ArchivesAlethia4India

4 April : देव आम्हास इतरांद्वारे बळ देतो

Alethia4India
Alethia4India
4 April : देव आम्हास इतरांद्वारे बळ देतो
Loading
/

“शिमोना, शिमोना, पाहा, तुम्हांला गव्हासारखे चाळावे म्हणून सैतानाने मागणी केलीं; परंतु तुझा विश्वास ढळू नये म्हणून तुझ्यासाठीं मी विनंती केलीं आहे; आणि तू वळलास म्हणजें तुझ्या भावांना स्थिर कर.” (लूक 22:31-32)

इतर दहा प्रेषितांविषयी काय (यात यहूदाचा समावेश नाहीं)?

सैतान त्यांनाहीं चाळणार होता. येशूनें त्यांच्यासाठीं प्रार्थना केलीं का?

होय, त्यानें प्रार्थना केलीं. परंतु जसे त्यानें पेत्राच्या विश्वासाचे रक्षण केलें तसे इतर शिष्यांच्या विश्वासाचे देखील रक्षण केलें जावें अशी विनंती त्यानें पित्याला केलीं नाहीं.

त्या रात्री सैतानाच्या चाळणीच्या वेदनेद्वारें देवानें पेत्राचा अहंकार आणि स्वतःवर भरवंसा करण्याचा स्वभाव हाणून पाडला. पण त्यानें त्याला असेच सोडले नाहीं. त्यानें त्याला मागे परत फिरवले आणि त्याला क्षमा केलीं आणि त्याला पुनर्स्थापित केलें आणि त्याचा विश्वास बळकट केला. आणि आता इतर दहा शिष्यांना बळकट करण्याचे कार्य पेत्राचे होते. “आणि तू वळलास म्हणजें तुझ्या भावांना स्थिर कर.”

येशूनें पेत्राची तरतूद करून दहा जणांची तरतूद केलीं. जो बळकट होतो तो बळकट करणारा बनतो.

आमच्यांसाठीं येथे एक मोठा धडा आहे. कधी कधी देव तुमच्याशी प्रत्यक्ष व्यवहार करेल, इतर सर्वजण गाढ निद्रेत असतांना पहाटेच्या पहिल्या प्रहरी तोच तुमचा विश्वास बळकट करेल. परंतु बहुतेकदा (आपण दहा-अकराव्या वेळेस म्हणू शकतो) देव दुसऱ्या व्यक्तीद्वारे आपला विश्वास बळकट करतो.

देव आपल्याजवळ काहीं शिमोन पेत्रांना पाठवतो जो आम्हांला विश्वासात टिकून राहण्यासाठीं आवश्यक असलेला कृपेचा शब्द घेऊन येतो : कसे याबद्दल काहीं साक्ष ”रात्री विलापाने बिर्‍हाड केलें, तरी प्रातःकाळी हर्षध्वनी होतो“ (स्तोत्र 30:5).

सार्वकालिक सुरक्षा हा एक समुदायिक प्रकल्प आहे. जेव्हां जेव्हां देव तुमच्या अंतःकरणाला या अभिवचनाने उत्तेजन देतो कीं सैतानाच्या चाळणीत तुमचा विश्वास अपयशी होणार नाहीं, तेव्हां तेव्हां ते उत्तेजन घ्या आणि ख्रीस्तातील तुमच्या बंधु-भगिनींना बळकट करण्यासाठीं त्याचा उपयोग करून तुमचा आनंद द्विगुणित करा – ज्या सामर्थ्याने तुम्हांला बळ प्राप्त झालें आहे त्याच सामर्थ्यानिशी.

3 अप्रैल : यीशु हमारे बीच में खड़ा है

Alethia4India
Alethia4India
3 अप्रैल : यीशु हमारे बीच में खड़ा है
Loading
/

“उसी दिन जो सप्ताह का पहला दिन था, सन्ध्या के समय जब वहाँ के द्वार जहाँ चेले थे, यहूदियों के डर के मारे बन्द थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़ा होकर उनसे कहा, ‘तुम्हें शान्ति मिले।” यूहन्ना 20:19

जब यीशु अपने पुनरुत्थान के बाद पहली बार अपने चेलों के सामने प्रकट हुआ, तब वे बन्द दरवाजों के पीछे छिपे हुए थे, डरते हुए कि उनके अगुवा को क्रूस पर चढ़ाने वाले अधिकारी अब उनके साथ क्या करेंगे। लेकिन बन्द दरवाजे यीशु को रोक नहीं सके! कुछ भी उसे उस घर में प्रवेश करने और उनके जीवन में दोबारा प्रवेश करने से नहीं रोक सका। उसने खुद को उनका उद्धारकर्ता और जीवित आशा के रूप में प्रमाणित किया। उसे देखा जा सकता था, सुना जा सकता था, छूआ जा सकता था, और जाना जा सकता था। आज भी, वह हमारे जीवन में इसी प्रकार प्रवेश करता है। चाहे हम जहाँ भी हों या हमने जो भी किया हो, मसीह हमारे जीवन में—हमारे दुख, हमारे अन्धकार, हमारे डर, हमारी शंकाओं—में प्रवेश कर सकता है और खुद को प्रकट कर सकता है, यह ऐलान करते हुए, “तुम्हें शान्ति मिले।”

शायद आप “सन्देह करने वाले थोमा” हैं, जो विश्वास के मामलों पर जल्दबाजी में सवाल उठाता है। एक हद तक, सवाल करना अच्छा और स्वस्थ है। थोमा ने यीशु से स्पष्ट रूप से कहा, मैं तब तक विश्वास नहीं करूँगा जब तक मैं आपके घावों को अपने हाथ से छू न लूँ।” यीशु ने थोमा को उत्तर दिया, “यदि तुम्हें विश्वास करने के लिए यही चाहिए, तो लो, मैं तुम्हारे सामने हूँ” (यूहन्ना 20:24-29)। यीशु हमारे सन्देहों में हमसे मिल सकता है। या शायद आप “इनकार करने वाले पतरस” हैं, जो मसीह में अपनी पहचान को जल्दी से अस्वीकार कर देता है और अपनी गलतियों के लिए खुद को दोषी महसूस करता है। यीशु ने उस पतरस को कलीसिया की नींव बना दिया, जिसने यीशु को कई बार चुनौती दी थी लेकिन एक दासी की पूछताछ के आगे टूट गया था (मत्ती 16:18)। यीशु हमारी कमियों के बावजूद हमें स्वीकार करता है और एक परिवर्तन लाने के लिए हमारे जीवन का उपयोग करता है। या शायद आप “अपमानित मरियम मगदलीनी” हैं, जिसका अतीत उसे सताता है और स्वयं को यीशु के प्रेम और स्वीकृति के योग्य नहीं मानता। लेकिन परमेश्वर ने यीशु के पुनरुत्थान के बाद की पहली दर्ज घटना को किसी धर्म-शिक्षक के साथ नहीं, बल्कि एक ऐसी स्त्री के साथ होने की योजना बनाई, जिसका अतीत पाप से भरा हुआ था और यहाँ तक कि जिसने दुष्टात्माओं के कष्ट सहे थे। यह कोई संयोग नहीं था कि पुनरुत्थित मसीह का पहला आलिंगन, जैसा कि यह था, ऐसे एक व्यक्ति के साथ हुआ। यीशु हमें भी यही मुक्ति का आलिंगन प्रदान करता है।

यीशु बन्द दरवाजों को पार कर सकता है; वह कठोर दिलों को बेध सकता है। अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के माध्यम से उसने उस खाई को पाट दिया है, जो पाप के कारण विद्रोही मनुष्यजाति और धर्मी परमेश्वर के बीच उत्पन्न हुई थी। अवश्य है कि हम उस उद्धार को स्वीकार करें, जो वह स्वतन्त्र रूप से हमें प्रदान करता है। यह हर दिन हमारे मन में ताजा रहना चाहिए।

क्या आपने ऐसा किया है? क्या आपने यीशु को बिना शर्त और पूरी तरह स्वीकार किया है? क्या आप प्रतिदिन उसका आलिंगन करते हैं? क्या आप हर सुबह उसके सुसमाचार को अपने दिल में दोहराते हैं? इस प्रकार विश्वास करना यह दर्शाता है कि हम सेवा में अपने आप को परमेश्वर की अधीनता में सौंपते हैं। हम अपने उद्धारकर्ता के रूप में उसके प्रभुत्व के अधीन हो जाते हैं। हम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को अपने दिल से स्वीकार करते हैं और उस उद्धार को ग्रहण करते हैं, जो वह स्वतन्त्र रूप से प्रदान करता है। इस विश्वास के साथ, आप देखेंगे कि वह आपके साथ खड़ा है, आपको शाश्वत और अन्तरंग शान्ति प्रदान करता है, जो आपके दुख, आपके अन्धकार, आपके डर, और आपकी शंकाओं को पराजित और रूपान्तरित करती है। पुनरुत्थित मसीह को यह कहते हुए सुनें, “तुम्हें शान्ति मिले।”

यूहन्ना 20:24-29

3 April : तुम्हीं अडखळता तेव्हां प्रतिसाद कसा द्यावा

Alethia4India
Alethia4India
3 April : तुम्हीं अडखळता तेव्हां प्रतिसाद कसा द्यावा
Loading
/

कारण जे चांगले करावेसे मला वाटते ते मी करत नाहीं; तर करावेसे वाटत नाहीं असे जे वाईट ते मी करतो. (रोम 7:19)

ख्रिस्ती केवळ पराभवाचे जीवन जगत नाहींत. पण आपण फक्त पापावर पूर्ण विजय मिळवण्यासाठींहि जगत नाहीं. आणि अशा काळात जेव्हां आपण पापावर विजय मिळवण्यात अपयशी ठरतो, तेव्हां रोम 7:13-25 आम्हांला निरोगी खिस्ती व्यक्तीने कसा प्रतिसाद दिला पाहिजे याची सामान्य पद्धत दाखवते.

आपण असे म्हणावें :

1. मी देवाच्या नियमशास्त्रावर प्रीति करतो (वचन 22)

2. मी इतक्यात जे केलें त्याचा मला वीट आहे (वचन 15)

3. किती मी कष्टी माणूस! मला ह्या मरणाधीन असलेल्या देहापासून कोण सोडवील? (वचन 24)

4. देवाचे आभार! आपला प्रभू येशू ख्रिस्त ह्याच्या द्वारे विजय येईल. (वचन 25)

दुसऱ्या शब्दांत, कोणताही ख्रिस्ती व्यक्ती पराभवाचं जीवन जगू इच्छित नाहीं. कोणताही ख्रिस्ती व्यक्ती पराभवाचं जीवन जगण्यात समाधान पावत नाहीं. परंतु जर आपण काहीं काळासाठीं पराभूत झालो, तर आपण त्याबाबत खोटे बोलता कामा नये.

ढोंग नाहीं. दिखावा नाहीं. अहंकारपूर्ण परिपूर्णतावाद नाहीं. कोणतीही धार्मिकतेचा बडेजाव करणारे, वरकरणी स्मितहास्य किंवा स्वस्त तकलादूपणा नको.

आणि त्याहीपेक्षा अधिक म्हणजें, देव आम्हांला आमच्यां स्वतःच्या अपयशाकडें कानाडोळा करण्यापासून आणि परिणामी इतरांवर त्वरित दोष लावण्यापासून वाचवतो.

हे परमेश्वरा, आम्हांला इतरांच्या अपयशापेक्षा आमच्यां स्वतःच्या उणीवांवर शोक करण्यासाठीं मदत कर. हे परमेश्वरा, आम्हांला या वचनातील प्रेषित पौलाची प्रामाणिकता आणि प्रांजळपणा आणि विनयशीलता दे!”किती मी कष्टी माणूस! मला ह्या मरणाधीन असलेल्या देहापासून कोण सोडवील? आपला प्रभू येशू ख्रिस्त ह्याच्या द्वारे मी देवाचे आभार मानतो. तर मग मी स्वतः मनाने देवाच्या नियमाचे दास्य करतो, पण देहाने पापाच्या नियमाचे दास्य करतो.“ (रोम 7:24-25).

2 अप्रैल : रहने के लिए एक नई जगह

Alethia4India
Alethia4India
2 अप्रैल : रहने के लिए एक नई जगह
Loading
/

“जो मेरे साथ बातें कर रहा था उसके पास नगर और उसके फाटकों और उसकी शहरपनाह को नापने के लिये एक सोने का गज़ था। वह नगर वर्गाकार बसा हुआ था और उसकी लम्बाई, चौड़ाई के बराबर थी; और उसने उस गज़ से नगर को नापा, तो साढ़े सात सौ कोस का निकला : उसकी लम्बाई और चौड़ाई और ऊँचाई बराबर थी।” प्रकाशितवाक्य 21:15-16

अतीत में परमेश्वर ने इस्राएल के लोगों के बीच यरूशलेम के मन्दिर में निवास किया। लेकिन वह मन्दिर नष्ट कर दिया गया। जब बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर के हाथों उस मन्दिर को नष्ट किया गया, तब परमेश्वर ने यह प्रतिज्ञा की कि वह एक नया मन्दिर बनाएगा (यहेजकेल 40-43)। यद्यपि यरूशलेम में एक दूसरा मन्दिर बनाया गया, लेकिन वह पहले की छाया मात्र था और स्पष्ट रूप से उस प्रतिज्ञा की पूर्ति नहीं था (हाग्गै 2:2-3)। यह प्रतिज्ञा अन्ततः यीशु के जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के माध्यम से पूरी हुई (यूहन्ना 2:19-22)।

मन्दिर में परमेश्वर की उपस्थिति मुख्यतः परम पवित्र स्थान में केन्द्रित थी, जो एक पूर्ण घन के रूप में निर्मित एक आन्तरिक पवित्र स्थान था। केवल एक व्यक्ति, अर्थात महायाजक साल में केवल एक बार वहाँ प्रवेश कर सकता था। सदियों बाद, जब वह पहला मन्दिर केवल स्मृति बनकर रह गया था, प्रेरित यूहन्ना ने परमेश्वर के अनन्त राज्य के नए नगर का दर्शन प्राप्त किया। इसे एक पूर्ण घन के रूप में चित्रित किया गया था, लेकिन अब यह घन मध्य-पूर्व के किसी एक भवन में सीमित नहीं था, बल्कि यूहन्ना के समय के ज्ञात संसार जितना विशाल था।

नई सृष्टि में परमेश्वर की उपस्थिति किसी विशेष स्थान तक सीमित नहीं होगी। वहाँ कोई विशेष भवन नहीं होगा, जहाँ परमेश्वर का दर्शन करने के लिए हमें जाना पड़ेगा, क्योंकि परमेश्वर और हमारे बीच कोई दूरी नहीं होगी। यूहन्ना लिखता है कि उसने “उसमें कोई मन्दिर न देखा” (प्रकाशितवाक्य 21:22), क्योंकि उस दिन परमेश्वर पूरी तरह और अद्‌भुत रूप से वहाँ होगा, एक ऐसे रूप में जिसे हम अभी तक समझ नहीं सकते। हर स्थान “मन्दिर का प्रांगण” ही होगा। यह एक क्रान्तिकारी तस्वीर है, जो पूरी तरह से नए अनुभव को दर्शाती है, अर्थात परिस्थितियों का ऐसा परिवर्तन जो इतना व्यापक, समृद्ध, और विशाल है कि जैसा कि प्रेरित पौलुस कहता है कि हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते “जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखने वालों के लिए तैयार किया है” (1 कुरिन्थियों 2:9)।

यदि हम मसीह के साथ एक हैं, तो पवित्र आत्मा के माध्यम से परमेश्वर की उपस्थिति हमारे साथ है। फिर भी, परमेश्वर के बारे में हमारी जानकारी और उसके साथ हमारी निकटता अभी भी सीमित है। हमारी वर्तमान स्थिति वह नहीं है, जिसकी हमें पूरी तरह से लालसा है, और न ही वह है जो परमेश्वर हमारे लिए चाहता है। वह समय अभी आना बाकी है—लेकिन वह अवश्य आएगा।

क्या आप परमेश्वर के साथ इस अकल्पनीय निकटता की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं? यदि आप ईमानदारी से परमेश्वर के साथ इस स्थाई निवास स्थान की आशा कर रहे हैं, तो यह आपके जीवन की पवित्रता और इस चिन्ता में स्पष्ट होगा कि आपके मित्र, रिश्तेदार, और पड़ोसी मसीह को जानें। यह जानते हुए कि हमारे पास यह महान आशा है, हम शुद्ध होंगे, जैसे मसीह शुद्ध है (1 यूहन्ना 3:3)—और हम दूसरों को अपने जीवन और अपने शब्दों के माध्यम से यीशु के बारे में बताने से रुक नहीं पाएँगे।

प्रकाशितवाक्य  21:9-27

2 April : एव्हरेस्ट पर्वतापेक्षा उत्तम

Alethia4India
Alethia4India
2 April : एव्हरेस्ट पर्वतापेक्षा उत्तम
Loading
/

परंतु आपल्याला ठाऊक आहे कीं, देवावर प्रीति करणाऱ्यांना म्हणजें त्याच्या संकल्पाप्रमाणे बोलावलेल्यांना देवाच्या करणीने सर्व गोष्टी मिळून कल्याणकारक होतात. (रोम 8:28)

जर तुम्हीं या भव्य अभिवचनात राहत असाल, तर तुमचे जीवन एव्हरेस्ट पर्वतापेक्षा अधिक मजबूत व स्थिर आहे.

जेव्हां तुम्हीं रोम 8:28 च्या तटबंदीच्या आत असता तेव्हां कोणतीहि गोष्ट तुम्हांला पराभूत करू शकत नाहीं. रोम 8:28 च्या बाहेर, सर्वकाहीं गोंधळ आणि चिंतांतुरता आणि भीती आणि अनिश्चितता आहे. देवाच्या सर्वसमावेशक भावी कृपेच्या या वचनाच्या बाहेर, ड्रग्ज आणि अश्लीलता आणि डझनभर व्यर्थ करमणूकीं आहेत. या जगांत ठिसूळ गुंतवणूक धोरणांच्या आणि क्षणभंगुर विमा संरक्षणाच्या आणि क्षुल्लक सेवानिवृत्ती योजनांच्या पातळ भिंती आणि टिनाची छप्परे आहेत. डेडबोल्ट कुलुप आणि अलार्म प्रणाली आणि अँटीबॅलिस्टिक क्षेपणास्त्राच्या निव्वळ पुठ्याने बनलेल्या तटबंदी आहेत. रोम 8:28 ची जागा घेणारे एक हजार उलट उपाय आहेत.

एकदा का तुम्हीं प्रीतिच्या दारातून प्रवेश करून रोम 8:28  च्या अफाट, अढळ इमारतीत गेलात कीं सर्वकाहीं बदलून जाते. तुमच्या जीवनात स्थैर्य आणि खोली आणि स्वातंत्र्य येते. तुम्हीं यापुढे पराभूत केलें जाऊ शकणार नाहीं. सार्वभौम परमेश्वर देव तुम्हीं कधी अनुभवाल अशा तुमच्या सर्व दुःखांवर आणि सर्व सुखांवर तुमच्या भल्याकरिता शासन करतो हा विश्वास हा तुमच्या जीवनातील एक अतुलनीय आश्रय आणि सुरक्षितता आणि आशा आणि बळ आहे.

जेव्हां देवाचे लोक रोम 8:28  च्या – गोवर ते शवागारापर्यंत – भावी कृपेच्या प्रकाशझोतांत जगतात तेव्हां ते जगातील सर्वाधिक स्वतंत्र आणि बलवान आणि सर्वात उदार लोक ठरतात.

त्यांचा प्रकाश चमकतो आणि लोक त्यांच्या स्वर्गातील पित्याचे गौरव करतांत (मत्तय 5:16).

1 अप्रैल : उत्साही अपेक्षा

Alethia4India
Alethia4India
1 अप्रैल : उत्साही अपेक्षा
Loading
/

“केवल वही नहीं पर हम भी जिनके पास आत्मा का पहला फल है, आप ही अपने में कराहते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं।” रोमियों 8:23

मसीही अनुभव अद्‌भुत और चुनौतीपूर्ण दोनों है।

हमें क्षमा प्राप्त हुई है। हम परमेश्वर के परिवार में स्वीकार किए गए हैं। हम ऐसी संगति का आनन्द लेते हैं, जो स्वाभाविक सम्बन्धों से भी अधिक गहरी है। हमारे पास स्वर्ग की एक सुनिश्चित आशा है, जो एक उत्सुक प्रतीक्षा को उत्पन्न करती है। हमारे भीतर परमेश्वर का आत्मा, स्वयं परमेश्वर, वास करता है। फिर भी, हम इस पतित संसार के जीवन की वास्तविकताओं से अलग नहीं हैं। हम निराशा को जानते हैं, हम दिल टूटने को जानते हैं, हम असफलता को जानते हैं, और हम कराहने को जानते हैं।

अब जब हम पृथ्वी पर हैं, हमें स्वर्ग की हल्की सी झलक तो मिलती है, लेकिन हम अभी वहाँ नहीं पहुँचे हैं। मसीहत हमें क्षय या पाप से अछूता नहीं बनाती। हम बीमार पड़ते हैं, और हमारे शरीर दुर्बल हो जाते हैं।

पाप के साथ हमारा संघर्ष जारी रहता है और हम अपने विश्वास के खिलाफ विरोध का सामना करते रहते हैं। वास्तव में, जैसा कि 17वीं शताब्दी के वेस्टमिंस्टर के धर्मशास्त्रियों ने कहा था, मसीही लोग “पाप के खिलाफ एक सतत और असमझौते से भरे युद्ध” में लगे हुए हैं।[1]

हम अपने पाप से संघर्ष को लेकर कई तरह की आध्यात्मिक और धर्मशास्त्रीय उलझनों में खुद को बांध सकते हैं। हम सोच सकते हैं, “मैं अभी भी अवज्ञा क्यों करता हूँ?” ऐसे क्षणों में, आपको और मुझे उद्धार के “तीन कालों” को याद रखने की आवश्यकता है, जो मसीही लोगों के जीवन में परमेश्वर के कार्य का सार प्रस्तुत करते हैं।

यदि हम मसीह में छिपे हुए हैं, तो हमें पाप की सजा से बचा लिया गया है। न्याय के दिन का हमें कोई भय नहीं होना चाहिए, क्योंकि यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा हमारे पापों को उठा लिया और हमारी जगह सज़ा का सामना किया। वर्तमान काल में, हमें पाप की शक्ति से बचाया जा रहा है। यह एक सतत दिव्य कार्य है; इस धरती पर कोई भी व्यक्ति पूर्णतः पापरहित नहीं होगा, लेकिन परमेश्वर हमारे भीतर कार्य कर रहा है, हमें गलत को न कहने और सही को हाँ कहने में सक्षम बना रहा है। और अन्त में, वह दिन आएगा, जब मसीह लौटेगा, और हम पाप की उपस्थिति से मुक्त हो जाएँगे।

समय-समय पर हमें स्वर्ग की एक झलक मिलती रहती है, जो आने वाले समय के लिए हमारी आकांक्षा को बढ़ाती रहती है। यही कारण है कि पौलुस कहता है कि हम “अपने शरीर के उद्धार की प्रतीक्षा में भीतर ही भीतर कराहते हैं।” हमें मसीह की वापसी के लिए उत्साही प्रत्याशा के साथ देखना चाहिए!

मसीही लोगों के रूप में, हम स्वर्ग के नागरिकों के रूप में संसार में जाते हैं, और फिलहाल परदेशी और अजनबी के रूप में जी रहे हैं। लेकिन हमें हमेशा अपने घर से दूर नहीं रहना पड़ेगा। एक दिन यीशु लौटेगा—और जब वह लौटेगा, तो वह हमें अपने पुनरुत्थित शरीर में अपने सिद्ध राज्य में शामिल होने के लिए ले जाएगा। आज, ऐसे मत जियो मानो यही सब कुछ है। आगे की ओर देखो, क्योंकि तुम्हारे सर्वश्रेष्ठ दिन अभी आने वाले हैं। तुम अभी वहाँ नहीं पहुँचे हो—लेकिन निश्चित रूप से एक दिन तुम वहाँ पहुँच जाओगे।

प्रकाशितवाक्य 22

1 April : आमच्यां सखोल गरजांपैकीं दोन

Alethia4India
Alethia4India
1 April : आमच्यां सखोल गरजांपैकीं दोन
Loading
/

देव आपला पिता व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या ठायीं असलेल्या थेस्सलनीकाकरांच्या मंडळीला पौल, सिल्वान व तीमथ्य ह्यांच्याकडून : (2 थिस्सल 1:1)

मंडळी या नात्यानें आपण पित्याच्या “ठायीं” आणि प्रभूच्या “ठायीं” आहोत. याचा अर्थ काय? “पिता” हा शब्द मूलतः निगा आणि सांभाळ आणि संरक्षण आणि प्रयोजन आणि शिस्त सूचवितो. म्हणून, पित्याच्या “ठायीं” असण्याचा अर्थ मुख्यतः आमचा स्वर्गीय पिता म्हणून देवाच्या संरक्षणात आणि निगेत असणे असा होईल.

दुसरी पदवी आहे प्रभू : आम्हीं प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या ठायीं आहोत. “प्रभू” हा शब्द मुख्यत्वे करून अधिकार आणि नेतृत्व आणि स्वामित्व सूचित करतो. म्हणून, प्रभूच्या “ठायीं” असण्याचा अर्थ मुख्यत्वे करून जबाबदार असणे, अधिकाराधीन असणे, आणि आमचा परम श्रेष्ठ प्रभू म्हणून येशूच्या मालकींचे असणे असा आहे.

म्हणून, पौल थेस्सलोनिया येथील मंडळीस अशाप्रकारे अभिवादन करतो कीं त्यांस आठवण करून दिली जावी कीं ते एक कुटुंब (पित्याच्या निगेत) आहेत, आणि ते सेवक (प्रभूच्या आज्ञेत) आहेत. पिता आणि प्रभू म्हणून देवाची ही दोन वर्णने आणि अशाप्रकारे कुटुंब आणि सेवक म्हणून मंडळीचे असणे, आमच्यां दोन सखोल गरजानुरूप आहेत.

एकींकडें, आमच्यांपैकीं प्रत्येकाला सुटकेची आणि मदतीची गरज आहे, आणि दुसरीकडें जगण्याचा हेतू आणि जीवनाला अर्थाची गरज आहे.

  1. आमच्यांवर दया करण्यासाठीं आणि पाप आणि दुःखापासून आम्हास मुक्त करण्यासाठीं आपल्याला स्वर्गीय पित्याची गरज आहे. आपल्याला प्रत्येक पावलावर त्याच्या मदतीची गरज आहे, कारण आपण अतिशय दुर्बळ आणि संवेदनशील आहोत.
  • आम्हास जीवनात मार्गदर्शन करण्यासाठीं आणि काय बुद्धिनुरूप आहे हे सांगण्यासाठीं आणि आपल्याला एक थोर आणि अर्थपूर्ण जबाबदारी, आणि अस्तित्वाचे कारण, देवानें आम्हास जसे घडविले आहे त्यासाठीं काहीं उपयुक्तता देण्यासाठीं स्वर्गाच्या प्रभूची देखील गरज आहे. आम्हीं फक्त पित्याच्या काळजीत सुरक्षित राहू इच्छित नाहीं – अर्थातच, ते मूल्यवान आणि आवश्यक आहे. पण आम्हास जगण्यासाठीं एक गौरवी निमित्त देखील हवे आहे.

एक दयाळू पिता आमचा रक्षक असावा अशी आमची इच्छा आहे, आणि सर्वशक्तिमान प्रभूने एखाद्या मोठ्या उद्देशासाठीं आमचा विजेता आणि आमचा सेनापति आणि आमचा पुढारी असावे अशी आमची इच्छा आहे. म्हणून पौल पहिल्या वचनात म्हणतो कीं तुम्हीं “पिता व प्रभू येशू ख्रिस्त यांच्या ठायीं” मंडळी आहात, म्हणून आपण त्याजपासून विसावा आणि मदत प्राप्त करू शकतो – देव आमचा पिता आहे! आणि आम्हीं दुसर्यापासून धैर्य आणि अर्थ प्राप्त करू शकतो – येशू आमचा प्रभू आहे!

31 मार्च : सहायता के लिए पुकारना

Alethia4India
Alethia4India
31 मार्च : सहायता के लिए पुकारना
Loading
/

“जब-जब इस्राएली बीज बोते तब-तब मिद्यानी और अमालेकी और पूर्वी लोग उनके विरुद्ध चढ़ाई करते . . . मिद्यानियों के कारण इस्राएली बड़ी दुर्दशा में पड़ गए; तब इस्राएलियों ने यहोवा की दोहाई दी।”  न्यायियों 6:3, 6

जब हम असहाय होते हैं, तो हम सच्चा विश्वास सीखने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होते हैं। न्यायियों 6 के आरम्भ में इस्राएल के लोगों ने एक बार फिर “यहोवा की दृष्टि में बुरा किया” (न्यायियों 6:1)। उन्होंने एक बार फिर विद्रोह और पश्चाताप के बार-बार दोहराए जाने वाले चक्र में अपने आप को फँसा लिया था, जो सीखने में धीमे थे और सीखी हुई बातों को जल्दी भूल जाते थे कि उनकी कठिन परिस्थितियाँ प्रायः उनकी अवज्ञा के कारण होती थीं। अन्ततः, इस्राएलियों को यह समझने में संघर्ष करना पड़ा कि परमेश्वर उन्हें ऐसी स्थिति में आने देगा जहाँ उनकी एकमात्र प्रतिक्रिया दोहाई देना रह जाएगी, कि वह उन्हें अपने साथ, अपनी महिमा और उनकी भलाई के लिए सहभागिता में ला सके। वह उन लोगों के जीवन में अपने उद्देश्यों को पूरा करते हुए, जो अपने को असहाय जानते हैं, आज भी हमारे लिए ऐसा ही करता है। ये वे लोग हैं जो जानते हैं कि वे “मन के दीन हैं” हैं, न कि वे जो सोचते हैं कि वे अपने आप में पर्याप्त हैं, जिनके लिए यीशु ने राज्य की प्रतिज्ञा की है (मत्ती 5:3)।

हममें से कुछ लोग इस गलत धारणा को अपनाए बैठे हैं कि यदि हम केवल यीशु के पीछे चलते रहें तो सब कुछ सदैव ठीक होता जाएगा। अन्दर ही अन्दर हम यह सोचते रहते हैं कि परमेश्वर सदैव और तुरन्त कठिनाई को दूर करने के लिए हस्तक्षेप करेगा। जब परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर उस तरह या उस समय पर नहीं देता जैसे हम चाहते हैं, तो हम यह सोचने लगते हैं कि क्या हम अब भी भरोसा कर सकते हैं कि वह सब कुछ जानता है। हो सकता है कि आप आज ऐसी ही स्थिति में हैं।

सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में बार-बार परमेश्वर हमारी सहायता करने की प्रतिज्ञा करता है जब हम माँगते हैं: “न तो दिन को धूप से, और न रात को चाँदनी से तेरी कुछ हानि होगी। यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा। यहोवा तेरे आने जाने में तेरी रक्षा अब से लेकर सदा तक करता रहेगा” (भजन संहिता 121:6-8)। ये परमेश्वर के वचन के आश्वासन हैं। फिर भी जिस तरह से वह ऐसी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है, वह प्रायः पथरीले स्थानों में, अन्धेरी घाटियों के मध्य और असुविधाजनक प्रतीक्षा के कक्षों में होता है।

जब परमेश्वर ने न्यायियों की पुस्तक में अपने लोगों के लिए मध्यस्थी की, तो उसने उन्हें उनके पापों के विषय में समझाते हुए उन्हें अपने वचन की ओर फेरा। भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के वचनों को बोलते हुए इस्राएलियों को वह याद दिलाया, जो उन्हें जानने की आवश्यकता थी, “मैं तुम को मिस्र में से ले आया, और दासत्व के घर से निकाल ले आया . . . मैंने तुमसे कहा, ‘मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ . . .’ परन्तु तुमने मेरा कहना नहीं माना” (न्यायियों 6:8, 10)। परन्तु फिर कहानी में मोड़ आता है, जब हम परमेश्वर के न्याय की आशा करते हैं, तो हम पढ़ते हैं, “यहोवा के दूत ने दर्शन देकर” दया के इन शब्दों को कहा कि “यहोवा तेरे संग है” (न्यायियों 6:12)।

दिन-प्रतिदिन अपनी दया को प्रदर्शित करने के विपरीत यदि परमेश्वर हमें उस न्याय को हम पर आने देता जिसके हम योग्य हैं तो हम कहाँ होते? उसने इस्राएल के लोगों को वह नहीं दिया जिसके वे योग्य थे, न ही उसने आपके और मेरे साथ ऐसा किया है। परमेश्वर की दया और अनुग्रह का कोई अन्त नहीं है। परन्तु अपनी भलाई में वह प्रायः हमारे जीवन में कठिन परिस्थितियों का उपयोग करके हमें यह सिखाता है कि वह ही वह सब है जिसकी हमें आवश्यकता है। किसी भली वस्तु को हटाए जाने से पीड़ा होती है, परन्तु यह हमें परमेश्वर की दोहाई देने और उसमें अपना बल, शान्ति और आशा खोजने के लिए भी प्रेरित कर सकती है। सहायता के लिए उसे पुकारें, इस आशा के साथ कि जो परमेश्वर आपकी सुनता है वह वास्तव में जानता है कि सर्वोत्तम क्या है। प्रभु आपके साथ है!       

रोमियों 5:1-11

31 March : प्रेमाचे हात बांधणारे काय आहे?

Alethia4India
Alethia4India
31 March : प्रेमाचे हात बांधणारे काय आहे?
Loading
/

ख्रिस्त येशूमधील तुमचा विश्वास व तुमची सर्व पवित्र जनांवरील प्रीति, ह्यांविषयी ऐकून, आम्हीं तुमच्यासाठीं जेव्हां प्रार्थना करतो तेव्हां स्वर्गात तुमच्यासाठीं राखून ठेवलेल्यां आशेमुळे आम्हीं सर्वदा आपल्यां प्रभू येशू ख्रिस्ताचा पिता देव ह्याची उपकारस्तुती करतो. ह्या आशेविषयी तुम्हीं सुवार्तेच्या सत्य वचनात पूर्वी ऐकलें. (कलस्सै 1:3-5)

आज मंडळीची समस्या ही नाहीं कीं स्वर्गावर आवेशाने प्रेम करणारे अनेक लोक आहेत. समस्या ही नाहीं कीं विश्वासाचा दावा करणारे ख्रिस्ती लोक जगापासून माघार घेत आहेत, म्हणजे त्यांचे अर्धे दिवस पवित्र शास्त्र वाचनात घालवीत आहेत आणि दुसरा अर्धा भाग जगाच्या गरजांची उपेक्षा करीत देवामधील त्यांच्या सुखांबद्दल गीत गाण्यात घालवतात. असे होत नाहींये! देवाचे लोक देवावर इतकीं प्रीति करत नाहींत कीं ते त्यांचे अर्धे दिवस त्याच्या वचनांत घालवितील.

समस्या ही आहे कीं विश्वासाचा दावा करणारे ख्रिस्ती लोक दहा मिनिटे पवित्र शास्त्र वाचनात खर्ची घालतात आणि नंतर त्यांचे अर्धे दिवस पैसे कमविण्यात आणि उरलेले अर्धे दिवस ते त्यांनी ज्यावर खर्ची केलें त्यावर प्रीति करण्यात आणि ते दुरुस्त करण्यात प्रेमळ आणि दुरुस्त करण्यात खर्ची घालतात.

स्वर्गीय मानसिकता नाहीं जी या जगातील हरवलेल्यां आणि दुःखी लोकांप्रत प्रेमात अडखळण आणते . ही जगिक मानसिकता आहे जी प्रेमात अडखळण आणते, आठवड्याच्या शेवटी धार्मिक नित्यक्रमाच्या कपटवेशात लपलेली असली तरीही.

ती व्यक्ती कोठे आहे जिच्या हृदयात स्वर्गाच्या प्रतिज्ञात गौरवाप्रत इतके उत्कट प्रेम आहे कीं त्याला पृथ्वीवर निर्वासित आणि यात्रेकरू असल्यांसारखे वाटते? तो व्यक्ती कोठे आहे ज्यानें येणाऱ्या युगाच्या सौंदर्याचा इतका आस्वाद घेतला आहे कीं या जगाचे हिरे त्याला डॉलरच्या दुकानातील कंच्यांसारखे दिसतात, आणि जगाची करमणूक व्यर्थ वाटते आणि जगाची नैतिक कारणे अतिशय लहान आहेत कारण तेथून अनंतकाळाकडें पाहता येत नाहीं? ही व्यक्ती कुठे आहे?

निश्चितच, तो इंटरनेटच्या किंवा खाण्याच्या किंवा झोपेच्या किंवा पिण्याच्या किंवा मेजवानी करण्याच्या किंवा मासेमारी अथवा नौकानयन करण्याच्या किंवा फेरफटका मारण्याच्या बंधनात नाहीं. तो विदेशात राहणारा स्वतंत्र मनुष्य आहे. आणि त्याचा एक प्रश्न असा आहे: मी या पृथ्वीवर निर्वासित असताना सर्व अनंतकाळासाठीं देवाचा आनंद जास्तीत जास्त कसा मिळवू शकतो? आणि त्याचें उत्तर नेहमी सारखेच असते: प्रेमाचा परिश्रम करून. देवामधील माझ्या आनंदाचा विस्तार करून, जर शक्य असेल तर मी इतरांना त्यात समाविष्ट करू शकेन, मग त्यासाठीं काहींही किंमत का मोजावी लागेना.

फक्त एकच गोष्ट त्यास संतुष्ट करते ज्याची संपत्ती स्वर्गात आहे: स्वर्गाची कामे करणे. आणि स्वर्ग हे प्रेमाने परिपूर्ण जग आहे!

स्वर्गाच्या दोऱ्या प्रेमाचे हात बांधून त्यांस निष्प्रभ करीत नाहींत. पैश्याचे आणि अवकाशाचे आणि आरामाचे आणि प्रशंसेचे प्रेम आहे – प्रेमाच्या हातांना बांधणाऱ्या स्वार्थाचे दोरखंड आहेत. आणि या दोरखंडांस तोडणारे सामर्थ्य आहे ख्रिस्ती आशा. “ख्रिस्त येशूमधील तुमचा विश्वास व तुमची सर्व पवित्र जनांवरील प्रीति, ह्यांविषयी ऐकून, आम्हीं तुमच्यासाठीं जेव्हां प्रार्थना करतो तेव्हां स्वर्गात तुमच्यासाठीं राखून ठेवलेल्यां आशेमुळे आम्हीं सर्वदा आपल्यां प्रभू येशू ख्रिस्ताचा पिता देव ह्याची उपकारस्तुती करतो” (कलस्सै 1:4-5).

मला असलेल्यां पूर्ण खात्रीने मी ते पुन्हा म्हणतो: या पृथ्वीवरील प्रेमास अडखळण आणणारी स्वर्गीय मानसिकता नाहीं. ती सांसारिक चित्तवृत्ती आहे. आणि म्हणूनच प्रीतिचा महान झरा ख्रिस्ती आशेचा सामर्थ्यवान स्वतंत्र करणारा आत्मविश्वास आहे.

30 मार्च : अन्तहीन लाभ

Alethia4India
Alethia4India
30 मार्च : अन्तहीन लाभ
Loading
/

“क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा। यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?”  मत्ती 16:25-26

यीशु प्रश्न पूछने में निपुण था, विशेषकर ऐसे प्रश्न जो लोगों को रुककर ध्यान देने पर बाध्य कर देते थे। जब हमारा सामना यीशु के प्रश्नों से होता है, जैसा कि यहाँ चेलों के साथ हुआ, तो हमें सावधान रहना चाहिए कि हम उनके प्रभाव को टालने का प्रयास न करें।

पहली नजर में हो सकता है कि यीशु का यह प्रश्न, जो भौतिक सफलता के लिए प्राण की हानि उठाने के बारे में है, प्राथमिक रूप से एक चेतावनी के रूप में लगे जैसे कि किसी स्वार्थी व्यक्ति पर दण्ड आने का संकेत दे रहा हो। हम यीशु के प्रश्न को इस तरह से पढ़ने के लिए प्रलोभित होते हैं, मानो वह एक माँ के समान है जो अपने बच्चे को कठोर चेतावनी देकर कह रही है, “अब यदि तुम इसे अपनी बहन के साथ नहीं बाँटोगे, तो तुम जानते हो कि क्या होगा!” परन्तु यह प्रश्न एक अवलोकन है। यीशु दिखा रहा है कि जब हम अपने जीवन और निर्णयों को अपनी पापी अभिलाषाओं, जैसे कि अपनी सम्पत्ति, अपनी उपलब्धियों, अपनी इच्छित पहचान के आधार पर दिशा देते हैं, तब क्या होता है। वह कहता है कि इस तरह से जीना अपने जीवन की हानि उठाना है।

इस कारण, यहाँ यीशु जिस जीवन की हानि की बात कर रहा है, वह तात्कालिक और अनन्त दोनों है। यदि हम जीवन को उससे प्राप्त होने वाली वस्तुओं से अधिक कुछ नहीं मानते, तो हम वास्तव में इसके सबसे बड़े आनन्द से वंचित रह जाते हैं; अन्ततः हमारा केवल अस्तित्व रह जाता है, किन्तु हम वास्तव में जी नहीं पाते। इसके अतिरिक्त, जब हम अपने आप को अपने जीवन के सिंहासन पर बिठा देते हैं, तो हम यीशु को उसके उचित स्थान से हटा देते हैं और इस वास्तविकता को स्वीकार करते हैं कि स्वाभाविक रूप से हम संसार के पीछे चलना पसन्द करते हैं, न कि हमारी इच्छाओं को छोड़कर मसीह के पीछे चलना। यदि हम इसी तरह चलते रहेंगे, तो हम अनन्त जीवन के वरदान को खो देंगे, जिसे वह अपने अनुयायियों को देना पसन्द करता है।

तो हम वर्तमान समय में सांसारिक अभिलाषाओं से कैसे लड़ सकते हैं? सबसे पहले हमें यह पहचानना होगा कि जैसे 17वीं सदी के गणितज्ञ और धर्म-विज्ञानी ब्लेज़ पास्कल ने कहा था, हमारे अस्तित्व के सबसे गहन स्तर पर परमेश्वर के आकार का एक छेद है और इस छेद को परमेश्वर के अतिरिक्त कोई भी नहीं भर सकता। हम क्षण भर के सुखों का पीछा करने के लिए नहीं, अपितु जीवित परमेश्वर के साथ सम्बन्ध का आनन्द लेने के लिए अस्तित्व में हैं। फिर दूसरा, हमें अपनी आत्माओं के मूल्य पर निरन्तर चिन्तन करना चाहिए जैसा कि यरूशलेम के बाहर उस क्रूर दृश्य में स्पष्ट है, जहाँ तिरस्कृत, बहिष्कृत, छिदे हुए, घावों से भरे हुए और ठुकराए हुए निष्पाप मसीह को क्रूस पर लटका दिया गया था, ताकि हम परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध में लाए जाएँ और मुक्त रूप से अनन्त जीवन प्राप्त करें। यीशु का बलिदान इस बात को उजागर करता है कि परमेश्वर के लिए हमारी आत्माओं का अनन्त भविष्य कितना महत्त्व रखता है।

यीशु को अपने उद्धारकर्ता और अपने राजा के रूप में मानना ​​और उसके मूल्य को किसी भी सांसारिक खजाने से ऊपर स्वीकारना एक क्षणिक निर्णय नहीं है; यह एक आजीवन प्रतिबद्धता है, जिसे प्रतिदिन जीया जाता है। यदि आप तैयार हैं कि प्रतिदिन उसके क्रूस तक आएँगे, दीनता से स्वीकार करेंगे कि वह कौन हैं, और अपना जीवन, अपनी इच्छाएँ, आराम, धन उसके लिए दे देंगे, तो अब और सदा तक आपका लाभ अन्तहीन होगा। हमारे लिए बेहतर होगा कि हम अपने हर दिन के आरम्भ में अपने आप से वह प्रश्न पूछें, जो यीशु ने उस दिन सड़क पर अपने चेलों से पूछा था, यदि मैं सारे जगत को प्राप्त कर लूँ और अपने प्राण की हानि उठाऊँ तो मुझे क्या लाभ होगा?       

मत्ती 16:13-27