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31 May : देवाची सेवा करण्याचा लाभ

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31 May : देवाची सेवा करण्याचा लाभ
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“माझी सेवा व इतर देशातील राजांची सेवा ह्यांतील भेद त्यांना कळावा म्हणून ते त्याचे अंकित होतील” (2 इतिहास 12:8).

देवाची सेवा करणे इतर कोणाची सेवा करण्यापेक्षा पूर्णपणे वेगळे आहे.

आपण हे समजून घ्यावें – आणि त्याचा आनंद घ्यावा- याविषयीं देव खूप आवेशी आहे. उदाहरणार्थ, तो आपल्याला आज्ञा देतो, “हर्षाने परमेश्वराची सेवा करा!” (स्तोत्र 100:2). ह्या हर्षामागे एक कारण आहे. ते प्रे. कृत्ये 17:25 मध्यें दिलेले आहे. “माणसांच्या हातून परमेश्वराची सेवा घडावी असेही नाहीं; कारण जीवन, प्राण व सर्वकाही तो स्वतः सर्वांना देतो.”

आपण आनंदाने त्याची सेवा करतो कारण त्याच्या गरजा पूर्ण करण्याचा भार आपल्यावर नाहीं. त्याला काही गरजा नाहींत. म्हणून, त्याची सेवा करणे म्हणजें त्याच्या गरजा पूर्ण करणे असा त्या सेवेचा अर्थ नाहीं. उलट आपण अशा सेवेत आनंद साजरा करतो ज्यात तो आपल्या गरजा पुरवितो. देवाची सेवा करण्याचा अर्थ आपल्याला जे करायचे आहे ते करण्यासाठीं देवाकडून कृपा प्राप्त करणे असा होय.

हे आम्हास समजावे याविषयीं देव किती ईर्ष्यावान किंवा आवेशी आहे आणि त्यांत त्याचे किती गौरव होते हे दाखवण्यासाठीं, 2 इतिहास 12 मध्यें एक गोष्ट आहे. शलमोनाचा मुलगा, रहबाम ज्याने दहा कुळांच्या बंडानंतर दक्षिणेकडील राज्यावर राज्य केलें, त्यानें परमेश्वराची सेवा न करण्याचा निर्णय घेतला आणि इतर देवतांची व इतर राज्यांची सेवा केलीं.

न्यायनिवाडा म्हणून, देवानें शिशकला 1200 रथ व 60,000 स्वार घेऊन रहबामाविरुद्ध पाठविले (2 इतिहास 12:2-3).

देवानें आपल्या दयेनुसार शमाया संदेष्ट्याला रहबामाकडे हा संदेश घेऊन पाठवले:  “परमेश्वर म्हणतो, ‘तुम्हीं मला सोडले म्हणून मीही तुम्हांला सोडून तुम्हांला शिशकाच्या हाती दिलें आहे” (2 इतिहास 12:5). त्या संदेशाचा हर्षयुक्त परिणाम असा झाला कीं रहबाम आणि त्याचे सरदार हे दीन झालें व पश्चात्ताप करून म्हणू लागले कीं, “परमेश्वर न्यायी आहे” (2 इतिहास 12:6).

ते दीन झालें आहेत असें परमेश्वराने पाहिले तेव्हां त्यानें म्हटले, “ते दीन झालें आहेत म्हणून मी त्यांचा नाश करणार नाहीं; मी लवकरच त्यांचा बचाव करीन; माझ्या क्रोधाचा वर्षाव शिशकाच्या हस्ते मी यरुशलेमेवर करणार नाहीं” (2 इतिहास 12:7).पण त्यांस ताडन म्हणून तो म्हणतो, “माझी सेवा व इतर देशातील राजांची सेवा ह्यांतील भेद त्यांना कळावा म्हणून ते त्याचे अंकित होतील” (2 इतिहास 12:8).

विषयाचा हेतू स्पष्ट आहे: शत्रूची सेवा करणे आणि देवाची सेवा करणे यात खूप फरक आहे. कसा? देवाची सेवा करणे म्हणजें प्राप्त करणे आणि आशीर्वाद आणि आनंद आणि लाभ आहे. शिशकाची सेवा करणे थकविणारे आणि रिक्त करणारे आणि कष्ट देणारे आहे. देव हा देणारा आहे. शीशक हा हिसकावून घेणारा आहे.

म्हणूनच मी हे मोठ्या आवेशाने सांगतो कीं रविवारची सकाळची उपासना आणि दैनंदिन आज्ञापालनाची उपासना हे मूलतः देवाला जाचक देणे नाहीं, परंतु देवाकडून आनंदाने प्राप्त करणे आहे. हीच खरी सेवा आहे ज्याची देव आम्हांकडून मागणी करतो. तुम्हीं जे काही करता त्यात, देणारा म्हणून माझ्यावर विश्वास ठेवा.

30 मई : प्रतिज्ञा किया हुआ प्रबन्ध

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30 मई : प्रतिज्ञा किया हुआ प्रबन्ध
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“तब यीशु ने उन से कहा, ‘हे बालको, क्या तुम्हारे पास कुछ मछलियाँ हैं?’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘नहीं।’ उसने उनसे कहा, ‘नाव की दाहिनी ओर जाल डालो तो पाओगे।’ अतः उन्होंने जाल डाला, और अब मछलियों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके।”  यूहन्ना 21:5-6

हम यीशु के पास क्या लाते हैं? केवल हमारी आवश्यकता।

यूहन्ना 21 में पुनर्जीवित यीशु के साथ मछली पकड़ने का दृश्य उस पहले दृश्य की याद दिलाता है, जब लूका 5 में गलील झील में शिष्यों को मछली पकड़ते दिखाया गया है। दोनों कथाओं में, पेशेवर मछुआरे होने के बावजूद, शिष्यों ने कठिन परिश्रम किया लेकिन कुछ नहीं पकड़ा। दोनों घटनाओं में, यीशु प्रकट हुआ और बहुत सारी मछलियाँ पकड़ने में उनकी सहायता की। पहली मुलाकात का उद्देश्य उन्हें मनुष्यों के मछुआरे बनने की शिक्षा देना था; दूसरी बार उनका उद्देश्य उन्हें परमेश्वर के राज्य में वृद्धि के कार्य में निरन्तरता बनाए रखने की याद दिलाना था। ये दोनों चमत्कार यह सिद्ध करते हैं कि शिष्य केवल परमेश्वर की शक्ति के माध्यम से ही सफल हो सकते थे।

यीशु का गलील झील पर तब जितना नियन्त्रण था जब शिष्य कुछ नहीं पकड़ पाए थे, उतना ही नियन्त्रण तब भी था जब उन्होंने बहुत सारी मछलियाँ पकड़ी थीं। वह उनके खालीपन पर उतना ही प्रभु था, जितना उनके भरपूर होने पर था। मसीह चाहता है कि हम अपनी दरिद्रता को देखें ताकि हम उसकी प्रावधान पर विस्मित हो सकें। जब आप और मैं अपने खालीपन से पूरी तरह अवगत होते हैं, तो हम यह विश्वास कर सकते हैं कि परमेश्वर उस पर भी नियन्त्रण रखे हुए है। वह हमें आमन्त्रित करता है कि हम अपने जीवन के हर खालीपन को उसकी अच्छाई और शक्ति से भरें।

जब यीशु ने शिष्यों से यह पूछा कि क्या वे मछली पकड़ पाए हैं, तो उसने उन्हें उनकी आवश्यकता की स्थिति का सामना करने और ईमानदारी से उत्तर देने के लिए मजबूर किया। मसीह आज भी हमारे खालीपन में हमसे सवाल करता है। वह बहाने, संवाद, या बहस नहीं ढूँढ रहा है। वह चाहता है कि हम अपनी आवश्यकता को ईमानदारी से स्वीकार करें। शिष्यों की स्थिति हमारे अपने समान है: हम जो काम निपुणता से करते हैं, उसे भी हम प्रभु की मदद के बिना नहीं कर सकते। हम परमेश्वर की सक्षम बनाने वाली कृपा के बिना न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं, न गा सकते हैं, न लिख सकते हैं, न काम कर सकते हैं, न ही खेल सकते हैं। जैसा कि यीशु ने यूहन्ना 15:5 में कहा था, “मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।”

यीशु ने शिष्यों को उनकी दरिद्रता में अकेला नहीं छोड़ा, और न ही उसने उन्हें केवल इतना ही दिया कि वे किसी तरह से गुजारा कर सकें; उसने बहुलता से एक बड़ा प्रावधान प्रदान किया। यह आपूर्ति इस बात को दर्शाती है कि जैसे यीशु ने उस पर विश्वास करने वाले सभी लोगों को शाश्वत जीवन की प्रतिज्ञा दी, वैसे ही वह हमारे माँगने या कल्पना करने से भी कहीं अधिक हमें देता रहता है। जब मसीह अपने आत्मा के द्वारा हमारे जीवनों में हस्तक्षेप करता है, तो वह हमें केवल एक पानी की बूँद नहीं देता; वह प्रतिज्ञा करता है कि हमारे हृदयों से जीवन के जल की नदियाँ बहेंगी (यूहन्ना 7:38)। जैसे यीशु ने शिष्यों को झील के किनारे पर उसके पास आने और नाश्ता करने का निमन्त्रण दिया था (21:9-10), वैसे ही वह आपको अपनी मेज़ पर आमन्त्रित करता है, ताकि आपकी भूख तृप्त हो सके। और जैसे वह आपको अपने साथ जुड़ने के लिए आमन्त्रित करता है, वैसे ही वह रास्ते में आपके पास आता है और आपकी यात्रा के लिए आवश्यकता से अधिक शक्ति प्रदान करता है।

यीशु ने कहा, “धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, क्योंकि वे तृप्त किए जाएँगे” (मत्ती 5:6)। आज अपनी आवश्यकता को उसके पास लाएँ। अपनी कमी के बारे में ईमानदारी से बताएँ। फिर उस पर विश्वास रखें कि वह आपको आपकी आवश्यकता से कहीं अधिक देगा ताकि आप अपने स्वर्गीय घर की ओर चलते हुए, उसके अद्‌भुत उद्देश्यों की सेवा करते हुए, आगे बढ़ सकें।

यूहन्ना 21:1-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 22–23; मत्ती 16 ◊

30 May : आढ्यता बाळगण्यासाठीं काही

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30 May : आढ्यता बाळगण्यासाठीं काही
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कारण कृपेनेच विश्वासाच्या द्वारें तुमचे तारण झालेंले आहे आणि हे तुमच्यां हातून झालें असें नाहीं, तर हे देवाचे दान आहे; कोणी आढ्यता बाळगू नये म्हणून कर्मे केल्याने हे झालें नाहीं. (इफिस 2:8-9).

नवीन करार ही खात्री करण्यासाठीं कीं आपण त्या गोष्टीविषयीं बढाई मारू नये जी केवळ कृपेनेच प्राप्त होते, विश्वास आणि कृपा यांतील परस्पर संबंध दाखवितो.

सर्वात सुपरिचित उदाहरणांपैकीं एक म्हणजें इफिस 2:8. कृपेनेच विश्वासाच्या द्वारें. या दोन तत्वांमध्यें कृपेच्या स्वातंत्र्याचे रक्षण करणारा परस्पर संबंध आहे. कृपेनेच विश्वासाच्या द्वारें.  

विश्वास आमच्यांत घडलेली बौद्धिक कृति आहे ज्याद्वारें आपण आपल्या स्वतःच्या अपुरेपणापासून परमेश्वराच्या मोफत आणि सर्वसंपन्न प्रयोजनाकडे वळते. अपात्र लोकांवर कृपा करण्याच्या परमेश्वराच्या स्वातंत्र्यावर विश्वास आपले लक्ष केंद्रित करतो. तो देवाच्या विपुलतेवर अवलंबून राहतो.

म्हणून विश्वास, स्वतःच्या व्याख्येनुसार, आढ्यता बाळगणे ठेचून टाकतो आणि कृपेस अनुकूल अशी सांगड घालतो. जेथेकोठे विश्वास पाहतो, तो प्रत्येक प्रशंसनीय कृत्यामागे कृपाच पाहतो. म्हणून विश्वास आढ्यता बाळगूशकत नाहीं, तर केवळ प्रभूमध्यें,जो कृपेचा कर्ता आहे, आढ्यता बाळगतो.

म्हणून पौल, तारण हे कृपेने विश्वासाच्या द्वारें आहे असें म्हटल्यानंतर पुढे म्हणतो, “आणि हे तुमच्यां हातून झालें असें नाहीं, तर हे देवाचे दान आहे; कोणी आढ्यता बाळगू नये म्हणून कर्मे केल्याने हे झालें नाहीं” (इफिस 2:8,9). विश्वास मानवी चांगुलपणा किंवा लायकीं किंवा बुद्धीचा अभिमान बाळगू शकत नाहीं, कारण विश्वास देवाच्या विनामूल्य, सर्व-संपन्न कृपेवर केंद्रित असतो. जो काही चांगुलपणा विश्वास पाहतो, तो त्याकडे कृपेचे फळ म्हणूनच पाहतो.

जेव्हां विश्वास आपले “ज्ञान म्हणजें नीतिमत्त्व आणि पवित्रीकरण व खंडणी भरून प्राप्त केलेंली मुक्ती” यांकडे पाहते तेव्हां तो म्हणतो, “जो अभिमान बाळगतो, त्यानें परमेश्वराविषयी तो बाळगावा” (1 करिंथ. 1:30-31).

29 मई : क्रूस का अर्थ

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29 मई : क्रूस का अर्थ
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“वरन् इसी समय उसकी धार्मिकता प्रगट हो कि जिससे वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्‍वास करे उसका भी धर्मी ठहराने वाला हो।” रोमियों 3:26

यदि मसीह की क्रूस पर मृत्यु न होती, तो कोई सुसमाचार नहीं होता। यीशु के बलिदान के माध्यम से ही यह सम्भव हुआ है कि परमेश्वर पिता ने पापी मनुष्यों को अपने साथ संगति में आने का अवसर प्रदान किया है। यदि हम परमेश्वर को जानना चाहते हैं, तो हमें उससे प्रभु यीशु मसीह में मिलना होगा। केवल क्रूस के माध्यम से ही परमेश्वर पाप को सजा देने में न्याय और उसकी क्षमा प्रदान करने में दया दिखाता है, जिससे आप और मेरे जैसे लोग स्वर्ग की पवित्रता को भंग किए बिना उसमें प्रवेश कर सकें। क्रूस परमेश्वर का उत्तर है न केवल पाप के खिलाफ, बल्कि पाप पर उसके पवित्र क्रोध के खिलाफ भी। जो लोग विश्वास नहीं करते, उनके लिए परमेश्वर का यह उत्तर बिल्कुल मूर्खतापूर्ण लगता है, लेकिन जो विश्वास करते हैं वे क्रूस को परमेश्वर की शक्ति के रूप में समझते हैं (1 कुरिन्थियों 1:18)।

यदि परमेश्वर पाप को नजरअंदाज कर देता या उस पर क्रोधित होना बन्द कर देता, तो वह परमेश्वर नहीं रह सकता था; क्योंकि परमेश्वर का न्याय उसके स्वभाव में निहित है, और न्याय माँग करता है कि पाप को सजा मिले। वह बुराई पर आँखें नहीं मूँद सकता। जब हम दूसरों के हाथों पीड़ित होते हैं, तो यह हमारे लिए शुभ समाचार है; यह हमें दीन करने वाला समाचार भी है क्योंकि हम स्वयं भी पापी हैं।

मसीह का क्रूस वह तरीका है जिसके द्वारा परमेश्वर न्यायी रह सकता है और उन पापियों को निर्दोष घोषित कर सकता है जिन्होंने इस क्रूसित उद्धारकर्ता पर विश्वास किया है। पाप से निपटने के लिए परमेश्वर ने अपनी कृपा में अपने पुत्र को भेजा, ताकि वह उस सजा को उठाए जो पापियों को मिलनी चाहिए। हमारा उद्धार इस कारण आया है, क्योंकि मसीह ने हमारा स्थान ले लिया। इस पर विचार करने के लिए रुकिए। यह चौंकाने वाला तथ्य है, पहले इसलिए कि परमेश्वर ने यह योजना बनाई, और दूसरा इसलिए कि उसने इसे पूरा किया। क्रूस पर विचार करते समय हमेशा हमें विस्मित और विनम्र स्तुति की ओर प्रेरित होना चाहिए।

मसीह के द्वारा हमारा स्थान लेना ही वह कारण है कि सभी पुराने नियम के बलिदान यीशु की ओर इशारा करते हैं। मसीह की मृत्यु में परमेश्वर का क्रोध, जो कि पाप के प्रति उसकी धार्मिक प्रवृत्ति है, सन्तुष्ट होता है, और हमारे लिए उसका प्रेम और अधिक उजागर होता है। जो लोग यीशु पर विश्वास कर लेते हैं, उन्हें अब उसके क्रोध का सामना करने की आवश्यकता नहीं है; इसके बजाय हमें क्रूस पर प्रकट हुए प्रेम पर आनन्दित होने के लिए आमन्त्रित किया जाता है। सचमुच, सुसमाचार के सभी आशीर्वाद और लाभ उसके कारण हमारे हो जाते हैं, जो यीशु ने अपनी जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान में पूरा किया।

यीशु इसलिए आया कि पाप पर आने वाले परमेश्वर के सारे दण्ड को अपने ऊपर उठा ले। जब मसीह ने हमारा स्थान लिया, तो उसने हमारे ऊपर आने वाले अन्तिम न्याय को क्रूस पर लाकर हमें परमेश्वर के सिंहासन के सामने खड़ा किया, ताकि हम कह सकें, “मैं उसके साथ हूँ। उसने वह जीवन जीया जो मैं नहीं जी सकता था। वह मेरे स्थान पर मरा।”

अपने पहले पत्र में, यूहन्ना लिखता है कि कभी-कभी “हमारा मन हमें दोष देगा” (1 यूहन्ना 3:19)। यह एक ऐसा अनुभव है, जिसका सामना सभी लोग करते हैं। लेकिन मसीही लोगों को अपने विवेक को दागदार करने की जरूरत नहीं है, ताकि वे दोष लगाने वाली आवाज़ को शान्त कर सकें, और न ही उन्हें उस आवाज़ से दबकर रहने की आवश्यकता है। हम अपने पाप की गहराई के बारे में बहुत ईमानदार हो सकते हैं क्योंकि परमेश्वर का प्रेम उससे भी गहरा है। “अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं है” (रोमियों 8:1)। यीशु क्रूस पर हमसे मिलने के लिए आया। माफ किए गए पापी, क्या आप वहाँ जाकर उससे मिलेंगे और उसे देखकर हैरान होंगे?

लूका 15:11-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 19–21; मत्ती 15:21-39

29 May : देव नियम शास्त्रांत प्रकट स्वतःच्या इच्छेविरुद्ध जातो तेव्हां

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29 May : देव नियम शास्त्रांत प्रकट स्वतःच्या इच्छेविरुद्ध जातो तेव्हां
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“तरीपण ते आपल्या पित्याचा शब्द ऐकेनात कारण देवाला त्यांना मारून टाकायचे होते.” (1 शमुवेल 2:25)

एली याजक जेव्हां त्याच्या मुलांना त्यांच्या पापांसाठीं हटकत असें तेव्हां ते त्याच्या आज्ञेचे पालन करीत नसत. आमच्या जीवनांसाठीं ह्या वचनाचे तीन अर्थ आहेत.

1) फार काळपर्यंत आणि अतिशय गंभीरपणे पाप करणे शक्य आहे कीं स्वतः परमेश्वरहि पश्चात्तापबुद्धी देणार नाहीं.

म्हणूनच पौलाने म्हटले कीं आपण प्रार्थना आणि शिक्षण देण्याचे सर्व कार्य पार पाडल्यानंतर, “कदाचित देव त्यांना सत्याचे ज्ञान होण्यासाठीं पश्चात्तापबुद्धी देईल,” – “त्यांस पश्चातापबुद्धी देईलच” असें नाहीं (2 तीमथ्य 2:25). जेव्हां आपण पापाचे जीवन जगत असतो तेव्हां पश्चातापासाठीं “फार उशीर” झालेंला असू शकतो. इब्री 12:17 मध्यें जसे एसावाबद्दल म्हटले आहे, “त्यानें जरी अश्रू ढाळून फार प्रयत्न केला तरी पश्चात्तापाची संधी त्याला मिळाली नाहीं.” त्याचा त्याग करण्यात आला, तो पश्चाताप करू शकला नाहीं.

याचा अर्थ हा नाहीं कीं जे लोक संपूर्ण आयुष्यभर पाप केल्यानंतर खरोखर पश्चात्ताप करतात त्यांचे तारण होऊ शकत नाहीं. ते नक्कीच तारण पावू शकतात आणि पावतील! देव अत्यंत दयाळू आहे. वधस्तंभावरील चोराची आठवण करा. येशू ने त्याला म्हटले, “मी तुला खचीत सांगतो, तू आज माझ्याबरोबर सुखलोकात असशील.” (लूक 23:43).

2) कधी कधी देव पाप करणाऱ्या व्यक्तीस योग्य ते करू देत नाहीं.

“तरीपण ते आपल्या पित्याचा शब्द ऐकेनात कारण देवाला त्यांना मारून टाकायचे होते.” त्यांच्या पित्याचा शब्द ऐकणे म्हणजें जे योग्य ते त्यांना करावयांस पाहिजे होते. पण ते तसें करेनात. का? “कारण देवाला त्यांना मारून टाकायचे होते.” 

त्यांनी त्यांच्या पित्याची आज्ञा पाळली नाहीं या मागे कारण हे होते कीं त्यांच्या बाबतींत देवाचे हेतू निराळे होते,  आणि त्यानें त्यांना पाप आणि मृत्यूसाठीं सोडून दिलें होते. यावरून असें दिसून येते कीं असें समय आहेत जेव्हां देवाची पूर्वनियोजित योजना ही देवाच्या नियमशास्त्रांत प्रकट झालेंल्या इच्छेपेक्षा वेगळी असते.

3) कधीकधी देवाची प्रकट इच्छा पूर्ण व्हावी यासाठीं आपल्या प्रार्थना केल्या जात नाहींत कारण देवानें आपल्या पवित्र आणि बुद्धीसम्मत हेतूंसाठीं काहीतरी वेगळे ठरवलेले असते.

मला असें वाटते कीं त्याच्या मुलांचे परिवर्तन व्हावें म्हणून एलीने प्रार्थना केलीं. आणि नक्कीच, त्याला अशाच प्रकारे प्रार्थना करणे अगत्याचे होते. पण देवानें हे योजिले होते कीं तो हफनी आणि फिनहास यांनी आज्ञा पाळू नये, तर मारले जावे.

जेव्हां असें काहीतरी घडते (जे आपल्याला सामान्यतः ती वेळ येईपर्यंत ठाऊक नसते) कीं जेव्हां एकींकडे आपण परिवर्तनासाठीं परमेश्वराचा धावा करत असतो, तेव्हां परमेश्वराचे उत्तर असें नसते:  “मी तुजवर प्रीति करीत नाहीं.” त्याऐवजी उत्तर असें असते : “या पापावर विजय न मिळविण्यामागे आणि पश्चात्ताप न करण्यामागे माझे बुद्धियुक्त आणि पवित्र हेतू आहेत. तुला हे सर्व हेतू आता दिसत नाहींत. मजवर विश्वास ठेव. मी काय करत आहे हे मला माहीत आहे. मी तुजवर प्रीति करतो.”

28 मई : फूट और विभाजन

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28 मई : फूट और विभाजन
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पहली सदी की कलीसिया में विभाजन पैदा करने वाले लोग अनोखे नहीं थे; वे कलीसिया के इतिहास में हमेशा से मौजूद रहे हैं। इसलिए यहूदा का यह निर्देश आज हमारे लिए उतना ही व्यावहारिक है, जितना कि उन विश्वासियों के लिए था जिनके लिए उसने अपना पत्र लिखा था।

प्रारम्भिक कलीसिया में विभाजन उत्पन्न करने वाले लोग नैतिक और सैद्धान्तिक दोषों के हानिकारक मिश्रण से ग्रसित थे। वे आत्मा से रहित थे, इंद्रिय भोग का प्रचार कर रहे थे और “अपनी अभिलाषाओं के अनुसार चलने वाले थे” (यहूदा 16), फिर भी किसी प्रकार वे परमेश्वर के लोगों के बीच घुसने में कामयाब हो गए थे। यहूदा उन्हें “समुद्र में छिपी हुई चट्टान” (पद 12) कहता है, जो पानी की सतह से बस इतना नीचे होती हैं कि उनका पता नहीं चलता, और फिर भी यदि कोई जहाज उनसे टकरा जाए, तो वे उसे पूरी तरह से तबाह कर सकती हैं। सचमुच, ये चट्टानें उस जहाज को डुबोने में सक्षम होती हैं।

इन ठगों के खिलाफ, यहूदा अपने साथी विश्वासियों से विनती करता है कि वे उन बातों को न भूलें जिन्हें “प्रेरित पहले ही कह चुके” थे, जिन्होंने चेतावनी दी थी कि “पिछले दिनों” में—अर्थात प्रभु के स्वर्गारोहण और उनके पुनः आगमन के बीच—ऐसे लोग होंगे जो मसीह और उसके चुने हुए प्रेरितों की शिक्षा का मजाक उड़ाएँगे और जो हमारी शारीरिक चाहतों से प्रेरित व्यवहार को सहन करेंगे और यहाँ तक कि उसे बढ़ावा भी देंगे। परमेश्वर के प्रावधान के अनुसार प्रारम्भिक कलीसिया को पहले से चेतावनी दी गई थी ताकि वे इन विभाजनकारी लोगों से सावधान रहें—और हम भी उसी तरह से चेतावनी प्राप्त करते हैं।

लेकिन परमेश्वर का वचन हमें केवल उन लोगों से केवल सतर्क रहने के लिए नहीं ही कहता जो विघटन और विभाजन उत्पन्न करते हैं; बल्कि यह हमें उन लोगों के साथ दयालुता से व्यवहार करने का भी निर्देश देता है जो वास्तविक सन्देह से जूझ रहे हैं। झूठे शिक्षकों की शिक्षा और उद्देश्यों का प्रतिरोध करने के साथ-साथ हमें “उन पर जो शंका में हैं दया” करनी है और “बहुतों को आग में से झपटकर” निकलना है (यहूदा 22-23। इस सन्तुलन को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है! और फिर भी यहूदा इस प्रोत्साहन से पीछे नहीं हटता। जो विश्वास में और सैद्धान्तिक शिक्षा में स्थिर हैं, उन्हें कहा गया है कि वे गिरते हुओं को नम्रता के साथ सम्भालें (गलातियों 6:1 देखें) और उन लोगों के जीवनों में हस्तक्षेप करें जो आग के साथ खेल रहे हैं।

चूंकि परमेश्वर ने आपको बचाया और सम्भाला है, इसलिए आप से यह अपेक्षित है कि आप खतरे से सतर्क रहें और दूसरों को साहसिक रूप से लेकिन नम्रता के साथ आग से बाहर खींचें। और आपको परमेश्वर के प्रेम में अपने आप को बनाए रखने और प्रार्थना करने के लिए कहा गया है (यहूदा 20), ताकि आप गलती को पहचान सकें और उन लोगों का प्रतिरोध कर सकें जो परमेश्वर के कलीसिया को विभाजित करने का प्रयास कर रहे हैं। तब आप अपने भाइयों और बहनों के साथ खड़े हो पाएँगे और यहूदा के साथ कह पाएँगे, “उस एकमात्र परमेश्‍वर हमारे उद्धारकर्ता की महिमा और गौरव और पराक्रम और अधिकार, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा जैसा सनातन काल से है, अब भी हो और युगानुयुग रहे। आमीन।” (पद 25)।

यहूदा 1-25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 17–18; मत्ती 15:1-20 ◊

28 May : धीराचे प्रतिफळ

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28 May : धीराचे प्रतिफळ
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“तुम्हीं माझे वाईट योजले, पण आज पाहता त्याप्रमाणे अनेक लोकांचे प्राण वाचावे म्हणून देवानें ते चांगल्यासाठींच योजले होते.” (उत्पत्ति 50:20)

उत्पत्ती 37-50 मधील योसेफाची गोष्ट आम्हीं देवाच्या सार्वभौम, भविष्यातील कृपेवर विश्वास का ठेवला पाहिजे याविषयी एक मोठा धडा आहे.

योसेफाला त्याच्या भावांनी गुलाम म्हणून विकले, ज्यामुळें त्याच्या धीराची मोठी परीक्षा घेण्यांत आली असावी. पण त्याला मिसर देशात पोटीफरच्या घरात चांगली नोकरी दिली गेली. मग, जेव्हां तो आज्ञापालनाच्या अनियोजित स्थानी सरळपणाने वागत असतो, तेव्हां पोटीफरची पत्नी त्याच्या प्रामाणिकपणाविषयी खोटे बोलते आणि त्याला तुरुंगात टाकण्यात येते – त्याच्या धीराची दुसरी मोठी परीक्षा.

पण पुन्हा परिस्थिती सुधारते आणि बंदिशाळेचा अधिकारी त्याला जबाबदारी आणि आदर देतो. पण जेव्हां त्याला वाटते कीं त्याला ज्याच्या स्वप्नाचा त्यानें अर्थ सांगितला होता त्या फारोच्या प्यालेदारामुळें मुक्ती मिळणार आहे, तो प्यालेदार त्याला आणखी दोन वर्षे विसरून जातो. त्याच्या धीराची आणखी एक दुःखद परीक्षा.

शेवटी, या सर्व वळणांचा आणि विलंबांचा अर्थ स्पष्ट होतो. योसेफाला मिसर देशचा नेता म्हणून तयार केलें जाते, फारोनंतर त्याचे दुसरे स्थान आहे. ज्या भावांनी त्याला गुलाम म्हणून विकले होते त्यांना तो उपासमारीपासून वाचवतो. बऱ्याच काळपासून दुरावलेल्या या भावांना योसेफ म्हणतो, “देवानें मला तुमच्यांपुढे ह्यासाठीं पाठवले कीं तुमचा पृथ्वीवर अवशेष ठेवावा…तुम्हीं माझे वाईट योजले, पण आज पाहता त्याप्रमाणे अनेक लोकांचे प्राण वाचावे म्हणून देवानें ते चांगल्यासाठींच योजले होते” (उत्पत्ति 45:7;50:20).

या प्रदीर्घ वर्षांच्या निर्वासन आणि गैरवर्तनाच्या काळात योसेफाच्या धीराची गुरुकिल्ली कोणती असावी? उत्तर आहे: देवाच्या सार्वभौम, भावी कृपेवर विश्वास – अनियोजित जागा आणि अनियोजित गतीस कल्पनीय सुखद अंतात बदलणाऱ्या देवाच्या सार्वभौम, भावी कृपेवर विश्वास. हीच आपल्या धीराची गुरुकिल्ली आहे. जेव्हां आपल्या जीवनांत सर्वात विचित्र आणि सर्वात दुःखद वळण येतांत, तेव्हां देव आपल्यासाठीं कार्य करत आहे असा विश्वास तुम्हीं ठेवता का?

27 मई : आत्मिक आलस्य से निपटना

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27 मई : आत्मिक आलस्य से निपटना
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“छोटी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के और लेटे रहना, तब तेरा कंगालपन डाकू के समान, और तेरी घटी हथियारबन्द मनुष्य के समान आ पड़ेगी।” नीतिवचन 24:33-34

हम सभी ने इसे देखा है। खेल, व्यापार, और अकादमिक संसार में, कम सक्षम व्यक्ति अक्सर उन लोगों से आगे बढ़ जाते हैं जिनके पास अधिक क्षमता होती है, केवल एक गुण के कारण: कर्मठता। ऐसे लोग आलस्य की चुनौती को गम्भीरता से लेते हैं और इसके आकर्षण से बचने के लिए जो भी करना चाहिए, करते हैं। आप शायद ऐसे ही एक व्यक्ति हैं या एक ऐसा व्यक्ति बनने की आकांक्षा रखते हैं और इसके लिए परिश्रम करते हैं।

लेकिन यदि हम ईमानदारी से कहें, तो इस कर्मठता की कमी अक्सर हमारे आत्मिक जीवन में भी पाई जाती है।

यदि आप और मैं आत्मिक आलस्य का मुकाबला करना चाहते हैं, तो हमें एक तरह का मूल्यांकन करने की आवश्यकता है: क्या हमें कोई संकेत मिलता है कि हमारा आत्मिक जीवन कैसा चल रहा है? जब हम पिछले साल पर विचार करते हैं, तो क्या हमने कोई प्रगति की है? क्या हमने हाल ही में कोई बाइबल पद याद किए हैं? क्या हमने “खाली समय” का उपयोग बाइबल पढ़ने या मनन करने या अपने प्रभु से प्रार्थना करने में किया है? या आलस्य के कारण हम सर्वोत्तम को छोड़कर आसान को करने के लिए मजबूर हुए हैं और इसने हमें परमेश्वर के वचन को अपने दिल में संजोने से रोक दिया है?

जब हमें मसीही सेवा में भाग लेने के लिए कहा जाता है, तो हम कैसे प्रतिक्रिया करते हैं? शायद यह सीधे तौर पर इनकार नहीं होता, लेकिन यहाँ तक कि थोड़ी सी झिझक भी एक खतरनाक संकेत है। जब परमेश्वर के वचन का प्रचार किया जाता है, और जब यह शक्ति और प्रभाव के साथ हमारे दिलों में आता है और हमें पता होता है कि यह लागू करने और परिवर्तन की माँग करता है, तो हम क्या करते हैं? क्या हम वचन के केवल सुनने वालों की तरह नहीं, बल्कि उसे करने वालों की तरह प्रतिक्रिया करते हैं (याकूब 1:22)?

ऐसे प्रश्नों के उत्तर हमें आगे बढ़ने में मदद कर सकते हैं और आलस्य की धीमी प्रक्रिया (सुबह प्रार्थना करने के बजाय लेटे रहना, प्रार्थना सभा में जाने के बजाय टी.वी. देखना, या यीशु के बारे में बातचीत करने के बजाय खेल का मैच देखना) से बचने में मदद कर सकते हैं, जो आत्मिक दरिद्रता की ओर ले जाती है। अधूरी आत्मिक योजनाओं और अधूरे अच्छे इरादों के मालिक न बनें। अक्सर, शुरू की गई योजनाएँ, दयालु शब्दों में लिखे गए नोट्स, और पछतावे और मदद की प्रार्थनाएँ हमारे दिमाग में मर जाती हैं, जब हम अपने बिस्तर पर ऐसे करवटें लेते रहते हैं, “जैसे किवाड़ अपनी चूल पर घूमता है” (नीतिवचन 26:14)। इस व्यवहार से दूर भागें और इसके बजाय दौड़कर मसीह के पास आएँ, उससे प्रार्थना करें कि वह आपके दिल को उत्तेजित करे और आपको एक सक्रिय व्यक्ति बनाए।

क्या आप परमेश्वर के लिए उपयोगी होना चाहते हैं? क्या आप कोई अन्तर लाने की इच्छा रखते हैं: कि आप लोगों तक पहुँचें, उनके जीवन के समुद्र में उनके सारे दुखों और खालीपन में शामिल हों और परमेश्वर की कलीसिया के निर्माण का एक साधन बनें? आलस्य को स्थान देकर अपनी आत्मा को अनदेखा न करें। परमेश्वर के साथ आपके सम्बन्ध में कर्मठता के बिना, आप अपने जीवन में कोई वास्तविक फल नहीं उत्पन्न कर पाएँगे। “आने वाला कल” शैतान के प्रिय शब्द हैं। “देखो, अभी वह प्रसन्नता का समय है; देखो, अभी वह उद्धार का दिन है” (2 कुरिन्थियों 6:2, बल दिया गया है)। अभी परमेश्वर के लिए उपयोगी बनें।

नीतिवचन 24:27-34

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 15–16; मत्ती 14:22-36

27 May : अस्सल विरूद्ध नकली विश्वास

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27 May : अस्सल विरूद्ध नकली विश्वास
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“त्या अर्थी ख्रिस्त ‘पुष्कळांची पापे स्वतःवर घेण्यासाठीं’ एकदाच अर्पण केला गेला, आणि जे त्याची वाट पाहतात त्यांना पापसंबंधात नव्हे तर तारणासाठीं तो दुसऱ्यांदा दिसेल.” (इब्री 9:28)

आपल्या सर्वांसमोर जो प्रश्न आहे तो हा: ख्रिस्ताने ज्यांची पापे वाहून नेली त्या “पुष्कळ” लोकांमध्यें आपला समावेश आहे का? आणि तो दुसऱ्यांदा दिसेल  त्यां वेळी आपण तारले जाऊ का?

इब्री 9:28 चे उत्तर आहे, “होय,” जर आपण “त्याची उत्सुकतेने वाट पाहत आहोत.” आपण जाणू शकतो कीं आपली पापे वाहून नेण्यात आली आहेत आणि न्यायनिवाडा होईल त्यां दिवशी आपण सुरक्षित असू, जर आपण ख्रिस्तावर अशाप्रकारे विश्वास ठेवतो कीं तो विश्वास आम्हास त्याच्या आगमनासाठीं उत्सुक करतो.

एक नकली, बनावटी विश्वास आहे जो ख्रिस्तावर विश्वास ठेवण्याचा दावा करतो, परंतु केवळ अग्नि विमा धोरण आहे. नकली विश्वास नरकापासून बचाव करण्यासाठीं “विश्वास ठेवतो.” त्याला ख्रिस्तासाठीं खरी इच्छा नसते. खरे म्हणजें, तो न आल्यास त्याला आवडेल, यासाठीं कीं आपल्याला या जगाच्या सुखांचा होईल तितका आस्वाद घेता यावा. यावरून दिसते कीं ते हृदय ख्रिस्तासोबत नाहीं, जगासोबत आहे.

तर, आपल्यासाठीं मुद्दा हा आहे कीं आपण ख्रिस्ताच्या आगमनाची उत्कंठेने वाट पाहत आहोत का? कीं जगासोबत आपले प्रेमसंबंध सुरू असताना त्यानें आमच्यापासून दूर राहावे असें आम्हास वाटते? हाच प्रश्न आहे जो विश्वासाच्या खरेपणाची पारख करतो.

“आपला प्रभू येशू ख्रिस्त ह्याच्या प्रकट होण्याची वाट” पाहत असतांना आपण करिंथकरांसारखे बनावे (1 करिंथ 1:7) आणि फिलिप्पैकरांसारखे ज्यांचे ”नागरिकत्व तर स्वर्गात आहे; तेथून प्रभू येशू ख्रिस्त हा तारणारा येणार आहे, त्याची आपण वाट पाहत आहोत“ (फिलिप्पै 3:20).

आमच्यासाठीं हा मुद्दा आहे. त्याचे प्रगट होणे आपल्याला आवडते का? किंवा आपले जगावर प्रेम आहे आणि आम्हीं आशा करतो कीं त्याचे प्रगट होणे आपल्या योजनांमध्यें अडखळण आणणार नाहीं? या प्रश्नावर अनंतकाळ अवलंबून आहे.

26 मई : परमेश्वर का अपरिवर्तनीय वचन

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26 मई : परमेश्वर का अपरिवर्तनीय वचन
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“विश्‍वास ही से अब्राहम ने, परखे जाने के समय में, इसहाक को बलिदान चढ़ाया; और जिसने प्रतिज्ञाओं को सच माना था और जिससे यह कहा गया था, ‘इसहाक से तेरा वंश कहलाएगा,’ वही अपने एकलौते को चढ़ाने लगा।” इब्रानियों 11:17-18

जीवन कभी-कभी भारी महसूस हो सकता है। हर दिन नए चुनौतीपूर्ण क्षण लेकर आता है, जबकि पुरानी समस्याएँ बिना हल हुए जारी रहती हैं। यह आसान है कि हम अपने विश्वास को हमारी परिस्थितियों की समझ की कमी के कारण ठोकर खाकर गिरने दें—यह ऐसा है मानो विश्वास की छड़ी को यह कहते हुए जमीन पर फेंक देना, “मैं थक चुका हूँ, अब मैं और नहीं दौड़ सकता।” ऐसे क्षणों में, परमेश्वर का वचन हमें यह याद रखने के लिए प्रोत्साहित करता है कि मसीही विश्वास एक दृढ़ विश्वास है जो दृढ़ रहता है। यह सम्भव है कि हम परमेश्वर के आदेशों का पालन करते रहें, भले ही हमारे चारों ओर सब कुछ उसकी प्रतिज्ञाओं के विपरीत प्रतीत होता हो।

क्रूस से पहले, शायद पूरे पवित्रशास्त्र में अब्राहम के जीवन से अधिक अभूतपूर्व क्षण कहीं और नहीं मिलता। यह वह क्षण था जो पूरी तरह से परमेश्वर के आदेश से हुआ था: “[परमेश्वर] ने कहा, ‘अपने पुत्र को अर्थात अपने एकलौते पुत्र इसहाक को, जिससे तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा; और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।’. . . जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे” (उत्पत्ति 22:2, 9-10)। अब्राहम के लिए परमेश्वर का आदेश स्पष्ट था—फिर भी यह परमेश्वर की प्रतिज्ञा के विपरीत प्रतीत होता था कि “पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को [अब्राहम के] वंश के कारण धन्य मानेंगी” और “जो तेरा वंश कहलाएगा वह इसहाक ही से चलेगा” (व 18; 21:12)। परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की पूर्ति इसहाक के जीवित रहने पर निर्भर थी। यदि इसहाक मर जाता, तो यह प्रतिज्ञा कैसे पूरा होती?

फिर भी अब्राहम ने आज्ञा मानी। हालाँकि उसकी परिस्थितियाँ उसे परमेश्वर के वचन पर सन्देह करने और प्रश्न पूछने के लिए उकसा सकती थीं, लेकिन फिर भी अब्राहम ने विश्वास से कहा, इसमें भी परमेश्वर की कोई योजना है। उसकी प्रतिज्ञा यह थी कि इसहाक के माध्यम से सभी राष्ट्रों को आशीर्वाद मिलेगा। इसलिए उसे उठाने के लिए परमेश्वर उसे मरे हुओं में से जीवित करेगा (इब्रानियों 11:19)। यही कारण है कि जब अब्राहम बलि चढ़ाने के लिए निकला था, तो उसने अपने सेवकों से कहा था, “गदहे के पास यहीं ठहरे रहो; यह लड़का और  मैं वहाँ तक जाकर और दण्डवत करके फिर तुम्हारे पास लौट आएँगे” (उत्पत्ति 22:5, विशेष बल दिया गया है)। विश्वास का क्या अद्‌भुत अभिव्यक्ति है! यह न भूलें: जब अब्राहम को आदेश दिया गया, तो उसने उसका पालन किया। हालाँकि यह परमेश्वर द्वारा की गई प्रतिज्ञाओं के सीधे विरोध में प्रतीत होता था, अब्राहम ने अपना काम किया, और उसने परमेश्वर को अपना काम करने का अवसर दिया।

हम भी ऐसा कर सकते हैं। अपनी परिस्थितियों को, चाहे वे कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, अपने आज्ञाकारिता को कम करने या परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर सवाल उठाने का कारण न बनने दें। अब्राहम और इसहाक के उस पहाड़ पर चढ़ने और उतरने के शताब्दियों बाद, परमेश्वर के अपने पुत्र ने उसी पहाड़ के किनारे से कब्र से जी उठकर यह साक्षात्कार दिया कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है। इसलिए आप आज जिस भी चुनौती का सामना करेंगे, उसमें आप आत्मविश्वास, आशा और प्रार्थना के साथ कह सकते हैं, “मैं आगे बढ़ सकता हूँ। मैं समाप्त नहीं हुआ। परमेश्वर अपना काम करेगा और इसलिए मैं अपना काम करूँगा।”

उत्पत्ति 22:1-19

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 राजाओं 12–14; मत्ती 14:1-21 ◊