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17 सितम्बर : कोई और नहीं है

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17 सितम्बर : कोई और नहीं है
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“मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही परमेश्‍वर हूँ और दूसरा कोई और नहीं है।” यशायाह 45:22

हर दिन, जैसे ही भोर होता है, भारत में गंगा के किनारे पूजा करने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है और सूर्योदय का स्वागत करती है। कई लोग अपने प्रियजनों की अस्थियाँ पानी में प्रवाहित करते हैं, ताकि वे अपनी शाश्वत सुख-शान्ति प्राप्त कर सकें। भारत के करोड़ों हिन्दुओं की तरह ये पुरुष और महिलाएँ मानते हैं कि “भगवान” हर चीज़ में विद्यमान है।

हालाँकि हम लोग ऐसी पूजा के दृश्यों और स्वरों से बहुत दूर हैं, लेकिन एक अन्य भाव में हम इसके कहीं ज़्यादा क़रीब हैं, जिसे हम स्वीकार नहीं करना चाहते।

हमारी अपनी संस्कृति में देखें तो आप पाएँगे कि मूर्तिपूजा और उसकी सूक्ष्मताएँ अब भी उतनी ही प्रचलित हैं, जितनी पहले थीं। यह धारणा में पाई जाती है कि इसका कोई महत्त्व नहीं है कि आप क्या मानते हैं, क्योंकि दुनिया के सारे बड़े धर्म “मूल बातों पर सहमत हैं।” मसीहत के भ्रष्ट और विकृत रूपों की भरमार पाई जाती है, क्योंकि हम अपने अनुसार बनाए गए एक “ईश्वर” की पूजा करने में माहिर हैं—एक ऐसा ईश्वर जो संयोगवश हमारी इच्छाओं के अनुकूल होता है और हमारे निर्णयों से सहमत रहता है। इसी तरह, सतही प्रकार के ‘सर्वेश्वरवाद’ (Panentheism) की झलक हमें आलीशान स्पा और योगा कक्षाओं में मिल सकती है, क्योंकि हम अपने आप को और अपने शरीर को भी एक देवता मानने में बड़े कुशल हैं।

असल में, हमारे पास सैकड़ों प्रतिस्थापित देवता हैं—ऐसी मूर्तियाँ जो हमें स्वतन्त्रता का वादा करती हैं, लेकिन वास्तव में हमें तुच्छ और बन्धक बना देती हैं। यदि आप सेक्स की पूजा करते हैं, तो यह आपकी प्रेम करने या प्रेम प्राप्त करने की क्षमता को नष्ट कर देगा। शराब की पूजा करें, तो यह आपको जकड़ लेगी। पैसे की पूजा करें, तो यह आपको निगल जाएगा। अपने परिवार की पूजा करें और आप (या वे) अधूरी उम्मीदों के बोझ तले टूट जाएँगे। किसी भी प्रतिस्थापित देवता की पूजा करें और आप पाएँगे कि वह सन्तुष्टि नहीं दे सकता।

जब हम मूर्तिपूजा में धीरे-धीरे और गहराई से उलझते जाते हैं, तो इसके परिणामस्वरूप बाइबल में हमारा विश्वास कम होता जाता है—उस बाइबल में जो परमेश्वर का अचूक वचन है। जब ऐसा होता है, तो यीशु नासरी के विशेष और अनन्य दावों की सीधी घोषणा के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता—कि वह त्रिएक परमेश्वरत्व का दूसरा व्यक्ति है, सृष्टिकर्ता है, पुनरुत्थित प्रभु है, स्वर्गारोहित राजा है, और—एक दिन—लौटने वाला मसीह है। इसलिए यह परमेश्वर की कृपा का कार्य है—भले ही एक विचलित कर देने वाला कार्य हो—कि वह अपने वचन में कहता है: मैं सब लोगों को, हर जगह, यह आज्ञा देता हूँ कि वे पश्चाताप करें, अपनी निरर्थक मूर्तियों से मुड़ें, और मेरी—सृष्टिकर्ता, पालनहार, शासक, पिता और न्यायी की—उपासना करें (प्रेरितों 17:30 देखें)।

आपके हृदय की उस निरन्तर इच्छा का इलाज क्या है, जो बार-बार उन मूर्तियों की ओर झुकती है जो प्रभु का अपमान करती हैं और उद्धार नहीं कर सकतीं? उत्तर बहुत सरल है: “हे पृथ्वी के दूर-दूर के देश के रहने वालो, तुम मेरी ओर फिरो और उद्धार पाओ! क्योंकि मैं ही परमेश्‍वर हूँ और दूसरा कोई और नहीं है।” उन मूर्तियों की पहचान करें जिनकी उपासना करने की ओर आपका मन झुकता है—और फिर उन्हें उस सृष्टिकर्ता और सम्पूर्ण सृष्टि के पालनहार के सामने रखकर देखें। वह परमेश्वर है, वे नहीं हैं। वह उद्धार कर सकता है, वे नहीं कर सकते। फिर से उनसे मुड़ें, और उसकी ओर लौट आएँ।

यशायाह 45:18-25

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: आमोस 1–3; यूहन्ना 7:1-27 ◊

17 September : गडगडाटी वादळांत देवाची उपासना करा.

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17 September : गडगडाटी वादळांत देवाची उपासना करा.
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“कारण जशी वीज आकाशाच्या एका बाजूस चमकून दुसर्‍या बाजूपर्यंत प्रकाशते, तसेच मनुष्याच्या पुत्राचेही त्याच्या दिवशी होईल.” (लूक 17:24)

मी एकदा रात्री शिकागोहून मिनियापोलिसला जात होतो, आणि विमानात जवळजवळ एकटाच होतो. पायलटने जाहीर केलें कीं मिशिगन सरोवर आणि विस्कॉन्सिनमध्यें गडगडाटी वादळ आहे. गोंधळ होऊं नये म्हणून तो विमान पश्चिमेकडें स्कर्ट करायचा.

मी विमानाच्या पूर्वेकडें असलेल्या घनदाट काळोखाकडें पाहत बसलो असताना, अचानक संपूर्ण आकाश प्रकाशाने चकाकले आणि विमानाच्या खाली चार मैलांवर पांढऱ्या ढगांची एक पोकळ पडली व लगेच नाहींशी झाली.

एका सेकंदानंतर, क्षितिजावर उत्तरेकडून दक्षिणेंकडें प्रकाशाचा एक विशाल पांढरा बोगदा फुटला आणि पुन्हा घनदाट काळोखांत नाहींसा झाला. लगेच त्या गडगडाटी विजांची सर स्थिरावली , ज्यामुळें ढगांच्या अथांगातून आणि ढगांच्या दूरच्या पांढऱ्या पर्वतांच्या मागे प्रकाशाचे ज्वालामुखी फुटलेलें दिसू लागलें.

मी अक्षरशः अविश्वासाने डोके हलवत बसलो, आणि ओरडू लागलो, हे परमेश्वरा, जर या तुझ्या तलवारीला धारदार करतांना उडणाऱ्या केवळ ठिणग्यामात्र असतील, तर तुझ्या प्रकट होण्याचा दिवस कसा असेल! आणि मला ख्रिस्ताचे शब्द आठवले : “जशी वीज आकाशाच्या एका बाजूस चमकून दुसर्‍या बाजूपर्यंत प्रकाशते, तसेच मनुष्याच्या पुत्राचेही त्याच्या दिवशी होईल” (लूक 17:24).

आताही ते दृश्य आठवत असताना माझे मुख त्याच्या गौरवाच्या शब्दांनी भरून जाते. मी देवाचे आभार मानतो कीं त्यानें माझ्या अंतःकरणात त्याच्या प्रकट होण्याची, त्याला पाहण्याची आणि ख्रिस्ती परमानंदाच्या मेजवानीला बसून गौरवाच्या राजाची उपासना करण्याची इच्छा वारंवार जागृत केलीं आहे. तो मैफिल हॉल खूप मोठा आहे. या.

16 सितम्बर : अनन्त लाभ

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16 सितम्बर : अनन्त लाभ
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“यह नहीं कि मैं दान चाहता हूँ परन्तु मैं ऐसा फल चाहता हूँ जो तुम्हारे लाभ के लिए बढ़ता जाए। मेरे पास सब कुछ है, वरन् बहुतायत से भी है; जो वस्तुएँ तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्त हो गया हूँ, वह तो सुखदायक सुगन्ध, ग्रहण करने योग्य बलिदान है, जो परमेश्‍वर को भाता है।” फिलिप्पियों 4:17-18

फिलिप्पी की कलीसिया को पत्र लिखते हुए पौलुस ने यह कहने के लिए कि “आपकी वित्तीय सहायता के लिए धन्यवाद,” जिस तरीके का उपयोग किया, वह एकदम अनोखा था: वह कहता है कि उनकी उदारता ने उसे इस कारण से प्रसन्न नहीं किया कि उनका उपहार उसके लिए क्या मायने रखता था, बल्कि इसलिए कि वह उनके लिए अर्थात उपहार देने वालों के लिए क्या मायने रखता है। वह उन्हें बताता है कि उनका दान उनके स्वयं के लिए अधिक लाभकारी होगा, न कि उसके अपने लिए अर्थात प्राप्त करने वाले के लिए!

पौलुस की खुशी उनकी उदारता को लेकर इस आश्वासन से उत्पन्न हुई कि उनके लिए यह अनन्तकाल के लिए लाभकारी होगा। उसका यह विश्वास यीशु की शिक्षा पर आधारित था। उदाहरण के लिए, लूका के सुसमाचार में पतरस ने यीशु से कहा था, “देख, हम तो घर-बार छोड़कर तेरे पीछे हो लिए हैं” (लूका 18:28)। हम ठीक-ठीक नहीं जानते कि पतरस ने यह बात किस उद्देश्य से कही थी, लेकिन हम यीशु का उत्तर अवश्य जानते है: उसने कहा, “ऐसा कोई नहीं जिसने परमेश्‍वर के राज्य के लिए घर, या पत्नी, या भाइयों, या माता–पिता, या बाल–बच्चों को छोड़ दिया हो; और इस समय कई गुणा अधिक न पाए और आने वाले युग में अनन्त जीवन” (लूका 18:29-30)। यीशु यह कह रहा था कि पतरस और अन्य चेलों ने यह सब छोड़ा नहीं था, बल्कि अपने भविष्य के लिए निवेश किया था।

बाइबल वर्तमान समय और अनन्तकाल की निकटता—दोनों के बारे में पूर्णतः स्पष्ट है। हम अक्सर ऐसे जीने लग जाते हैं जैसे अनन्तकाल का हमारे देने, सोचने और जीने के तरीके पर कोई असर ही नहीं होता। लेकिन सच्चाई यह है कि अनन्तकाल हममें से हर एक के लिए बस एक श्वास की दूरी पर हो सकता है और इस क्षणभंगुर जीवन की तुलना में कहीं अधिक लम्बा है। इसलिए यह उपयुक्त है कि हम इस दृष्टिकोण से दें कि उसका प्रतिफल हमें अनन्त जीवन में समृद्ध रूप से मिलेगा।

हमारे द्वारा खुले हाथों से देने की क्षमता और अनन्तता को ध्यान में रखते हुए देने की प्रेरणा, परमेश्वर की स्वयं की उदारता में निहित है, जो सबसे महान दाता है। शायद सबसे बड़ी गलती जो हम देने में कर सकते हैं वह यह है कि हम कुछ भी न दें। हमें यह सोचने का प्रलोभन हो सकता है कि हम देने का सामर्थ्य नहीं रखते—लेकिन सच्चाई यह है कि हम न देने का जोखिम नहीं उठा सकते! जैसे यीशु हमें स्नेहपूर्वक वचन देता है, “दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा। लोग पूरा नाप दबा दबाकर और हिला हिलाकर और उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा” (लूका 6:38)।

इसलिए अपनी निवेशों पर विचार करें—रिटायरमेंट की योजनाओं, शेयर बाजार, या कॉलेज फंड में नहीं, बल्कि उस प्रकार के भुगतान में जो अनन्त जीवन में “आपके खाते में बढ़ता जाएगा।” सुसमाचार के लिए देने में महान लाभ है। आने वाले जीवन को अपने आज के खर्चों पर निर्णायक प्रभाव डालने दें और आप पाएँगे कि आप उदारता से और खुशी से देने वाले बन गए हैं।

2 कुरिन्थियों 8:1-15

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 3–5; यूहन्ना 6:52-71

16 September : जिवाची अंतिम मेजवानी

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16 September : जिवाची अंतिम मेजवानी
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परमेश्वराजवळ मी एक वरदान मागितले, त्याच्या प्राप्तीसाठीं मी झटेन; ते हे कीं, आयुष्यभर परमेश्वराच्या घरात माझी वस्ती व्हावी; म्हणजें मी परमेश्वराचे मनोहर रूप पाहत राहीन व त्याच्या मंदिरात ध्यान करीन. (स्तोत्र 27:4)

भग्न व अनुतप्त आत्म्याला देव प्रतिसाद देणार नाहीं हे अशक्य आहे. तो धाव घेतो आणि आमचे पापाचे ओझे उचलतो आणि आमची अंत:करणें आनंद व उपकारस्तुतीनें भरतो. “तू माझा विलाप दूर करून मला नाचायला लावले आहेस; तू माझे गोणताट काढून मला हर्षरूपी वस्त्र नेसवले आहेस; ह्यासाठीं कीं माझ्या आत्म्याने तुझे गुणगान गावे, गप्प राहू नये; हे परमेश्वरा, माझ्या देवा, मी सर्वकाळ तुझे उपकारस्मरण करीन!” (स्तोत्र 30:11-12).

पण आपला हा आनंद आम्हांवर केवळ पूर्वी झालेंल्यां कृपेच्या कृतज्ञतेतून येत नाहीं. तर हा आनंद आम्हीं ज्यां भावी कृपेवर आशा ठेवितो त्यांतून सुद्धा येतो : “हे माझ्या जिवा, तू का खिन्न झालास? तू आतल्या आत का तळमळत आहेस? देवाची आशा धर; तो मला दर्शन देऊन माझा उद्धार करतो, म्हणून मी त्याचे पुनरपि गुणगान गाईन.” (स्तोत्र 42:5-6).

“मी याहवेहची वाट पाहतो, मोठ्या अपेक्षेने माझा जीव वाट पाहतो, आणि मी माझी आशा त्याच्या वचनावर टाकली आहे” (स्तोत्र 130:5-अनुवादक).

शेवटी, भग्न व अनुतप्त हृदय हे देवाकडून मिळणाऱ्या कोणत्याही चांगल्या दानांसाठीं नाहीं तर स्वतः देवासाठीं लुसलुसते. त्याचे दर्शन घेणें आणि त्याला ओळखणें व त्याच्या उपस्थितीत राहणें ही आमच्या जिवाची अंतिम मेजवानी आहे. यापलीकडें कोणताही शोधाशोध शिल्लक राहत नाहीं. माझ्याकडें शब्द नाहीं. आपण आपल्या शब्दांत ह्याला आनंद, हर्ष, सुख म्हणतो. परंतु हे केवळ त्या अकथनीय अनुभवाचे दुर्बळ सूचकमात्र आहेत :

“परमेश्वराजवळ मी एक वरदान मागितले, त्याच्या प्राप्तीसाठीं मी झटेन; ते हे कीं, आयुष्यभर परमेश्वराच्या घरात माझी वस्ती व्हावी; म्हणजें मी परमेश्वराचे मनोहर रूप पाहत राहीन व त्याच्या मंदिरात ध्यान करीन.” (स्तोत्र 27:4)

“तुझ्या सान्निध्यात पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातांत सौख्ये सदोदित आहेत” (स्तोत्र 16:11).

“परमेश्वराच्या ठायीं तुला आनंद होईल” (स्तोत्र 37:4).

15 सितम्बर : कमजोरी का लाभ

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15 सितम्बर : कमजोरी का लाभ
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“यह जो बड़ी भीड़ हम पर चढ़ाई कर रही है, उसके सामने हमारा तो बस नहीं चलता और हमें कुछ सूझता नहीं कि क्या करना चाहिए? परन्तु हमारी आँखें तेरी ओर लगी हैं।” 2 इतिहास 20:12

अपनी अक्षमताओं को देखने के लिए हमें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती—विशेषकर जब हम परमेश्वर के लिए जीने और उसकी सेवा करने की बात करें। जब जीवन की परिस्थितियाँ हम पर दबाव डालती हैं, तो हम अपने सामने खड़ी चुनौती की तीव्रता से महसूस करते हैं और जल्दी ही अपने आप को उससे पीछे हटते हुए पाते हैं। हम लोगों से यह सुनते-सुनते थक जाते हैं कि हम क्या कर सकते हैं, जबकि हमें यह पता होता है कि हम वह नहीं कर सकते; लेकिन हम एक ऐसे संसार में अपनी कमजोरी का सामना करने के लिए तैयार नहीं होते, जो हमें मजबूत और आत्मविश्वासी होने के लिए कहता रहता है। यदि आप स्वयं को इस स्थिति में पाते हैं, तो हिम्मत रखें। आप अकेले नहीं हैं।

यहूदा का राजा यहोशापात एक असाधारण व्यक्ति था, जिसने ऐसे बदलाव लागू किए जिन्होंने परमेश्वर के लोगों को परमेश्वर के व्यवस्था-विधान को फिर से खोजने में मदद की (2 इतिहास 19)। उसने उन्हें परमेश्वर के वचन को समझने और पालन करने के महत्त्व की याद दिलाई, ताकि वे परमेश्वर की सेवा विश्वासपूर्वक, पूरे दिल से और साहसिक रूप से कर सकें।

फिर भी, यहोशापात डर से अछूता नहीं था। जब यहूदा के शत्रुओं ने उसके देश को धमकी दी, तो वह अपनी जनता की अक्षमता और अपने शत्रुओं की श्रेष्ठता से भली-भाँति परिचित था। लेकिन उसे यह भी पता था कि अक्षमता का सही उत्तर पूरी तरह से परमेश्वर पर निर्भर होना था। जब उसने अपनी शक्ति की कमी और अनिश्चितता का सामना किया, तो उसने अपनी दृष्टि को ऊपर की ओर रखा और प्रार्थना की, “हमें कुछ सूझता नहीं कि क्या करना चाहिए, परन्तु हमारी आँखें तेरी ओर लगी हैं।”

जब शत्रु हमें यह कहकर चुप कराना चाहता है कि हम डरपोक हैं या पूरी तरह से बेकार हैं, तो हम उसके झूठ का सामना परमेश्वर के वचन के सत्य से कर सकते हैं और अपने आप से कह सकते हैं, “मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुममें अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलिप्पियों 1:6)। जब हम महसूस करते हैं कि हम प्रलोभन के खिलाफ लड़ाई में शक्तिहीन हैं, तो हम परमेश्वर के वचन के सत्य पर विश्राम कर सकते हैं और स्वयं से कह सकते हैं, “परमेश्‍वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10:13)। जब हमें लगता है कि हमें अकेला छोड़ दिया गया है, तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि “उसने आप ही कहा है, ‘मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा’” (इब्रानियों 13:5)।

जब हम अपनी कमजोरी को स्वीकार करते हैं, तो हमारा सामर्थी उद्धारकर्ता उसे हमारे भले और उसकी महिमा के लिए इस्तेमाल करेगा। जब हमें यह नहीं पता होता कि क्या करें, हम अपनी आँखें उस पर रख सकते हैं और उससे मार्गदर्शन और छुटकारे के लिए प्रार्थना कर सकते हैं, जैसे उसने यहोशापात और सम्पूर्ण यहूदा के लिए किया था (2 इतिहास 20:14-17, 22-25)।

जैसा कि बाइबल में परमेश्वर की सेवा करने वाले पुरुषों और महिलाओं के साथ हुआ, वैसे ही आज भी परमेश्वर अप्रत्याशित, संकोची और हिचकिचाने वाले लोगों को इस्तेमाल करना पसन्द करता है। जिस बात ने इन व्यक्तियों को अन्य सभी से अलग किया, वह उनकी ताकत, क्षमता या आत्मविश्वास नहीं था, बल्कि यह था कि वे अपनी कमजोरियों से हार नहीं गए थे; इसके बजाय, उन्होंने अपनी कमजोरियों को अपनाया और परमेश्वर की शक्ति पर निर्भर होकर उन्हें पार किया।

क्या आप भी ऐसा करेंगे?

1 इतिहास 20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: विलापगीत 1–2; यूहन्ना 6:22-51 ◊

15 September : एकमेव अक्षय आनंद

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15 September : एकमेव अक्षय आनंद
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“ह्याप्रमाणें तुम्हांला आता दुःख झालें आहे; तरी मी तुम्हांला पुन्हा भेटेन, आणि तुमचे अंतःकरण आनंदित होईल व तुमचा आनंद तुमच्यापासून कोणी काढून घेणार नाहीं.” (योहान 16:22)

“तुमचा आनंद तुमच्यापासून कोणी काढून घेणार नाहीं” कारण तुमचा आनंद हा येशूच्या सहवासातून येतो, आणि येशूच्या पुनरुत्थानाचा अर्थ असा कीं तुम्हांला कधीही मरण येणार नाहीं; तुम्हांला त्याच्यापासून कधीही विभक्त केलें जाणार नाहीं. 

तर मग, तुमचा आनंद तुमच्यापासून कधीही काढून घेतला जाणार नाहीं असे जर आहे तर दोन गोष्टी खऱ्या असणें साहजिक आहे. एक म्हणजें तुमच्या आनंदाचा झरा सर्वकाळासाठीं अक्षय आहे, आणि दुसरे म्हणजें तुम्हीं देखील अक्षय आहांत. जर तुम्हीं किंवा तुमच्या आनंदाचा झरा जर नश्वर आहांत तर तुमचा आनंद तुमच्यापासून काढून घेतला जाईल.

आणि हो, किती लोक असे आहेत जे नुसता नश्वरतेंत समाधानी होऊन बसले आहेत! ते म्हणतांत, खा, प्या आणि आनंद करा, कारण उद्या तर आपण मरणारच आहोत, बस, हेच आयुष्य आहे (लूक 12:19). अन्न हे अक्षय नाहीं आणि मीही अक्षय नाहीं. तेव्हा आपल्याला शक्य होईल तितका आपण खाण्या-पिण्याचा पुरेपूर फायदा घेऊ या. काय ही शोकांतिका!

जर तुम्हीं अशा विचारसरणीच्या परीक्षेत पडत असाल, तर मग माझी तुम्हांला कळकळीची विनंती आहे कीं तुम्हीं शक्य तितक्या गांभीर्याने यावर विचार करा कीं जर तुमचा आनंद हा येशूच्या सहवासातून येत आहे तर, “तुमचा आनंद तुमच्यापासून कोणी काढून घेणार नाहीं” – या जीवनातही नाहीं, व येण्याऱ्या जीवनातही नाहीं.

मरण, जीवन, देवदूत, अधिपती, वर्तमानकाळच्या गोष्टी, भविष्यकाळच्या गोष्टी, बले, उंची, खोली, किंवा दुसरी कोणतीही सृष्ट वस्तू, ख्रिस्त येशू आपला प्रभू ह्याच्यामध्यें असलेल्या आनंदपासून आपल्याला विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं (रोमकरांस 8:38-39).

येशूच्या सहवासांत असण्याचा जो आनंद आहे त्याची साखळी आतापासून अनंतकाळापर्यंत अखंड अशी आहे; ती तोडली जाऊ शकत नाहीं – त्याच्या मरणानेही नाहीं, वा आमच्या मरणानेही नाहीं.

14 सितम्बर : सेवा में साझेदारी

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“भाई अपुल्लोस से मैं ने बहुत विनती की है कि तुम्हारे पास भाइयों के साथ जाए।” 1 कुरिन्थियों 16:12

मसीह की देह एक व्यक्ति के अकेले काम करने की जगह नहीं है, विशेषकर सेवाकार्य के काम में। मसीही जीवन एक टीम का खेल है, कोई प्रतियोगिता नहीं। प्रेरित पौलुस आरम्भिक कलीसियाओं को लिखे अपने पत्रों में हमें इस बारे में बार-बार याद दिलाता है।

कुरिन्थियों की कलीसिया के आरम्भ में ही पौलुस जान गया था कि इस तरह के संघर्षों से खतरा हो सकता है और कुछ लोग अपुल्लोस की देखभाल को उसकी स्वयं की देखभाल से अधिक पसन्द करते थे (1 कुरिन्थियों 3:3-7)। यदि पौलुस अपने स्वयं के हितों का ध्यान रखता और अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने और कलीसिया को अपनी ओर खींचने के लिए काम करता, तो वह यह सुनिश्चित करता कि अपुल्लोस कभी कुरिन्थुस वापस नहीं लौटता। लेकिन हम पढ़ते हैं कि उसने ऐसा नहीं किया। बल्कि उसने इसके विपरीत किया। वह केवल यही चाहता था कि परमेश्वर का लोग सेवा प्राप्त करें। वह जानता था कि सेवाकार्य एक साझा प्रयास होना चाहिए।

परमेश्वर ने प्रारम्भिक कलीसिया में सेवाकार्य की टीम को अद्‌भुत तरीकों से तैयार किया। उदाहरण के लिए, तीमुथियुस को लें। पौलुस ने कुरिन्थियों से कहा, “यदि तीमुथियुस आ जाए, तो देखना कि वह तुम्हारे यहाँ निडर रहे; क्योंकि वह मेरे समान प्रभु का काम करता है। इसलिए कोई उसे तुच्छ न जाने, परन्तु उसे कुशल से इस ओर पहुँचा देना कि मेरे पास आ जाए; क्योंकि मैं उसकी बाट जोह रहा हूँ कि वह भाइयों के साथ आए” (1 कुरिन्थियों 16:10-11)। कई लोगों के लिए, तीमुथियुस सेवा के लिए अपर्याप्त प्रतीत हो सकता था: वह स्वभाव से संकोची था (शायद यही कारण था कि पौलुस ने कलीसिया को उसका अच्छे से स्वागत करने की याद दिलाई), शारीरिक रूप से कमजोर था (उसे अपने पेट के लिए थोड़ा दाखरस पीने के लिए जाना जाता था), और अधिकांश साथियों से उम्र में छोटा था (1 तीमुथियुस 4:12; 5:23)। लेकिन पौलुस जानता था कि परमेश्वर ने तीमुथियुस को एक कार्य सौंपा था, और वह उसे पूरा करने में उसकी मदद करना चाहता था।

कई अन्य पुरुषों और महिलाओं, जैसे फीबे, प्रिस्का, अक्विला, फूरतूनातुस और अखइकुस, ने भी पौलुस के साथ सेवाकार्य में सहभागिता की। इनमें से कोई भी एक जैसा नहीं दिखता था और न ही एक जैसा व्यवहार करता था। उनके वरदान भी एक जैसे नहीं थे। लेकिन फिर भी, वे सभी सेवाकार्य के काम में महत्त्वपूर्ण थे। यह बात आज की कलीसिया की देह के बारे में भी सच है: हम सभी को प्रभु द्वारा विभिन्न कार्यों की जिम्मेदारी दी गई है। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि हम केवल उन्हीं लोगों के साथ सेवा करने की प्रवृत्ति से बचें, जो हमारे जैसे हैं या जिनसे हम प्रभावित होते हैं। हमें यह नहीं कहना चाहिए, “मुझे तो केवल उसी का प्रचार पसन्द है,” “मैं केवल उसी की बात मान सकता हूँ,” या “मैं बस उसे पसन्द नहीं करता।” इसके बजाय, हमें परमेश्वर के सभी सेवकों के लिए आभारी होना चाहिए।

हममें से अधिकांश लोग अपने जीवन ऐसे जीएँगे कि कोई भी हमें हमारे तत्काल प्रभाव क्षेत्र के बाहर नहीं जान पाएगा। लेकिन हमारे कब्र के शिलालेख पर यह लिखना काफी हो सकता है, “यहाँ वह व्यक्ति विश्राम कर रहा है, जो दूसरों की मदद करने के लिए जाना जाता था।” क्या आप विश्वास करते हैं कि “यीशु के पास एक ऐसा कार्य है, जो केवल आप ही कर सकते हैं”?[1] जब परमेश्वर अपना हाथ आप पर रखता है और आपको एक कार्य सौंपता है, तो क्या आप उसे गम्भीरता से लेते हैं, भले ही वह महत्त्वहीन सा लगे? हमें एक साथ एक समुदाय के रूप में उसके राज्य के लिए एक एकीकृत टीम बनकर उसकी सेवा करनी है। आज अपना किरदार निभाने और दूसरों को उनका किरदार निभाने के लिए प्रोत्साहित करने में, आपको आनन्द और सन्तोष की अनुभूति होगी।

1 कुरिन्थियों 3:1-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 19–21; यूहन्ना 6:1-21


[1] एल्सी डंकन येल, “देयर्ज़ ए वर्क फॉर जीज़स” (1912).

14 September : देव तुमची सर्व गरज भागवील

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14 September : देव तुमची सर्व गरज भागवील
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माझा देव ख्रिस्त येशूमधील त्याच्या वैभवशाली समृद्धीनुसार तुमची सर्व गरज भागवील. (फिलिप्पै 4:19 RV-BSI)

फिलिप्पैकर 4:6 मध्यें, पौल म्हणतो, “कशाविषयीही चिंताक्रांत होऊ नका, तर सर्व गोष्टींविषयी प्रार्थना व विनंती करून आभारप्रदर्शनासह आपली मागणी देवाला कळवा.” आणि मग (केवळ 13 वचनांनंतर), फिलिप्पै 4:19 मध्यें तो चिंतामुक्त करणारे असे भावी कृपेविषयीचे अभिवचन देतो : “माझा देव ख्रिस्त येशूमधील त्याच्या वैभवशाली समृद्धीनुसार तुमची सर्व गरज भागवील.”

जर आपण भावी कृपेच्या या अभिवचनावरील विश्वासाने जगतो, तर चिंतेला निभाव करणें खूप कठीण होईल. देवाची “वैभवशाली समृद्धी” अक्षय आहे. आपण आपल्या भविष्याविषयी चिंताक्रांत होऊ नये अशी त्याची खरोखर इच्छा आहे.

पौलाने आपल्यासाठीं मांडलेल्या ह्या धोरणावर आपण चालावें. आपण भावी कृपेचे हे अभिवचन दृढ धरूनच चिंतारूपी अविश्वासाशी सुयुद्ध केलें पाहिजे.

जेव्हा मी एखादी धोकादायक नवी सेवा किंवा सार्वजनिक सभा यांविषयी चिंताक्रांत होऊन जातो, तेव्हा मी नेहमीच माझी जी सर्वात जास्त उपयोगांत आणली जाणारी अभिवचने आहेंत त्यांपैकीं एक म्हणजें यशया 41:10 हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी लढा देतो.

ज्या दिवशी मी पुढील तीन वर्षे जर्मनीत जाऊन राहण्यासाठीं अमेरिकेहून निघालो त्यावेळी माझ्या वडिलांनी मला दूरध्वनीवरून फोन करून हेच अभिवचन दिलें होते. प्रचंड ताणतणावातून बाहेर निघण्यासाठीं मी सलग तीन वर्षें हेच अभिवचन स्वतःला पाचशे वेळा तरी वाचून दाखविले असेल. “तू भिऊ नकोस, कारण मी तुझ्याबरोबर आहे, घाबरू नकोस, कारण मी तुझा देव आहे; मी तुला शक्ती देतो, मी तुझे साहाय्यही करता, मी आपल्या नीतिमत्तेच्या उजव्या हाताने तुला सावरतो.”

मी हे अभिवचन घेऊन इतक्या वेळा चिंतेशी लढा दिला आहे कीं जेव्हा माझे मन कोणताही विचार करित नसते, तेव्हा जो आवाज मला माझ्या मनांत ऐकू येतो तो यशया 41:10 चा आवाज असतो.

13 सितम्बर : कब तक? क्यों?

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13 सितम्बर : कब तक? क्यों?
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हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा? मैं कब तक तेरे सम्मुख “उपद्रव”, “उपद्रव”, चिल्लाता रहूँगा? क्या तू उद्धार नहीं करेगा? तू मुझे अनर्थ काम क्यों दिखाता है? क्या कारण है कि तू उत्पात को देखता ही रहता है?” हबक्कूक 1:2-3

हम यह मानने के प्रलोभन में आ सकते हैं कि हम पुराने नियम में वर्णित परिस्थितियों से बहुत दूर हैं। लेकिन जब हम इन पदों में हबक्कूक की शिकायत को पढ़ते हैं, तो हम यह पहचान सकते हैं कि हालाँकि हम काल और स्थान में दूर हैं, फिर भी हम उस परिस्थिति से बहुत दूर नहीं हैं जिसमें वह स्वयं था।

हबक्कूक ने परमेश्वर के लोगों के बीच के मुद्दों का वर्णन किया। वे उन चीजों से भटक चुके थे जिन्हें परमेश्वर ने उनके लिए निर्धारित किया था, और कोई अन्त दिखाई नहीं दे रहा था। और इससे भी बुरी बात यह थी कि परमेश्वर हस्तक्षेप करता प्रतीत नहीं हो रहा था। हबक्कूक की दृष्टि में यह समस्या दोहरी थी: परमेश्वर का समय (तू कब तक गलत को सहन करता रहेगा?) और परमेश्वर की सहिष्णुता (तू इसको सहन क्यों करता है?)। ये प्रश्न आज भी कई विचारशील विश्वासियों के होंठों पर होते हैं जब वे कलीसिया को देखते हैं: “यह कब तक चलेगा? ऐसा क्यों है कि अच्छा, नैतिक, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, जिसकी हम सेवा करते हैं, उन लोगों के बीच आध्यात्मिक और नैतिक पतन को सहन करता है, जो स्वयं को उसके अनुयायी कहते हैं?”

क्या आप कभी इन प्रश्नों से जूझे हैं? आप अकेले नहीं हैं; यह कोई नया मुद्दा नहीं है। परमेश्वर के विश्वासयोग्य लोग इतिहास भर में इससे जूझते रहे हैं। यहाँ दो अवलोकन हैं जो हमें हमारे जीवन के “कब तक” वाले प्रश्नों के साथ संघर्ष करते समय सहायक हो सकते हैं।

पहला, हम आभारी हो सकते हैं कि परमेश्वर हमारी समय-सीमा में हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर देने के लिए इतना कठोर नहीं हैं। परमेश्वर की देरी हमेशा उद्देश्यपूर्ण होती है। उसका दृष्टिकोण हमारी कल्पना से कहीं अधिक व्यापक है। वह इसलिए देरी कर सकता है, ताकि वह हमारे स्वार्थ से या हमारे जीवन के किसी अवज्ञा के क्षेत्र से निपट सके, हमें उस पर विश्वास करना सिखा सके, या हमें हमारे स्वयं से बचा सके। यही कारण है कि बाइबल हमें अक्सर प्रभु की प्रतीक्षा करने के लिए कहती है। हमारी निराशाएँ, विफलताएँ, और भ्रम परमेश्वर के शाश्वत उद्देश्य की समग्र सुरक्षा में लाए जा सकते हैं।

दूसरा, हम भविष्यद्वक्ता के उदाहरण का पालन कर सकते हैं और परमेश्वर से सहायता की मांग कर सकते हैं। हबक्कूक ने अपनी शिकायत को उसी स्थान पर रखा जहाँ हमें अपनी शिकायतें रखनी चाहिएँ: अर्थात प्रभु के पास। उसने पहचान लिया कि भजनकार क्या कहता है: “मुझे सहायता यहोवा की ओर से मिलती है, जो आकाश और पृथ्वी का कर्ता है” (भजन 121:2)। बहुत से धार्मिक विश्वासी भजनों के माध्यम से अपने भ्रम और प्रश्नों को परमेश्वर के पास लेकर आए। इससे हमें भी ऐसा ही करने की अनुमति मिलती है। जब हम “कब तक?” और “क्यों?” कहकर पुकारते हैं, तो वह हमारी व्यथा को समझता है। उसका अन्तिम उत्तर हमें यीशु और उसकी विजय में दिया गया है। वह अंधेरी रात के बाद सुबह की किरण लाने में आनन्दित होता है। इसलिए जब आप अपने दिल को या जीवन को, या कलीसिया को देखते हैं, और यह पूछने के लिए प्रेरित होते हैं, “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा?” तो आप इस प्रकार के शब्दों में सान्त्वना पा सकते हैं:

परमेश्वर अभी भी सिंहासन पर है,

और वह अपने लोगों को याद रखेगा;

हालाँकि संकट हमें दबाते हैं और बोझ हमें कष्ट देते हैं,

वह हमें कभी अकेला नहीं छोड़ेगा।[1]

भजन 121

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: न्यायियों 16–18; यूहन्ना 5:25-47 ◊


[1] किट्टी एल. सफ्फील्ड, “गॉड इज़ स्टिल ऑन द थ्रोन” (1929).

13 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 3

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13 September : चिंता न करण्याची 7 कारणें, भाग 3
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“ह्यास्तव ‘काय खावे? काय प्यावे? काय पांघरावे?’ असे म्हणत चिंता करत बसू नका. (कारण ह्या सर्व गोष्टी मिळवण्याची धडपड परराष्ट्रीय लोक करत असतांत.) तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे. तर तुम्हीं पहिल्याने देवाचे राज्य व त्याचे नीतिमत्त्व मिळवण्यास झटा म्हणजें त्यांच्याबरोबर ह्याही सर्व गोष्टी तुम्हांला मिळतील. ह्यास्तव उद्याची चिंता करू नका, कारण उद्याची चिंता उद्याला; ज्या दिवसाचे दुःख त्या दिवसाला पुरे.” (मत्तय 6:31-34)

आपण गेल्या दोन दिवसांत पाहिले आहे कीं मत्तय 6:25-34 मध्यें येशूनें योजिलेली अशी किमान सात अभिवचनें आहेंत, जी आम्हांला विश्वासासंबंधीचे जे सुयुद्ध ते लढण्यास आणि चिंतामुक्त होण्यास मोठे सहाय्य पुरवितांत. आज आपण अंतिम तीन अभिवचने पाहूं.

अभिवचन #5: “ह्यास्तव ‘काय खावे? काय प्यावे? काय पांघरावे?’ असे म्हणत चिंता करत बसू नका. (कारण ह्या सर्व गोष्टी मिळवण्याची धडपड परराष्ट्रीय लोक करत असतांत.) तुम्हांला ह्या सर्वांची गरज आहे हे तुमचा स्वर्गीय पिता जाणून आहे.” (मत्तय 6:31-32)

देवाला तुमच्या गरजां माहित नाहीं असे समजू नका. तो त्यां सर्व गरजां जाणून आहे. शिवाय तो “तुमचा स्वर्गीय पिता” आहे. तो तटस्थ किंवा बेपर्वा अशी भूमिका घेऊन दुरू उभा राहून पाहत नाहीं. तो काळजी करतो. त्यानें ठरविलेल्या योग्य वेळी तो तुमच्या गरजां भागविल.

अभिवचन # 6: “तर तुम्हीं पहिल्याने देवाचे राज्य व त्याचे नीतिमत्त्व मिळवण्यास झटा म्हणजें त्यांच्याबरोबर ह्याही सर्व गोष्टी तुम्हांला मिळतील.” (मत्तय 6:33)

जर तुम्हीं तुमच्या खाजगी भौतिक गरजांविषयी चिंता करित बसण्याऐवजी, या जगात त्याचा उद्देश्य सिद्धीस न्यावयांस त्याच्या नामास्तव स्वतःचे जीवन ओतून द्याल तर त्याचा उद्देश्य सिद्धीस न्यावयांस आणि त्याचे गौरव व्हावे म्हणून तुमच्याकडें सर्व काहीं आहे याची खात्री तो स्वतः करून घेईल. “ह्याही सर्व गोष्टी तुम्हांला मिळतील.” म्हणजें काय खावे, काय प्यावे, काय पांघरावे त्यां सर्व गरजां- आणि त्याचबरोबर इतर गरजां देखील – ज्यां तुम्हांला त्याची इच्छा पूर्ण करण्यांसाठीं आणि त्याचे गौरव करण्यासाठीं आवश्यक आहेत. याचा अर्थ असा असू शकतो कीं तुम्हीं त्याच्यासाठीं मरावे हा त्याचा उद्देश आहे, परंतु तो त्याच्या गौरवासाठीं तुम्हांला आवश्यक असलेल्या सर्व गोष्टी पुरवील.

हे अगदी रोमकरांस 8:32 मध्यें असलेल्या अभिवचनासारखे आहे, “[देव] त्याच्या [ख्रिस्ता] बरोबर आपल्याला सर्वकाहीं कसे देणार नाहीं?” मग पुढे असे लिहिले आहे, “ख्रिस्ताच्या प्रीतिपासून कोण आपल्याला वेगळे करील? संकट किंवा दुःख, पाठलाग, भूक किंवा नग्नता, आपत्ती किंवा तलवार करील काय?  कारण पवित्र शास्त्रात असे लिहिले आहे कीं, ‘तुझ्याकरता आम्हीं दिवसभर मारले जात आहोत, आम्हीं वधाच्या मेंढराप्रमाणें गणलेले आहोत.’ पण ज्याने आपल्यावर प्रीति केलीं, त्याच्याद्वारे या सर्व गोष्टींत आपण महाविजयी ठरतो.” (रोमकरांस 8:35-37). भूक किंवा नग्नता यां येऊ शकतांत. परंतु आपल्याला यां सर्व गोष्टींत महाविजयी होण्यासाठीं आवश्यक असलेल्यां सर्व वस्तु आपल्याकडें असतील.

अभिवचन # 7: “ह्यास्तव उद्याची चिंता करू नका, कारण उद्याची चिंता उद्याला; ज्या दिवसाचे दुःख त्या दिवसाला पुरे.” (मत्तय 6:34)

तुमची कसोटी तुमच्या शक्तीपलीकडें कधीही होऊं नये याची देव खात्री करून घेतो (1 करिंथ 10:13). तो तुमच्याठायीं आपलें कार्य सिद्धीस नेईल, जेणेंकरून तुमचे “सामर्थ्य आयुष्यभर कायम” राहावे (अनुवाद 33:25).

प्रत्येक दिवसाचे दुःख हे त्या दिवसाला ठरविलेले आहे. परंतु त्याच्या करुणेंमुळें ते दुख तुमच्या शक्तीपलीकडें कधीही जात नाहीं. आमच्यावर दररोज करुणा केलीं जाईल जी रोज सकाळी नवी होते – आणि ती त्या दिवसाच्या दुखासाठीं पुरे आहे (विलाप 3:22-23). तो तुमच्याकडून असे कोणतेही चांगले काम करून घेणार नाहीं जे सिद्धीस नेण्यांस तो स्वतः तुम्हांला आवश्यक असलेली सर्व कृपा पुरवणार नाहीं (2 करिंथ 9:8).