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23 अगस्त : परमेश्वर काफी बड़ा है

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23 अगस्त : परमेश्वर काफी बड़ा है
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“पौलुस ने अरियुपगुस के बीच में खड़े होकर कहा, ‘हे एथेंस के लोगो . . . जिसे तुम बिना जाने पूजते हो, मैं तुम्हें उसका समाचार सुनाता हूँ।’” प्रेरितों 17:22-23

परमेश्वर की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझे बिना हम यीशु के सुसमाचार का प्रचार नहीं कर सकते। जैसा कि जे.बी. फिलिप्स अपनी पुस्तक योर गॉड इज़ टू स्मॉल  में लिखते हैं, “आज बहुत से लोग आन्तरिक असन्तोष में और किसी विश्वास के बिना जी रहे हैं . . . वे अपने वयस्क मस्तिष्क से ऐसा परमेश्वर नहीं खोज पाए हैं जो जीवन को समझाने के लिए पर्याप्त रूप से बड़ा हो।”[1] इसलिए जब हम परमेश्वर के चरित्र, उसकी महानता और उसकी महिमा के बारे में बात करें, तो हमें प्रत्येक उपयुक्त शब्द का उपयोग करना चाहिए।

जब पौलुस ने सुसमाचार का प्रचार किया, तो उसने धार्मिक लोगों, आम जनता और बुद्धिजीवियों सभी के पास जाकर यह सन्देश दिया, क्योंकि वह जानता था कि परमेश्वर का शुभ समाचार सभी के लिए पर्याप्त है और हर किसी की चिन्ताओं का उत्तर है (प्रेरितों 17:24-31)। हम पौलुस के इस दृष्टिकोण से सीख सकते हैं, जिसमें उसने परमेश्वर के स्वभाव के पाँच महत्त्वपूर्ण पहलुओं को स्पष्ट किया:

परमेश्वर सृष्टिकर्ता है। इस संसार को उसी ने बनाया है, जबकि वह स्वयं अजन्मा और अजर-अमर है। वह अपनी सृष्टि से अलग और समय से परे है। वह मात्र एक शक्ति नहीं है—यहाँ तक कि सबसे बड़ी शक्ति भी नहीं—और न ही उसे किसी रूप में बाँधा या नियन्त्रित किया जा सकता है।

परमेश्वर पालनहार है। वही है जो जीवन और श्वास का दाता है। वह पालनहार परमेश्वर मनुष्यों के हाथों की सेवा पर निर्भर नहीं है, न ही उसे किसी प्रकार के पोषण की आवश्यकता है।

परमेश्वर शासक है। वह राष्ट्रों पर अधिकार रखते है। इतिहास, भूगोल, सरकारें—पूरी सृष्टि—सब उसके नियन्त्रण में है। कोई भी घटना हमारे परमेश्वर को चौंका नहीं सकती; वह मनुष्य के पापपूर्ण कार्यों तक को अपनी योजना में सम्मिलित कर सकता है। इसके अलावा, एक शासक के रूप में, उसने हर व्यक्ति को एक निश्चित स्थान और समय में रखा है, ताकि हम परमेश्वर को खोजें, उसे पाएँ और उसके पवित्र नाम की स्तुति करें।

परमेश्वर पिता है। मनुष्य उसके “वंशज” हैं (प्रेरितों 17:28), और इस अर्थ में कि उसने आदम से लेकर प्रत्येक मनुष्य को जीवन दिया है, वह हर मनुष्य का पिता है (लूका 3:38)। उसने हम सबको अपने स्वरूप में बनाया है। हम नैतिक प्राणी हैं, जिनमें सही और गलत का ज्ञान है और हम वास्तव में केवल तभी फल-फूल सकते हैं, जब हम उसके साथ सम्बन्ध में होते हैं।

परमेश्वर न्यायी है। उसे पूरी पृथ्वी पर अधिकार प्राप्त है। एक न्याय का दिन आएगा, जो निष्पक्ष और अन्तिम होगा, जब हर अन्याय का निपटारा किया जाएगा और हर बुराई को सुधारा जाएगा। वास्तव में, परमेश्वर पहले ही अपने पुत्र यीशु के द्वारा इस संसार में हस्तक्षेप कर चुका है, और यीशु के पुनरुत्थान के द्वारा उसने उसे न्यायाधीश के रूप में नियुक्त क दिया है। यह परमेश्वर की कृपा और धैर्य है कि उसने न्याय के दिन की घोषणा पहले से कर दी है, ताकि हम उस दिन से पहले पश्चाताप कर लें और उससे क्षमा प्राप्त करें।

परमेश्वर किसी की भी मात्र धार्मिक अभिरुचि के लिए ही पर्याप्त नहीं है—बल्कि वह उससे कहीं अधिक महान है। वह आपके और मेरे लिए, हमारी हर चिन्ता और दुख के लिए पर्याप्त रूप से बड़ा है। वह हर बौद्धिक जिज्ञासा को सन्तुष्ट करने और हर भावनात्मक अभिलाषा को पूरा करने के लिए पर्याप्त रूप से बड़ा है—और अन्ततः, वह जीवन जीने के लिए भी पर्याप्त रूप से बड़ा है। आप परमेश्वर को जितना अधिक सही रूप में जानेंगे, उतना ही अधिक खुशी से आप उसकी आज्ञा का पालन करेंगे और उसके विषय में आनन्द से भरकर आत्मविश्वास से बातें करेंगे।

  यशायाह 44:6-8

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 113–115; 2 कुरिन्थियों 2


[1] योर गॉड इज़ टू स्मॉल: ए गाईड फॉर बिलिवर्स ऐण्ड स्कैप्टिक्स अलाईक (टचस्टोन, 2004), पृ. 8.

23 August : देव मूर्तिपूजक नाहीं

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23 August : देव मूर्तिपूजक नाहीं
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आपल्या पवित्र जनांच्या ठायीं गौरव मिळावा म्हणून, आणि त्या दिवशी विश्वास ठेवणार्‍या सर्वांच्या ठायीं आश्‍चर्यपात्र व्हावे म्हणून तो येईल, कारण आम्हीं दिलेंल्या साक्षीवर तुम्हीं विश्वास ठेवला आहे. (2 थेस्सलनीका 1:10)

पौल म्हणतो कीं ख्रिस्त हा मुख्यता त्याला गौरव मिळावा म्हणून आणि आश्‍चर्यपात्र व्हावे म्हणून येत आहे. तो येत आहे त्यामागचे कारण हेच.

देव स्वतःचे गौरव करू पाहतो आणि त्याच्या लोकांकडून त्याची स्तुती व्हावी या शोधांत असतो हे शिक्षण ऐकून बरेच लोक अडखळतांत कारण आपण स्वतःचे गौरव करून घेणारे होऊं नये किंवा स्वतःची स्तुती करून घावयांस पाहूं नये असे बायबल आपल्याला शिक्षण देते. उदाहरणार्थ, बायबल सांगते कीं प्रेम “स्वार्थ पाहत नाहीं” (1 करिंथ 13:5).

देव इतका प्रेमळ असूनही त्याचवेळी पूर्णपणें “स्वतःचे” गौरव (स्वार्थ) व स्तुती करू पाहणारा आणि पूर्णपणें आपलाच आनंद शोधणारा कसा असू शकतो? जर देव स्वतःमध्येंच इतका पूर्णपणें गुंतलेला असेल तर मग तो आमच्या कल्याणार्थ कसा असू शकतो?

मी याचे उत्तर पुढीलप्रमाणें मांडतो : कारण वैभव व परम-स्वयंपूर्णता यांबाबतींत देव हाच एकमेव अद्वितीय आहे, म्हणून जर तो आमचे गौरव करणार असेल तर मग त्याला स्वत:मध्यें गौरवी असणें अगत्याचे आहे. दीन व नम्रपणाचे जें नियम मानव-प्राणी म्हणून आमच्यावर लागू होतांत तें आमचा निर्माणकर्ता म्हणून देवावर लागू होऊ शकत नाहींत.

सार्वकालिक आनंदाचा उगम म्हणून जर देव स्वतःपासूनच विभक्त झाला तर तो देव नाहीं. त्यासाठीं त्याला आपल्या स्वत:च्या अमर्याद वैभवाचे मूल्य नाकारावे लागेल. असे केल्यानें तो हे सूचित करेल कीं त्याच्या स्वतःच्या बाहेर असे काहींतरी आहे जें त्याच्यापेक्षा अधिक मौल्यवान आहे. अशाने तो मूर्तिपूजक ठरेल.

हे आमच्या कोणत्याही लाभाचे नाहीं. कारण आपला देवच जर अनीतिमान झाला आहे तर आपण कोठे जायचे? जें असीम मोलवान त्यालाच जर देवानें असीम महत्त्व देणें थांबविले तर आपण या विश्वात शुद्धतेचा खडक कोठे शोधावा? देव स्वतःविषयीचे जें अमर्याद मूल्य आणि सौंदर्याचे दावे करतो तें त्यानें स्वतःच जर नाकारले तर आपण कोणाची उपासना करावीं?

नाहीं, देवानें आपलें देवपण सोडून द्यावे अशी मागणी करून आपण देवाचे स्वतःचे गौरव करणें ह्याला आपल्या प्रीत्यर्थ प्रीति म्हणूं शकत नाहीं.

उलट, देव अद्वितीय प्रीति आहे हे आपण पाहावें कारण आपल्या पवित्र जनांच्या ठायीं त्याच्या नावाला गौरव मिळावा म्हणून तो अखंडपणें शोध करीत असतो. आपल्या ठायीं त्याच्या महानतेच्या गौरवाची स्तुती व्हावी हाच आपल्या परमानंदाचा आणि त्याच्या महानतेचा शिखर आहे.

22 अगस्त : अपने निम्नतर स्तर पर परमेश्वर को पाना

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22 अगस्त : अपने निम्नतर स्तर पर परमेश्वर को पाना
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“यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया . . . पर यहोवा यूसुफ के संग-संग रहा और उस पर करुणा की, और बन्दीगृह के दारोगा के अनुग्रह की दृष्‍टि उस पर हुई।” उत्पत्ति 39:20-21

जब पोतीपर की पत्नी ने यूसुफ पर झूठा आरोप लगाया, तो एक बार फिर से वह अपने जीवन के निम्नतर स्तर पर पहुँच गया। इस बार उसे किसी गड्ढे में नहीं, बल्कि अन्धेरे कारागार में डाल दिया गया। उसका संसार पूरी तरह बिखर।

फिर भी, एक परमेश्वर-भक्त और सिद्धान्तों पर चलने वाले व्यक्ति के रूप में यूसुफ ने धैर्य बनाए रखा। उसने पोतीपर की पत्नी के प्रलोभन से भागने का निर्णय अपने धार्मिक विश्वास और शुद्धता के आधार पर लिया था। यूसुफ के लिए परमेश्वर का भय जेल के भय से कहीं बड़ा था। वह पोतीपर की पत्नी के साथ सम्बन्ध नहीं बना सकता था, क्योंकि ऐसा करना परमेश्वर के विरुद्ध पाप होता। यह तथ्य यूसुफ के लिए किसी भी आन्तरिक संघर्ष का अन्त था और निर्णय लेने के लिए पर्याप्त था।

ऐसा ही दृष्टिकोण हमें भी संकीर्ण मार्ग पर बनाए रखेगा। सच्ची निष्ठा व्यवहारिक सोच से नहीं, बल्कि सिद्धान्तों से आती है। यह जीवन के कोलाहल से दूर, एक शान्त स्थान पर निर्णय लेने की प्रक्रिया है। यह परिणामों की परवाह किए बिना आज्ञाकारिता है। यह परमेश्वर का जन बनने के लिए इतना दृढ़ निश्चय करना है कि जब पाप करने का दबाव सबसे अधिक हो या जब जीवन पूरी तरह से टूट जाए, तब भी हमें पता हो कि हमें कैसे प्रतिक्रिया देनी है।

जब यूसुफ ने अन्यायपूर्ण पीड़ा सही, तब परमेश्वर ने अपने प्रेम का प्रदर्शन किया और उसे जेल के अधिकारी की दृष्टि में अनुग्रह प्रदान किया। कहानी में कहीं भी ऐसा संकेत नहीं है कि यूसुफ ने परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की थी—और यदि वह किसी मित्र या सहायक की तलाश में भी होता, तो उसे कभी उम्मीद नहीं होती कि जेल का अधिकारी ही उसका सहायक बन जाएगा! लेकिन परमेश्वर की योजनाएँ कुछ और ही थीं। प्रभु की उपस्थिति उसके लोगों के साथ सबसे कठिन परिस्थितियों में भी बनी रहती है।

समय-समय पर हम सभी को ऐसा लगता है कि हम भी किसी “कारागार”—जीवन के एक नए निम्न स्तर पर में हैं, जहाँ हमें ठण्डे एकान्त ने जकड़ लिया हो। शायद आज आप भी वैसा ही महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आप भी यूसुफ की तरह झूठे आरोपों के शिकार हुए हों, या प्रभु के प्रति आपकी आज्ञाकारिता की कीमत चुका रहे हों, या फिर कोई और भारी बोझ आपकी आत्मा को थका रहा हो। लेकिन चाहे जो भी हो, प्रभु सब कुछ जानता है। वह कभी किसी चीज़ से चौंकता नहीं है, और वह आपसे अनन्त प्रेम करता है। उसका प्रेम अटल है और परिस्थितियों से नहीं बदलता। उसने आपसे इतना प्रेम किया कि उसने मृत्यु की काल-कोठरी और नरक की यातना को सह लिया ताकि आपको ऐसा कभी न करना पड़े। इस सच्चाई में शान्ति पाएँ कि जैसा भविष्यवक्ता जकर्याह ने कहा, “जो तुम को छूता है, वह [परमेश्वर की] आँख की पुतली ही को छूता है” (जकर्याह 2:8)।

लूका 8:22-39

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 110–112; 2 कुरिन्थियों 1 ◊

22 August : स्तुती करण्यात आनंदी

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22 August : स्तुती करण्यात आनंदी
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देवा, राष्ट्रे तुझी स्तुती करोत, सर्व राष्ट्रे तुझी स्तुती करोत! (स्तोत्र 67:3, 5)

आपण देवाची स्तुती करावी अशी देव आपल्याकडून मागणी का करतो?

सी.एस. लुईस :

लोक जितक्या मोठ्या आवेशाने त्यांना किंमत असलेल्यां कोणत्याही गोष्टीची स्वाभाविकरित्या स्तुती करतांत, तितक्याच स्वाभाविक आवेशाने ते आम्हांला देखील त्यांच्या भक्तींत सहभागी होण्याचा आग्रह करतांत : “ती किती सुंदर आहे, नाहीं का? ती गोष्ट किती वैभवी होती, नाहीं का? ती गोष्ट किती विलक्षण आहे, असे तुम्हांला वाटत नाहीं का?”

जेव्हां स्तोत्रकर्ते प्रत्येकाला देवाची स्तुती करण्याचे आव्हान करतांत, तेव्हां तें देखील तेच करत आहेंत जे सर्व लोक स्वाभाविकरित्या मोठ्या आवेशाने त्यांना किंमत असलेल्यां कोणत्याही गोष्टीच्या बाबतींत बोलतांत. देवाची स्तुती करण्याच्या बाबतींत असलेली माझी संपूर्ण, अति सामान्य अडचण ही कीं ती स्तुति आपल्या दृष्टित अति मोलवान असलेल्या व्यक्तीसाठीं जी गोष्ट करण्यात आपल्याला आनंद होतो, तीच आपल्याला करू दिलीं जात नाहीं या माझ्या मूर्खपणाच्या विचारावर अवलंबून आहे, जे खरे पाहता आपण स्वत:हून करू शकत नाहीं.

माझ्या मते, आपल्याला त्याची स्तुती करण्यात आनंद होतो ज्याच्यात आपला सर्व आनंद असतो, कारण स्तुती ही केवळ आपल्याला अभिव्यक्तच करत नाहीं तर ती आपला आनंद देखील भरून काढते; हाच तिचा ठराविक शेवट. एकमेकांवर प्रेम करणारे जोडपे तू किती सुंदर आहेत अशी एकमेकांची स्तुतीसुमने करतांत हा कौतुकाच्या बाहेरचा विषय नाहीं; स्तुती जोपर्यंत व्यक्त होत नाहीं तोपर्यंत आनंद हा अपूर्णच असतो.

येथें उत्तर आहे – देव आपल्याकडून त्याची स्तुती करण्याची मागणी करतो त्यामागे आभासीपणें दिसून येणाऱ्या देवाच्या अहंकारावर उपाय! म्हणजें असें कीं, मुळांत ही आज्ञा आमच्या परम आनंदासाठीं आहे. आपण ज्याचा आनंद घेतो त्याची आपण स्तुतीही करतो कारण तो आनंद जोपर्यंत स्तुती करण्याद्वारे व्यक्त होत नाहीं तोपर्यंत तो अपूर्ण असतो. आपण ज्याला महत्त्व देतो त्याच्याविषयी जर आपल्याला बोलू दिलें नाहीं आणि आपल्याला जे आवडते त्याचा उत्सव साजरा करण्याची आपल्याला परवानगी दिली गेलीं नाहीं आणि ज्याचे आपल्याला कौतुक वाटते किंवा ज्याचा आपण सम्मान करतो त्याची जर आपल्याला स्तुती करू दिली नाहीं तर आपला आनंद पूर्ण होणार नाहीं.

म्हणून, आपला आनंद पूर्ण करण्याइतपत जर देव आपल्यावर प्रीति करत असेल, तर मग त्यानें स्वतःला भेट म्हणून आपल्याला द्यावे इतके पुरे नाहीं; त्यानें आपल्याकडून आपल्या अंतःकरणातून उसळणारी स्तुती देखील जिंकली पाहिजे – त्याला स्वतःमध्यें असलेला काहीं कमकुवतपणा दूर करायचा आहे किंवा त्याच्यात असलेला काहीं अपुरेपणा भरून काढायचा आहे म्हणून नव्हें, तर तो आपल्यावर प्रेम करतो आणि आपला आनंद पूर्ण व्हावा अशी उत्कंठा बाळगतो आणि ती उत्कंठा केवळ तेव्हांच पूर्ण होते जेव्हा आपण त्याला ओळखते व त्याची स्तुती करतो, जो सर्वांमध्यें अति महान व गौरवी आहे.

जर तो खरोखर आपला आहे, तर तो तसा स्वतःसाठींच असला पाहिजे! सर्व विश्वात केवळ हाच परमेश्वर असा आहे ज्याच्यासाठीं स्वतःची स्तुती करून घेण्यामध्यें त्याच्या सर्वोच्च प्रीतिचे कार्य प्रकट होते. त्याच्या बाबतींत, स्वतःला उंचविणें हा सर्वोच्च सद्गुण आहे. जेव्हा तो “त्याच्या गौरवाची स्तुती व्हावी म्हणून” सर्व गोष्टी करतो (इफिस 1:12, 14), तेव्हा तो या जगातील अशी एकमेव गोष्ट आपल्यासाठीं राखून ठेवतो व आपल्याला देतो जी आपली संपूर्ण तळमळ संतुष्ट करू शकते.

देव आमच्यासाठीं आहे! परंतु या प्रीतिचा पाया म्हणजें देव हा स्वतःसाठीं होता, आजही स्वतःसाठीं आहे आणि युगानुयुग स्वतःसाठीं राहील.

21 अगस्त : अब और तब

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21 अगस्त : अब और तब
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“क्योंकि मेरे लिए जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है। पर यदि शरीर में जीवित रहना ही मेरे काम के लिए लाभदायक है तो मैं नहीं जानता कि किसको चुनूँ। क्योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूँ; जी तो चाहता है कि कूच करके मसीह के पास जा रहूँ, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है, परन्तु शरीर में रहना तुम्हारे कारण और भी आवश्यक है।” फिलिप्पियों 1:21-24

क्या आपको याद है जब बचपन में आप अपने रिश्तेदारों से मिलने जाया करते थे? शायद कुछ मुलाकातें ऐसी थीं जिनका आपको डर रहता था क्योंकि जिनसे आप मिलने जा रहे थे, वे आपके करीबी नहीं थे या आप उनके साथ सहज महसूस नहीं करते थे। लेकिन फिर कुछ विशेष मुलाकातें भी थीं, उन लोगों के साथ जिन्हें आप वास्तव में प्यार करते थे। शायद उनके दरवाजे पर पहुँचकर आपका स्वागत आपको गले से लगाकर किया जाता हो या ताज़ा बेक किए हुए कुकीज़ की खुशबू से किया जाता हो। आप उनसे मिलने के लिए उत्साहित रहते थे! वे आपके लिए अनमोल थे, और आप उनकी उपस्थिति में रहने के लिए उत्सुक रहते थे।

प्रेरित पौलुस के लिए ऐसा व्यक्ति स्वयं यीशु था। पौलुस कैद में रहते हुए भी आनन्दित रहता था, क्योंकि मसीह उसके लिए इतना महत्त्वपूर्ण था। वह उस समय की प्रतीक्षा में था, जब उसे यीशु की उपस्थिति में बुलाया जाएगा। यीशु उसके लिए सब कुछ था।

क्या आप और मैं यीशु के बारे में ऐसा कह सकते हैं? या फिर हमारी खुशी केवल सांसारिक चीज़ों पर आधारित है—जैसे हमारी शादी, बच्चे, आजीविका, या प्रभाव? यदि आपकी आत्मा की सारी उत्तेजना और आपकी पहचान केवल सांसारिक चीज़ों में ही बंधी हुई है, तो यीशु के साथ होने की चाहत फीकी पड़ जाती है। इसलिए यह याद रखना बुद्धिमानी होगी कि हमारी असली पहचान उसी में है, क्योंकि एक दिन हमें बाकी सब कुछ पीछे छोड़ना होगा।

आपने शायद यह कहावत सुनी होगी कि कोई व्यक्ति इतना अधिक स्वर्गिक विचारों में लीन हो सकता है कि वह पृथ्वी पर किसी काम का न रहे। लेकिन हम इतने सांसारिक विचारों में भी उलझ सकते हैं कि स्वर्ग के लिए बेकार हो जाएँ। कई बार, हमें यह इच्छा होती है कि हमें अभी और यहीं पर सम्पूर्ण स्वास्थ्य, दुखों का अन्त और एक निश्चिन्त जीवन मिल जाए। लेकिन वास्तविकता यह है कि हमें प्रियजनों को खोना पड़ेगा, अस्पतालों से डरावनी रिपोर्टें मिलेंगी, और हमें निराशा व आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। यह सब हमारे “अभी” का हिस्सा है। इस पत्र में पौलुस की दुविधा थी कि “अभी” और “आगे” के बीच सन्तुलन कैसे बनाए रखा जाए। हालाँकि वह इस संसार से जाने की लालसा रखता था, लेकिन यह इसलिए नहीं था कि वह अपनी वर्तमान परिस्थितियों से भागना चाहता था। निस्सन्देह उसने कई कठिन परीक्षाओं का सामना किया, लेकिन उसके लिए स्वर्ग केवल सांसारिक पीड़ा से राहत नहीं था। वह जीवन से बचकर मृत्यु की ओर भाग नहीं रहा था, बल्कि वह यीशु के साथ रहने की अभिलाषा कर रहा था क्योंकि वह जानता था कि वह अनुभव कितना अद्‌भुत होगा।

वर्तमान में विश्वासयोग्य जीवन जीते हुए यीशु के साथ होने की वास्तविकता की प्रतीक्षा करना हम सभी के लिए सीखने योग्य बात है। पौलुस जानता था कि जब तक उसके भीतर साँस थी, तब तक उसे अपने सांसारिक कार्यों को निष्ठापूर्वक पूरा करना था, जब तक कि मसीह उसे स्वर्ग में अपने पास न बुला ले। इसलिए कुछ समय निकालकर यीशु को उसकी सम्पूर्ण प्रेमपूर्ण महिमा में देखते हुए चिन्तन करें। फिर इस महान सच्चाई का आनन्द लें कि एक दिन वह अपनी महिमा में आपका स्वागत करेगा। और फिर यह विचार करें कि उस क्षण तक पहुँचने का द्वार मृत्यु ही है। यही आपका भविष्य है। एक दिन, यह आपका वर्तमान होगा। और तब तक, आप वही कर सकते हैं जो पौलुस ने किया—मसीह के लिए पूर्ण समर्पण के साथ जीवन जीएँ, यह जानते हुए कि मृत्यु केवल लाभ ही होगी।

2 तीमुथियुस 4:6-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 107–109; गलातियों 6

21 August : अखंड आनंदी देव

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21 August : अखंड आनंदी देव
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“माझा आनंद तुमच्यामध्यें असावा व तुमचा आनंद परिपूर्ण व्हावा म्हणून मी तुम्हांला ह्या गोष्टी सांगितल्या आहेत.” (योहान 15:11)

परमेश्वर हा निखालस सार्वभौम आहे.

“आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” (स्तोत्र 115:3).

त्यामुळें तो कधीही निराश होऊ शकत नाहीं. त्यानें मोशेच्या द्वारे इस्रायलाला ज्या पराक्रमाने सोडविले त्याविषयीच्या विविध रंगांवर तो विचार करतो, तेव्हां त्याला आपल्या कृतींपासून आनंद होतो. त्याच्या आनंदाला खंड पडत नाहीं.

त्याचा आनंद हा मुळांत त्याला स्वतःमध्यें असलेली आत्मसंतुष्टी आहे. सृष्टीची उत्पत्ती करण्यापूर्वी, तो त्याच्या पुत्राच्या व्यक्तीत्वात असलेल्या त्याच्या गौरवाच्या प्रतिमेपासून आंनदी होता– म्हणजें त्याच्या प्रिय पुत्रामध्यें ज्याच्याविषयी तो संतुष्ट होता (मत्तय 3:17). नंतर देवाचा हा आनंद त्यानें सृष्टीची उत्पत्ती केलीं व तारणाचे गौरवी कार्य केलें त्यावेळी सर्व “जगासमोर उघड झाला”.

ह्या कृतींपासून देवाच्या मनाला आनंद होतो कारण ती त्याच्या वैभवाचे प्रतिबिंब आहेंत. आकाश देवाचा महिमा वर्णिते; अंतरिक्ष त्याची हस्तकृती दर्शवते (स्तोत्र 19:1). “परमेश्वराचे वैभव चिरकाल राहो! परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होवो!” (स्तोत्र 104:31). तो जें काहीं करतो ते सर्व तो आपलें हे वैभव टिकवून ठेवण्यासाठीं व ते जगासमोर उघड करण्यासाठीं करतो, कारण यापासूनच त्याच्या जिवाला आनंद होतो.

देवाच्या सर्व कृतींचा कळस तारण पावलेलें त्याचे लोक त्याची थोरवी वर्णितांत त्यांत आहे. “त्याच्या पराक्रमाच्या कृत्यांबद्दल त्याचे स्तवन करा; त्याच्या थोरवीच्या वैपुल्यानुसार त्याचे स्तवन करा!” (स्तोत्र 150:2). त्याच्या आनंदाचा कळस म्हणजें जेव्हा तो पवित्र केलेंल्या आपल्या सर्व लोकांच्या स्तवनाची ललकारपूर्ण प्रतिध्वनी ऐकतो त्यापासून त्याला होणारा आनंद घेतो. “तो घोड्याच्या बलाने आनंदित होत नाहीं, मनुष्याच्या पायांनी संतोष पावत नाहीं. जे परमेश्वराचे भय धरतांत, जे त्याच्या दयेची प्रतीक्षा करतांत त्यांच्यावर तो संतुष्ट होतो” (स्तोत्र 147:10-11).

परंतु त्याच्या थोरवीचा प्रतिध्वनी म्हणून जेव्हा देव आपली स्तवने ऐकतो तेव्हां त्यापासून केवळ त्यालाच आनंद होत नाहीं; त्याच्या थोरवीचे हे स्तवन आपल्या आनंदाचा देखील कळस आहे. स्तवन म्हणजें जेव्हां आपण देवाची थोरवी पाहतो व तिचा आस्वाद घेतो तेव्हां त्यांत आपल्याला जो आनंद मिळतो त्यात आपल्याला मिळणारी संतुष्टी

म्हणून, आपल्याकडून त्याचे स्तवन व्हावे हा देवाचा शोधाशोध आणि त्यांत आनंद मिळवण्याचा आपला शोधाशोध हा शोधाशोध आहे. ख्रिस्तात प्रकट झालेंल्या देवाच्या कृपेच्या गौरवाच्या सुवार्तेचा हा अग्रगण्य परिणाम आहे!

20 अगस्त : चुनाव का क्षण

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20 अगस्त : चुनाव का क्षण
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“विश्‍वास ही से मूसा ने सयाना होकर फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इनकार किया। इसलिए कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्‍वर के लोगों के साथ दुख भोगना अधिक उत्तम लगा।” इब्रानियों 11:24-25

हम एक ही समय में संसार के दोस्त और परमेश्वर के दोस्त नहीं हो सकते (याकूब 4:4)। जो लोग इस मध्य मार्ग पर चलने की कोशिश करते हैं, वे एक न एक दिन अवश्य समझ जाते हैं कि यह कितना निरर्थक और व्यर्थ है: और क्रिस क्रिस्टोफर्सन के शब्दों में यह हमें “एक चलता-फिरता विरोधाभास” बना देता है।[1]

फिरौन की बेटी के दत्तक पुत्र के रूप में मूसा को सामाजिक स्थिति, शारीरिक आराम और भौतिक सम्पत्ति का आनन्द मिला। एक इस्राएली के रूप में फिरौन के दरबार से बाहर उसे केवल गुमनामी, दरिद्रता और गुलामी ही मिलती। मूसा जानता था कि फिरौन के दरबार में रहना उसके लिए हर सांसारिक दृष्टिकोण से बेहतर होता। वह यह सोच सकता था कि इससे उसे परमेश्वर के लोगों के पक्ष में प्रभाव डालने का मौका मिलेगा, जो तब सम्भव नहीं होगा यदि वह दरबार को छोड़कर उनके साथ जा मिलता है।

लेकिन मूसा फिरौन के परिवार में नहीं रुका। इसके बजाय, उसने मिस्र की नागरिकता के लाभों को त्याग दिया और एक दीन-हीन, तिरस्कृत, उत्पीड़ित समूह के साथ एक हो गया, जिनके पास कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे। क्यों? कोई क्यों इतने कम को अपनाने के लिए इतने अधिक को छोड़ देगा?

उत्तर यह है कि मूसा ने महसूस किया कि वह परमेश्वर के लोगों और मिस्रियों के साथ एक ही समय में एक नहीं हो सकता। वह जान गया था कि वह या तो अपने लोगों के साथ गुलाम होगा या फिरौन के दरबार में समझौता करने वाला बनकर रहेगा। यह नहीं हो सकता था कि एक ओर तो वह कहे कि वह एक इस्राएली था जो अपने पूर्वजों के परमेश्वर में विश्वास करता था और साथ ही एक मिस्री के रूप में भी जीवन जीए।

हमें बताया गया है कि मूसा ने “मसीह के कारण” अपमान और कठिनाई को चुन लिया (इब्रानियों 11:26)—उस एक के लिए, जो हव्वा के वंश और अब्राहम के परिवार से आने पर था और जो उनके लिए परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने पर था (उत्पत्ति 3:16; 12:1-3)। उसका यह निर्णय वही था जैसा एक सहस्राब्दी के बाद प्रेरित पौलुस ने लिया था, जिसकी पृष्ठभूमि बिल्कुल “सही” थी—शिक्षा, सटीकता, और वंश—फिर भी उसने कहा, “मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ” (फिलिप्पियों 3:8)।

मूसा ने एक क्रान्तिकारी निर्णय लिया—ऐसा निर्णय जो हम में से कुछ लोगों को भी लेने की आवश्यकता है। शायद आपकी पृष्ठभूमि मूसा के समान है; बचपन से ही आपकी सारी भौतिक जरूरतें बड़ी आसानी से पूरी हुई हैं और इस संसार में आपके पास बहुत बड़ी सफलता की सम्भावनाएँ हैं। हालाँकि, हम जो भी हैं और जहाँ से भी आए हैं, हम सभी को उसी निर्णय का सामना करना पड़ता है जिसका सामना मूसा ने किया था। क्या हम संसार के दोस्त होंगे या परमेश्वर के दोस्त? कोई मध्य मार्ग नहीं है। क्या आज आप संसार के मापदण्डों से जीएँगे, संसार के हँसी-ठट्ठे पर हँसेंगे, संसार की विधियों का पालन करेंगे, और संसार की प्राथमिकताओं को अपनाएँगे? या क्या आप यीशु मसीह के साथ खड़े होंगे, पूरी तरह से विरोध का सामना करेंगे, अपना ध्वज लहराएँगे, और शब्दों तथा कामों से यह स्वीकार करेंगे कि वह आपका प्रभु है? शायद आज वह दिन है जब आपको पहली बार, या लम्बे समय के बाद “विश्वास के द्वारा” जीने और वह क्रान्तिकारी निर्णय लेने की जरूरत है।

लूका 18:18-30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 105–106; गलातियों 5 ◊


[1] “द पिलग्रिम, अध्याय 33” (1971).

20 August : तुम्हीं ज्या पराक्रमी मनुष्याला शोधत आहात तो येशू आहे

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20 August : तुम्हीं ज्या पराक्रमी मनुष्याला शोधत आहात तो येशू आहे
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“स्वर्गात आणि पृथ्वीवर सर्व अधिकार मला दिलेंला आहे. तेव्हा तुम्हीं जाऊन सर्व राष्ट्रांतील लोकांना शिष्य करा; त्यांना पित्याच्या, पुत्राच्या व पवित्र आत्म्याच्या नावाने बाप्तिस्मा द्या; जे काहीं मी तुम्हांला आज्ञापिले ते सर्व त्यांना पाळण्यास शिकवा; आणि पाहा, युगाच्या समाप्तीपर्यंत मी सर्व दिवस तुमच्याबरोबर आहे.” (मत्तय 28:18-20)

मत्तयाचा शेवटचा अध्याय ही ती खिडकीं आहे जी मरणांतून उठलेला ख्रिस्त ह्याच्या गौरवी सूर्योदयाच्या दिशेने उघडते. त्या खिडकींतून तुम्हीं ख्रिस्ताच्या चारित्र्याच्या पर्वतरांगेत अणकुचीदार असलेले किमान तीन असे भव्य शिखरे पाहू शकता : त्याच्या सामर्थ्याचा शिखर; त्याच्या दयेचा शिखर; आणि त्याचा संकल्प-सिद्धीचा शिखर.

सर्व अधिकार त्याला दिलेंला आहे – त्याची इच्छा पूर्ण करण्याचा सर्व अधिकार व सामर्थ्य. आणि या सामर्थ्याचा उपयोग तो सर्व राष्ट्रांतील लोकांना शिष्य बनवण्याचा आपला खंबीर उद्देश साध्य करून घेण्यासाठीं करतो. हे करत असतांना, तो आपल्या प्रत्येकावर वैयक्तिकरित्या दया करतो, ती अशी कीं, युगाच्या समाप्तीपर्यंत तो सर्व दिवस आमच्याबरोबर आहे असे तो आपल्याला अभिवचन देतो.

आपण सर्वांना आपल्या अंतःकरणात हे ठाऊक आहे कीं मरणांतून उठलेला ख्रिस्त हा आपण त्याच्या पराक्रमाचे कौतुक करावें  ही आमची अभिलाषा जर पूर्ण करणार असेल तर ह्या सर्व गोष्टीं अशाच असणें अगत्याचे आहे. सामर्थ्याने पराक्रमी. दयाळूपणामघ्ये पराक्रमी. आपला संकल्प सिद्धींस नेण्यांत पराक्रमी.

जे लोक त्यांचे संकल्प पूर्ण करण्याच्या बाबतींत अत्यंत दुर्बळ असतांत, ते पराक्रमाचे कौतुक करण्याची आमची अभिलाषा पूर्ण करू शकत नाहींत. ज्यांच्या जीवनात कोणतेही उद्दिष्ट नाहीं अशा लोकांचे कौतुक आपण कदाचितच करतो. आणि ज्यांचे संकल्प केवळ स्वार्थी आणि निर्दयी आहेत त्यांचे कौतुक करणें तर अशक्यच.

आपल्याला एखाद्या अशा पुरुषाला पाहण्याची आणि जाणून घेण्याची अभिलाषा असते ज्याचे सामर्थ्य अमर्याद, ज्याची दया सौम्य आणि ज्याचा संकल्प शुद्ध आणि निश्चयी असा आहे.

कादंबरीकार आणि कवी व चित्रपट निर्माते आणि विविध विषयाचे लेखक अधूनमधून अशा पराक्रमी व्यक्तीचे चित्र आपल्यापुढे रेखाटत असतांत. परंतु अशा मनुष्याची उपासना करण्याइतपत माझी जी तळमळ आहे ती ते भरून काढू शकत नाहींत.

आपल्याला काहींतरी असे आवश्यक असते जें वास्तविक आहे. आपल्याला सर्व सामर्थ्य आणि दया आणि संकल्प साध्य करण्याचे अस्सल मूळ पाहण्याची तळमळ असते. यास्तव आपण मरणातून उठलेला ख्रिस्त ह्याच्याकडें पहावें आणि त्याची उपासना करावीं.

19 अगस्त : सच्चा राजा

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19 अगस्त : सच्चा राजा
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“यह कटोरा मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है नई वाचा है।” लूका 22:20

यीशु ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा किया है और उनके हरेक आशीर्वाद को वितरित किया है। उसने नए वाचा का आरम्भ कर दिया है और असली राजा के रूप में अपनी लम्बे समय से प्रतीक्षित भूमिका ग्रहण कर ली है। यीशु से ही हरेक आशीर्वाद बहता है। उसके माध्यम से हर प्रतिज्ञा पूरी होती है। उसे ही सारी महिमा दी जाती है।

मसीही लोग इन सत्यों को प्रभु भोज की मेज पर स्वीकार करते हैं, जब हम प्याला लेते हैं और याद करते हैं कि यीशु ने अपना रक्त बहाया। यह नई वाचा का रक्त था, जो हमारे पापों की माफी के लिए बहाया गया था। क्रूस पर यीशु ने वह दण्ड अपने ऊपर ले लिया जो हमें मिलना चाहिए था, ताकि पापी लोग, जो उसकी दया और कृपा के पात्र नहीं हैं, क्षमा के आशीर्वाद का आनन्द ले सकें।

इसका अर्थ है कि जब हम यीशु में विश्वास करते हैं, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उसने हमारे पाप और उसके न्याय को अपने ऊपर ले लिया है और बदले में हमें अपनी सारी धार्मिकता दे दी है। यीशु उस मृत्यु से मरा, जो हमें मिलनी चाहिए थी। उसने वह सम्पूर्ण जीवन जीया, जो हम नहीं जी सकते थे। परमेश्वर ने अपने पुत्र के माध्यम से हमें अपनी क्षमा की चादर में लपेट लिया है। हमें कभी भी यह सच नहीं भूलना चाहिए कि हमारे बारे में ये बातें विश्वास के द्वारा सच हैं।

पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा था: एक राजा आएगा जो दाऊद का वंशज होगा, और वह परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा करेगा। वह परमेश्वर का राज्य स्थापित करेगा, एक नया युग लाएगा, और बुराई के प्रभावों से निपटेगा। क्रूस पर लटका हुआ यीशु किसी राजा जैसा नहीं दिखता था, लेकिन यह उसकी महानतम विजय का क्षण था। और जब यीशु कब्र से बाहर आया, तो उसके पुनरुत्थान ने यह घोषणा की कि वह सिर्फ दाऊद का पुत्र नहीं था, बल्कि परमेश्वर का पुत्र था, जो मृत्यु को भी पराजित कर सकता था।

सारा अधिकार उसी के पास है और अनन्त कृपा और दया की धारा उसी के माध्यम से बहती है। जो इस शक्ति का स्रोत है, केवल वही दिलों को बदल सकता है और हमारी आत्माओं के प्रेम के योग्य सिद्ध हो सकता है।

यीशु अभी पिता के दाहिने हाथ विराजमान होकर राज्य करता है, लेकिन वह उन लोगों के दिलों में भी राज्य करता है जो उस पर विश्वास करते हैं। आज का दिन खोए हुए लोगों के लिए सबसे अच्छा दिन है कि वे अपने विद्रोही हथियारों को नीचे रख दें, इस योग्य राजा के सामने विनम्रता से झुकें, स्वीकार करें कि वह वही उद्धारकर्ता है जिसकी उन्हें इतनी अधिक आवश्यकता है, और उससे अपने जीवन की राजगद्दी पर राज्य करने का अनुरोध करें। क्या मसीह आपका राजा है? तो उसके अनुयायी के रूप में उसकी आराधना और स्तुति करें, और उसके राजदूत के रूप में जाएँ और दूसरों को इस आशा के बारे में बताएँ जिसे आपने पाया है।

1 कुरिन्थियों 15:12-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 103–104; गलातियों 4

19August : आमच्या बाबतींत पुनरुत्थान म्हणजें काय

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19August : आमच्या बाबतींत पुनरुत्थान म्हणजें काय
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कीं, येशू प्रभू आहे असे जर ‘तू आपल्या मुखाने’ कबूल करशील आणि देवानें त्याला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवशील तर तुझे तारण होईल. (रोमकरांस 10:9)

“देवानें त्याला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवशील” म्हणजें काय? देवानें येशूला मेलेल्यांतून उठवले असा विश्वास सैतान देखील ठेवतो. त्यानें ते घडताना पाहिले आहे. या प्रश्नाच्या उत्तरासाठीं, आपल्याला देवाच्या लोकांच्या बाबतींत पुनरुत्थानाचा अर्थ काय आहे यावर विचार करावा लागेल.

पुनरुत्थान म्हणजें देव आपल्या पक्षाचा झाला आहे. स्वतःला आमच्या जवळ आणावे हांच त्याचा मुख्य हेतू. आपल्या सर्व परित्यक्तपणाच्या आणि परकेपणाच्या भावनांवर मात करणें हे त्याचे ध्येय आहे.

येशूचे पुनरुत्थान हे इस्रायलापुढे आणि जगापुढे देवानें केलेंलीं अशी घोषणा आहे कीं आपण आपल्या कर्मांनी गौरवांत प्रवेश करू शकत नाहीं, म्हणून जिथें जाणें आपल्यासाठीं अशक्य आहे तिथें आपल्याला पोहोचवण्यासाठीं आवश्यक असलेली अशक्य गोष्ट त्यानें स्वतःच करावी असा त्याचा संकल्प आहे.

पुनरुत्थान हे देवानें याविषयी दिलेंले अभिवचन आहे कीं जें येशूवर विश्वास ठेवतांत त्यां सर्वांना देवाचे सामर्थ्य दिलें जाईल जेणेंकरून त्यांनी नीतिमत्वाच्या मार्गावर चालण्यास आणि मृत्यूच्या दरीतूनहि सुरक्षित निघण्यांस समर्थ व्हावें.

म्हणून, देवानें येशूला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवणें ही गोष्ट केवळ घडलेल्या वस्तुस्थितीला मान्य करण्यापर्यंत मर्यादित नाहीं. याचा अर्थ असा विश्वास ठेवणें आहे कीं देव तुमच्या बाजूने आहे, कीं त्याचे तुमच्यासोबत घनिष्ठ नाते जुळले आहे, कीं तो तुमच्या जीवनांत बदल घडवून आणत आहे आणि शेवटी तो तुम्हांला सार्वकालिक जीवनाचा आनंद मिळावा म्हणून तुम्हांला तारेल.

पुनरुत्थानावर विश्वास ठेवणें म्हणजें त्यानें जीवन, आणि आशा आणि नीतिमत्व यांविषयी जी जी अभिवचने दिलींत त्यांवर जशाचा तसा विश्वास ठेवणें.

याचा अर्थ देवाच्या सामर्थ्यावर आणि त्यानें आपल्यावर केलेंल्या प्रीतिवर इतका विश्वास ठेवणें कीं ऐहिक लाभाचा मोह असो वा ऐहिक नुकसानाची भीती, यांपैकीं कोणतीही गोष्ट आपल्याला त्याच्या इच्छेविरुद्ध बंड करण्यांस प्रवृत्त करणार नाहीं.

सैतानाचा विश्वास आणि पवित्र जनांचा विश्वास यांत हाच फरक आहे. हे देवा, आम्हीं तुझ्यावर प्रीति करावी आणि तुझा पुत्र ख्रिस्त येशू ह्याच्या पुनरुत्थानात विश्रांती घ्यावी म्हणून तू आमच्या अंतःकरणाची सुंता कर (अनुवाद 30:6).