“तुम ऊँचा सुनने लगे हो . . . यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए। तुम तो ऐसे हो गए हो कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए। क्योंकि दूध पीने वाले बच्चे को तो धर्म के वचन की पहिचान नहीं होती, क्योंकि वह बालक है। पर अन्न सयानों के लिए है।” इब्रानियों 5:11-14
कल्पना कीजिए कि आप अपने पसन्दीदा रेस्तराँ में जाएँ और देखें कि सभी ग्राहक अपनी मेजों पर बैठे हैं और दूध पीने वाली बड़ी-बड़ी बोतलों से दूध पी रहे हैं। यह कितना विचित्र दृश्य होगा! फिर भी यही वह चित्र है जिसे इब्रानियों के लेखक ने चित्रित किया था जब उसने अपने समय के यहूदी मसीहियों से अधिक से अधिक मसीह के समान बनने के लिए लालायित बने रहने की विनती की थी। वह जानता था कि बहुत से लोग पहले से ही अपने विश्वास में उदासीन हो रहे थे। जिन्हें अब तक गुरु हो जाना चाहिए था, उन्हें अपनी बुनियादी बातों की फिर से समीक्षा करने की आवश्यकता थी।
इन विश्वासियों के लिए बाइबल के सिद्धान्तों को समझने में कठिनाई न तो किसी जटिल विषय-वस्तु के कारण हुई थी और न ही लेखक की स्पष्ट रूप से व्याख्या करने में असमर्थता के कारण। इसके विपरीत, उनके सीखने के प्रयास में कमी थी। जब लेखक लिखता है कि वे “ऊँचा सुनने लगे” थे, तो “ऊँचा” के लिए वह उसी शब्द का उपयोग करता है, जिसका उपयोग वह बाद में उन्हें “आलसी” न होने की चेतावनी देते समय करता है (इब्रानियों 6:12)। वहाँ वह अपने पाठकों के इस प्रकार के आलसी रवैये को सहन करने के विपरीत “उनका अनुकरण करने” के लिए प्रोत्साहित करता है, “जो विश्वास और धीरज के द्वारा प्रतिज्ञाओं के वारिस होते हैं।”
यदि ये आरम्भिक मसीही लोग कर्तव्यनिष्ठ होते जो ध्यान से सुन रहे होते और बाइबल की अवधारणाओं को समझने का पूरा प्रयास कर रहे होते और केवल ऐसा करने में उन्हें कठिनाई हो रही होती, तो सम्भवतः लेखक उनके साथ इतना कठोर नहीं होता। परन्तु ऐसा नहीं था। उसे कलीसिया के इन सदस्यों को फटकारना पड़ा क्योंकि जिन्हें उत्सुकता से सत्य को ग्रहण करना चाहिए था, वे उदासीन हो गए थे। उनका उत्साह कम हो गया था। उन्होंने ध्यान देना बन्द कर दिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि वे समझने में असफल रहे, जिससे परमेश्वर के सत्य के द्वारा उनमें बदलाव आना रुक गया था।
यदि हम सचेत नहीं रहते हैं, तो हमारे साथ भी यही हो सकता है। हम दलिया, डबलरोटी और दूध के आहार के सहारे अपना जीवन नहीं चला सकते। दूध अच्छा होता है। इसे अपने आहार के भाग के रूप में लेना भी ठीक है। परन्तु आहार के रूप में केवल इसी का ही सेवन करना ठीक नहीं है। यह शिशुओं के लिए है और हमें शिशु नहीं बने रहना है। हमें अधिक पौष्टिक भोजन खाना सीखना चाहिए और अपनी रुचि को बढ़ाना चाहिए।
अपना लक्ष्य बनाएँ कि आप “हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते” जाएँ (2 पतरस 3:18), ताकि आप सच्चे मसीही अनुभव के पहलुओं का सामना कर सकें। ऐसे व्यक्ति न बनें जो सुसमाचार के शुभ समाचार को सुनता और अपने मन में कहता है, “ओह, यह तो मैं जानता हूँ। मैं अब ध्यान हटा सकता हूँ।” ऐसे व्यक्ति न बनें जो रविवार की सुबह के प्रवचन को पूरे सप्ताह के लिए पर्याप्त आत्मिक भोजन मानता हो। ऐसे व्यक्ति न बनें जो उथले पानी में छपछपाते हुए चलता हो और कभी भी परमेश्वर के वचन की गहराई में उतरने का प्रयास नहीं करता। ऐसे व्यक्ति बनें जो सुसमाचार से प्रेम करता हो और जो परमेश्वर के अनुग्रह से इसे सुनने से कभी थकता नहीं है; और जो परमेश्वर के वचन से प्रेम करता है, जो इसे पीना और इसे चबाना पसन्द करता है, और बार-बार इसकी सच्चाई से प्रेरित होता है, जब आप इसके महान विषय, अर्थात् हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता की समानता में अधिकाधिक बनते जाते हैं।
भजन संहिता 119:33-48