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15  June : कधीही न संपणारा मधुचंद्र

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15  June : कधीही न संपणारा मधुचंद्र
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नवरा जसा नवरी पाहून हर्षतो तसा तुझा देव तुला पाहून हर्षेल. (यशया 62:5)

जेव्हां देव त्याच्या लोकांचे कल्याण करतो, तेव्हां ते असें नसते कीं एखादा न्यायाधीश नाखुशीनें त्याला घृणा वाटणार्‍या गुन्हेगाराला नाईलाजानें दया दाखवत आहे. ते असें असते जसे नवरा मुलगा त्याच्या नवरीला आपुलकीं दाखवत असतो.

कधी कधी आपण चेष्टा करत विवाहा बाबत म्हणतो कीं, “मधुचंद्र आता संपला आहे.” याचे कारण आपल्यांला मर्यादा आहेत. आपण मधुचंद्राचा अग्नी आणि जिव्हाळा टिकवून ठेवू शकत नाहीं. पण देव म्हणतो कीं त्याचा त्याच्या लोकांकरिताचा आनंद एखाद्या नवऱ्यामुलाचा  त्याच्या नवरी वरील आनंदा प्रमाणें आहे. याचा अर्थ असा नाहीं कीं ते त्या प्रकारे सुरू होते आणि कालांतरानें त्याच्यात घट होत जाते.

तो मधुचंद्रात असलेंला अग्नी, सुख, जोम, उत्साह आणि आनंद या बद्दल बोलत आहे. तो आपल्यां मनाला हे सांगू पाहतो कीं जेव्हां देव आपल्यांसाठीं पूर्ण मनानें हर्ष करतो तेव्हां त्याचा अर्थ काय आहे. यिर्मया 32:41 – “मी त्यांच्याविषयीं आनंद पावून त्यांचे कल्याण करीन व मी मनापासून जिवाभावानें त्यांची ह्या देशात खरोखर लागवड करीन.” सफन्या 3:17 – “परमेश्वर तुझा देव, साहाय्य करणार्‍या वीरासारखा तुझ्या ठायी आहे; तो तुझ्याविषयीं आनंदोत्सव करील; त्याचे प्रेम स्थिर राहील, तुझ्याविषयीं त्याला उल्लास वाटून तो गाईल.”

देवाचा मधुचंद्र कधीच संपत नाहीं. त्याचे सामर्थ्य आणि ज्ञान आणि कल्पकता अनंत आहे, त्यामुळें पुढच्या अनंतकाळच्या अब्जावधी वर्षामध्यें देखील आपल्यांला कंटाळ येणार नाहीं.

14 जून : शोक की वास्तविकता

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14 जून : शोक की वास्तविकता
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“जब यीशु ने उसको और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे, रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल हुआ, और कहा, ‘तुम ने उसे कहाँ रखा है?’ उन्होंने उससे कहा, ‘हे प्रभु, चलकर देख ले।’ यीशु रोया।” यूहन्ना 11:33-35

शोक “किसी हानि को कारण जीवन को हिला देने वाला दुख है। शोक जीवन को चिथड़े-चिथड़े कर देता है; यह एक व्यक्ति को ऊपर से नीचे तक हिला देता है। यह उसे निढाल कर देता है; वह जड़ों से उखड़ने लगता है। शोक वास्तव में जीवन को पूरी तरह से नष्ट कर देने वाली हानि है।”[1] आप शायद इस अनुभव को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। मुझे याद है जब यह पहली बार मेरे जीवन में आया था, उस समय मैं किशोर था और मेरी माँ का निधन हो गया था। कुछ भी पहले जैसा नहीं रहा था।

आपको विश्वासी के रूप में जीवन जीने के दौरान जल्दी ही यह पता चल जाएगा कि विश्वास हमारे जीवन में दुख और उसके भय को आने से रोकता नहीं है। पौलुस ने अपने मित्र इपफ्रुदीतुस के मृत्यु के निकट अनुभव के बारे में लिखा: “निश्चय ही वह बीमार तो हो गया था यहाँ तक कि मरने पर था, परन्तु परमेश्‍वर ने उस पर दया की, और केवल उस ही पर नहीं पर मुझ पर भी कि मुझे शोक पर शोक न हो” (फिलिप्पियों 2:27)। इपफ्रुदीतुस को खो देने के विचार ने पौलुस का दिल तोड़ दिया था। वह जानता था कि मृत्यु अन्त नहीं है, लेकिन वह यह भी जानता था कि हानि का अनुभव करने में या यहाँ तक कि उसके सम्भावित होने में वास्तविक शोक होता है।

शोक में से गुजरना कठिन होता है क्योंकि कुछ खो चुका होता है, और कुछ खुशियाँ अब कभी वापस नहीं आ सकतीं। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि शोक एक वास्तविकता है जिस पर पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से बोलता है—एक ऐसी वास्तविकता जो एक दिन एक बड़े आनन्द में बदल दी जाएगी। और हम भी जानते हैं कि शोक वह वास्तविकता है जिसके साथ हमारा उद्धारकर्ता व्यक्तिगत रूप से परिचित है। जब यीशु अपने मित्र लाजर की कब्र के पास खड़ा था, तो उसने—अर्थात त्रिएकता के दूसरे व्यक्ति ने—वहाँ इकट्ठा हुए लोगों के साथ शोक व्यक्त किया। हालाँकि वह लाजर को मरे हुओं में से जीवित करने वाला था, फिर भी उसने आँसू बहाए क्योंकि वह वास्तव में शोकित था। इस दृश्य में रहस्य यह है कि यीशु हमारी मानवता के साथ इस तरह से एक हो गया था कि उसने अपने प्रिय मित्र के खो जाने पर सच में आँसू बहाए।

हालाँकि बाइबल हमें मसीह की मृत्यु और कब्र पर विजय की वास्तविकता से परिचित कराती है, लेकिन यह हमें किसी तरह के चमकदार, हृदयहीन विजयवाद की ओर नहीं बुलाती। बल्कि, जैसा कि ऐलेक मोट्यर लिखते हैं, “आँसू विश्वासियों के लिए उपयुक्त हैं—वास्तव में उन्हें और अधिक बहाने चाहिएँ, क्योंकि मसीह हर भावना के प्रति, चाहे वह खुशी हो या शोक, उन लोगों से अधिक संवेदनशील होते हैं जिन्होंने परमेश्वर की कोमल और जीवनदायक कृपा को कभी महसूस नहीं किया।”[2]

यह तथ्य कि हमारे प्रियजन, जो मसीह में सो गए हैं, अब उसके साथ हैं, हानि और अकेलेपन के दुख को हल्का तो करता है, लेकिन इसे पूरी तरह से हटा नहीं सकता। हम उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब ऐसा दुख पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। जब तक वह दिन नहीं आता, तब तक हम यह जानकर सान्त्वना पा सकते हैं कि यीशु “दुखी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी” (यशायाह 53:3), क्योंकि हम उसे अपने आदर्श के रूप में देखते हैं, जब हम यह देखते हैं कि वह “पुनरुत्थान और जीवन” (यूहन्ना 11:25) है, और हम उसे अपनी अनन्तता के लिए देखते हैं। यह जानने से ही हमारे दिलों में दुख और आशा को साथ-साथ रहने की शक्ति मिलती है।

  यूहन्ना 14:1-7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 25–26; मत्ती 25:1-30


[1] जेय ई. ऐडम्स, शेफर्डिंग गॉड्स फ्लॉक: ए हैण्डबुक ऑन पास्टरल मिनिस्ट्री, काऊँसलिंग, ऐण्ड लीडरशिप (ज़ोनडेरवन, 1975), पृ. 136.

[2] जे. ऐलेक मोट्यर, द मैसेज ऑफ फिलिपियंस, द बाइबल स्पीक्स टुडे (आई.वी.पी. अकेडेमिक्स, 1984), पृ. 90.

14  June : देव तुम्हांला कितीं आशीर्वादित करू इच्छितो

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14  June : देव तुम्हांला कितीं आशीर्वादित करू इच्छितो
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परमेश्वर जसा तुझ्या पूर्वजांवर प्रसन्न होता तसा तुझ्या कल्याणासाठीं तुझ्यावरही पुन्हा प्रसन्न होईल.” (अनुवाद 30:9)

देव आपल्यांला अनिच्छेनें आशीर्वादित करत नाहीं. देव आपल्यांवर उपकार करावयांस आवेशी असतो. आपण त्याच्याकडें जावें अशी तो वाट पहात नाहीं. तो आपला शोध करतो कारण त्याचा आनंद आपलें कल्याण करण्यात आहे. देव आपली वाट पाहत बसत नाहीं, तो आपल्यां पाठी येत असतो. स्तोत्र 23:6 चा खरे तर शब्दश: अनुवाद असा आहे कीं “खरोखर माझ्या आयुष्याचे सर्व दिवस कल्याण व दया माझा पिच्छा करतील.

देवाला दया करायला आवडते. मी हे परत सांगतो. देवाला दया करायला आवडते. त्याच्या लोकांचे कल्याण करण्याच्या त्याच्या इच्छे मध्यें संकोच, संदिग्धता किंवा संभावीतपणा नसतो. तो मंदक्रोध आहे आणि करुणा करण्याच्या बाबतींत तत्पर आहे. सिनाय पर्वतावर उतरल्या वर मोशेला तो हेच म्हणाला, “परमेश्वर, दयाळू व कृपाळू देव, मंदक्रोध, दयेचा व सत्याचा सागर आहे” (निर्गम 34:6). हेच तो यिर्मया 9:24 मध्यें म्हणतो, “मी दया करणारा व पृथ्वीवर प्रेमदया, न्याय आणि नीतिमत्ता चालवणारा परमेश्वर आहे, ह्याची त्याला जाणीव आहे, ओळख आहे, ह्यात मला संतोष आहे, असें परमेश्वर म्हणतो.”

देव कधीच वैतागलेंला आणि तणावात नसतो. तो शीघ्रकोपी नाहीं. उलट त्याच्यात त्याच्या इच्छा पूर्ण करण्याचा अनंत, अमर्याद आणि न संपणारा उत्साह आहे.

याचे आकलन करणें आपल्यां करिता कठीण आहे, कारण प्रत्येक दिवसाला यशस्वी होणें तर सोडाच पण नुसते तोंड देण्याकरिता आपल्यांला विश्रांतीची गरज असते. आपल्यां भावना वर खाली होत असतात. आपल्यांला एक दिवस कंटाळा येतो आणि निराश वाटते, तर दुसर्‍या दिवशी आपल्यांला आशावादीपणा आणि उत्साह जाणवतो.

आपण त्या पाण्याच्या कारंज्या प्रमाणें आहोत, जो कधी कमी, कधी जास्त आणि अनियमित असतो. पण देव त्या विशाल नायग्राच्या धबधब्या प्रमाणें आहे – तुम्हीं प्रत्येक मिनिटाला 1,86,000 टन पाणी वरून खाली पडताना पाहता आणि विचार करता – नक्कीच हे पाणी ह्या जोरानें वर्षानूवर्षे खाली पडत नसणार. होय ते तसेच पडत आलेलें आहे.

अशाच प्रकारे देव आपलें कल्याण करण्याबाबत असतो. त्याला त्याचा कधी थकवा येत नाहीं. ते त्याला कधीच कंटाळवाणें वाटत नाहीं. त्याच्या नायग्राच्या कृपेच्या धबधब्याला अंत नाहीं.

13 जून : मेरे दिन तेरे हाथ में हैं

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13 जून : मेरे दिन तेरे हाथ में हैं
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“परन्तु हे यहोवा, मैं ने तो तुझी पर भरोसा रखा है, मैं ने कहा, ‘तू मेरा परमेश्‍वर है।’ मेरे दिन तेरे हाथ में हैं; तू मुझे मेरे शत्रुओं और मेरे सताने वालों के हाथ से छुड़ा। अपने दास पर अपने मुँह का प्रकाश चमका; अपनी करुणा से मेरा उद्धार कर।!” भजन 31:14-16

हममें से अधिकांश लोग भावनाओं और अनुभवों का मिश्रण होते हैं। अच्छे, बुरे और कष्टकारी अनुभव नियमित रूप से हम पर आते रहते हैं। मुख्य मुद्दा यह है कि हम इन भावनाओं और अनुभवों के साथ क्या करते हैं। एक विश्वासी के रूप में हमारा संसार को देखने का तरीका कैसा होता है? “मेरे दिन तेरे हाथ में हैं,” छः शब्दों का यह पुष्टिकरण मसीहियों को याद दिलाता है कि कठिनाइयों और आपदाओं के बावजूद, हम सर्वशक्तिमान परमेश्वर की देखभाल में हैं।

भजन 31 के प्रारम्भिक पदों में यह स्पष्ट होता है कि दाऊद पीड़ा में है। जैसे-जैसे हम पढ़ते हैं, हम पाते हैं कि वह कुछ पी पदों बाद वह आश्वासन की स्थिति में है, लेकिन फिर तुरन्त ही एक बार फिर से वह दुखी हो जाता है। मसीही विश्वास की यात्रा में पीड़ा और आनन्द का यह चक्र एक असामान्य अनुभव नहीं है। दरअसल, विश्वास के पथ पर निराशा और असुविधा का बार-बार आना एक आम बात है।

अपनी पुस्तक द हाईडिंग प्लेस में, कोरी टेन बूम अपनी पहली रेल यात्रा का इंतजार करने की एक कहानी बताती हैं। हालाँकि उनकी यात्रा कई सप्ताहों बाद थी, फिर भी वह बार-बार अपने पिता से पूछती रहती थी कि क्या उन्होंने टिकट खरीद लिया है। वह हर बार कहते थे कि उन्होंने टिकट खरीद लिया है। उन्हें समझ में आ गया कि उनकी समस्या अपने पिता पर विश्वास की कमी थी; उन्हें विश्वास नहीं था कि वह सब कुछ सम्भाल लेंगे। वह डरती थीं कि कहीं उनके पिता टिकट खो न दें और यात्रा के दिन उनके पास टिकट न हो। इस पाठ में उन्होंने सीखा कि परमेश्वर हमें यात्रा का टिकट यात्रा के दिन देता है, न कि उससे पहले।[1] और जाहिर है कि वह इसे हमसे कहीं अधिक सुरक्षित रखने में सक्षम है।

हमारे अपने दुखों, निराशाओं, प्रियजनों के खोने और व्यक्तिगत असफलताओं के सफर में हम यह सीख सकते हैं कि यह वास्तव में सच है। इसलिए हमें परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिए। जिस दिन हम समय से अनन्तकाल तक की यात्रा करेंगे, यदि हम मसीह को जानते हैं, तो हम जानते हैं कि वह हमें टिकट अवश्य देगा। यदि वह दिन आज है, तो टिकट रास्ते में है। यदि नहीं, तो हम क्यों जागते रहें और अपनी भावनाओं को हमें नियन्त्रित करने दें और अपनी चिन्ताओं को अपने ऊपर हावी होने दें?

हम मनमानी, अवैयक्तिक शक्तियों की दया पर नहीं पल रहे हैं; हम अपने प्रेमी परमेश्वर के हाथों में सुरक्षित हैं। वह हमसे कहता है,हे सभी थके-माँदे और बोझ तले दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ। अपनी सारी चिन्ताओं, डर, आतंक, मानसिक तनाव और दिल के दुखों के साथ मेरे पास आओ। मेरा जुआ अपने ऊपर ले लो। मेरे प्रेमी शासन के तहत जीवन बिताओ, क्योंकि मेरा जुआ हल्का है और मेरा बोझ सरल है, और तुम अपनी आत्माओं के लिए विश्राम पाओगे, हमेशा का विश्राम (मत्ती 11:28-30 देखें)।

यह आपकी सुरक्षा है। आपका समय—चाहे छोटा हो या बड़ा, चाहे धनी हो या गरीब, चाहे दुखी हो या सुखी—परमेश्वर के हाथ में हैं। वह आपको हर दिन अच्छे काम करने के लिए देगा, और फिर आपके अन्तिम दिन पर, वह आपको सुरक्षित रूप से उस स्थान पर ले आएगा जहाँ आपके दिन अनन्तकाल तक लम्बे, असाधारण रूप से समृद्ध और अनमोल रूप से खुशहाल होंगे।

  भजन 31

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 22–24; मत्ती 24:29-51 ◊


[1] द हाईडिंग प्लेस (1971), अध्या. 2.

13  June : येशूचा वध कोणी केला?

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13  June : येशूचा वध कोणी केला?
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ज्यानें आपल्यां स्वतःच्या पुत्रास राखून न ठेवता त्याला आपल्यां सर्वांकरता समर्पण केलें, तो त्याच्याबरोबर आपल्यांला सर्वकाहीं कसे देणार नाहीं? (रोम 8:32).

माझा एलनोईस या ठिकाणी एक मित्र होता जो पाळक होता, तो खूप वर्षापूर्वी पवित्र आठवड्यात एका तुरुंगात कैद्यानां वचन सांगत होता. वचन सांगताना तो थांबला व त्यानें विचारलें कीं येशूचा वध कोणी केला हे त्यांना ठाऊक आहे का?

काहीं लोकं बोललें त्याला सैनिकांनें मारलें. काहीं म्हणालें यहुद्यांनी मारलें. तर काहीं म्हणालें पिलातानें. नंतर शांतता झाल्यावर, माझा मित्र सहजपणें म्हणाला, “त्याचा वध त्याच्या पित्यानें केला.”

रोमकरांस पत्र 8:32 चा पहिला भाग हेच सांगत आहे : देवानें त्याच्या पुत्राला सुद्धा राखून ठेवलें नाहीं तर मरणाच्या स्वाधीन केलें.” तो देवाच्या ठाम संकल्पानुसार व पूर्वज्ञानानुसार तुमच्यां स्वाधीन झाल्यावर तुम्हीं त्याला धरून अधर्म्यांच्या हातांनी वधस्तंभावर खिळून मारलें.” (प्रेषित 2:23). यशया 53 हे जास्त ठळकपणें सांगते, “तरी त्याला ताडन केलेलें, देवानें त्याच्यावर प्रहार केलेलें व त्याला पिडलेलें असें आम्हीं त्याला लेंखलें…. त्याला ठेचावे असें परमेश्वराच्या (त्याच्या पित्याच्या!) मर्जीस आलें. त्यानें त्याला पिडलें” ( यशया 53:4, 10).

किंवा जसे रोम 3:25 म्हणते, “त्याच्या रक्तानें विश्वासाच्या द्वारें प्रायश्‍चित्त होण्यास देवानें त्याला पुढे ठेवलें.” ज्याप्रमाणें अब्राहामानें त्याचा पुत्र इसहाकाला मारायला चाकू उचलला, पण नंतर त्याच्या मुलाला सोडून दिलें कारण त्याला झुडपात एक कोकरा दिसला, अगदी त्याप्रमाणें देव जो पिता यानें त्याच्या स्वत:च्या पुत्राच्या – येशूच्या छातीवर चाकूनें वार केला, त्यानें त्याला राखून ठेवलें नाहीं कारण तो कोकरा होता, आमच्यां जागी मरणारा आमचा प्रतिनिधी होता.

देवानें आपल्यां स्वत:च्या पुत्राला देखील राखून ठेवलें नाहीं कारण तोच एक मार्ग होता ज्याद्वारें तो आपल्यांला वाचवू शकत होता आणि तरी देखील तो एक पवित्र आणि न्यायी देव म्हणून राहू शकणार होता. आपल्यां दुष्कर्माचा दोष, आपल्यां पापांची शिक्षा, आपल्यां पापांच्या शापामुळें आपल्यांला नरकाच्या नाशापासून सुटका मिळाली नसती. पण देवानें आपल्यां पुत्राला देखील राखून ठेवलें नाहीं; त्यानें त्याला आमच्यां अपराधांमुळें घायाळ केलें, आपल्यां दुष्कर्मामुळें ठेचलें आणि आपल्यां पापांमुळें क्रूसावर खिळलें.

रोम 8:32 – हे वचन माझ्यासाठीं पवित्र शास्त्रातील सर्वात मोलवान वचन आहे कारण ते देवाच्या भावी कृपेच्या सर्व-समावेशक अभिवचनांचा पाया आहे, कीं देवाच्या पुत्रानें माझी सर्व शिक्षा, माझा सर्व दोष, माझी सर्व दंडाज्ञा,  माझ्या सर्व चुका आणि माझी सर्व भ्रष्टता त्याच्या शरीरावर घेतली, जेणें करून मला त्या महान आणि पवित्र देवापुढे क्षमा पावलेंला, समेट झालेंला, नीतीमत्व प्राप्त झालेंला, स्वीकारलेंला असें उभें राहता यावे आणि त्याच्या उजव्या हाताशी असणार्‍या सर्वकाळाच्या आनंदाच्या अभिवचनाचा लाभार्थी होणें शक्य व्हावें. 

12 जून : पिता की इच्छा

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12 जून : पिता की इच्छा
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“तब मैं ने कहा, देख, मैं आ गया हूँ, पवित्रशास्त्र में मेरे विषय में लिखा हुआ है, ताकि हे परमेश्‍वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ’।” इब्रानियों 10:7

जब माता-पिता और दादा-दादी या नाना-नानी अपने परिवार के नए सदस्य को देख कर प्रसन्न होते हैं, तो वे अक्सर यह उम्मीदें और योजनाएँ साझा करते हैं कि यह छोटी लड़की बड़ी होकर क्या हासिल करेगी या यह छोटा लड़का बड़ा होकर क्या बनेगा। हालाँकि, यह बड़ा हैरानीजनक होगा यदि छोटे बच्चे अपने जीवन की योजनाओं और उद्देश्यों की घोषणा स्वयं करने लगें। फिर भी, यह वह एक और तरीका है जिसमें मसीह अद्वितीय है: उसने इस संसार में प्रवेश किया, तो कहा, “‘देख, मैं आ गया हूँ . . .  ताकि हे परमेश्‍वर, तेरी इच्छा पूरी करूँ’।”

जब यीशु बारह वर्ष का था, उसके माता-पिता ने उसे मन्दिर में धार्मिक नेताओं और शिक्षकों से बातचीत करते पाया। मरियम और यूसुफ उसे तीन दिन तक ढूँढते रहे, बिना यह सोचे कि वह उन्हें वहाँ मिलेगा, और वे उसे वहाँ देखकर हैरान हो गए; लेकिन यीशु ने उत्तर दिया, “क्या तुम नहीं जानते थे कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है?” (लूका 2:49)। उसने अपने आरम्भिक दिनों से अपने स्पष्ट उद्देश्य को समझ लिया था।

परमेश्वर की वह इच्छा क्या थी, जिसे मसीह पूरा करने के लिए संसार में आया था? बाइबल हमें बताती है कि जब परमेश्वर ने यीशु को भेजा, तो उसने अपने लोगों के लिए उसे भेज दिया जो सम्पूर्ण व्यवस्था-विधान की माँगों को पूर्ण समर्पण के साथ पूरा करेगा और फिर पाप की सजा सहकर मनुष्यों को उसकी गुलामी से मुक्त करेगा। उद्धारकर्ता के आने की योजना अनन्तकाल से बनाई गई थी और इसकी प्रतिज्ञा पूरे पुराने नियम में अर्थात “पवित्रशास्त्र” में की गई थी। यीशु—जिसने एक बालक के रूप में एक चरनी में जन्म लिया—हमारे उद्धार की पूर्ति है।

अपने जीवन के हर क्षण में, चाहे जब शैतान द्वारा उसकी परीक्षा हुई हो या गतसमनी के बगीचे में उसने दुख का सामना किया हो, यीशु अपने उद्देश्य को जानता था और याद रखता था। उसे पता था कि वह अपने पिता की इच्छा के अनुसार यहाँ आया था। हालाँकि उसने प्रार्थना की उसके दुख का प्याला टल जाए, लेकिन फिर भी उसने पिता के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता में समर्पण किया। जैसा कि किसी भी मनुष्य के साथ हो सकता था, उसे भी अपने पिता की इच्छा से दूर हटने के प्रलोभन का सामना हुआ, फिर भी उसने प्रार्थना की, “तौभी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो” (मत्ती 26:39-46)।

यीशु अपने आगमन के कारण के बारे में अस्पष्ट नहीं था—और क्योंकि उसने अपने पिता की इच्छा के अनुसार जीवन जिया, इसलिए हम उसके साथ अनन्तकाल तक रहेंगे और उसकी ओर से किए गए हर कार्य पर आनन्दित होते हुए।

न मेरे हाथों का श्रम

तेरे कानून की माँग पूरी कर सकता है;

यदि मैं अपना सारा बल लगा देता,

यदि मेरे आँसू हमेशा बहते रहते,

तौभी पाप के लिए प्रायश्चित नहीं हो पाता;

तू ही बचा सकता है, और केवल तू ही।[1]

आज, आप और मैं परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए जी सकते हैं, इस डर में रहते हुए नहीं कि यदि हम आज्ञा का पालन नहीं कर पाए तो हमें सजा मिलेगी, बल्कि इस विश्वास के साथ कि हम पहले ही मसीह में आशीर्वाद पा चुके हैं। क्योंकि उसने हमेशा आज्ञा का पालन किया, इसलिए हम ऐसा करने में हमारी असफलता के लिए माफ किए गए हैं और खुशी से अपने पिता की इच्छा का पालन करने के लिए मुक्त किए गए हैं—इसलिए नहीं कि हमें करना ही होगा, बल्कि इसलिए कि हम इसे करना चाहते हैं।

रोमियों 5:12-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 20–21; मत्ती 24:1-28


[1] औगुस्तुस टोपलेडी, “रॉक ऑफ एजिस” (1776).

12 June : माझा अविश्वास घालवून टाका

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12 June : माझा अविश्वास घालवून टाका
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कारण मला प्राप्त झालेंल्या कृपादानांवरून मी तुमच्यांपैकीं प्रत्येक जणाला असें सांगतो कीं, आपल्यां योग्यतेपेक्षा स्वतःला अधिक मानूं नकां, तर देवानें प्रत्येकाला वाटून दिलेंल्या विश्वासाच्या परिमाणानुसार मर्यादेनें स्वतःला माना. (रोम 12:3)

ह्या वचनाच्या पार्श्वभूमी मध्यें पौलाला काळजी वाटत होती कीं काहीं लोक स्वत:ला “त्यांच्या योग्यते पेक्षा अधिक समजत होते”. ह्या गर्वाचा शेवटचा उपाय म्हणजें ही गोष्ट जाणणें कीं आपल्यांला प्राप्त झालेंली आत्मिक दानेंच केवळ देवाच्या मोफत कृपेमुळें नाहींत तर ती दानें वापरण्यासाठींचा विश्वास देखील देवाच्या कृपेमुळें आहे. “तर देवानें प्रत्येकाला वाटून दिलेंल्या विश्वासाच्या परिमाणानुसार मर्यादेनें स्वतःला माना.”

याचा अर्थ असा कीं स्वत:विषयीं फुशारकीं मारावी असा प्रत्येक संभाव्य निकष आपल्यांतून काढून टाकण्यांत येतो. आपण कशी आढ्यता मिरवू शकतो जेव्हां ती आत्मिक कृपादानें घेण्याकरिता लागणारी पात्रता सुद्धा आपल्यांला कृपादान म्हणूनच मिळाली आहे?

ह्या सत्याचा आपल्यां प्रार्थनें वर गाढ परिणाम होतो. येशू आपल्यांला लूक 22:31-32 उदाहरण देतो. पेत्रानें येशूचा तीन वेळा नकार केला त्यापूर्वी येशूनें त्याला म्हटलें, “शिमोना, शिमोना, पाहा, तुम्हांला गव्हासारखे चाळावे म्हणून सैतानानें मागणी केली; ‘परंतु तुझा विश्वास ढळू नये म्हणून तुझ्यासाठीं मी विनंती केली आहे; आणि तू वळलास म्हणजें तुझ्या भावांना स्थिर कर.”

येशू पेत्राच्या नकाराच्या पापा नंतर सुद्धा त्याचा विश्वास टिकून रहावा म्हणून प्रार्थना करतो, कारण त्याला ठाऊक आहे कीं आपल्यांला देवच विश्वास देऊ करतो. म्हणून येशूनें जशी प्रार्थना केली तशी आपण देखील केली पाहिजे – आपल्यां स्वतःकरिता आणि इतरांच्या करिता, कीं देव आपला विश्वास टिकवून ठेवील. 

या करिताच त्या भूतग्रस्त मुलाच्या पित्यानें डोळ्यांत आसवे आणून अशी विनंती केली कीं, “प्रभूजी, माझा विश्वास आहे, माझा अविश्वास घालवून टाका” (मार्क 9:24). ही एक चांगली प्रार्थना आहे. ती हे मान्य करते कीं आपण जसा विश्वास ठेवायला पाहिजे तसा विश्वास आपण देवाच्या कृपादानावांचून ठेऊ शकत नाहीं.

तर मग, आपण रोज ही प्रार्थना करूंया, “हे परमेश्वरा, माझ्यांत देऊं केलेंल्या विश्वासाबद्दल मी तुझा आभारी आहे. त्याला टिकवून ठेव. बळकट कर. अधिक ढृढ कर. अपयशी होऊ देऊ नकोस. त्याला माझ्या जीवनाचे सामर्थ्य कर, अशासाठीं कीं मी जे काहीं करीन त्याचा गौरव, सर्व गोष्टींचा दाता म्हणून तुलाच मिळेल. आमेन.”

11 जून : खुला कान, तत्पर इच्छा

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11 जून : खुला कान, तत्पर इच्छा
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“तब प्रभु ने उससे कहा, ‘उठकर उस गली में जा जो ‘सीधी’ कहलाती है, और यहूदा के घर में शाऊल नामक एक तरसुसवासी को पूछ; क्योंकि देख, वह प्रार्थना कर रहा है।’” प्रेरितों 9:11

बाइबल में, प्रेरितों 9 से पहले हनन्याह का कोई उल्लेख नहीं है, और इसके बाद भी केवल एक संक्षिप्त उल्लेख (प्रेरितों 22:12) है। इन दोनों उल्लेखों के अनुसार वह कोई महान व्यक्ति नहीं था, जिसने संसार के मापदण्डों के अनुसार कोई महान कार्य किए थे। फिर भी, परमेश्वर ने उसके भीतर एक विश्वासपूर्ण हृदय देखा और उसे शाऊल (जो बाद में पौलुस के नाम से जाना गया) के जीवन-परिवर्तन की प्रक्रिया में अद्‌भुत रीति से उपयोग किया।

हनन्याह की तरह शायद आपने भी अपने जीवन में कोई महान कार्य नहीं किए होंगे, अद्‌भुत स्थानों पर नहीं गए होंगे, या कोई बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त नहीं की होगी। लेकिन परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को चुनता है और उन्हें अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए उपयोग करता है। हमारा भाग बस इतना है कि हम हनन्याह की तरह हों, अर्थात कान खुले रखें और अपनी इच्छा को परमेश्वर को सुनने और उसकी आज्ञा को मानने के लिए तैयार रखें।

इस पद में जो मुख्य बात है वह यह नहीं है कि परमेश्वर ने हनन्याह से कैसे बात की, बल्कि यह है कि हनन्याह ने कैसे प्रतिक्रिया दी: “हाँ, प्रभु।” उसका कान परमेश्वर को सुनने के लिए तैयार था। क्या आपके कान भी ऐसे हैं? क्या आप परमेश्वर को उसके वचन के माध्यम से बोलते हुए सुनते हैं? क्या आपके हृदय की अवस्था ऐसी है कि जो कुछ भी वह आपको करने के लिए बुला रहा है, आप कहेंगे, “हाँ, प्रभु”?

जब हम विचार करते हैं कि परमेश्वर ने हनन्याह से क्या करने को कहा और किसके लिए कहा, तो उसका परमेश्वर को दिया गया उत्तर उल्लेखनीय प्रतीत होता है। उसने “इस मनुष्य [शाऊल] के विषय में बहुतों से सुना है कि इसने यरूशलेम में तेरे पवित्र लोगों के साथ बड़ी–बड़ी बुराइयाँ की हैं” और वह जानता था कि दमिश्क में भी शाऊल को “प्रधान याजकों की ओर से अधिकार मिला है कि जो लोग तेरा नाम लेते हैं, उन सब को बाँध ले” (प्रेरितों 9:13-14)। फिर भी उसने शाऊल और उसकी गतिविधियों के प्रति किसी भी डर या नफरत के बावजूद परमेश्वर के बुलावे का पालन करने का निर्णय लिया। उसने सुना, और उसने कार्य किया।

हम कितनी बार परमेश्वर के बुलावे के जवाब में अपनी निष्क्रियता के लिए बहाने बनाते हैं? हम कितनी बार अपने डर के पीछे छिपते हैं या अत्यधिक सावधानी से जीते हैं और यह भूल जाते हैं कि “परमेश्‍वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ्य और प्रेम और संयम की आत्मा दी है” (2 तीमुथियुस 1:7)? हनन्याह ने अपने आज्ञापालन के माध्यम से इस शक्तिशाली आत्मा का प्रदर्शन किया।

हमारी संस्कृति बड़े नामों, बड़ी उपलब्धियों, और बड़ी रेटिंग्स की परवाह करती है। परमेश्वर के पास वही प्राथमिकताएँ नहीं हैं। हनन्याह का कोई बड़ा नाम या भारी लोकप्रियता नहीं थी; उसके पास बस परमेश्वर की आवाज़ सुनने के लिए एक खुला कान था और उसकी आज्ञा का पालन करने की इच्छाशक्ति थी। इसके परिणामस्वरूप उसका जीवन परमेश्वर की सेवा में उपयोगिता के लिए समर्पित हुआ। और उस दिन, इसका अर्थ यह हुआ कि वह पहला ऐसा व्यक्ति था जिसने पौलुस के पास जाकर उसे “भाई” कहकर परमेश्वर का प्रेम और अनुग्रह उसपर प्रकट किया (प्रेरितों 9:17)। इस प्रकार, भले ही वह बाइबल में केवल एक छोटा सा पात्र हों, फिर भी आप और मैं उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।

हो सकता है कि इस जीवन में मसीह के प्रति आपकी विश्वासयोग्यता के लिए आपको कोई पहचान न मिले। हो सकता है कि आप उसकी सेवा में जोखिम उठा रहे हों और बलिदान कर रहे हों और महसूस कर रहे हों कि इससे कुछ ज्यादा अन्तर नहीं आ रहा और इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा। लेकिन यह संसार आपको जो कुछ भी दे सकता है, उससे कहीं बेहतर है कि जब आप स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे, तो आप परमेश्वर से यह सुनेंगे, “धन्य, हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास” (मत्ती 25:21)। उसकी सेवा में किया गया कोई भी अच्छा कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता। वह इसे उद्धार की महान गाथा में बुन देता है।

यशायाह 6:1-13

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 18–19; मत्ती 23:23-39 ◊

11  June : भावी काळाकरिता विश्वास

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11  June : भावी काळाकरिता विश्वास
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देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या ठायी होय हे आहे; म्हणून आम्हीं देवाच्या गौरवाला त्याच्या द्वारें आमेन म्हणतो. (2 करिंथ 1:20)

जर “देवाची वचनें कितीही असोत, त्याच्या [येशूच्या] ठायी होय हे आहे” तर मग आता वर्तमानसमयी त्याच्यावर भरवसा ठेवणें म्हणजें हा विश्वास ठेवणें कीं त्याची अभिवचनें पूर्ण होऊन ती खरी सिद्ध होतील.

त्याच्यावर भरवसा ठेवणें आणि त्याच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवणें – हे दोन वेगवेगळ्या प्रकारचे विश्वास नाहींत. येशू वर विश्वास ठेवणें – तारणासाठीं त्याच्यावर विश्वास ठेवणें – म्हणजेंच विश्वास ठेवणें कीं तो त्याचा शब्द पाळतो. वधस्तंभावर खिळलेंला आणि मरणातून पुन्हा उठलेंल्या ख्रिस्तामध्यें समाधानी असणें म्हणजें असा विश्वास ठेवणें कीं भावी काळातील प्रत्येक क्षणापासून ते  सर्वकालिकते पर्येंत त्याच्या प्रीति पासून आपल्यांला कोणतीही गोष्ट विभक्त करूं शकणार नाहीं, आणि सर्व गोष्टी आपल्यां कल्याणाकरिता कार्य करण्यापासून त्याला कोणीच थांबवू शकणार नाहीं. आणि ते “कल्याण” म्हणजें परमेश्वराला ख्रिस्तामध्यें आपलें सर्वोच्च धन मानणें व त्याचे सौंदर्य न्याहाळणें होय.

आमचे हे सर्व-समाधानकारक कल्याण सर्वकाळासाठीं आहे हा विश्वास आम्हांवर झालेंल्या गतकाळातील गौरवी कृपेवर आधारलेंला आहे, विशेषत: त्यां कृपेवर कीं देवानें आपल्यां स्वतःच्या पुत्राला राखून न ठेवता त्याला आपल्यां सर्वांकरिता दिलें (रोमकरांस 8:32).

आता आपण देवानें भूतकाळात जें जें साध्य केलें – विशेषकरून आपल्यां पापांकरिता ख्रिस्ताचे मरण व पुनरुत्थान या द्वारें- आणि त्याच्या सर्व अभिवचनांमध्यें त्याचे अध्यात्मिक सौंदर्य चाखलें पाहिजे. भूतकाळात झालेंल्या कृपेत मुळावलेंला आपला देवावरील भरवसा या गोष्टीना दृढ धरून राहतो कीं देव पुढल्या क्षणी आम्हांबरोबर राहील, व तो तसाच पुढच्या महिन्यात आणि अनंत सार्वकालिकतेसाठीं आम्हांबरोबर असेल.

तोच आणि केवळ तोच आपल्यां आत्म्याचे भावी समयामध्यें समाधान करील. आणि जर आपण मुळावलेलें ख्रिस्ती म्हणून जगण्याकरिता ख्रिस्त आपल्यांला बोलवत असेल तर आपल्यांला आपल्यां भावी जीवनाबद्दल हींच खात्री वाटायला हवी.

ख्रिस्तांत असलेंला आमचा वर्तमान समयीचा आनंद– म्हणजें आमचा वर्तमान विश्वास- जर देवाच्या सर्व अभिवचनांना होय व आमेन म्हणत नसेल, तर मग देव (भविष्यातील प्रत्येक क्षणी) जे सामर्थ्य पुरवेल त्या सामर्थ्यात मुळावलेंली सेवा घडू शकणार नाहीं (1 पेत्र 4:11).

माझी प्रार्थना अशी आहे कीं आपल्यांवर जी भावी कृपा केलीं जाईल तिच्या विश्वासाचे स्वरूप काय आहे यावर अशाप्रकारे चिंतन केल्यांनें आपल्यांला देवाच्या वचनांवर जो विश्वास ठेवायचा आहे त्याविषयींची वरवरची, अतिसरळ विधानें टाळण्यास त्यानें सहाय्य पुरवावें. ही खूप गहन आणि सुंदर गोष्ट आहे.  

10 जून : न्याय, कृपा, और नम्रता

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10 जून : न्याय, कृपा, और नम्रता
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“हे मनुष्य, वह तुझे बता चुका है कि अच्छा क्या है; और यहोवा तुझ से इसे छोड़ और क्या चाहता है, कि तू न्याय से काम करे, और कृपा से प्रीति रखे, और अपने परमेश्‍वर के साथ नम्रता से चले?” मीका 6:8

जब अठारहवीं सदी के भजनकार और प्रचारक जॉन न्यूटन ने इस पद पर प्रवचन दिया, तो उन्होंने अपने प्रवचन का शीर्षक दिया, “मसीह के सुसमाचार के बिना परमेश्वर के पास कोई नहीं पहुँच सकता।” उन्होंने ऐसा शीर्षक क्यों रखा, जिसका इस पद से कोई सम्बन्ध नहीं लगता? न्यूटन ने खुद टिप्पणी की, “बाइबल का शायद ही कोई ऐसा पद हो जिसे इससे अधिक गलत समझा गया हो।”[1]

ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने प्रवचन का यह शीर्षक सामान्य गलतफहमियों को ठीक करने के उद्देश्य से रखा था।

न्यूटन का शीर्षक हमें यह सावधान करता है कि हमें यहाँ जो गुण बताए गए हैं, उन्हें पढ़ने के बाद सुसमाचार के बिना जीने की कोशिश न करें, या सुसमाचार के स्थान पर इन्हें परमेश्वर के पास पहुँचने का तरीका मानकर इनका प्रचार न करें। इनमें से कोई भी उस उद्देश्य को पूरा नहीं करता जो भविष्यद्वक्ता—और प्रभु—ने चाहा था। मीका 6:8 को समझने का सबसे अच्छा तरीका यह नहीं है कि इसे ऐसे कार्यों की सूची माना जाए, जो हमारे धर्मी ठहराए जाने में योगदान करती हैं, बल्कि इन्हें हमारे धर्मी ठहराए जाने के प्रमाण के रूप में देखा जाना चाहिए। जब हम इसे इस तरह से देखते हैं और उचित प्रेरणा तथा लक्ष्य स्थापित करते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि परमेश्वर ने इस्राएल को और हमें क्या करने के लिए बुलाया है।

पहले, परमेश्वर हमें मीका के माध्यम से “न्याय से काम” करने के लिए कहता है। इसका अर्थ है परमेश्वर की इच्छा और उद्देश्य के अनुसार कार्य करने का संकल्प लेना। उदाहरण के लिए, व्यवस्थाविवरण की पुस्तक में मूसा कहता है कि परमेश्वर “अनाथों और विधवा का न्याय चुकाता, और परदेशियों से ऐसा प्रेम करता है कि उन्हें भोजन और वस्त्र देता है” (व्यवस्थाविवरण 10:18)। हम उन चीजों के बारे में परवाह करना चाहते हैं जिनकी परमेश्वर को परवाह है, जिसका अर्थ है कि हम इन प्राथमिकताओं को गम्भीरता से लें और “जहाँ तक अवसर मिले हम सबके साथ भलाई करें, विशेष करके विश्वासी भाइयों के साथ।” (गलातियों 6:10)।

दूसरे, परमेश्वर हमें “कृपा से प्रीति” रखने के लिए कहता है। यदि न्याय करना क्रिया है, तो कृपा से प्रेम करना हृदय की वह भावना है जो इसे प्रेरित करती है। यह स्नेहपूर्ण सहानुभूति है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि हम न्याय का पालन केवल किसी कर्तव्य की तरह नहीं, बल्कि उदारता की खुशी के साथ करें।

तीसरे, हमें “नम्रता से चलने” के लिए कहा गया है। दूसरे शब्दों में, हमें परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण में चलना है और हर कदम पर उसके ऊपर हमारी पूरी निर्भरता को अपनाना है। मीका इस पद को नम्रता पर क्यों समाप्त करता है? पहले, क्योंकि नम्रता ही वह गुण है जो यह स्वीकार करने के लिए आवश्यक है कि हम कृपा से प्रेम करने और न्याय के काम करने के बुलावे का पूरी तरह से पालन नहीं कर सकते—और इसलिए हमें केवल परमेश्वर की आज्ञाओं की ही नहीं, बल्कि उसकी क्षमा की भी आवश्यकता है। और दूसरा, क्योंकि जब हम उसका वैसा आज्ञापालन करते हैं जैसा मीका 6:8 हमें कहता है, तो हमारे प्रयासों का फल अन्ततः हम पर निर्भर नहीं करता।

आप और मैं संसार को सुधार नहीं सकते; इसके बजाय हमें संसार के राजा और न्यायाधीश को समाधान सौंप देना चाहिए। ऐसा करने से हमें प्रेरणा मिलती है और हम स्थापित रहते हैं, परमेश्वर की सहायता से, न्याय, कृपा, और नम्रता के माध्यम से, हमारे पड़ोसियों के भले के लिए, कलीसिया की गवाही के लिए, और मसीह की महिमा के लिए उस सुसमाचार के अनुसार जी पाते हैं जिसने हमें बचाया है। सदियों बाद भी आज मीका आपको बुलावा देता है कि आप इस सुसमाचार की आवश्यकता पर विनम्रता से विचार करें, अपने हृदय को देखें और पवित्र आत्मा की सहायता से इसे मसीही कृपालुता में बढ़ाएँ, और फिर अपने संसार को देखें और सक्रिय रूप से न्याय और निष्पक्षता का पालन करें।

  मीका 6:1-8

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 15–17; मत्ती 23:1-22


[1] द वर्क्स ऑफ रेव्ह. जॉन न्यूटन (1808), खण्ड. 2, पृ. 543.