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12 अक्तूबर : अच्छे कामों के लिए बनाए गए

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12 अक्तूबर : अच्छे कामों के लिए बनाए गए
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“हमारे लोग भी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अच्छे कामों में लगे रहना सीखें ताकि निष्फल न रहें।” तीतुस 3:14

आप यहाँ संयोग से नहीं हैं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा से हैं। आपने अपने आप को नहीं बनाया, और न ही आपने अपनी सृष्टि में कोई भाग लिया। आपको आपकी माता के गर्भ में बारीकी से बुना गया है (भजन 139:13)। परमेश्वर के हाथ ने आपको उस व्यक्ति के रूप में आकार दिया जो आप हैं; उसने आपको उसी क्षण बनाया जब उसने चाहा, और उसने आपको इतिहास के इस बिन्दु पर इसलिए रखा ताकि आप, मसीह में, अनुग्रह के द्वारा, विश्वास के माध्यम से, अच्छे काम कर सकें—वे अच्छे काम जो उसने आपके लिए निर्धारित किए हैं (इफिसियों 2:10)।

दूसरे शब्दों में, आपको अच्छे कार्यों करने के लिए ही अनुग्रह पर अनुग्रह प्राप्त हुआ है।

हालाँकि जब हम परमेश्वर के परिवर्तनकारी अनुग्रह के हमारे ऊपर प्रभाव पर विचार करते हैं, तो “अच्छे कामों को करने” का विचार आपके मन में प्राथमिकता न रखता हो, तौभी शायद यह प्रेरित पौलुस की सूची में लगभग पहले स्थान पर था। तीतुस को अपनी चिट्ठी में वह लिखता है कि परमेश्वर ने यीशु में “अपने आप को हमारे लिए दे दिया कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और शुद्ध करके अपने लिए एक ऐसी जाति बना ले जो भले–भले कामों में सरगर्म हो” (तीतुस 2:14, विशेष जोर दिया गया है)। यह जोर इस चिट्ठी में कई बार आता है, और पौलुस के समापन उपदेश में इस प्रकार निष्कर्ष पर पहुँचता है: “हमारे लोग भी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अच्छे कामों में लगे रहना सीखें।”

पौलुस का अच्छे कामों के प्रति विशेष उत्साह उसके और हमारे दोनों युगों में पूरी तरह से संस्कृति के विपरीत था। हम एक ऐसे संसार में जीते हैं, जहाँ स्वार्थी जीवन जीने के आकर्षण भरे पड़ें हैं। तो फिर हम पौलुस की नकल कैसे करें और अच्छे कार्यों में आगे कैसे बढ़ें?

सबसे पहले, हमें यह स्पष्ट करना होगा कि हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर की कृपा को अर्जित नहीं करते। हम अच्छे कार्य इसलिए नहीं करते कि हम बचाए जाएँ, बल्कि हम अच्छे कार्य इसलिए करते हैं क्योंकि हम बचाए गए हैं। बिना अनुग्रह के आधार के सद्‌गुणी जीवन का बुलावा केवल बाहरी आचरण बनाएगा और यह या तो हमें थका देगा या हमें अहंकारी बना देगा। दूसरे, हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारे अच्छे कार्य परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं और हम “मनुष्यों को नहीं, परन्तु परमेश्वर को, जो हमारे मनों को जाँचता है, प्रसन्न करते हैं” (1 थिस्सलुनीकियों 2:4)। इसलिए हमें परमेश्वर की आदर देने वाली, मसीह की महिमा करने वाली अच्छाई से भरे रहना चाहिए, जो हमारे महान उद्धार का जीवित प्रमाण है।

पौलुस कहता है कि अच्छे कार्य करने की हमारी क्षमता एक सीखी हुई आदत है। हमें कहा गया है कि हम “अच्छे कामों में लगे रहना सीखें।” हमारे कार्य केवल भावनात्मक उथल-पुथल का परिणाम नहीं होने चाहिएँ, या केवल तब होने चाहिएँ जब इन्हें करने का हमारा मन हो। इसके बजाय, हमें हर दिन इस उद्देश्य से प्रयास करना चाहिए कि हम वह राजकीय कार्य करें जो परमेश्वर ने हममें से प्रत्येक के लिए निर्धारित किया है, और इसे सोच-समझकर और आदतन करें। और हमें उन लोगों को देखना चाहिए जो अपने विश्वास की यात्रा में आगे बढ़ गए हैं और जो इस प्रकार का जीवन जीते हैं, और उनसे सीखने का प्रयास करना चाहिए।

मसीह में, आपके सभी दिन और आपके सभी कार्य किसी व्यक्ति के लिए और किसी बात के लिए अच्छे हो सकते हैं। हर दिन परमेश्वर से यह मांगने की आदत डालें कि आपको मिले अनुग्रह के प्रत्युत्तर के रूप में वह दूसरों के लिए अच्छे कार्य करने में आपकी सहायता करे, यह विश्वास करते हुए कि वह आपको अपने विश्वास के प्रमाण के रूप में अपने कार्यों को दिखाने के लिए अनुग्रह से सक्षम करेगा।

याकूब 1:27 – 2:13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: श्रेष्ठगीत 6– 8; इफिसियों 2

10 अक्तूबर : प्रार्थना द्वारा सहारा

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10 अक्तूबर : प्रार्थना द्वारा सहारा
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“इस्राएलियों ने तेरी वाचा टाल दी … मैं ही अकेला रह गया हूँ; और वे मेरे प्राणों के भी खोजी हैं।” 1 राजाओं 19:14

एक बार एक विशेष पादरी सम्मेलन में एक सेमिनार आयोजित किया गया था, जिसमें सेवाकार्य में पाई जाने वाली निराशा और तनाव पर चर्चा की गई थी। चाहे इसे अत्यन्त उत्साहवर्धक कहा जाए या अत्यन्त निराशाजनक, इस सेमिनार में उस सम्मेलन के सबसे अधिक लोग उपस्थित हुए थे, जिसमें इतने अधिक लोग आ गए थे कि सबने खड़े रहकर पूरा सेमिनार सुना। पासबान, जिनमें से कुछ पासबान अपनी पत्नियों के साथ आए थे, सेवाकार्य में गम्भीर निराशा के मध्य में आशा और उत्तरों की तलाश में थे।

नबी एलिय्याह भली-भाँति जानता होगा कि उस कमरे में सबसे अधिक दुखी सेवक को कैसा महसूस हो रहा होगा। उसने अपनी सेवा में निराशा का अनुभव किया था। एक बार वह 450 सशस्त्र पुरुषों के सामने अकेला खड़ा हुआ था। ये सब झूठे देवता बाल के नबी थे, जो पूरी तरह से एलिय्याह के खिलाफ थे और परमेश्वर ने अपनी महान शक्ति से आकर उन्हें नष्ट कर दिया था। फिर भी, इसके तुरन्त बाद उसे रानी ईज़ेबेल से धमकी भरा सन्देश मिला और वह जंगल की ओर भाग गया। उसने एक गुफा में निराशा भरी रात बिताई, यह मानते हुए कि वह अकेला ही ऐसा व्यक्ति जीवित बचा है, जो परमेश्वर के प्रति उत्साही है। और इस सबसे निराश अवस्था में परमेश्वर ने एलिय्याह से मिलकर उसे प्रोत्साहित किया, विशेषकर इस प्रतिज्ञा के साथ कि “मैं सात हज़ार इस्राएलियों को बचा रखूँगा। ये तो वे सब हैं, जिन्होंने न तो बाल के आगे घुटने टेके, और न मुँह से उसे चूमा है” (1 राजाओं 19:18)।

आपका विश्वास और मसीह के स्वरूप में आपकी वृद्धि आपके पासबान के लिए बहुत बड़ा प्रोत्साहन है। जब प्रेरित पौलुस ने सुना कि थिस्सलुनीके में युवा मण्डली अभी भी अपने विश्वास में दृढ़ खड़ी है, तो उसने उन्हें लिखा कि “अब हम जीवित हैं” और वर्णन किया कि “हमें तुम्हारे कारण अपने परमेश्‍वर के सामने आनन्द मिला है” (1 थिस्सलुनीकियों 3:8-9)।

सेवाकार्य का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है, जिसमें परमेश्वर के सेवक निराशा से बच सकें। मसीही सेवा का मार्ग उतार-चढ़ाव से भरा होता है; कुछ दिन आनन्दमय होते हैं और कुछ दिन विनाशकारी। जब हम निराश होते हैं, तो आगे बढ़ना कठिन लगता है—लेकिन पासबानों और सेवाकार्य के अगुवों को सहारा देने के लिए परमेश्वर अपने लोगों को उनके विश्वास, विकास और उनकी प्रार्थनाओं के द्वारा उपयोग करता है। जब सी.एच. स्पर्जन लोगों को लंदन के मेट्रोपोलिटन टैबरनेकल का दौरा कराते थे, तो वह उन्हें नीचे ले जाकर “बॉयलर रूम” दिखाते थे। वहाँ कोई बॉयलर नहीं था; इसके बजाय, वहाँ सीटें थीं। हर रविवार सुबह कई सौ लोग वहाँ इकट्ठे होते थे और स्पर्जन के प्रचार के दौरान उनके लिए प्रार्थना करते थे। वह जानते थे कि उनके सेवाकार्य की प्रभावशीलता उन लोगों पर निर्भर करती है जो प्रार्थना करते हैं और उस परमेश्वर पर निर्भर करती है जो उनकी प्रार्थनाओं का उत्तर देता है।

यदि आप सेवाकार्य में हैं (चाहे वेतनभोगी हों या न हों) और निराश महसूस कर रहे हैं, तो इस पर विचार करें: आपने शाश्वतता के लिए जीवनों को प्रभावित किया है। पिछले कुछ वर्षों में देखें और कठिनाइयों के बीच आप परमेश्वर के कार्य के प्रमाण देख पाएँगे। इसे अपने प्रोत्साहन के रूप में लें! और आप चाहे जो भी हों, यह कितने समय पहले हुआ था, जब आपने अपने आस-पास सेवाकार्य में व्यस्त लोगों को प्रोत्साहन का सन्देश लिखा था या उनके लिए प्रार्थना की थी? यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है कि आप ऐसा करें। भले ही ये अगुवे एक ही प्रकार के सन्देश का प्रचार करते रहें और एक ही प्रकार की सेवा करते रहें, जैसे वे हमेशा से करते आ रहे हैं, तौभी जब हम उनके लिए विश्वास से प्रार्थना करते हैं, तो इसका प्रभाव कहीं अधिक होगा। ऐसा करना हम सभी की जिम्मेदारी है—वास्तव में, एक विशेषाधिकार है।

1 थिस्सलुनीकियों 2:17 – 3:13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: श्रेष्ठगीत 1–3; यूहन्ना 21

9 अक्तूबर : प्रतिज्ञा के साथ शपथ

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9 अक्तूबर : प्रतिज्ञा के साथ शपथ
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“इसलिए जब परमेश्‍वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ रीति से प्रगट करना चाहा कि उसका उद्देश्य बदल नहीं सकता, तो शपथ को बीच में लाया। ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिनके विषय में परमेश्‍वर का झूठा ठहरना अनहोना है, दृढ़ता से हमारा ढाढ़स बंध जाए, जो शरण लेने को इसलिए दौड़े हैं कि उस आशा को जो सामने रखी हुई है प्राप्त करें। वह आशा हमारे प्राण के लिए ऐसा लंगर है जो स्थिर और दृढ़ है, और परदे के भीतर तक पहुँचता है।” इब्रानियों 6:17-19

एक शपथ का उन दोनों व्यक्तियों के लिए अत्यधिक महत्त्व होना चाहिए, जो शपथ ले रहा है और जिसे शपथ दी जा रही है। इसमें उच्चतम उपलब्ध शक्ति को एक निर्णायक साक्षी बनाया जाता है, ताकि किसी के शब्दों पर सन्देह समाप्त किया जा सके और दी गई प्रतिज्ञा की विश्वसनीयता की पुष्टि की जा सके। हालाँकि लोग बार-बार झूठ बोलने और शपथें तोड़ने के माध्यम से शपथों का मज़ाक उड़ाते हैं, फिर भी इसके द्वारा किसी के शब्दों की निष्ठा प्रकट होती है।

स्वाभाविक रूप से, शपथ केवल उस व्यक्ति के चरित्र के बराबर होती है जो इसे लेता है। इसलिए हम जानते हैं कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ भरोसेमंद हैं, और इसका यदि कोई अन्य कारण नहीं है तो केवल यह कारण ही पर्याप्त है कि ये स्वयं परमेश्वर ने दी हैं। उसे अपनी प्रतिज्ञा को शपथ से सुनिश्चित करने की आवश्यकता नहीं थी; केवल परमेश्वर द्वारा अपने लोगों को दी गई प्रतिज्ञा ही काफी है कि हम उस पर विश्वास करें। फिर भी, उसने एक और कदम आगे बढ़ाते हुए खुद की शपथ ली, क्योंकि उसके स्वयं से बड़ा और कोई है ही नहीं जिसकी वह शपथ ले सकता।

परमेश्वर हमें निराशा के संसार से आशा की वास्तविकता में लाया है, और हमारी आत्माओं का लंगर सुरक्षित और निश्चित है। यह एक अचल वस्तु से बंधा हुआ है, अर्थात परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से और उस परमेश्वर द्वारा, जो झूठ नहीं बोल सकता, अदृश्य स्वर्गिक क्षेत्र में बांधा गया है। वास्तव में ये प्रतिज्ञाएँ इतनी सुरक्षित हैं कि इन्हें दूसरों के साथ प्रचार में साझा करना उन्हें आकर्षक बनाता है, क्योंकि हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जो निराशा से भरा हुआ है और एक ऐसी संस्कृति में जीते हैं जो अपने असन्तोष को नकली मुस्कान, छुट्टियों और भौतिक लाभों से ढकने की कोशिश करती है।

कितना अद्‌भुत है कि हम ऐसे लोग हो सकते हैं जो विश्वास में दृढ़ हैं, और अपने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के लंगर से सुरक्षित हैं। यीशु मसीह हमारे विश्वास के योग्य है और हम यह जान सकते हैं कि “परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में ‘हाँ’ के साथ हैं” (2 कुरिन्थियों 1:20), जिसका जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण हमारे लिए एक ऐतिहासिक और शाश्वत विजय का कारण बने हैं।

परमेश्वर की कौन सी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करना और उन्हें अपने जीवन का आधार बनाना आपको सबसे कठिन लगता है? याद रखें कि ये प्रतिज्ञाएँ किसने दी हैं। वह वही परमेश्वर हैं जिसने निस्सन्तान और वृद्ध अब्राहम को शपथ दी थी कि उसका वंश आकाश के तारों के समान अनगिनत होगा और जिसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। वह वही परमेश्वर हैं जिसने अपने शिष्यों को शपथ दी थी कि उसे ठुकराया और मारा जाएगा, और फिर तीन दिनों के बाद वह फिर से जीवित हो जाएगा और जिसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। याद रखें कि जिन प्रतिज्ञाओं पर आपको विश्वास करने में कठिनाई हो रही है, वे प्रतिज्ञाएँ किसने दी हैं। याद रखें कि वह किस तरह का परमेश्वर है। वही आपके आत्मा का लंगर और आपके भविष्य की आशा है।

भजन 105

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 47–48; यूहन्ना 20 ◊

8 अक्तूबर : घर्षण पर विजयी होना

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8 अक्तूबर : घर्षण पर विजयी होना
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“जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो, अर्थात् सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो; और मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो।” इफिसियों 4:1-3

घर्षण का एक उपोत्पाद गर्मी है: जब दो या दो से अधिक वस्तुएँ एक-दूसरे से रगड़ती हैं, तो तापमान बढ़ता है। इसी प्रकार, जब आप पापी लोगों को एक साथ रखते हैं—यहाँ तक कि कलीसिया में भी, जहाँ पाप अब शासन नहीं करता, लेकिन उसकी उपस्थिति अभी भी है—वहाँ घर्षण होना तय है। हमें इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हम सही आकार में बनाई गई ईंटें नहीं हैं, जो बड़ी सुन्दरता से एक साथ फिट हो जाती हैं। हम खुरदरे और अधूरे लोग हैं। लेकिन फिर भी, हमें घर्षण के कारण अपने अन्तिम उद्देश्य से विचलित नहीं हो जाना चाहिए।

घर्षण को नजरअंदाज करने से वह गायब नहीं होगा; इसके बजाय, जब हम मसीह पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और उसे महत्त्व देते हैं जिसे वह विश्वासियों की मण्डली के लिए महत्त्व देता है, जैसे कि आतिथ्य, एक-दूसरे के बोझों को सहन करना, आपसी प्रोत्साहन, प्रार्थना और दान, तब हम घर्षण पर विजयी होते हैं। ये मूल्य हमें यह पूछने के लिए प्रेरित नहीं करते कि “मसीह की देह मेरे लिए क्या कर सकती है?” बल्कि यह कि “मैं मसीह की देह के लिए क्या कर सकता हूँ?” जब हम इस दृष्टिकोण से काम करते हैं, तब हमारी आत्म-दया, गुस्सा और चिन्ताएँ दूर होना शुरू होते हैं।

इसलिए जबकि घर्षण की उम्मीद की जानी चाहिए, फिर भी इसे सहन नहीं किया जाना चाहिए। विश्वासियों के रूप में, हमें विनम्र और पश्चाताप करने वाले दिलों के प्रमाण दिखाने चाहिएँ। जब हम ऐसा नहीं करते, तो यह उपयुक्त हो जाता है कि कलीसिया के अन्य लोग हमारी मदद करें और यदि आवश्यक हो तो हमें प्रेमपूर्वक चुनौती दें और अनुशासित करें। सुधार काल के दौरान कलीसिया के अगुवों ने कहा था कि एक कलीसिया सच्ची कलीसिया तब होती है, जब उसमें परमेश्वर का वचन सुनाया जाता है, संस्कारों का पालन किया जाता है, और कलीसियाई अनुशासन का पालन किया जाता है।

कलीसिया में पश्चाताप न करने वाली विभाजनकारी प्रवृत्तियों को सहन करना न केवल घर्षण से उत्पन्न होने वाली गर्मी को अनियन्त्रित छोड़ने की अनुमति देता है, बल्कि यह विनाश का कारण भी बन सकता है। हम किसी को अपने भोजन कक्ष की मेज पर बैठने और हमारे परिवारों केवल इस कारण नष्ट करने की अनुमति नहीं देंगे क्योंकि उनका रवैया बुरा है; फिर भी यह कितना आसान है कि हम कलीसिया में घर्षण और विभाजन को सहन कर लें ताकि यह प्रतीत हो सके कि हम एक अच्छा, आरामदायक स्थान प्रदान कर हैं। लेकिन हमें कठिन मार्ग अपनाना होगा। कलीसिया का भविष्य इसी पर निर्भर करता है।

घर्षण आएगा। हम गलतियाँ करेंगे। इसलिए हमें एक-दूसरे के साथ प्रेम से सहन करना होगा। हमें एक-दूसरे के प्रति धैर्य रखना होगा। हमें हर सम्भव “यत्न” करना होगा ताकि हम उस एकता को बनाए रख सकें जो आत्मा हममें लाता है, जब वह हमें विश्वास के द्वारा परमेश्वर के परिवार में लाता है (इफिसियों 4:3)। दूसरे शब्दों में, हमें मसीह की तरह बनना होगा, क्योंकि उसका निःस्वार्थ अगापे प्रेम ही है जो हमें सिखाता है कि हम एक-दूसरे से बलिदानी प्रेम कैसे करें और संघर्ष पर कैसे विजयी हों। एकता एक कीमती उपहार है, और इसलिए घर्षण को सम्बोधित किया जाना चाहिए—नम्रता और धैर्य से, लेकिन फिर भी इसे सम्बोधित किया जाना चाहिए। शायद आज आपको किसी से बात करने की आवश्यकता है। शायद आज आपको किसी से पश्चाताप करने की आवश्यकता है, या किसी को क्षमा करने की आवश्यकता है, या कलीसिया के किसी सदस्य के साथ उनके घर्षण को सुलझाने में मदद करने के लिए उनके साथ चलने की आवश्यकता है।

याकूब 3:13-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 45–46; यूहन्ना 19:23-42

7 अक्तूबर : एक प्रतिष्ठित जीवन

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7 अक्तूबर : एक प्रतिष्ठित जीवन
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“जब यह देखा गया कि दानिय्येल में उत्तम आत्मा रहती है, तब उसको उन अध्यक्षों और अधिपतियों से अधिक प्रतिष्ठा मिली; वरन् राजा यह भी सोचता था कि उसको सारे राज्य के ऊपर ठहराए। तब अध्यक्ष और अधिपति राजकार्य के विषय में दानिय्येल के विरुद्ध दोष ढूँढ़ने लगे; परन्तु वह विश्वासयोग्य था, और उसके काम में कोई भूल या दोष न निकला, और वे ऐसा कोई अपराध या दोष न पा सके।” दानिय्येल 6:3-4

बन्दी बनाकर बेबीलोन ले जाए जाने के बाद दानिय्येल को उत्कृष्ट इस्राएली युवकों के एक विशेष समूह का हिस्सा बनाया गया, जिन्हें राजा नबूकदनेस्सर के दरबार में कार्यभार सौंपे गए थे। हालाँकि उसे निर्वासन में ले जाया गया था, उसका नाम बदल दिया गया था और वह अपने परिवार तथा परिचितों से दूर था, फिर भी दानिय्येल ने अपने दिल में यह ठान लिया था कि वह राजा के खाने और पीने से स्वयं को अपवित्र नहीं करेगा (दानिय्येल 1:12-16)। वह अपने समय की नैतिक गिरावट के बीच एक साहसी व्यक्ति के रूप में खड़ा हुआ और अपनी सत्यनिष्ठा पर अडिग रहा।

दानिय्येल ने जिस सरकार में काम किया, उसमें अपने जीवन की गुणवत्ता से उसने स्वयं को अलग किया। अब तक उसकी निष्ठा निर्विवाद प्रमाणित हुई थी। वह निरन्तरता वाला व्यक्ति था, जिसे उसने कई साम्राज्यों के दौरान प्रदर्शित किया। उसके पास कठिनाइयों का सामना करने और उन्हें पार करने की असाधारण क्षमता थी, और साथ ही परमेश्वर द्वारा दी गई बुद्धिमत्ता थी, जिसने उसे ऐसा परामर्श देने में सक्षम बनाया, जिसने मानव इतिहास की दिशा बदल डाली।

हालाँकि दानिय्येल जिन सरकारी पदों पर कार्यरत था, वे भ्रष्टाचार से प्रभावित हो सकते थे, तौभी उसने सभी प्रकार की बेईमानी को न कहकर खुद को अलग किया। वह न तो लापरवाह था और न ही अनैतिक, और न ही उसके सार्वजनिक कार्यों और निजी जीवन के बीच कोई अन्तर था। वह अपने साथियों की नजरों में निर्दोष था। यहाँ तक कि उसके विरोधी भी, जो उसकी विशिष्टता से जलते थे और उसे नापसन्द करते थे, उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगा सके।

ईर्ष्या से भरे हुए, इन अधिकारियों ने अन्ततः दानिय्येल के खिलाफ साजिश रचने का निर्णय लिया। वे उसके परमेश्वर के प्रति उसकी अडिग प्रतिबद्धता को या इस तथ्य को पसन्द नहीं करते थे कि वह अधिकार वाले एक पर नियुक्त था। वे यह नहीं सहन कर सके कि वह अपने जीवन से परमेश्वर की शक्ति और पवित्रता के प्रति एक अडिग विश्वास को प्रदर्शित करता था। पवित्र जीवन अक्सर इस प्रकार के तिरस्कार को लाता है। दानिय्येल को इसलिए नहीं फँसाया गया था क्योंकि वह बुरा व्यक्ति था, बल्कि इसलिए क्योंकि वह सत्य के लिए खड़ा था। वह उन बातों से प्यार करता था जो परमेश्वर को प्रिय है, और उसे अपने जीवन में उतारता था।

क्या आपके जीवन में भी इसी तरह का विश्वास पाया जाता है? क्या आपके कर्म आपके परमेश्वर के बारे में सत्य को प्रकट करते हैं? क्या आप सत्यनिष्ठा के प्रति एक जुनून को पोषित करने के लिए तैयार हैं? क्या आप परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के बारे में अधिक चिन्तित हैं, बजाय इसके कि लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं? यीशु ने अपने अनुयायियों को चेतावनी दी थी कि वे उसके कारण निन्दित होंगे और उसके लिए पीड़ा सहेंगे (मत्ती 5:11), जब वे ऐसा जीवन जीएँगे, जो उनके पिता की महिमा और प्रशंसा करेगा (पद 14-16)। दानिय्येल के समान समर्पण के साथ जीवन जीएँ; इस बात में स्पष्ट रहें कि आप उन बातों से प्यार करें जो परमेश्वर को प्रिय हैं, और फिर उन्हें अपनी जीवन में उतारें।

1 पतरस 2:9-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 42–44; यूहन्ना 19:1-22 ◊

6 अक्तूबर : पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा

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6 अक्तूबर : पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा
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“पवित्रशास्त्र . . . तुझे मसीह पर विश्‍वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिए बुद्धिमान बना सकता है। सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिए लाभदायक है, ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए।” 2 तीमुथियुस 3:15-17

पवित्रशास्त्र का अधिकार, पर्याप्तता, अचूकता और निष्कपटता परमेश्वर और उसकी कलीसिया के निरन्तर कार्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हैं। जब तक हम सुसमाचार के दिव्य स्रोत के प्रति आश्वस्त नहीं होते, तब तक हम इसे खोए हुए और पीड़ित संसार तक नहीं ले जा सकते। जैसा कि जे. सी. राइल ने लिखा है, यदि मसीहियों के पास बाइबल एक “दिव्य पुस्तक के रूप में नहीं है, जिस पर वे अपनी सैद्धान्तिक शिक्षा और आचरण का आधार बना सकें, तो उनके पास न तो वर्तमान शान्ति या आशा के लिए कोई ठोस आधार होगा और न ही मानवजाति का ध्यान आकर्षित करने का कोई अधिकार होगा।”[1]

पौलुस ने इसी विषय पर तीमुथियुस को याद दिलाया कि “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है।” दूसरे शब्दों में, बाइबल कोई मानव निर्मित ग्रंथ नहीं है, जिसमें दिव्यता का समावेश किया गया हो; बल्कि यह एक दिव्य उपहार है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के माध्यम से दिया है। इसकी प्रत्येक पुस्तक, अध्याय, वाक्य और शब्द मूल रूप से परमेश्वर की प्रेरणा से दिए गए हैं।

अन्य मसीही सैद्धान्तिक शिक्षाओं के समान पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझना भी एक चुनौती हो सकता है। लेकिन किसी बात को समझने में आने वाली कठिनाई उसकी सच्चाई को कम नहीं करती। इसके अलावा, जब पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त की बात आती है, तो कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें हम वस्तुनिष्ठ रूप से देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि बाइबल पूर्ण रूप से एक संगठित और सामंजस्यपूर्ण रचना है। यह तीस से अधिक लेखकों द्वारा लगभग पन्द्रह सौ वर्षों की अवधि में लिखी गई थी, फिर भी वे सभी लेखक एक ही कहानी बताते हैं—इस संसार का वर्णन करना, इसके सृष्टिकर्ता के चरित्र को उजागर करना, मानव हृदय की समस्या को दर्शाना, और परमेश्वर के मेमने के बलिदान के माध्यम से उद्धार के अद्‌भुत मार्ग की ओर संकेत करना—और उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक एक ही कहानी को बताया गया है!

बाइबल समय, संस्कृति, लिंग और बुद्धिमत्ता की सीमाओं को पार कर जाती है। कुछ पुस्तकें किसी विशेष व्यक्ति, युग या स्थान के लिए उपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन कोई अन्य पुस्तक ऐसी नहीं है, जो हर दिन और हर युग की चुनौतियों का सामना इतनी पूर्णता से कर सके और जीवन के मूलभूत प्रश्नों का उत्तर दे सके। परमेश्वर के वचन की गहराइयों को सबसे महान बुद्धिजीवी भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते, और फिर भी छोटे बच्चे तक इसे पढ़कर इसके सत्य को जान सकते हैं और अपने जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं।

पवित्रशास्त्र का अधिकार, पर्याप्तता, अचूकता और निष्कपटता ही वह आधार हैं, जिन पर हमें खड़े रहना है; और इस कार्य को करने के लिए हमारे पास दिव्य सहायता भी उपलब्ध है। जिस पवित्र आत्मा ने परमेश्वर के वचन को प्रेरित किया, वही पवित्र आत्मा उस वचन को प्रकाशित भी करता है और हमें यह विश्वास दिलाता है कि यह परमेश्वर का दिया हुआ वचन है, जिससे हम उसमें विश्वास करें जो देहधारी वचन है। जब आत्मा यह कार्य आपके भीतर करता है, तब आपका विश्वास केवल एक बौद्धिक स्वीकृति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आपको परमेश्वर के वचन को और अधिक जानने और समझने की भूख से भर देता है—उसके लिए जो न केवल इसका लेखक है बल्कि इसका केन्द्र भी है।

  भजन 12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 40–41; यूहन्ना 18:19-40


[1] बाइबल इंस्पिरेशन: इट्स रियैलिटी एण्ड नेचर (विलियम हण्ट, 1877), पृ. 6.

5 अक्तूबर : आत्मा से भरी निडरता

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5 अक्तूबर : आत्मा से भरी निडरता
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परन्तु यदि तू चढ़ाई करते डरता हो, तो अपने सेवक फूरा को संग लेकर छावनी के पास जाकर सुन, कि वे क्या कह रहे हैं; उसके बाद तुझे उस छावनी पर चढ़ाई करने का साहस होगा।” न्यायियों 7:10-11

डर में पीछे हटना हमेशा आसान होता है, जबकि विश्वास में आगे बढ़ना कठिन। पीछे हटना आसान तो है, लेकिन कभी भी बेहतर नहीं है।

गिदोन डर के बारे में और उसकी वजह से होने वाली हिचकिचाहट के बारे में बहुत कुछ जानता था। जब परमेश्वर के दूत ने उसे इस्राएल का नेतृत्व करने के लिए बुलाया, तब उसने संकोच किया (न्यायियों 6:13, 15)। जब इस्राएल के शत्रु उससे युद्ध करने के लिए इकट्ठा हुए, तब भी उसने संकोच किया (पद 36-40)। और ऐसा प्रतीत होता है कि युद्ध से ठीक पहले, जिसमें परमेश्वर ने उसे विजय का आश्वासन दिया था, वह फिर से संकोच कर रहा था (7:9-10)। इसी डर और संकोच के बीच परमेश्वर ने उससे बात की। ध्यान दें कि गिदोन के डर को देखकर भी परमेश्वर अनुग्रह और धैर्य से उससे बात करता है, “परन्तु यदि तू चढ़ाई करते डरता हो . . .” और उसे अपने सेवक के साथ शत्रु शिविर में जाने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह गिदोन के भय को ध्यानपूर्वक सम्बोधित करने का एक संवेदनशील तरीका है। परमेश्वर ने यह स्वीकार किया कि मानवीय दृष्टिकोण से गिदोन के पास डरने के ठोस कारण थे! वह एक ऐसे शत्रु के खिलाफ युद्ध में जा रहा था, जिसकी सेना उसके सैनिकों की तुलना में हजारों में अधिक थी। लेकिन परमेश्वर ने उसे उसके डर के लिए डाँटा नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास से भरने का कारण दिया।

गिदोन की तरह हमें भी प्रभु के ऐसे ही दयालु शब्दों की जरूरत है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हम अपनी सारी चिन्ताएँ उस पर डाल सकते हैं (1 पतरस 5:7)। हम अपने सारे बोझ और भय उसके चरणों में रख सकते हैं। हमें यह अनुमति दी गई है कि हम उसके पास जाकर कहें कि हमें नहीं पता कि हमें क्या करना चाहिए। और उसका उत्तर हमेशा अनुग्रह और करुणा से भरा होता है।

जो बात इस कहानी को और भी सुन्दर बनाती है, वह है गिदोन की परमेश्वर की कोमल प्रेरणा के प्रति प्रतिक्रिया। जब वह अपने सेवक के साथ छिपकर शत्रु शिविर में जाता है, तो वह दो सैनिकों को एक स्वप्न के बारे में चर्चा करते हुए सुनता है, जिसमें एक सैनिक इसकी व्याख्या इस प्रकार करता है कि वे “गिदोन की तलवार” से हार जाएँगे क्योंकि “उसी के हाथ में परमेश्वर ने मिद्यान को सारी छावनी समेत कर दिया है” (न्यायियों 7:14)। जब गिदोन यह सुनता है और महसूस करता है कि परमेश्वर ने सचमुच उसके लिए पहले से ही वह कार्य कर दिया है जो वह स्वयं कभी नहीं कर सकता था, तो वह क्या करता है? “उसने आराधना की” (पद 15)। इस प्रतिक्रिया में बहुत गहराई है। असम्भव परिस्थितियों का सामना करते हुए, लेकिन परमेश्वर की प्रतिज्ञा में आश्वस्त होकर, यह भयभीत, कमजोर और अप्रत्याशित अगुवा परमेश्वर की स्तुति में अपना हृदय उण्डेल देता है और फिर परमेश्वर से मिले साहस से अपनी सेना को एकत्र करता है। उसकी निडरता एक गुप्त, निजी क्षण से आई थी, जो उसने परमेश्वर के साथ बिताया था।

यह महत्त्वपूर्ण है कि हम उस अन्तर को समझें जो मनुष्यों द्वारा संचालित योजनाओं और आत्मा से भरी वास्तविक निडरता के बीच है। मानवीय योजनाएँ केवल एक मानवीय प्रयास होती हैं और जल्दी ही बिखर सकती हैं; लेकिन आत्मा से मिलने वाली निडरता केवल तब पाई जाती है, जब हम परमेश्वर के सामने दीन होते हैं, अपनी अपर्याप्तता को स्वीकार करते हैं, और उसके सामर्थ्य को याद रखते हैं। यही वह ठोस स्थान है जिस पर हम खड़े हो सकते हैं। डर का समाधान स्वयं को महान मान लेना नहीं है, जैसा कि बहुत से लोग दावा करते हैं। इसका समाधान यह है कि हम परमेश्वर को महान मानें और उसकी शक्ति पर विश्वास करें, जो हमें एक पवित्र और विनम्र निडरता प्रदान कर सकता है।

आप इस समय किससे डर रहे हैं? किस बात को लेकर आप संकोच कर रहे हैं, जबकि परमेश्वर आपको आज्ञाकारिता में आगे बढ़ने के लिए बुला रहा है? अपने भय को परमेश्वर के पास लाएँ। उससे प्रार्थना करें कि वह आपको वह सामर्थ्य दिखाए जो आप में नहीं है। फिर उस पर भरोसा करें, उसकी आराधना करें, और उसकी आज्ञा का पालन करें।

यहोशू 1:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 37–39; यूहन्ना 18:1-18 ◊

4 अक्तूबर : अस्थिर चट्टान

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4 अक्तूबर : अस्थिर चट्टान
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“भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, ‘हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है?’ उसने उससे कहा, ‘हाँ, प्रभु; तू तो जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।’ उसने उससे कहा, ‘मेरे मेमनों को चरा।’” यूहन्ना 21:15

यूहन्ना 21 में यीशु का झील के तट पर प्रकट होना उसके पुनरुत्थान के बाद का घटनाक्रम था, और इस प्रकार यह क्रूस पर उसकी मृत्यु और उससे जुड़े सभी घटनाक्रमों के बाद हुआ था—जिसमें पतरस का कायरता से मसीह को पहचानने से इनकार करना भी शामिल था। हम निश्चित रूप से मान सकते हैं कि पतरस ने अपनी इस विश्वासघाती असफलता के लिए गहरा पश्चाताप और शर्मिन्दगी महसूस की होगी। हम कल्पना कर सकते हैं कि वह अन्य चेलों से कह रहा होगा, मुझे एक मौका मिला था, और मैंने उसे गँवा दिया। मैंने उससे विश्वासघात किया। मैं, जिसने खुद को एक नायक समझा था, अब यहाँ एक सबसे बड़े कायर के रूप में खड़ा हूँ। इसलिए जब यीशु ने पतरस से बात की, तो निश्चय ही पतरस सोच रहा होगा, अब वह मुझसे क्या कहेगा? क्या अब भी मेरा उसके लोगों में कोई स्थान है?

यीशु ने पतरस की असफलता को नजरअंदाज नहीं किया; उसने उसे स्वीकार किया। भोजन के बाद यीशु ने पतरस को उसके पुराने नाम “शमौन” से सम्बोधित किया, जिसका अर्थ है “सुनना।” अपने सेवाकार्य की आरम्भ में यीशु ने उसका नाम बदलकर “पतरस” रखा था, जिसका अर्थ है “पत्थर” (यूहन्ना 1:42)। यह नाम परिवर्तन उस बदलाव को दर्शाता था, जो पतरस के स्वभाव और बुलाहट में आने वाला था: वह डगमगाने वाला व्यक्ति था, लेकिन भविष्य में वह एक दृढ़ चट्टान की तरह स्थिर होने वाला था। झील के तट पर यीशु ने पतरस को उसकी अस्थिरता की याद दिलाई। पतरस के स्थिर बनने से पहले उसे यह समझना जरूरी था कि उसके आचरण ने न तो एक मजबूत विश्वास को दर्शाया था और न ही मसीह के प्रेम में दृढ़ निडरता दर्शाई थी।

हम भी पतरस की तरह कभी-कभी अपनी असफलताओं, पतन, और अविश्वास के कारण हतोत्साहित महसूस कर सकते हैं। हमें अपने “असन्तुलित विश्वास” की पीड़ा महसूस होगी; और हमें उस महान चिकित्सक की जरूरत होगी जो हमारे प्रेम को फिर से सही स्थान पर रखे—कभी-कभी पीड़ादायक तरीके से, लेकिन हमेशा पुनर्स्थापना के लिए। ध्यान दें कि यीशु यहाँ पतरस के दिल, उसके प्रेम और उसकी भक्ति की ही चिन्ता कर रहा था। हाँ, यह सच है कि अन्य गुण आवश्यक और उपयोगी हैं, लेकिन मसीह के प्रति हमारा प्रेम अनिवार्य है। हमारा प्रेम कहाँ टिका है? क्या वह अस्थिर रेत पर आधारित है या एक दृढ़ चट्टान पर?

फिर भी, जब मसीह हमारे प्रेम को पुनर्स्थापित करता है, तब भी वह हमें अपने राज्य का सेवाकार्य सौंपता है। यीशु ने अभी भी पतरस को अपनी कलीसिया के निर्माण के लिए चुना। यह कितना आश्चर्यजनक है कि यीशु ने अपने “मेमनों” की देखभाल उस चेले को सौंपी, जिसने (यहूदा को छोड़कर) उसे सबसे अधिक चोट पहुँचाई थी और जिसके शब्दों और कार्यों में सबसे अधिक अन्तर था। लेकिन यह हमारे लिए भी कितना उत्साहजनक है कि यीशु ने ऐसा किया! क्योंकि यदि वह पतरस जैसे व्यक्ति को उपयोग करने के लिए तैयार था, तो वह मुझ जैसे और आपके जैसे व्यक्ति को भी उपयोग कर सकता है।

यीशु ने पतरस को बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दी, लेकिन यह ज़िम्मेदारी पतरस के लिए एक परीक्षा भी थी। मसीह के प्रति प्रेम की परीक्षा यह है कि हमारा जीवन आज्ञाकारिता और कर्म को कैसे प्रदर्शित करता है। प्रेरितों की पुस्तक हमें दिखाती है कि कैसे पतरस ने परमेश्वर के आत्मा के सामर्थ्य से इस परीक्षा का उत्तर दिया।

डगमगाती चट्टान, अर्थात पतरस की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि हमारा परमेश्वर अनुग्रह देने वाला और दूसरा अवसर देने वाला परमेश्वर है। हमारी कमजोरियाँ हमें यह दिखाती हैं कि हमें एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता है जो हमारी अपनी नहीं है, बल्कि उस महान शाश्वत चट्टान, अर्थात मसीह में पाई जाती है। इसलिए यह जानते हुए कि वही सामर्थ्य हमारे लिए हमारे उद्धारकर्ता की ओर से उपलब्ध है—जो हमारे लिए मरा, और जिसने हमें अपनी सेवा के लिए बुलाया है—आप निश्चिन्त होकर अपने दिन में आगे बढ़ सकते हैं और प्रेमपूर्वक उसकी आज्ञा का पालन कर सकते हैं।

प्रेरितों 5:17-42

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 35–36; यूहन्ना 17

3 अक्तूबर : परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित

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3 अक्तूबर : परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित
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“‘हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।’ यह बात सारी मण्डली को अच्छी लगी।” प्रेरितों 6:4-5

यद्यपि पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा से परिपूर्ण घटनाएँ और उसके परिणामस्वरूप हुआ सेवाकार्य असाधारण थे, तौभी प्रेरितों और उनके अनुयायियों ने यह कहना आरम्भ नहीं कर दिया कि अब परमेश्वर का आत्मा मुझे सिखाता है; इसलिए मुझे किसी और की सुनने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, जब वे पवित्र आत्मा से भर गए, तो वे परमेश्वर के वचन के अधिकारपूर्ण प्रचार और शिक्षा को पूरी तत्परता से सुनने लगे। यह हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देता है: परमेश्वर का आत्मा सदैव परमेश्वर के लोगों को उसके वचन के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है।

इसी कारण प्रेरितों की पुस्तक प्रचार की केन्द्रीयता से भरी हुई है। प्रेरितों ने पहचाना कि परमेश्वर द्वारा अपने लोगों को अपने पुत्र की छवि में नया बनाने का सर्वोच्च साधन उसका वचन है, और उसका आत्मा उसके वचन के माध्यम से कार्य करता है। प्रेरितों 6 में हम यह देखते हैं कि प्रेरितों ने उन लोगों को किस प्रकार प्राथमिकता और संरक्षण दिया, जिन्हें शिक्षा देने के लिए बुलाया और तैयार किया गया था। प्रेरितों ने यह गम्भीर जिम्मेदारी समझी कि उन्हें परमेश्वर के वचन को लोगों के सामने प्रस्तुत करने के लिए सेवक बनाए जाने का सौभाग्य मिला है।

पुराने नियम की पुस्तकें भविष्यवक्ताओं के “वचनों” का उल्लेख करती हैं; इस शब्द का अनुवाद “भारी भविष्यवाणी” भी किया जा सकता है (उदाहरण के लिए, यशायाह 13:1 देखें)। यह हृदय और मन पर पड़े उस भार को दर्शाता है, जो परमेश्वर के सत्य को लोगों तक पहुँचाने की महान जिम्मेदारी के कारण उत्पन्न होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में सी. एच. स्पर्जन ने इस भार को स्वीकार करते हुए यह घोषणा की थी कि उनका पुलपिट इंग्लैंड के राजा के सिंहासन से अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि वह वहाँ परमेश्वर के सिंहासन से मिले सन्देश को लेकर खड़े होते थे और मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा के सत्य का प्रचार करते थे।

हमें उन लोगों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए, जिन्हें पवित्रशास्त्र की सच्चाइयों को सिखाने के लिए बुलाया गया है—चाहे वे किसी मण्डली को सिखाते हों, छोटे बच्चों को सिखाते हों, या किसी अन्य सन्दर्भ में सिखाते हों। यह कोई छोटी बात नहीं है कि कोई व्यक्ति नियमित रूप से एक पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच खड़ा होकर उसके वचन की घोषणा करे। यह एक भारी उत्तरदायित्व होने के साथ-साथ एक अद्‌भुत विशेषाधिकार भी है।

जैसे हमें अपने शिक्षकों और प्रचारकों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, वैसे ही हमें स्वयं भी विनम्र और उत्सुक होकर परमेश्वर के वचन की अधिकारपूर्ण शिक्षा को सुनने और सीखने के लिए तत्पर रहना चाहिए। प्रारम्भिक कलीसिया ने इस समर्पण का उदाहरण स्थापित किया, जब उन्होंने प्रेरितों की शिक्षा के प्रति स्वयं को समर्पित किया (प्रेरितों 2:42)। आज भी हमें उसी प्रकार समर्पित रहना चाहिए; हमें उस शिक्षा के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए, जो प्रेरितों को प्रकट किए गए नए नियम के सत्यों पर आधारित है और जो पुराने नियम की सैद्धान्तिक शिक्षा की नींव पर निर्मित है।

हमें अपना समय व्यर्थ की चीज़ों में नहीं लगाना चाहिए—जैसे ऐसे टीवी कार्यक्रम देखने में जो केवल हमारे विचारों की पुष्टि करें, ऐसी पुस्तकें या वीडियो गेम में जो हमें वास्तविकता से दूर ले जाएँ। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। उसे ही अपना आत्मिक भोजन बनाएँ और आप पाएँगे कि प्रतिदिन परमेश्वर का आत्मा आपको उसकी सच्चाइयों और आनन्द में और भी गहराई तक ले जाता है।

भजन 119:81-96

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 33–34; यूहन्ना 16 ◊

2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा

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2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा
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“उसने अपनी इच्छा का भेद उस भले अभिप्राय के अनुसार हमें बताया, जिसे उसने अपने आप में ठान लिया था कि समयों के पूरे होने का ऐसा प्रबन्ध हो कि जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” इफिसियों 1:9-10

अपने निबन्ध “ऑन फेयरी स्टोरीज़” में जे. आर. आर. टोल्किन उन कारणों के बारे में लिखते हैं, जिनकी वजह से लोग परीकथाओं की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसी कहानियाँ अक्सर हमारे दैनिक समाचारों के विपरीत होती हैं: जहाँ वास्तविक जीवन में युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, महामारी और दिल टूटने की घटनाएँ होती हैं, वहीं परीकथाएँ सुखद अन्त प्रस्तुत करती हैं, जो मानव हृदय की गहरी इच्छाओं को प्रतिबिम्बित करता है। टोल्किन सुझाव देते हैं कि इन इच्छाओं की जड़ में यह तड़प है कि मसीह इस संसार को सही करे—सभी चीज़ों को एक साथ लाए, सब कुछ पुनर्स्थापित करे, और संसार को उतना ही सुन्दर बनाए, जितना यह आदम के विद्रोह से पहले था। क्या आप भी नहीं चाहते कि परमेश्वर सब कुछ ठीक कर दे? क्या आप भी उस सुखद अन्त की लालसा नहीं रखते?

पवित्रशास्त्र में, और हमारे जीवन में भी, हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि हम अभी वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं। हम एक पतित संसार में रहते हैं, जहाँ अलगाव, निराशा और विघटन व्याप्त है। पहले आदम ने पाप किया, और मृत्यु और अराजकता उसका परिणाम बनी। लेकिन फिर दूसरा आदम आया ताकि वह पहले आदम द्वारा किए गए काम को सुधार कर सब कुछ पुनर्स्थापित कर सके और वह पूरा कर सके जो कोई और नहीं कर सकता था। परमेश्वर सब कुछ ठीक करेगा। वास्तव में, उसने इसका आरम्भ कर भी दिया है।

पहली शताब्दी की कलीसियाओं को लिखे अपने पत्रों में पौलुस ने उनकी कठिनाइयों को पहचाना और उन्हें कम करके नहीं आँका; लेकिन उसने हमेशा अपने पाठकों को यह याद दिलाया कि एक दिन ऐसा आएगा “जब दुख समाप्त होंगे और पीड़ाएँ मिट जाएँगी,” और हमारी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।[1] उसने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे अपनी आँखें परम लक्ष्य पर टिकाए रखें, ताकि वे अपने तत्कालीन संघर्षों का सामना कर सकें।

जो उन्हें तब चाहिए था, वही हमें अब चाहिए। यदि आप केवल उन परिस्थितियों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, जो आपके सामने हैं और परमेश्वर के पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा को अपनी दृष्टि में नहीं लाएँगे, तो आप वास्तव में अपने सामने आने वाली समस्याओं से नहीं निपट पाएँगे। वे आपके नियन्त्रण से बाहर लगने लगेंगी। वे आपको निराश कर देंगी। वे आपकी आशा और आनन्द को छीन लेंगी। चाहे समस्याएँ वैश्विक हों, राष्ट्रीय हों, या व्यक्तिगत, सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करें और याद रखें कि परमेश्वर का वचन परमेश्वर की योजना के बारे में क्या कहता है। एक सुखद अन्त होगा। एक समय आएगा जब सब कुछ एक सिद्ध राजा के अधीन एकजुट होगा।

वह क्या है जो आज आपको परेशान कर रहा है? समय के मामलों को पवित्र आत्मा की सहायता के द्वारा एक शाश्वत दृष्टिकोण से देखें और आप उसकी सिद्ध योजना में सुरक्षा प्राप्त करेंगे। आप इस संसार की पूरी कहानी के सभी विवरण अभी नहीं जान सकते, लेकिन आप यह ज़रूर जान सकते हैं कि जो लोग मसीह पर विश्वास रखते हैं, उनके लिए अन्तिम दृश्य एक ऐसा सुखद अन्त लाएगा जिससे अनन्तता का आरम्भ होगा—और यह कोई परीकथा नहीं है।

  यशायाह 65:17-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 30–32; यूहन्ना 15


[1] स्टूअर्ट टाऊण्ट, “देयर इज़ ए होप” (2007).