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14 April : त्याच्या प्रसिद्धीसाठीं (गौरवासाठीं) प्रार्थना करा

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14 April : त्याच्या प्रसिद्धीसाठीं (गौरवासाठीं) प्रार्थना करा
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“ह्यास्तव तुम्हीं ह्या प्रकारे प्रार्थना करा: ‘हे आमच्यां स्वर्गातील पित्या, तुझे नाव पवित्र मानले जावो.” (मत्तय 6:9).

पवित्र शास्त्र अनेकदा म्हणते कीं देव “त्याच्या नावासाठीं” कार्य करतो.

  • तो आपल्या नावासाठीं मला नीतिमार्गांनी चालवतो. (स्तोत्र  23:3)
  • हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर. (स्तोत्र  25:11)
  • त्यानें आपल्या नावासाठीं त्यांचे तारण केलें. (स्तोत्र 106:8)
  • माझ्या नामाप्रीत्यर्थ मी आपला क्रोध लांबणीवर टाकला. (यशया 48:9)
  • कारण त्याच्या नावामुळे तुमच्या पापांची तुम्हांला क्षमा झालीं आहे. (1 योहान  2:12)

जर तुम्हीं विचाराल कीं त्या सर्व वाक्यांत कोणती गोष्ट परमेश्वराचे अंतःकरण द्रवित करीत आहेत (आणि अनेकांस ते आवडतात), तर उत्तर हे आहे कीं देव यांत प्रसन्न होतो कीं त्याचे नाव कळविले जावे आणि त्याचा आदर केला जावा.

पहिली आणि सर्वात महत्त्वाची प्रार्थना जी करता येऊ शकते ती आहे, “तुझे नाव पवित्र मानले जावो.” मला असे वाटत होते कीं ही एक प्रशंसा आहे. जसे, “हालेलुया! प्रभूचे नाव पवित्र आहे!” पण ती प्रशंसा नाहीं. ती एक विनंती आहे. वास्तविक एक प्रकारचा आदेश किंवा आज्ञा. प्रभु, असेंच होऊं दे! ते पवित्र मानिले जाऊं दे. तुझे नाव पवित्र मानले जावो. ही माझी विनंती, माझी प्रार्थना आहे. मी यासाठीं तुला आग्रह करीत आहे: लोकांना तुझे नाव पवित्र मानावयास प्रवृत्त कर. मला तुझे नाव पवित्र मानावयास उत्तेजन दे!

जास्तीत जास्त लोकांनी त्याचे नाव “पवित्र” मानावे हे देवाला आवडते. म्हणूनच त्याचा पुत्र ख्रिस्ती विश्वासणाऱ्यांस त्यासाठीं प्रार्थना करावयास शिकवतो. वस्तुतः, येशू हिला सर्वात पहिली आणि सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना ठरवतो. कारण हा पित्याचा प्रथम आणि सर्वांत मोठा आवेश आहे.

“प्रभु, अधिकाधिक लोकांना तुझे नाव पवित्र मानण्याची प्रेरणा दे,” अर्थात, तुझ्या नावाचा आदर, प्रशंसा, मान, विचार, सन्मान, भक्ती, आणि स्तुती होऊ दे. अधिकाधिक लोकांनी ते करावें! म्हणून, आपण पाहू शकता कीं मुळांत ही एक सुवार्तिक प्रार्थना आहे.

13 अप्रैल : अतुलनीय विनम्रता

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13 अप्रैल : अतुलनीय विनम्रता
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“यीशु काँटों का मुकुट और बैंजनी वस्त्र पहने हुए बाहर निकला; और पिलातुस ने उनसे कहा, ‘देखो, यह पुरुष!’” यूहन्ना 19:5

वहाँ खड़ा था मसीह—सिर काँटों के मुकुट से छिदा हुआ, किसी दूसरे के कपड़े पहने हुए, हाथ में एक सरकण्डे की छड़ी पकड़े हुए, सब उसके राजा होने का मजाक उड़ाने के लिए—और रोमी राज्यपाल पिलातुस ने हँसी उड़ाते हुए भीड़ से कहा, “देखो, यह पुरुष!” जबकि वह शब्द तिरस्कार के साथ कहे गए थे, परन्तु विडम्बना यह है कि वे उपयुक्त थे; वहाँ खड़ा था संसार का उद्धारकर्ता, जो अतुलनीय विनम्रता में सुसज्जित था, और संसार के लिए एक अपार प्रेम से सजा हुआ था।

हमारे पास मसीह के उदाहरण से बहुत कुछ सीखने को है। जब विनम्र राजा ने शाही अपमान और मृत्यु से पहले कोड़ों की क्रूर मार की “पूर्व-मृत्यु” को सहन किया, उसने अपनी आत्म-रक्षा में एक भी शब्द नहीं कहा। और वे उसे किस लिए दोषी ठहरा रहे थे? 18 साल से अपंग एक महिला को चंगा करने के लिए (लूका 13:10-13)? नाईन की विधवा के मरे हुए बेटे को जीवित करने के लिए (लूका 7:11-17)? लाजर को जीवित करके कब्र से बाहर लाने के लिए (यूहन्ना 11:1-44)? बच्चों को अपनी गोदी में बैठाने और अपने शिष्यों को यह समझाने के लिए कि “स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है” (मत्ती 19:14)? मसीह के अभियोगी कैसे इस नतीजे पर पहुँचे कि वे उसे इस तरह अपमानित करें? इसका कोई आधार नहीं था। फिर भी उन्होंने ऐसा किया।

जब हमारा विनम्र प्रभु अपने मुकद्दमे के दौरान चुप रहा, तो पिलातुस को ठेस लगी और उसने अपमानित महसूस किया। यहाँ एक बड़ी विडम्बना है, क्योंकि यह रोमी राज्यपाल समस्त सृष्टि के राजा को अपमानित करने का प्रयास कर रहा था! और फिर भी, उस राजा ने अपने अधिकार को साबित करने या अपनी जान बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया। उसने विनम्रता से एक अन्यायपूर्ण मुकद्दमा सहा, जब सवाल किए गए तो सत्य बोला, और हमारे स्थान पर मृत्यु को गले लगाने के लिए आगे बढ़ा।

मैं खुद से पूछता हूँ: क्या मैं सच में उस पुरुष को देखता हूँ, जो पिलातुस के सामने खड़ा है, जो भीड़ के सामने खड़ा है—जो मेरे  सामने खड़ा है? यह कोई असहाय व्यक्ति नहीं है, जो अपनी मदद आप नहीं कर सकता। यह तो देहधारी परमेश्वर है।

क्या मैं सचमुच समझता हूँ कि वह इस अपमानित मार्ग पर क्यों चला? “ओह, वह प्रेम जिसने उद्धार की योजना बनाई”[1]—आपके और मेरे लिए प्रेम और उद्धार की योजना! दो हजार साल पहले, वहाँ रोम राज्यपाल के महल के बाहर एक दुखद दृश्य खड़ा था, और इसका एक कारण यह था कि यीशु की आँखों के सामने हमारे नाम थे—हमारे नाम जिन्हें उसने अपने हाथों की हथेलियों पर उकेरा था, जिन हाथों को निर्दयी कीलें चीरने वाली थीं (यशायाह 49:16 देखें)।

हम कभी भी उस बगावती भीड़ की तरह न बनें, जो मसीह की विनम्रता का मजाक उड़ाती है, न ही पिलातुस की तरह बनें, जो मसीह प्रभावित करना चाहता है। इसके बजाय, इस पुरुष को उसकी सम्पूर्ण विनम्रता में देखो—यह सरकण्डा पकड़े हुए, यह मुकुट धारण किए हुए, यह वस्त्र पहने हुए, उस क्रूस पर लटके हुए—और देखो उसे आह्वान करते हुए। इस पुरुष को देखो, और बिना किसी सन्देह के जान लो कि आपके लिए उसका प्रेम कभी समाप्त नहीं होगा।

यशायाह 52:13 – 53:12

13 April : तुमच्या अश्रूंना बोला

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13 April : तुमच्या अश्रूंना बोला
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“जे अश्रूपूर्ण नेत्रांनी पेरणी करतात ते हर्षाने कापणी करतील. जो पेरणीसाठीं बी घेऊन रडत बाहेर पडतो तो खातरीने आनंद करीत आपल्या पेंढ्या घेऊन येईल.” (स्तोत्र 126:5-6).

बी पेरण्याविषयी दुःखद काहींही नाहीं. त्यासाठीं कापणीपेक्षा जास्त श्रम लागत नाहीं. दिवस सुंदर असू शकतात. कापणीसाठीं मोठी आशा असू शकते.

तरीही स्तोत्र “अश्रूपूर्ण नेत्रांनी” पेरणी करण्याविषयी सांगते. ते म्हणते कीं कोणीतरी “पेरणीसाठीं बी घेऊन रडत बाहेर पडतो.” तर, ते का रडत आहेत?

मला वाटते कीं त्याचे कारण हे नाहीं कीं पेरणी करणे दुःखाचे आहे किंवा पेरणी कठीण आहे. मला असे वाटते कीं रडण्याचा संबंध पेरणीशी मुळीच नाहीं. पेरणी हे फक्त काम आहे जे आपल्याला तेव्हांही केलें पाहिजे जेव्हां आमच्यां जीवनात रडवणाऱ्या गोष्टी असतांत.

आमचे दुःख करणे समाप्त होईपर्यंत किंवा आमच्यां सर्व समस्यांचे निवारण केलें जाईपर्यंत पिके थांबणार नाहींत. जर आम्हांला पुढच्या हिवाळ्यात खायचे असेल, तर आम्हांला शेतात जावे लागेल आणि बी पेरावे लागेल, आम्हीं रडत असू वा नसू.

जर तुम्हीं असे करता, तर स्तोत्राचे अभिवचन हे आहे कीं तुम्हीं “हर्षाने कापणी कराल.” तुम्हीं “आनंद करीत आपल्या पेंढ्या घेऊन” घरी याल. यासाठीं नाहीं कीं पेरणीच्या आसवांमुळे कापणीचा आनंद उत्पन्न होतो, तर निव्वळ पेरणीमुळे कापणी होते, आणि जरी तुमचे अश्रू तुम्हांला पेरणी सोडून देण्यास मोहात पाडत असले, तरीही तुम्हांला हे लक्षात ठेवण्याची गरज आहे.

तर, धडा हा आहेः जेव्हां साधी, सरळ कामे करावयाची असतात, आणि तुमचे अंतःकरण दुःखाने भरलेले असेल, आणि तुमची आसवे सहज वाहत असतील, तेव्हां पुढे जा आणि अश्रूंसोबतच कामे करा. वास्तववादी बना. आपल्या अश्रूंना म्हणा, “अश्रूंनो, मला तुमची जाणीव आहे. तुम्हीं माझ्यात जीवनाचा त्याग करण्याची इच्छा उत्पन्न करता. पण शेतात पेरणी करावयाची आहे (भांडी धुवायची, गाडी दुरूस्त करावयाची, उपदेश लिहावयाचा आहे).”

मग, देवाच्या वचनाच्या आधारे म्हणा, “अश्रूंनो, मला माहित आहे कीं तुम्हीं सदाकाळ टिकणार नाहीं. मी माझे काम (अश्रू आणि सर्व) करतो फक्त ही वस्तुस्थिती शेवटी आशीर्वादाची कापणी आणील. म्हणून, पुढे जा आणि जरूरी असेल तर वाहत रहा. पण माझा विश्वास आहे – जरी मला ते अद्याप दिसत नसले किंवा ते पूर्णपणे जाणवत नसले – तरी माझा विश्वास आहे कीं माझ्या पेरणीचे साधे काम कापणीच्या पेढ्या घेऊन येईल. आणि माझे अश्रू आनंदात बदलतील.”

12 अप्रैल : आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

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12 अप्रैल : आप यीशु के साथ क्या करेंगे?
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“मेरा राज्य इस संसार का नहीं . . . तू कहता है कि मैं राजा हूँ। मैंने इसलिए जन्म लिया और इसलिए संसार में आया हूँ कि सत्य की गवाही दूँ। जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है।” यूहन्ना 18:36-37

आप यीशु के साथ क्या करेंगे? उस पहले गुड फ्राईडे की सुबह यहूदी धार्मिक अधिकारी यीशु को रोमी राज्यपाल पुन्तियुस पिलातुस के पास ले गए, ताकि उसका मुकद्दमा जारी रखा जा सके। हम सुसमाचारों के विवरण में देख सकते हैं कि कैसे परमेश्वर ने इन घटनाओं को पूरी तरह से अपनी योजना के अनुसार नियोजित किया। यहूदी नेताओं का यीशु को क्रूस पर मरवाने का निर्णय दरअसल परमेश्वर की शाश्वत योजना को पूरा कर रहा था। इस दिव्य योजना में यीशु का पिलातुस के साथ संवाद भी शामिल था, और जब वे एक-दूसरे के सामने खड़े हुए, पिलातुस ने यीशु की पहचान और अधिकार के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल पूछे, जो अनन्त महत्त्व रखते थे, और हममें से हर एक को इसका उत्तर देना चाहिए। एक भजनकार के शब्दों पर विचार करें:

यीशु पिलातुस के महल में खड़ा है—

मित्रविहीन, त्यागा हुआ, सभी से धोखा खाया हुआ;

सुनो! इस अचानक हुई पुकार का क्या अर्थ है?

आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

पिलातुस ने सोचा कि वह केवल एक बौद्धिक और राजनीतिक परीक्षा ले रहा था। लेकिन “यीशु कौन हैं?” यह सवाल हमेशा एक आत्मिक और पारलौकिक सवाल होता है। यीशु एक राजनीतिक राजा नहीं था, जैसा पिलातुस सोच रहा था; बल्कि वह तो स्वर्गिक राजा था। यीशु ने पिलातुस से कहा, मेरा राज्य इस संसार का है ही नहीं। मेरा राज्य तो मेरे लोगों के हृदयों में आत्मिक परिवर्तन लाने से सम्बन्धित है। पृथ्वी पर एक राजा के तौर पर जन्म लेने का मेरा उद्देश्य परमेश्वर के सत्य की गवाही देना है। लेकिन पिलातुस अपने अविश्वास में अंधा होकर पहले ही अपना निर्णय ले चुका था। निराश और उदासीन होकर वह इस मूलभूत सवाल से बचने की कोशिश कर रहा था, जिसका उत्तर हम सभी को देना चाहिए: “मैं यीशु के साथ क्या करूँगा?” लेकिन इस सवाल से बचने की कोशिश करते हुए पिलातुस ने अपना जवाब दे दिया। उसका उत्तर था: मैं अपने ऊपर यीशु के दावे को और अपने ऊपर उसके शासन को नकारता हूँ, और ऐसा करके मेरा उद्धार करने के उसके प्रस्ताव को भी ठुकराता हूँ।

आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

उदासीन आप नहीं हो सकते;

एक दिन आपका दिल पूछेगा,

वह मेरे साथ क्या करेगा?”[1]

उदासीन आप नहीं हो सकते। आप या तो उनके राज्य के अधीन जीवन जीएँगे, या फिर आप उसे नकार देंगे। इसलिए सुबह जब आप सुबह अपनी बाइबल पढ़कर बन्द करते हैं, तो यह सोचकर अपने दिन का आरम्भ न करें कि यह संसार, इसकी चिन्ताएँ और इसके अस्थायी शासक ही सब कुछ हैं और केवल यही मायने रखता है। इस सोच के साथ अपने दिन का आरम्भ न करें कि इस संसार में आपके जीवन में यीशु की कोई जगह या रुचि नहीं है। यीशु पिलातुस के सामने मित्रविहीन और त्यागा हुआ खड़ा था, ताकि आप उसके मित्र बनकर उनके शाश्वत राज्य में स्वागत किए जा सकें। उदासीनता का कोई विकल्प नहीं है—तो फिर हम इसे क्यों चाहेंगे?

 यूहन्ना 18:28-40

12 April : शेवटी तुम्हीं पराभूत होऊं शकत नाहीं

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12 April : शेवटी तुम्हीं पराभूत होऊं शकत नाहीं
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“तुमच्याजवळ पहारा आहे; जा, तुमच्याने होईल तसा बंदोबस्त करा.” (मत्तय 27:65).

जेव्हां येशू मेला आणि त्याला पुरण्यात आले, व त्याच्या कबरेवर मोठी धोंड ठेवण्यात आली, तेव्हां परूशी लोक पिलाताजवळ येऊन ती धोंड मोहरबंद करण्याची व कबरेवर पहारा देण्याची परवानगी मागू लागले.

त्यांनी आटोकाट प्रयत्न केला – पण व्यर्थच.

त्या वेळी ते आशारहित होते, आजही ते आशारहित आहे, आणि ते नेहमीच आशारहित असेल. त्यांनी कितीही प्रयत्न केला असला तरीही, लोक येशूला दाबून ठेवू शकत नाहींत. ते त्याला पुरलेल्या अवस्थेत ठेवू शकत नाहींत.

हे समजणे कठीण नाहीं: तो मार्ग फोडून बाहेर येऊ शकतो कारण त्याला बळजबरीने आत टाकण्यात आले नाहीं. त्यानें स्वतःची निंदा होऊ दिली आणि छळ होऊ दिला आणि बहिष्कृत होऊ दिलें आणि तिरस्कार होऊ दिला आणि ठार करू दिलें.

”मी आपला प्राण परत घेण्याकरता देतो. कोणी तो माझ्यापासून घेत नाहीं, तर मी होऊनच तो देतो. मला तो देण्याचा अधिकार आहे व तो परत घेण्याचाही अधिकार आहे” (योहान 10:17-18).

कोणी त्याला दाबून ठेवू शकत नाहीं कारण कोणीही त्याला खाली पाडलेले नाहीं. जेव्हां तो तयार होता तेव्हां त्यानें स्वतःला दिलें.

जेव्हां असे दिसते कीं तो पुरला गेला ते चांगल्यासाठींच, तेव्हां येशू अंधारात काहींतरी अद्भुत करीत आहे. “परमेश्वराचे राज्य असे आहे कीं, जणू काय एखादा माणूस जमिनीत बी टाकतो, रात्री झोपी जातो, दिवसा उठतो, आणि ते बी रुजते व वाढते, पण हे कसे होते हे त्याला कळत नाहीं.” (मार्क 4:26-27).

जगास वाटते कीं येशूचा अंत झाला – तो मार्गातून दूर झाला – पण येशू अंधारलेल्या जागी कार्य करीत आहे. ”गव्हाचा दाणा जमिनीत पडून मेला नाहीं तर तो एकटाच राहतो, आणि मेला तर पुष्कळ पीक देतो.” (योहान 12:24). त्यानें स्वतःला पुरले जाऊ दिलें – “कोणीही (माझा प्राण) माझ्यापासून घेत नाहीं” – आणि जेव्हां आणि जेथे त्याला वाटेल तेव्हां तो सामर्थ्यानिशी बाहेर येईल – “तो परत घेण्याचाही अधिकार आहे.”

”त्याला देवानें मरणाच्या वेदनांपासून सोडवून उठवले; कारण त्याला मरणाच्या स्वाधीन राहणे अशक्य होते.“ (प्रेषितांची कृत्ये 2:24). ”अक्षय जीवनाच्या सामर्थ्याने“ येशूचे याजकपद अद्याप आहे (इब्री 7:16).

मागील वीस शतके, जगाने खूप प्रयत्न केला आहे – पण व्यर्थ. ते त्याला पुरू शकत नाहींत. ते त्याला आत धरून ठेवू शकत नाहींत. ते त्याला शांत करू शकत नाहींत किंवा मर्यादित करू शकत नाहींत. येशू जिवंत आहे आणि जेथे कोठे तो जाऊ इच्छितो तेथे जाण्यास व येण्यास तो पूर्णपणे स्वतंत्र आहे.

त्याच्यावर विश्वास ठेवा आणि त्याच्यासोबत जा, मग काहींही का असेना. तुम्हीं शेवटी पराभूत होऊं शकत नाहीं.

11 अप्रैल : अपनी तलवार म्यान में रख

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11 अप्रैल : अपनी तलवार म्यान में रख
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“तब शमौन पतरस ने तलवार, जो उसके पास थी, खींची और महायाजक के दास पर चलाकर उसका दाहिना कान उड़ा दिया . . . तब यीशु ने पतरस से कहा, ‘अपनी तलवार म्यान में रख। जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे न पीऊँ?’” यूहन्ना 18:10-11

यीशु की गतसमनी के बग़ीचे में गिरफ्तारी अन्ततः उसके पिता के प्रति उसके समर्पण को प्रकट करती है। जब सैनिक उसे पकड़ने आए, यीशु पहले ही यह निश्चय कर चुका था कि वह कष्ट का प्याला पीएगा—अर्थात क्रूस पर उसकी मृत्यु—ताकि यह हमारे लिए उद्धार का प्याला बन सके।

लेकिन कौन से शिष्य ने तुरन्त कदम बढ़ाया, जैसे कि यह सब एक संकेत था? बेशक, आवेगी शमौन पतरस—जो तलवार लहराते हुए आया! भावुकता में आकर काम करना और कुछ बोल देना पतरस के लिए कोई नई बात नहीं थी। उसने यीशु के पास पानी पर चलकर जाने की कोशिश की थी। उसने मसीह को फटकारने की कोशिश की थी। उसने मसीह के लिए अपने प्राणों की आहुति देने का प्रस्ताव दिया था। और फिर, यीशु की रक्षा के लिए कदम बढ़ाने के तुरन्त बाद उसने डर के मारे यीशु को जानने से भी इनकार कर दिया।

अपने प्रभु को गिरफ्तार होते देखकर पतरस द्वारा की गई प्रतिक्रिया पूरी तरह से समझने योग्य थी, लेकिन पूरी तरह से गलत थी। जबकि पतरस यहाँ यीशु के लिए लड़ा था, वह वास्तव में यीशु के खिलाफ ही लड़ रहा था। वह परमेश्वर की इच्छा के खिलाफ लड़ रहा था, जो यह चाहता था कि मनुष्यों के पापों के लिए यीशु प्रायश्चित बलि बने। पतरस का यह उदाहरण हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देता है; जैसा कि कैल्विन कहते हैं, “आओ हम अपने आवेग को संयमित करना सीखें। और जैसा कि हमारे शरीर की इच्छाएँ हमें परमेश्वर के आदेशों से अधिक करने के लिए उकसाती हैं, हम यह सीखें कि हमारे आवेग का परिणाम तब गलत हो जाएगा जब हम परमेश्वर के वचन से आगे बढ़ने की हिम्मत करेंगे।”[1]

पतरस के इस काम को सही करने की आवश्यकता को जानकर यीशु ने उससे एक प्रश्न पूछा: “जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे न पीऊँ?” वह परमेश्वर की इच्छा के उस हिस्से को स्वीकार कर रहा था, जिसे उसने अभी प्रार्थना में स्वीकार किया था, और जिसके कारण बाद में उसने क्रूस पर यह पुकारा था, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। उसकी पीड़ा के माध्यम से उसकी महिमा प्रकट हुई और विश्वास करने वाले सभी लोगों के लिए उद्धार मुक्त रूप से प्रस्तुत किया गया। पतरस द्वारा निकाला गया कोई भी मार्ग इस मार्ग से बेहतर नहीं हो सकता था, और वह इसे नकार कर गलत कर रहा था।

जब हमारी अधीरता परमेश्वर की योजनाओं में हस्तक्षेप करने का प्रयास करती है, तो हमें अपनी आभासी तलवारें छोड़ देनी चाहिएँ। हमें परमेश्वर की योजना पर विश्वास करना चाहिए, उसके समय का इंतजार करना चाहिए, और उसके आदेशों पर चलना चाहिए। जितना अधिक हम पवित्रशास्त्र से परिचित होंगे—उसमें पाई जाने वाली महान कहानी, प्रतिज्ञाओं और सच्चाइयों को जानेंगे—हम उसकी योजनाओं को उतना ही बेहतर समझ पाएँगे। लेकिन फिर भी, ऐसे समय आएँगे जब उसके मार्ग हमारे लिए रहस्यमय होंगे और हम जिस मार्ग पर वह हमें ले जा रहा है, उसके खिलाफ लड़ने का प्रलोभन होगा। शायद आप अभी भी ऐसा कर रहे हैं।

पतरस से कहे गए यीशु के शब्दों को दिल से लें: “अपनी तलवार म्यान में रख।” परमेश्वर के प्रेमी हाथ पर विश्वास करें, उसके आदेशों का पालन करें, और उसके मार्गदर्शन का अनुसरण करें। वह हमारे विश्वास का “कर्ता और सिद्ध करने” वाला है (इब्रानियों 12:2), और जिस कहानी को वह लिख रहा है, वह आपकी कल्पना से कहीं अधिक शानदार है।

भजन संहिता 23

11April : थोर राजाचा द्राक्षरस

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11April : थोर राजाचा द्राक्षरस
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“कारण आपल्या सर्वांच्या दुर्बलतेविषयी ज्याला सहानुभूती वाटत नाहीं, असा आपला प्रमुख याजक नाहीं, तर तो सर्व प्रकारे आपल्याप्रमाणे पारखलेला होता; तरी निष्पाप राहिला.” (इब्री 4:15).

मी कोणालाही कधीही असे म्हणतांना ऐकलेले नाहीं, ”माझ्या जीवनाचे खरोखर गंभीर धडे सुख आणि विश्रांतीच्या समयातून आले आहेत.“ तर मी सुदृढ पवित्र जणांस असे म्हणतांना ऐकले आहे, ”देवाच्या प्रीतिच्या खोलीचे आकलन करून घेण्यासाठीं आणि त्याजबरोबर खोलवर वाढत जाण्यासाठीं मी केलेंली प्रत्येक महत्त्वाची वाटचाल दुःखातून आली आहे.”

हे एक गंभीर बायबलसंबंधीत सत्य आहे. उदाहरणार्थ:”इतकेच नाहीं, तर ख्रिस्त येशू माझा प्रभू, ह्याच्याविषयीच्या ज्ञानाच्या श्रेष्ठत्वामुळे मी सर्वकाहीं हानी असे समजतो; त्याच्यामुळे मी सर्व गोष्टींना मुकलो, आणि त्या केरकचरा अशा लेखतो; ह्यासाठीं कीं, मला ख्रिस्त हा लाभ प्राप्त व्हावा.” (फिलिप्पै 3:8). अर्थ: वेदना नाहीं, तर लाभ नाहीं.

किंवा: आता मला जर त्याद्वारे ख्रिस्ताचा अधिक लाभ होत असेल, तर मग सर्व गोष्टींचा त्याग केला पाहिजे.

येथे आणखी एक उदाहरण आहे: अर्थ: ”तो पुत्र असूनही त्यानें जे दुःख सोसले तेणेकरून तो आज्ञाधारकपणा शिकला;” (इब्री 5:8). याच पुस्तकात असे म्हटलेंले आहे कीं त्यानें कधी पाप केलें नाहीं (इब्री 4:15).

म्हणून आज्ञाधारकपणा शिकण्याचा अर्थ हा नाहीं कीं अवज्ञेकडून आज्ञाधारकपणाकडें येतो. याचा अर्थ आज्ञाधारकपणाच्या अनुभवात देवासोबत अधिक खोलवर वाढत जाणे. याचा अर्थ देवाप्रत समर्पणाचा अनुभव करणे जो अन्यथा प्राप्त झाला नसता. दुःखातून हेच प्राप्त होते. वेदना नाहीं, तर लाभ नाहीं.

सॅम्युएल रदरफोर्डने म्हटलें कीं जेव्हां त्यांना दुःखाच्या कालकोठीत टाकण्यात आले तेव्हां त्यांना आठवले कीं थोर राजा नेहमी तेथे त्याचा द्राक्षरस ठेवत असे. चार्ल्स स्पर्जन यांनी म्हटलें, “दुःखाच्या समुद्रात डुबकीं मारणारे दुर्लभ मोती आणतात.”

जेव्हां तुम्हांला काहीं अनोख्या वेदना होतात ज्यामुळे तुम्हांला असे वाटते कीं कर्करोग झाला आहे तेव्हां तुम्हीं तुमच्या प्रिय व्यक्तीवर अधिक प्रीति करीत नाहीं का? आम्हीं खरोखर विचित्र प्राणी आहोत. जर आपल्याजवळ आरोग्य आणि शांती आणि प्रेम करण्यास वेळ असेल तर ती एक पातळ आणि घाईघाईची गोष्ट ठरू शकते. परंतु जर आपण मरणाच्या लागास असू, तर प्रेम ही एक अव्यक्त आनंदाची खोल, संथ नदी बनते, आणि आपण क्वचितच तिचा त्याग करणे सहन करू शकतो.

म्हणून, माझ्या बंधूं आणि भगिनींनो, “नाना प्रकारच्या परीक्षांना तुम्हांला तोंड द्यावे लागते तेव्हां तुम्हीं आनंदच माना.” (याकोब 1:2).

10 अप्रैल : सभी राष्ट्रों के लिए शान्ति

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“हे सिय्योन बहुत ही मगन हो! हे यरूशलेम, जयजयकार कर! क्योंकि तेरा राजा तेरे पास आएगा; वह धर्मी और उद्धार पाया हुआ है, वह दीन है, और गदहे पर वरन् गदही के बच्चे पर चढ़ा हुआ आएगा। मैं एप्रैम के रथ और यरूशलेम के घोड़े नष्ट करूँगा; और युद्ध के धनुष तोड़ डाले जाएँगे, और वह जाति–जाति से शान्ति की बातें कहेगा; वह समुद्र से समुद्र तक और महानद से पृथ्वी के दूर-दूर के देशों तक प्रभुता करेगा।” जकर्याह 9:9-10

एक जनसमूह के साथ यीशु के यरूशलेम में प्रवेश करने का घटनाक्रम नाटकीयता से भरा हुआ था।

सुसमाचारों में कई बार ऐसा हुआ है कि यीशु और उसके शिष्य भीड़ से दूर, जितना सम्भव हो सके, शान्त और गोपनीय रूप से अकेले कहीं चले जाते थे। यीशु के लिए यह सम्भव था कि वह किसी का ध्यान अपनी ओर खींचे बिना शहर में प्रवेश करे। इसके बजाय, उसने जानबूझकर तय किया कि वह यरूशलेम में इस तरीके से प्रवेश करेगा, जो उसे उस मसीह-राजा के रूप में घोषित करेगा, जिसकी पवित्रशास्त्र में लम्बे समय से प्रतिज्ञा की गई थी। हालाँकि, लोगों की यह अवधारणा कि यीशु का यहूदियों का राजा बनने का वास्तव में तात्पर्य क्या था, इतनी भ्रान्तिपूर्ण थी कि यीशु जो दिखाना चाह रहा था, उसे लोगों ने गलत समझ लिया। लोग पहले भी यीशु को बलपूर्वक राजा बनाने की कोशिश कर चुके थे, लेकिन वह उनसे बचकर चला गया था (यूहन्ना 6:14-15)। वह जानता था कि लोग क्या सोचते थे कि राजा को क्या करना चाहिए, और वह तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं करने आया था। लोगों का दृष्टिकोण गलत था। उस समय भी यही स्थिति तब थी जब यह समझा जा रहा था कि यीशु किसी राजनीतिक क्रान्ति में शामिल है। इस पर उसने उत्तर दिया, “मेरा राज्य इस संसार का नहीं है” (यूहन्ना 18:36)।

यरूशलेम में यीशु के विजयी प्रवेश के दौरान भीड़ के नारे जुनून, आशा, और भ्रम से भरे हुए थे। वे रोम की कब्जे के अधीन नहीं रहना चाहते थे। वे राष्ट्रीय पुनर्स्थापना और राजनीतिक क्रान्ति चाहते थे। उन्हें एक राजनीतिक नायक की आवश्यकता थी, और यीशु उनकी सबसे बड़ी उम्मीद था। ऐसा लगता है कि वे यह विश्वास कर रहे थे कि यीशु उन्हें कुछ ऐसा देने वाला था, जो उसने कभी देने का इरादा किया ही नहीं था। जब भीड़ ने “होसन्ना!” (अर्थात “हमें बचा!”) कहा, तो वे व्यक्तिगत, आध्यात्मिक उद्धार के बारे में नहीं सोच रहे थे; वे जो सोच रहे थे वह उनके वर्तमान समय की बात थी।

यदि हम सुसमाचार को अपनी सोच के केन्द्र में न रखें, तो हम भी इसी प्रकार के जुनून, आशा, और भ्रम का शिकार हो सकते हैं। आज भी, हममें से कई लोग अपने लिए एक ऐसा यीशु बना लेते हैं, जो हमारी अपनी अपेक्षाओं को पूरा कर सके, एक ऐसा “उद्धारकर्ता” जो हमारे लिए आराम, समृद्धि, या स्वास्थ्य लेकर आया है, जो हमारे परिवार, आस-पड़ोस, और राष्ट्र को आशीर्वाद देने आया है। लेकिन मसीह यरूशलेम में विजयी राष्ट्रवादी के रूप में रथ पर सवार होकर नहीं आया; वह तो शान्ति लाने वाले अन्तर्राष्ट्रीयवादी के रूप में विनम्रता से गधे पर सवार होकर आया। वह तो जकर्याह 9 की भविष्यवाणी को पूरा करने आया था, यह घोषणा करते हुए कि सम्पूर्ण पृथ्वी पर उसके सिद्ध और सार्वभौमिक शासन में “सभी राष्ट्रों के लिए शान्ति” लाई जाएगी। यही सुसमाचार का सन्देश है—एक ऐसा सन्देश जो हर किसी के लिए, हर जगह, हमेशा अच्छा है। ऐसा नहीं कि हमारे सपने और माँगें उसके लिए बहुत बड़ी हैं, बल्कि यह कि वे बहुत छोटी हैं।

यीशु आज हमें यह चुनौती देता है, जैसे उसने अपने समय में लोगों को चुनौती दी थी कि हम उसकी आराधना वैसे करें जैसा वह है, वैसे नहीं जैसा हम उसे चाहते हैं। उसे हमारे कामों का हिस्सा मत बनाइए; इसे एक विशेषाधिकार मानिए कि आप उसके कामों का हिस्सा बनें।

जकर्याह 9:9-17

10 April : योग्य लाज म्हणजें काय?

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10 April : योग्य लाज म्हणजें काय?
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तुम्हीं पापाचे गुलाम होता तेव्हां नीतिमत्त्वासंबंधाने बंधमुक्त होता. तर ज्या गोष्टींची तुम्हांला आता लाज वाटते त्यांपासून तुम्हांला त्या वेळेस काय फळ प्राप्त होत असे? त्यांचा शेवट तर मरण आहे. (रोम 6:20-21)

जेव्हां त्याच्या पूर्वीच्या देवाचा अनादर करणाऱ्या वर्तनाविषयी ख्रिस्ती व्यक्तीचे डोळे उघडतात, तेव्हां ख्रिस्ती व्यक्तीला लाज वाटणे योग्यच आहे. पौल रोमच्या मंडळीस म्हणतो, “तुम्हीं पापाचे गुलाम होता …तर ज्या गोष्टींची तुम्हांला आता लाज वाटते त्यांपासून तुम्हांला त्या वेळेस काय फळ प्राप्त होत असे?”

एके काळी आम्हीं अशाप्रकारे जगत होतो ज्याने देवाचा तिरस्कार होत होता याकडें मागे वळून पाहण्याची आणि वेदना अनुभव करण्याची एक योग्य जागा आहे. निश्चितच, यावर मनन करण्याद्वारे आम्हीं कमकुवत होता कामा नये. पण एक संवेदनशील हृदयाने तरूणपणाच्या मूर्खपणाचा परत विचार करून लाजेच्या प्रतिध्वनींचा अनुभव येवू नये असे होऊ शकत नाहीं, जरी प्रभूसोबत त्याचा सोक्षमोक्ष लावण्यात आलेला असला तरीही.

योग्यप्रकारे लाज वाटणे अत्यंत आरोग्यदायक आणि मुक्तीदायक आहे. पौलाने थेस्सलनीका येथील लोकांस लिहिले,  ”ह्या पत्रातील आमचे वचन जर कोणी मानत नसेल तर तो मनुष्य लक्षात ठेवा आणि त्याला लाज वाटावी म्हणून त्याची संगत धरू नका“ (2 थेस्सल 3:14). याचा अर्थ जीवन-परिवर्तन होत असतांना पूर्वीच्या गोष्टींची लाज वाटणे हे योग्य आणि मुक्तीदायक पाऊल आहे, आणि आध्यात्मिक थंडपणा व पापाच्या ऋतूपासून विश्वासणाऱ्याच्या पश्चातापातही. कोणत्याही किंमतीत लाज टाळू शकत नाहीं. देवाच्या आपल्या लोकांसोबत त्याच्या व्यवहारात त्याचे एक महत्वाचे स्थान आहे.

आपण असा निष्कर्ष काढू शकतो कीं चुकींच्या लाजेसाठीं आणि योग्य अशा लाजेसाठीं पवित्र शास्त्राची कसोटी मूलतः परमेश्वर-केन्द्रित आहे.

चुकींच्या ठिकाणी असलेल्या लाजेसाठीं पवित्रशास्त्राची कसोटी म्हणते, ज्या गोष्टीमुळे देवाला मान मिळतो त्यासाठीं लाज वाटता कामा नये, मग इतर लोकांच्या नजरेत त्यामुळे तुम्हीं कितीही दुर्बळ किंवा मूर्ख अथवा चुकींचे का दिसेना. किंवा चुकींच्या लाजेची ही परमेश्वर केन्द्रित कसोटी लागू करण्याची एक दुसरी पद्धत : जोपर्यंत तुम्हीं एक प्रकारे वाईटात सहभागी होत नाहीं तोपर्यंत खरोखर लाजरवाण्या परिस्थितीमुळे लाज वाटून घेऊ नये.

योग्य लाजेची पवित्रशास्त्राची कसोटी म्हणते, देवाचा अनादर करणाऱ्या कोणत्याही गोष्टीत हात असल्याबद्दल लाज वाटू द्या, मग ते तुम्हांला इतरांच्या नजरेत कितीही बळकट किंवा शहाणे किंवा योग्य असल्यासारखे का दाखवत असेना.

आपल्याला लाज वाटली पाहिजे याचे कारण म्हणजें देवाचा अनादर करणाऱ्या वागणूकींसाठीं नापसंती होय. आपल्याला लाज वाटू नये याचे कारण म्हणजें देवाचा आदर करणारे वर्तन, जरी लोकांनी त्यासाठीं तुम्हांला लज्जित करण्याचा प्रयत्न का केला असेना.

9 अप्रैल : सब नामों से ऊँचा नाम

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9 अप्रैल : सब नामों से ऊँचा नाम
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“मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। इस कारण परमेश्‍वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है।” फिलिप्पियों 2:8-9

एक प्रकार से बाइबल के सन्देश का सर्वोत्तम सार और इस सृष्टि का सबसे बुनियादी सत्य बस यह है: यीशु मसीह प्रभु है।

अधिकांश धर्मशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि जिस “नाम” का उल्लेख पौलुस ने पद 9 में किया है, केवल “प्रभु” ही हो सकता है (फिलिप्पियों 2:11)। यहाँ “प्रभु” के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द कुरियोस है, जिसका उपयोग यहोवा (याहवेह) के दिव्य नाम के रूप में 6,000 से अधिक बार सेप्टुआजिण्ट (पुराने नियम का यूनानी अनुवाद) में किया गया है—वह नाम जिसे आजकल अधिकांश अंग्रेजी बाइबलों में “प्रभु” के रूप में अनुवादित किया गया है। पौलुस पहले हमें यीशु के पृथ्वी पर रहने के दौरान उसकी दीनता के बारे में याद दिलाता है और फिर परमेश्वर के दिव्य नाम का उपयोग करके यीशु की दिव्यता को प्रमुख रूप से उजागर करता है।

याहवेह नाम चार व्यंजनाक्षरों (YHWH) से मिलकर बना है, जिसे इब्रानी में मूल रूप से उच्चारित करना असम्भव है—और ऐसा जानबूझकर किया गया था, क्योंकि यहूदी इस दिव्य नाम को अपने मुँह से उच्चारण करने का साहस नहीं करते थे। फिर भी, यह अद्वितीय परमेश्वर याहवेह पृथ्वी पर अवतरित हुआ और मसीह के रूप में स्वयं को मनुष्यों के सामने प्रकट किया। वह विनम्रता से क्रूस पर मर गया, और फिर उसे उच्चतम स्थान—उसका उचित स्थान—दिया गया और उस नाम से नवाजा गया जो “सब नामों से ऊँचा नाम है।” एक टिप्पणीकार ने कहा, “उसने अपरिभाष्य नाम को बदलकर एक ऐसा नाम बना दिया जिसे मनुष्य उच्चारित कर सके और जो पूरी दुनिया में जिसकी कामना की जा सके।” जिसने यह नाम धारण किया, परमेश्वर की दिव्यता उसमें “दया के वस्त्रों में सुसज्जित है।”[1]

पुराने नियम की भविष्यवाणी इस विचार को बार-बार मजबूत करती है। यशायाह 45 में, परमेश्वर एक ऐसी विशेषता का वर्णन करता है, जो केवल उसके स्वयं पर लागू होती है: “मुझे छोड़ कोई और दूसरा परमेश्‍वर नहीं है, धर्मी और उद्धारकर्ता परमेश्‍वर मुझे छोड़ और कोई नहीं है” (यशायाह 45:21)। पौलुस, जो पहले मसीह और उसके अनुयायियों का कट्टर विरोधी था, इस विशेष विवरण को मसीह पर लागू करता है, और उसकी दिव्यता का प्रभावशाली उद्‌घोष करता है। वह यह इंगित करता है कि यीशु को सार्वजनिक रूप से उसी महिमा से नवाजा गया है, जो उसके पृथ्वी पर हमारी खातिर अपमान सहने के लिए आने से पहले भी उचित रूप में उसकी थी। अब वह पिता के दाहिने हाथ विराजमान है। उसकी महिमा उन सभी के लिए दृष्टिगोचर है, जो उसे उद्धारकर्ता के रूप में जानते हैं। उसकी पहचान अस्पष्ट या संदिग्ध नहीं है।

एकमात्र उद्धारकर्ता केवल परमेश्वर है—और वह उद्धारकर्ता यीशु ही है, जिसके बारे में कहा गया था, “तू उसका नाम यीशु रखना, क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा” (मत्ती 1:21)। वर्षों बाद, जब पौलुस की आँखें यीशु के बारे में सत्य के लिए खुल चुकी थीं, तौभी फिलिप्पियों को लिखे गए उसके शब्दों में हम श्रद्धा और प्रेम का अनुभव महसूस कर सकते हैं। यीशु मसीह प्रभु है। उसका नाम सब नामों से ऊँचा है। पौलुस ने इस सत्य से परिचित होने के बावजूद इस पर कभी भी लापरवाही नहीं दिखाई। हमें भी ऐसा नहीं करना चाहिए। अब रुकें और हर शब्द को इस अद्‌भुत व्यक्ति की प्रशंसा में एक श्रद्धा भरी स्तुति के रूप में आने दें: यीशु, अपने लोगों का उद्धारकर्ता . . . मसीह, लम्बे समय से प्रतिज्ञा किया गया राजा . . . प्रभु है, जो अवर्णनीय, प्रकट परमेश्वर है। और आप उसे “भाई” कह सकते हैं (इब्रानियों 2:11)।

 प्रकाशितवाक्य 1:9-20