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3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य

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3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य
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“जो सिंहासन पर बैठा था, उसने कहा, ‘देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूँ!’” प्रकाशितवाक्य 21:5

हर कोई हमेशा जानना चाहता है कि कहानी का अन्त कैसे होता है। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें अन्तिम पृष्ठ पर झाँकने का अवसर देती है, ताकि हम इतिहास के अन्त की ओर अधिक विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द के साथ बढ़ सकें।

पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पूरा मानव इतिहास एक अन्तिम लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है; परमेश्वर ने मनुष्य को यह जानने के लिए बनाया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ अस्तित्व में है। वास्तव में, उसने हमारे मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है (सभोपदेशक 3:11)।

हर धर्म और विचारधारा इतिहास को समझने का प्रयास करती है। उदाहरण के लिए, हिन्दू धर्म सिखाता है कि हम जिस वास्तविकता में हैं, वह किसी गन्तव्य की ओर नहीं बढ़ रही है, बल्कि वास्तव में चक्रों में घूम रही है—अर्थात इतिहास चक्रीय है। नास्तिक प्रकृतिवाद तर्क देता है कि इतिहास की कोई पद्धति नहीं है, कोई उद्देश्य या अन्तिम लक्ष्य नहीं है; इतिहास केवल परमाणुओं के पुनः संयोजन की कहानी है (और हम भी उसी का हिस्सा हैं)। लेकिन मसीही लोग मानते हैं कि बाइबल इतिहास को रैखिक रूप में प्रस्तुत करती है: इसका एक प्रारम्भिक बिन्दु था, इसका एक समापन बिन्दु होगा, और यह एक उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मसीह का जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और वापसी पूरे मानव इतिहास की केन्द्रीय विषयवस्तु है। इसलिए पूरी मानवजाति की कहानी को इसी ढांचे के भीतर देखा जाना चाहिए। यीशु वापिस आएगा; वह परमेश्वर की अनन्त उद्धार योजना को पूरा करेगा और उसके सिद्ध राज्य को स्थापित करेगा। वह सब कुछ नया और सिद्ध बना देगा।

यीशु जो सिद्ध राज्य लेकर आएगा, वह क्या है? यह एक ऐसा राज्य है, जिसका केन्द्र उसका क्रूस है। यह एक ऐसा राज्य है, जो हृदयों और जीवनों को बदलता है, और इसके नागरिक यीशु को राजा मानकर उसे दण्डवत करते हैं। यह प्रेम और न्याय, करुणा और शान्ति का राज्य है। यह राज्य बढ़ रहा है और पृथ्वी के छोर तक फैल रहा है—और निर्धारित समय पर, जो हमारे लिए अज्ञात है, परमेश्वर पिता अपने पुत्र को राष्ट्रों को उसकी विरासत के रूप में देगा (भजन 2:8)।

यहाँ तक कि अभी भी, परमेश्वर अपनी सम्प्रभु योजना और अपनी इच्छा के रहस्य को पूरा कर रहा है। जब यूहन्ना अन्त समय के बारे में लिखता है, तो वह हमें याद दिलाता है कि “उद्धार के लिए हमारे परमेश्वर का . . . जय–जयकार हो” (प्रकाशितवाक्य 7:10)। यदि उद्धार किसी और के हाथ में होता या इसे भाग्य पर छोड़ दिया जाता, तो परमेश्वर की योजना पूरी नहीं हो सकती थी। लेकिन वह इतिहास का रचयिता और भविष्य का शासक है। उसने अपनी प्रजा को बचाने का निश्चय किया है, और वह इसे पूरा करेगा। एक दिन हम उसे यह कहते हुए सुनेंगे, “ये बातें पूरी हो गई हैं” (प्रकाशितवाक्य 21:6)।

परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा हमारे उद्धार का कार्य प्रारम्भ कर दिया है, और एक दिन वह सभी चीज़ों को एक ही प्रधान—यीशु—के अधीन कर देगा। इसलिए यदि हम मसीह के साथ जुड़े हुए हैं, तो हम “जयवन्त से भी बढ़कर हैं” (रोमियों 8:37) और पुत्र के साथ अनन्तकाल तक राज्य करने के लिए सक्षम हैं। हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द! क्योंकि भले ही हम नहीं जानते कि हमारे जीवन में आगे क्या होगा, लेकिन हम यह अवश्य जानते हैं कि कहानी का अन्त कैसा होगा—और हमारी अनन्तता कैसे प्रारम्भ होगी। इसलिए हम उत्सुकता से यह प्रार्थना करते हैं, “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है . . . तेरा राज्य आए” (मत्ती 6:9-10)।

यशायाह 60

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 63– 65; प्रेरितों 23:1-15

3 August : तुमच्या शरीराचा हेतू

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3 August : तुमच्या शरीराचा हेतू
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कारण तुम्हीं मोलाने विकत घेतलेले आहात; म्हणून तुम्हीं आपलें शरीर [व आत्मा] जी देवाची आहेत त्याद्वारे देवाचा गौरव करा. (1 करिंथ 6:20)

देवानें या भौतिक विश्वाची निर्मिती अविचाराने केलीं नाहीं. त्यामागे त्याचा उद्देश होता, तो म्हणजें, असे निरनिराळे निमित्त उदयांस आणणें जेणेंकरून त्याचा महिमा वाढावा आणि तो अधिक तेजस्वीपणें प्रकट केला जावा. “आकाश देवाचा महिमा वर्णिते; अंतरिक्ष त्याची हस्तकृती दर्शवते” (स्तोत्र 19:1).

देवानें याच कारणासाठीं निर्माण केलेंल्या इतर सर्व भौतिक गोष्टींच्या त्याच श्रेणीत आपली शरीरे देखील सुसंगतपणें बसतांत. मानव प्राणी व मानव शरीर यांद्वारे स्वतःचा गौरव करून घेण्याच्या मूळ आपल्या उद्देशापासून तो माघार घेणार नाहीं.

देव आपल्या कुजलेल्या, पापाने डागाळलेल्या शरीराला पुनरुत्थान पावलेले शरीर बनविण्यासाठीं, जेणेंकरून त्या शरीराने गौरव आणि अमरत्व धारण करावे, तो त्याचे हात घाण करणारे कष्ट का घेतो? उत्तर : कारण त्याच्या पुत्राने मृत्यूची खंडणी दिली जेणेंकरून या भौतिक विश्वासाठीं त्याच्या पित्याचा उद्देश पूर्णतेस जावा, तो म्हणजें, त्यां भौतिक वस्तूंमध्यें ज्यांत आपली शरीरेही आहेत, अनंतकाळासाठीं त्याचा महिमा व्हावा.

यास्तव आपला शास्त्रलेख असे म्हणतो : “कारण तुम्हीं मोलाने विकत घेतलेले आहात [म्हणजें, त्याच्या पुत्राच्या मरणाद्वारे]. म्हणून तुम्हीं आपलें शरीर [व आत्मा] जी देवाची आहेत त्याद्वारे देवाचा गौरव करा.” देव त्याच्या पुत्राने जें केलें त्याकडें दुर्लक्ष करणार नाहीं वा अनादर करणार नाहीं. आपली शरीरे मेलेल्यांतून उठवून देव त्याच्या पुत्राच्या कार्याचा गौरव करेल आणि आपण आपल्या शरीराचा उपयोग सर्वकाळ त्याचे गौरव करण्यासाठीं करू.

म्हणूनच आता तुम्हांला शरीर आहे. आणि म्हणूनच ते ख्रिस्ताच्या गौरवी शरीराचे स्वरूप धारण करण्यासाठीं पुन्हा उठविले जाईल.

2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना

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2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना
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“दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते रहो।” इफिसियों 5:18-19

जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सब कुछ एक साथ होता हुआ प्रतीत होता है, जैसे किसी बच्चे का जन्म या किसी नए देश में स्थानान्तरण। मसीह में नया जीवन प्रारम्भ करना शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब हम यीशु पर विश्वास करते हैं, तो एक साथ कई परिवर्तन होते हैं: हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, हम परमेश्वर के परिवार में गोद लिए जाते हैं, हमें उसके पुत्र और पुत्रियों के रूप में एक नई पहचान दी जाती है, और—जैसा कि इस वचन में दर्शाया गया है—हमारे भीतर पवित्र आत्मा का वास होता है।

जब कोई यीशु पर विश्वास करता है, तो पवित्र आत्मा उसमें वास करने लगता है, उसे वह इच्छा और सामर्थ्य प्रदान करता है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए आवश्यक है। आत्मा की यह परिपूर्णता मसीही अनुभव का मूलभूत सत्य है। यह हर उस व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, जो मसीह पर विश्वास करता है। फिर भी, सच्चाई यह है कि विश्वासियों के रूप में हम हमेशा परमेश्वर के आत्मा की परिपूर्णता में नहीं जीते। यह सम्भव है कि हमारी अवज्ञा के कारण हम हमारे भीतर रहने वाले आत्मा को दुखी कर देते हैं (इफिसियों 4:30)। यह भी सम्भव है कि हम उससे अधिक किसी अन्य चीज़ के प्रभाव में अधिक आ जाएँ—यही कारण है कि पौलुस यहाँ यह स्पष्ट करता है कि हम एक साथ शराब और आत्मा दोनों के प्रभाव में नहीं रह सकते।

हमें यह समझना होगा कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हम कभी भी उसके पितृत्व से बाहर नहीं आ सकते; लेकिन अवज्ञा में जीने से हम उसके पितृ-संरक्षण, उपस्थिति और आनन्द से वंचित हो सकते हैं। जो बच्चा अपने माता-पिता की पूरी तरह अवहेलना करता है, वह भले ही नाश्ते की मेज़ पर बैठा हो, तब भी वह जानता है कि वे अभी भी उसके माता-पिता हैं और वह अभी भी उनका बेटा है, लेकिन ऐसा होने पर भी उसके इस रिश्ते का आनन्द कम हो जाएगा। हमारे साथ भी यही होता है: हम अवज्ञा में नहीं जी सकते—ऐसा नहीं हो सकता कि एक ओर तो हम अपने जीवन में किसी अन्य प्राथमिकता, विचार या पदार्थ को अपना मार्गदर्शक बना लें और दूसरी ओर हम आत्मा की परिपूर्णता में भी जीएँ।

यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे हम स्वयं हल कर सकते हैं। हम खुद को पवित्र आत्मा से नहीं भर सकते। हम केवल परमेश्वर से पवित्र आत्मा की परिपूर्णता को ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि उसका आनन्द भी उसी के द्वारा सम्भव होता है। हम स्वयं को नहीं भर सकते, लेकिन हमें स्वयं को भरे जाने के लिए तैयार और खुले अवश्य रखना चाहिए। हर मसीही जीवन की अपेक्षा यही है कि यह आत्मा से भरे होने का प्रमाण—जिसे पौलुस “आत्मा का फल” (गलातियों 5:22) कहता है—धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हो।

आपके जीवन की और हर एकत्रित कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम सब आत्मा से भरे जाएँ—कि हम किसी और चीज़ के बजाय उसके द्वारा निर्देशित हों। यही सच्चे रूपान्तरण, आनन्द, शान्ति और प्रेम को लाता है। यही हमें प्रेरित करता है कि हम न केवल अपने ओठों से, बल्कि अपने हृदय में भी मसीह की स्तुति के गीत गाएँ। इसलिए प्रार्थना करें कि वह आपको नए सिरे से भर दे:

हे पवित्र आत्मा, मेरे हृदय पर उतर,

इसे संसार से अलग कर, इसकी हर धड़कन में प्रवाहित हो;

मेरी निर्बलता के बावजूद, तू शक्तिशाली है,

मुझे वैसा प्रेम करना सिखा, जैसा मुझे करना चाहिए।[1]

  यहेजकेल 11:14-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 60– 62; प्रेरितों 22 ◊


[1] जॉर्ज क्रोली, “स्पिरिट ऑफ गॉड, डिसेण्ड अपोन माई हार्ट” (1854).

2 August : यापुढे मरणाचे भय नाहीं

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2 August : यापुढे मरणाचे भय नाहीं
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ज्या अर्थी ‘मुले’ एकाच रक्तमांसाची होती त्या अर्थी तोही त्यांच्यासारखा रक्तमांसाचा झाला, हेतू हा कीं, मरणावर सत्ता गाजवणारा म्हणजें सैतान, ह्याला मरणाने शून्यवत करावे, आणि जे मरणाच्या भयाने आयुष्यभर दास्याच्या बंधनात होते त्या सर्वांना मुक्त करावे. (इब्री 2:14-15)

ख्रिस्त आपल्याला मृत्यूच्या भीतीपासून बंधमुक्त करून “धन-वैभव नाहींसे हो, कीं सोडून जावोत सर्व आप्तजन, कीं नश्वर जीवनहि लयास जावो” अशा प्रीतियुक्त त्यागाच्या मानसिकतेचे जीवन जगण्यांस कसे स्वतंत्र करतो?

ज्या अर्थी ‘मुले’ एकाच रक्तमांसाची होती

“मुले” हा शब्द यापूर्वीच्या वचनातून घेतलेला आहे जो मुक्तिदाता ख्रिस्ताच्या आध्यात्मिक संततीचे सूचक आहे. ही “देवाची लेकरें” देखील आहेत. दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे झालें तर, देवानें ख्रिस्ताला पाठविले तेव्हां त्याचा मुख्य उद्देश्य आपल्या “मुलांचे” तारण करणें हाच होता. “ज्या अर्थी ‘मुले’ एकाच रक्तमांसाची होती. . . “

त्या अर्थी तोही त्यांच्यासारखा रक्तमांसाचा झाला.

देवाचा पुत्र, जो देही होण्यापूर्वी सनातन शब्द म्हणून होता (योहान 1:1), तो रक्तमांसाचा झाला व त्याच्या देवपणाने मानवरूप परिधान केलें. तो पूर्ण मनुष्य बनला, त्याचवेळी पूर्णतः देव म्हणूनही कायम होता.

कीं मरणाने. . .

ख्रिस्त मानव झाला तो मरण्यासाठीं. देही होण्यापूर्वी, देव म्हणून पापी लोकांसाठीं मरणें त्याला शक्य नव्हतें. पण रक्तमांसाचा झाल्यावर, त्याला ते शक्य झालें. मरण हेच त्याचे ध्येय होते. त्यामुळें त्याला नश्वर मानव रूपांत जन्म घ्यावा लागला.

हेतू हा कीं, मरणावर सत्ता गाजवणारा म्हणजें सैतान, ह्याला…..शून्यवत करावे. . .

ख्रिस्त मेला तेव्हां त्यानें सैतानाचा पराभव केला. तो कसा? आपली सर्व पापें दूर करून (इब्री 10:12). याचा अर्थ असा कीं देवासमोर आपल्यावर दोषारोप ठेवण्यासाठीं सैतानाकडें कोणतीही कायदेशीर तर्कबुद्धी नाहीं. “देवाच्या निवडलेल्या लोकांवर दोषारोप कोण ठेवील? देवच नीतिमान ठरवणारा आहे” (रोमकरांस 8:33). तो कोणत्या आधारावर आम्हांला नीतिमान ठरवतो? येशूच्या रक्ताद्वारे (इब्री 9:14; रोमकरांस 5:9).

सैतान आपल्याविरुद्ध जें शेवटचे शस्त्र उपयोगांत आणतो तें म्हणजें आमची स्वतःची पापें. येशूच्या मृत्यूने जर ते दूर केलें गेलें आहे तर सैतानाचे मुख्य शस्त्र त्याच्या हातातून हिसकावून त्याला निशस्त्र करण्यांत आलें आहे. त्या अर्थाने, तो शून्यवत झाला आहे.

आणि जे मरणाच्या भयाने आयुष्यभर दास्याच्या बंधनात होते त्या सर्वांना मुक्त करावे.

तर मग, आता आपण मरणाच्या भयापासून मुक्त झालेंलें असें आहोत. देवानें आपल्याला नीतिमान ठरवले आहे. आपल्यासमोर आहे ती फक्त भावी कृपा. सैतान देवाचा हा विधिलेख रद्द करू शकत नाहीं. ही सार्वकालिक सुरक्षा लगेच आपल्या जीवनावर कार्यकारी व्हावी अशी देवाची इच्छा आहे. हेतू हा कीं, त्यानें वर्तमान समयी आपल्याला दास्याच्या व भीतीच्या बंधनातून मुक्त करावे व शेवट पूर्णानंदाने  व्हावा.

1 अगस्त : सच्चा धन

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1 अगस्त : सच्चा धन
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“परमेश्‍वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है!” मरकुस 10:25

धनवानों का जीवन अक्सर आसान होता है। पैसा कई दरवाजे खोलता है। शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, यात्रा और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में हमें अक्सर यह देखने को मिलता है कि अधिक धन होने से चीज़ें अधिक सुगम हो जाती हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि धन को अक्सर “सार्वभौमिक पासपोर्ट” कहा जाता है!

लेकिन एक महत्त्वपूर्ण दरवाजा ऐसा भी है, जिसे धन अपने आप नहीं खोल सकता। धनवान युवा अगुवे ने पाया कि अनन्त जीवन की खोज में उसके धन ने कोई सहायता नहीं की बल्कि वह उसके लिए एक बाधा बन गया। अपनी सम्पत्ति को छोड़ने और यीशु का अनुसरण करने की अनिच्छा ने उद्धार के लिए उसके मार्ग को बन्द कर दिया, और इसलिए वह उदास हो गया तथा मसीह के साथ अपनी बातचीत को रोककर चला गया—उसके पास अब भी उसका धन था, लेकिन उसकी आत्मा खतरे में थी (मरकुस 10:22)।

इस युवक की उदासी से अधिक गहरी उदासी यीशु की थी। वह जानता था कि सांसारिक सम्पत्ति पर भरोसा करना कितना आसान है और वास्तव में महत्त्वपूर्ण चीजों से दृष्टि खो देना कितना खतरनाक है। और जिस दृष्टिकोण से यीशु ने धनवान युवा अगुवे को देखा, वह सुसमाचार में उसके अन्य उपदेशों के अनुरूप था। उदाहरण के लिए, एक बार उसने एक किसान की कहानी सुनाई जिसने अपने खलिहान तोड़कर और बड़े खलिहान बनाए (लूका 12:13-21)।

यह एक वैध निर्णय था, लेकिन वह मूर्ख था क्योंकि उसने अपने धन को अपनी आत्मा की सुरक्षा का मापदण्ड मान लिया। उसने अपने आप से कहा, “प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत सम्पत्ति रखी है; चैन कर, खा, पी, सुख से रह” (वचन 19)। लेकिन यीशु ने उसे मूर्ख कहा, क्योंकि वह मृत्यु के लिए तैयार नहीं था, और धन उसे मृत्यु से नहीं बचा सकता था (वचन 20)। आखिरकार, “यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?” (मत्ती 16:26)।

अक्सर हम भी सांसारिक सम्पत्ति में अपनी सुरक्षा खोजने की गलती करते हैं। हम या तो अधिक सम्पत्ति इकट्ठा करके या दूसरों को दान देकर अपने नाम और प्रतिष्ठा के लिए ऐसा करते हैं। लेकिन अन्ततः, यदि हम गलत चीजों को अधिक मूल्यवान समझते हैं और वास्तविक रूप से अनमोल चीजों को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो हम उसी मूर्खता में पड़ जाते हैं (“मिस्टर बिजनेसमैन” शीर्षक वाले गीत के शब्दों में)।[1]

हमारे पास जो कुछ भी है या हम जो कुछ भी करते हैं, वह हमें मृत्यु से बचाने और अनन्त जीवन में ले जाने के लिए हमारा मार्ग प्रशस्त नहीं कर सकता। जब वह धनी युवक दुखी होकर चला गया, तब यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “मनुष्यों से यह नहीं हो सकता, परन्तु परमेश्वर से हो सकता है; क्योंकि परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है” (मरकुस 10:27)। धन का सबसे बड़ा खतरा यह है कि यह हमें गर्व और आत्मनिर्भरता में डाल सकता है, जिससे हम भूल सकते हैं कि केवल परमेश्वर ही हमारा उद्धारकर्ता है।

यदि यीशु आपसे कहे कि उसके सेवाकार्य के लिए आप अपने धन को छोड़ दें, तो क्या आप ऐसा करने के लिए तैयार होंगे? या फिर आप उदास होकर चले जाएँगे क्योंकि यह मांग आपके लिए बहुत बड़ी होगी और कीमत बहुत अधिक होगी? यदि आप अपने धन या संसाधनों पर भरोसा कर रहे हैं, तो उस सोच से पश्चाताप करें और परमेश्वर की दया से मिलने वाले उद्धार में आनन्दित हों। परमेश्वर जो कर सकता है, वह किसी रहस्य के समान छिपा नहीं है। जो कोई भी उसके पास आता है, उसे वह कभी अस्वीकार नहीं करेगा।

  लूका 12:13-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 57–59; प्रेरितों 21:18-40


[1] रेय स्टीवंस, “मिस्टर बिजनेसमैन” (1968).

1 August : आमचा  अशक्तपणाच त्याची योग्यता प्रकट करतो

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1 August : आमचा  अशक्तपणाच त्याची योग्यता प्रकट करतो
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“माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते.” (2 करिंथ 12:9)

आमच्या जीवनांत देव दुःख आणतो त्यामागे त्याची योजना ही कीं त्याद्वारे ख्रिस्ताची योग्यता आणि सामर्थ्य ही पूर्णतेस यावीं. ही कृपा आहे, कारण ख्रिस्ती लोकांचा सर्वात मोठा आनंद म्हणजें आपल्या जीवनात ख्रिस्त उंचविला जावा यांत आहे.

जेव्हा पौलाला प्रभु येशूनें सांगितले कीं त्याचा “शरीरात असलेला काटा” दूर केला जाणार नाहीं, तेव्हा त्यानें यामागचे कारण स्पष्ट करून पौलाच्या विश्वासाला बळकटी दिलीं. प्रभुनें म्हटलें, “माझी कृपा तुला पुरेशी आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते” (2 करिंथ 12:9). पौलाने अशक्तच असावें हे देवानें नेमून ठेविलें यांत हेतू हा कीं पौलानें ख्रिस्तामध्येंच आपलें सामर्थ्य शोधावें.

जर आपण स्वतःला आत्मनिर्भर समजू लागलो आणि त्यां दृष्टिने आपण स्वतःकडें पाहू लागलो तर आपण फार चढून जाऊ, व ख्रिस्ताचे गौरव होणार नाहीं. म्हणून, ख्रिस्तानें जगातील जे हीनदीन, व जे शून्यवत अशांना निवडले “म्हणजें देवासमोर कोणाही मनुष्यानें अभिमान बाळगू नये” (1 करिंथ 1:29). आणि कधी कधी तो बाह्य रूपाने बलवान दिसणाऱ्या लोकांना अशक्त बनवतो जेणें करून देवाचे सामर्थ्य अधिक स्पष्टपणें प्रकट व्हावें.

आपल्याला ठाऊक आहे कीं पौलाने ही गोष्ट कृपा म्हणून अनुभवली, कारण तो आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदाने मिरवीत असें : “म्हणून ख्रिस्ताच्या सामर्थ्याची छाया माझ्यावर राहावी म्हणून मी विशेषेकरून आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदाने मिरवीन. ख्रिस्तासाठीं दुर्बलता, अपमान, अडचणी, पाठलाग, संकटे ह्यांत मला संतोष आहे; कारण जेव्हा मी अशक्त तेव्हाच मी सशक्त आहे” (2 करिंथ 12:9-10).

देवाच्या कृपेवर विश्वास ठेऊन जगणें म्हणजें येशूमध्यें देव आपल्यासाठीं जो काहीं आहे त्या सर्व गोष्टींत समाधानी असणें. म्हणून, देव येशूमध्यें आपल्यासाठीं जो काहीं आहे ते सर्व प्रकट होत असतांना आणि त्याद्वारे देवाचे गौरव होत असतांना विश्वास त्यापासून कधीच माघार घेणार नाहीं. आपला अशक्तपणा व आपलें दुःख यांचा हाच हेतू आहे.

19 जून : हम एक देह हैं

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19 जून : हम एक देह हैं
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“क्योंकि जैसे हमारी एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही सा काम नहीं; वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं।” रोमियों 12:4-5

आपने कभी-कभी लोगों को आपसे यह पूछते सुना होगा, “क्या आप यहाँ के सदस्य हैं?” यह सवाल आमतौर पर किसी कंट्री क्लब, जिम, या इसी तरह के किसी स्थान से सम्बन्धित होता है। वे जानना चाहते हैं, “क्या आप इस स्थान की सदस्य-सूची में शामिल हैं? क्या यहाँ के लोग आपको जानते हैं और स्वीकार करते हैं, और क्या वे आपको तब याद करेंगे जब आप मौजूद नहीं होंगे?”

कलीसिया का वर्णन करने के लिए पौलुस अक्सर शरीर के उदाहरण का उपयोग करता है। इसके अर्थ को समझने के लिए हमें अपनी कल्पना का विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है। हम सभी के पास एक शरीर है, जो विभिन्न हिस्सों से बना हुआ है, और प्रत्येक भाग का एक विशेष कार्य होता है। सभी भाग दिखाई नहीं देते, लेकिन सभी महत्त्वपूर्ण हैं। यदि कोई भाग काम नहीं कर रहा या मौजूद नहीं है, तो इसका असर बाकी सब पर पड़ता है। किसी के पूरे शरीर की प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि यह सिर द्वारा नियन्त्रित हो रहा है या नहीं। यह सत्य मसीह की देह अर्थात स्थानीय कलीसिया पर भी लागू होता है: आत्मिक शरीर तभी सही तरीके से काम करता है, जब वह यीशु के नेतृत्व में एकजुट होकर काम करता है। जब ऐसा होता है, तो हम . . .

एकता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं रहते।

बहुलता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम विभिन्न प्रकार के हिस्सों से बने हैं।

विविधता के साथ काम करते हैं, क्योंकि शरीर के कार्य स्वाभाविक रूप से विविध होते हैं।

सुगमता के साथ काम करते हैं, जिसे हम तब महसूस करते हैं जब सब कुछ एकजुट होकर काम करता है।

पहचान के साथ काम करते हैं, यह दर्शाते हुए कि हममें से प्रत्येक जन अकेला रहकर स्वयं को पूर्ण रूप से नहीं जान सकता।

दूसरे शब्दों में, जब आप एक व्यक्ति के रूप में मसीह की देह की प्रकृति को समझते हैं, तो आप बेहतर तरीके से समझ पाते हैं कि आप कौन हैं और आप कहाँ फिट बैठते हैं। मसीह की देह के एक सदस्य के रूप में आप कहीं न कहीं अवश्य शामिल हैं। जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें बदल दिया है, तो हमें यह एहसास होना चाहिए कि हमारे लिए यह ध्यान रखना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हमें एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध में बुलाया गया है—एक समुदाय में बुलाया गया है। हम उन वरदानों में विविध हैं जो हमें दिए गए हैं; हममें से कोई भी अकेले रहकर शरीर नहीं बना सकता, बल्कि हम एकसाथ जुटकर ही शरीर बनते हैं। हममें से प्रत्येक एक-दूसरे के लिए हैं। इसलिए हम कलीसिया में इस उद्देश्य से एकत्रित होते हैं कि हम अपने आप को एक-दूसरे के लिए और अन्ततः हमारे प्रभु के लिए अर्पित कर सकें। हम मसीह की देह में हमारे उपस्थित रहने, हमारे गीतों, हमारे प्रार्थनाओं और हमारी संगति के माध्यम से योगदान देते हैं। जैसा कि आइसक वॉट्स ने लिखा:

मेरी जीभ अपनी प्रतिज्ञाएँ दोहराती है,

इस पवित्र घर को शान्ति मिले!”

क्योंकि यहाँ मेरे मित्र और परिवारजन रहते हैं। [1]

कलीसिया सिर्फ एक ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ आप आकर बैठ जाते हैं। यह एक देह है। यह आपका परिवार है। आपको अपनी कलीसिया की आवश्यकता है; और आपकी कलीसिया को आपकी आवश्यकता है। जितना अधिक आप अपनी कलीसिया के प्रति प्रतिबद्ध होंगे, उतना ही अधिक आप इससे आशीषित होंगे; क्योंकि हमारे जीवन में इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि परमेश्वर अपने लोगों को एक साथ लाता है, क्योंकि एकजुटता ही वह स्थान है जहाँ हम सबको होना चाहिए।

  1 कुरिन्थियों 12:12-27

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 37–39; मत्ती 27:1-26 ◊


[1] आइसक वॉट्स, “हाओ प्लीज़्ड ऐण्ड ब्लेस्ट वाज़ आई” (1719).

11 मई : यह प्रभु का काम है

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11 मई : यह प्रभु का काम है
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“तब वह [नाओमी] मोआब के देश में यह सुनकर कि यहोवा ने अपनी प्रजा के लोगों की सुधि ले के उन्हें भोजन वस्तु दी है, उस देश से अपनी दोनों बहुओं समेत लौट जाने को चली।” रूत 1:6

बैतलहम बाइबल के इतिहास में एक प्रमुख नगर है। राजगद्दी सम्भालने से पहले दाऊद ने इसी नगर में अपनी भेड़ें चराईं थीं। एक हज़ार साल बाद, जब विभिन्न चरवाहे अपनी भेड़ों के झुण्डों की देखभाल कर रहे थे, तो इसी नगर में स्वर्गदूतों के एक दल ने यीशु मसीह के जन्म की घोषणा की।

हालाँकि इन दोनों महत्त्वपूर्ण घटनाओं से पहले न्यायाधीशों का काल था, जो हिंसा, सामाजिक और राजनीतिक अराजकता, और धार्मिक उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस उथल-पुथल के दौरान, बैतलहम में अकाल पड़ा, जिससे यह नगर, जिसका नाम इब्रानी भाषा में “रोटी का घर” है, भूख और निराशा का एक घर बन गया।

इन निराशाजनक परिस्थितियों में, एलीमेलेक नाम का एक व्यक्ति भोजन की तलाश में अपनी पत्नी नाओमी और अपने दो बेटों को मोआब देश में ले गया। जबकि एलीमेलेक नाम का अर्थ “मेरा परमेश्वर राजा है” है, लेकिन इस्राएल के शत्रुओं के देश मोआब में जाने का उसका निर्णय यह सवाल उठाता है कि क्या वह वास्तव में परमेश्वर के प्रावधान पर विश्वास कर भी रहा था या नहीं, या उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध था भी या नहीं।

मोआब भोजन की भूमि नहीं, बल्कि शोक का स्थान साबित हुआ। एलीमेलेक और उसके बेटों की मृत्यु हो गई, और नाओमी विधवा हो गई। हालाँकि, कुछ वर्षों बाद, नाओमी के दर्द के अंधकार में एक छोटी सी उम्मीद की किरण जागी; उसे यह समाचार मिला कि बैतलहम में भोजन लौट आया था। परमेश्वर ने अपने देश में अपनी प्रजा के लिए प्रावधान किया था।

हज़ारों साल बाद, हम इस सत्य को जल्दी से नजरअंदाज करने के लिए प्रलोभित हो सकते हैं: कि परमेश्वर अपनी प्रजा को वही प्रदान करता है, जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। शायद आप अपने उद्धार के बारे में यह तथ्य जानते हैं—लेकिन यह कितना आसान है कि हम उसके दैनिक प्रावधान के बारे में भूल जाएँ! क्या हमारे पास उन चीजों को देखने की दृष्टि है जो परमेश्वर हमारे दैनिक जीवन में हमें दे रहा है और हमारे लिए कर रहा है? क्या हर दिन के अन्त में उन कामों के लिए हमारे दिलों में धन्यवाद भरा हुआ होता है, जो उसने हमारे लिए किए हैं?

परमेश्वर के निरन्तर प्रावधान का एक व्यावहारिक उदाहरण वह भोजन है, जो हमें प्रतिदिन मिलता है। किराने की दुकान में यदि किसी को सबसे अधिक आभार और आश्चर्य के साथ देखना चाहिए, तो वह मसीही लोग हैं! आखिरकार, परमेश्वर ही तो है जो हमारी दुकानों और भण्डारगृहों को भोजन से भरता है। हम दुकान से अण्डे और दूध खरीदते हुए यह कह सकते हैं, “यह तो यहोवा की ओर से हुआ है, यह हमारी दृष्‍टि में अद्‌भुत है” (भजन 118:23)।

चाहे जीवन की घटनाएँ कितनी भी अंधकारमय और नाटकीय क्यों न दिखें, परमेश्वर अब भी अपनी प्रजा की चिन्ता करता है और अपनी योजनाओं को पूरा करता है, और वह अक्सर इसे अप्रत्याशित व्यक्तियों के माध्यम से और शान्त तरीकों से करता है। उसने नाओमी और उसके परिवार के माध्यम से महान कार्य करने का उद्देश्य रखा था—और यह बैतलहम में रोटी से शुरू हुआ। हमें भी अपनी आँखें खोलनी चाहिए ताकि हम देख सकें कि परमेश्वर द्वारा भोजन प्रदान करना हमारी सबसे बड़ी स्थाई आवश्यकता—हमारे उद्धारकर्ता, यीशु मसीह—के प्रावधान की ओर तथा हमारे उच्चतम बुलावे की ओर इशारा करता है: अर्थात हम उसकी महिमा के लिए “उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया” (इफिसियों 2:10)।

प्रेरितों 17:24-31

10 मई : नियम एवं शर्तें

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10 मई : नियम एवं शर्तें
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“उसने भीड़ को अपने चेलों समेत पास बुलाकर उनसे कहा, “जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इनकार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।” मरकुस 8:34-35

ऑनलाइन कुछ भी करने से पहले हमें अक्सर उपयोग की शर्तों और नीतियों को सहमति देनी होती है। और जब हम “मैं सहमत हूँ” बॉक्स पर टिक करते हैं, तो क्रेडिट कार्ड कम्पनियाँ, सोशल मीडिया प्लेटफार्म और वेबसाइटें समय-समय पर हमें सूचित करती हैं कि उनकी कानूनी नीतियाँ बदल गई हैं—और यह कि सेवा का उपयोग जारी रखने के लिए हमें नई नीतियों को स्वीकार करना होगा।

ऐसी बदलती नीतियाँ अक्सर बार-बार होती हैं और सूक्ष्म होती हैं। इन्हें पहचानना या इन पर नज़र रखना लगभग असम्भव होता है। फिर भी, यह सौभाग्य की बात है कि मसीह के अनुयायी बनने की “शर्तें और नीतियाँ” कभी नहीं बदलतीं, और कभी नहीं बदलेंगी। उन्हें न तो हटाया जा सकता है और न ही हमारी पसन्द के अनुसार बदला जा सकता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर ने स्थापित किया है। इन पदों में, परमेश्वर के पुत्र ने अपने लोग बनने और अनन्त जीवन पाने के लिए “शर्तें और नीतियाँ” निर्धारित की हैं।

हम कभी-कभी ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हमें प्रभु की आज्ञा का पालन करने के लिए खुद को मजबूर करना होगा। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है! बाइबल कहती है कि जैसे हम यीशु की पहल और अनुग्रह के उत्तर स्वरूप उस पर विश्वास करते हैं (इफिसियों 2:8), वैसे ही वही अनुग्रह हमें बनाए रखता है और हमें उसके पीछे चलने में सक्षम बनाता है (फिलिप्पियों 1:6)। वह हमारे विचारों, हमारी नैतिकता, हमारे व्यवहार और हमारे संसाधनों को आकार देता है, ताकि हम उसके नियन्त्रण के अधीन आ सकें, जिसे हमने अपनी महिमा माना है।

मसीह का अनुसरण करने की एक “शर्त” यह है कि अब हमारे जीवन का केन्द्र हम स्वयं नहीं हैं। हमारी व्यक्तिगत पहचान और लक्ष्य प्राथमिकता नहीं हैं। इसके बजाय, हमारा रूपान्तरण हो जाता है, ताकि मसीह के साथ हमारी एकता के माध्यम से बाहर के संसार के सामने हम दृश्य रूप में फल ला सकें। वह हमें आत्म-उपासना का पूर्ण रूप से खण्डन करने का बुलावा देता है।

स्वयं को नकारने के द्वारा हम अपने क्रूस को उठाते हैं और मसीह का अनुसरण करते हैं। दुर्भाग्य से, “अपना क्रूस उठाने” का रूपक अक्सर हल्का कर दिया जाता है; हमें याद रखना चाहिए कि क्रूस की मृत्यु वास्तव में मानवता द्वारा आविष्कार की गई सबसे क्रूर और भयंकर मृत्यु की विधियों में से एक थी। क्रूस उठाने के इस रूपक का उपयोग करके यीशु यह स्पष्ट कर रहा है कि शिष्यता का एक बड़ा मूल्य है।

लेकिन मसीह हमें ऐसा कुछ करने के लिए नहीं कह रहा है, जो उसने पहले न किया हो। वही क्रूस था, जिस पर उसने हमें एक मूल्य चुकाकर खरीदा (1 कुरिन्थियों 6:20)। इसलिए उसकी शिष्यता में चलना हमारे पुराने मनुष्यत्व की मृत्यु की ओर तथा अनन्त जीवन की ओर ले जाने वाला एक अभियान है। यह एक सैर नहीं है, बल्कि एक जीवित बलिदान है, क्योंकि हम अपने नहीं हैं। लेकिन आशा रखें, क्योंकि इस अभियान में भी एक सुन्दरता है। एक दिन, मानव-पुत्र शक्ति और महिमा में वापस आएगा, और हरेक टूटे हुए को अपने राज्य में पुनः स्थापित करेगा। तब तक, परमेश्वर के राज्य के लिए अपने जीवन को खोना एक अच्छा निवेश है, चाहे मूल्य कुछ भी हो।

1 पतरस 3:13 – 4:11

9 मई : पूरी सहानुभूति

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9 मई : पूरी सहानुभूति
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“इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिससे वह उन बातों में जो परमेश्‍वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिए प्रायश्चित करे। क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है जिनकी परीक्षा होती है।” इब्रानियों 2:17-18

हममें से कई लोग इस बात से हतोत्साहित होते हैं कि हमें कितनी बार प्रलोभन का सामना करना पड़ता है। हम अपने जीवन में प्रलोभन के अपार आकर्षण से शर्मिन्दा हो सकते हैं। यह हम पर पूरी तरह से हावी हो सकता है। ऐसे क्षणों में यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि प्रलोभन का अनुभव करना अपने आप में पाप नहीं है—क्योंकि मसीह ने भी, जो निष्पाप था, इसका सामना किया था। लेकिन क्योंकि उसने प्रलोभनों के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया, जैसा कि हम अक्सर करते हैं, इसलिए धार्मिकता का पालन करने में वह हमारे लिए परम आदर्श है।

जब मसीह ने मानव स्वभाव को अपनाया, तो वह इसकी सीमाओं और परीक्षणों के अधीन हो गया। इसलिए, हालाँकि यीशु परमेश्वर का दिव्य पुत्र और हमारा महान महायाजक है, केवल एक सामान्य इंसान नहीं है, हम यह जानकर हिम्मत पा सकते हैं कि वह हमारे संघर्षों के साथ पूरी तरह से सहानुभूति रख सकता है।

आपके और मेरे सामने आने वाली परीक्षाओं के मध्य में मसीह की सहानुभूति पाप के अनुभव पर निर्भर नहीं है, बल्कि पाप के प्रलोभन के अनुभव पर निर्भर है, जिसे केवल वही पूरी तरह जान सकता है जो वास्तव में निष्पाप है। यीशु दूर रहकर सहानुभूति नहीं दिखाता; वह प्रलोभन का सामना करने की पीड़ा और चुनौती को गहराई से जानता है। उसने हमारी पृथ्वी पर की राहों पर चलकर इसे अनुभव किया है।

तो फिर, जब आप प्रलोभन का सामना करने के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं और अपनी कमजोरियों के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं, तब आप इस स्थान पर जा सकते हैं। 21वीं सदी के “महान प्रधान याजकों” की सांसारिक बुद्धि पर भरोसा मत करें, जो आपको बताएँगे कि प्रलोभन इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही आते हैं, कि दोषी महसूस करना एक बीमारी है जिसे नकारा जाना चाहिए, और कि शर्म हमेशा अनावश्यक और हानिकारक होती है। इसके बजाय सच्चे महान महायाजक की ओर मुड़ें, जो आपको बताता है कि प्रलोभनों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए और जो आपको ऐसा करने की शक्ति भी प्रदान करता है (1 कुरिन्थियों 10:13), और जो आपको यह भी आश्वस्त करता है कि जब आप प्रलोभनों में आत्मसमर्पण कर देते हैं, तो आपका दोष और शर्म उसके शरीर में सहन कर लिया गया है और क्रूस पर मिटा दिया गया।

प्रभु यीशु मसीह के साथ सम्बन्ध में सबसे सुन्दर बात यह है कि आप पूरे आत्मविश्वास के साथ उसके पास जा सकते हैं, जिसने आपके लिए अपने प्राण दे दिए ताकि आप अपने विश्वास को दृढ़ता से पकड़ सकें। आप नियमित रूप से, विनम्रता से, विश्वास के साथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकते हैं, जो आपको सहानुभूति देने वाले मसीह के माध्यम से आपका स्वागत करता है। और अन्ततः, अनन्त काल में ऐसा कुछ भी नहीं होगा जिसके लिए मसीह को आपके पक्ष में प्रार्थना करने की आवश्यकता होगी। आप बस परमेश्वर के सामने खड़े हो सकेंगे और इस बात के लिए उसकी वन्दना कर सकेंगे कि उसने अपनी सिद्ध उपस्थिति में प्रवेश करने का निमन्त्रण आपको दिया। तब तक, उससे प्रार्थना करें जो यह जानता है कि प्रलोभन का सामना करना और प्रतिरोध करना क्या होता है, ताकि वह प्रलोभनों से आपके युद्ध के समय और आज आपके द्वारा उसके आज्ञापालन के प्रयासों में वह आपके साथ हो।

इब्रानियों  2:5-18