी पत्नी से प्रेम रखो जैसा मसीह ने भी कलीसिया से प्रेम करके अपने आप को उसके लिए दे दिया,” कितना ऊँचा है। यदि आप एक पति हैं, या भविष्य में बनना चाहते हैं, तो इसे प्रार्थना से आरम्भ करें—प्रार्थना करें कि पवित्र आत्मा आपको बाइबल आधारित सोचने, आज्ञाकारिता से जीने, और वास्तव में निःस्वार्थ प्रेम करने में सक्षम बनाए। और यदि आप एक पत्नी हैं, या भविष्य में बनने की आशा रखती हैं, तो आप यह प्रार्थना अपने पति के लिए भी करें, जिससे आपकी और उसकी प्रसन्नता सुनिश्चित हो, और सबसे बढ़कर, परमेश्वर को महिमा मिले।

इफिसियों 5:22-32

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 146–147; यूहन्ना 1:1-28 ◊

4 सितम्बर : विवाह के लिए परमेश्वर की योजना

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4 सितम्बर : विवाह के लिए परमेश्वर की योजना
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“इस कारण पुरुष अपने माता–पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे एक ही तन बने रहेंगे। आदम और उसकी पत्नी दोनों नंगे थे, पर लजाते न थे।” उत्पत्ति 2:24-25

विवाह परमेश्वर द्वारा दिया गया एक उपहार है, जिसे हमने अपने पाप के कारण मलिन कर दिया है। ये बाइबल-पद एक पूर्ण विश्वास से भरे, पूर्ण रूप से निर्बोध, और प्रेम में पूर्णतः एकता से जुड़े हुए सम्बन्ध को दर्शाते हैं। दुर्भाग्यवश, पतित संसार में रहने का एक स्पष्ट प्रभाव यह है कि फिल्मों के अतिरिक्त वास्तविक जीवन में कोई भी विवाह केवल और हमेशा ऐसा नहीं होता। मानव पाप का सबसे बड़ा दुख यह है कि हमारी प्रवृत्ति ही यह है कि हम परमेश्वर द्वारा बनाई गई अच्छी चीज़ों को भ्रष्ट कर दें, जिससे विवाह की सुन्दरता और आनन्द, जैसा कि परमेश्वर ने उसे रचा था, नष्ट हो जाता है। लेकिन एक आशा है! विश्वासियों के लिए, परमेश्वर का आत्मा हमें विवाह को उसकी मूल योजना के अनुसार समझने में सहायता करता है।

सबसे पहले, हमें यह स्वीकार करना होगा कि मसीह के बिना, हम सभी परमेश्वर की योजना के विरुद्ध विद्रोह में जी रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं कि हम विवाह के स्वरूप को लेकर भ्रमित हैं, बल्कि यह भी है कि हमारी पाप से भरी इच्छाएँ विवाह की हमारी थोड़ी सी समझ को भी पूरी तरह अस्वीकार कर देती हैं। आज के संसार में विवाह को अक्सर एक बन्धन, एक सीमा, या एक पुरानी परम्परा के रूप में देखा जाता है, जो अब किसी काम की नहीं। यदि हम विवाह को इसी दृष्टि से देखते हैं, तो इसका कारण यह है कि हमारी प्रवृत्ति यही कहने की है, “मुझे परमेश्वर की योजना पसन्द नहीं। मैं इसे अपनी तरह से करूँगा।”

लेकिन जब हम मसीह में होते हैं, तब परमेश्वर हमें विवाह को उसकी योजना के अनुसार देखने की बुद्धि और सामर्थ्य प्रदान करता है। चाहे कोई भी सरकार कुछ भी तय करे, पवित्रशास्त्र पूरी तरह स्पष्ट है कि विवाह केवल एक पुरुष और एक स्त्री के बीच ही हो सकता है और न तो एक पुरुष एक से अधिक पत्नी रख सकता है और न ही एक स्त्री एक से अधिक पति रख सकती है। यही विवाह का मूल स्वरूप है, क्योंकि यही वह योजना है जिसे परमेश्वर ने सृष्टि के आरम्भ से निर्धारित किया था (उत्पत्ति 2)। यीशु ने भी उत्पत्ति 2 में विवाह के वर्णन को प्रमाणित किया और कहा कि परमेश्वर की योजना आरम्भ से लेकर अभी तक कभी नहीं बदली (मत्ती 19:4-6)।

हमें बाइबल को आधुनिक समाज के अनुसार बदलने या उसमें संशोधन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यद्यपि यह पतित संसार बाइबल-आधारित विवाह के स्वरूप को अस्वीकार कर सकता है, परन्तु यदि हम विश्वास करते हैं कि बाइबल परमेश्वर का वचन है, तो हम उसकी शिक्षाओं का पालन करेंगे—अपने स्वयं के जीवन में, और जब हम दूसरों के विवाह के बारे में बात करते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं।

विश्वासियों के रूप में, हमें यह पहचानना चाहिए कि हर संस्कृति और हर युग में विवाह के प्रति परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि यह मसीह के प्रेम और उसके लोगों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को प्रतिबिम्बित करे (इफिसियों 5:22-25)। और हमें यह भी याद रखना चाहिए कि जो कुछ पाप के कारण नष्ट और विकृत हो गया है, उसे प्रभु यीशु पुनर्स्थापित करने और सुधारने आया था।

केवल मसीह में और मसीह के द्वारा ही हम विवाह को परमेश्वर की योजना और स्वरूप के अनुसार देख सकते हैं। जहाँ संसार कहता है कि हम अपनी मर्जी से जीएँगे, वहीं परमेश्वर हमें प्रेमपूर्वक आमन्त्रित करता है कि हम अपने हृदय को उसकी योजना के अधीन करें। कुछ लोगों के लिए इस क्षेत्र में परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना एक बड़े व्यक्तिगत बलिदान की मांग कर सकता है। और हम सब के लिए, 21वीं सदी में, संसार के मार्ग का विरोध करने और परमेश्वर के मार्ग पर दृढ़ता से चलने के लिए साहस की आवश्यकता होगी। आपकी विशेष परिस्थिति और सन्दर्भ में, परमेश्वर द्वारा विवाह जैसे महान उपहार के लिए बनाई गई उसकी योजना को प्रतिबिम्बित करने वाले ढंग से सोचना, बोलना और कार्य करना आपके लिए क्या मायने रखेगा?

उत्पत्ति 2

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 143–145; 2 कुरिन्थियों 13

3 सितम्बर : पत्नियों के लिए एक सन्देश

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3 सितम्बर : पत्नियों के लिए एक सन्देश
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“हे पत्नियो, अपने-अपने पति के ऐसे अधीन रहो जैसे प्रभु के।” इफिसियों 5:22

“अधीनता” शब्द अक्सर तरह-तरह की नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है। इसका एक कारण यह है, जैसा कि जॉन स्टॉट ने 40 साल पहले लिखा था, “आज के युग में अधिकार की अधीनता में आने का विचार पुराना हो चुका है। यह वर्तमान समय की स्वच्छन्दता और स्वतन्त्रता की मानसिकता से पूरी तरह मेल नहीं खाता।”[1] बीते दशकों में अधीनता की नकारात्मक छवि और भी गहरी हो गई है, जिसे विशेष रूप से विवाह के सन्दर्भ में देखा जा सकता है।

फिर भी यह तथ्य बना हुआ है कि यदि इसे सही रूप में समझा और लागू किया जाए, तो सम्बन्धों के केन्द्र में अधीनता ही होती है, जैसा कि परमेश्वर ने उन्हें स्थापित किया है। बच्चे अपने माता-पिता के अधीन होते हैं (इफिसियों 6:1), कलीसिया के सदस्य अपने अगुवों के अधीन होते हैं (इब्रानियों 13:17), और इसी प्रकार पत्नियाँ अपने पतियों के वैसे ही अधीन होती हैं, “जैसे प्रभु के” (इफिसियों 5:22)। हमारे जीवन में हमें जिन भूमिकाओं के लिए बुलाया गया है, उनके अनुसार दूसरों की अधीनता में आना हमारे सम्बन्धों का एक स्वाभाविक भाग है। इस दृष्टि से, एक पत्नी का अपने पति की अधीनता में आना विवाह के लिए परमेश्वर की दिव्य व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करता है। लेकिन हमें इस शिक्षा को कैसे समझना चाहिए?

पहली बात, पत्नी को अपने पति की अधीनता में होने की आज्ञा का अर्थ यह नहीं कि वह अपने पति से कम मूल्यवान या हीन है। बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि पुरुष और स्त्री दोनों समान सम्मान के योग्य हैं, क्योंकि दोनों ही परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। विश्वासियों के रूप में, हम छुटकारे में भी समान हैं—और यह समानता इस बात में प्रकट होती है कि हम परमेश्वर के अनुग्रह के संयुक्त उत्तराधिकारी हैं (1 पतरस 3:7)। परमेश्वर के सामने पुरुषों और स्त्रियों की स्थिति पूरी तरह से समान है।  भूमिका में अन्तर का अर्थ मूल्य में अन्तर नहीं होता।

दूसरी बात, पत्नियों को अपने-अपने पति के अधीन होने के लिए कहा गया है, न कि सभी पुरुषों के अधीन। पौलुस समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर कोई सामान्य आदेश नहीं दे रहा है, बल्कि वह परिवार में पत्नी की भूमिका के बारे में एक विशिष्ट निर्देश दे रहा है। इस सन्दर्भ में, पत्नी का प्रभु की अधीनता में आना उसके अपने पति की अधीनता में आने के द्वारा प्रकट होता है।

तीसरी बात, यह अधीनता अंधी और बिना शर्त आज्ञाकारिता नहीं है। पति अपनी पत्नियों को बलपूर्वक अधीनता के लिए बाध्य नहीं कर सकते, और न ही वे उनसे कोई भी ऐसी माँग कर सकते हैं जो प्रभु की इच्छा के विरुद्ध हो। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि पत्नी को अपने पति के हर आदेश को बिना किसी प्रश्न के मानना होगा। इसके विपरीत, पति को “अपनी पत्नी से अपने समान प्रेम” रखना है, उसके लिए अपना जीवन देना है और उसे पवित्रता में अगुवाई करनी है (इफिसियों 5:33)। यदि आप पति हैं, तो आपके लिए यह समझना आवश्यक है कि यदि आप अपनी पत्नी को मसीह की आज्ञा मानने से रोकने या उससे दूर ले जाने का प्रयास करते हैं, तो उसे बाइबल के अनुसार आपका अनुसरण करने की कोई बाध्यता नहीं है।

यदि आप पत्नी हैं, तो बाइबल आपको अंधी और दासत्व जैसी आज्ञाकारिता के लिए नहीं बुलाती। बल्कि, आपकी अधीनता एक आनन्दमयी निष्ठा और अपने पति के नेतृत्व का अनुसरण करने की प्रतिबद्धता होनी चाहिए—एक पारस्परिक सहभागिता का हिस्सा, जो हर बात में परमेश्वर की महिमा को खोजती है। सम्पूर्ण हृदय से, बिना किसी अनिच्छा के की गई यह अधीनता केवल परमेश्वर की शक्ति से सम्भव है, ताकि आप अपने पति से “अपने जीवन के सारे दिनों में बुरा नहीं, वरन् भला ही व्यवहार” करें (नीतिवचन 31:12)।

बाइबल पर आधारित यह अधीनता निश्चित रूप से आज के संसार में लोकप्रिय नहीं है। यह अक्सर आसान भी नहीं होती। लेकिन परमेश्वर और उसके लोगों की दृष्टि में यह अत्यन्त सुन्दर है।

  नीतिवचन 31:10-31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 140–142; 2 कुरिन्थियों 12 ◊


[1] द मैसेज ऑफ इफिशियंस: द बाइबल स्पीक्स टूडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक, 1979), पृ. 215.

2 सितम्बर : मसीह के प्रति श्रद्धा

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2 सितम्बर : मसीह के प्रति श्रद्धा
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“. . . मसीह के भय से एक दूसरे के अधीन रहो।” इफिसियों 5:20-21

लोग कई कारणों से एक-दूसरे के अधीन होते हैं—राजनीति, सामाजिक संरचनाओं, या यहाँ तक कि व्यवहारिकता के आधार पर। कभी-कभी दूसरों के अधीन होना बहुत आसान (और निश्चित रूप से सुखद) होता है, बजाय इसके कि असभ्य या टकरावपूर्ण प्रतीत होने का जोखिम उठाया जाए।

तौभी ये कारण मसीही अधीनता के प्रेरक कारक नहीं हैं। इसके बजाय, हमारी परस्पर अधीनता की विशिष्ट विशेषता यह होनी चाहिए कि इसे “मसीह के प्रति श्रद्धा” के कारण किया जाए। यीशु के सामने घुटने टेकने से हमें आत्म-केन्द्रित होने से बचने में मदद मिलती है। मसीह के प्रति श्रद्धा न केवल हमें स्वयं से दूर खींचती है, बल्कि यह हमें यीशु की ओर आकर्षित भी करती है। उसी में हम अधीनता के आह्वान को समझना सीखते हैं, क्योंकि यीशु ने स्वयं सिखाया, “जो तुम में प्रधान होना चाहे, वह तुम्हारा दास बने . . . जैसे कि मनुष्य का पुत्र; वह इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपने प्राण दे” (मत्ती 20:26, 28)। उसने न केवल ये बातें कहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में पूरा भी किया।

उदाहरण के लिए, यूहन्ना 13 में यीशु द्वारा चेलों के पाँव धोने की घटना पर विचार करें। यूहन्ना लिखता है: “यीशु ने, यह जानकर कि पिता ने सब कुछ मेरे हाथ में कर दिया है और मैं परमेश्‍वर के पास से आया हूँ और परमेश्‍वर के पास जाता हूँ, भोजन पर से उठकर अपने ऊपरी कपड़े उतार दिए, और अँगोछा लेकर अपनी कमर बाँधी। तब बरतन में पानी भरकर चेलों के पाँव धोने और जिस अँगोछे से उसकी कमर बँधी थी उसी से पोंछने लगा” (यूहन्ना 13:3-5)।

यहाँ क्या हो रहा था? यही कि परमेश्वर पुत्र परमेश्वर पिता के अधीन हो रहा था। जो परमेश्वर से आया था और स्वयं परमेश्वर था, उसने स्वयं को विनम्र बनाया और “दास का स्वरूप धारण किया” (फिलिप्पियों 2:7)।

यीशु अपनी इच्छा पूरी करने नहीं, बल्कि अपने पिता की इच्छा पूरी करने आया था (यूहन्ना 6:38)। परिणामस्वरूप, उसने कठिनाइयाँ स्वीकार कीं। उसे अलग-थलग किया गया और दुर्व्यवहार सहना पड़ा। उसने द्वेष, गलतफहमियों और मृत्यु तक को झेला। यीशु तोड़ा गया ताकि हमारे टूटे हुए जीवन को पुनः स्थापित और परिवर्तित किया जा सके। वह अपने पिता की इच्छा के अधीन होकर क्रूस पर मरने के लिए आया था, ताकि वह उन सभी के लिए छुटकारे का प्रबन्ध करे, जो विनम्र होकर झुकते हैं और स्वीकार करते हैं, “यही वह उद्धारकर्ता है, जिसकी मुझे आवश्यकता है।”

जब हम मसीह को वैसे देखते हैं जैसा वह वास्तव में है, तो हम उसे आदर और श्रद्धा देने के लिए बाध्य हो जाते हैं। त्रिएक परमेश्वर के दूसरे व्यक्ति के अतिरिक्त और कौन है जिसे हम अधिक सम्मान और प्रेम दे सकते हैं, जिसने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए और अपने लोगों की भलाई के लिए स्वयं को मृत्यु तक अधीन कर दिया? जब हम मसीह की श्रद्धा करते हैं, तो हम उसी मनोभाव को अपनाने के लिए तैयार होते हैं जो मसीह का था—एक ऐसा मनोभाव जो प्रभुता प्राप्त करने की लालसा नहीं करता, अधिकार के लिए संघर्ष नहीं करता, या अपने अधिकारों पर अड़ा नहीं रहता, बल्कि ऐसा मनोभाव जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करता है और अपने भाइयों-बहनों के हितों को अपनी इच्छाओं से ऊपर रखता है।

कई कारण हो सकते हैं जिनके कारण हम किसी के अधीन होने या न होने का चुनाव करते हैं। लेकिन आपके बारे में यह बात सत्य हो: कि आप मसीह की श्रद्धा के कारण अपनी कलीसिया में दूसरों के अधीन हों—जो अपने पिता के अधीन हुआ और ऐसा करते हुए आपका उद्धारकर्ता बन गया।

फिलिप्पियों 2:17-30

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 137–139; 2 कुरिन्थियों 11:16-33