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9 April : केवळ देवाविषयी नव्हे, तर देवाशी बोला

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9 April : केवळ देवाविषयी नव्हे, तर देवाशी बोला
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मृत्युच्छायेच्या दरीतूनही मी जात असलो तरी कसल्याही अरिष्टाला भिणार नाहीं, कारण तू माझ्याबरोबर आहेस; तुझी आकडी व तुझी काठी मला धीर देतात. (स्तोत्र 23:4)

23 व्या स्तोत्राचे स्वरूप उद्बोधक आहे.

स्तोत्र 23:1-3 मध्ये दावीद देवाचा उल्लेख “तो” म्हणून करतो :

परमेश्वर माझा मेंढपाळ आहे;

तो मला हिरव्यागार कुरणात बसवतो;

तो मला संथ पाण्यावर नेतो.

तो माझा जीव ताजातवाना करतो;

मग वचन 4 आणि 5 मध्ये दावीद देवाला “तू“ म्हणून संबोधतोः

मी…कसल्याही अरिष्टाला भिणार नाहीं, कारण तू माझ्याबरोबर आहेस;

तुझी आकडी व तुझी काठी मला धीर देतात.

तू माझ्या शत्रूंच्या देखत माझ्यापुढे ताट वाढतोस;

तू माझ्या डोक्याला तेलाचा अभ्यंग करतोस;

मग वचन 6 मध्ये तो परत बदल करतो :

परमेश्वराच्या घरात मी चिरकाल राहीन.

या स्वरूपातून जो धडा आपण शिकू शकतो तो हा कीं देवाशी न बोलता देवाबद्दल फार वेळ न बोलणे चांगले आहे.

प्रत्येक ख्रिस्ती व्यक्ती कमीत कमी एक ईश्वरविज्ञानाचा हौशी पंडित आहे – म्हणजें, असा व्यक्ती जो देवाचे चारित्र्य आणि मार्ग समजून घेण्याचा प्रयत्न करतो आणि नंतर ते शब्दात मांडतो. जर आपण अल्प प्रमाणांत ईश्वरविज्ञानांत पारंगत नसलो तर आम्हीं देवाबद्दल एकमेकांना, किंवा देवाला काहींही बोलणार नाहीं आणि एकमेकांच्या विश्वासाला फारच कमी अशी खरी मदत होऊ.

पण स्तोत्र 23 आणि इतर स्तोत्रांमध्ये मी दाविदाकडून जे शिकलो ते हे आहे कीं मी माझ्या ईश्वरविज्ञानास प्रार्थनेची जोड द्यावी. देवाशी बोलण्याद्वारे मी वारंवार देवाबद्दलच्या माझ्या बोलण्यात व्यत्यय आणला पाहिजे.

“देव उदार आहे” या ईश्वरविज्ञानाच्या वाक्यामागे नाहीं, तर “देवा, तुझ्या औदार्याबद्दल धन्यवाद” हे प्रार्थनापूर्ण वाक्य यायला हवे.

“देव गौरवशाली आहे“ च्या टाचेवर, “मी तुझ्या गौरवाची उपासना करतो” हे आलें पाहिजे.

जर आपण आपल्या हृदयात देवाची वास्तविकता अनुभवत आहोत तसेच आपल्या डोक्यांत त्याचा विचार करत आहोत आणि आपल्या ओठांनी त्याचे वर्णन करत आहोत तर हे असेच असायला पाहिजे.

8 अप्रैल : परमेश्वर अपने लोगों को इंसाफ दिलाता है

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8 अप्रैल : परमेश्वर अपने लोगों को इंसाफ दिलाता है
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“जहाँ तक हो सके, तुम भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्‍वर के क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, ‘बदला लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूँगा।’ . . . बुराई से न हारो, परन्तु भलाई से बुराई को जीत लो।” रोमियों 12:18-19, 21

कल्पना करें कि एक बच्चा स्कूल से घर आता है और बहुत दुखी है, क्योंकि किसी अन्य बच्चे ने उसे कुछ बुरा कहा या उसके साथ कुछ बुरा किया है। एक ऐसी चोट के कारण, जो पहाड़ से भी बड़ी लग रही है, उसके लिए यह सोचना आसान होगा कि वह उस बच्चे से अब कभी बात नहीं करेगा जिसने उसे दुख पहुँचाया, या वह यह योजना बनाने लगे कि एक दिन मैं अपना बदला जरूर लूँगा।

लेकिन साथ ही यह भी कल्पना करें कि उसके माता-पिता उसे साधारण शब्दों में यह सन्देश लिखने का सुझाव देते हैं, जिसमें वह माफ़ी और दोस्ती, दोनों को प्रकट करता है, और अगले दिन, ऐसा करने के बाद, वह खुशी से खबर देता है: “मैंने यह कर दिया! मैं स्कूल में वह सन्देश लेकर गया और उससे काम बन गया। हम गले मिले, और हम दोस्त बन गए। यह शानदार था!”

पौलुस के इस आह्वान का पालन करने का अर्थ यही है, कि “जहाँ तक तुम्हारे ऊपर निर्भर हो, शान्ति से रहो।” कभी-कभी, शान्ति असम्भव महसूस हो सकती है; लेकिन कभी भी ऐसा न हो कि यह हमारी खुद की कमी के कारण हो। और यह इस कारण भी न हो क्योंकि हम बदला लेने की कोशिश कर रहे हैं या योजना बना रहे हैं। बदला लेना तो केवल परमेश्वर का काम है, उसके लोगों का नहीं।

सच कहूँ तो, हमारे अधिकांश विवाद वास्तव में बचपन में होने वाली घटनाओं के बड़े संस्करण होते हैं। अन्याय के सामने हमारी प्रतिक्रिया यह बताती है कि वास्तव में हमारा विश्वास क्या है। क्या हम “बुराई के बदले बुराई” (1 पतरस 3:9) करेंगे, जो दुनिया का तरीका है, या क्या हम मसीह के मन के अनुसार प्रतिक्रिया करेंगे?

हमारे सभी संघर्ष और चोटें उस दर्द के सामने कुछ नहीं हैं, जो यीशु ने सहा और महसूस किया। फिर भी जब यीशु का अपमान किया गया, तो उसने बदले में अपमान नहीं किया। जब उसने दुख उठाया, तो उसने शाप या धमकी नहीं दी। हमें यह बड़ी गलती नहीं करनी चाहिए कि हम यीशु की मुक्ति को तो स्वीकार कर लें, लेकिन उसके उदाहरण को नजरअंदाज कर दें, और अपने नाम को साफ करने, अपने इरादों का पक्ष रखने, और अपने आप को स्पष्ट करने में अपना जीवन बर्बाद कर दें, और हर गलती के लिए भुगतान और हर अपमान के लिए प्रतिशोध की तलाश करते रहें। स्वाभाविक रूप से हमारे साथ ऐसा ही होता है; और हमें उस रास्ते से छुटकारा पाने के लिए यह याद रखना चाहिए कि हम परमेश्वर पर विश्वास कर सकते हैं कि वह अपने लोगों को समय पर इंसाफ दिलाएगा। इंसाफ होगा, और यह हम नहीं करेंगे। तो क्या कोई है, जिससे आपको शान्ति से सम्पर्क करने की आवश्यकता है? क्या कोई है, जिसे आप अपने क्रोध का सामना करा रहे हैं, बजाय इसके कि आप उसे अपना प्रेम दिखाएँ? प्रिय मित्र, प्रतिशोध को परमेश्वर पर छोड़ दो, और बुराई को अच्छाई से हराओ। आज ही।

1 पतरस 2:18-25

8 April : सैतानास त्याचा पराजय जाणू द्या

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8 April : सैतानास त्याचा पराजय जाणू द्या
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सैतानाला अडवा, म्हणजें तो तुमच्यापासून पळून जाईल. (याकोब 4:7)

आपल्या दिवसात सैतान जितका वास्तविक दिसतो – अधिक प्रकटरित्या सक्रिय – ख्रिस्ताचा विजय त्याच्यावर विश्वास ठेवणाऱ्यांसाठीं अधिक मूल्यवान ठरेल.

नवा करार शिकवतो कीं जेव्हां ख्रिस्त मेला आणि पुन्हा जिवंत झाला तेव्हां सैतानाचा कायमचा निर्णायक पराभव करण्यात आला. त्याला मर्यादित स्वातंत्र्य देण्यात आले आहे, परंतु देवाच्या लोकांविरुद्ध त्याचे सामर्थ्य मोडकळीस आले आहे आणि त्याचा नाश निश्चित आहे.

  • सैतानाची कृत्ये नष्ट करण्यासाठींच देवाचा पुत्र प्रकट झाला(1 योहान 3:8)
  • ज्या अर्थी ‘मुले’ एकाच रक्तमांसाची होती त्या अर्थी तोही त्यांच्यासारखा रक्तमांसाचा झाला, हेतू हा कीं, मरणावर सत्ता गाजवणारा म्हणजें सैतान, ह्याला मरणाने शून्यवत करावे. (इब्री 2:14)
  • त्यानें सत्ताधीशांना व अधिकार्‍यांना नाडून त्यांच्याविरुद्ध वधस्तंभावर जयोत्सव करून त्यांचे उघडउघड प्रदर्शन केलें. (कलसै 2:15)

दुसऱ्या शब्दांत, निर्णायक वार कल्वरी येथे करण्यात आला. आणि एक दिवस येईल, जेव्हां सैतानाचा मर्यादित स्वातंत्र्याचा काळ देखील समाप्त होईल, प्रकटीकरण 20:10 “त्यांना ठकवणाऱ्या सैतानाला ‘अग्नीच्या’ व ‘गंधकाच्या’ सरोवरात टाकण्यात आले; …तेथे त्यांना रात्रंदिवस युगानुयुग पीडा भोगावी लागेल.”

आपल्यापैकीं जे येशू ख्रिस्ताचे अनुसरण करतात त्यांच्यासाठीं याचा काय अर्थ आहे?

  • म्हणून ख्रिस्त येशूमध्ये असलेल्यांना दंडाज्ञा नाहींच. [ते देहाप्रमाणे नाहीं तर आत्म्याप्रमाणे चालतात.] (रोमकरांस 8:1)
  • देवाच्या निवडलेल्या लोकांवर दोषारोप कोण ठेवील? देवच नीतिमान ठरवणारा आहे. (रोमकरांस 8:33)
  • कारण माझी खातरी आहे कीं, मरण, जीवन, देवदूत, अधिपती, वर्तमानकाळच्या गोष्टी, भविष्यकाळच्या गोष्टी, बले, उंची, खोली, किंवा दुसरी कोणतीही सृष्ट वस्तू, ख्रिस्त येशू आपला प्रभू ह्याच्यामध्ये देवाची आपल्यावरील जी प्रीति आहे तिच्यापासून आपल्याला विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं. (रोमकरांस 8:38–39)
  • जगात जो आहे त्याच्यापेक्षा तुमच्यात जो आहे तो मोठा आहे. (1 योहान 4:4)
  • त्याला त्यांनी कोकर्‍याच्या रक्तामुळे व आपल्या साक्षीच्या वचनामुळे जिंकले. (प्रकटीकरण 12:11)

म्हणून, “सैतानाचा प्रतिकार करा, आणि तो तुमच्यापासून पळून जाईल!“ त्याचा पराजय झाला आहे, आणि आम्हांला विजय देण्यात आला आहे. आता आमचे कार्य आहे त्या विजयात जगणे आणि सैतानाला त्याच्या पराभवाविषयी जाणीव करून देणें.

7 अप्रैल : तुम शुद्ध हो जाओगे

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7 अप्रैल : तुम शुद्ध हो जाओगे
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“तब एलीशा ने एक दूत से उसके पास यह कहला भेजा, ‘तू जाकर यरदन में सात बार डुबकी मार, तब तेरा शरीर ज्यों का त्यों हो जाएगा, और तू शुद्ध होगा।’ परन्तु नामान क्रोधित हो . . . चला गया!”

2 राजाओं 5:10-11

इतिहास और समाजशास्त्र का संक्षिप्त अध्ययन भी यह स्पष्ट कर देता है कि मनुष्यजाति अपने टूटे हुए संसार को ठीक करने में असमर्थ है। कुछ समय पहले, हमें यह बताया गया था कि लोग बुरे काम इसलिए करते हैं क्योंकि वे गरीब हैं; यदि हम भौतिक जरूरतों का समाधान करते हैं, तो हम बेहतर व्यवहार देख पाएँगे। अब, दुनिया के कुछ सबसे समृद्ध देशों में, कुछ समाजशास्त्री यह बताते हैं कि लालच, भ्रष्टाचार और हत्या का कारण अधिक भौतिक सम्पत्ति होना है। विशेषज्ञ और वैश्विक नेता इन बाहरी ताकतों के सामने हैरान हैं, और गलत जगहों पर उत्तर ढूँढ रहे हैं।

नामान को एक ऐसा रोग था, जिसने उसे दुखी किया हुआ था और उसके लिए इससे निपटना काफी कठिन था। किसी भी प्रकार का इलाज करने के लिए उसके पास सारे आवश्यक संसाधन मौजूद थे, और वह सम्भवतः किसी भी हद तक जाने को तैयार था। समस्या यह थी कि वह उत्तर को गलत जगहों पर खोज रहा था। उसका रुतबा, सम्पत्ति, और शाही सम्बन्ध उसे वह इलाज नहीं दिला पाए जो वह चाहता था, और जब वह राहत के लिए इस्राएल के राजा के पास गया, तो उसके अनुरोध से उसे निराशा ही हाथ लगी; राजा ने अपने कपड़े फाड़ डाले क्योंकि उसे पता था कि वह उसकी मदद नहीं कर सकता था (2 राजाओं 5:7)।

राजा की प्रतिक्रिया उसी प्रकार की प्रतिक्रिया थी जो शायद हमारे वैश्विक नेता सार्वजनिक सेवा में कुछ करने की कोशिश करते हुए देश-विदेश की यात्राओं के दौरान महसूस करते हैं। रात के समय शायद वे भी ऐसा ही महसूस करते होंगे कि हम भी अपने कपड़े फाड़ते हुए कहें, “मैं इस मामले को कैसे सुलझाऊँ और कुछ अन्तर लाऊँ? हम शान्ति कैसे ला सकते हैं? हम इलाज कैसे ला सकते हैं?”

जो काम राजा नहीं कर सका, वह परमेश्वर के भविष्यवक्ता ने कर दिया। लेकिन वह इलाज उस कोढ़ी के लिए अपमानजनक लग रहा था! नामान कुछ भव्य चाहता था—कुछ ऐसा जो उसकी उच्च स्थिति के अनुकूल हो और उसे आत्म-महत्त्व का एक झूठा अहसास दिलाए। वह सोचता था कि इलाज सरल या कम प्रभावशाली नहीं होना चाहिए। उसने एलीशा के उपाय को अपमानजनक और हास्यास्पद माना।

जहाँ वास्तविक कुष्ठ रोग को काफी हद तक समाप्त कर दिया गया है, वहीं हम सभी उस कुरूप और घातक बीमारी के साथ जी रहे हैं, जिसे पाप कहा जाता है। फिर भी बहुत से लोग इसके इलाज को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं, जैसे नामान तैयार नहीं था। हमारे पाप के एकमात्र और पर्याप्त इलाज के तौर पर मसीह के क्रूस पर मरने का सन्देश “यहूदियों के लिए ठोकर का कारण और अन्यजातियों के लिए मूर्खता है” (1 कुरिन्थियों 1:23) और यह आज भी बहुत से लोग ऐसा ही सोचते हैं। यहाँ तक कि विश्वासियों के लिए भी यह परीक्षा का कारण बन सकता है कि जब पाप के इलाज की बात आती है, तो हमें खुद कुछ करना होगा।हमें रोज़ाना उस इलाज के लिए अपनी आँखें खोलनी चाहिएँ, जिसकी हमें आवश्यकता है और विनम्रता में झुकना चाहिए, जैसा कि नामान ने अन्ततः किया (2 राजाओं 5:14)। क्योंकि ऐसा करने वाला व्यक्ति जान सकता है कि “तू शुद्ध होगा” अब अतीत की बात है, और वह खुशी से यह स्वीकार कर सकता है कि यीशु उसे देखता है और कहता है, “तुम शुद्ध हो” (यूहन्ना 13:10-11; 15:3)। आईने में देख कर यह न सोचें कि आपका इलाज आपके रुतबे में या आपके कामों में है; इसके बजाय, विश्वास की खिड़की से देखें, क्रूस को देखें, और जानें कि यह सब उसने किया है।

   2 राजाओं 5:1-14

7 April : आपल्या वैऱ्यांसाठीं प्रार्थना करणें म्हणजें काय

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7 April : आपल्या वैऱ्यांसाठीं प्रार्थना करणें म्हणजें काय
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तुम्हीं आपल्या वैऱ्यांवर प्रीति करा, आणि जे तुमचा छळ करतात (व तुमच्या पाठीस लागतात) त्यांच्यासाठीं प्रार्थना करा. (मत्तय 5:44)

आपल्या वैऱ्यांसाठीं प्रार्थना करणें ही प्रीतिच्या सर्वात गंभीर स्वरूपांपैकीं एक आहे, कारण याचा अर्थ असा आहे कीं त्यांच्यासोबत काहींतरी चांगले घडावे अशी तुम्हीं खरोखर इच्छा बाळगता.

तुमच्या वैऱ्याचे कल्याण व्हावे अशी वास्तविक इच्छा न बाळगता तुम्हीं आपल्या वैऱ्यांसाठीं चांगल्या गोष्टी करू शकता. परंतु त्यांच्यासाठीं प्रार्थना ही देवाच्या उपस्थितीत केलीं जाते जो तुमचे अंतःकरण जाणतो आणि प्रार्थना त्यांच्यासाठीं देवाजवळ मध्यस्थी करणे होय.

ती त्यांच्या परिवर्तनासाठीं असू शकते. ती त्यांच्या पश्चात्तापासाठीं असू शकते. कदाचित् त्यांना त्यांच्या मनातील वैरभावाची जाणीव होईल. असे असू शकते कीं त्यांची पापाची खालची घसरण थांबेल, जरी त्यासाठीं त्यांच्यावर रोग किंवा संकटे आली तरीही. परंतु येथे येशूच्या मनात असलेली प्रार्थना ही नेहमी त्यांच्या कल्याणासाठीं असते.

वधस्तंभावर टांगलेला असतांना येशूनें हेच केलें :

“तेव्हां येशू म्हणाला, “हे बापा, त्यांना क्षमा कर; कारण ते काय करतात हे त्यांना समजत नाहीं.” (लूक 23:34)

आणि स्तेफनसाला दगडमार होत असताना त्यानें हेच केलेः

मग गुडघे टेकून तो मोठ्याने ओरडला, “हे प्रभू, हे पाप त्यांच्याकडें मोजू नकोस.” (प्रेषितांची कृत्ये 7:60)

येशू आम्हास पाचारण करीत आहे कीं आम्हीं फक्त आपल्या शत्रूंसाठीं सत्कृत्ये करू नयेत, जसे त्यांस अभिवादन करणे आणि त्यांच्या गरजा पुरविण्यात त्यांची मदत करणे (मत्तय 5:47); तो आम्हास यासाठीं देखील पाचारण करीत आहे कीं आम्हीं त्यांचे सर्वोच्च कल्याण व्हावें अशी इच्छा धरावी, आणि त्या इच्छा प्रार्थनेमध्ये व्यक्त कराव्यात, तो वैरी कुठेही जवळपास नसतो तेव्हांहि.

आमच्यां अंतःकरणांची इच्छा त्यांचे तारण असले पाहिजे आणि ते स्वर्गात आमच्यांसोबत असतील अशी इच्छा धरली पाहिजे आणि त्यांना सार्वकालिक सुख मिळावें अशी इच्छा धरली पाहिजे. यहूदी लोकांसाठीं प्रेषित पौलाने केलेंल्या प्रार्थनेप्रमाणे प्रार्थना करण्याची देवानें आम्हास कृपा द्यावी, ज्यांपैकीं अनेकांनी पौलासाठीं जीवन जगणे अतिशय कठीण केलें होते :

त्यांच्याविषयी माझी मनीषा व देवाजवळ विनंती अशी आहे कीं, त्यांचे तारण व्हावे. (रोम 10:1)

6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान

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6 अप्रैल : ग्रहण करने योग्य बलिदान
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मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध, ग्रहण करने योग्य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।” फिलिप्पियों 4:18

यह आपके सोचने के लिए एक अद्‌भुत विचार है: आप परमेश्वर को प्रसन्न करने में सक्षम हैं।

यह एक चौंकाने वाला विचार है: कि हमारा सृष्टिकर्ता हमारे कार्यों से प्रसन्न होगा। फिर भी पवित्रशास्त्र हमें इस वास्तविकता को देखने के लिए प्रोत्साहित करता है। मसीही होने के नाते, हम अपने स्वर्गिक पिता की मुस्कान के तहत जीने का प्रयास करते हैं। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के लिए एक बाइबल में दी गई यह प्रेरणा एक बड़ा प्रोत्साहन है, “जैसे तुमने . . . परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखा है . . . वैसे ही और भी बढ़ते जाओ” (1 थिस्सलुनीकियों 4:1)—और इसे करने का एक तरीका हमारा उदारता से दिया जाने वाला दान है, जो परमेश्वर के समक्ष “ग्रहण करने योग्य बलिदान” है। पौलुस ने फिलिप्पी की कलीसिया के दान को पुराने नियम के पशु बलिदान के अभ्यास की शब्दावली में व्यक्त किया। जब पुराने नियम में परमेश्वर के लोग अपने होमबलि लाते थे, तो उन बलिदानों के साथ धूप भी जलाया जाता था। इसलिए इस बलिदान से एक आकर्षक सुगन्ध आती थी। एक भाव में, यह परमेश्वर की दृष्टि में बलिदान की मिठास और स्वीकृति का प्रतीक था। उसी तरह, परमेश्वर पहली शताब्दी में और अब इक्कीसवीं शताब्दी में अपने लोगों कहता है, जब तुम्हारा दान मेरे साथ मेल खाते हुए दिल से आता है, तो यह एक मधुर सुगन्ध उत्पन्न करता है, और तुम्हारा बलिदान मुझे प्रसन्न करता है।”

जब हम इस प्रकार के दान पर विचार करते हैं, तो हमें “बलिदान” शब्द को जल्दी से अनदेखा नहीं कर देना चाहिए। बलिदानी दान हमेशा उदार दान के समान नहीं होता। हमारे लिए यह सम्भव है कि हम उदार हों—जैसा कि सच में कई विश्वासियों होते हैं—बिना इसके कि हमारे जीवन या परिस्थितियों पर इसका कोई वास्तविक प्रभाव पड़े।

इसी बिन्दु को स्पष्ट करते हुए, यीशु ने अपने शिष्यों का ध्यान एक गरीब विधवा की ओर आकर्षित किया, जो मन्दिर में अपनी दशमाँश राशि दे रही थी। जब उसने देखा कि यह महिला ताम्बे के दो सिक्के, जो कुछ भी मूल्य नहीं रखते थे, खजाने में डाल रही थी तो उसने उसके आस-पास खड़े अमीर लोगों के उपहारों से उसकी तुलना करते हुए कहा, “इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है। क्योंकि उन सबने अपनी-अपनी बढ़ती में से दान में कुछ डाला है, परन्तु इसने अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका डाल दी है” (लूका 21:2-4)। अमीर लोगों का दान उदार था; परन्तु विधवा का दान बलिदानी था। उसने दान देने के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। और उसके प्रभु ने देखा और जो उसने देखा उससे प्रसन्न हुआ।

हम स्वभाव से बलिदानी दाता नहीं हैं। लेकिन पूरी मसीही यात्रा—प्राप्ति और दान में, देखभाल और साझेदारी में—आरम्भ से लेकर अन्त तक कृपा से भरी हुई है। जब हम एक ऐसे दिल से बलिदानी रूप में देते हैं, जो परमेश्वर को प्रसन्न करने की इच्छा करता है, तो वह वचन देता है कि वह “अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है, तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा” (फिलिप्पियों 4:19)। इसका भाव यह है कि हम मनन करें कि परमेश्वर ने हमें क्या दिया है, और परमेश्वर हमें क्या दे रहा है, और परमेश्वर हमें क्या देगा। जब हम ऐसा करते हैं, तो इससे हमारे दिल खुल जाते हैं और हम बलिदानी रूप से और खुशी से देने की शक्ति पाते हैं। और जब हम ऐसा करते हैं, तो हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।

फिलिप्पियों का व्यवहार, और उनके खाते का विवरण, यह दिखाता है कि वे वास्तव में इस पर विश्वास करते थे। आपके विवरण कितने हद तक इस विश्वास को दर्शाते हैं?

1 थिस्सलुनीकियों 4:1-12

6 April : येशूची आठवण ठेवण्याचे दोन मार्ग

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6 April : येशूची आठवण ठेवण्याचे दोन मार्ग
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माझ्या सुवार्तेप्रमाणे मेलेल्यांतून उठवलेला, दाविदाच्या संतानांतील येशू ख्रिस्त, ह्याची आठवण ठेव. (2 तीमथ्य 2:8)

पौल येशूची आठवण ठेवण्याच्या दोन विशिष्ट मार्गांचा उल्लेख करतो : मेलेल्यांतून जिवंत झालेंला म्हणून त्याची आठवण ठेवा. आणि दाविदाचे संतान म्हणून त्याची आठवण ठेवा. येशूविषयी या दोन गोष्टी का?

कारण तो मेलेल्यांतून उठला आहे म्हणून तो जिवंत आहे आणि मरणावर विजयी झाला आहे – यात आमच्यां मृत्यूचाही समावेश आहे! ”ज्याने येशूला मेलेल्यांतून उठवले, त्याचा आत्मा जर तुमच्यामध्ये वसती करतो, तर ज्याने ख्रिस्त येशूला मेलेल्यांतून उठवले तो तुमच्यामध्ये वसती करणाऱ्या आपल्या आत्म्याने तुमची मर्त्य शरीरेही जिवंत करील“ (रोम 8:11).

याचा अर्थ हा आहे कीं दुःखसहन कितीही गंभीर का होईना, तरीही या पृथ्वीवर सर्वात वाईट गोष्ट जी होऊ शकते ती म्हणजें तुम्हास मारले जाणें. आणि येशूनें त्या शत्रूची नांगी काढून टाकली आहे. तो जिवंत आहे. आणि तुम्हीं जिवंत राहाल. ”जे शरीराचा घात करतात पण आत्म्याचा घात करण्यास समर्थ नाहींत त्यांना भिऊ नका“ (मत्तय 10:28).

पण त्याहीपेक्षा अधिक म्हणजें, येशूचे पुनरुत्थान आकस्मिक पुनरुत्थान नव्हते. ते दाविदाच्या पुत्राचे पुनरुत्थान होते. “मेलेल्यांतून उठवलेला, दाविदाच्या संतानांतील येशू ख्रिस्त, ह्याची आठवण ठेव.” पौल असे का म्हणतो?

कारण प्रत्येक यहूदी व्यक्तीला माहीत होते कीं त्याचा अर्थ काय आहे. त्याचा अर्थ हा आहे कीं येशू हा तो ख्रिस्त, म्हणजें मशीहा आहे (योहान 7:42). आणि याचा अर्थ हा होता कीं हे पुनरुत्थान एका सनातन राजाचे पुनरुत्थान होते. येशूची आई, मरीया हिला देवदूत काय बोलला तें ऐका :

”पाहा, तू गरोदर राहशील व तुला पुत्र होईल. तू त्याचे नाव येशू ठेव. तो थोर होईल व त्याला परात्पराचा पुत्र म्हणतील; आणि प्रभू देव त्याला त्याचा पूर्वज दावीद ह्याचे राजासन देईल; आणि तो याकोबाच्या घराण्यावर ‘युगानुयुग राज्य करील’, व त्याच्या राज्याचा अंत होणार नाहीं“ (लूक 1:31-33).

म्हणून, येशूची आठवण ठेवा, ज्याची तुम्हीं सेवा करता, आणि ज्याच्यासाठीं तुम्हीं दुःख सोसता. तो फक्त मेलेल्यांतून जिवंत झालेंला नाहीं, तर तो राजा म्हणून जिवंत आहे जो सर्वकाळ राज्य करील – त्याच्या राज्याचा अंत नाहीं. ते तुम्हांला काहींही करेनात, तुम्हांला भिण्याची गरज नाहीं. तुम्हीं पुन्हा जिवंत केलें जाल. आणि तुम्हीं त्याच्यासोबत राज्य कराल.

5 अप्रैल : परमेश्वर का शासन और आशीर्वाद

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5 अप्रैल : परमेश्वर का शासन और आशीर्वाद
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“इसलिए अब यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, और मेरी वाचा का पालन करोगे, तो सब लोगों में से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे; समस्त पृथ्वी तो मेरी है।” निर्गमन 19:5

आज्ञाकारिता का महत्त्व आज की दुनिया में कम हो गया है, लेकिन यह मसीही जीवन का केन्द्र है।

यह असामान्य नहीं है कि हम अच्छे से अच्छे लोगों को भी अधिकार के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त करते हुए सुनें, क्योंकि हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जो अधिकार-विरोधी है। एक समय में कलीसिया में पवित्र माना जाने वाला पवित्रशास्त्र का अधिकार आज कुछ लोगों के मन में सहजता से नहीं बसता। लेकिन जब हम अपनी शर्तों पर और परमेश्वर के अधिकार से हटकर स्वतन्त्रता पाने का प्रयास करते हैं, तो हम स्वयं को उसके आशीर्वाद से भी वंचित कर लेते हैं।

जब आदम और हव्वा ने अदन की वाटिका में परमेश्वर के नियम का उल्लंघन किया, तो वे उससे अलग हो गए; उन्होंने उसकी उपस्थिति के आशीर्वाद को खो दिया। परमेश्वर की व्यवस्था को अस्वीकार करने से हम हमेशा, और हमेशा ही, अपने सृष्टिकर्ता से दूर हो जाएँगे और उसके आशीर्वाद को खो बैठेंगे। इसके विपरीत, परमेश्वर के शासन की पुनःस्थापना हमेशा उस संगति और सहभागिता का आशीर्वाद लाती है, जिसे परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए बनाया था।

परमेश्वर के शासन और आशीर्वाद की यह प्रतिज्ञा इस्राएल के इतिहास में उसकी व्यवस्था के दान में पूरी हुई। इस्राएलियों की ओर से व्यवस्था के प्रति आज्ञाकारिता उनके लिए उद्धार प्राप्त करने का पुरज़ोर प्रयास नहीं थी; बल्कि यह उस उद्धार के प्रति एक प्रतिक्रिया थी जो पहले ही उनके लिए पूरा हो चुका था। परमेश्वर पहले अपने लोगों के पास पहुँचा और उन्हें थाम लिया, उन्हें मिस्र की दासता से छुड़ाया—और उसके बाद उन्हें व्यवस्था दी गई।

दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने व्यवस्था को उद्धार के साधन के रूप में या उसके लोगों में शामिल होने का मार्ग बनाने के लिए नहीं दिया। इसके बजाय, इस्राएलियों को छुड़ाने के बाद उसने उन्हें अपनी कृपा का माध्यम प्रदान किया ताकि वे यह जान सकें कि उसके शासन के अधीन कैसे जीना है और उसके आशीर्वाद का पूरा आनन्द कैसे लेना है। यदि इस सिद्धान्त को उल्टा कर दिया जाए, तो सब कुछ गलत हो जाता है। हम कर्मकाण्डवाद की कठोर पकड़ में अपना जीवन बिताएँगे, हर समय यह सोचते हुए कि हमारे प्रयास हमें परमेश्वर के सामने सही स्थिति में ला सकते हैं। लेकिन साथ ही, यदि हम यह भूल जाते हैं कि परमेश्वर ने हमें इसलिए बचाया ताकि हम उसके शासन के अधीन जीवन का आनन्द ले सकें, और हम जब चाहें उसकी व्यवस्थाओं को अनदेखा करना जारी रखते हैं, तो हम अपने जीवन में यह सोच-सोचकर परेशान होते रहेंगे कि उसके आशीर्वाद हमसे दूर क्यों रहते हैं।

परमेश्वर की व्यवस्था उद्धार नहीं देती, लेकिन यह “सम्पूर्ण व्यवस्था है, स्वतन्त्रता की व्यवस्था,” और जो इसका पालन करता है, वह “अपने काम में आशीर्वाद पाएगा” (याकूब 1:25)। परमेश्वर द्वारा पाप से छुड़ाए गए लोगों के रूप में हमें उसके उद्धार का उत्तर हर्षित आज्ञाकारिता में चलने के द्वारा देना है।

जब हम प्रभु के साथ चलते हैं

उसके वचन के प्रकाश में,

तो कैसी महिमा हमारे मार्ग पर पड़ती है!

जब हम उसकी भली इच्छा पूरी करते हैं,

वह हमारे साथ बना रहता है,

और उन सब के साथ जो विश्वास करेंगे और आज्ञापालन करेंगे।[1]

भजन 119:49-64

5 April : न्यायसमयाची पुस्तके

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5 April : न्यायसमयाची पुस्तके
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‘ज्या कोणाची’ नावे जगाच्या स्थापनेपासून ‘वधलेल्या कोकऱ्याजवळील जीवनाच्या पुस्तकात लिहिलेली’ नाहीं असे पृथ्वीवर राहणारे सर्व जण त्या श्वापदाला नमन करतील. (प्रकटीकरण 13:8)

तारण त्या सर्वांसाठीं प्राप्त करून तें सुरक्षित ठेवण्यात आले आहे ज्यांची नावे जीवनाच्या पुस्तकात लिहिलेली आहेत.

जीवनाच्या पुस्तकात नावे लिहिण्यात आल्यामुळे आमचे तारण सुरक्षित होते याचे कारण हे आहे कीं या पुस्तकास वधलेल्या कोकऱ्याजवळील जीवनाचे पुस्तक असे म्हटलेंले आहे. या पुस्तकात ज्यांची नावे लिहिलेली आहेत ते त्यांच्या कृत्यांच्या आधारे तारण पावलेली नाहींत. ते तारण पावले ते ख्रिस्त वधिला गेला म्हणून.

पण प्रकटीकरण 20:12 या वचनात योहान म्हणतो, “मग मृत झालेंल्या लहानथोरांना मी (देवाच्या) राजासनापुढे उभे राहिलेले पाहिले. त्या वेळी ‘पुस्तके उघडली गेली;’ तेव्हां दुसरे एक ‘पुस्तक’ उघडले गेले ते ‘जीवनाचे’ होते; आणि त्या पुस्तकामध्ये जे लिहिले होते त्यावरून मृतांचा न्याय ‘ज्यांच्या-त्यांच्या कृत्यांप्रमाणे’ ठरवण्यात आला.” जर आमचे तारण ख्रिस्त वधिला गेल्यामुळे झालें आहे, तर मग, “पुस्तकात” समाविष्ट आमच्यां जीवनांचा लेख आमच्यां न्यायाचा भाग कसा आहे?

उत्तर हे आहे कीं, आमच्यां कृत्यांचा लेख नोंदविणाऱ्या पुस्तकांत आम्हीं ख्रिस्ताचे असल्याचा पुरेसे पुरावा आहेत कीं ते आमच्यां विश्वासाची आणि ख्रिस्तासोबत आमच्यां ऐक्याची सार्वजनिक पुष्टी म्हणून कार्य करतात.

प्रकटीकरण 21:27 चा विचार करा, “तिच्यात कोणत्याही निषिद्ध गोष्टी’ आणि अमंगळपणा व असत्य आचरणारा इसम ह्यांचा ‘प्रवेश होणारच नाहीं’ तर कोकऱ्याच्या ‘जीवनाच्या पुस्तकात लिहिलेल्या लोकांचा’ मात्र होईल.”  येथे “जीवनाच्या पुस्तकात” लिहिले जाण्याचा परिणाम फक्त नाश न पावणे हा नाहीं, तर घृणास्पद, पापमय वर्तन न करणे हा देखील आहे.

उदाहरणार्थ, वधस्तंभावरील चोराचा विचार करा. येशूनें म्हटलें कीं तो सुखलोकात प्रवेश करील (लूक 23:43). पण जेव्हां पुस्तके उघडली जातील तेव्हां त्याचा न्याय कसा होईल? त्याच्या जीवनाच्या 99.9 टक्केपेक्षा जास्त भाग पाप असेल.

त्याचे तारण ख्रिस्ताच्या रक्ताद्वारे सुरक्षित केलें जाईल. त्याचे नाव वध केलेंल्या कोंकराच्या पुस्तकात लिहिलेले असेल.

मग देव पुस्तके उघडील. सर्वात आधी, तो त्याच्या पुत्राच्या श्रेष्ठ बलिदानाचा गौरव करण्यासाठीं पापाच्या आजीवन अभिलेखाचा उपयोग करील. दुसरे म्हणजें, देव शेवटचे पुस्तक वाचेल, जेथे वधस्तंभावर चोराचे नाट्यपूर्ण परिवर्तन नमूद करण्यात आले आहे. त्याच्या जीवनातील देवाचे हे कार्य, जे पुस्तकांत नमूद करण्यात आले आहे, त्या चोराच्या विश्वासाची आणि ख्रिस्तामधील ऐक्याची त्या शेवटल्या दिवशी सार्वजनिक पुष्टी ठरेल. आणि त्याच्या तारणाचा आधार ख्रिस्त असेल, त्याची कार्ये नाहींत.

म्हणून, जेव्हां मी म्हणतो कीं पुस्तकांत जे लिहिलेले आहे ते आमच्यां विश्वासाची आणि ख्रिस्तामधील ऐक्याची सार्वजनिक पुष्टी आहे, तेव्हां माझ्या म्हणण्याचा अर्थ हा आहे नाहीं कीं त्या अभिलेखात दुष्कृत्यांपेक्षा सत्कृत्यांचा अधिक समावेश असेल.

तर माझ्या म्हणण्याचा अर्थ हा आहे कीं तेथे विश्वासाची वास्तविकता दाखविणारे ख्रिस्तामधील जीवन नमूद केलें असेल – नवीन जीवनाची वास्तविकता आणि ख्रिस्तासोबत ऐक्य. ख्रिस्ती म्हणून प्रत्येक दिवस अशाच प्रकारे जगतो : या विश्वासाने कीं आमची दंडाज्ञा नाहींसी झालीं आहे (रोम 8:1), आणि आमचे नाव जीवनाच्या पुस्तकात आहे, आणि ज्याने आमच्यांठायीं चांगले कार्य सुरू केलें ते तो ख्रिस्ताच्या दिवसापर्यन्त पूर्णत्वास नेईल.

4 अप्रैल : पवित्रशास्त्र में मसीह को देखना

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4 अप्रैल : पवित्रशास्त्र में मसीह को देखना
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“हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो : यीशु नासरी . . .” प्रेरितों 2:22

हर गुजरते वर्ष के साथ, मैंने महसूस किया है कि आधी रात को जागना मेरी एक आदत हो गई है। जब आधी रात को मैं नींद से उठता हूँ, तो अक्सर चिन्ता मेरे विचारों में भर जाती है—और एक पास्टर के रूप में मेरी एक चिन्ता यह भी है: क्या मैं मसीह को सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के अन्दर और पवित्रशास्त्र के द्वारा देख रहा हूँ और सिखा रहा हूँ?

यह सम्भव है कि हम बाइबल का अध्ययन मसीह को अपने केन्द्र में रखे बिना करें। हम अपने अध्ययन के व्यवस्थित तरीके से करने पर गर्व कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करते हुए हम इस खतरे में पड़ सकते हैं कि हम अपनी पद्धति पर इतने मोहित हो जाएँ कि हम मसीह को देखने में विफल हो जाएँ।

प्रेरितों के काम 2 में, जब पतरस भीड़ को सम्बोधित करता है, तो वह कहता है, “हे इस्राएलियो, ये बातें सुनो।” (उसकी आवाज़ में अधिकार स्पष्ट दिखता है, है न?) और फिर ध्यान दें कि उसके बाद वह क्या कहता है: “यीशु नासरी . . .।” पतरस अपनी बात लोगों की आवश्यकता पर जोर देते हुए या सुसमाचार के व्यावहारिक लाभ प्रस्तुत करते हुए आरम्भ नहीं करता, और न ही वह किसी प्रकार की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझाने या प्रस्तावों की शृंखला पेश करने का प्रयास करता है। इसके बजाय, वह यह बताता है कि यीशु कौन हैं, वह क्यों आया, और उसने क्या किया।

पतरस की शिक्षा दिल तक पहुँचने वाली, अनुग्रह में जमी हुई और मसीह पर केन्द्रित थी। इस प्रकार की शिक्षा के लिए एक कीमत चुकानी पड़ती है—एक ऐसी कीमत जिसे हर कोई चुकाने के लिए तैयार नहीं होता। दिन-प्रतिदिन के मुद्दों पर चर्चा करना मसीह को गहराई से जानने और साझा करने की तुलना में कहीं अधिक आसान है। कभी-कभी उन कलीसियाओं में भी, जो बाइबल को अत्यन्त सम्मान देती हैं, हम अपनी पसंदीदा सैद्धान्तिक शिक्षाओं के बारे में बात करना अधिक सहज समझते हैं, बजाय उस मसीह के, जो अक्सर हमें असहज कर देता है और हमारे जीवन के तरीकों को चुनौती देता है। लेकिन कठिन कार्य करना ही सही कार्य है। क्या यह उर्जा की भयानक बर्बादी नहीं है कि हम हर चीज़ में अन्तर्दृष्टि प्राप्त करें या मार्गदर्शन दें, परन्तु यीशु के उद्धार की कहानी पर कोई बात ही न करें?

पवित्रशास्त्र का केन्द्र और उसकी पूर्ति मसीह में है। इस बात का असली परीक्षण कि परमेश्वर का वचन हमारे भीतर कितनी गहराई से निवास करता है, यह नहीं है कि हम कहानी को कितनी अच्छी तरह से व्यक्त कर सकते हैं, बल्कि यह है कि हम पवित्रशास्त्र में यीशु को कितना देख पाते हैं। मसीह केवल मसीही विश्वास का आरम्भ नहीं हैं, बल्कि वह उसका पूर्ण योग है। हमारा लक्ष्य मसीह में गहराई तक जाना होना चाहिए, उससे परे आगे बढ़ जाना नहीं।

शायद जब भी हम अपनी बाइबल के पृष्ठ खोलें, तो हमारी प्रार्थना यह होनी चाहिए:

यीशु के बारे में और अधिक जानूँ,

उसके अनुग्रह को दूसरों को दिखाऊँ;

उसके उद्धार की परिपूर्णता को और अधिक देखूँ,

उसके प्रेम को और समझूँ, जिसने मेरे लिए प्राण दिए।

यीशु के बारे में और अधिक सीखूँ,

उसकी पवित्र इच्छा को और अधिक पहचानूँ;

परमेश्वर की आत्मा, मेरे शिक्षक बनो,

मुझे मसीह के विषय में सिखाओ।[1]

 लूका 24:13-35