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28 अगस्त : पश्चाताप की यात्रा

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28 अगस्त : पश्चाताप की यात्रा
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“मैं ये बातें तुम्हें इसलिए लिखता हूँ कि तुम पाप न करो; और यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् धर्मी यीशु मसीह।” 1 यूहन्ना 2:1

मसीही विश्वास क्षमा के सन्देश पर आधारित है। अन्य धर्म नैतिकता सिखा सकते हैं, वे हमें ऐसी विधियाँ दे सकते हैं जो हमारे जीवन को व्यवस्थित करने या हमें एक अच्छा इंसान महसूस कराने में मदद करें। परन्तु मसीही विश्वास उन लोगों के लिए है जो अयोग्य, खोए हुए, संघर्षरत और पापी हैं। यह उन लोगों के लिए है, जिन्हें यह सुनने की आवश्यकता है कि वे क्षमा प्राप्त कर सकते हैं। अर्थात, यह सभी के लिए है।

सुसमाचार का केन्द्र-बिन्दु यह नहीं है कि हमें क्या करना चाहिए, बल्कि यह कि परमेश्वर ने हमारे लिए क्या किया है। परमेश्वर की दया ही है जो हममें क्षमा पाने की इच्छा उत्पन्न करती है—और केवल जब हम यीशु में विश्वास रखते हैं, तभी हमें पूर्ण रूप से क्षमा प्राप्त होती है। जब हम पश्चाताप और विश्वास के साथ उसकी ओर मुड़ते हैं, तब हम पीछे मुड़कर यह कह सकते हैं कि हम पाप के दण्ड से बचा लिए गए हैं। जो कुछ हमारे विरुद्ध था, जो कुछ हमें परमेश्वर को जानने और उसकी प्रेम और भलाई को अनुभव करने से रोक रहा था—वह सारा दण्ड जो हमें मिलना चाहिए था—वह सब प्रभु यीशु मसीह के क्रूस पर किए गए उद्धारक कार्य के द्वारा मिटा दिया गया है।

विश्वासी होने के नाते हम आनन्दित हो सकते हैं—और होना भी चाहिए—कि अब पाप हम पर शासन नहीं करता। फिर भी, वास्तविकता यह है कि इस सांसारिक जीवन में हम अभी भी पाप करते हैं। हम अभी भी परमेश्वर के मापदण्ड तक पहुँचने में असफल होते हैं। और जब ऐसा होता है, तो शत्रु हमारे कानों में फुसफुसाता है, “क्या तू वास्तव में उद्धार पाया है? क्या परमेश्वर तुझे इस बार भी क्षमा करेगा?” इस पर हमारा उत्तर होना चाहिए, “हाँ, मैं उद्धार पाया हुआ हूँ; और हाँ, वह मुझे क्षमा करेगा, क्योंकि जिसने मेरे लिए प्राण दिए, वह इस समय भी मेरे लिए परमेश्वर के सामने वकालत कर रहा है।”

परमेश्वर से क्षमा पाना हमें पाप करने की स्वतन्त्रता नहीं देता। वास्तव में, प्रेरित यूहन्ना ने लिखा कि “तुम पाप न करो” (1 यूहन्ना 2:1)। जब हम पाप करते हैं, तो परमेश्वर में जो आनन्द हमने पाया है, वह धुंधला पड़ने लगता है। वह हमारा स्वर्गिक पिता बना रहता है, परन्तु यदि हम अपने हृदय में पाप को स्थान देते हैं, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी कि हम उन आशिषों का पूरा आनन्द नहीं उठा सकेंगे जो वह हमारे लिए रखना चाहता है।

इसलिए, हम अपने प्रभु की आज्ञाओं का पालन करने का प्रयास करते हैं, परन्तु चूंकि हम इसे पूरी तरह नहीं कर सकते, इसलिए हमें अपने प्रभु के सामने निरन्तर पश्चाताप करते रहना भी आवश्यक है। यीशु ने यूहन्ना 13 में दैनिक पश्चाताप की आवश्यकता और महत्त्व को उजागर किया, जब वह अपने शिष्यों के पैर धोने वाला था और पतरस ने कहा, “तू मेरे पाँव कभी न धोने पाएगा!” इसके जवाब में यीशु ने कहा, “यदि मैं तुझे न धोऊँ, तो मेरे साथ तेरा कुछ भी साझा नहीं” (यूहन्ना 13:8)। जब तक यीशु हमें नहीं धोता, तब तक हमें क्षमा नहीं मिलती—और उसके बाद भी, वह प्रतिदिन हमारे पश्चाताप और विश्वास के द्वारा हमें शुद्ध करता रहता है।

एक दिन जब हम स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, तो पाप की उपस्थिति से भी मुक्त कर दिए जाएँगे। परन्तु उस महान दिन तक हमारा मसीही जीवन एक पश्चाताप की यात्रा बना रहेगा। आप उद्धार पा चुके हैं। आप उद्धार पाएँगे। लेकिन अभी, इसी क्षण, परमेश्वर की करुणा से प्रतिदिन पश्चाताप करते हुए और यीशु की ओर लौटते हुए आप उद्धार पा रहे हैं।

रोमियों 7:7 – 8:2

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 123–125; 2 कुरिन्थियों 7 ◊

28 August : येशूच्या नावामुळेंमाझ्या दुष्टाईची क्षमा झालीं

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28 August : येशूच्या नावामुळेंमाझ्या दुष्टाईची क्षमा झालीं
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हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर; कारण ती फार झाली आहे. (स्तोत्र 25:11)

न्याय्य काय आहे हे जाणून घेण्यासाठीं, देव स्वतःहून ऊंच अशा कोणत्याही अधिकाराशी मसलत करत नाहीं. त्याचा आपला अधिकारच या विश्वातील अंतिम अधिकार आहे. म्हणून, देवासाठीं जे योग्य आहे ते करणें म्हणजें त्याच्या या अंतिम अधिकाराशी जे सुसंगत आहे तेच करणें.

देवाला ज्यांविषयी अमर्याद आवेश आहे आणि जी त्याला परम आनंद आणि प्रसन्नता देणारी आहे ती एक अति मोलवान गोष्ट म्हणजें त्याचे स्वतःचे नीतिमत्व, जो त्याची स्वतःची परिपूर्णता व त्याचा सन्मान आहे. आणि आपल्या परिपूर्णतेसाठीं त्याला असलेल्या या अमर्याद  आवेशाच्या विरुद्ध जर तो कधी गेला तर तो अनीतिमान ठरेल – तो एक मूर्तिपूजक ठरेल.  

असा नीतिमान देव आपल्यासारख्या देव-निंदक अशा पापी लोकांवर कशी प्रीति करू शकतो? परंतु सुवार्तेच्या बाबतींत थक्क करून टाकणारी गोष्ट म्हणजें हीच आहे कीं जे तारण तो आम्हांला देऊ करतो त्याचा पाया त्याचे स्वतःचे दिव्य नीतिमत्त्व आहे.

पित्याला आपल्या प्रिय पुत्राबद्दल असलेला अमर्याद आदर तोच माझ्यासारख्या एका दुष्ट पाप्यावर त्यां पुत्रामध्यें अशी प्रीति करणें व माझा स्वीकार करणें हे त्याच्यासाठीं शक्य करतो, कारण त्यानें आपल्या मरणाने आपल्या पित्याचा अधिकार आणि गौरव प्रमाणित केला आहे.

ख्रिस्तानें जें केलें त्यामुळें, आपण स्तोत्रकर्त्याच्या प्रार्थनेला नाविन्याने समजून तीच प्रार्थना करू शकतो, “हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर; कारण ती फार झाली आहे” (स्तोत्र 25:11). या प्रार्थनेविषयी नवी समज ही आहे कीं, आपण फक्त अशी प्रार्थना करण्याऐवजी कीं “तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर,” आपण ख्रिस्तामुळें आता अशी प्रार्थना करतो, “हे परमेश्वरा, तू येशूच्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर.”

पहिले योहान 2:12 येशूला उद्देशून म्हणते, “मुलांनो, मी तुम्हांला लिहितो, कारण त्याच्या नावामुळें तुमच्या पापांची तुम्हांला क्षमा झाली आहे,”. येशूनें आता पापाचे प्रायश्चित्त केलें आहे आणि पित्याचे गौरव प्रमाणित केलें आहे जेणेंकरून “त्याच्या नावामुळें” आपल्या “दुष्टाईची क्षमा” केलीं जावीं.

देव नीतिमान आहे. तो पापाला दंड दिल्यावाचून ते असेच झाकत नाहीं. जर कोण्या पापी मनुष्याला दोषमुक्त करण्यांत आलें तर, कोणी असा आहे जो देवानें त्या पापी व्यक्तीला असेच क्षमा केलें हा डाग त्याजवर लागू नये म्हून देवाच्या गौरवाचे असीम मूल्य प्रमाणित करण्यासाठीं मरण पावतो. ख्रिस्तानें तेच केलें. म्हणून, “हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं” आणि “येशूच्या नावामुळें” ही दोन्ही संबोधणें एकच आहेत. आणि म्हणूनच आम्हीं पापांच्या क्षमेसाठीं मोठ्या खात्रीने प्रार्थना करतो.

27 अगस्त : अनुग्रह प्राप्त करना

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27 अगस्त : अनुग्रह प्राप्त करना
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“परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्‍टि नूह पर बनी रही।” उत्पत्ति 6:8

आम धारणा में नूह एक आत्मिक योद्धा और विश्वास का नायक माना जाता है। परन्तु सच्चाई यह है कि वह भी एक साधारण मनुष्य था। वह भी बाकी सभी की तरह अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रहता था, अपनी जीविका कमाता था और अपने बच्चों का पालन-पोषण करता था।

नूह की कहानी आरम्भ होने से पहले पवित्रशास्त्र हमें बताता है: “यहोवा ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है। और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ” (उत्पत्ति 6:5-6)। यहाँ कोई भेदभाव नहीं किया गया है। इसमें कोई अपवाद नहीं है कि सम्पूर्ण मानवजाति दुष्टता में लिप्त थी और नूह भी इससे अछूता नहीं था।

सन्देश स्पष्ट है: सभी ने पाप किया था। सभी परमेश्वर से विमुख हो गए थे। सभी को न्याय का सामना करना था। लेकिन तभी एक महत्त्वपूर्ण वाक्य आता है— “परन्तु . . . नूह . . .।” पाप और न्याय की वास्तविकता के बावजूद, परमेश्वर के अनुग्रह के कारण एक दिव्य परिवर्तन आता है। परमेश्वर का अनुग्रह, जो न तो समझाया जा सकता है और न ही कमाया जा सकता है, नूह पर प्रकट हुआ। यही एकमात्र बात थी जिसने उसे बाकी मनुष्यजाति से अलग किया। परमेश्वर ने नूह और उसके परिवार को अपने अनुग्रह के पात्र के रूप में चुना और उसके साथ एक ऐसा सम्बन्ध स्थापित किया, जो पहले अस्तित्व में नहीं था। इसी अनुग्रह के कारण, नूह “धर्मी पुरुष” बना, जो “परमेश्वर ही के साथ-साथ चला” (उत्पत्ति 6:9)।

नूह परमेश्वर से कोई विशेष अधिकार नहीं माँग सकता था। उसके स्वयं के किसी गुण या प्रयास के कारण नहीं, बल्कि परमेश्वर ने पूर्णतः अपनी कृपा से नूह के जीवन में अनायास ही हस्तक्षेप किया।

बहुत से लोग मानते हैं कि अनुग्रह केवल नए नियम में पाया जाता है और पुराने नियम में तो केवल आग, गन्धक, व्यवस्था और न्याय की ही बात होती है, और अनुग्रह केवल यीशु के आने पर ही आता है। परन्तु सच्चाई यह है कि अनुग्रह न केवल सृष्टि से पहले अस्तित्व में था, बल्कि पूरे इतिहास में न्याय के मध्य भी प्रकट होता रहा है। बाइबल के प्रत्येक पृष्ठ पर अनुग्रह प्रकट होता है।

पूरी बाइबल में ही अनुग्रह प्रकट होता रहता है। नूह ने परमेश्वर के वचन के प्रति आज्ञाकारिता में एक नाव का निर्माण किया, जबकि उसके पास केवल परमेश्वर का वचन ही था जिस पर वह भरोसा कर सकता था। जब हम अनुग्रह को उसकी पूर्णता में अनुभव करते हैं, तो यह हमें विनम्र बना देता है और परमेश्वर को महान करता है। यह हमें यह एहसास कराता है कि जीवन परमेश्वर और उसकी भलाई के बारे में है, न कि हमारे बारे में। यह हमें उसके वचन पर विश्वास करने और उसकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।

आज आपको संसार से अलग करने वाली एकमात्र बात वही है जिसने नूह को उसकी पीढ़ी से अलग किया था—परमेश्वर का अवर्णनीय और अपरिवर्तनीय अनुग्रह। इसलिए आत्मिक घमण्ड और सांसारिक समझौते से सावधान रहें। हममें से कोई भी इतना बुद्धिमान नहीं है कि उद्धार के आनन्द को स्वयं समझ सके, और न ही इतना अच्छा कि उसे पाने के योग्य हो सके। आप और मैं इसके योग्य नहीं हैं—फिर भी, परमेश्वर ने हमारे जीवनों में हस्तक्षेप किया है। जब परमेश्वर का अनुग्रह हमारे हृदय को छू लेगा, केवल तब ही हम नूह की तरह इस संसार के मार्ग पर नहीं, बल्कि अपने सृष्टिकर्ता के मार्ग पर चलेंगे, और आज्ञाकारिता से भरी विनम्रता और आत्मविश्वास से भरी आशा के साथ जीवन जीएँगे। केवल अनुग्रह ही ऐसा प्रभाव डाल सकता है।

उत्पत्ति 6

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 120–122; 2 कुरिन्थियों 6

27 August : येशू आपल्या सर्व शत्रूंना तुडवील

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27 August : येशू आपल्या सर्व शत्रूंना तुडवील
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नंतर शेवट होईल, तेव्हा सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य ही नष्ट केल्यावर तो देवपित्याला राज्य सोपवून देईल. (1 करिंथ 15:24)

ख्रिस्ताच्या राज्याची व्याप्ती किती आहे?

पुढील वचन, 1 करिंथ 15:25 सांगते, “कारण आपल्या ‘पायांखाली सर्व शत्रू ठेवीपर्यंत’ त्याला राज्य केलें पाहिजे.” येथें प्रयुक्त केलेंला शब्द “सर्व” त्याच्या राज्याची व्याप्ती सूचित करतो.

त्याचप्रमाणें वचन 24 मध्यें प्रयुक्त केलेंला शब्द “सर्व” देखील तेंच सूचित करतो : “नंतर शेवट होईल, तेव्हा सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य ही नष्ट केल्यावर तो देवपित्याला राज्य सोपवून देईल.”

असा कोणताही रोग नाहीं, व्यसन नाहीं, महाकाय नाहीं, वाईट सवय नाहीं, दोष नाहीं, दुर्गुण नाहीं, दुर्बलता नाहीं, स्वभाव नाहीं, मन:स्थिती नाहीं, गर्व नाहीं, आत्म-दया नाहीं, कलह नाहीं, मत्सर नाहीं, विकृती नाहीं, लोभ नाहीं, आळशीपणा नाहीं कीं ज्यांवर ख्रिस्त आपल्या प्रतिष्ठेचा शत्रू म्हणून विजय मिळविणार नाहीं.

आणि या अभिवचनांत असलेले उत्तेजन असें कीं जेव्हा तुम्हीं तुमच्या विश्वासाच्या आणि तुमच्या पवित्रतेच्या शत्रूंशी युद्ध करण्यासाठीं सज्ज होता तेव्हा युद्ध लढणारे तुम्हीं एकटे नाहीं.

येशू ख्रिस्त हा वर्तमान समयी, या युगातच, त्याच्या सर्व शत्रूंना आपल्या पायाखाली ठेवत आहे. सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य यांवर विजय मिळविला जाईल.

म्हणून, लक्षात ठेवा कीं ख्रिस्ताच्या राज्याचा प्रसार हा तुमच्या जीवनात आणि या विश्वात असलेल्या त्याच्या गौरवाच्या सर्वात लहान आणि सर्वात मोठ्या शत्रूपर्यंत पोहोचतो. सर्व शत्रूंचा पराभव केला जाईल.

26 अगस्त : धैर्यवान उद्धारकर्ता

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26 अगस्त : धैर्यवान उद्धारकर्ता
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“उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’ और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया; और उनसे कहा, ‘तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्‍वास नहीं?’” मरकुस 4:38-40

जब तूफ़ान आया और चेलों को भय ने घेर लिया, तब यीशु ने केवल शान्ति ही नहीं, बल्कि उनकी प्रतिक्रिया के प्रति अद्‌भुत धैर्य भी दिखाया।

उन्होंने यीशु पर यह आरोप लगाया कि उसे इस बात की चिन्ता नहीं थी कि वे नष्ट हो रहे हैं। लेकिन यीशु ने उन्हें नहीं, बल्कि हवा और लहरों को डाँटा। यह कितनी अद्‌भुत बात है! संसार में किसी भी शिक्षक के पास यीशु के चेलों से अधिक धीमी गति से सीखने वाले छात्र नहीं थे—परन्तु यह भी सच है कि न ही किसी अन्य शिक्षक में उसके समान धैर्य और क्षमा करने की क्षमता थी।

यीशु का धैर्य केवल इस घटना तक सीमित नहीं था; अपने पूरे सेवाकार्य के दौरान वह अपने चेलों की कमजोरियों और असफलताओं के प्रति लगातार धैर्यवान रहा। मरकुस 6 में केवल पाँच रोटियों और दो मछलियों से पाँच हज़ार लोगों को भोजन खिलाने के बाद जब चेलों ने उसे पानी पर चलते देखा, तब भी उन्होंने उस पर सन्देह किया। लेकिन यीशु ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया, “ढाढ़स बाँधो : मैं हूँ; डरो मत” (मरकुस 6:50)। आगे भी, जब उसने बार-बार अपनी मृत्यु की आवश्यकता और उद्देश्य के बारे में समझाया, तो चेलों ने उसे समझने या स्वीकार करने में कठिनाई महसूस की (मरकुस 8:31-33; 9:30-32; 10:32-34)। यहाँ तक कि पुनरुत्थान के बाद भी यीशु ने चेलों को इस बात के लिए नहीं डाँटा कि वे उसकी भविष्यवाणी के अनुसार उसके जी उठने से चकित हो गए थे। इसके विपरीत, उसने प्रेम और धैर्य के साथ उनसे गहरे प्रश्न पूछे और अपनी सच्ची पहचान को उनपर प्रकट किया।

हम चेलों में अपने कमज़ोर विश्वास को प्रतिबिम्बित होता हुआ देख सकते हैं। यदि हम उनके स्थान पर होते, तो शायद हम भी उसी तरह डरकर भाग-दौड़ कर रहे होते और अपने सन्देह तथा शिकायतें यीशु के सामने रख रहे होते। लेकिन आज भी, हमारे भय और सन्देह के बावजूद मसीह हमें धैर्यपूर्वक सम्भालता है। वह हमें हमारे एक क्षण के अविश्वास के कारण अस्वीकार नहीं करता। वह हमारी कायरता के कारण हमें त्याग नहीं देता। उसके समान कोई और शिक्षक है ही नहीं।

इसलिए जब हम मसीह के इस अद्वितीय धैर्य के भागीदार हुए हैं, तो हमें भी यही धैर्य दूसरों के प्रति दिखाना चाहिए। यदि आप माता-पिता, कोच, प्रबन्धक, सेवकाई नेता, शिक्षक, या केवल एक मित्र भी हैं, तो यीशु के उदाहरण को याद रखें। यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे डगमगाते विश्वास को सहन करे, तो हमें भी दूसरों के प्रति और यहाँ तक कि अपने स्वयं के प्रति भी ऐसा ही धैर्य रखना चाहिए।

सबसे बढ़कर, हमें केवल यीशु के उदाहरण का अनुसरण करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी सिद्धता का आनन्द लेने के लिए बुलाया गया है। उसका धैर्य कभी असफल नहीं होगा। वह अपनी देखभाल में रहने वालों की कभी उपेक्षा नहीं करता और न ही उन्हें छोड़ता है। आपके पापों और आपके संघर्षों के कारण उसकी सहनशीलता का बाँध कभी नहीं टूटता। वह आज भी आपके साथ धैर्यवान रहेगा। वह आपका उद्धारकर्ता, आपका निस्तारक, आपका हमेशा धैर्यवान शिक्षक—आपका यीशु है।

निर्गमन 33:18 – 34:8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 119:89-176; 2 कुरिन्थियों 5 ◊

26 August : छाया आणि झरे

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26 August : छाया आणि झरे
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परमेश्वराचे वैभव चिरकाल राहो! परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होवो! तो पृथ्वीकडें पाहतो तेव्हा ती कापते; तो पर्वतांना स्पर्श करतो तेव्हा ते धुमसतांत. माझ्या जिवात जीव आहे तोपर्यंत मी परमेश्वराचे गुणगान गाईन; मी जिवंत आहे तोपर्यंत माझ्या देवाचे स्तोत्र गाईन. मी केलेंले त्याचे मनन त्याला गोड वाटो; परमेश्वराच्या ठायीं मला हर्ष होईल.. (स्तोत्र 104:31-34)

परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होतो कारण त्यां कृती आपल्याला त्यांच्या पलीकडें म्हणजें प्रत्यक्ष देवाकडें पाहण्याचा संकेत देतांत.

देवाची इच्छा ही आहे कीं आपण या सृष्टीत दिसून येणारी त्याची हस्तकृती पाहून थक्क व भयभीत व्हावें. पण आपण त्यां कृतींचे कौतुक करावें म्हणून नाहीं. त्याची इच्छा अशी आहे कीं आपण त्याच्या सृष्टीकडें पाहून असे म्हणावें : जर त्याचे फक्त अंगुलीकार्य (स्तोत्र 8:3) इतके शहाणपण आणि सामर्थ्य आणि भव्यता आणि वैभव आणि सौंदर्य यांनी परिपूर्ण आहे, तर हा परमेश्वर स्वतः कसा असावा!

ही अंगुलीकार्ये फक्त त्याच्या वैभवाची केवळ मागची बाजू आहेत, कीं जणू आपण ती काचातून खोल अंधकारांत पाहत आहों. मग या सर्वांचा जो निर्माणकर्ता, प्रत्यक्षात त्याचा महिमा पाहणें म्हणजें काय असेल! फक्त त्याच्या हस्तकृतीच नाहीं! अब्ज आकाशगंगा देखील मनुष्याच्या जिवाला संतुष्ट करू शकणार नाहींत. परमेश्वर आणि केवळ परमेश्वर हाच आमच्या आत्म्याची तहान तृप्त करू शकतो.

जोनाथन एडवर्ड्स यांनी ही गोष्ट पुढीलप्रमाणें अभिव्यक्त केलीं :

परमेश्वरापासून आनंद हे ते एकमेव सुख आहे जे आपल्या आत्म्यांची तहान तृप्त करू शकते. स्वर्गात जावून देवाचा पूर्ण आनंद घेणें हे येथें असलेल्यां सर्व-सुखांच्या निवासस्थानांपेक्षा अमर्यादपणें श्रेष्ठ आहे. . . . [ह्यां] फक्त छाया मात्र आहेत. पण देव हा वास्तविक रूप आहे. ह्यां गोष्टी केवळ विखुरलेला प्रकाश आहे; पण देव हा सूर्य आहे. हे फक्त झरे आहेत; पण देव हा महासागर आहे.

म्हणूनच स्तोत्र 104 ची शेवटची 31-34 ही वचनें प्रत्यक्षांत देवावर लक्ष केंद्रित करून या स्तोत्राचा समारोप करतांत. “माझ्या जिवात जीव आहे तोपर्यंत मी परमेश्वराचे गुणगान गाईन. . . परमेश्वराच्या ठायीं मला हर्ष होईल.” शेवटी ज्यां गोष्टीं आपली अंतःकरणें आश्चर्याने भरून टाकतील आणि आपल्या मुखांत सार्वकालिक स्तुती भरतील त्यां गोष्टीं हा समुद्र किंवा हे पर्वत किंवा दऱ्याखोरी किंवा पाण्याचे झरे किंवा ढग किंवा मोठमोठ्या आकाशगंगा नसतील, तर तो स्वतः देव असेल जो सर्वांमध्यें सर्वकाहीं पूर्ण करतो.

25 अगस्त : प्रतिशोध का त्याग

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25 अगस्त : प्रतिशोध का त्याग
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“हे प्रियो, बदला न लेना, परन्तु परमेश्‍वर के क्रोध को अवसर दो।” रोमियों 12:19

बदला लेना हमारी सबसे स्वाभाविक प्रवृत्तियों में से एक है। यह संसार का तरीका है, क्योंकि हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जहाँ “बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है।” यदि कोई हमारे रास्ते में आता है, तो हम उसे हटाने की पूरी कोशिश करते हैं। यह विशेषकर तब एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है, जब हमारे साथ अन्याय होता है—परन्तु यह मसीही प्रतिक्रिया नहीं है। इसलिए हमें हमेशा इसके विरुद्ध सतर्क रहना चाहिए। भले ही हमने कल इसे टाल दिया हो, इसकी कोई निश्चितता नहीं है कि हम आज भी ऐसा कर पाएँगे।

शायद खेल का मैदान ऐसा स्थान है, जहाँ हम सबसे अधिक देखते हैं कि प्रतिशोध कितनी आसानी से हमारी योजनाओं और कार्यों का प्रेरक बन जाता है। यदि कोई विरोधी खिलाड़ी आपको फाउल करता है और रेफरी या अम्पायर इसे नहीं देखता या दण्डित नहीं करता, तो आप क्या करते हैं? हमारी सहज प्रवृत्ति होती है कि हम किसी तरह उससे बदला लें। हम योजना बनाते हैं, सही समय का इन्तज़ार करते हैं और फिर “हिसाब बराबर” कर देते हैं। और जिस तरह खेल के मैदान में यह होता है, वैसे ही हमारे जीवन में भी होता है—भले ही व्यवहार में न सही, परन्तु हमारी कल्पनाओं में ऐसा अवश्य होता है।

परन्तु फिर पवित्रशास्त्र हमारे इस स्वाभाविक स्वभाव को यह कहकर काट देता है: “बदला न लेना।”

पौलुस ने केवल इस सिद्धान्त को लिखा ही नहीं, बल्कि इसे अपने जीवन में जीकर भी दिखाया। वह एक ऐसे वातावरण में सेवा कर रहा था, जहाँ उसके पास प्रतिशोध लेने के पर्याप्त कारण थे—उसे बदनाम किया गया, पीटा गया, उपहास किया गया और कैद में डाला गया। जब सम्राट नीरो और उसकी सरकार मसीहियों को राजमहल के आँगन में जलती हुई मशालों में बदल रहे थे, तब भी सम्भवतः पौलुस जीवित था। वे मसीही विश्वासियों को खम्भों से बाँध देते थे, उन खम्भों को ज़मीन में गाड़ देते थे, और फिर उन्हें मोम से ढककर आग लगा देते थे—लेकिन उस समय भी आदेश यही था: “बदला न लेना।”

हम अक्सर ईश्वरीय न्याय, जो परमेश्वर का अधिकार है; आपराधिक न्याय, जो सरकार की परमेश्वर द्वारा ठहराई हुई ज़िम्मेदारी है (रोमियों 13:1-4); और व्यक्तिगत प्रतिशोध के अभ्यास के बीच अन्तर नहीं कर पाते, जिसके लिए बाइबल हमें कोई अधिकार नहीं देती। हमें सरकार से आपराधिक न्याय प्राप्त करने की अनुमति है, लेकिन हमें यह ध्यान में रखना है कि यह पूर्ण नहीं होगा और इसका उद्देश्य अन्तिम न्याय करना नहीं है। लेकिन सबसे बढ़कर, हमें स्वयं को परमेश्वर के दिव्य न्याय के हाथों सौंपना है, ठीक वैसे ही जैसे उसके पुत्र ने किया (1 पतरस 2:23)। हमें यह याद रखते हुए जीना चाहिए कि आज शायद अन्तिम न्याय का दिन नहीं है, और निश्चित रूप से आप और मैं न्यायाधीश नहीं हैं।

हमारी नागरिकता किसी भी सांसारिक राज्य से बढ़कर एक अनन्त राज्य में है। यदि अविश्वासी हमें यह प्रचार करते हुए देखते हैं कि मसीह सच्चा और न्यायी न्यायाधीश है, लेकिन फिर हमें खुद ही न्याय करते हुए पाते हैं, तो वे मसीह की ओर आकर्षित नहीं होंगे। हमारा व्यवहार उन लोगों को प्रभावित करेगा जो पाप के साथ संघर्ष कर रहे हैं। इसलिए ऐसा हो कि वे हमारे प्रेम से मसीह की ओर खिंचे चले आएँ, न कि हमारे प्रतिशोध के कारण उससे दूर हो जाएँ।

रोमियों 12:9-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 119:1- 88; 2 कुरिन्थियों 4

25 August : जेव्हा देवाची प्रीति सर्वात गोड असते

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25 August : जेव्हा देवाची प्रीति सर्वात गोड असते
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पतींनो, जशी ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं तशी तुम्हींही आपापल्या पत्नीवर प्रीति करा; ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें, अशासाठीं कीं, तिला त्यानें वचनाद्वारे जलस्नानाने स्वच्छ करून पवित्र करावे. (इफिस 5:25-26)

देवानें तुमच्यावर कोणतीही अट न ठेवता प्रीति करावीं अशी जर तुम्हीं केवळ त्याच्याकडून अपेक्षा करत असाल, तर तुमची आशा मोठी तर आहे, पण खूप संकुचित मनाची.

देवाची अट-विरहित प्रीति त्याच्या प्रीतिचा एकमात्र गोड अनुभव नाहीं. सर्वात गोड अनुभव तो असतो जेव्हा त्याची प्रीति असे म्हणते, “मी तुला माझ्या पुत्राच्या प्रतिमेसारखे अशा रीतीने बनवले आहे कीं तुला पाहून व तुझ्या सहभागीतेत राहून मला आनंद होतो. तुझ्याठाई माझा आनंद आहे, कारण तू माझ्या गौरवाने इतका तेजस्वी झाला आहेस.”

हा अति गोड अनुभव आमच्यात परिवर्तन घडवून आणून आम्हांला असे लोक बनविण्याच्या दृष्टिने सशर्त आहे ज्यांच्या भावना आणि निवडी आणि कृती ह्या देवाला आनंद देतांत.

अटीविरहित प्रीति ही मनुष्यांत परिवर्तन घडवून आणणारा तो उगम आणि तो पाया आहे ज्यामुळें सशर्त प्रीतिचा गोडवा शक्य होतो. जर देवानें आपल्यावर अटीविरहित प्रीति केलीं नसती, तर त्यानें आपल्या कुरूप जीवनात प्रवेश केला नसता, आपल्याला विश्वासात आणले नसते, आपल्याला ख्रिस्ताशी जोडले नसते, आपल्याला त्याचा आत्मा देऊ केला नसता आणि आपल्याला अंशा-अंशाने येशूसारखे घडवले नसते.

पण जेव्हा देव कोणतीही अट न ठेवता आपली निवड करतो, आणि ख्रिस्तानें आपल्यासाठीं मरण सोसावे म्हणून त्याला पाठवतो, आणि आपल्याला नव्याने जन्म देतो, तेव्हा तो परिवर्तनाची एक न थांबणारी प्रक्रिया सुरु करतो जी आपल्याला अंशा-अंशाने तेजस्वी बनवत जाते. त्याला ज्या स्वरूपाचा मनुष्य आवडतो त्याशी आपल्याला समरूप करण्यासाठीं तो आपल्याला एक तेज देतो : त्याचे स्वतःचे तेज.

हे आपण इफिसकर 5:25-27 मध्यें पाहतो. “ख्रिस्तानें मंडळीवर प्रीति केलीं आणि स्वतःस तिच्यासाठीं समर्पण केलें (अटी-विरहित प्रीति), अशासाठीं कीं, तिला त्यानें…पवित्र करावे. . . आणि गौरवयुक्त मंडळी अशी ती स्वतःला सादर करावी” – म्हणजें ते स्वरूप ज्यांत त्याला आनंद होतो.

आपण अविश्वासात असलेलें पापी असताना देखील देवानें आपल्यावर त्याची अटी-विरहित कृपा केलीं हे ‘अद्भुत’ अवर्णनीय आहे. हे अद्भुत आहे याचे प्रमुख कारण म्हणजें हे कीं ही अटी-विरहित प्रीति आपल्याला त्याच्या गौरवशाली उपस्थितीच्या सार्वकालिक आनंदात घेऊन येते.

पण त्या आनंदाचा शिखर म्हणजें आपण केवळ त्याचे वैभव पाहतच नाहीं तर आपण त्या वैभवाला प्रतिबिंबित सुद्धा करतो. “प्रभू येशू ह्याच्या नावाला तुमच्या ठायीं व तुम्हांला त्याच्या ठायीं गौरव मिळावा” (2 थेस्सलनीकाकर 1:12).

24 अगस्त : पहचान और प्रतिक्रिया

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24 अगस्त : पहचान और प्रतिक्रिया
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“उसने उनसे कहा, ‘नाव की दाहिनी ओर जाल डालो तो पाओगे।’ अतः उन्होंने जाल डाला, और अब मछलियों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके। तब उस चेले ने जिससे यीशु प्रेम रखता था, पतरस से कहा, ‘यह तो प्रभु है!’ शमौन पतरस ने यह सुनकर कि वह प्रभु है, कमर में अंगरखा कस लिया, क्योंकि वह नंगा था, और झील में कूद पड़ा।” यूहन्ना 21:6-8

जब किनारे पर खड़े व्यक्ति ने मछुआरों से नाव के दूसरी ओर जाल डालने के लिए कहा—और जब उन मछुआरों ने देखा कि पूरी रात कुछ न पकड़ने के बाद अब उनके जाल मछलियों से भर गए हैं—तब वे पहचान गए कि यह कौन था जिसने उन्हें पुकारा था। इम्माऊस के मार्ग पर जा रहे उन व्यक्तियों के समान शायद ये भी किसी अलौकिक कारण से उसे पहचान नहीं पाए थे (लूका 24:16)। या शायद सुबह की हल्की धुंध या नाव और किनारे के बीच की दूरी के कारण वे अपने उद्धारकर्ता को पूरी तरह से पहचान नहीं पाए थे।

कारण चाहे जो भी रहा हो, जल्द ही यूहन्ना, “जिससे यीशु प्रेम रखता था,” समझ गया कि उनसे किसने बात की थी—और जैसे ही उसने यह बात पतरस को बताई, पतरस ने तुरन्त प्रतिक्रिया दी। यूहन्ना की पहचान और पतरस की प्रतिक्रिया एक सुन्दर सहभागिता को दर्शाती है, जो परमेश्वर की पूरक विविधता की योजना को प्रकट करती है। परमेश्वर इस संसार में से यूहन्ना जैसे चिन्तनशील लोगों और पतरस जैसे जोशीले लोगों को एक साथ लेकर आता है ताकि वे एक-दूसरे के बिना अधूरे न रहें।

यूहन्ना के सुसमाचार में हम देखते हैं कि वह एक गहरे विचारशील और स्थिर विश्वास वाला व्यक्ति था। जब वह और पतरस खाली कब्र में गए, तो उसने बड़ी सूझबूझ से सोचा कि कब्र के वस्त्र बिना शरीर के क्यों पड़े हैं और इस प्रकार उसने विश्वास किया (यूहन्ना 20:8)। इसी प्रकार, नाव में रहते हुए भी उसने अपने आस-पास की घटनाओं को जल्दबाजी में नहीं, बल्कि गहराई से समझने के बाद विश्वास किया। जब यूहन्ना को एहसास हुआ कि उनके सामने यीशु है, तो उसने तुरन्त इस बारे में पतरस को बताया।

पतरस ने यूहन्ना की इस पहचान को उसी जोशीले ढंग से स्वीकार किया, जैसा वह अक्सर करता था: उसने विश्वास से भरी, उत्साही, और तत्काल कार्रवाई की। कल्पना करें कि उसने पानी में छलाँग लगा दी, और आधा तैरते हुए, आधा चलते हुए, पूरी ताकत से किनारे की ओर बढ़ने लगा, ताकि अपने उद्धारकर्ता तक जल्द से जल्द पहुँचे। उसने नाव में से पानी में छलाँग लगाने में एक पल की भी झिझक नहीं दिखाई। उसका एकमात्र उद्देश्य था, प्रभु तक पहुँचना।

यदि सूझबूझ वाले चिन्तनशील यूहन्ना जैसे लोग यहाँ न हों, तो पतरस जैसे उत्साही लोग निरन्तर व्यस्त रहते हुए जल्द ही थककर चूर हो जाएँ। और यदि पतरस जैसे साहसी लोग न हों, तो यूहन्ना जैसे लोग अपनी गहरी सोच में उलझकर निष्क्रिय हो जाएँ। हमें मसीह की सेवा करने के लिए साथी और सहयोगी चाहिएँ। चाहे आप पतरस हों या यूहन्ना, या फिर आपके पास कोई और विशेष स्वभाव हो, परमेश्वर ने आपको जैसे बनाया है, वैसे ही अपने राज्य में एक विशेष उद्देश्य के लिए रखा है।

हममें से कई लोग बहुत अधिक समय यह सोचने में गवा देते हैं कि काश हम किसी और की तरह होते। और कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें अपने स्वभाव और योग्यताओं की पूरी पहचान होती है, लेकिन वे उन्हें दूसरों की सेवा के लिए विनम्रता से उपयोग करने में असफल रहते हैं या उन लोगों के साथ धैर्य नहीं रख पाते जो उनसे भिन्न हैं।

यदि आप यह समझ लें कि आपका हर गुण परमेश्वर द्वारा दिया गया है और वह चाहता है कि आप इसे अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि उसकी आज्ञा मानने, उसकी प्रजा के संग रहने, और उसके पुत्र की महिमा के लिए उपयोग करें—तो आप खुद को और अपने उद्देश्य को देखने के तरीके में क्या बदलाव लाएँगे?

1 कुरिन्थियों 12:12-27

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 116–118; 2 कुरिन्थियों 3 ◊

24 August : निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश

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24 August : निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश
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स्वतःला शहाणें म्हणता म्हणता ते मूर्ख बनले; आणि अविनाशी देवाच्या गौरवाची, नाशवंत मनुष्य, पक्षी, चतुष्पाद पशू व सरपटणारे प्राणी ह्यांच्या प्रतिमांच्या रूपांशी त्यांनी अदलाबदल केलीं. (रोमकरांस 1:22-23)

जर एखाद्या मनुष्य त्याच्या वधूपेक्षा त्याच्या लग्नाच्या अंगठीवर जास्त प्रेम करत असेल तर हा एक मोठा मूर्खपणा ठरेल आणि मोठी शोकांतिका किंवा अति दुर्दैवी प्रसंग ठरेल. परंतु हा शास्त्रपाठ नेमके तेच घडल्याचे सांगत आहे.

मनुष्यजातिने देवाऐवजी निर्मिलेल्यां वस्तूंमध्यें दिसून येणारे त्याचे सर्वश्रेष्ठ सनातन सामर्थ्य व देवपण याच्या प्रतीबिम्बावर प्रीति केलीं आणि खरी प्रीति आणि सामर्थ्य आणि गौरव ह्याची जी अतुलनीय व मूळ प्रतिध्वनी आहे ती ऐकण्यापासून बहिरी झाली.

निर्मिलेल्यां पदार्थांचा संदेश असा आहे :

या संपूर्ण चित्तथरारक विश्वाच्या निर्मितीमागे एक असा महान परमेश्वर आहे जो वैभव आणि सामर्थ्य आणि औदार्य ह्यानें परिपूर्ण आहे; तुम्हीं त्याचे आहांत कारण त्यानें तुम्हांला बनवले आहे. बंडखोरीने भरलेले तुमचे जीवन कायम ठेवण्यासाठीं तो तुमच्याविषयी धीर धरतो. त्याच्याकडें फिरा आणि त्याजवर तुमची आशा ठेवा आणि त्यानें निर्मिलेल्यां पदार्थांवरून दिसून येणाऱ्या त्याच्या हस्तकलेवरच केवळ नव्हे तर प्रत्यक्षात त्याजमध्यें आपला आनंद शोधा.

स्तोत्र 19:1-2 सांगते त्याप्रमाणें, दिवस त्या संदेशाचा “संवाद” जे दिवसाचे आहेंत त्यां सर्वांसाठीं करतो, आणि दिवस तो संवाद आंधळे करणारा तेजस्वी सूर्य आणि निळे आकाश व  ढग आणि ज्ञात व अज्ञात असे असंख्य ग्रह आणि रंग आणि सर्व दृश्यमान गोष्टींची सुंदर रचना यांच्या द्वारे करतो. रात्र देखील त्याच संदेशाचे “ज्ञान” जें रात्रीचे आहेंत त्या सर्वांसाठीं ओतते, रात्र हे ज्ञान अथांग खोल शून्यता आणि उन्हाळ्यातील चंद्र आणि असंख्य तारे आणि विलक्षण ध्वनी आणि थंड वारा आणि उत्तरेकडील तारे यांद्वारे प्रकट करते.

दिवस व रात्र या एकाच गोष्टीचा संदेश देत आहेत : परमेश्वर वैभवशाली आहे! परमेश्वर वैभवशाली आहे!! परमेश्वर वैभवशाली आहे! निर्मिलेल्यां पदार्थांमध्यें आपलें परम समाधान शोधण्यापासून आपलें मन फिरवा आणि ह्या वैभवशाली परमेश्वरामध्यें हर्षानंद करा.