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30 March : जर तो बोलावतो, तर तो राखतोहि

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30 March : जर तो बोलावतो, तर तो राखतोहि
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आपल्यां प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या दिवशी तुम्हीं निर्दोष ठरावे म्हणून तोच शेवटपर्यंत तुम्हांला दृढ राखील. ज्यानें स्वपुत्र येशू ख्रिस्त आपला प्रभू ह्याच्या सहभागीपणात तुम्हांला बोलावले तो देव विश्वसनीय आहे. (1 करिंथ 1:8-9)

येशू येईपर्यंत तुमचा विश्वास टिकेल याची खात्री करण्यासाठीं तुम्हीं कशावर अवलंबून आहात? प्रश्न हा नाहीं कीं, तुम्हीं सार्वकालिक सुरक्षेवर विश्वास करता का? प्रश्न हा आहे कीं आम्हास कसे  सुरक्षित ठेवले जाते?

आपल्यां विश्वासाची चिकाटी आपल्यां स्वतःच्या संकल्पाच्या विश्वसनीयतेवर निर्णायकपणे अवलंबून असते का? कीं ती आम्हास “आमच्या विश्वासात टिकवून ठेवण्यासाठीं“ देवाच्या कार्यावर निर्णायकपणे अवलंबून आहे?

हे पवित्र शास्त्राचे एक थोर आणि अद्भुत सत्य आहे कीं देव विश्वासू आहे आणि ज्यांना त्यानें पाचारण केलें आहे त्यांना तो सदाकाळ सुरक्षित ठेवेल. आपण सार्वकालिकरित्या सुरक्षित आहोंत हा आपला विश्वास म्हणजे “आम्हांला विश्वासात टिकवून ठेवण्यासाठीं“ जे काहीं आवश्यक असेल ते देवच करेल हा विश्वास!

सार्वकालिकतेची खात्री ही या खात्रीपेक्षा मोठी नाहीं कीं देव आता आम्हास विश्वासात टिकवून ठेवेल. परंतु देवानें ज्यांना पाचारण केलें आहे त्यांच्यासाठीं ही खात्री फार मोठी आहे.

किमान तीन शास्त्र-संदर्भ अशा प्रकारे देवाचे पाचारण आणि देवाचे राखून ठेवणें अशाप्रकारे एकत्र मांडतांत.

1. आपल्यां प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या दिवशी तुम्हीं निर्दोष ठरावे म्हणून तोच शेवटपर्यंत तुम्हांला दृढ राखील. ज्यानें स्वपुत्र येशू ख्रिस्त आपला प्रभू ह्याच्या सहभागीपणात तुम्हांला बोलावले तो देव विश्वसनीय आहे. (1 करिंथ 1:8-9)

2. “शांतीचा देव स्वतः तुम्हांला परिपूर्णपणे पवित्र करो; आणि आपला प्रभू येशू ख्रिस्त ह्याच्या आगमनसमयी तुमचा आत्मा, जीव व शरीर ही निर्दोष अशी संपूर्णपणे राखली जावोत. तुम्हांला पाचारण करणारा विश्वसनीय आहे; तो हे करीलच” (1 थेस्सल 5:23-24). 

3. “देवपित्यानें पवित्र केलेंले आणि येशू ख्रिस्तासाठीं राखून ठेवलेले असे पाचारलेले लोक ह्यांना येशू ख्रिस्ताचा दास व याकोबाचा बंधू यहूदा ह्याच्याकडून : दया, शांती व प्रीति ही तुम्हांला विपुल मिळोत” (यहूदा 1-2). (रोम 8:30, फिलिप्पै 1:6, 1 पेत्र 1:5 आणि यहूदा 24 मध्यें हीच वास्तविकता पहा.)

देवाचा “विश्वासूपणा” याची हमी देतो कीं त्यानें ज्यांना बोलाविले आहे त्या सर्वांस तो सर्वकाळ राखील.

29 मार्च : सच्चा इस्राएल

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29 मार्च : सच्चा इस्राएल
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“जब इस्राएल बालक था, तब मैंने उससे प्रेम किया, और अपने पुत्र को मिस्र से बुलाया। परन्तु जितना वे उनको बुलाते थे, उतना ही वे भागे जाते थे; वे बाल देवताओं के लिए बलिदान करते, और खुदी हुई मूरतों के लिए धूप जलाते गए।”  होशे 11:1-2

जब यीशु का जन्म हुआ तो मरियम और यूसुफ उसे राजा हेरोदेस के सताव से बचाने के लिए मिस्र ले गए। जब ​​मत्ती उस घटना के बारे में लिखता है, तो वह होशे के इन शब्दों को सम्मिलित करता है जो सात शताब्दियों से भी पहले कहे गए थे और समझाता है कि वे वास्तव में एक भविष्यद्वाणी थी जिसे यीशु ने पूरा किया (मत्ती 2:13-15)। किन्तु होशे के शब्द किसी व्यक्ति को सन्दर्भित नहीं कर रहे थे, अपितु एक राष्ट्र के बारे में थे (“उनको बुलाते थे . . . वे भाग जाते थे . . . वे बलिदान करते गए”)। तो फिर हो सकता है कि हम यह सोचें कि यहाँ मत्ती ने बिना पूरी तरह से सोचे-समझे पवित्रशास्त्र का उपयोग किया है।

किन्तु वास्तविकता में मत्ती जानता है कि वह क्या कर रहा है। वह जानबूझकर यीशु को इस्राइल के साथ जोड़ रहा है। जैसे परमेश्वर ने अपने प्रिय लोगों, अर्थात् अपने “पुत्र” को मिस्र से बाहर बुलाया था ताकि वे प्रतिज्ञा किए गए देश में उसकी आराधना करें, मत्ती कहता है कि वैसे ही अब परमेश्वर अपने एकलौते पुत्र, प्रभु यीशु को मिस्र से बाहर बुला रहा था और प्रतिज्ञा किए गए देश में वापस ला रहा था। यद्यपि यीशु अलग था। इस्राएलियों के समान उसे जंगल में परीक्षा का सामना करना पड़ा, परन्तु इस्राएलियों के विपरीत उसने पाप नहीं किया (मत्ती 4:1-11; निर्गमन 32:1-6 भी देखें)। यीशु सच्चा इस्राएल है, सच्चा पुत्र है।

अपने सेवाकार्य के आरम्भ में यीशु ने बारह चेलों को चुना (मत्ती 10:1-4)। यह एक महत्त्वपूर्ण संख्या थी। यीशु ने बारह चेलों को चुनकर एक स्पष्ट और महत्त्वपूर्ण सन्देश दिया। वह, सच्चा इस्राएल, लोगों को एक नए इस्राएल का भाग बनने के लिए बुला रहा था। इस्राएल के बारह गोत्रों से उलट, उसके बारह चेले अब इसकी नींव थे। इस चयन में परमेश्वर के लोगों का केन्द्र बदल गया। यह बदलाव पहले हुआ था और अब भी जारी है। तब से सच्चा इस्राएल अब मध्य-पूर्व में नहीं पाया जाता है, न ही इसमें केवल अब्राहम के जैविक वंशज सम्मिलित हैं। इसके विपरीत, इसमें अब्राहम के आत्मिक वंशज सम्मिलित हैं, जो यहूदी और गैर-यहूदी दोनों हैं। परमेश्वर की सन्तान वे हैं जो परमेश्वर की उन प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करके, जो यीशु में पूरी होती हैं, अब्राहम के उदाहरण का अनुसरण करते हैं।

पौलुस कहता है कि प्रतिज्ञा “विश्वास पर आधारित है” और सदा “अनुग्रह की रीति पर” है (रोमियों 4:16)। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप यहूदी हैं या गैर-यहूदी, अमीर हैं या गरीब, पुरुष हैं या स्त्री। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं या आपने क्या किया है। एक ही सिद्धान्त सदा लागू होता है कि “यदि तुम मसीह के हो तो अब्राहम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो” (गलातियों 3:29)। हम सब “मसीह में एक हैं” (गलातियों 3:28)। सुसमाचार सभी के लिए समान है क्योंकि क्रूस के तले भूमि समतल है। धार्मिक और नैतिक लोगों को उसी उद्धार की आवश्यकता है जैसे किसी ऐसे व्यक्ति को जो कभी कलीसिया में नहीं जाता और जिसने किसी भी मानक या पंथ के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाया। हमारे पास बताने के लिए केवल एक कहानी है, किन्तु यह वही एकमात्र कहानी है जो हमारे लिए या किसी के लिए भी आवश्यक है।

हम निर्विवाद रूप से असिद्ध हैं। पहले इस्राएल की तरह हम भी अपने पिता से भटकने और मूर्तियों को पूजने के लिए प्रवृत्त हैं। किन्तु यीशु, जो सिद्ध रीति से धर्मी है, बेहतर और सच्चा इस्राएल है, हमारे पापों को उठाने के लिए मर गया ताकि हम आकर उसकी दया पर पूर्ण रूप से अपने आप को डाल दें। हम इस्राएल के सच्चे राज्य की संरचना में उसके महान समुदाय में एक किए गए हैं और यह हमारे वजूद के कारण या हमारे कामों के कारण नहीं हुआ है, बल्कि उसके वजूद के कारण और उसके द्वारा पूरे किए गए काम के कारण हुआ है। आज उस विश्वास के कारण जो मसीह यीशु में है, आप परमेश्वर की सन्तान हैं और उतने ही प्रिय हैं जितना वह था और है (गलतियों 3:26)।

      मत्ती 4:1-11

29 March : देवाची प्रीति त्याच्या पुत्रावर जितकीं निश्चित आहे

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29 March : देवाची प्रीति त्याच्या पुत्रावर जितकीं निश्चित आहे
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ज्यानें आपल्यां स्वतःच्या पुत्रास राखून न ठेवता त्याला आपल्यां सर्वांकरता समर्पण केलें, तो त्याच्याबरोबर आपल्यांला सर्वकाहीं कसे देणार नाहीं? (रोम 8:32)

देव प्रत्येक दुःखाचे विध्वंसक सामर्थ्य निशस्त्र करतो. तुम्हीं यावर विश्वास केला पाहिजे, नाहींतर ह्या आधुनिक जीवनातील तनाव आणि परीक्षांमध्यें तुम्हीं ख्रिस्ती म्हणून कधीहि उत्कर्ष पावणार नाहीं किंवा कदाचित टिकून राहणार नाहीं.

खूप वेदना आहेत, खूप अडचणी आणि निराशा आहेत, अनेक वादविवाद आणि तनाव आहेत. सर्वशक्तिमान देव प्रत्येक अडचण, प्रत्येक निराशा, प्रत्येक वाद, प्रत्येक तणाव आणि प्रत्येक वेदना घेऊन त्याचें विध्वंसक सामर्थ्य काढून टाकत आहे आणि देवामधील माझ्या आनंदाच्या वाढीसाठीं कार्य करीत आहे यावर माझा विश्वास नसेल तर मी कोठे जावें हे मला माहित नाहीं.

1 करिंथ 3:21-23 मधील पौलाचे अद्भुत शब्द ऐका, “पौल असो, अपुल्लोस असो, अथवा केफा असो, जग असो, जीवन असो, अथवा मरण असो, वर्तमानकाळच्या गोष्टी असोत अथवा भविष्यकाळच्या गोष्टी असोत, सर्वकाहीं तुमचे आहे; आणि तुम्हीं ख्रिस्ताचे आहात आणि ख्रिस्त देवाचा आहे.” जग आपले आहे. जीवन आपले आहे. मृत्यू आपला आहे, ज्याचा अर्थ मी असा घेतो : देव त्याच्या निवडलेल्यां लोकांच्या वतीने असे सर्वोच्च राज्य करतो कीं आज्ञापालन आणि सेवेच्या जीवनकाळात आपल्यांला ज्यां ज्यां संकटाना तोंड द्यावे लागते त्यां सर्वांचा देवाच्या सामर्थ्यवान हाताने पराभव करून त्यांस अधीन केलें जाईल आणि त्यांना आपल्यां पवित्रतेचा सेवक आणि देवामध्यें आपला सार्वकालिक आनंद होईल.

जर देव आमच्यासाठीं असेल, आणि जर देव हा देव असेल, तर हे खरे आहे कीं आमच्याविरुद्ध काहींही यशस्वी होऊ शकणार नाहीं. ज्यानें आपल्यां स्वतःच्या पुत्रास राखून न ठेवता त्याला आपल्यां सर्वांकरता समर्पण केलें, तो त्याच्याबरोबर आपल्यांला अचूकपणे आणि विनामूल्य सर्वकाहीं कसे देणार नाहीं  – सर्व काहीं – जग, जीवन, मरण आणि स्वतः परमेश्वर.

रोम 8:32 हा एक मौल्यवान मित्र आहे. देवाच्या भावी कृपेचे अभिवचन अतिशय प्रबळ आहे. पण सर्वांत महत्वाचा म्हणजे पाया आहेः मी त्याला स्वर्गाचा तर्क म्हटलेंले आहे. येथे तो मोर्चा आहे ज्यावर उभें राहून आपण सर्व अडचणींविरुद्ध लढा देऊं शकतो. देवानें स्वतःच्या पुत्राला राखून ठेवले नाहीं! म्हणून! म्हणून! स्वर्गाचा तर्क! म्हणून, ख्रिस्ताने जे विकत घेण्यासाठीं मरण पत्करले ते सर्व – सर्व गोष्टी, सर्व चांगले आणि सर्व वाईट हे आपल्यां कल्यांणासाठीं कार्य करण्याकरिता तो आणखी प्रयत्न करणार नाहीं का!

त्यानें आपल्यां पुत्रावर जितकीं प्रीति केलीं तितकेच हे निश्चित आहे!

28 मार्च : ठोस आहार

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28 मार्च : ठोस आहार
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“तुम ऊँचा सुनने लगे हो . . . यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्‍वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए। तुम तो ऐसे हो गए हो कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए। क्योंकि दूध पीने वाले बच्चे को तो धर्म के वचन की पहिचान नहीं होती, क्योंकि वह बालक है। पर अन्न सयानों के लिए है।”  इब्रानियों 5:11-14

कल्पना कीजिए कि आप अपने पसन्दीदा रेस्तराँ में जाएँ और देखें कि सभी ग्राहक अपनी मेजों पर बैठे हैं और दूध पीने वाली बड़ी-बड़ी बोतलों से दूध पी रहे हैं। यह कितना विचित्र दृश्य होगा! फिर भी यही वह चित्र है जिसे इब्रानियों के लेखक ने चित्रित किया था जब उसने अपने समय के यहूदी मसीहियों से अधिक से अधिक मसीह के समान बनने के लिए लालायित बने रहने की विनती की थी। वह जानता था कि बहुत से लोग पहले से ही अपने विश्वास में उदासीन हो रहे थे। जिन्हें अब तक गुरु हो जाना चाहिए था, उन्हें अपनी बुनियादी बातों की फिर से समीक्षा करने की आवश्यकता थी।

इन विश्वासियों के लिए बाइबल के सिद्धान्तों को समझने में कठिनाई न तो किसी जटिल विषय-वस्तु के कारण हुई थी और न ही लेखक की स्पष्ट रूप से व्याख्या करने में असमर्थता के कारण। इसके विपरीत, उनके सीखने के प्रयास में कमी थी। जब लेखक लिखता है कि वे “ऊँचा सुनने लगे” थे, तो “ऊँचा” के लिए वह उसी शब्द का उपयोग करता है, जिसका उपयोग वह बाद में उन्हें “आलसी” न होने की चेतावनी देते समय करता है (इब्रानियों 6:12)। वहाँ वह अपने पाठकों के इस प्रकार के आलसी रवैये को सहन करने के विपरीत “उनका अनुकरण करने” के लिए प्रोत्साहित करता है, “जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के वारिस होते हैं।”

यदि ये आरम्भिक मसीही लोग कर्तव्यनिष्ठ होते जो ध्यान से सुन रहे होते और बाइबल की अवधारणाओं को समझने का पूरा प्रयास कर रहे होते और केवल ऐसा करने में उन्हें कठिनाई हो रही होती, तो सम्भवतः लेखक उनके साथ इतना कठोर नहीं होता। परन्तु ऐसा नहीं था। उसे कलीसिया के इन सदस्यों को फटकारना पड़ा क्योंकि जिन्हें उत्सुकता से सत्य को ग्रहण करना चाहिए था, वे उदासीन हो गए थे। उनका उत्साह कम हो गया था। उन्होंने ध्यान देना बन्द कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि वे समझने में असफल रहे, जिससे परमेश्वर के सत्य के द्वारा उनमें बदलाव आना रुक गया था।

यदि हम सचेत नहीं रहते हैं, तो हमारे साथ भी यही हो सकता है। हम दलिया, डबलरोटी और दूध के आहार के सहारे अपना जीवन नहीं चला सकते। दूध अच्छा होता है। इसे अपने आहार के भाग के रूप में लेना भी ठीक है। परन्तु आहार के रूप में केवल इसी का ही सेवन करना ठीक नहीं है। यह शिशुओं के लिए है और हमें शिशु नहीं बने रहना है। हमें अधिक पौष्टिक भोजन खाना सीखना चाहिए और अपनी रुचि को बढ़ाना चाहिए।

अपना लक्ष्य बनाएँ कि आप “हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते” जाएँ (2 पतरस 3:18), ताकि आप सच्चे मसीही अनुभव के पहलुओं का सामना कर सकें। ऐसे व्यक्ति न बनें जो सुसमाचार के शुभ समाचार को सुनता और अपने मन में कहता है, “ओह, यह तो मैं जानता हूँ। मैं अब ध्यान हटा सकता हूँ।” ऐसे व्यक्ति न बनें जो रविवार की सुबह के प्रवचन को पूरे सप्ताह के लिए पर्याप्त आत्मिक भोजन मानता हो। ऐसे व्यक्ति न बनें जो उथले पानी में छपछपाते हुए चलता हो और कभी भी परमेश्वर के वचन की गहराई में उतरने का प्रयास नहीं करता। ऐसे व्यक्ति बनें जो सुसमाचार से प्रेम करता हो और जो परमेश्वर के अनुग्रह से इसे सुनने से कभी थकता नहीं है; और जो परमेश्वर के वचन से प्रेम करता है, जो इसे पीना और इसे चबाना पसन्द करता है, और बार-बार इसकी सच्चाई से प्रेरित होता है, जब आप इसके महान विषय, अर्थात् हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता की समानता में अधिकाधिक बनते जाते हैं।       

भजन संहिता 119:33-48

28 March : जेव्हां सर्व तुम्हांला सोडून जातात

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28 March : जेव्हां सर्व तुम्हांला सोडून जातात
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माझ्या पहिल्यां जबाबाच्या वेळेस माझ्या बाजूस कोणी नव्हता, सर्वांनी मला सोडले होते; ह्याबद्दल त्यांचा हिशेब घेण्यात न येवो. तरी प्रभू माझ्याजवळ उभा राहिला; माझ्याकडून घोषणा पूर्णपणे व्हावी आणि ती सर्व परराष्ट्रीयांनी ऐकावी म्हणून त्यानें मला शक्ती दिली; आणि त्यानें मला सिंहाच्या जबड्यातूनमुक्त केलें. प्रभू मला सर्व दुष्ट योजनांपासून मुक्त करील, व आपल्यां स्वर्गीय राज्यात घेण्यासाठीं तारील; त्याला युगानुयुग गौरव असो. आमेन. (2 तीमथ्य 4:16-18)

आज सकाळी मी या उदात्त आणि कष्टदायक शब्दांवर रेंगाळत होतो. पौल रोममध्यें तुरुंगात होता. आतापर्यंत आम्हीं जाणतो कीं, त्याला कधीही सोडण्यात आले नाहीं. त्याच्या शेवटच्या पत्राचा अशाप्रकारे अंत होतो.

विचार करा आणि विस्मित व्हा!

त्याला सोडून देण्यात आले आहे : “माझ्या बाजूस कोणी नव्हता.” तो एक वयोवृद्ध माणूस आहे. एकनिष्ठ सेवक. विदेशी नगरात, घरापासून दूर. शत्रूंनी घेरलेला. मृत्यूचा त्याला धोका आहे. का? उत्तर : यासाठीं कीं त्यानें आमच्या निराश झालेल्यां, भयभीत, अथवा एकाकीं जीवासाठीं तो हे बहुमूल्य वाक्य लिहावे, “तरी प्रभू माझ्याजवळ उभा राहिला!

अहाहा, मला ही वचनें किती प्रिय वाटतात! जेव्हां तुमचे जवळचे मित्र तुम्हांला सोडून जातात, तेव्हां तुम्हीं देवाचा धावा करता काय? मग, तुमच्या जीवनातील लोक खरोखर तुमचे देव आहेत का? किंवा तुम्हांस या उदात्त सत्यामध्यें धाडस प्राप्त होते का : “युगाच्या समाप्तीपर्यंत मी सर्व दिवस तुमच्याबरोबर आहे.” (मत्तय 28:20) – मग तुम्हांला कोणीही का सोडेना? तुम्हीं देवाच्या या कठोर शपथेने तुमच्या अंतःकरणास बळ देता का? “मी तुला सोडून जाणार नाहीं व तुला टाकणार नाहीं” (इब्री 13:5)?

मग आपण म्हणू या, “तरी प्रभू माझ्याजवळ उभा राहिला!”

प्रश्न : 2 तीमथ्य 4:18 मध्यें कोणत्या गोष्टीची भिती होती? उत्तर : पौल प्रभूचे स्वर्गीय राज्य प्राप्त करू शकणार नाहीं! पण ही भिती असतांनाहीं पौल ओरडतो, “प्रभू… मला सुरक्षितपणे त्याच्या स्वर्गीय राज्यात आणील.”

प्रश्न : गमावण्याची भिती घालण्यात आलेले स्वर्गीय राज्य पौल कसे प्राप्त करणार होता? उत्तर : “दुष्कृत्ये.” “प्रभू मला प्रत्येक दुष्कृत्यापासून  वाचविल आणि मला सुरक्षितपणे त्याच्या स्वर्गीय राज्यात आणील.”

प्रश्न : एखादे दुष्कृत्य (दुष्ट योजना) पौलाच्या स्वर्गीय राज्य प्राप्त करण्यास कसे भिती घालू शकत होते? उत्तर : त्याला आज्ञाभंगास भाग पाडून ख्रिस्ताप्रत निष्ठा सोडून देण्याच्या मोहांत घालण्याद्वारें.

प्रश्न : हा मोह “सिंहाचा जबडा “ होता का ज्यातून त्याला सोडविण्यात आले होते? उत्तर : होय. “सावध असा, जागे राहा; तुमचा शत्रू सैतान हा गर्जणाऱ्या सिंहासारखा कोणाला गिळावे हे शोधत फिरतो. त्याच्याविरुद्ध विश्वासात दृढ असे उभे राहा” (1 पेत्र 5:8-9).

प्रश्न : मग पौल या सैतानी मोहास बळी न पडता विश्वास आणि आज्ञाधारकतेने शेवटपर्यंत धीर धरून राहिला याचे गौरव कोणाला प्राप्त होते? उत्तर : “त्याला गौरव व पराक्रम युगानुयुग आहे” (1 पेत्र 5:10). “त्याला सदासर्वकाळपर्यंत गौरव असो. आमेन” (2 तीमथ्य 4:18).

प्रश्न : का? खंबीरपणे उभा राहणारा पौल नव्हता का? उत्तर : “प्रभू माझ्या बाजूला उभा राहिला आणि त्यानें मला सामर्थ्य दिले!”

27 मार्च : बलिदान द्वारा बचाए गए

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27 मार्च : बलिदान द्वारा बचाए गए
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“और जिन घरों में तुम रहोगे उन पर वह लहू तुम्हारे लिए चिह्न ठहरेगा; अर्थात् मैं उस लहू को देखकर तुम को छोड़ जाऊँगा, और जब मैं मिस्र देश के लोगों को मारूँगा, तब वह विपत्ति तुम पर न पड़ेगी और तुम नष्ट न होगे।”  निर्गमन 12:13

प्रभु-भोज में क्या होता है? क्यों मसीही लोग रोटी खाते हैं और प्याले में से पीते हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढते हुए, हममें से बहुत से लोग मूसा की ओर देखने के बारे में नहीं सोचते। यदि हम उसकी कहानी के विवरण में बहुत अधिक ध्यान केन्द्रित करने लगेंगे तो हमारे पास केवल सरकंडों, जलती हुई झाड़ी और विपत्तियों का एक सीमित दृष्टिकोण होगा। परन्तु यदि हम अपने आप को थोड़ा पीछे खींच लें, तो हम परमेश्वर की पूरी योजना की महिमा को देखेंगे और उसके भागीदार बनने में सक्षम हो सकेंगे।

अपनी प्रजा इस्राएल के कूच की प्रक्रिया को आरम्भ करने के लिए न्याय करने हेतु देश से होकर जाते हुए, परमेश्वर ने मिस्र पर दस विपत्तियों में से अन्तिम विपत्ति भेजी और प्रत्येक मिस्री का पहिलौठे मार दिया गया। इस्राएल के पहिलौठे भी मारे जाने के खतरे में थे, क्योंकि वे पाप से निर्दोष नहीं थे, और पाप मृत्यु की ओर ले जाता है (रोमियों 6:23)। परन्तु परमेश्वर ने फसह के द्वारा उनके बचाव का एक उपाय प्रदान किया। जब प्रभु ने बलि के मेमने का लहू द्वार की चौखट पर देखा, जिसे जूफा के पौधे से लगाया गया था (निर्गमन 12:22), तो वह उस घराने को लाँघकर आगे बढ़ गया।

पुराने नियम में परमेश्वर द्वारा इस प्रकार लाँघकर जाना उसके उद्धार का महान कार्य था। इसमें और इसके द्वारा परमेश्वर ने अपने लोगों को एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त सिखाया कि परमेश्वर प्रतिस्थापन द्वारा बचाता है।  उसने इन लोगों को इसलिए बचाया क्योंकि उनके स्थान पर पशुओं की बलि दी गई थी। जिस प्रकार मूसा लिखता है कि मिस्र में उस रात “एक भी ऐसा घर न था जिसमें कोई मरा न हो” (निर्गमन 12:30)। एक पुत्र मरा था या एक मेमना मरा था। परमेश्वर के लोग अपने पापों के लिए मृत्यु के पात्र थे, परन्तु क्योंकि उन्होंने दूसरे के बलिदान पर भरोसा किया, जैसा कि परमेश्वर ने आज्ञा दी थी और जिसे परमेश्वर ने प्रदान किया था, वे बचा लिए गए। पुराने नियम के इतिहास में प्रत्येक वर्ष परमेश्वर के लोग इस घटना की ओर देखा करते और उस महान सत्य को याद करते कि परमेश्वर प्रतिस्थापन द्वारा बचाता है।

वे सभी वर्ष और वे सभी पर्व उस क्षण के महत्त्व को रेखांकित करते हैं, जब बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना यीशु को आते देखकर कहता है, “देखो, यह परमेश्‍वर का मेमना है जो जगत का पाप उठा ले जाता है” (यूहन्ना 1:29)। ठीक फसह के मेमने की तरह, यहाँ कोई ऐसा व्यक्ति था जो अपने लोगों को पाप से बचाने और अपने लोगों को स्वतन्त्र करने के लिए परमेश्वर का प्रावधान था।

इस्राएल का कूच मानवजाति के महान कूच का पूर्वाभास है। जब परमेश्वर के न्याय के योग्य पुरुष या स्त्रियाँ क्रूस पर उनके लिए बहाए गए लहू पर भरोसा करते हैं, तो उन्हें पाप से मुक्ति मिल जाती है। हर बन्धन टूट जाता है, ठीक वैसे ही जैसे इस्राएलियों की जंजीरें तब टूट गई थीं जब उन्हें दासत्व से मुक्त कराया गया था।

अगली बार जब आप प्रभु-भोज के बारे में सोच रहे हों, तो मूसा, जलती हुई झाड़ी और विपत्तियों की कहानी पर विचार कीजिएगा। फिर उनके बीच के सम्बन्धों को समझिएगा और याद रखिएगा कि हम प्रभु-भोज इसलिए लेते हैं क्योंकि यीशु हमारा बलिदान है। वह परमेश्वर का मेमना है। वह आपका प्रतिस्थापन है। आपको किसी न्याय से डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उसका आपकी वर्तमान स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं है, वह क्रूस पर चुकाया जा चुका है और उसका समाधान किया जा चुका है। आप प्रतिज्ञा के देश की ओर जा रहे हैं।       यूहन्ना 19:16ब-37

27 March : पुनरुत्थानाचे 10 परिणाम

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27 March : पुनरुत्थानाचे 10 परिणाम
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“आणि ख्रिस्त उठवला गेला नसेल तर तुमचा विश्वास निष्फळ; तुम्हीं अजून आपल्यां पापांतच आहात.” (1 करिंथकरांस 15:17)

येशूच्या पुनरुत्थानाविषयीं येथे दहा आश्चर्यकारक गोष्टी आहेत, ज्यांविषयी आपण ख्रिस्ताचे ऋणी असायला पाहिजे :

1) एक असा तारणकर्ता ज्याला पुन्हा कधीही मरण येणार नाहीं. “आपल्यांला ठाऊक आहे कीं, मेलेल्यांतून उठलेला ख्रिस्त ह्यापुढे मरण पावत नाहीं; त्याच्यावर ह्यापुढे मरणाची सत्ता चालत नाहीं” (रोमकरांस 6:9).

2) पश्चात्ताप. “ज्या येशूला तुम्हीं खांबावर टांगून मारले त्याला आपल्यां पूर्वजांच्या देवानें उठवले. त्यानें इस्राएलाला पश्‍चात्ताप व पापांची क्षमा ही देणगी द्यावी म्हणून देवानें त्याला आपल्यां उजव्या हाताशी अधिपती व तारणारा असे उच्चपद दिले” (प्रेषित 5:30-31).

3) नवा जन्म. “जिवंत आशा प्राप्त होण्यासाठीं आणि अविनाशी, निर्मळ व अक्षय वतन मिळण्यासाठीं, त्यानें आपल्यां महादयेनुसार येशू ख्रिस्ताच्या मृतांतून पुनरुत्थानाच्या द्वारें आपल्यांला पुन्हा जन्म दिला” (1 पेत्र 1:3).

4) पापाची क्षमा. “आणि ख्रिस्त उठवला गेला नसेल तर तुमचा विश्वास निष्फळ; तुम्हीं अजून आपल्यां पापांतच आहात” (1 करिंथ 15:17).

5) पवित्र आत्मा. “त्या येशूला देवानें उठवले ह्याविषयी आम्हीं सर्व साक्षी आहोंत. म्हणून तो देवाच्या उजव्या हाताकडें बसवलेला आहे, त्याला पवित्र आत्म्याविषयीचे वचन पित्यापासून प्राप्त झाले आहे आणि तुम्हीं जे पाहता व ऐकता त्याचा त्यानें वर्षाव केला आहे” (प्रेषित 2:32-33).

6) निवडलेल्यांसाठीं दंडाज्ञा नाहीं. “तर दंडाज्ञा करणारा कोण? जो मेला इतकेच नाहीं, तर मेलेल्यांतून उठला आहे, जो देवाच्या उजवीकडें आहे आणि जो आपल्यांसाठीं मध्यस्थीही करत आहे तो ख्रिस्त येशू आहे” (रोमकरांस 8:34).

7) आम्हांबरोंबर येशूची वैयक्तिक सहभागिता आणि संरक्षण. “पाहा, युगाच्या समाप्तीपर्यंत मी सर्व दिवस तुमच्याबरोबर आहे” (मत्तय 28:20).

8) येणाऱ्या न्यायनिवाड्याचा पुरावा. “ [देवानें] असा एक दिवस नेमला आहे कीं, ज्या दिवशी तो आपण नेमलेल्यां मनुष्याच्या द्वारें जगाचा न्यायनिवाडा नीतिमत्त्वाने करणार आहे; त्यानें त्याला मेलेल्यांतून उठवून ह्याविषयीचे प्रमाण सर्वांस पटवले आहे” (प्रेषित 17:31).

9) देवाच्या भावी क्रोधापासून तारण. “[आम्हीं] त्याचा पुत्र येशू ह्याची स्वर्गातून येण्याची वाट [पाहतो]…………त्या पुत्राला म्हणजे येशूला देवानें मेलेल्यांतून उठवले व तो आपल्यांला भावी क्रोधापासून सोडवणार आहे” (1 थेस्सलनी 1:10; रोमकरांस 5:9).

10) मरणातून आमचे स्वतःचे पुनरुत्थान. “हे आम्हांला ठाऊक आहे कीं, ज्यानें प्रभू येशूला उठवले तो येशूबरोबर आम्हांलाही उठवील व तुमच्याबरोबर सादर करील” (2 करिंथ 4:14; रोमकरांस  6:4; 8:11; 1 करिंथ 6:14; 15:20).

26 मार्च : अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखना

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26 मार्च : अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखना
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“अपने आप को परमेश्‍वर के प्रेम में बनाए रखो; और अनन्त जीवन के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह की दया की बाट जोहते रहो।”  यहूदा 21

यद्यपि परमेश्वर आपको “ठोकर खाने से बचाने” और विश्वास में बने रहने में पूरी तरह सक्षम है (यहूदा 24), फिर भी वह आपको मसीही जीवन में आगे बढ़ने में सक्रिय भूमिका निभाने का, अर्थात् अपने आप को उसके प्रेम में बनाए रखने का बुलावा देता है।

हमारे जीवन में परमेश्वर के प्रेम का पीछा करना एक निरन्तर कार्य होना चाहिए। यही कारण है कि बाइबल में इसके बारे में इतना कुछ कहा गया है! विश्वास के मार्ग में हम निष्क्रिय नहीं रह सकते; हमारा विश्वास अपने आप दृढ़ नहीं होगा। तो फिर कौन सी विशिष्ट क्रियाएँ या दृष्टिकोण आपको परमेश्वर के प्रेम में बने रहने में सहायता करते हैं?

सबसे पहले, पवित्रशास्त्र हमें सिखाता है कि परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को बनाए रखने के लिए हमें सब पापों से निरन्तर घृणा करनी चाहिए (नीतिवचन 8:13; भजन संहिता 97:10; रोमियों 12:9 देखें)। यदि हम पाप के साथ खेलें, उसे बढ़ावा दें, या अपने आप को उसके प्रति आकर्षित होने दें, तो परमेश्वर के प्रति आपका प्रेम अनिवार्य रूप से घटने लगेगा। दूसरा, हम परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को उन विधियों में आनन्दित रहने के द्वारा बढ़ा सकते हैं, जो उसने कलीसिया को दी हैं। उदाहरण के लिए, यीशु ने प्रभु-भोज की स्थापना एक ऐसे माध्यम के रूप में की है जिसके द्वारा वह एक विशेष तरीके से हमसे मिलता है, उसने स्वयं को हमें दिखाया ताकि हम उसके प्रेम को जान सकें और उससे प्रेम भी कर सकें। यदि हम परमेश्वर के द्वारा स्थापित अनुग्रह के साधनों से स्वयं को अलग कर लेते हैं, तो हमारे लिए उसके साथ स्वस्थ सम्बन्ध बनाए रखना असम्भव हो जाता है।

तीसरा, हमें यह याद रखने की आवश्यकता है कि अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखना न केवल एक व्यक्तिगत प्रयास है, बल्कि एक सामूहिक प्रयास भी है। हम मसीह के पास आते तो व्यक्तिगत रूप से हैं, किन्तु हम उसमें अकेले रहकर नहीं जीते। जीवित पत्थरों के समान हम एक आत्मिक घर में बनते जाते हैं, ताकि हम विश्वासी मिलकर पवित्र याजकों का एक समाज बन सकें (1 पतरस 2:5)। परमेश्वर से प्रेम करने वाले अन्य लोगों के साथ गहरी और सच्ची मित्रता बढ़ाना हमें  परमेश्वर से प्रेम करने में सहायता करता है। सम्बन्ध कभी तटस्थ नहीं होते। यदि हम अपने विश्वास में बढ़ना चाहते हैं, तो हमें धर्मी मित्रों की संगति खोजनी चाहिए।

हमारा विश्वास में बढ़ना, क्रिया और जवाबदेही की माँग करता है किन्तु इसके लिए धैर्य की भी आवश्यकता होती है, क्योंकि हम “अनन्त जीवन के लिए हमारे प्रभु यीशु मसीह की दया की बाट जोहते हैं।” जबकि हम उत्सुकता से अपनी देह के छुटकारे और परमेश्वर के उद्देश्यों की पूर्ण पूर्णता की प्रतीक्षा कर रहे हैं (रोमियों 8:23), हमें अपने स्वर्गिक पिता के साथ एक गहरा और दृढ़ सम्बन्ध स्थापित करना है, पाप से फिरना है और दूसरों के साथ उनके वरदानों का आनन्द लेना है, जिनके पास एक नया स्वभाव है और जिनमें पवित्र आत्मा वास करता है।

इसलिए “डरते और काँपते हुए अपने-अपने उद्धार का कार्य पूरा करते जाओ; क्योंकि परमेश्‍वर ही है जो तुम में कार्य करता है” (फिलिप्पियों 2:12-13)। हम उद्धार पाने के लिए काम नहीं करते, बल्कि अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में इस प्रकार कार्य करते हैं कि हम उद्धार पा चुके हैं। आपको कौन से पाप से लड़ना है? आपको गहरी मसीही मित्रता को किस प्रकार बढ़ावा देना है? अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखें।    

  1 यूहन्ना 5:12-21

26 March : देवाच्या वचनात कसे रमावे

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26 March : देवाच्या वचनात कसे रमावे
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तुझी वचनें माझ्या जिभेला किती मधुर लागतात! माझ्या तोंडाला ती मधापेक्षा गोड लागतात. (स्तोत्र 119:103)

ख्रिस्ती विश्वासाला कधीही मागणी आणि संकल्प आणि इच्छाशक्तीच्या विषयांपर्यंत मर्यादित करू नका. आपल्यांला काय आवडते, आपण कोणत्या गोष्टीत रमतो,  आपल्यांला काय रूचकर वाटते हा विषय महत्वाचा आहे.

येशू जगात आला त्यावेळी मानवजात ज्यांना जे जे आवडत असे त्यानुसार विभागलेली होती. “निवाडा हाच आहे कीं, जगात प्रकाश आला आहे आणि मनुष्यांनी प्रकाशापेक्षा अंधाराची आवड धरली; कारण त्यांची कृत्ये दुष्ट होती” (योहान 3:19). नीतिमान आणि दुष्ट ते ज्या गोष्टींत रमतात त्यानुसार विभागलेले आहेत – येशूच्या मुखांत देवाचे प्रकटीकरण, कीं जगाच्या रहाटीप्रमाणे.

म्हणून एखाद्याला प्रश्न पडू शकतो : मी देवाच्या वचनात कसा रमू शकतो? माझे उत्तर दुहेरी आहे :

1) तुमच्या अंतःकरणाच्या जीभेवर नवीन स्वादग्रंथींसाठीं प्रार्थना करा;

2) देवानें त्याच्या लोकांसाठीं जी जी अद्भुत अभिवचनें दिलींत त्यांवर मनन करा.

हाच स्तोत्रकर्ता ज्यानें म्हटलें, “तुझी वचनें माझ्या जिभेला किती मधुर लागतात!” (स्तोत्र 119:103), त्यानें यापूर्वी म्हटलें, “तुझ्या नियमांपासून बहकणाऱ्या सर्वांचा तू धिक्कार करतोस” (स्तोत्र 119:18). त्यानें ही प्रार्थना केलीं, कारण गौरव पाहण्यासाठीं आत्मिक डोळे प्राप्त करणे, किंवा हृदयाच्या जीभेवर पवित्र स्वादग्रंथी असणे, ही देवाची देणगी आहे. स्वाभाविकवृत्तीने कोणीही मनुष्य भूकेला होत नाहीं, आणि देवाची व त्याच्या बुद्धीची आवड धरीत नाहीं.

पण जेव्हां तुम्हीं प्रार्थना करून चुकला, म्हणजे खरोखर तुम्हीं प्रार्थना करीत असतांना, त्याच्या लोकांसाठीं दिलेल्यां देवाच्या अभिवचनांचा लाभांवर आणि आता आणि सदाकाळ सर्वशक्तितान परमेश्वर तुमचा सहायक म्हणून आहे या आनंदाच्या गोष्टीवर मनन करा. स्तोत्र 1:3-4 म्हणते कीं जो पुरुष देवाच्या नियमशास्त्राचे रात्रंदिवस मनन करतो, तो जे झाड पाण्याच्या प्रवाहाजवळ लावलेले असते, जे आपल्यां हंगामात फळ देते, ज्याची पाने कोमेजत नाहींत, अशा झाडासारखा आहे; आणि जे काहीं तो हाती घेतो ते सिद्धीस जाते. दुर्जन तसे नाहींत, ते वार्‍याने उडून जाणार्‍या भुसासारखे आहेत.”

कोणाला असे पुस्तक वाचणे आवडणार नाहीं किंवा त्यांत रमणार नाहीं, ज्याचे वाचन त्याला निरूपयोगी भूसापासून बदलून लबानोनचा विशाल केदार वृक्षाप्रमाणे बनविल, किंवा टेक्ससच्या धूळीची वाटी बदलून हवाईची फलबाग बनविल? आपल्यां अंतःकरणात कोणालाही भूसा असावे असा वाटत नाहीं – मूळ नसलेला, वजन नसलेला, निरूपयोगी. आम्हीं सर्व जण वास्तविकतेच्या खोल पाण्याच्या प्रवाहातून बळ प्राप्त करू इच्छितो आणि फळ देणारे असे उपयोगी लोक बनू इच्छितो.

वास्तविकतेचा तो पाण्याचा प्रवाह देवाचे वचन आहे, आणि सर्वथोर संत त्याद्वारें थोर बनलेले आहेत.

25 मार्च : मसीही तरीके से सोचना

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25 मार्च : मसीही तरीके से सोचना
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“इसलिए हे भाइयो, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, अर्थात् जो भी सद्‌गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन पर ध्यान लगाया करो।”  फिलिप्पियों 4:8

कई मायनों में, हम वही होते हैं जो हम सोचते हैं। हमारे मन हमारे कार्यों के पीछे का कारण होते है, और हमारे मन के माध्यम से ही हमारे भाव जागृत होते हैं। इसलिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम उचित बातों के बारे में सोचें और उचित तरीके से सोचना सीखें। दूसरे शब्दों में, हमें मसीही तरीके से सोचना सीखना चाहिए।

कुछ लोग कहेंगे कि मसीही तरीके से सोचने का अर्थ है एक ऐसा मन होना जो केवल मसीही विषयों पर ही विचार करता है और प्रत्येक दूसरी धारणा के लिए अपने को बन्द कर लेता है। किन्तु यह मसीही सोच के उस वर्णन के अनुरूप नहीं है, जो हमें पवित्रशास्त्र में मिलता है। बाइबल सिखाती है कि हमें वास्तव में प्रत्येक बात  के बारे में सोचना चाहिए, परन्तु हमें बाइबल के दृष्टिकोण से ऐसा करना सीखना चाहिए (2 कुरिन्थियों 10:5)। हमें संगीत, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कला, न्याय, स्वतन्त्रता और प्रेम, अर्थात् मानव अस्तित्व के पूरे विस्तार पर परमेश्वर के वचन की प्रकट सच्चाइयों के चश्मे के माध्यम से विचार करना चाहिए।

प्रेरित पौलुस ने इसे समझा इसलिए उसने हमें उन गुणों की एक सूची दी जिसके साथ हम अपनी सोच का ढांचा तैयार कर सकते हैं। पौलुस ने कहा कि मसीह के अनुयायी होने के कारण हमारे विचारों को सत्य, आदर, न्याय और पवित्रता जैसे गुणों द्वारा निर्देशित और नियन्त्रित होना चाहिए।

वह कहता है कि हमें उन बातों के बारे में सोचना चाहिए जिनमें “कोई भी सद्‌गुण” है। “सद्‌गुण” के लिए वह जिस शब्द का उपयोग करता है वह यूनानी भाषा का शब्द areté है, जो यूनानी भाषा में “सद्‌गुण” के लिए सबसे व्यापक शब्द है। दूसरे शब्दों में, पौलुस हमें वह मानक प्रदान करता है जिसके आधार पर हम नियमित रीति से अपने सोचने के तरीकों को परख सकते हैं। हम परमेश्वर के वचन को देखकर यह पूछ सकते हैं, “जिस बारे में सोचने का चयन कर रहा हूँ और जिस तरह से मैं इसके बारे में सोचने का चयन कर रहा हूँ, क्या वह नैतिक सद्‌गुण के अनुरूप है? क्या वह परमेश्वर की स्वीकृति के अनुसार है?”

यह कितनी बड़ी चुनौती है! इस तरह की सोच शून्यता में या बहुत प्रयास करे बिना नहीं आएगी। यदि हम इसे विकसित करना चाहते हैं, तो हमें दिन-रात परमेश्वर के वचन पर ध्यान देना होगा (यहोशू 1:8)। जब हमारे मन के नए हो जाने से हम अपने चाल–चलन को बदलने का निरन्तर प्रयास करते हैं (रोमियों 12:2), तो हम न केवल परमेश्वर को महिमा देंगे, बल्कि अपनी बातचीत में सुसमाचार को दृढ़तापूर्वक कहने की अपनी क्षमता में भी सुदृढ़ होते जाएँगे।

तो जब आप अपने विचारों के बारे में सोचें, तब इस पद को अपने जीवन में लागू करने के लिए आपको तीन प्रश्न पूछने चाहिएँ:

क्या ऐसी कोई बात है जिसके बारे में मुझे और अधिक सोचना चाहिए?

क्या ऐसी कोई बात है जिसके बारे में मुझे कम सोचना चाहिए, या बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए?

क्या ऐसी कोई बात है जिसके बारे में मुझे अलग तरीके से सोचना चाहिए?       

भजन संहिता 1