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20 June : कृपा ही क्षमा आहे – आणि सामर्थ्य

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20 June : कृपा ही क्षमा आहे - आणि सामर्थ्य
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तरी जो काहीं मी आहे तो देवाच्या कृपेनें आहे आणि माझ्यावर त्याची जी कृपा झाली आहे ती व्यर्थ झाली नाहीं; परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असें नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्या देवाच्या कृपेनें केलें. (1 करिंथ 15:10)

कृपा ही आम्हीं पाप केल्यांनंतर मिळणारी केवळ दया नव्हे. कृपा पाप न करण्यासाठीं सामर्थ्य देणारे देवाचे कृपादान आणि सामर्थ्य आहे. कृपा ही सामर्थ्य आहे, केवळ पापक्षमा नव्हे.

हे स्पष्ट आहे, उदाहरणार्थ, 1 करिंथ 15:10 मध्यें पौल कृपेचे वर्णन त्याच्या कार्याचे समर्थ बनविणारे सामर्थ्य म्हणून वर्णन करतो. त्याच्या पापांची ती केवळ क्षमा नाहीं; आज्ञाधारकपणांत पुढे वाढत जाण्याचे ते सामर्थ्य आहे. “परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असें नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणाऱ्या देवाच्या कृपेनें केलें.

म्हणून, देवाच्या आज्ञेचे पालन करण्यासाठीं जी धडपड आपण करतो ती आम्हीं आपल्यां स्वतःच्या शक्तीनें केलेंला प्रयत्न नसतो, “देवानें दिलेंल्या शक्तीनें – ह्यासाठीं कीं, सर्व गोष्टींत देवाचा गौरव येशू ख्रिस्ताच्या द्वारें व्हावा” (1 पेत्र 4:11). हे विश्वासाचे आज्ञापालन होय. आम्हीं जे केलें पाहिजे ते करण्यासाठीं आम्हांला सामर्थ्य पुरविणारी देवाची क्षणाक्षणाला प्रकट होणारी कृपापूर्ण शक्ती.

याची पुष्टी पौल 2 थेस्सल 1:11-12 मध्यें करतो आणि आमच्यां चांगुलपणाच्या सर्व कार्यांस तो “विश्वासाचे कार्य” म्हणतो, आणि तसे म्हणण्याद्वारें येशूला जे गौरव प्राप्त होते ते “आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेनें” आहे कारण हे त्याच्या “सामर्थ्यानें” घडते. खालील सर्व वाक्प्रचार ऐका :

ह्याकरता तर आम्हीं तुमच्यांसाठीं सर्वदा अशी प्रार्थना करतो कीं, आपल्यां देवानें तुम्हांला झालेंल्या ह्या पाचारणाला योग्य असें मानावे आणि चांगुलपणाचा प्रत्येक मनोदय व विश्वासाचे कार्य सामर्थ्यानें पूर्ण करावे; ह्यासाठीं कीं, आपला देव व प्रभू येशू ख्रिस्त ह्यांच्या कृपेनें आपला प्रभू येशू ह्याच्या नावाला तुमच्यां ठायी व तुम्हांला त्याच्या ठायी गौरव मिळावा.

ज्या आज्ञाधारकपणामुळें देवाला आनंद होतो तो विश्वासाद्वारें देवाच्या कृपेच्या सामर्थ्यानें उत्पन्न होतो. ख्रिस्ती जीवनाच्या प्रत्येक पातळीवर हीच शक्ती कार्य करते. विश्वासाद्वारें तारणारे देवाच्या कृपेचे सामर्थ्य (इफिस 2:8) देवाच्या कृपेचे तेच सामर्थ्य आहे जे विश्वासाद्वारें पवित्रहि करते.

19 जून : हम एक देह हैं

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19 जून : हम एक देह हैं
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“क्योंकि जैसे हमारी एक देह में बहुत से अंग हैं, और सब अंगों का एक ही सा काम नहीं; वैसा ही हम जो बहुत हैं, मसीह में एक देह होकर आपस में एक दूसरे के अंग हैं।” रोमियों 12:4-5

आपने कभी-कभी लोगों को आपसे यह पूछते सुना होगा, “क्या आप यहाँ के सदस्य हैं?” यह सवाल आमतौर पर किसी कंट्री क्लब, जिम, या इसी तरह के किसी स्थान से सम्बन्धित होता है। वे जानना चाहते हैं, “क्या आप इस स्थान की सदस्य-सूची में शामिल हैं? क्या यहाँ के लोग आपको जानते हैं और स्वीकार करते हैं, और क्या वे आपको तब याद करेंगे जब आप मौजूद नहीं होंगे?”

कलीसिया का वर्णन करने के लिए पौलुस अक्सर शरीर के उदाहरण का उपयोग करता है। इसके अर्थ को समझने के लिए हमें अपनी कल्पना का विस्तार करने की आवश्यकता नहीं है। हम सभी के पास एक शरीर है, जो विभिन्न हिस्सों से बना हुआ है, और प्रत्येक भाग का एक विशेष कार्य होता है। सभी भाग दिखाई नहीं देते, लेकिन सभी महत्त्वपूर्ण हैं। यदि कोई भाग काम नहीं कर रहा या मौजूद नहीं है, तो इसका असर बाकी सब पर पड़ता है। किसी के पूरे शरीर की प्रभावशीलता इस पर निर्भर करती है कि यह सिर द्वारा नियन्त्रित हो रहा है या नहीं। यह सत्य मसीह की देह अर्थात स्थानीय कलीसिया पर भी लागू होता है: आत्मिक शरीर तभी सही तरीके से काम करता है, जब वह यीशु के नेतृत्व में एकजुट होकर काम करता है। जब ऐसा होता है, तो हम . . .

एकता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं रहते।

बहुलता के साथ काम करते हैं, क्योंकि हम विभिन्न प्रकार के हिस्सों से बने हैं।

विविधता के साथ काम करते हैं, क्योंकि शरीर के कार्य स्वाभाविक रूप से विविध होते हैं।

सुगमता के साथ काम करते हैं, जिसे हम तब महसूस करते हैं जब सब कुछ एकजुट होकर काम करता है।

पहचान के साथ काम करते हैं, यह दर्शाते हुए कि हममें से प्रत्येक जन अकेला रहकर स्वयं को पूर्ण रूप से नहीं जान सकता।

दूसरे शब्दों में, जब आप एक व्यक्ति के रूप में मसीह की देह की प्रकृति को समझते हैं, तो आप बेहतर तरीके से समझ पाते हैं कि आप कौन हैं और आप कहाँ फिट बैठते हैं। मसीह की देह के एक सदस्य के रूप में आप कहीं न कहीं अवश्य शामिल हैं। जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें बदल दिया है, तो हमें यह एहसास होना चाहिए कि हमारे लिए यह ध्यान रखना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हमें एक-दूसरे के साथ सम्बन्ध में बुलाया गया है—एक समुदाय में बुलाया गया है। हम उन वरदानों में विविध हैं जो हमें दिए गए हैं; हममें से कोई भी अकेले रहकर शरीर नहीं बना सकता, बल्कि हम एकसाथ जुटकर ही शरीर बनते हैं। हममें से प्रत्येक एक-दूसरे के लिए हैं। इसलिए हम कलीसिया में इस उद्देश्य से एकत्रित होते हैं कि हम अपने आप को एक-दूसरे के लिए और अन्ततः हमारे प्रभु के लिए अर्पित कर सकें। हम मसीह की देह में हमारे उपस्थित रहने, हमारे गीतों, हमारे प्रार्थनाओं और हमारी संगति के माध्यम से योगदान देते हैं। जैसा कि आइसक वॉट्स ने लिखा:

मेरी जीभ अपनी प्रतिज्ञाएँ दोहराती है,

इस पवित्र घर को शान्ति मिले!”

क्योंकि यहाँ मेरे मित्र और परिवारजन रहते हैं। [1]

कलीसिया सिर्फ एक ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ आप आकर बैठ जाते हैं। यह एक देह है। यह आपका परिवार है। आपको अपनी कलीसिया की आवश्यकता है; और आपकी कलीसिया को आपकी आवश्यकता है। जितना अधिक आप अपनी कलीसिया के प्रति प्रतिबद्ध होंगे, उतना ही अधिक आप इससे आशीषित होंगे; क्योंकि हमारे जीवन में इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि परमेश्वर अपने लोगों को एक साथ लाता है, क्योंकि एकजुटता ही वह स्थान है जहाँ हम सबको होना चाहिए।

  1 कुरिन्थियों 12:12-27

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 37–39; मत्ती 27:1-26 ◊


[1] आइसक वॉट्स, “हाओ प्लीज़्ड ऐण्ड ब्लेस्ट वाज़ आई” (1719).

19 June : मनुष्याचे भय धरण्याचा अपराध

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19 June : मनुष्याचे भय धरण्याचा अपराध
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तेव्हां शौल शमुवेलाला म्हणाला, “मी पाप केलें आहे; मी परमेश्वराच्या आज्ञेचे व आपल्यां शब्दाचे उल्लंघन केलें आहे; कारण मी लोकांना भिऊन त्यांचे म्हणणें ऐकलें. (1 शमुवेल 15:24)

शौलानें देवाचे म्हणणें ऐकण्याऐवजी लोकांचे म्हणणें का ऐकलें? कारण त्याला देवाऐवजी लोकांची भीती होती. त्याला अवज्ञेच्या दैवीय परिणामांची जितकीं भीती होती त्यापेक्षा अधिक भीती आज्ञापालनानें पुढे मानवीय परिणाम काय होतील याची होती. देवाच्या नाराजीपेक्षा त्याला लोकांच्या नाराजीचे अधिक भय होते. आणि हा देवाचा फार मोठा अपमान आहे.

वस्तुतः, यशया म्हणतो कीं देवाच्या अभिवचनांकडें दुर्लक्ष करून मनुष्य काय करूं शकतो याची भीती धरणें एक प्रकारचा अहंकार आहे. तो ह्या मर्मभेदी प्रश्नानें देवाचे शब्द उद्धृत करतो: “तुमचे सांत्वन करणारा मी, केवळ मीच आहे; तू मर्त्य मनुष्याला, तृणवत मानवपुत्राला भितेस अशी तू कोण? परमेश्वर तुझा कर्ता, ह्याला तू का विसरलीस?” (यशया 51:12-13).

मनुष्याचे भय गर्वासारखे वाटत नसेल, पण देव म्हणतो कीं ते आहे, “तू  मनुष्याला, मानवपुत्राला भितेस अशी तू कोण! परमेश्वर तुझा कर्ता, ह्याला तू का विसरलीस?”

मुद्दा हा आहे : जर तुम्हीं मनुष्याचे भय धरता, तर तुम्हीं देवाच्या आणि त्याचा पुत्र, येशू याच्या पवित्रतेचा, त्याच्या मूल्याचा नाकार करणें सुरू केलें आहे. देव मनुष्यापेक्षा अतिशय बलवान आहे. तो अत्यंत बुद्धीमान आणि प्रतिफळ आणि आनंद यांनी अमर्यादपणें परिपूर्ण आहे.

मनुष्य काय करूं शकतो या भीतीनें त्याजकडें पाठमोरे होण्याचा अर्थ देव जे त्याचे भय बाळगतात त्यांच्यासाठीं जे अभिवचन देतो ते सर्व फेटाळून लावणें होय. हा मोठा अपमान आहे. आणि अशा अपमानामुळें देव प्रसन्न होऊ शकत नाहीं.

दुसरीकडें, जेव्हां आपण देवाची अभिवचनें ऐकतो आणि आमच्यां अविश्वासामुळें देवाची निंदा होईल या भीतीनें त्याच्यावर धैर्यानें विश्वास ठेवतो, तेव्हां त्याला खूप आदर मिळतो. आणि त्यात त्याला खूप खूप आनंद होतो.

18 जून : स्वयं के प्रति सही दृष्टिकोण रखना

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18 जून : स्वयं के प्रति सही दृष्टिकोण रखना
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“क्योंकि मैं उस अनुग्रह के कारण जो मुझ को मिला है, तुम में से हर एक से कहता हूँ कि जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर जैसा परमेश्‍वर ने हर एक को विश्‍वास परिमाण के अनुसार बाँट दिया है, वैसा ही सुबुद्धि के साथ अपने को समझे।” रोमियों 12:3

कोई भी व्यक्ति आत्म-प्रशंसा के पाप से बचा हुआ नहीं है। इसके प्रमाण के लिए बस किसी भी किंडरगार्टन क्लासरूम में चले जाइए। इस छोटे से समूह में, जल्दी ही कोई न कोई अपने सबसे ऊँचे ब्लॉक टावर बनाने या सबसे बेहतरीन पारिवारिक चित्र बनाने की बातें करने लगेगा—दूसरे शब्दों में, अपने आप को उससे अधिक समझना जितना वह वास्तव में है।

हमेशा दूसरों से अपनी तुलना करना एक सांसारिक सोच का तरीका है। अपने आप का अतिरंजित मूल्यांकन एक भयंकर समस्या है—यह दूसरों को नीचा दिखाता है और परमेश्वर के सामने हमारे स्थान को नजरअंदाज करता है। हालाँकि इसका उत्तर आत्म-अपमान में नहीं है, जो आत्म-प्रशंसा के विपरीत है और उसी के समान गलत भी है। यह आत्म-हीनता भी अहंकार का ही उत्पाद है, क्योंकि यह तुलना से उत्पन्न होती है। यह भी आत्म-केन्द्रित ही होती है।

मसीही लोगों का आत्म का दृष्टिकोण परमेश्वर द्वारा नवीनीकरण किए गए मन में आधारित होना चाहिए (रोमियों 12:2)। इस दृष्टिकोण के साथ, हम अपने मूल्य और पहचान को परमेश्वर की कृपा और अनुग्रह में पाते हैं। हमारा महत्त्व, पहचान, मूल्य, और भूमिका इस पर आधारित होते हैं कि परमेश्वर कौन है और उसने हमारे लिए क्या किया है, न कि इस पर कि हम कौन हैं या हमने उसके लिए क्या किया है।

हम इस सही दृष्टिकोण को उस समय याद करते हैं, जब हम इस गीत की ये पंक्तियाँ गाते हैं, “जब मैं अद्‌भुत क्रूस को देखता हूँ, जिस पर महिमा का राजकुमार मरा।”[1] क्रूस को देखने का अर्थ सुसमाचार पर ध्यान केन्द्रित करना है—इस सत्य पर कि कोई और हमारे स्थान पर मरा और हमारे दण्ड को सहा। ऐसा करते हुए हम समझ जाते हैं कि “मेरे सबसे बड़े लाभ को मैं हानि मानता हूँ, और अपने सारे घमण्ड का तिरस्कार करता हूँ।” क्रूस हमें एक साथ ऊँचा और नीचा करता है, और यह हमें जीवन में आगे बढ़ने के प्रयास करने की जरूरत से मुक्त करता है और हमें यह पहचानने में सक्षम बनाता है कि परमेश्वर ने हमें किस प्रकार के वरदान दिए हैं। हम “सुबुद्धि के साथ” अपना आत्म-मूल्यांकन करें।

इसलिए कलीसिया का दृष्टिकोण संसार से स्पष्ट रूप से अलग होना चाहिए कि हम अपने आप को और एक-दूसरे को कैसे देखते हैं। जब हम सुसमाचार से एकजुट होकर एक साथ आते हैं, तो हमारे अस्तित्व से सम्बन्धित बाकी सब कुछ, हालाँकि वह अप्रासंगिक नहीं है, अपने प्राथमिक महत्त्व को खो देता है, और हम अपने वरदानों का उपयोग अपनी प्रशंसा के लिए नहीं बल्कि दूसरों की सेवा के लिए करते हैं।

क्रूस को देखिए, जहाँ आपका उद्धारक आपके पापों के लिए लहूलुहान हुआ और मरा, क्योंकि वह आपसे प्रेम करता है। आपके पास गर्व करने के लिए कोई स्थान नहीं है। दूसरों से अपनी तुलना करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, जो कुछ उसने आपको दिया है, उसका उपयोग आप दूसरों की निस्वार्थ, आनन्दमयी सेवा में कर सकते हैं।

  1 कुरिन्थियों 4:1-7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 34–36; मत्ती 26:47-75


[1] आइसक वॉट्स, “वैन आई सर्वे द वण्ड्रस क्रॉस” (1707).

18 June : विश्वास न ठेवणाऱ्या लोकांसाठीं विनंती कशी करावी?

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18 June : विश्वास न ठेवणाऱ्या लोकांसाठीं विनंती कशी करावी?
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बंधुजनहो, त्यांच्याविषयीं माझी मनीषा व देवाजवळ विनंती अशी आहे कीं, त्यांचे तारण व्हावे. (रोम 10:1)

पौल प्रार्थना करतो कीं देवानें इस्राएलाचे तारण करावे. तो त्यांच्या तारणासाठीं प्रार्थना करतो. तो अशी प्रार्थना करीत नाहीं जिचा प्रभावीपणा परिणामशून्य आहे, तर तो अशी प्रार्थना करतो जी प्रभावशाली आहे. आणि आम्हीं देखील अशीच प्रार्थना केली पाहिजे.

आपण देवाच्या नवीन कराराची अभिवचनें घेऊन देवाजवळ विनवणी केली पाहिजे कीं त्यानें ती विनंती आमच्यां मुलांमध्यें आणि आमच्यां शेजार्ंयामध्यें आणि जगाच्या सर्व मिशन क्षेत्रांत पूर्ण करावी.

  • परमेश्वरा, त्यांच्या शरीरातून पाषाणहृदय काढून त्यांस मांसाचे नवीन हृदय दे. (यहेज्केल 11:19)
  • त्यांच्या हृदयाची सुंता कर यासाठीं कीं त्यांनी तुजवर प्रीती करावी! (अनुवाद 30:6).
  • पित्या, त्यांच्याठायी तुझा आत्मा घाल आणि तुझ्या नियमांत त्यांस चालव. (यहेज्केल 36:27)  
  • त्यांस पश्चाताप आणि सत्याचे ज्ञान दे यासाठीं कीं त्यांनी सैतानाच्या पाशातून सुटावे (2 तीमथ्य 2:25-26)
  • त्यांची अंतःकरणें उघड यासाठीं कीं त्यांनी सुवार्तेवर विश्वास करावा! (प्रेषितांची कृत्ये 16:14)

जेव्हां आपण देवाच्या सर्वाभौमत्वावर विश्वास ठेवू – कठोर पातकीं लोकांस निवडण्याच्या आणि मग त्यांना विश्वास आणि तारणाप्रत आणण्याच्या देवाच्या अधिकारावर आणि सामर्थ्यावर विश्वास ठेवू – तेव्हां आपण विसंगतीवाचून, आणि हरविलेंल्यांच्या परिवर्तनासाठीं पवित्र शास्त्रातील थोर अभिवचनांच्या खात्रीनें  प्रार्थना करण्यात समर्थ होऊ.

अशाप्रकारे, देवाला या प्रकारच्या प्रार्थनेंत प्रसन्नता वाटते कारण त्याद्वारें त्याला स्वतंत्र आणि सार्वभौम परमेश्वर म्हणून, जो तो तारण आणि निवडीबाबत आहे, अधिकार व आदर प्राप्त होतो.

17 जून : नया मन

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17 जून : नया मन
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“इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल–चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्‍वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।” रोमियों 12:2

एयरपोर्ट कण्ट्रोल टावर एक आकर्षक जगह होती हैं। इतनी छोटी सी जगह में इतनी बड़ी क्षमता और शक्ति समाहित होती है। इन टावरों से दिए गए निर्देशों से गड़बड़ी रोकी जाती है और सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है। यदि इन टावरों में कुछ गलत होता है, तो इसका असर उनकी दीवारों के बाहर महसूस होता है और यह अक्सर बड़ी मुश्किल का कारण बनता है।

इसी तरह, हम यह कह सकते हैं कि हमारे मन हमारे शरीरों के कण्ट्रोल टावर होते हैं। हम जो कुछ भी अपने शरीर के साथ करते हैं, वह सीधे तौर पर हमारे मन में हो रही गतिविधियों से जुड़ा होता है। हमारे मन में हम सम्भावनाओं पर विचार करने, निर्णय लेने, अपनी भावनाओं का मूल्यांकन करने, और अपनी रुचियों को आकार देने की क्षमता रखते हैं। इसलिए यह कोई अचम्भे की बात नहीं है जब पौलुस कहता है कि परमेश्वर की दया के प्रत्युत्तर में “अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्‍वर को भावता हुआ बलिदान करके” (रोमियों 12:1) अर्पित करने में हमारा मन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

एक मसीही होने का अर्थ है एक ऐसी मानसिकता अपनाना जो पूरी तरह से बदली हुई हो, जो शुद्ध विचारों और पवित्र आचरण में भरी होती है, जो मसीह के बिना जीवन में नहीं देखी जाती। जैसे पौलुस रोमियों की पत्री में पहले लिखता है, “शारीरिक व्यक्ति शरीर की बातों पर मन लगाते हैं; परन्तु आध्यात्मिक आत्मा की बातों पर मन लगाते हैं” (रोमियों 8:5)। दृष्टिकोण में यह बदलाव पवित्र आत्मा की शक्ति से आता है, क्योंकि वह हमें परमेश्वर के वचन के सत्य में निर्देशित करता है।

यह परिवर्तन एक प्रक्रिया है। प्रत्येक दिन हम यीशु मसीह के स्वरूप में ढल रहे हैं। हमारे मन—वास्तव में हमारा पूरा जीवन—नया हो रहा है। हम अभी न तो पूरी तरह से वह हैं जो हमें होना चाहिए, और न ही वह जो हम बनने वाले हैं—लेकिन हम अब वह नहीं हैं जो हम पहले थे। और जब हमारे मन परमेश्वर के आत्मा और परमेश्वर के वचन के अधिकार में होते हैं, तो बाकी सब कुछ वैसे ही होता है जैसे वह चाहता है। हम जान जाते हैं कि परमेश्वर का तरीका सर्वोत्तम है और हम खुशी से उसमें चलने के लिए तैयार रहते हैं। हम हर कदम उठाने से पहले सोचते हैं। हम इस संसार के रूप के आकार में ढलने से इनकार करते हैं, यह सीखते हुए कि किस प्रकार हमें ऐसी एक मानसिकता बेची जा रही है जो परमेश्वर के वचन के सत्य पर नहीं, बल्कि झूठ पर आधारित है।

इसलिए विश्वास रखें कि परमेश्वर के वचन की शक्ति आपके मन को नया बनाएगी और पवित्र आत्मा से कहें कि वह इसे आपके भीतर पूरा करे। देखें कि कैसे संसार आपको अपने में ढलने के लिए बुला रहा है, और इन अवसरों को देखें कि कैसे आप अपने मन को ईश्वरीय ज्ञान से रूपान्तरित कर सकते हैं। और ऐसा इसलिए न करें क्योंकि आपको करना ही पड़ेगा, बल्कि इसलिए करें क्योंकि यह आपका आनन्द है, क्योंकि आप जानते हैं कि “धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाए, और वह मनुष्य जो समझ प्राप्त करे, क्योंकि बुद्धि की प्राप्ति चाँदी की प्राप्ति से बड़ी, और उसका लाभ चोखे सोने के लाभ से भी उत्तम है . . . उसके मार्ग आनन्ददायक हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं” (नीतिवचन 3:13-14, 17)।

नीतिवचन 3:1-18 पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 32–33; मत्ती 26:26-46 ◊

17 June : देवाला कशाप्रकारची प्रार्थना प्रसन्न करते

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17 June : देवाला कशाप्रकारची प्रार्थना प्रसन्न करते
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“पण जो दीन व भग्नहृदय आहे व माझी वचनें ऐकून कंपायमान होतो, त्याच्याकडें मी पाहतो.” (यशया 66:2)

दीन व भग्न अंत:करणाची प्रथम ओळख ही आहे कीं ते देवाचे वचन ऐकून कंपायमान होते.

यशया 66 अशा कांही लोकांना संबोधून आहे ज्यांपैकीं काहीं अशाप्रकारे उपासना करतात जी देवाला प्रसन्न करते, आणि काहीं जे अशाप्रकारे उपासना करतात ज्यानें तो प्रसन्न होत नाहीं. तिसरे वचन अशा दुष्ट मनुष्याचे वर्णन करते जो असें अर्पण घेऊन येतो : “जो बैल कापतो तो मनुष्यवध करणारा होय.” त्यांच्या यज्ञार्पणांचा देवाला तिटकारा आहे – जे मनुष्यवधासमान आहेत. का?

चौथ्या वचनात देव स्पष्ट करतो, “कारण मी हाक मारली तेव्हां कोणी उत्तर दिलें नाहीं, मी बोललो तेव्हां त्यांनी माझें ऐकलें नाहीं.” त्यांच्या यज्ञार्पणांचा देवाला तिटकारा होता कारण त्या लोकांनी त्याच्या वाणीकडें दुर्लक्ष केलें. पण त्या लोकांचे काय ज्यांच्या प्रार्थना देवानें ऐकल्या? देव दुसऱ्या वचनात असें म्हणतो, “पण जो दीन व भग्नहृदय आहे व माझी वचनें ऐकून कंपायमान होतो, त्याच्याकडें मी पाहतो.”

या वचनावरून मी असा निष्कर्ष काढतो कीं सरळ अंत:करण असलेंल्या मनुष्याची, ज्याच्या प्रार्थना देवाला प्रसन्न करणार्या असतांत, प्रथम ओळख ही आहे कीं तो वचन ऐकून कंपायमान होतो. हेंच ते लोग आहेत ज्यांच्याकडें परमेश्वर पाहतो.

म्हणून, सरळ मनुष्याची प्रार्थना जी देवाला प्रसन्न करते ती अशा अंतःकरणातून येते जे सर्वप्रथम परमेश्वराच्या सान्निध्यात कंपायमान होते. देवाचे वचन ऐकून ते कंपायमान होते, कारण त्याला देवाच्या आदर्शापासून दूर असल्यासारखे आणि त्याच्या निर्णयापुढे अत्यंत दुर्बळ असल्यासारखे आणि अतिशय लाचार असल्यासारखे वाटते आणि आपण अपयशी आहोत याची त्याला खंत जाणवते.

दावीदानें स्तोत्र 51:17 मध्यें अगदी हेच म्हटलें, “देवाचे यज्ञ म्हणजें भग्न आत्मा; हे देवा, भग्न व अनुतप्त हृदय तू तुच्छ मानणार नाहींस.” पहिली गोष्ट जिच्यामुळें प्रार्थना देवाला स्वीकारणीय होते ती म्हणजें प्रार्थना करणाऱ्या व्यक्तीचे भग्नहृदय आणि नम्रता. तो त्याचे वचन ऐकून कंपायमान होतो.

16 जून : प्रतिबद्धता के लिए बुलावा

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16 जून : प्रतिबद्धता के लिए बुलावा
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“इसलिए हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्‍वर की दया स्मरण दिला कर विनती करता हूँ कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्‍वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ। यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।” रोमियों 12:1

जब सैलवेशन आर्मी मिशन के संस्थापक विलियम बूथ से उनके जीवन के प्रभाव को समझाने के लिए पूछा गया, तो उन्होंने एक प्रभावशाली वाक्य में उत्तर दिया: “यीशु मसीह ने मुझ पर पूरा अधिकार कर लिया है।”

इस उत्तर में कोई घमण्ड या अहंकार नहीं था। यह तो केवल वह एकमात्र तरीका था, जिससे बूथ यह समझा सकते थे कि वह एक सामान्य व्यक्ति थे, जिनके पास सीमित संसाधन थे, लेकिन फिर भी कैसे वह असाधारण तरीके से कैसे इस्तेमाल हुए और उस विशेष समय में उनका प्रभाव इतना अधिक क्यों था।

इसका क्या अर्थ है कि यीशु मसीह ने आप पर पूरा अधिकार कर लिया है?

रोमियों की पुस्तक के पहले ग्यारह अध्यायों में परमेश्वर द्वारा क्रूस पर पूर्ण की विजय के माध्यम से आई पाप से मुक्ति की खुशी मनाने के बाद रोमियों 12 के आरम्भ में पौलुस यीशु मसीह पर विश्वास करने वाले सभी लोगों को बुलावा देता है कि वे अपने शरीर, मन और आत्मा को पूरी तरह से प्रभु यीशु मसीह को समर्पित कर दें। यहाँ पर “विनती” के लिए उसने जिस शब्द का इस्तेमाल किया है, वह यूनानी के शब्द लॉजिकोस से आया है, जिससे हमें “तर्कसंगत” शब्द मिलता है। दूसरे शब्दों में, उसका यह प्रोत्साहन भावनाओं या छल पर आधारित नहीं है। बल्कि पौलुस अपने पाठकों से एक तर्कपूर्ण और तीव्र अपील कर रहा है, जो केवल परमेश्वर की कृपा की शक्ति पर आधारित है।

हमारी मानवता का कोई भी आयाम ऐसा नहीं है, जो परमेश्वर के प्रति हमारे विद्रोह से प्रभावित न हुआ हो। फिर भी, अपनी कृपा के कारण परमेश्वर अपने लोगों के पाप उनके खिलाफ नहीं गिनता और उसने हमें उस दण्ड से बचा लिया है, जो हमें मिलना चाहिए था। इसके बजाय, उसने हमारे पापों को अपने प्रिय पुत्र पर डाल दिया।

यदि हम इस विनती में से “परमेश्वर की दया” वाले हिस्से को नजरअंदाज करते हैं, तो हम तुरन्त गलत दिशा में चल पड़ते हैं। यह उन विनती उन लोगों से की गई है, जिन्होंने परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त किया है, ताकि वे अपने जीवन को पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित करें—इसलिए नहीं कि वे स्वीकार किए जाएँ, बल्कि इसलिए कि वे स्वीकार किए जा चुके हैं। यह विनती उन लोगों के लिए है, जो अनुग्रह के द्वारा मुक्त हो चुके हैं, ताकि वे वह सब बन सकें जो परमेश्वर उनके लिए चाहता है और पूरी तरह से उसे समर्पित हो सकें।

परमेश्वर हमसे हमारी सम्पत्ति या धन देने के लिए नहीं कहता। वह हमसे इससे भी अधिक की मांग करता है: हमारे अपने आप को। जो हम हैं, जो हम सोचते हैं, जो हम महसूस करते हैं, जो हम काम करते हैं, और जो हम जानते हैं—इसे उस परमेश्वर के लिए अर्पित करना जो हमारे लिए अपना पुत्र दे चुका है, यह उसकी कृपा का एकमात्र तर्कसंगत प्रत्युत्तर है। जब हम अपने आप को पूरी तरह से परमेश्वर को सौंपते हैं, तो हमारी सभी क्षमताएँ, फिर चाहे वे जितनी भी सीमित क्यों न हों, उसकी महिमा और उद्देश्यों के लिए उपयोग की जा सकती हैं। मसीही जीवन में कोई आधे-अधूरे उपाय या पीछे हटने का विकल्प नहीं है। यह एक पूरी तरह से समर्पित जीवन है।

इससे बढ़कर शानदार प्रतिबद्धता और कोई नहीं हो सकती, जो कहती है, “मैं पूरी तरह से समर्पित हूँ।” यदि आप पूरी तरह से समर्पित हो जाते हैं, तो जो कुछ भी आप में और आपके माध्यम से होगा, उसकी कोई सीमा नहीं होगी। क्या आप वह व्यक्ति होंगे जो कह सकता है, “यीशु मसीह ने मुझ पर पूरा अधिकार कर लिया है?”

फिलिप्पियों 1:19-30

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 30–31; मत्ती 26:1-25

16  June : तहानलेल्यां अंत:करणानें देवाची सेवा करा

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16  June : तहानलेल्यां अंत:करणानें देवाची सेवा करा
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म्हणून आम्हीं गृहवासी असलो किंवा दूर आलेलें असलो, तरी त्याला संतुष्ट करण्याची आम्हांला हौस आहे. (2 करिंथ 5:9)

काय होईल जर तुम्हांला असें आढळून आलें (जसे परूश्यांना आढळलें) कीं तुम्हीं तुमचे संपूर्ण जीवन देवाला प्रसन्न करण्यात  घालविलें होते, पण त्याचवेळी तुम्हीं अशा गोष्टी सुद्धा करत होता ज्या देवाच्या दृष्टीत किळसवाण्या आहेत (लूक 16:14-15)?

कोणी यावर आक्षेप घेऊन असें म्हणू शकतो, “मला नाहीं वाटत कीं हे शक्य आहे; जो मनुष्य आयुष्यभर देवाला प्रसन्न करण्याचा प्रयत्न करित होता तो त्या व्यक्तीचा अव्हेर करणार नाहीं.” पण असा आक्षेप घेणाऱ्या व्यक्तीनें काय केलें आहे ते तुम्हीं पाहता का? देवाला काय प्रसन्न करेल या विषयींची त्याची खात्री देव कसा असावा या त्याच्या कल्पनेंवर आधारित आहे. अगदी याच कारणास्तव आपण सर्वप्रथम पवित्र शास्त्रात प्रगट झालेलें देवाचे चरित्र समजून घेतलें पाहिजें.

देव पर्वतावरील झरा आहे, पाण्याचे द्रोण नाहीं. पर्वतवरील झरा स्वतः भरणारा असतो. तो सतत ओसंडून वाहतो आणि इतरांस पाणी पुरवितो. पण पाण्याचे द्रोण एकतर पंपानें भरावे लागते किंवा बादलीनें भरावे लागते. म्हणून, मोठा प्रश्न हा आहे: तुम्हीं झऱ्याची सेवा कशी करता? आणि: तुम्हीं पाण्याच्या द्रोणाची सेवा कशी करता? देवानें स्वत:ला जसें वास्तविकपणें प्रकट केलें आहे त्या ज्ञानाला शोभेल तसे तुम्हीं त्याचे गौरव कसे कराल?

जर तुम्हांला पाण्याच्या द्रोणाच्या मोलाचे गौरव करायचे असेल, तर तुम्हीं ते परिपूर्ण आणि उपयोगी ठेवण्यासाठीं कठोर परिश्रम करता. पण जर तुम्हांला एखाद्या झऱ्याच्या मोलाचे गौरव करायचे असेल, तर तुम्हीं ते करण्यासाठीं हात टेकून आणि गुडघे टेकून आपल्यां मनाचे समाधान होईपर्यंत त्यांतून पिता, जोपर्यंत तुम्हांला ताजेतवानें वाटत नाहीं आणि परत खोर्यात जाऊन लोकांना हे सांगत नाहीं कीं तुम्हांला काय आढळलें आहे.

एक नाऊमेद पापी म्हणून माझी आशा पवित्र शास्त्रातील या सत्यावर टिकलेंली आहे : कीं परमेश्वर असा परमेश्वर आहे जो मी देऊ करायच्या असलेंल्या एका गोष्टीनें प्रसन्न होईल : माझी तहान. म्हणूनच देवाचे सार्वभौम स्वातंत्र्य आणि त्याचे स्वतःमध्यें परिपूर्ण असणें या गोष्टीं माझ्यासाठीं खूप मूल्यवान आहेत: ते माझ्या आशेचा आधार आहेत कीं देव बादली ब्रिगेडच्या साधनसंपत्तीनें नव्हे तर जेव्हां भग्नहृदयी पातकीं कृपेच्या झऱ्याजवळ पिण्यासाठीं खाली वाकतो, तेव्हां प्रसन्न होतो.

आम्हीं सर्व प्रकारे परमेश्वराला प्रसन्न करण्याचा प्रयत्न केला पाहिजे, आज आणि सर्वकाळ. पण आपलें संपूर्ण जीवन देवाला कोणती गोष्ट प्रसन्न करते या विषयींच्या चुकींच्या दृष्टिकोनावर आधारित असल्याचे सिद्ध होत असेल तर आम्हास धिक्कार असो. परमेश्वर त्या लोकांवर प्रसन्न होत नाहीं जे त्याच्याशी गरजू पाण्याचे द्रोण म्हणून वर्तन करतांत, तर एक तो त्यांच्यावर प्रसन्न होतो जें त्याच्याकडें अक्षय, सर्वप्रकारे संतुष्ट करणारा झरा म्हणून त्याच्याशी वर्तन करतांत. स्तोत्र 147:11 म्हणते, “जे परमेश्वराचे भय धरतात, जे त्याच्या दयेची प्रतीक्षा करतात त्यांच्यावर तो संतुष्ट होतो.”

15 जून : मनुष्य का नगर

Alethia4India
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15 जून : मनुष्य का नगर
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“हे मेरे लोगो, उस में से निकल आओ कि तुम उसके पापों में भागी न हो, और उसकी विपत्तियों में से कोई तुम पर आ न पड़े। क्योंकि उसके पापों का ढेर स्वर्ग तक पहुँच गया है, और उसके अधर्म परमेश्‍वर को स्मरण आए हैं।” प्रकाशितवाक्य 18:4-5

हमें आश्चर्यचकित या चिन्तित नहीं होना चाहिए जब विश्वासियों को लगातार विरोध का सामना करना पड़ता है। मनुष्यजाति का स्वाभाविक रुख परमेश्वर के प्रति गर्वपूर्ण विरोध होता है और इसी कारण उसके लोगों का विरोध भी होता है। मनुष्य अपने गर्व की अस्थिर नींव पर “एक शहर बनाता है” (प्रकाशितवाक्य की चित्रात्मक भाषा का उपयोग करते हुए) और एक ऐसी जीवनशैली बनाता है, जो परमेश्वर के मार्गों के खिलाफ होती है। मनुष्यजाति यह काम पतन के समय से ही करती आ रही है। पहली परमेश्वर-विरोधी निर्माण परियोजना शिनार के मैदान में हुई थी, जिसे बेबीलोन कहा गया है (उत्पत्ति 11:1-9)—यह वही बेबीलोन है, जहाँ आगे चलकर परमेश्वर के लोग निर्वासित हुए थे।

इसलिए प्रकाशितवाक्य 18 में मनुष्य के शहर को, जो परमेश्वर के खिलाफ बना हुआ है, बेबीलोन कहा गया है; और फिर बेबीलोन को एक वेश्या के रूप में व्यक्त किया गया है, जो लोगों को आत्मिक व्यभिचार के लिए ललचाती है। मोहक और आकर्षक, मनुष्य का शहर लोगों को परमेश्वर से दूर करने में प्रभावी है। यह “वह बड़ा नगर है जो पृथ्वी के राजाओं पर राज्य करता है” (17:18), और इसका प्रभाव महत्त्वपूर्ण और विनाशकारी है।

तो फिर, परमेश्वर के शहर के नागरिकों को इस सांसारिक प्रतिस्पर्धी को कैसे प्रत्युत्तर देना चाहिए? हमें इस संसार में रहना है, लेकिन इस संसार का नहीं होना है। दूसरे शब्दों में, हमें नमक होना है, जिसमें एक विशिष्ट स्वाद और संरक्षित करने की क्षमता होती है; और हमें प्रकाश होना है, जो अंधकार में छिपी हरेक वस्तु को उजागर करता है, लेकिन जो दूसरों का सुरक्षा की ओर मार्गदर्शन भी करता है (मत्ती 5:13-16)।

हमें इस तनाव में जीना है कि हम इस संसार के सदस्य हैं लेकिन यहाँ के नहीं हैं: यहाँ रहते हुए भी हमें उनसे अलग रहना है जिनके दिल और दिमाग परमेश्वर के खिलाफ हैं। मनुष्य के शहर के पाप विश्वासियों के जीवन का हिस्सा नहीं बनने चाहिएँ, जैसा कि यूहन्ना ने कहा, कहीं ऐसा न हो कि “उसकी विपत्तियों में से कोई तुम पर आ पड़े।” यदि हम बेबीलोन के मोह में फंसते हैं, तो हम यह सिद्ध करते हैं कि हमारी पहचान कभी भी परमेश्वर के राज्य के नागरिक की थी ही नहीं।

जो मसीह का अनुसरण करते हैं, उन्हें बाइबल के सत्य के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए। मसीहत केवल नैतिक नियमों से कहीं अधिक है। यह जीवन जीने के ढांचे या किसी के जीवन को सुधारने के तरीका से कहीं अधिक है। उसमें क्रूस कहाँ है? मसीहत अन्य सभी धर्मों से अलग है, क्योंकि हम यीशु की क्रूस पर मृत्यु को अपने परमेश्वर से मेल-मिलाप का साधन मानते हैं। हम अपने पापों में मरे हुए थे, परमेश्वर के क्रोध और न्याय के पात्र थे—लेकिन उसने हमें मसीह के पूर्ण जीवन, बलिदानी मृत्यु और विजयी पुनरुत्थान के द्वारा मुक्ति दी।

अभी के लिए, संसार वैसे ही चल रहा है, जैसे पहले चलता था। लेकिन एक दिन मसीह लौटेगा और हर झूठे भविष्यवक्ता, बेबीलोन के हर नागरिक, और यहाँ तक कि शैतान को भी शान्त कर देगा। हम देख सकते हैं कि कलीसिया दबाव में है, इसका मजाक उड़ाया जाता है, इसके खिलाफ कानून बनाए जाते हैं और इसे उत्पीड़ित किया जाता है। संसार इसे कमजोर समझेगा, इतिहास के गलत छोर पर और सम्मान या स्वीकृति के योग्य नहीं मानेगा। लेकिन हम इस विजयी घोषणा में आशा रखते हैं: न तो बेबीलोन के द्वार और न ही नरक के द्वार इस पर प्रबल होंगे, क्योंकि मसीह अपनी कलीसिया को बनाएगा और इसे सुरक्षित रखेगा (मत्ती 16:18)।

इसलिए अभी के लिए जब आप बेबीलोन में रहते हैं, तो इसके पापों में से कौन से पाप आपको सबसे आकर्षक लगते हैं? आप किस प्रकार इस तरह का जीवन जीने के लिए सबसे अधिक प्रलोभित होते हैं कि यह शहर ही सब कुछ है? और आपको अपने आस-पास के लोगों के लिए नमक और प्रकाश बनने के लिए कौन से अवसर मिले हैं? सुनिश्चित करें कि आप मनुष्य के शहर का विरोध करें और दूसरों को परमेश्वर के शहर में आमन्त्रित करें।

प्रकाशितवाक्य 18:1 – 19:10

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यिर्मयाह 27–29; मत्ती 25:31-46 ◊