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26 जुलाई : परमेश्वर-केन्द्रित एकाग्रता

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26 जुलाई : परमेश्वर-केन्द्रित एकाग्रता
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“मैं दाखलता हूँ : तुम डालियाँ हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।” यूहन्ना 15:5

शौकिया फोटोग्राफर्स अक्सर यह नहीं जानते कि वे किस पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे जानते हैं कि वे किस पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, लेकिन फिर तस्वीरों में धुंधले चेहरे और टेढ़ी-मेढ़ी इमारतें दिखाई देती हैं। फिर वे अपनी तस्वीरों को देखते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं, “यह वह नहीं है जिस पर मैं ध्यान केन्द्रित कर रहा था!” लेकिन हकीकत यह है कि तस्वीरें बिल्कुल वही दिखाती हैं जिस पर उनके कैमरे का लेंस केन्द्रित था।

जिन्दगी के उतार-चढ़ाव में और हर एक पल में हम जिस तरह से हालातों पर प्रतिक्रिया करते हैं, वह हमारे दिल और दिमाग के ध्यान के केन्द्र को प्रकट कर देता है। इसलिए विश्वासियों के लिए चुनौती यह है कि वे परमेश्वर पर अपना ध्यान केन्द्रित करके जीएँ।

यीशु ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि हमें परमेश्वर पर अपना ध्यान केन्द्रित करना है, तो सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि हम उसके बिना कौन हैं। वास्तव में, यीशु ने अपने शिष्यों से कह दिया था कि उसके बिना वे कुछ भी नहीं कर सकते; आखिरकार, “सब वस्तुएँ उसी में स्थिर रहती हैं” (कुलुस्सियों 1:17)। हमें यीशु की ज़रूरत केवल आंशिक तौर पर नहीं है, बल्कि पूरी तरह से है। हम परमेश्वर की मदद के बिना तो एक सांस भी नहीं ले सकते। जो भी कार्य वह हमारे द्वारा कर रहा है, उसका कोई भी श्रेय हम कैसे ले सकते हैं? दिव्य सहायता के बिना हम पूरी तरह से अभाव में हैं।

यह सिद्धान्त पूरी बाइबल में पाया जाता है। मूसा ने, जिसे परमेश्वर ने इस्राएली लोगों को बन्धन और गुलामी से मुक्त करने के लिए चुना था, दृढ़ता से कहा कि वह यह कार्य तब तक नहीं कर सकता जब तक परमेश्वर उसके साथ नहीं होता—और वह सही था (निर्गमन 3:11-12)। आमोस अंजीर के पेड़ों का किसान और भेड़ों का चरवाहा था; जब परमेश्वर ने उसे भविष्यवक्ता के रूप में नियुक्त किया, तो उसके पास सेवाकार्य में योगदान देने के लिए कुछ नहीं था (आमोस 7:14-15)।

इसी प्रकार दानिय्येल, जिसने अद्‌भुत तरीके से सपनों का अर्थ बताया, सारा श्रेय परमेश्वर को देने में तत्पर था (दानिय्येल 2:26-28)। इन सभी पुरुषों ने परमेश्वर पर अपनी पूरी निर्भरता को पहचाना। वास्तव में, बाइबल में परमेश्वर के लिए महान कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से परमेश्वर पर निर्भर हुए बिना ऐसा कर ही नहीं सकता था। जिस कार्य को करने के लिए उन्हें बुलाया गया था, उसे पूरा करने की क्षमता के लिए उन्होंने अपने भीतर देखने के बजाय ऊपर परमेश्वर की ओर देखा।

एक मसीही के रूप में, हमें परमेश्वर पर ध्यान केन्द्रित करके जीने के लिए अपने आप पर या अपनी क्षमताओं पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से हम अपने जीवन में परमेश्वर के अनुग्रह और शक्ति को छिपा सकते हैं। मसीह में, हमें अपनी क्षमताओं पर घमण्ड नहीं करना है या अपने आप को आकर्षित करने का कोई अवसर नहीं ढूँढना है। बल्कि हमें केवल जीवित परमेश्वर के सेवक के रूप में पहचाने जाने की इच्छा रखनी है और उसकी सेवा में उपयोगी बनना है, जब वह हमारे अन्दर अपने अच्छे उद्देश्य के अनुसार कार्य करता है, और जो भी हम करते हैं या कहते हैं, उसमें हम ध्यान अपने ऊपर न लाकर उसके ऊपर लेकर आएँ।

आज आपका ध्यान कहाँ होगा? और जब सफलता या प्रशंसा आपकी ओर आएँगे, तो इसका श्रेय आप किसे देंगे?

लूका 17:7-19

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 40–42; प्रेरितों 18

26 July : द्रव्याचा लोभ धरणें म्हणजें काय

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26 July : द्रव्याचा लोभ धरणें म्हणजें काय
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कारण द्रव्याचा लोभ सर्व प्रकारच्या वाइटाचे एक मूळ आहे. (1 तीमथ्य 6:10)

पौलाने हे लिहिले तेव्हा त्याला काय म्हणायचे होते? तुम्हीं पाप करता तेव्हा पैसा तुमच्या मनात असतो असा त्याचा अर्थ असू शकत नाहीं. आपण अशावेळी देखील पुष्कळ पापें करीत असतो जेव्हा आपल्या डोक्यांत पैशांचा तिळमात्रहि विचार नसतो.

मी त्याचा असा अर्थ सुचवितो : त्याला असे म्हणायचे होते कीं जगात असलेल्यां सर्व वाईट गोष्टी एका विशिष्ट प्रकारच्या अंत:करणांतून येतांत, म्हणजें अशा अंत:करणांतून ज्याला द्रव्याचा लोभ असतो.

मग द्रव्याचा लोभ म्हणजें काय? हिरव्या कागदाची किंवा तांब्याची नाणी किंवा चांदीची नाणी यांची पूजा करणें असा त्याचा अर्थ होत नाहीं. द्रव्याचा लोभ म्हणजें काय हे जाणून घेण्यासाठीं तुम्हांला हा प्रश्न करावा लागेल, द्रव्य किंवा पैसा म्हणजें नेमके काय? मी या प्रश्नाचे उत्तर असे देईन : द्रव्य किंवा पैसा हे फक्त मानव तरतुदींचे एक साधन आहे. द्रव्य म्हणजें देवाकडून मिळविण्याऐवजी तुम्हीं माणसांकडून — इतर मानवांकडून — जे काहीं मिळवू शकता तें.

देव पैशाच्या नव्हे तर कृपेच्या चलनात व्यवहार करतो: “हो तान्हेल्यांनो, तुम्हीं सर्व जलाशयाकडें या, जवळ पैसा नसलेले तुम्हीं या; सौदा करा, खा!” (यशया 55:1). पैसा हे मानवी संसाधनांचे चलन आहे. म्हणून, जें अंत:करण पैशावर प्रीति करते ते असे अंत:करण आहे जे मानवी संसाधने आपल्याला काय देऊ शकतांत यांवर आपली सर्व आशा अडकवून ठेवते, आपल्या सर्व सुखांचा शोध त्यांत घेते व त्यावर भरवसा ठेवते.

अशाप्रकारे, द्रव्याचा लोभ हे अक्षरशः पैशावर असा विश्वास– भरवसा (विश्वास, खात्री) ठेवण्यासारखेच आहे कीं तुमच्या सर्व गरजा पैशानेच पूर्ण होतील आणि त्यातंच तुमचे सर्व सुख व समाधान आहे.

द्रव्याचा लोभ (किंवा पैशावर प्रीति करणें) हा देवाच्या भावी कृपेवरील विश्वासाची जागा घेतो. हे भविष्यासाठीं मानवी संसाधनांवर विश्वास ठेवणें आहे – म्हणजें अशी गोष्ट जी तुम्हीं पैशाने मिळवू शकता किंवा जी तुम्हीं राखून ठेऊ शकता. म्हणून पैशावर प्रेम करणें किंवा पैशावर विश्वास ठेवणें, हे देवाच्या वचनांवर अविश्वासाची खोली आहे. येशूनें मत्तय 6:24 मध्यें म्हटलें, “कोणीही दोन धन्यांची चाकरी करू शकत नाहीं……तुम्हीं देवाची आणि धनाची चाकरी करू शकत नाहीं.”

तुम्हीं एकाच वेळी देवावर आणि पैशावर भरवसा ठेवू शकत नाहीं. एकावर विश्वास म्हणजें दुसऱ्यावर अविश्वास. जे अंत:करण पैशावर प्रीति करते – जे आनंदासाठीं पैशावर अवलंबून राहते – ते अंत:करण आपल्या आत्म्याची तृप्ती म्हणून येशूमध्यें देव आपल्यासाठीं जो कांही आहे त्यावर अवलंबून राहत नाहीं.

25 जुलाई : अनुग्रह, दया, और शान्ति

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25 जुलाई : अनुग्रह, दया, और शान्ति
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“प्रिय पुत्र तीमुथियुस के नाम : परमेश्‍वर पिता और हमारे प्रभु मसीह यीशु की ओर से तुझे अनुग्रह और दया और शान्ति मिलती रहे।” 2 तीमुथियुस 1:2

पौलुस अपने पत्रों में जिस तरह से तीमुथियुस को सम्बोधित करता है, वह बहुत ही प्रभावशाली है। वह इस युवक से किसी प्रकार की दूरी बनाकर नहीं रखता, बल्कि पौलुस उसे अपने “प्रिय पुत्र,” “प्रिय बालक,” और सुसमाचार की घोषणा में एक “सहकर्मी” के रूप में सम्बोधित करता है (2 तीमुथियुस 1:2; 1 कुरिन्थियों 4:17; रोमियों 16:21)।

आरम्भ में, हमें यह शायद नहीं लगेगा कि तीमुथियुस पौलुस के शब्दों या पत्रों को प्राप्त करने के लिए एक स्पष्ट विकल्प था, कम से कम मानवीय दृष्टिकोण से तो बिल्कुल भी नहीं। वह एक मजबूत या परिपक्व व्यक्ति नहीं था, बल्कि अपेक्षाकृत युवा, शारीरिक रूप से कमजोर और स्वभाव से संकोची था—एक ऐसा व्यक्ति जो शायद अपने कार्य के लिए अपर्याप्त अनुभव वाला लगता था। जब वह चिन्तित होता, तो यह उसके पेट को प्रभावित करता था (1 तीमुथियुस 5:23)। वह एक उच्च गुणवत्ता वाला उम्मीदवार नहीं था। वास्तव में, यह कोई असामान्य बात नहीं है। अधिकांश विश्वासियों का हाल यही है। आप और मैं भी ऐसे ही हैं।

फिर भी, तीमुथियुस परमेश्वर का जन था।

वह परमेश्वर का जन था क्योंकि परमेश्वर ने उसे चुना था। परमेश्वर उन पुरुषों और महिलाओं को चुनने में आनन्दित होता है, जो अपेक्षाकृत युवा, स्वाभाविक रूप से कमजोर, शारीरिक रूप से कमजोर या स्वाभाविक रूप से संकोची होते हैं, और कहता है, मैंने तुम लोगों को इस काम के लिए चुना है। तुम मेरे चुने हुए सेवक हो और मैंने तुम्हें इस कार्य के लिए चुना है।

18वीं सदी के प्रचारक जॉर्ज व्हाइटफील्ड को परमेश्वर ने हजारों लोगों को उद्धार की ओर लाने के लिए उपयोग किया। फिर भी, वह अक्सर अपने सेवाकार्य के विचार से अभिभूत हो जाता था। एक बार, टॉवर ऑफ लंदन के चैपल में प्रचार के लिए जाते समय व्हाइटफील्ड ने लिखा, “जब मैं सीढ़ियों पर चढ़ रहा था, तो लगभग सभी लोगों ने मेरी युवावस्था के कारण मुझे ताना मारा; लेकिन वे जल्दी ही गम्भीर हो गए और बहुत ध्यान से सुनने लगे।”[1] उनके श्रोताओं की प्रतिक्रिया क्यों बदल गई? इसका उत्तर सरल है— तीमुथियुस के समान व्हाइटफील्ड भी परमेश्वर का चुना हुआ जन था।

तीमुथियुस को पौलुस का अभिवादन कितना सुकून देता होगा, जो उसे उसके संसाधनों की याद दिलाता था! परमेश्वर ने तीमुथियुस को उद्धार दिया थी और नियुक्त किया था, और परमेश्वर परीक्षणों के लिए अनुग्रह, विफलताओं के लिए दया, और खतरों तथा शंकाओं के सामने शान्ति प्रदान करने वाला था।

आज आपको और मुझे किसकी आवश्यकता है? ठीक वही जिसकी आवश्यकता तीमुथियुस को थी: अनुग्रह, दया, और शान्ति। जो कुछ भी तीमुथियुस के लिए उपलब्ध था, वही हमारे लिए भी उपलब्ध है। इसलिए आप परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं और जो प्रावधान उसने आपके लिए मसीह में तैयार किए हैं, उन पर निर्भर हो सकते हैं। उनके संसाधन आपकी हर एक आवश्यकता को पूरा करने के लिए और उस हर एक कार्य को सम्पूर्ण करने के लिए पर्याप्त हैं, जिसे करने के लिए उसने आपको बुलाया है।

  2 तीमुथियुस 1:1-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 37–39; प्रेरितों 17:16-34 ◊


[1] जॉर्ज व्हाइटफील्डज़ जरनल्स (1737-1741), सम्पादक विलियम वी. डेविस (स्कॉलर्स फैक्सिमलीज़ ऐण्ड रिप्रिण्ट्स, 1969), पृ. 57.

25 July : सैतानाची रणनीती आणि तुमचा बचाव

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25 July : सैतानाची रणनीती आणि तुमचा बचाव
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सावध असा, जागे राहा; तुमचा शत्रू सैतान हा गर्जणार्‍या सिंहासारखा कोणाला गिळावे हे शोधत फिरतो. त्याच्याविरुद्ध विश्वासात दृढ असे उभे राहा. (1 पेत्र 5:8-9)

आपल्या जिवाचे दोन मोठे शत्रू पाप व सैतान हें आहेत. यांत सर्वात वाईट शत्रू पाप हा आहे, कारण सैतान ज्यां एकमेव रणनीतीने आपला नाश करू शकतो तो म्हणजें आपल्याला पाप करायला लावणें आणि आपल्याला पश्चात्ताप करण्यापासून रोखून ठेवणें. केवळ एकच गोष्ट जिचा परिणाम मरण आहे ती म्हणजें अक्षम्य पाप. सैतान नाहीं.

त्यानें आपल्याला पीडावे, कीं बहुंना आपल्याला जिवें देखील मारावें अशी देव स्वतः त्याला काहीं काळासाठीं परवानगी देऊं शकतो, जसे त्यानें इयोबाच्या बाबतींत केलें, किंवा जसें त्यानें स्मुर्णा येथील पवित्र जनांच्या बाबतींत केलें (प्रकटीकरण 2:10); पण सैतान आपला सार्वकालिक नाश करू शकणार  नाहीं वा आपलें सार्वकालिक जीवन हिरावून घेऊ शकत नाहीं. त्याची एकमेव रणनीती ज्याद्वारे तो आपल्याला अंतिम हानी पोहोचवू शकतो ती म्हणजें आपल्याला पापांत पाडणें आणि मग पश्चात्ताप करण्यापासून दूर ठेवणें; तोच त्याचा मुख्य हेतू आहे.

तर मग, आपल्याला पापांत पाडणें, त्याचे समर्थन करणें, त्यासाठीं उत्तेजन देणें, त्यांत सहाय्य करणें, त्यांत असलेल्या आनंदाकडें आकर्षित करणें आणि आपला कल पापाकडेंच असावा याची खात्री करून घेणें, आणि एवढेच काय तर आम्हांला विश्वास आणि पश्चात्ताप यांपासून दूर ठेवणें, हाच सैतानाचा मुख्य नित्यक्रम आहे.

आपण हे इफिसकरांस पत्र 2:1-2 मध्यें पाहू शकतो: “तुम्हीं आपलें अपराध व आपली पातके ह्यांमुळें मृत झालेंले होता; त्या पातकांमध्यें तुम्हीं पूर्वी चालत होता. . . अंतरिक्षातील राज्याचा अधिपती… ह्याच्या धोरणाप्रमाणें चालत होता.” ह्या जगात पाप करणें हे सैतानाच्या “धोरणाप्रमाणें” चालणें होय. जेव्हा तो नैतिकदृष्ट्या एखादी वाईट गोष्ठ घडवून आणत असतो, ती तो पापाद्वारे घडवून आणत असतो. आपण पाप करतो तेव्हा आपण त्याच्या क्षेत्रात वावरत असतो. आपण त्याच्या धोरणाशी सहमत होतो. आपण पाप करतो तेव्हा आपण सैतानाला वाव देतो (इफिस 4:27).

न्यायाच्या दिवशी आपल्याला दोषी ठरवणारी एकमेव गोष्ट म्हणजें क्षमा न झालेंलें पाप – आजारपण किंवा त्रास किंवा छळ किंवा भीती किंवा भयप्रद स्वप्ने ह्या गोष्टीं नव्हे. सैतानाला हे माहीत आहे. म्हणूनच, त्याचा प्राथमिक जोर ख्रिस्ती लोकांना विचित्र घटनांनी कसे घाबरवायचे यावर नसतो (जरी अशा घटना पुष्कळ होतांत ), तर ख्रिस्ती लोकांना व्यर्थ गोष्टींची मोहिनी घालून त्यांना वाईट विचारांनी कसे भ्रष्ट करावे यावर आहे.

सैतान अशा वेळी आपल्याला गिळून टाकण्याच्या शोधांत असतो ज्यावेळी आपला विश्वास दृढ नसतो, जेव्हा तो भेद्य असतो. ही गोष्ट समजण्यास सोपी आहे कीं सैतानाला ज्या गोष्टीचा नाश करायचा असतो नेमकीं तिच त्याच्या प्रयत्नांचा प्रतिकार करण्याचे शस्त्र आहे. म्हणूनच पेत्र म्हणतो, “त्याच्याविरुद्ध विश्वासात दृढ असे उभे राहा” (1 पेत्र 5:9). म्हणूनच पौल सुद्धा म्हणतो कीं “विश्वासाची ढाल” “त्या दुष्टाचे सगळे जळते बाण विझवते” (इफिस 6:16).

सैतानाचा जर पराभव करायचा असेल तर त्यासाठीं एकमेव रणनीती म्हणजें ही कीं तो ज्या गोष्टीचा नाश करण्याचा सर्वात जास्त प्रयत्न करीत असतो – तो म्हणजें तुमचा विश्वास- त्यांत दृढ असे उभे राहणें.

24 जुलाई : अधर्मी क्रोध

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24 जुलाई : अधर्मी क्रोध
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“अपनी पत्नी की ये बातें सुनकर कि तेरे दास ने मुझसे ऐसा-ऐसा काम किया, यूसुफ के स्वामी का कोप भड़का। और यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहाँ राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया; अतः वह उस बन्दीगृह में रहा।” उत्पत्ति 39:19-20

पोतीपर लोगों को परखने में माहिर था। फिरौन के अधिकारी और गार्ड के कप्तान के रूप में उसके जीवन के अधिकांश समय में कई लोग उसकी अधीनता में रहे होंगे। उसके अनुभव ने उसे यह देखने में सक्षम बनाया कि यूसुफ में कुछ खास बात थी।

यूसुफ अन्य नौकरों जैसा नहीं था; वह सबसे अच्छा नौकर था। पोतीपर के सभी कार्य यूसुफ की देखरेख में समृद्ध हुए थे, और पोतीपर ने सब कुछ उसकी देखरेख में सौंप दिया था—सिर्फ अपनी पत्नी को छोड़कर बाकी सब कुछ।

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब पोतीपर की पत्नी ने यूसुफ पर बलात्कार के प्रयास का आरोप लगाया, तो पोतीपर ने गुस्से और क्रोध में प्रतिक्रिया की। कोई भी सम्मानजनक पति इसी तरीके से प्रतिक्रिया करेगा। इस तरह की सुरक्षा बिल्कुल सही है और हमें पोतीपर से इसी प्रकार की प्रतिक्रिया की अपेक्षा करनी चाहिए।

पोतीपर की गलती उसकी प्रारम्भिक प्रतिक्रिया में नहीं थी, बल्कि यह थी कि उसने यूसुफ के खिलाफ निर्णय सुनाने में बहुत जल्दबाजी की थी। इस बारे में कोई उल्लेख नहीं है कि पोतीपर ने दी गई जानकारी की सही से जाँच की, और न ही उसने अपनी पत्नी के आरोप पर यूसुफ की ईमानदारी के सन्दर्भ में विचार किया। इसके बजाय, पोतीपर ने अपने क्रोध को अपने निर्णय से अधिक प्रभावी होने दिया। क्रोध ने पोतीपर को सत्य और तर्क के प्रति अंधा कर दिया।

साथ ही, पोतीपर अपनी पत्नी के अत्यधिक प्रभाव में भी था। बेशक, हम सभी अपने करीबी साथियों से प्रभावित होते हैं और कई बार यह सहायक भी होता है। लेकिन हमें परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य किसी से भी अत्यधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए। जब हम निर्णय लेने के समय इस प्रकार के प्रभाव को स्वीकार करते हैं, तो हम न केवल अपने आप को, बल्कि अपने आस-पास के सभी लोगों को भी खतरे में डाल देते हैं। इसके बजाय, हमें “सम्मति देने वालों की बहुतायत” में सुरक्षा और विजय प्राप्त करनी चाहिए (नीतिवचन 11:14; 24:6), जो हमें हर परिस्थिति में परमेश्वर के वचन की बुद्धि की ओर ले चलेंगे। निर्णय और उसके परिणाम जितने बड़े होंगे, हमें उतनी ही अधिक सलाह की और उतनी ही अधिक प्रार्थना की आवश्यकता पड़ेगी।

पोतीपर ने अपने गुस्से में एक निर्णय लिया—और वह निर्णय अन्यायपूर्ण था। अनियन्त्रित क्रोध मन को अंधा कर देता है। एक बार भड़क जाने पर इसे शान्त करना आसान नहीं होता है। लेकिन यहाँ तक कि उन परिस्थितियों में भी जहाँ अन्याय या पाप के प्रति सही प्रतिक्रिया क्रोध हो (और हम उस प्रभु का अनुसरण करते हैं जिसने उचित समय पर क्रोध किया—मरकुस 11:15-18 देखें), तौभी हमें गुस्से को अपनी भावनाओं प्रभावित करने और अपने निर्णयों को निर्देशित करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। जल्दी से परमेश्वर से पूछें कि क्या आपके जीवन में मौजूदा क्रोध का कोई स्रोत है, ताकि आप आवश्यकतानुसार पश्चाताप कर सकें, जब बुलाया जाए तो क्षमा कर सकें और बुद्धि और विश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

गलातियों  5:16-24

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 35–36; प्रेरितों 17:1-15

24 July : येशू आपली मेंढरे राखतो

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24 July : येशू आपली मेंढरे राखतो
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“शिमोना, शिमोना, पाहा, तुम्हांला गव्हासारखे चाळावे म्हणून सैतानाने मागणी केलीं; परंतु तुझा विश्वास ढळू नये म्हणून तुझ्यासाठीं मी विनंती केलीं आहे; आणि तू वळलास म्हणजें तुझ्या भावांना स्थिर कर.” (लूक 22:31-32)

वास्तविक पाहता, जरी पेत्र तीन वेळा येशूचा नकार केल्यामुळें वाईटरित्या अयशस्वी झाला, तरी येशूनें त्याच्यासाठीं विनंती करून त्याला पूर्णपणें नाश होण्यापासून वाचवले. तो मोठ्या दुःखाने रडला; त्यानंतर त्याला पुन:स्थापित करण्यांत आलें जे पेन्टेकॉस्टच्या दिवशी पेत्रानें दिलेंल्या उपदेशांत त्याचा आनंद व धैर्य यांमध्यें स्पष्ट दिसून आलें. आपला विश्वास ढळू नये म्हणून येशू आज देखील आपल्यासाठीं मध्यस्थी करत आहे. पौल हे रोमकरांस 8:34 मध्यें सांगतो.

येशूनें अभिवचन दिलें कीं तो आपल्या मेंढरांचे संरक्षण करील; त्यांचा कधीही नाश होणार नाहीं. “माझी मेंढरे माझी वाणी ऐकतांत; मी त्यांना ओळखतो व ती माझ्यामागे येतांत; मी त्यांना सार्वकालिक जीवन देतो; त्यांचा कधीही नाश होणार नाहीं आणि त्यांना माझ्या हातातून कोणी हिसकून घेणार नाहीं” (योहान 10:27-28).

याचे कारण हे कीं स्वतः देव आपल्या मेंढरांना विश्वासांत राखून ठेवतो. “ज्याने तुमच्या ठायीं चांगले काम आरंभले तो ते येशू ख्रिस्ताच्या दिवसापर्यंत सिद्धीस नेईल हा मला भरवसा आहे” (फिलिप्पै 1:6).

विश्वासाचे हे युद्ध लढत असतांना आपल्याला स्वबळावर सोडून दिलें जात नाहीं. “कारण इच्छा करणें व कृती करणें हे तुमच्या ठायीं आपल्या सत्संकल्पासाठीं साधून देणारा तो देव आहे” (फिलिप्पै 2:13).

आम्हांला देवाच्या वचनावर भरवसा आहे कीं, जर आपण त्याची संतती आहों, तर तो “देव आपल्या दृष्टीने जे आवडते ते आपणांमध्यें येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे करील व तो आपल्या इच्छेप्रमाणें करण्यास आपल्याला प्रत्येक चांगल्या कामात सिद्ध करील” (इब्री 13:21).

विश्वास आणि आनंद यांत आपलें टिकून राहणें हे अखेरीस आणि निर्णायकपणें देवाच्याच हातांत आहे. होय, आपण लढले पाहिजे, पण हा लढा आपल्याठायीं साध्य करून देणारा तो देव आहे. आणि तो नक्कीच ते करेल, कारण रोमकरांस 8:30 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें, “ज्यांना त्यानें नीतिमान ठरवले त्यांचा त्यानें गौरवही केला.” देवाच्या नीतिमान ठरविण्यांत आलेंल्यां लेकरांचे गौरव करणें तितकेच चांगले आहे.

ज्यांना त्यानें विश्वासात आणले आहे आणि नीतिमान ठरवले आहे त्यांपैकीं एकालाही तो गमावणार नाहीं.

23 जुलाई : परमेश्वर हमारी जरूरतें पूरी करेगा

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23 जुलाई : परमेश्वर हमारी जरूरतें पूरी करेगा
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“हम तुम्हारे बीच में अनुचित चाल न चले, और किसी की रोटी मुफ़्त में न खाई; पर परिश्रम और कष्ट से रात दिन काम धन्धा करते थे कि तुम में से किसी पर भार न हो।” 2 थिस्सलुनीकियों 3:7-8

परमेश्वर पर निर्भर रहना हमारे दैनिक के जीवन के लिए काम करने के संघर्ष से टकराता नहीं है। वास्तव में, काम और उसे करने की क्षमता परमेश्वर की ओर से दिए गए प्रावधान का हिस्सा हैं। यदि हमें इस पर सन्देह हो, तो हमें यह विचार करना चाहिए कि यीशु स्वयं भी काम करता था। भले ही वह स्वर्ग से आया था और सब कुछ उसका ही था, फिर भी उसने वर्षों तक बढ़ई का काम किया और इस तरह उसने उस पद्धति की पुष्टि की जिसे उत्पत्ति की पुस्तक में मनुष्यजाति के लिए स्थापित किया गया था (उत्पत्ति 2:15)।

इसी तरह, प्रेरितों ने विश्वास के अनुसार जीते हुए और कलीसिया के विस्तार के लिए पूरी तरह से समर्पित होकर “रात दिन” परिश्रम किया। उन्होंने आलस्य को अस्वीकार किया और किसी का भोजन बिना कीमत चुकाए नहीं खाया। सुसमाचार के प्रचारक के रूप में उनके पास प्रावधान के लिए सहायता माँगने का अधिकार था (1 तीमुथियुस 5:17-18); लेकिन फिर भी, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठाई और जो व्यवसाय वे जानते थे, उसे पूरा किया और सबके लिए “आदर्श” बने (2 थिस्सलुनीकियों 3:9)।

हमारे अपने श्रम के बीच हमें यह पहचानने की आवश्यकता है कि हम काम की आशीष को कम से कम दो तरीकों से हानि पहुँचा सकते हैं: आलस्य से या आवश्यकता से अधिक काम करके। नीतिवचन की चेतावनी हम सभी पर लागू होती है: “आलसी मनुष्य शीत के कारण हल नहीं जोतता; इसलिए कटनी के समय वह भीख माँगता, और कुछ नहीं पाता।” (नीतिवचन 20:4)। या फिर जैसा पौलुस ने कहा, हमें आलसी नहीं होना चाहिए। लेकिन हमें भजनकार के इन शब्दों पर भी उतनी ही सतर्कता से ध्यान देना चाहिए, “तुम जो सबेरे उठते और देर करके विश्राम करते और दुख भरी रोटी खाते हो, यह सब तुम्हारे लिये व्यर्थ ही है” (भजन 127:2)। हाँ, हमें अपने हाथों से काम करना है। लेकिन यदि हम परमेश्वर की महिमा के लिए काम नहीं कर रहे हैं, तो फिर हम बेमन होकर काम कर रहे हैं, और वह भी व्यर्थ ही होता है।

इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हमें तब मिलता है, जब हम सब्त के सिद्धान्त की अवहेलना करते हैं। जब हम छः दिन काम करने और एक दिन विश्राम करने के परमेश्वर के आदेश का सही रीति से पालन नहीं करते, तो हम दर्शाते हैं कि हम परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं करना चाहते और अपने दैनिक प्रावधान के लिए उस पर भरोसा नहीं करना चाहते (व्यवस्थाविवरण 5:12-15)। हम क्यों सोचते हैं कि हमें हर दिन, पूरा दिन काम करना चाहिए? इसका उत्तर यह है कि हम यह विश्वास करने में संघर्ष करते हैं कि परमेश्वर हमारी जरूरतों को पूरा करेगा। हमें अपनी सुरक्षा अपने काम में नहीं, बल्कि उस परमेश्वर में प्राप्त करनी चाहिए, जो हमें काम देता है और उसे करने के लिए संसाधन प्रदान करता है।

हमारी भौतिकवादी संस्कृति में यह आसान नहीं है कि हम विश्वासयोग्यता के साथ काम करें और परमेश्वर की ओर से हमें जो मिला है उससे सन्तुष्ट होना सीखें। एक पल के लिए अपने काम पर विचार करें, चाहे वह घर में हो, खेत में, कारखाने में, या दफ्तर में। आप किस तरीके से आलस्य की ओर प्रवृत्त होते हैं? और किस तरीके से आवश्यकता से अधिक काम करने की ओर प्रवृत्त होते हैं? आपके लिए कड़ी मेहनत करने और परमेश्वर पर विश्वास करने का क्या रूप होगा? भौतिकवाद से जकड़े संसार में, आपके काम में और परमेश्वर के प्रावधान में आपका सन्तोष परमेश्वर के दिव्य प्रेम का एक प्रभावशाली गवाह बनेगा, जो सच्ची सन्तुष्टि प्रदान करता है।

व्यवस्थाविवरण 5:1-3, 12-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 33–34; प्रेरितों 16:22-40 ◊

23 July : पाप-वासनेचा प्रतिकार कसा करावा

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23 July : पाप-वासनेचा प्रतिकार कसा करावा
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मोशे प्रौढ झाल्यावर’ त्यानें आपणास फारोच्या कन्येचा पुत्र म्हणवण्याचे विश्वासाने नाकारले. पापाचे क्षणिक सुख भोगणें ह्यापेक्षा देवाच्या लोकांबरोबर दुःख सोसणें हे त्यानें पसंत करून घेतले. ‘ख्रिस्ताप्रीत्यर्थ विटंबना सोसणें’ ही मिसर देशातील धनसंपत्तीपेक्षा अधिक मोठी संपत्ती आहे असे त्यानें गणले; कारण त्याची दृष्टी प्रतिफळावर होती. (इब्री 11:24-26)

किंवा, सारांश रूपांत थोडक्यांत सांगायचे तर : “मोशे विश्वासाने. . . पापाचे क्षणिक सुख भोगणें ह्यापेक्षा. . . कारण त्याची दृष्टी प्रतिफळावर होती” (इब्री 11:24-26).

विश्वास हा “क्षणिक सुख भोगण्यांत” समाधानी राहत नाहीं. तो आनंदासाठीं व्याकुळ (कासावीस) झालेंला असतो, म्हणजें अशा आनंदासाठीं जो टिकून राहील. कायमचा. आणि देवाचे वचन म्हणते, “जीवनाचा मार्ग तू मला दाखवशील; तुझ्या सान्निध्यात पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातांत सौख्ये सदोदित आहेत.” (स्तोत्र 16:11). म्हणून, विश्वास पापाच्या फसव्या सुखांकडें पाहून आपल्या उद्दिष्टांपासून विचलित होत नाहीं. तो ज्या परम आनंदाच्या शोधात असतो तो मिळविण्यापासून तो इतक्या सहजासहजी हार मानणार नाहीं.

देवावरील विश्वासाची भूक भागवणें हीच देवाच्या वचनाची भूमिका आहे. आणि, असे करत असतांना, ते माझ्या मनाला वासनेच्या भ्रामक चवींपासून सोडवते.

सुरुवातीला, वासना मला फूस लावून अशी जाणीव करून देण्याचा प्रयत्न करते कीं जर मी शुद्धतेचा मार्ग स्वीकारला तर मी खरोखरच असे काहीं तरी गमावून बसीन जे मला मोठे सुख व समाधान देऊं शकते. पण मग मी आत्म्याची तलवार उचलतो आणि लढायला लागतो.

  • मी शास्त्रांत वाचतो कीं वासनेच्या आहारी जाण्यापेक्षा मी माझा डोळा उपटून टाकणें हे अधिक बरे आहे (मत्तय 5:29).
  • मी वाचतो कीं जर मी जे काहीं शुद्ध, जे काहीं प्रशंसनीय, जे काहीं श्रवणीय, जो काहीं सद्‍गुण, जी काहीं स्तुती, त्यांचे मनन केलें तर शांतिदाता देव मजबरोबर राहील (फिलिप्पै 4:8-9).
  • मी वाचतो कीं देहस्वभावाचे चिंतन हे मरण; पण आत्म्याचे चिंतन हे जीवन व शांती आहे (रोमकरांस 8:6).
  • मी वाचतो कीं दैहिक वासनां या माझ्या जिवात्म्याबरोबर युद्ध करतांत  (1 पेत्र 2:11), आणि धन व विषयसुख आत्म्याच्या जीवनाची वाढ खुंटवून टाकतांत (लूक 8:14).
  • पण सर्वात महत्त्वाचे म्हणजें, मी असे वाचतो कीं जे सात्त्विकपणें चालतांत त्यांना उत्तम ते दिल्यावाचून देव राहणार नाहीं (स्तोत्र 84:11), आणि जें अंतःकरणाचे शुद्ध ते देवाला पाहतील (मत्तय 5:8).

माझा विश्वास देवामध्यें असलेले जीवन व शांती यांत समाधानी असावा अशी प्रार्थना मी करत असताना, आत्म्याची तलवार वासनेच्या विषावर असलेले साखरेचे आवरण कोरून टाकते. मग मला दिसून येते कीं ते काय आहे. आणि मला फूस लावणारी त्याची मोहक शक्ती देवाच्या कृपेने धूळीस मिळते.

22 जुलाई : याद रखें, आपको प्रार्थना करनी है

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22 जुलाई : याद रखें, आपको प्रार्थना करनी है
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“जब वह घर में आया, तो उसके चेलों ने एकान्त में उस से पूछा, ‘हम उसे क्यों न निकाल सके?’ उसने उनसे कहा, ‘यह जाति बिना प्रार्थना किसी और उपाय से नहीं निकल सकती।’” मरकुस 9:28-29

मरकुस 6 में यीशु ने अपने शिष्यों को दो-दो करके भेजा था, ताकि वे पश्चाताप की आवश्यकता का प्रचार करें। उसने उन्हें न केवल विशेष निर्देश दिए, बल्कि “उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया” (मरकुस 6:7)। इसके कारण उनके पास एक शानदार गवाही थी: उन्होंने “बहुत सी दुष्टात्माओं को निकाला, और बहुत से बीमारों पर तेल मलकर उन्हें चंगा किया।” (पद 13)।

उनके पहले के सेवाकार्य में सफलता को देखते हुए यह समझना आसान है कि शिष्य आश्चर्यचकित और भ्रमित क्यों हुए, जब वे एक लड़के में से अशुद्ध आत्मा को निकालने में असफल रहे। लेकिन फिर, यीशु ने आकर उन्हें समझाया (मरकुस 9:14-27)। जब चेलों ने यीशु से यह पूछा, “हम इसे क्यों नहीं निकाल सके?” तो शायद शिष्यों को उम्मीद थी कि यीशु उन्हें कोई विशेष गुप्त ज्ञान देगा। कभी-कभी हम भी यही मानते हैं, और यीशु के उत्तर को इस तरह से समझते हैं कि हमें एक विशेष क्षमता या सेवाकार्य की आवश्यकता है। लेकिन ऐसा नहीं है। यीशु बस अपने शिष्यों और हमें यह याद दिला रहा था: तुम इसलिए सफल नहीं हुए क्योंकि तुम एक महत्त्वपूर्ण बात भूल गए थे: तुमने प्रार्थना नहीं की।

अपनी सफलता के कारण शिष्य निश्चिन्त हो गए थे। वे भूल गए थे कि यह केवल परमेश्वर की अपार दया और शक्ति के कारण ही था कि वे कुछ कर पा रहे थे। वे अभी भी मसीह के साथ थे, फिर भी वे भूल गए थे। उन्हें याद दिलाए जाने की आवश्यकता थी।

कभी-कभी हमें भी याद दिलाए जाने की आवश्यकता होती है। यह मानना कि परमेश्वर की शक्ति अब बस हमारे पास है और हमारे नियन्त्रण में है, अविश्वास के समान है; यह परमेश्वर पर भरोसा करने के बजाय खुद पर भरोसा कर लेना है। इसके विपरीत, प्रार्थना हमारी इच्छा को परमेश्वर की इच्छा के अधीन ले आती है। तब हम स्वीकार कर लेते हैं कि आश्चर्यकर्म परमेश्वर करता है, हम नहीं। और जब तक हम परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर नहीं रहते, तब तक हम किसी के हालात में हस्तक्षेप करने और एक शाश्वत परिवर्तन लाने में असमर्थ होते हैं।

इसके कई कारण हो सकते हैं कि हम प्रार्थना क्यों नहीं करते। हमें लगता है कि हमें इसकी आवश्यकता नहीं है। हम इसे करना ही नहीं चाहते। हम अपनी क्षमताओं का आवश्यकता से अधिक अनुमान लगाते हैं। हम परिकल्पानाओं में चले जाते हैं। जब हम सब कुछ अपने प्रयासों से करने की कोशिश करते हैं, तो हम अक्सर बुरी तरह से विफल हो जाते हैं।

तो अगली बार जब आप किसी बात को खुद से समझने की कोशिश करें, या यह मान लें कि परमेश्वर की शक्ति आपको इस बार भी पार करा देगी क्योंकि पिछली बार ऐसा हुआ था (और वह “अगली बार” शायद आज ही होगा!), तो याद करें कि शिष्य क्या भूल गए थे और यीशु ने उन्हें क्या याद दिलाया था: उससे प्रार्थना करें, जिसके पास सारी शक्ति है, जो हम पर अपनी दया उण्डेलता है, और जो सारी महिमा का हकदार है। क्योंकि जब आप प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर को काम करते हुए देखते हैं, तो आप पाते हैं कि वह उससे भी कहीं अधिक करता है जितना आपने उससे मांगा था या कल्पना की थी (इफिसियों 3:20)।

मरकुस 9:14-29

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 31–32; प्रेरितों 16:1-21

22 July : स्वतःला उपदेश द्या

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22 July : स्वतःला उपदेश द्या
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हे माझ्या जिवा, तू का खिन्न झालास? तू आतल्या आत का तळमळत आहेस? देवाची आशा धर; तो माझा देव मला दर्शन देऊन माझा उद्धार करतो, म्हणून मी त्याचे पुनरपि गुणगान गाईन. (स्तोत्र 42:11)

आपण निराशावादी दृष्टिकोण व उदासीनता -म्हणजें खिन्न झालेंला जीव-  यांशी लढा द्यायला शिकण्याची गरज आहे. हा लढा भावी कृपेवरील विश्वासाचा लढा आहे. देव आणि त्यानें भविष्याविषयी जें अभिवचन दिलें आहे त्या सत्याचा आपण स्वतःला उपदेश देऊन हा लढा देत असतो.

स्तोत्रकर्ता स्तोत्र 42 मध्यें हेच करतो. स्तोत्रकर्ता त्याच्या खिन्न झालेंल्यां जीवाला उपदेश देतो. तो स्वतःला धमकावतो व  स्वतःशीच वाद घालतो. आणि त्याचा मुख्य युक्तिवाद म्हणजें भविष्यातील कृपा: “देवाची आशा धर! देव भविष्यात तुझ्या निमित्त दर्शन देऊन ज्यां प्रकारे तुझा उद्धार करणार आहे त्यावर विश्वास ठेव. हर्ष-नादाचा दिवस येत आहे. परमेश्वर स्वतः दर्शन देऊन तुला आवश्यक असलेले सर्व सहाय्य पुरवेल. तो सर्वकाळ आम्हांबरोबर राहील असे अभिवचन त्यानें दिलें आहे.”

मार्टिन लॉयड-जोन्स यांना खात्री होती कीं देवाच्या भावी कृपेविषयी स्वतःला सत्याचा उपदेश देण्याविषयीचा हा मुद्दा आध्यात्मिक नैराश्यावर मात करण्यासाठीं अत्यंत निकडीचा आहे. त्यांनी Spiritual Depression नावाचे जे उपयुक्त पुस्तक लिहिलें त्यांत ते पुढीलप्रमाणें असे लिहितांत,

तुमच्या कधी हे लक्षात आलें आहे का कीं तुमच्या जीवनातील दुःख हे मुख्यतः ह्यामुळें आहे कारण तुम्हीं स्वतःशी बोलण्याऐवजी स्वतःचे ऐकत असतां? उदाहरणार्थ, तुम्हीं सकाळी उठल्या उठल्या तुमच्या मनात जें विचार येतांत त्यांवर विचार करा. त्यांचा उगम तुमच्यातून झाला नाहीं, तरी ते तुमच्याशी बोलू लागतांत, ते कालचे अनुत्तरीत प्रश्न परत लक्ष्यांत आणतांत. कुणीतरी तुमच्याशी संवाद साधतोय. . . . तुमचा स्व: तुमच्याशी संवाद साधत आहे. आता स्तोत्र 42 मधील या पुरुषाने जे समाधान काढले ते म्हणजें असे कीं तो त्याच्या स्व:ला त्याच्याशी संवाद साधू देण्याऐवजी तो त्या स्व:शी बोलू लागतो. तो विचारतो “हे माझ्या जिवा, तू का खिन्न झालास?” त्याचा जीव त्याला खिन्न करत होता, चिरडत होता. म्हणून तो उठतो, आणि म्हणतो, “ हे माझ्या स्व:, जरा ऐक. मी तुझ्याशी जें बोलतो, तें ऐक.” (20–21)

नैराश्याविरुद्ध असलेला आपला लढा देवाच्या वचनांवर विश्वास ठेवण्याविषयीचा लढा आहे. आणि देवाच्या भावी कृपेवरचा विश्वास त्याचे वचन ऐकण्याने येतो. आणि म्हणून स्वतःला देवाच्या वचनातून उपदेश देणें हे या आध्यात्मिक युद्धाचा जीव कीं प्राण आहे.