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11 मई : यह प्रभु का काम है

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11 मई : यह प्रभु का काम है
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“तब वह [नाओमी] मोआब के देश में यह सुनकर कि यहोवा ने अपनी प्रजा के लोगों की सुधि ले के उन्हें भोजन वस्तु दी है, उस देश से अपनी दोनों बहुओं समेत लौट जाने को चली।” रूत 1:6

बैतलहम बाइबल के इतिहास में एक प्रमुख नगर है। राजगद्दी सम्भालने से पहले दाऊद ने इसी नगर में अपनी भेड़ें चराईं थीं। एक हज़ार साल बाद, जब विभिन्न चरवाहे अपनी भेड़ों के झुण्डों की देखभाल कर रहे थे, तो इसी नगर में स्वर्गदूतों के एक दल ने यीशु मसीह के जन्म की घोषणा की।

हालाँकि इन दोनों महत्त्वपूर्ण घटनाओं से पहले न्यायाधीशों का काल था, जो हिंसा, सामाजिक और राजनीतिक अराजकता, और धार्मिक उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस उथल-पुथल के दौरान, बैतलहम में अकाल पड़ा, जिससे यह नगर, जिसका नाम इब्रानी भाषा में “रोटी का घर” है, भूख और निराशा का एक घर बन गया।

इन निराशाजनक परिस्थितियों में, एलीमेलेक नाम का एक व्यक्ति भोजन की तलाश में अपनी पत्नी नाओमी और अपने दो बेटों को मोआब देश में ले गया। जबकि एलीमेलेक नाम का अर्थ “मेरा परमेश्वर राजा है” है, लेकिन इस्राएल के शत्रुओं के देश मोआब में जाने का उसका निर्णय यह सवाल उठाता है कि क्या वह वास्तव में परमेश्वर के प्रावधान पर विश्वास कर भी रहा था या नहीं, या उसकी आज्ञा का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध था भी या नहीं।

मोआब भोजन की भूमि नहीं, बल्कि शोक का स्थान साबित हुआ। एलीमेलेक और उसके बेटों की मृत्यु हो गई, और नाओमी विधवा हो गई। हालाँकि, कुछ वर्षों बाद, नाओमी के दर्द के अंधकार में एक छोटी सी उम्मीद की किरण जागी; उसे यह समाचार मिला कि बैतलहम में भोजन लौट आया था। परमेश्वर ने अपने देश में अपनी प्रजा के लिए प्रावधान किया था।

हज़ारों साल बाद, हम इस सत्य को जल्दी से नजरअंदाज करने के लिए प्रलोभित हो सकते हैं: कि परमेश्वर अपनी प्रजा को वही प्रदान करता है, जिसकी उन्हें आवश्यकता होती है। शायद आप अपने उद्धार के बारे में यह तथ्य जानते हैं—लेकिन यह कितना आसान है कि हम उसके दैनिक प्रावधान के बारे में भूल जाएँ! क्या हमारे पास उन चीजों को देखने की दृष्टि है जो परमेश्वर हमारे दैनिक जीवन में हमें दे रहा है और हमारे लिए कर रहा है? क्या हर दिन के अन्त में उन कामों के लिए हमारे दिलों में धन्यवाद भरा हुआ होता है, जो उसने हमारे लिए किए हैं?

परमेश्वर के निरन्तर प्रावधान का एक व्यावहारिक उदाहरण वह भोजन है, जो हमें प्रतिदिन मिलता है। किराने की दुकान में यदि किसी को सबसे अधिक आभार और आश्चर्य के साथ देखना चाहिए, तो वह मसीही लोग हैं! आखिरकार, परमेश्वर ही तो है जो हमारी दुकानों और भण्डारगृहों को भोजन से भरता है। हम दुकान से अण्डे और दूध खरीदते हुए यह कह सकते हैं, “यह तो यहोवा की ओर से हुआ है, यह हमारी दृष्‍टि में अद्‌भुत है” (भजन 118:23)।

चाहे जीवन की घटनाएँ कितनी भी अंधकारमय और नाटकीय क्यों न दिखें, परमेश्वर अब भी अपनी प्रजा की चिन्ता करता है और अपनी योजनाओं को पूरा करता है, और वह अक्सर इसे अप्रत्याशित व्यक्तियों के माध्यम से और शान्त तरीकों से करता है। उसने नाओमी और उसके परिवार के माध्यम से महान कार्य करने का उद्देश्य रखा था—और यह बैतलहम में रोटी से शुरू हुआ। हमें भी अपनी आँखें खोलनी चाहिए ताकि हम देख सकें कि परमेश्वर द्वारा भोजन प्रदान करना हमारी सबसे बड़ी स्थाई आवश्यकता—हमारे उद्धारकर्ता, यीशु मसीह—के प्रावधान की ओर तथा हमारे उच्चतम बुलावे की ओर इशारा करता है: अर्थात हम उसकी महिमा के लिए “उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया” (इफिसियों 2:10)।

प्रेरितों 17:24-31

11 May : मेजवानीस जा

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11 May : मेजवानीस जा
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परमेश्वर किती चांगला आहे ह्याचा अनुभव घेऊन पाहा ! ( स्तोत्र 34:8 )

तुम्हीं जे असें म्हणता कीं तुम्हीं देवाच्या गौरवाची चव कधीच चाखली नाहीं, मी तुम्हाला हे सांगतो कीं तुम्हीं त्याच्या कृपेच्या चवीचा थोडासा आस्वाद निश्चित घेतला आहे.

तुम्हीं कधी वर आकाशाकडे पाहिले आहे का? तुम्हाला कोणी आलिंगन दिलें आहे का? तुम्हीं कधी गरम शेकोटीच्या पुढे बसला आहात का? तुम्हीं कधी जंगलातून चालत गेला आहात का, तलावाकाठी बसला आहात का, उन्हाळ्यात झोपाळ्यामध्यें बसलात का? गरमीच्या दिवसात तुमचे आवडीचे पेय प्यायलात का किंवा काही तरी रुचकर खाल्ले आहे का?

आपली प्रत्येक इच्छा स्वर्गातील गौरवाचा आस्थायुक्त किंवा विकृत मोह असतो.

तुम्हीं म्हणाल कीं तुम्हीं देवाच्या गौरवाचा अनुभव कधी घेतला नाहीं. मी म्हणतो, तुम्हीं त्याच्या गौरवाचा आस्वाद घेतला आहे. मग आता मेजवानीस जा. खुद्द देवाकडे जा.

तुम्हीं सावली पाहिली आहे, आता मुख्य तत्व पाहा. तुम्हीं उबदार सूर्य प्रकाशात चालला आहात, मग आता सूर्याकडेच वळा – होय, सुवार्तेच्या सौरक्षक आणि टोकदार भिंगा मधून. तुम्हीं सगळीकडे देवाच्या गौरवाचा प्रतिध्वनी ऐकलेला आहे, आता तुमचे मन त्याच्या अस्सल संगीताकडे लावा.

तुमचे मन जुळवण्यासाठीं सर्वोत्तम ठिकाण आहे, येशू ख्रिस्ताचा वधस्तंभ. “आम्हीं त्याचा गौरव पाहिला. तो पित्यापासून आलेल्या एकुलत्या एकाचा गौरव असावा असा अनुग्रह व सत्य ह्यांनी परिपूर्ण होता” (योहान 1:14).

तुम्हाला देवाचे गौरव सर्वाधिक एकवटलेले पाहायचे असेंल तर, शुभवर्तमानातील येशूकडे पाहा. आणि विशेषत: कृसाकडे पाहा. हे तुमचे डोळे एकाग्र करेल, तुमचे मन त्याला जुळेल आणि तुम्हाला आस्वाद घेण्यास लावेल, जेणे करून तुम्हीं देवाचे गौरव सगळीकडे, पाहू, ऐकू आणि चाखू शकाल.

ह्या करिताच तुमची निर्मिती झाली आहे. मी तुम्हाला विनंती करतो : तुमचे जीवन आभासी गोष्टींकडे व्यर्थच घालवू नका. देवानें तुम्हाला त्याचे गौरव पाहण्यासाठीं आणि त्याचा आनंद घेण्यासाठीं बनवले आहे. तुमच्यां अंत:करणाने सर्व गोष्टीं मध्यें त्याचाच शोध करा. तुम्हीं त्याची थोडीशी चव चाखली आहे. आता पूर्ण मेजवानीचा आस्वाद घ्यावयांस जा.

10 मई : नियम एवं शर्तें

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10 मई : नियम एवं शर्तें
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“उसने भीड़ को अपने चेलों समेत पास बुलाकर उनसे कहा, “जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इनकार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।” मरकुस 8:34-35

ऑनलाइन कुछ भी करने से पहले हमें अक्सर उपयोग की शर्तों और नीतियों को सहमति देनी होती है। और जब हम “मैं सहमत हूँ” बॉक्स पर टिक करते हैं, तो क्रेडिट कार्ड कम्पनियाँ, सोशल मीडिया प्लेटफार्म और वेबसाइटें समय-समय पर हमें सूचित करती हैं कि उनकी कानूनी नीतियाँ बदल गई हैं—और यह कि सेवा का उपयोग जारी रखने के लिए हमें नई नीतियों को स्वीकार करना होगा।

ऐसी बदलती नीतियाँ अक्सर बार-बार होती हैं और सूक्ष्म होती हैं। इन्हें पहचानना या इन पर नज़र रखना लगभग असम्भव होता है। फिर भी, यह सौभाग्य की बात है कि मसीह के अनुयायी बनने की “शर्तें और नीतियाँ” कभी नहीं बदलतीं, और कभी नहीं बदलेंगी। उन्हें न तो हटाया जा सकता है और न ही हमारी पसन्द के अनुसार बदला जा सकता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर ने स्थापित किया है। इन पदों में, परमेश्वर के पुत्र ने अपने लोग बनने और अनन्त जीवन पाने के लिए “शर्तें और नीतियाँ” निर्धारित की हैं।

हम कभी-कभी ऐसा व्यवहार करते हैं मानो हमें प्रभु की आज्ञा का पालन करने के लिए खुद को मजबूर करना होगा। लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है! बाइबल कहती है कि जैसे हम यीशु की पहल और अनुग्रह के उत्तर स्वरूप उस पर विश्वास करते हैं (इफिसियों 2:8), वैसे ही वही अनुग्रह हमें बनाए रखता है और हमें उसके पीछे चलने में सक्षम बनाता है (फिलिप्पियों 1:6)। वह हमारे विचारों, हमारी नैतिकता, हमारे व्यवहार और हमारे संसाधनों को आकार देता है, ताकि हम उसके नियन्त्रण के अधीन आ सकें, जिसे हमने अपनी महिमा माना है।

मसीह का अनुसरण करने की एक “शर्त” यह है कि अब हमारे जीवन का केन्द्र हम स्वयं नहीं हैं। हमारी व्यक्तिगत पहचान और लक्ष्य प्राथमिकता नहीं हैं। इसके बजाय, हमारा रूपान्तरण हो जाता है, ताकि मसीह के साथ हमारी एकता के माध्यम से बाहर के संसार के सामने हम दृश्य रूप में फल ला सकें। वह हमें आत्म-उपासना का पूर्ण रूप से खण्डन करने का बुलावा देता है।

स्वयं को नकारने के द्वारा हम अपने क्रूस को उठाते हैं और मसीह का अनुसरण करते हैं। दुर्भाग्य से, “अपना क्रूस उठाने” का रूपक अक्सर हल्का कर दिया जाता है; हमें याद रखना चाहिए कि क्रूस की मृत्यु वास्तव में मानवता द्वारा आविष्कार की गई सबसे क्रूर और भयंकर मृत्यु की विधियों में से एक थी। क्रूस उठाने के इस रूपक का उपयोग करके यीशु यह स्पष्ट कर रहा है कि शिष्यता का एक बड़ा मूल्य है।

लेकिन मसीह हमें ऐसा कुछ करने के लिए नहीं कह रहा है, जो उसने पहले न किया हो। वही क्रूस था, जिस पर उसने हमें एक मूल्य चुकाकर खरीदा (1 कुरिन्थियों 6:20)। इसलिए उसकी शिष्यता में चलना हमारे पुराने मनुष्यत्व की मृत्यु की ओर तथा अनन्त जीवन की ओर ले जाने वाला एक अभियान है। यह एक सैर नहीं है, बल्कि एक जीवित बलिदान है, क्योंकि हम अपने नहीं हैं। लेकिन आशा रखें, क्योंकि इस अभियान में भी एक सुन्दरता है। एक दिन, मानव-पुत्र शक्ति और महिमा में वापस आएगा, और हरेक टूटे हुए को अपने राज्य में पुनः स्थापित करेगा। तब तक, परमेश्वर के राज्य के लिए अपने जीवन को खोना एक अच्छा निवेश है, चाहे मूल्य कुछ भी हो।

1 पतरस 3:13 – 4:11

10 May : देवाच्या नावाकरिता लोक

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10 May : देवाच्या नावाकरिता लोक
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“परराष्ट्रीयांतून आपल्या नावाकरता काही लोक काढून घ्यावेत म्हणून देवानें त्यांची भेट कशी घेतली, हे शिमोनाने सांगितले आहे.” ( प्रेषितांची कृत्ये 15:14 )

देवाच्या नावाच्या केंद्रीयतेवर जास्त जोर दिला गेला असें म्हणणे क्वचितच शक्य आहे, म्हणजें मंडळीच्या सुवार्ता कार्यातील प्रेरणेसाठीं देवाच्या कींर्तीचे महत्व खूप आहे.

जेव्हां प्रेषितांची कृत्ये 10 मध्यें अशुद्ध प्राण्यांच्या दृष्टांताने पेत्राच्या जगाची उलथा पालथ झाली, आणि देवानें त्याला धडा दिला कीं त्यांने यहुदीं बरोबर परराष्ट्रीयांना देखील सुवार्ता सांगायची आहे तेव्हां तो यरूशलेमात परत गेला आणि इतर प्रेषितांना सांगू लागला कीं हे सर्व देवाच्या त्याच्या नावासाठीं असलेल्या आवेशामुळें आहे. आपल्याला हे ठाऊक आहे कारण याकोबाने त्याच्या संदेशाचा सारांश अश्या प्रकारे केला, ‘मग त्यांचे भाषण संपल्यावर याकोब म्हणाला, “बंधुजनहो, माझे ऐका. परराष्ट्रीयांतून आपल्या नावाकरता काही लोक काढून घ्यावेत म्हणून देवानें त्यांची भेट कशी घेतली, हे शिमोनाने सांगितले आहे.” ( प्रेषितांची कृत्ये 15:13-14 ).

पेत्राचे हे म्हणणे कीं देवाच्या उद्देशासाठीं तो त्याच्या नावाकरिता लोक एकत्र करत आहे; यामध्यें आश्चर्य नाहीं कारण प्रभू येशूनें काही वर्षापूर्वी  पेत्राला कधीच विसरता न येणारा धडा दिला होता.

तुम्हाला आठवत असेंल, जेव्हां एक श्रीमंत तरुण येशूच्या मागे जाण्यांस नकार करून माघारी फिरून निघून गेला, तेव्हां पेत्राने त्याला म्हटले, “पाहा, आम्हीं सर्व सोडून आपल्यामागे आलो आहोत, [ या श्रीमंत मनुष्याप्रमाणे नाहीं ]  तर आम्हांला काय मिळणार?” (मत्तय 19:27). येशूनें सौम्य रीतीने त्याची कानउघाडणी केलीं, त्याला हे म्हणायचे होते कीं, मनुष्याच्या पुत्राच्या नावासाठीं जगत असताना कोणतेच बलिदान सर्वोत्तम नाहीं. तो म्हणाला, “आणखी ज्या कोणी घरे, भाऊ, बहिणी, बाप, आई, मुले किंवा शेते माझ्या नावाकरता सोडली आहेत त्याला शंभरपटीने मिळून सार्वकालिक जीवन हे वतन मिळेल” ( मत्तय 19:29).

येथें सत्य अगदी स्पष्ट आहे : देव त्याच्या सर्वसमर्थ आनंदानिशी विश्वव्यापी उद्देशाने, सर्व जाती, भाषा आणि  राष्ट्रांतून त्याच्या नावासाठीं लोक एकत्र करण्याच्या हेतूने शोध करीत आहे ( प्रकटीकरण 5:9; 7:9). राष्ट्रांमध्यें त्याच्या नावाची कींर्ती व्हावीं म्हणून त्याच्यामध्यें न विझणारा आवेश आहे.

म्हणून, जेव्हां आपण आपल्या प्रीतिची त्याच्या इच्छे बरोबर सांगड घालतो, आणी त्याच्या नावाकरिता जगिक प्रसिद्धी आणि सुख सोडून त्याच्या जागतिक उद्देशात सामील होतो, तेव्हां देवाची सर्वसमर्थ वचनबद्धता आपल्या पुढे एका निशाण्याप्रमाणे जाते, आणि जरी आपल्याला खूप संकटातून जावे लागले तरी आपण अपयशी होऊ शकत नाहीं ( प्रेषित 14:22; रोम 8:35-39).

9 मई : पूरी सहानुभूति

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9 मई : पूरी सहानुभूति
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“इस कारण उसको चाहिए था, कि सब बातों में अपने भाइयों के समान बने; जिससे वह उन बातों में जो परमेश्‍वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिए प्रायश्चित करे। क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है जिनकी परीक्षा होती है।” इब्रानियों 2:17-18

हममें से कई लोग इस बात से हतोत्साहित होते हैं कि हमें कितनी बार प्रलोभन का सामना करना पड़ता है। हम अपने जीवन में प्रलोभन के अपार आकर्षण से शर्मिन्दा हो सकते हैं। यह हम पर पूरी तरह से हावी हो सकता है। ऐसे क्षणों में यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि प्रलोभन का अनुभव करना अपने आप में पाप नहीं है—क्योंकि मसीह ने भी, जो निष्पाप था, इसका सामना किया था। लेकिन क्योंकि उसने प्रलोभनों के आगे आत्मसमर्पण नहीं किया, जैसा कि हम अक्सर करते हैं, इसलिए धार्मिकता का पालन करने में वह हमारे लिए परम आदर्श है।

जब मसीह ने मानव स्वभाव को अपनाया, तो वह इसकी सीमाओं और परीक्षणों के अधीन हो गया। इसलिए, हालाँकि यीशु परमेश्वर का दिव्य पुत्र और हमारा महान महायाजक है, केवल एक सामान्य इंसान नहीं है, हम यह जानकर हिम्मत पा सकते हैं कि वह हमारे संघर्षों के साथ पूरी तरह से सहानुभूति रख सकता है।

आपके और मेरे सामने आने वाली परीक्षाओं के मध्य में मसीह की सहानुभूति पाप के अनुभव पर निर्भर नहीं है, बल्कि पाप के प्रलोभन के अनुभव पर निर्भर है, जिसे केवल वही पूरी तरह जान सकता है जो वास्तव में निष्पाप है। यीशु दूर रहकर सहानुभूति नहीं दिखाता; वह प्रलोभन का सामना करने की पीड़ा और चुनौती को गहराई से जानता है। उसने हमारी पृथ्वी पर की राहों पर चलकर इसे अनुभव किया है।

तो फिर, जब आप प्रलोभन का सामना करने के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं और अपनी कमजोरियों के बारे में सबसे ज्यादा जागरूक होते हैं, तब आप इस स्थान पर जा सकते हैं। 21वीं सदी के “महान प्रधान याजकों” की सांसारिक बुद्धि पर भरोसा मत करें, जो आपको बताएँगे कि प्रलोभन इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही आते हैं, कि दोषी महसूस करना एक बीमारी है जिसे नकारा जाना चाहिए, और कि शर्म हमेशा अनावश्यक और हानिकारक होती है। इसके बजाय सच्चे महान महायाजक की ओर मुड़ें, जो आपको बताता है कि प्रलोभनों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए और जो आपको ऐसा करने की शक्ति भी प्रदान करता है (1 कुरिन्थियों 10:13), और जो आपको यह भी आश्वस्त करता है कि जब आप प्रलोभनों में आत्मसमर्पण कर देते हैं, तो आपका दोष और शर्म उसके शरीर में सहन कर लिया गया है और क्रूस पर मिटा दिया गया।

प्रभु यीशु मसीह के साथ सम्बन्ध में सबसे सुन्दर बात यह है कि आप पूरे आत्मविश्वास के साथ उसके पास जा सकते हैं, जिसने आपके लिए अपने प्राण दे दिए ताकि आप अपने विश्वास को दृढ़ता से पकड़ सकें। आप नियमित रूप से, विनम्रता से, विश्वास के साथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकते हैं, जो आपको सहानुभूति देने वाले मसीह के माध्यम से आपका स्वागत करता है। और अन्ततः, अनन्त काल में ऐसा कुछ भी नहीं होगा जिसके लिए मसीह को आपके पक्ष में प्रार्थना करने की आवश्यकता होगी। आप बस परमेश्वर के सामने खड़े हो सकेंगे और इस बात के लिए उसकी वन्दना कर सकेंगे कि उसने अपनी सिद्ध उपस्थिति में प्रवेश करने का निमन्त्रण आपको दिया। तब तक, उससे प्रार्थना करें जो यह जानता है कि प्रलोभन का सामना करना और प्रतिरोध करना क्या होता है, ताकि वह प्रलोभनों से आपके युद्ध के समय और आज आपके द्वारा उसके आज्ञापालन के प्रयासों में वह आपके साथ हो।

इब्रानियों  2:5-18

9  May : देवावर प्रीति करणे म्हणजें काय

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9  May : देवावर प्रीति करणे म्हणजें काय
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हे देवा, तू माझा देव आहेस; मी आस्थेने तुझा शोध करीन; शुष्क, रुक्ष व निर्जल प्रदेशात माझा जीव तुझ्यासाठीं तान्हेला झाला आहे, माझ्या देहालाही तुझी उत्कंठा लागली आहे. अशा प्रकारे तुझे बळ व वैभव पाहण्यास पवित्रस्थानी मी तुझ्याकडे दृष्टी लावली आहे. ( स्तोत्रसंहिता 63:1-2 )

दाविदासारख्या अंत:करणाचे समाधान केवळ देवच करू शकतो. आणि दाविद हा देवाच्या अंत:करणाचा माग घेणारा पुरुष होता. आपली निर्मिती यासाठींच झाली आहे.

देवावर प्रीति करणे म्हणजें काय याचे सार हेच आहे : देवामध्यें समाधानी असणे. देवामध्यें – तो देणार्‍या भेटीं मध्यें नाहीं, पण देवामध्यें, त्याच्या गौरवी व्यक्तित्वा मध्यें!

देवावर प्रीति करणे यात त्याच्या आज्ञा पाळणे हे आलेच; त्याच बरोबर त्याच्या वचनावर विश्वास ठेवणे; तसेंच त्याच्या सर्व दानांसाठीं त्याचे उपकार मानणे. पण हे सर्वे वरवरचे आहे. देवावर प्रीति करण्याचे मुलतत्व म्हणजें तो जसा आहे त्यासाठीं त्याचे कौतुक वाटणे आणि त्याचा आनंद घेणे. आणि देवा मधील हा आनंदच आपल्या इतर प्रतिसादांना त्याच्या करिता गौरवी करतो.

आपल्याला हे सर्व अंतर्ज्ञानाने आणि वचनाद्वारें ठाऊक आहे. आपले प्रियजन जे आपले सेवा करीत असतात, तेव्हां आपल्याला कधी सन्मान मिळाल्या सारखे वाटते , जेव्हां ते एक बंधन म्हणून करत  असतात का जेव्हां ते सहभागीतेतिल आनंदाकरिता करतात तेव्हां?

माझ्या पत्नीला खूप सन्मानित तेव्हां वाटते जेव्हां मी म्हणतो, “मला तुझ्या सोबत वेळ घालवल्याने खूप आनंद होतो.” माझा आनंद हा तिच्या उत्कृष्टतेचा प्रतिध्वनि आहे. आणि देवासोबत पण असेंच आहे. आपण जेव्हां त्याच्यामध्यें सर्वाधिक समाधानी असतो, तेव्हां तो आपल्यामध्यें सर्वाधिक गौरवला जातो.

आपण कुणीच देवामध्यें परिपूर्ण समाधान प्राप्त करू शकलो नाहीं. जेव्हां मला कोणत्या भौतिक गोष्टीला किंवा समाधांनाला गमवावे लागते तेव्हां माझ्या कुरकुरण्यावर मी खूप दु:खी होतो. पण मी जाणले आहे कीं देव हा चांगला आहे. देवाच्या कृपेने आनंदाच्या सार्वकालिक झर्‍याला मी जाणतो. आणि त्यामुळें मला माझे दिवस लोकांना ह्या आनंदाचे आमिष देण्यात घालवायला आवडते, जो पर्येंत ते माझ्या बरोबर हे म्हणत नाहींत, परमेश्वराजवळ मी एक वरदान मागितले, त्याच्या प्राप्तीसाठीं मी झटेन; ते हे कीं, आयुष्यभर परमेश्वराच्या घरात माझी वस्ती व्हावी; म्हणजें मी परमेश्वराचे मनोहर रूप पाहत राहीन व त्याच्या मंदिरात ध्यान करीन” ( स्तोत्रसंहिता 27:4 ).

8 मई :आत्मा का सामर्थ्य

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8 मई :आत्मा का सामर्थ्य
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“परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।”  प्रेरितों 1:8

पवित्र आत्मा हमें इसलिए दिया गया है ताकि परमेश्वर के लोग परमेश्वर के वचन को परमेश्वर के संसार में लाकर फैलाएँ।

पवित्र आत्मा के बिना प्रेरितों की पुस्तक की घटनाएँ कभी नहीं हो पाती—जिसमें सुसमाचार के विस्तार की कहानी बताई गई है, जिसमें यीशु के चेले यरूशलेम की सड़कों पर जाकर मृतकों में से जी उठे मसीह के सन्देश का प्रचार करते हैं। आखिरकार, कुछ हफ्ते पहले यही शिष्य अपने क्रूसित राजा के लिए शोक करते हुए एक डरे-सहमे छोटे से समूह के रूप में बन्द दरवाजों के पीछे छिपे बैठे थे। उनके अचानक बदलाव का कारण क्या था?

इसका उत्तर यीशु की मृत्यु पर विजय और उस प्रतिज्ञा में पाया जाता है जो उसने अपने शिष्यों को दी थी—पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा, जो उन्हें सक्षम और सशक्त बनाने के लिए था। यह प्रतिज्ञा एक आदेश के साथ जुड़ी हुई थी: यीशु के अनुयायियों को पूरे संसार में जाकर खुशखबरी का प्रचार करना था।

इससे पहले कि शिष्य उत्साह से बाहर निकलते, यीशु ने उनके ध्यान को केन्द्रित किया। वे अभी तक यह नहीं समझ पाए थे कि उनकी चिन्ता सिर्फ इस्राएल तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सभी लोगों के लिए थी। (और इस सत्य को पूरी तरह से समझने में उन्हें और समय लगने वाला था: प्रेरितों 10:1 – 11:18 देखें।) इसलिए यीशु ने अपने अनुयायियों से कहा कि वे “यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे।”

यीशु के स्वर्गारोहण के बाद पवित्र आत्मा उसके अनुयायियों पर उतरा, जैसा कि यीशु ने प्रतिज्ञा की थी—और तब कलीसिया के पूरे संसार में फैलने की महान कहानी शुरू हुई। यह ऐसी कहानी है जो अभी तक खत्म नहीं हुई है, और इसमें हर एक विश्वासी शामिल है, क्योंकि सुसमाचार का संसार में हर जगह प्रचार हो रहा है।

यदि आप मसीह में हैं, तो आपके पास वही पवित्र आत्मा है, और आप उसकी शक्ति से यीशु के सत्य को पूरे संसार में फैलाने के लिए सक्षम हैं। पवित्र आत्मा हमें इसलिए नहीं दिया गया था कि हम बस बैठकर अपने आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अन्य मसीहियों से बातें करते रहे। बल्कि हमें अपने उपहारों और क्षमताओं का उपयोग करके सुसमाचार को सभी जातियों तक पहुँचाने के लिए भेजा गया है। हममें से कुछ के लिए इसका मतलब है विदेशों में मिशन पर जाना। दूसरों के लिए इसका मतलब है इसी मिशन के हिस्से के रूप में अपने रास्ते या अपने शहर में सुसमाचार का प्रचार करना।

परमेश्वर आपको उन लोगों से भी प्रेम करने और सेवा करने के लिए बुलाता है, जिनके साथ आपकी कोई सामान्य सांसारिक नागरिकता नहीं है। वह आपको विभाजन रेखाओं को पार करने और उन लोगों के पास आने के लिए बुलाता है, जिनके प्रति आप स्वाभाविक रूप से उदासीन होते हैं, या यहाँ तक कि जिनसे साथ आपकी शत्रुता हो। लेकिन वह आपको वह प्रेम और साहस इकट्ठा करने के लिए नहीं कहता, जिसकी इसके लिए आवश्यकता है। नहीं—हमें एक ऐसी शक्ति से परिवर्तित होना होगा, जो हमारे भीतर से नहीं बल्कि बाहर से आती है, और यही वह प्रतिज्ञा है जो यीशु ने की थी और जो पवित्र आत्मा प्रदान करता है। इसलिए आज आप अपने जीवन में पवित्र आत्मा को ताजगी से उण्डेलने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करें, ताकि आप साहस और उत्साह के साथ खुशखबरी का प्रचार कर सकें।

प्रेरितों 1:1-11

8 May : त्याच्या नीतिनियमांमध्यें आनंद

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8 May : त्याच्या नीतिनियमांमध्यें आनंद
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देवावर प्रीति करणे म्हणजें त्याच्या आज्ञा पाळणे होय; आणि त्याच्या आज्ञा कठीण नाहींत. कारण जे काही देवापासून जन्मलेले आहे ते जगावर जय मिळवते; आणि ज्याने जगावर जय मिळवला तो म्हणजें आपला विश्वास. येशू देवाचा पुत्र आहे असा विश्वास जो धरतो त्याच्यावाचून जगावर जय मिळवणारा कोण आहे? ( 1 योहन 5:3-5 ).

ह्या वचनात जें स्पष्ट केलें आहे ते म्हणजें हे कीं नवा जन्म झाल्यानंतर – देवापासून जन्मल्यानंतर – त्याच्या ज्या आज्ञा आपल्याला ओझ्याप्रमाणे वाटत होत्यां त्या आता आपला आनंद बनतांत. हा बदल कसा झाला?

नव्याने जन्मल्याने देवाच्या आज्ञा ओझं वाटण्याऐवजी आनंददायक कश्या वाटू लागतात?

प्रेषित योहन म्हणतो, “ज्याने जगावर जय मिळवला तो म्हणजें – आपला विश्वास” (1 योहन 5:4). दुसर्‍या शब्दात सांगयाचे झालें तर, जो देवापासून जन्मला आहे तो कश्या प्रकारे आज्ञापालनाच्या जगिक ओझ्यावर जय मिळवतो, तर ते विश्वासाला जन्म देऊन. याची पुष्टी 1 योहन 5:5 मध्यें केलीं आहे, तिथें आपण वाचतो, “येशू देवाचा पुत्र आहे असा विश्वास जो धरतो तो देवापासून जन्मला आहे.”

आपला विश्वास आपण देवापासून जन्मलेले आहोत याचा पुरावा आहे. आपण देवावर विश्वास ठेवून स्वत: चा नवा जन्म घडवत नाहीं. देव आपला नवा जन्म घडवून आणतो आणि मग आपल्यामध्यें विश्वास ठेवण्याची इच्छा निर्माण करतो. जसा पेत्र त्याच्या पहिल्या पत्रात सांगतो, “जिवंत आशा प्राप्त होण्यासाठीं आपल्याला पुन्हा जन्म दिला” (1 पेत्र 1:3). आपली जिवंत आशा, किंवा आपला भावी कृपेवरील विश्वास, हे आपल्या नवीन जन्मादवारे देवानें घडवीलेले कार्य आहे.

जेव्हां योहान म्हणतो “जे काही देवापासून जन्मलेले आहे ते जगावर जय मिळवते,” आणि मग तो पुढे सांगतो कीं, “ज्याने जगावर जय मिळवला तो म्हणजें – आपला विश्वास ” (1 योहान 5:4). याचा अर्थ मी असा घेतो कीं देवानें नवीन जन्मा द्वारें आपल्याला जगावर जय मिळवण्यासाठीं समर्थ केलें – ते अश्या प्रकारे कीं, आपली आज्ञा पाळण्याच्या जगिक नाखुशीवर जय मिळवून. आपल्यामध्यें विश्वास निर्माण करून नवीन जन्म हे घडवून आणतो, ज्याचा पुरावा म्हणजें आपली प्रवृत्ती बदलून गेल्याने आपल्याला देवाच्या आज्ञा पाळणे ओझ्याप्रमाणे न वाटता, त्या आपल्याला संतोष देतात. यास्तव, तो विश्वास आहे जो आपल्यातील आणि देवामधील आणि त्याच्या इच्छांमधील जन्मजात शत्रुत्वावर जय मिळवतो, आणि त्याच्या आज्ञा पाळण्याकरिता आपल्याला मुक्त करतो, जेणे करून आपण स्तोत्रकर्त्या सोबत म्हणू शकू. “हे माझ्या देवा, तुझ्या इच्छेप्रमाणे करण्यात मला आनंद आहे” ( स्तोत्र 40:8 ).

7 मई : हम किसी न किसी की आराधना करते हैं

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7 मई : हम किसी न किसी की आराधना करते हैं
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“मैं अन्धों को एक मार्ग से ले चलूँगा जिसे वे नहीं जानते और उनको ऐसे पथों से चलाऊँगा जिन्हें वे नहीं जानते। उनके आगे मैं अन्धियारे को उजियाला करूँगा और टेढ़े मार्गों को सीधा करूँगा। मैं ऐसे-ऐसे काम करूँगा और उनको न त्यागूँगा। जो लोग खुदी हुई मूरतों पर भरोसा रखते और ढली हुई मूरतों से कहते हैं, ‘तुम हमारे परमेश्वर हो,’ उनको पीछे हटना और अत्यन्त लज्जित होना पड़ेगा।” यशायाह 42:16-17

बॉब डिलन के शब्दों में, आपको किसी न किसी की सेवा करनी होगी।[1] यह सच है—हम सभी किसी न किसी की उपासना करते हैं। सवाल सिर्फ यह है कि हम किसकी उपासना करते हैं।

हमारी मानवीय मूर्खता के कारण, हम अक्सर अपनी खुद की चालाकी से बनाई हुई छोटी-छोटी सृजनाओं पर निर्भर हो जाते हैं और अन्त में उनकी उपासना करने लगते हैं। पूरे इतिहास में, मनुष्यों की बुनियादी समस्या यह रही है कि हम हमेशा झूठे देवता बनाते रहते हैं, जिनकी पूजा करके हम झूठी मुक्ति ढूँढते रहते हैं। ये मूर्तियाँ सच्चे परमेश्वर का स्थान लेने के लिए लोगों द्वारा अपने दिलों से बनाई जाती हैं। प्रभु को अपनी श्रद्धा का केन्द्र और सन्तोष का स्रोत मानने की बजाय हम उन अच्छी वस्तुओं को, जो उसने हमारे आनन्द के लिए बनाई हैं, उसके स्थान पर व्यर्थ के विकल्पों में बदल देते हैं।

सी.एस. लुईस इसे इस तरह से कहते हैं: “हम आधे-अधूरे दिल से चलने वाले प्राणी हैं, जो शराब, सेक्स और महत्वाकांक्षाओं में फँसे रहते हैं, जबकि हमें अनन्त आनन्द दिया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे झुग्गी-झोंपड़ियों में रहने वाला एक अनजान बच्चा कीचड़ में खेलता रहता है, क्योंकि वह नहीं जानता कि समुद्र के किनारे छुट्टियाँ मनाने का क्या अर्थ होता है। हम बहुत आसानी से खुश हो जाते हैं।”[2]

हम चाहे दिल से बनाए गए किसी भी विकल्प पर अपनी जिन्दगी को आश्रित रखें, हम यह भूल जाते हैं कि ये मूर्तियाँ शक्तिहीन होती हैं। ये हमारी मदद नहीं कर सकतीं। जैसा कि यशायाह ने स्पष्ट किया है, इन मूर्तियों ने न तो कभी भविष्य बताया है और न ही कभी अतीत पर विचार करने में हमारी मदद की है; न ही ये हमें मार्गदर्शन दे सकती हैं। ये हमारे सवालों का जवाब केवल चुप्पी और निराशाजनक अपेक्षाओं के साथ देती हैं (यशायाह 41:22-23, 28-29)।

केवल सच्चा और जीवित परमेश्वर ही आरम्भ से अन्त तक सब कुछ जानता है। उसने चुप्पी को तोड़ा और आने वाली घटनाओं के बारे में बताया। वह अंधकार को अपनी रोशनी से हराता है। वह अधर्म के “कठिन स्थानों” को धार्मिकता की “समतल भूमि” में बदल देता है। हालाँकि हमने एक बार उससे मुँह मोड़ लिया था, तौभी उसने अपने सेवक, हमारे अद्‌भुत मार्गदर्शक, यीशु को भेजा।

आप और मैं लगातार उन मूर्तियों से घिरे होते हैं जो हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए हमें पुकारती रहती हैं और हमें परमेश्वर को छोड़कर उनके भीतर सन्तोष खोजने के लिए ललचाती हैं। कौन सी मूर्तियाँ आपको सबसे अधिक ऊँची आवाज़ में पुकारती हैं? जान लें कि वे झूठ बोल रही हैं (हालाँकि वे आपको यह नहीं बतातीं)। परमेश्वर का वचन हमें इनकी उपासना करने से आने वाली शर्म की चेतावनी देता है और हमें एक बेहतर रास्ता दिखाता है: उसकी उपासना करने और उससे सेवा प्राप्त करने में सन्तोष पाना।

आज आपको किसी न किसी की सेवा करनी होगी। सुनिश्चित कर लें कि वह जीवित, प्रेम करने वाला परमेश्वर हो।

 रोमियों 1:16-32

6 मई : सेंतमेंत दिया गया

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6 मई : सेंतमेंत दिया गया
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“तौभी तुम ने भला किया कि मेरे क्लेश में मेरे सहभागी हुए। हे फिलिप्पियो, तुम आप भी जानते हो कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में, जब मैं मकिदुनिया से विदा हुआ, तब तुम्हें छोड़ और किसी मण्डली ने लेने देने के विषय में मेरी सहायता नहीं की।”  फिलिप्पियों 4:14-15

मसीही होने का अर्थ प्राप्त करने वाला और देने वाला होना है।

हममें से बहुतों को यह सिखाया गया है कि अपने रिटायरमेण्ट अकाउण्ट में नियमित रूप से निवेश करना कितना जरूरी है। लेकिन जहाँ समझदारी से आर्थिक फैसले लेना गलत नहीं है, वहीं एक विश्वासी के रूप में हमें अपनी उदारता और निवेश को अनन्तकाल के नजरिए से भी देखना चाहिए।

फिलिप्पी की कलीसिया को लिखे अपने पत्र में, प्रेरित पौलुस ने मसीह में अपने भाइयों और बहनों की इस बात के लिए सराहना की कि उन्होंने उसके संघर्ष में साझेदारी की—ऐसी साझेदारी जिसमें भौतिक उपहारों को साझा करना और देना भी शामिल था। फिलिप्पियों की उदारता अद्वितीय थी क्योंकि अन्य कलीसियाओं से उसे ऐसा कोई सहयोग नहीं मिला था। हालाँकि यह कलीसिया नई-नई स्थापित हुई थी, फिर भी उन्होंने शुरू से ही ठान लिया था कि वे सुसमाचार के कार्य में पौलुस का समर्थन करेंगे।

पौलुस के लिए उनका सहयोग सिर्फ विशिष्ट नहीं बल्कि स्थाई भी था। फिलिप्पियों की कलीसिया कभी-कभार देने वाली नहीं थी, बल्कि वे लगातार और निरन्तर पौलुस की जरूरतों को पूरा करने का प्रयास करते रहे। हालाँकि पौलुस द्वारा पहली बार उन्हें सुसमाचार सुनाए एक दशक बीत चुका था, लेकिन वे अब भी उसके साथ खड़े थे।

उनका दान भावनाओं के किसी क्षणिक उभार का या किसी बाहरी दबाव या प्रलोभन का परिणाम नहीं था। नहीं, यह आरम्भिक कलीसिया इस सच्चाई को समझती थी कि जो कुछ उनके पास था, वह सब परमेश्वर की देन थी। जब यीशु ने अपने चेलों को भेजा था, तो उसने उन्हें याद दिलाया था कि “तुमने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो।” (मत्ती 10:8)। दूसरे शब्दों में, बलिदानी, उदार और संसाधन साझा करने वाली सहभागिता की नींव परमेश्वर का अनुग्रह है। यह नींव तब स्थापित होती है जब हम समझ जाते हैं कि हम जो कुछ हैं और हमारे पास जो कुछ है—हमारे सारे संसाधन, हमारे वरदान, और हमारी क्षमताएँ—सब उसी से आए हैं।

हम सबके पास देने के लिए समान साधन या सामर्थ्य नहीं है, और आर्थिक सहायता ही दान देने का एकमात्र तरीका नहीं है! लेकिन क्योंकि हम सब परमेश्वर के अनुग्रह के प्राप्तकर्ता हैं, इसलिए हमें दूसरों को देने की लालसा भी रखनी चाहिए। परमेश्वर ने अपने लोगों को इस प्रकार एक साथ रखा है कि हर कोई “उस अनुग्रह के अनुसार जो हमें दिया गया है,” दे (रोमियों 12:6)। हमें न तो इसलिए देना चाहिए क्योंकि हमें मजबूर किया गया है, न इसलिए कि कोई भावनात्मक गीत सुनकर हमारी आँखों में आँसू आ गए, और न ही इसलिए कि हमारा नाम किसी इमारत या बेंच पर लिखा जाएगा। हमें सिर्फ एक ही कारण से देना चाहिए—क्योंकि परमेश्वर ने हमें स्वतन्त्र रूप से और उदारता से दिया है।

2 कुरिन्थियों 9:1-15