31 मार्च : सहायता के लिए पुकारना

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31 मार्च : सहायता के लिए पुकारना
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“जब-जब इस्राएली बीज बोते तब-तब मिद्यानी और अमालेकी और पूर्वी लोग उनके विरुद्ध चढ़ाई करते . . . मिद्यानियों के कारण इस्राएली बड़ी दुर्दशा में पड़ गए; तब इस्राएलियों ने यहोवा की दोहाई दी।”  न्यायियों 6:3, 6

जब हम असहाय होते हैं, तो हम सच्चा विश्वास सीखने के लिए सबसे उपयुक्त स्थिति में होते हैं। न्यायियों 6 के आरम्भ में इस्राएल के लोगों ने एक बार फिर “यहोवा की दृष्टि में बुरा किया” (न्यायियों 6:1)। उन्होंने एक बार फिर विद्रोह और पश्चाताप के बार-बार दोहराए जाने वाले चक्र में अपने आप को फँसा लिया था, जो सीखने में धीमे थे और सीखी हुई बातों को जल्दी भूल जाते थे कि उनकी कठिन परिस्थितियाँ प्रायः उनकी अवज्ञा के कारण होती थीं। अन्ततः, इस्राएलियों को यह समझने में संघर्ष करना पड़ा कि परमेश्वर उन्हें ऐसी स्थिति में आने देगा जहाँ उनकी एकमात्र प्रतिक्रिया दोहाई देना रह जाएगी, कि वह उन्हें अपने साथ, अपनी महिमा और उनकी भलाई के लिए सहभागिता में ला सके। वह उन लोगों के जीवन में अपने उद्देश्यों को पूरा करते हुए, जो अपने को असहाय जानते हैं, आज भी हमारे लिए ऐसा ही करता है। ये वे लोग हैं जो जानते हैं कि वे “मन के दीन हैं” हैं, न कि वे जो सोचते हैं कि वे अपने आप में पर्याप्त हैं, जिनके लिए यीशु ने राज्य की प्रतिज्ञा की है (मत्ती 5:3)।

हममें से कुछ लोग इस गलत धारणा को अपनाए बैठे हैं कि यदि हम केवल यीशु के पीछे चलते रहें तो सब कुछ सदैव ठीक होता जाएगा। अन्दर ही अन्दर हम यह सोचते रहते हैं कि परमेश्वर सदैव और तुरन्त कठिनाई को दूर करने के लिए हस्तक्षेप करेगा। जब परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर उस तरह या उस समय पर नहीं देता जैसे हम चाहते हैं, तो हम यह सोचने लगते हैं कि क्या हम अब भी भरोसा कर सकते हैं कि वह सब कुछ जानता है। हो सकता है कि आप आज ऐसी ही स्थिति में हैं।

सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में बार-बार परमेश्वर हमारी सहायता करने की प्रतिज्ञा करता है जब हम माँगते हैं: “न तो दिन को धूप से, और न रात को चाँदनी से तेरी कुछ हानि होगी। यहोवा सारी विपत्ति से तेरी रक्षा करेगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा। यहोवा तेरे आने जाने में तेरी रक्षा अब से लेकर सदा तक करता रहेगा” (भजन संहिता 121:6-8)। ये परमेश्वर के वचन के आश्वासन हैं। फिर भी जिस तरह से वह ऐसी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है, वह प्रायः पथरीले स्थानों में, अन्धेरी घाटियों के मध्य और असुविधाजनक प्रतीक्षा के कक्षों में होता है।

जब परमेश्वर ने न्यायियों की पुस्तक में अपने लोगों के लिए मध्यस्थी की, तो उसने उन्हें उनके पापों के विषय में समझाते हुए उन्हें अपने वचन की ओर फेरा। भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर के वचनों को बोलते हुए इस्राएलियों को वह याद दिलाया, जो उन्हें जानने की आवश्यकता थी, “मैं तुम को मिस्र में से ले आया, और दासत्व के घर से निकाल ले आया . . . मैंने तुमसे कहा, ‘मैं तुम्हारा परमेश्‍वर यहोवा हूँ . . .’ परन्तु तुमने मेरा कहना नहीं माना” (न्यायियों 6:8, 10)। परन्तु फिर कहानी में मोड़ आता है, जब हम परमेश्वर के न्याय की आशा करते हैं, तो हम पढ़ते हैं, “यहोवा के दूत ने दर्शन देकर” दया के इन शब्दों को कहा कि “यहोवा तेरे संग है” (न्यायियों 6:12)।

दिन-प्रतिदिन अपनी दया को प्रदर्शित करने के विपरीत यदि परमेश्वर हमें उस न्याय को हम पर आने देता जिसके हम योग्य हैं तो हम कहाँ होते? उसने इस्राएल के लोगों को वह नहीं दिया जिसके वे योग्य थे, न ही उसने आपके और मेरे साथ ऐसा किया है। परमेश्वर की दया और अनुग्रह का कोई अन्त नहीं है। परन्तु अपनी भलाई में वह प्रायः हमारे जीवन में कठिन परिस्थितियों का उपयोग करके हमें यह सिखाता है कि वह ही वह सब है जिसकी हमें आवश्यकता है। किसी भली वस्तु को हटाए जाने से पीड़ा होती है, परन्तु यह हमें परमेश्वर की दोहाई देने और उसमें अपना बल, शान्ति और आशा खोजने के लिए भी प्रेरित कर सकती है। सहायता के लिए उसे पुकारें, इस आशा के साथ कि जो परमेश्वर आपकी सुनता है वह वास्तव में जानता है कि सर्वोत्तम क्या है। प्रभु आपके साथ है!       

रोमियों 5:1-11

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