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20 अगस्त : चुनाव का क्षण

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20 अगस्त : चुनाव का क्षण
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“विश्‍वास ही से मूसा ने सयाना होकर फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इनकार किया। इसलिए कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्‍वर के लोगों के साथ दुख भोगना अधिक उत्तम लगा।” इब्रानियों 11:24-25

हम एक ही समय में संसार के दोस्त और परमेश्वर के दोस्त नहीं हो सकते (याकूब 4:4)। जो लोग इस मध्य मार्ग पर चलने की कोशिश करते हैं, वे एक न एक दिन अवश्य समझ जाते हैं कि यह कितना निरर्थक और व्यर्थ है: और क्रिस क्रिस्टोफर्सन के शब्दों में यह हमें “एक चलता-फिरता विरोधाभास” बना देता है।[1]

फिरौन की बेटी के दत्तक पुत्र के रूप में मूसा को सामाजिक स्थिति, शारीरिक आराम और भौतिक सम्पत्ति का आनन्द मिला। एक इस्राएली के रूप में फिरौन के दरबार से बाहर उसे केवल गुमनामी, दरिद्रता और गुलामी ही मिलती। मूसा जानता था कि फिरौन के दरबार में रहना उसके लिए हर सांसारिक दृष्टिकोण से बेहतर होता। वह यह सोच सकता था कि इससे उसे परमेश्वर के लोगों के पक्ष में प्रभाव डालने का मौका मिलेगा, जो तब सम्भव नहीं होगा यदि वह दरबार को छोड़कर उनके साथ जा मिलता है।

लेकिन मूसा फिरौन के परिवार में नहीं रुका। इसके बजाय, उसने मिस्र की नागरिकता के लाभों को त्याग दिया और एक दीन-हीन, तिरस्कृत, उत्पीड़ित समूह के साथ एक हो गया, जिनके पास कोई राजनीतिक अधिकार नहीं थे। क्यों? कोई क्यों इतने कम को अपनाने के लिए इतने अधिक को छोड़ देगा?

उत्तर यह है कि मूसा ने महसूस किया कि वह परमेश्वर के लोगों और मिस्रियों के साथ एक ही समय में एक नहीं हो सकता। वह जान गया था कि वह या तो अपने लोगों के साथ गुलाम होगा या फिरौन के दरबार में समझौता करने वाला बनकर रहेगा। यह नहीं हो सकता था कि एक ओर तो वह कहे कि वह एक इस्राएली था जो अपने पूर्वजों के परमेश्वर में विश्वास करता था और साथ ही एक मिस्री के रूप में भी जीवन जीए।

हमें बताया गया है कि मूसा ने “मसीह के कारण” अपमान और कठिनाई को चुन लिया (इब्रानियों 11:26)—उस एक के लिए, जो हव्वा के वंश और अब्राहम के परिवार से आने पर था और जो उनके लिए परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने पर था (उत्पत्ति 3:16; 12:1-3)। उसका यह निर्णय वही था जैसा एक सहस्राब्दी के बाद प्रेरित पौलुस ने लिया था, जिसकी पृष्ठभूमि बिल्कुल “सही” थी—शिक्षा, सटीकता, और वंश—फिर भी उसने कहा, “मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ” (फिलिप्पियों 3:8)।

मूसा ने एक क्रान्तिकारी निर्णय लिया—ऐसा निर्णय जो हम में से कुछ लोगों को भी लेने की आवश्यकता है। शायद आपकी पृष्ठभूमि मूसा के समान है; बचपन से ही आपकी सारी भौतिक जरूरतें बड़ी आसानी से पूरी हुई हैं और इस संसार में आपके पास बहुत बड़ी सफलता की सम्भावनाएँ हैं। हालाँकि, हम जो भी हैं और जहाँ से भी आए हैं, हम सभी को उसी निर्णय का सामना करना पड़ता है जिसका सामना मूसा ने किया था। क्या हम संसार के दोस्त होंगे या परमेश्वर के दोस्त? कोई मध्य मार्ग नहीं है। क्या आज आप संसार के मापदण्डों से जीएँगे, संसार के हँसी-ठट्ठे पर हँसेंगे, संसार की विधियों का पालन करेंगे, और संसार की प्राथमिकताओं को अपनाएँगे? या क्या आप यीशु मसीह के साथ खड़े होंगे, पूरी तरह से विरोध का सामना करेंगे, अपना ध्वज लहराएँगे, और शब्दों तथा कामों से यह स्वीकार करेंगे कि वह आपका प्रभु है? शायद आज वह दिन है जब आपको पहली बार, या लम्बे समय के बाद “विश्वास के द्वारा” जीने और वह क्रान्तिकारी निर्णय लेने की जरूरत है।

लूका 18:18-30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 105–106; गलातियों 5 ◊


[1] “द पिलग्रिम, अध्याय 33” (1971).

20 August : तुम्हीं ज्या पराक्रमी मनुष्याला शोधत आहात तो येशू आहे

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20 August : तुम्हीं ज्या पराक्रमी मनुष्याला शोधत आहात तो येशू आहे
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“स्वर्गात आणि पृथ्वीवर सर्व अधिकार मला दिलेंला आहे. तेव्हा तुम्हीं जाऊन सर्व राष्ट्रांतील लोकांना शिष्य करा; त्यांना पित्याच्या, पुत्राच्या व पवित्र आत्म्याच्या नावाने बाप्तिस्मा द्या; जे काहीं मी तुम्हांला आज्ञापिले ते सर्व त्यांना पाळण्यास शिकवा; आणि पाहा, युगाच्या समाप्तीपर्यंत मी सर्व दिवस तुमच्याबरोबर आहे.” (मत्तय 28:18-20)

मत्तयाचा शेवटचा अध्याय ही ती खिडकीं आहे जी मरणांतून उठलेला ख्रिस्त ह्याच्या गौरवी सूर्योदयाच्या दिशेने उघडते. त्या खिडकींतून तुम्हीं ख्रिस्ताच्या चारित्र्याच्या पर्वतरांगेत अणकुचीदार असलेले किमान तीन असे भव्य शिखरे पाहू शकता : त्याच्या सामर्थ्याचा शिखर; त्याच्या दयेचा शिखर; आणि त्याचा संकल्प-सिद्धीचा शिखर.

सर्व अधिकार त्याला दिलेंला आहे – त्याची इच्छा पूर्ण करण्याचा सर्व अधिकार व सामर्थ्य. आणि या सामर्थ्याचा उपयोग तो सर्व राष्ट्रांतील लोकांना शिष्य बनवण्याचा आपला खंबीर उद्देश साध्य करून घेण्यासाठीं करतो. हे करत असतांना, तो आपल्या प्रत्येकावर वैयक्तिकरित्या दया करतो, ती अशी कीं, युगाच्या समाप्तीपर्यंत तो सर्व दिवस आमच्याबरोबर आहे असे तो आपल्याला अभिवचन देतो.

आपण सर्वांना आपल्या अंतःकरणात हे ठाऊक आहे कीं मरणांतून उठलेला ख्रिस्त हा आपण त्याच्या पराक्रमाचे कौतुक करावें  ही आमची अभिलाषा जर पूर्ण करणार असेल तर ह्या सर्व गोष्टीं अशाच असणें अगत्याचे आहे. सामर्थ्याने पराक्रमी. दयाळूपणामघ्ये पराक्रमी. आपला संकल्प सिद्धींस नेण्यांत पराक्रमी.

जे लोक त्यांचे संकल्प पूर्ण करण्याच्या बाबतींत अत्यंत दुर्बळ असतांत, ते पराक्रमाचे कौतुक करण्याची आमची अभिलाषा पूर्ण करू शकत नाहींत. ज्यांच्या जीवनात कोणतेही उद्दिष्ट नाहीं अशा लोकांचे कौतुक आपण कदाचितच करतो. आणि ज्यांचे संकल्प केवळ स्वार्थी आणि निर्दयी आहेत त्यांचे कौतुक करणें तर अशक्यच.

आपल्याला एखाद्या अशा पुरुषाला पाहण्याची आणि जाणून घेण्याची अभिलाषा असते ज्याचे सामर्थ्य अमर्याद, ज्याची दया सौम्य आणि ज्याचा संकल्प शुद्ध आणि निश्चयी असा आहे.

कादंबरीकार आणि कवी व चित्रपट निर्माते आणि विविध विषयाचे लेखक अधूनमधून अशा पराक्रमी व्यक्तीचे चित्र आपल्यापुढे रेखाटत असतांत. परंतु अशा मनुष्याची उपासना करण्याइतपत माझी जी तळमळ आहे ती ते भरून काढू शकत नाहींत.

आपल्याला काहींतरी असे आवश्यक असते जें वास्तविक आहे. आपल्याला सर्व सामर्थ्य आणि दया आणि संकल्प साध्य करण्याचे अस्सल मूळ पाहण्याची तळमळ असते. यास्तव आपण मरणातून उठलेला ख्रिस्त ह्याच्याकडें पहावें आणि त्याची उपासना करावीं.

19 अगस्त : सच्चा राजा

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19 अगस्त : सच्चा राजा
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“यह कटोरा मेरे उस लहू में जो तुम्हारे लिए बहाया जाता है नई वाचा है।” लूका 22:20

यीशु ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा किया है और उनके हरेक आशीर्वाद को वितरित किया है। उसने नए वाचा का आरम्भ कर दिया है और असली राजा के रूप में अपनी लम्बे समय से प्रतीक्षित भूमिका ग्रहण कर ली है। यीशु से ही हरेक आशीर्वाद बहता है। उसके माध्यम से हर प्रतिज्ञा पूरी होती है। उसे ही सारी महिमा दी जाती है।

मसीही लोग इन सत्यों को प्रभु भोज की मेज पर स्वीकार करते हैं, जब हम प्याला लेते हैं और याद करते हैं कि यीशु ने अपना रक्त बहाया। यह नई वाचा का रक्त था, जो हमारे पापों की माफी के लिए बहाया गया था। क्रूस पर यीशु ने वह दण्ड अपने ऊपर ले लिया जो हमें मिलना चाहिए था, ताकि पापी लोग, जो उसकी दया और कृपा के पात्र नहीं हैं, क्षमा के आशीर्वाद का आनन्द ले सकें।

इसका अर्थ है कि जब हम यीशु में विश्वास करते हैं, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि उसने हमारे पाप और उसके न्याय को अपने ऊपर ले लिया है और बदले में हमें अपनी सारी धार्मिकता दे दी है। यीशु उस मृत्यु से मरा, जो हमें मिलनी चाहिए थी। उसने वह सम्पूर्ण जीवन जीया, जो हम नहीं जी सकते थे। परमेश्वर ने अपने पुत्र के माध्यम से हमें अपनी क्षमा की चादर में लपेट लिया है। हमें कभी भी यह सच नहीं भूलना चाहिए कि हमारे बारे में ये बातें विश्वास के द्वारा सच हैं।

पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा था: एक राजा आएगा जो दाऊद का वंशज होगा, और वह परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को पूरा करेगा। वह परमेश्वर का राज्य स्थापित करेगा, एक नया युग लाएगा, और बुराई के प्रभावों से निपटेगा। क्रूस पर लटका हुआ यीशु किसी राजा जैसा नहीं दिखता था, लेकिन यह उसकी महानतम विजय का क्षण था। और जब यीशु कब्र से बाहर आया, तो उसके पुनरुत्थान ने यह घोषणा की कि वह सिर्फ दाऊद का पुत्र नहीं था, बल्कि परमेश्वर का पुत्र था, जो मृत्यु को भी पराजित कर सकता था।

सारा अधिकार उसी के पास है और अनन्त कृपा और दया की धारा उसी के माध्यम से बहती है। जो इस शक्ति का स्रोत है, केवल वही दिलों को बदल सकता है और हमारी आत्माओं के प्रेम के योग्य सिद्ध हो सकता है।

यीशु अभी पिता के दाहिने हाथ विराजमान होकर राज्य करता है, लेकिन वह उन लोगों के दिलों में भी राज्य करता है जो उस पर विश्वास करते हैं। आज का दिन खोए हुए लोगों के लिए सबसे अच्छा दिन है कि वे अपने विद्रोही हथियारों को नीचे रख दें, इस योग्य राजा के सामने विनम्रता से झुकें, स्वीकार करें कि वह वही उद्धारकर्ता है जिसकी उन्हें इतनी अधिक आवश्यकता है, और उससे अपने जीवन की राजगद्दी पर राज्य करने का अनुरोध करें। क्या मसीह आपका राजा है? तो उसके अनुयायी के रूप में उसकी आराधना और स्तुति करें, और उसके राजदूत के रूप में जाएँ और दूसरों को इस आशा के बारे में बताएँ जिसे आपने पाया है।

1 कुरिन्थियों 15:12-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 103–104; गलातियों 4

19August : आमच्या बाबतींत पुनरुत्थान म्हणजें काय

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19August : आमच्या बाबतींत पुनरुत्थान म्हणजें काय
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कीं, येशू प्रभू आहे असे जर ‘तू आपल्या मुखाने’ कबूल करशील आणि देवानें त्याला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवशील तर तुझे तारण होईल. (रोमकरांस 10:9)

“देवानें त्याला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवशील” म्हणजें काय? देवानें येशूला मेलेल्यांतून उठवले असा विश्वास सैतान देखील ठेवतो. त्यानें ते घडताना पाहिले आहे. या प्रश्नाच्या उत्तरासाठीं, आपल्याला देवाच्या लोकांच्या बाबतींत पुनरुत्थानाचा अर्थ काय आहे यावर विचार करावा लागेल.

पुनरुत्थान म्हणजें देव आपल्या पक्षाचा झाला आहे. स्वतःला आमच्या जवळ आणावे हांच त्याचा मुख्य हेतू. आपल्या सर्व परित्यक्तपणाच्या आणि परकेपणाच्या भावनांवर मात करणें हे त्याचे ध्येय आहे.

येशूचे पुनरुत्थान हे इस्रायलापुढे आणि जगापुढे देवानें केलेंलीं अशी घोषणा आहे कीं आपण आपल्या कर्मांनी गौरवांत प्रवेश करू शकत नाहीं, म्हणून जिथें जाणें आपल्यासाठीं अशक्य आहे तिथें आपल्याला पोहोचवण्यासाठीं आवश्यक असलेली अशक्य गोष्ट त्यानें स्वतःच करावी असा त्याचा संकल्प आहे.

पुनरुत्थान हे देवानें याविषयी दिलेंले अभिवचन आहे कीं जें येशूवर विश्वास ठेवतांत त्यां सर्वांना देवाचे सामर्थ्य दिलें जाईल जेणेंकरून त्यांनी नीतिमत्वाच्या मार्गावर चालण्यास आणि मृत्यूच्या दरीतूनहि सुरक्षित निघण्यांस समर्थ व्हावें.

म्हणून, देवानें येशूला मेलेल्यांतून उठवले असा ‘आपल्या अंत:करणात’ विश्वास ठेवणें ही गोष्ट केवळ घडलेल्या वस्तुस्थितीला मान्य करण्यापर्यंत मर्यादित नाहीं. याचा अर्थ असा विश्वास ठेवणें आहे कीं देव तुमच्या बाजूने आहे, कीं त्याचे तुमच्यासोबत घनिष्ठ नाते जुळले आहे, कीं तो तुमच्या जीवनांत बदल घडवून आणत आहे आणि शेवटी तो तुम्हांला सार्वकालिक जीवनाचा आनंद मिळावा म्हणून तुम्हांला तारेल.

पुनरुत्थानावर विश्वास ठेवणें म्हणजें त्यानें जीवन, आणि आशा आणि नीतिमत्व यांविषयी जी जी अभिवचने दिलींत त्यांवर जशाचा तसा विश्वास ठेवणें.

याचा अर्थ देवाच्या सामर्थ्यावर आणि त्यानें आपल्यावर केलेंल्या प्रीतिवर इतका विश्वास ठेवणें कीं ऐहिक लाभाचा मोह असो वा ऐहिक नुकसानाची भीती, यांपैकीं कोणतीही गोष्ट आपल्याला त्याच्या इच्छेविरुद्ध बंड करण्यांस प्रवृत्त करणार नाहीं.

सैतानाचा विश्वास आणि पवित्र जनांचा विश्वास यांत हाच फरक आहे. हे देवा, आम्हीं तुझ्यावर प्रीति करावी आणि तुझा पुत्र ख्रिस्त येशू ह्याच्या पुनरुत्थानात विश्रांती घ्यावी म्हणून तू आमच्या अंतःकरणाची सुंता कर (अनुवाद 30:6).

18 अगस्त : एक चिन्ता का विषय

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18 अगस्त : एक चिन्ता का विषय
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“जिस रेंड़ के पेड़ के लिए तू ने कुछ परिश्रम नहीं किया, न उसको बढ़ाया, जो एक ही रात में हुआ, और एक ही रात में नष्ट भी हुआ; उस पर तू ने तरस खाई है। फिर यह बड़ा नगर नीनवे, जिसमें एक लाख बीस हज़ार से अधिक मनुष्य हैं जो अपने दाहिने बाएँ हाथों का भेद नहीं पहचानते, और बहुत से घरेलू पशु भी उसमें रहते हैं, तो क्या मैं उस पर तरस न खाऊँ?” योना 4:10-11

योना ने खुद को एक पीड़ित माना। उसे इस बात में पूरी तरह से यकीन था कि नीनवे को न्याय मिलना चाहिए था और यह कि उस नगर को बचाकर परमेश्वर ने गलत किया था। उसे इस बात में भी यकीन था कि छाँव देने वाले पौधे को मुरझा कर परमेश्वर ने गलत किया था, जिसके कारण उसे गर्मी में कष्ट भोगना पड़ रहा था।

इस पर परमेश्वर ने भविष्यवक्ता से उसकी दुख भरी आपत्ति पर बात नहीं की, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाया: “तेरा क्रोध, जो रेंड़ के पेड़ के कारण भड़का है, क्या वह उचित है?” (योना 4:9)। परमेश्वर ने छोटे से बड़े तक तर्क किया: यदि योना एक पौधे के लिए इतना चिन्तित हो सकता है, जो 24 घण्टे में आकर चला गया, तो क्या परमेश्वर को नीनवे के लोगों के बारे में चिन्ता करने का अधिकार नहीं था? परमेश्वर योना को अपनी प्राथमिकताओं का पुनः मूल्यांकन करने के लिए कह रहा था।

परमेश्वर ने जो सवाल योना से पूछा था, वह सवाल हमारे सामने भी आता है। क्या हमारे जीवन में ऐसी कोई चीज़ है जो हमें इससे अधिक चिन्तित करती हो कि अविश्वासी लोग यीशु मसीह के समर्पित अनुयायी बन जाएँ? यदि हम अपने दिलों को लेकर जागृत हैं, तो हम देख पाएँगे कि हमारे समय, पैसे, वरदानों, और स्वतन्त्रता को लेकर हमारा जो रवैया पहले “बस इतना ही काफी है” वाला था, वह जल्दी ही बदलकर “मुझे और चाहिए” वाला हो जाता है। शायद हमें देखने वाले लोग सोचें कि जिन लोगों ने अभी तक सुसमाचार नहीं सुना है, उनके बारे में चिन्तित होने के बजाय हम अपने आराम की स्थिति के बारे में कहीं ज्यादा चिन्तित हैं।

परमेश्वर के सवाल पर योना का उत्तर क्या था? हम नहीं जानते। योना की पुस्तक इसी दिव्य सवाल के साथ खत्म हो जाती है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि योना ने क्या उत्तर दिया होगा। इस पुस्तक का पूरा जोर परमेश्वर की दया पर है। सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल यह है: हम, जो इस पुस्तक को पढ़ते हैं, परमेश्वर के अनुग्रह को कैसे देखते हैं? क्या उसका उदाहरण हममें दूसरों के लिए एक चिन्ता की पद्धति स्थापित करेगा, जिससे हम उनके पाप से फिरने और परमेश्वर पर विश्वास करने की कामना करेंगे? क्या हमारे दिल योना के जैसे होंगे या परमेश्वर के जैसे?

समय आ गया है कि हम अपनी किसी भी सांसारिक चिन्ता को उन खोई हुई आत्माओं के प्रचार के ऊपर न रखें, जो हमारे समुदायों में मसीह को नहीं जानते। हमें यीशु के माध्यम से अपने जीवन में परमेश्वर की दया का अनुभव करने का आनन्द मिला है। और इस महान विशेषाधिकार का उपयुक्त उत्तर यही है कि हम अपने आप को इस प्रकार दें ताकि अन्य लोग भी उसे जान सकें। आप सबसे ज्यादा किस बात की चिन्ता करते हैं? आपके घर की? आपकी सम्पत्ति की? आपके तकनीकी गैजेट्स की? या आपकी गली के उन लोगों की, जो यीशु को नहीं जानते?

मत्ती  28:16-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 100–102; गलातियों 3 ◊

18 August : कठीण आज्ञां पाळण्याची आशा धरा

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18 August : कठीण आज्ञां पाळण्याची आशा धरा
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“जीविताची आवड धरून, चांगले दिवस पाहावे, अशी ज्याची इच्छा असेल. . . त्यानें वाइटाकडें पाठ फिरवून बरे ते करावे.” (1 पेत्र 3:10-11)

आपण येशूच्या आज्ञा का पाळत नाहीं याचे एकच मूळ कारण आहे : ते म्हणजें हे कीं आज्ञा न मानण्यापेक्षा आज्ञा पाळल्याने आम्हांला अधिक आशीर्वाद प्राप्त होईल यावर आपला मनापासून विश्वास नसतो. आपण देवाच्या अभिवचनावर पूर्ण आशा ठेवीत जगत नाहीं.

पेत्र येथें कोणते अभिवचन नमूद करतो? येशूनें जे शिक्षण दिलें, पेत्र ते पुढीलप्रमाणें आपल्याला सोपवितो :

वाइटाबद्दल वाईट, निंदेबद्दल निंदा असे करू नका; तर उलट आशीर्वाद द्या; कारण आशीर्वाद हे वतन मिळण्यासाठीं तुम्हांला पाचारण करण्यात आलें आहे. कारण,“जीविताची आवड धरून, चांगले दिवस पाहावे, अशी ज्याची इच्छा असेल….त्यानें वाइटाकडें पाठ फिरवून बरे ते करावे. त्यानें शांतीच्या प्राप्तीसाठीं झटावे व तिचा मार्ग धरावा.” (1 पेत्र 3:9-11)

पेत्र, जो येशूचे अनुकरण करत होता, त्यानें आम्हांला कठीण आज्ञां पाळण्यास — जसे कीं वाइटाबद्दल वाईट असे करू नका —प्रवृत्त करण्यास कसलीही लाज धरली नाहीं, आणि त्याबरोबर त्यानें एका मोठ्या हर्षाचे अभिवचनही दिलें. “निंदेबद्दल निंदा असे करू नका, जेणेंकरून तुम्हांला आशीर्वाद प्राप्त व्हावा!” तुम्हांला येणार्‍या युगात सार्वकालिक जीवनाचा आनंद घ्यायचा आहे का? तर वाइटाकडें पाठ फिरवून बरे ते करा! तुमच्यासाठीं युगानुयुगाचा आनंद राखून ठेविलेला आहे! तर मग आता सूड घेण्यांत जो आनंद मिळतो त्यापेक्षा ते प्रतिफळ जर आपण सूड घेणें टाळते तर, अधिक मोठे नाहीं का?

येशूची आज्ञा मोडण्याऐवजी जर तुम्हीं त्याची आज्ञा पाळता तर तुमचे नेहमी कल्याणच होईल, मग त्या आज्ञापालनामुळें तुम्हांला तुमचा जीवहि गमवावा लागला तरी योग्यच. येशूनें म्हटलें,

मी तुम्हांला खचीत सांगतो, ज्याने ज्याने माझ्याकरता व सुवार्तेकरता घर-दार, बहीण-भाऊ, आई-बाप, मुले-बाळे किंवा शेती-वाडी सोडली आहे, अशा प्रत्येकाला सांप्रतकाळी छळणुकींबरोबर शंभरपटीने….येणार्‍या युगात सार्वकालिक जीवन मिळाल्याशिवाय राहणार नाहीं. (मार्क 10:29-30)

प्रीतिचे मौल्यवान अर्पण देऊन ख्रिस्ताचे अनुकरण करण्यासाठीं लागणारे सामर्थ्य मिळवण्याचा एकमेव मार्ग म्हणजें आपण दृढ विश्वासाने ही आशा बाळगावी कीं, जर आपण त्याचे आज्ञापालन करतांना आपला जीवही गमावला, तरी आपण तो पुन्हा मिळवू आणि सर्वकाळासाठीं गौरवाच्या प्रतिफळाची कापणी करूं.

17 अगस्त : रहस्यमयी प्रावधान

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17 अगस्त : रहस्यमयी प्रावधान
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“तब यहोवा परमेश्‍वर ने एक रेंड़ का पेड़ उगाकर ऐसा बढ़ाया कि योना के सिर पर छाया हो, जिससे उसका दुख दूर हो। योना उस रेंड़ के पेड़ के कारण बहुत ही आनन्दित हुआ। सबेरे जब पौ फटने लगी, तब परमेश्‍वर ने एक कीड़े को भेजा, जिस ने रेंड़ का पेड़ ऐसा काटा कि वह सूख गया।” योना 4:6-7

नीनवे को बचा लिया गया था, लेकिन जब भविष्यवक्ता योना वहाँ से बाहर निकला, तो वह नाखुश था। उसने प्रभु से कहा, मुझे पहले ही पता था कि तू उन्हें उनके सारे बुरे कर्मों के बावजूद क्षमा कर देगा। अब अपने शत्रुओं को क्षमा होते हुए देखने से अच्छा है कि मैं मर जाऊँ (योना 4:2-3)।

योना ने सम्भवतः पत्थरों या मिट्टी की ईंटों से अपने लिए एक छोटा-सा छप्पर बनाया (पद 5)। उस चिलचिलाती धूप में खुले आकाश के नीचे बैठना उसके लिए बहुत ही असहज होता। कल्पना करें कि वह अपनी छोटी-सी झोंपड़ी में बैठा मृत्यु की इच्छा कर रहा था, और फिर उसने देखा कि उसके पास एक पौधा उगकर बड़ा हो रहा है। अचानक उस पौधे की छाया से दिन की गर्मी कम हो गई—और योना बहुत, बहुत खुश हुआ।

लेकिन उसकी यह खुशी क्षणिक थी। जिस परमेश्वर ने योना के आराम के लिए वह पौधा प्रदान किया था, उसी परमेश्वर ने एक कीड़ा भी भेजा जिसने उस पौधे को नष्ट कर दिया। यह पौधा किसी अस्वाभाविक कारण से नहीं सूखा, बल्कि यह सब परमेश्वर के दिव्य नियन्त्रण के तहत सामान्य प्रक्रियाओं के कारण हुआ।

सृष्टिकर्ता परमेश्वर अपनी बनाई हर चीज़ पर सम्प्रभु है। अपने रहस्यमयी प्रावधान के माध्यम से वह अपने सेवक के साथ अपनी इच्छा के अनुसार काम कर रहा था। योना की पुस्तक में एक वाक्यांश बार-बार दोहराया गया है: “यहोवा ने . . . ठहराया था।” उसने एक बड़े जल-जन्तु, एक पौधे, एक कीड़े और पुरवाई से बहने वाली लू को ठहराया था—उसने यह सब अपने सेवक के प्रति अपने प्रेम और चिन्ता को प्रकट करने के लिए किया था (योना 1:17; 4:8)। चाहे वह एक विशाल जल-जन्तु हो या एक छोटा कीड़ा, परमेश्वर अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए हर चीज़ को नियन्त्रित कर रहा था, जैसा कि वह आज भी कर रहा है।

हम प्रावधान की इस शिक्षा को हीडलबर्ग कैटेकिज़म के प्रश्न 27 में भी देखते हैं: “आप परमेश्वर के प्रावधान को कैसे समझते हो?” उत्तर मिलता है: “परमेश्वर का प्रावधान उसका सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी सामर्थ्य है, जिसके द्वारा वह आकाश और पृथ्वी और सभी सृजित वस्तुओं को मानो अपने हाथ से सम्भाले रखता है, और उन्हें इस प्रकार नियन्त्रित करता है कि हर पत्ता और घास, वर्षा और सूखा, फलदायक और अकाल के वर्ष, भोजन और पेय, स्वास्थ्य और बीमारी, धन और गरीबी—वास्तव में, सब कुछ किसी संयोग से नहीं, बल्कि उस पिता के प्रेमी हाथ से आता है।”[1]

अपने जीवन की यात्रा में जब आप “पौधों” को देखते हैं जो आपको आराम और खुशी देते हैं और जब आप “कीड़ों” को देखते हैं जो उस आराम को छीन लेते हैं, तो यह जानकर उत्साह प्राप्त करें कि आप किसी अंधे, भाग्यवादी बल के नियन्त्रण में नहीं हैं। बल्कि आपका स्वर्गिक पिता, जो आपको अपने प्रेमपूर्ण आलिंगन में रखता है, हर चीज़ को इस प्रकार व्यवस्थित कर रहा है कि वह आपके जीवन में अपने परम उद्देश्य को पूरा कर सके—ताकि आपको अपने पुत्र के समान बनाए और आपको अपने पास ले आए।

तो अपने जीवन पर विचार करें। आपके जीवन में कौन से “पौधे” हैं? कौन से “कीड़े” हैं? और क्या आप यह जानते हुए दोनों के लिए धन्यवाद देंगे कि ये सब एक प्रेमी पिता द्वारा आपके अनन्त कल्याण के लिए दिए गए हैं?

याकूब 1:9-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 97–99; गलातियों 2


[1] हीडलबर्ग कैटेकिज़म, प्र. 27.

17 August : परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय

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17 August : परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय
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माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर; हे माझ्या सर्व अंतर्यामा, त्याच्या पवित्र नावाचा धन्यवाद कर. (स्तोत्र 103:1)

या स्तोत्राच्या सुरुवातीला आणि शेवटी स्तोत्रकर्ता त्याच्या जिवाला आव्हानात्मक उपदेश देऊन परमेश्वराचा धन्यवाद करण्यास सांगतो— “हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर” — शिवाय, तो देवदूतांना आणि स्वर्गातील सैन्यांना आणि देवाच्या सर्व हस्तकृतींना देखील तेच करण्याचे आव्हान करतो.

अहो परमेश्वराच्या दूतांनो, जे तुम्हीं बलसंपन्न आहात,

आणि त्याचा शब्द ऐकून त्याप्रमाणें चालता

ते तुम्हीं त्याचा धन्यवाद करा.

अहो परमेश्वराच्या सर्व सैन्यांनो,

जे तुम्हीं त्याची सेवा करून त्याचा मनोदय सिद्धीस नेता,

ती तुम्हीं त्याचा धन्यवाद करा.

परमेश्वराच्या सर्व कृत्यांनो,

त्याच्या साम्राज्यातील सर्व ठिकाणी त्याचा धन्यवाद करा;

हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर! (स्तोत्र 103:20-22)

या स्तोत्राचा मुख्य विषय परमेश्वराचा धन्यवाद करण्यावर केंद्रित आहे. परमेश्वराचा धन्यवाद करणें म्हणजें काय?

याचा अर्थ त्याची महानता व चांगुलपण यांविषयी प्रशंसनीय शब्द बोलणें – आणि खरं तर त्याचा अर्थ म्हणजें ती प्रशंसा आपल्या जीवाने व अंतर्यामाने करणें.

दावीद या स्तोत्राच्या पहिल्या आणि शेवटच्या वचनांमध्यें जेव्हां असें म्हणतो, “हे माझ्या जिवा, परमेश्वराचा धन्यवाद कर,” तेव्हां तो असे म्हणत आहे कीं देवाचे चांगुलपण आणि त्याची महानता यांविषयी प्रामाणिकपणाचे शब्द हें आत्म्याच्या खोलीतून आलें पाहिजे.

जीव व अंतर्याम यांवाचून मुखाने परमेश्वराचा धन्यवाद करणें हे ढोंगीपणाचे ठरेल. येशूनें म्हटलें, “हे लोक, ओठांनी माझा सन्मान करतांत. पण त्यांचे अंतःकरण माझ्यापासून दूर आहे.” (मत्तय 15:8). ही गोष्ट किती भयप्रद आहे याची दाविदाला जाणीव आहे, म्हणून तो स्वतःलाच आव्हानात्मक उपदेश करतो. तो आपल्या जिवाला सांगत आहे कीं त्यानें असले ढोंग करू नये.

“हे माझ्या जिवा, ये आणि देवाचे वैभव व त्याचे चांगुलपण पाहा. माझ्या मुखाबरोबर स्वर-सांगड घाल म्हणजें आपण आपल्या संपूर्ण व्यक्तित्वाने परमेश्वराचा धन्यवाद करूं. हे माझ्या जिवा, आपण ढोंगीपणा करणार नाहीं!”

16 अगस्त : अयोग्य सेवक

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“[योना] ने यहोवा से यह कहकर प्रार्थना की, ‘हे यहोवा, जब मैं अपने देश में था, तब क्या मैं यही बात न कहता था? इसी कारण मैं ने तेरी आज्ञा सुनते ही तर्शीश को भाग जाने के लिए फुर्ती की; क्योंकि मैं जानता था कि तू अनुग्रहकारी और दयालु परमेश्‍वर है, और विलम्ब से कोप करने वाला करुणानिधान है, और दुख देने से प्रसन्न नहीं होता’ . . . यहोवा ने कहा, “तेरा जो क्रोध भड़का है, क्या वह उचित है?’” योना 4:2, 4

जब बच्चे कुछ गलत करते हैं, तो वे अक्सर अपने माता-पिता से क्षमा मांगते हैं, उसे प्राप्त करते हैं, और फिर कहते हैं, “मुझे पता है कि मैं गलत था, लेकिन . . . जो कुछ मैंने किया उसके पीछे एक बहुत अच्छा कारण था।” हम कुछ ऐसा ही भविष्यवक्ता योना के साथ देखते हैं। परमेश्वर ने उसे क्षमा किया, उसे उठाया, और उसे सही मार्ग पर वापस रखा—फिर भी उसने अपनी पिछली अवज्ञा को उचित ठहराने की कोशिश की। वह एक ही समय में क्रोधित हो रहा था, तर्क कर रहा था, और प्रार्थना कर रहा था—जो आसान कार्य नहीं है!

ध्यान दें कि योना के इस तर्क-वितर्क में “मैं” शब्द कितनी बार उभरकर आता है। उसकी बातचीत में बहुत अधिक “योना” था—और इसलिए उसके हृदय में भी—क्योंकि वह इस पूरे विषय को अपनी इच्छा और परमेश्वर की इच्छा के बीच की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। उसने मूर्खतापूर्वक यह मान लिया था कि उसकी योजना परमेश्वर की योजना से बेहतर थी।

योना की शिकायत एक दोहरे मापदण्ड पर आधारित थी। हालाँकि हाल ही में वह स्वयं परमेश्वर की करुणा और दया का पात्र बना था, फिर भी उसने उसी दया को नीनवे के लोगों पर प्रकट करने के लिए परमेश्वर को दोषी ठहराया, जिन्हें वह उद्धार के योग्य नहीं समझता था।

योना के लिए सबसे बड़ी समस्या थी परमेश्वर का सम्प्रभु अनुग्रह। वह इस बात से क्रोधित था कि परमेश्वर ने उस तरीके से कार्य किया था जिसे वह न तो समझता था और न ही स्वीकार करता था। लेकिन बहुत पहले ही प्रभु ने घोषणा कर दी थी, “जिस पर मैं अनुग्रह करना चाहूँ उसी पर अनुग्रह करूँगा, और जिस पर दया करना चाहूँ उसी पर दया करूँगा” (निर्गमन 33:19)। पापियों के प्रति परमेश्वर का अनुग्रह कभी समझाया नहीं जा सकता। इसका कोई कारण नहीं होता; यह केवल परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाता है।

योना की प्रतिक्रिया के उत्तर में प्रभु ने उससे यह नहीं पूछा कि क्या वह क्रोधित है, बल्कि यह पूछा कि क्या उसे क्रोधित होने का कोई अधिकार है। यही असली मुद्दा था: क्या योना को परमेश्वर की दया पर आपत्ति करने का कोई उचित कारण था—जो स्वयं एक ऐसे राष्ट्र का प्रतिनिधि था जिसे परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक आशीषित किया था, भले ही वे पथभ्रष्ट हो गए थे, और जिसने अपनी अवज्ञा में व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के उद्धारक हाथ का अनुभव किया था? उत्तर स्पष्ट है: नहीं। और न ही हमारे पास यह अधिकार है कि हम परमेश्वर से प्रश्न करें कि वह किस पर और कैसे अपनी दया प्रकट करता है या वह अपने लोगों को बचाने के लिए और अपने पुत्र की महिमा करने के लिए सभी चीज़ों को कैसे संचालित करता है।

यदि हम स्वयं को परमेश्वर से नाराज़ पाते हैं और उसके द्वारा अपनी योजनाओं को पूरा करने के तरीके पर शिकायत करते हुए पाते हैं, तो यह इसलिए है क्योंकि हम यह भूल गए हैं कि हम स्वयं उसकी दया और अनुग्रह के अयोग्य हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है: कि हम अपनी अवज्ञा के इतने आदी हो जाएँ कि हम स्वयं को परमेश्वर की कृपा और आशीष के योग्य समझने लगें। लेकिन प्रतिदिन सब कुछ केवल अनुग्रह से ही प्राप्त होता है। केवल जब हम इस अनुग्रह से पूरी तरह प्रभावित होंगे, तब ही हम परमेश्वर की उस असीमित दया में आनन्दित हो सकेंगे जो वह अपने अयोग्य संतों पर लुटाता है।

योना 4

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 94–96; गलातियों 1 ◊

16 August : आपण लैंगिक पापात का पडतो

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16 August : आपण लैंगिक पापात का पडतो
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आनंदाचे व हर्षाचे शब्द माझ्या कानी पडू दे; म्हणजें तू मोडलेली माझी हाडे उल्लासतील. . . . तू केलेंल्या उद्धाराचा आनंद मला पुन्हा होऊ दे; आणि उत्सुकतेच्या आत्म्याने मला सावरून धर. (स्तोत्र 51:8, 12)

दावीद त्याला लैंगिक दुराचारी प्रवृत्तीवर शक्ती मिळावी असा धावा का करत नाहीं? लोकांनी आपल्याला जाब विचारावा अशी तो लोकांकडें जाऊन मागणी का करत नाहीं? स्त्रीकडें वासनेने पाहण्यापासून देवानें त्याच्या डोळ्यांचे रक्षण करावें व त्याला वासना-मुक्त असे विचार द्यावेंत अशी प्रार्थना तो का करत नाहीं? खरे पाहता, बेथशेबेवर जणू बलात्कारच केल्यानंतर त्यानें पापाचा अंगीकार आणि पश्चात्तापाचे हे जे स्तोत्र लिहिलें, त्यांत दाविदाने अशीच काहींतरी विनवणी करायला पाहिजे होती अशी तुम्हीं अपेक्षा करत असाल.

याचे कारण असे कीं लैंगिक पाप हे एक लक्षण आहे, रोग नाहीं, हे त्याला ठाऊक आहे.

लोक लैंगिक पापं करतांत कारण त्यांना ख्रिस्तामध्यें आनंद व हर्षाची पूर्णता प्राप्त झालेंलीं नसते. त्यांची अंत:करणें स्थिर, खंबीर, आणि घट्ट पायावर उभारलेली नाहींत. ते अडखळतांत. परीक्षा आली कीं ते लगेच पापांत पडतांत कारण त्यांच्या भावना आणि विचार यांमध्यें देवाला ते सर्वोच्च स्थान नाहीं जे त्यांनी त्याला द्यायला पाहिजे.

दावीद हे स्वतःविषयी जाणून होता. आमच्याबाबतही ते खरे आहे. म्हणून दावीद जी विषयवस्तू घेऊन प्रार्थना करतो त्याद्वारे तो आम्हांला दाखवून देत आहे कीं, जे लोग लैंगिक पापांत पडतांत त्यांना खरी गरज कशाची आहे: देवाची! देवामध्यें असलेला आनंद व हर्ष.

हे शहाणपण आपल्यासाठीं अफाट आहे.