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4 अक्तूबर : अस्थिर चट्टान

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4 अक्तूबर : अस्थिर चट्टान
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“भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, ‘हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है?’ उसने उससे कहा, ‘हाँ, प्रभु; तू तो जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूँ।’ उसने उससे कहा, ‘मेरे मेमनों को चरा।’” यूहन्ना 21:15

यूहन्ना 21 में यीशु का झील के तट पर प्रकट होना उसके पुनरुत्थान के बाद का घटनाक्रम था, और इस प्रकार यह क्रूस पर उसकी मृत्यु और उससे जुड़े सभी घटनाक्रमों के बाद हुआ था—जिसमें पतरस का कायरता से मसीह को पहचानने से इनकार करना भी शामिल था। हम निश्चित रूप से मान सकते हैं कि पतरस ने अपनी इस विश्वासघाती असफलता के लिए गहरा पश्चाताप और शर्मिन्दगी महसूस की होगी। हम कल्पना कर सकते हैं कि वह अन्य चेलों से कह रहा होगा, मुझे एक मौका मिला था, और मैंने उसे गँवा दिया। मैंने उससे विश्वासघात किया। मैं, जिसने खुद को एक नायक समझा था, अब यहाँ एक सबसे बड़े कायर के रूप में खड़ा हूँ। इसलिए जब यीशु ने पतरस से बात की, तो निश्चय ही पतरस सोच रहा होगा, अब वह मुझसे क्या कहेगा? क्या अब भी मेरा उसके लोगों में कोई स्थान है?

यीशु ने पतरस की असफलता को नजरअंदाज नहीं किया; उसने उसे स्वीकार किया। भोजन के बाद यीशु ने पतरस को उसके पुराने नाम “शमौन” से सम्बोधित किया, जिसका अर्थ है “सुनना।” अपने सेवाकार्य की आरम्भ में यीशु ने उसका नाम बदलकर “पतरस” रखा था, जिसका अर्थ है “पत्थर” (यूहन्ना 1:42)। यह नाम परिवर्तन उस बदलाव को दर्शाता था, जो पतरस के स्वभाव और बुलाहट में आने वाला था: वह डगमगाने वाला व्यक्ति था, लेकिन भविष्य में वह एक दृढ़ चट्टान की तरह स्थिर होने वाला था। झील के तट पर यीशु ने पतरस को उसकी अस्थिरता की याद दिलाई। पतरस के स्थिर बनने से पहले उसे यह समझना जरूरी था कि उसके आचरण ने न तो एक मजबूत विश्वास को दर्शाया था और न ही मसीह के प्रेम में दृढ़ निडरता दर्शाई थी।

हम भी पतरस की तरह कभी-कभी अपनी असफलताओं, पतन, और अविश्वास के कारण हतोत्साहित महसूस कर सकते हैं। हमें अपने “असन्तुलित विश्वास” की पीड़ा महसूस होगी; और हमें उस महान चिकित्सक की जरूरत होगी जो हमारे प्रेम को फिर से सही स्थान पर रखे—कभी-कभी पीड़ादायक तरीके से, लेकिन हमेशा पुनर्स्थापना के लिए। ध्यान दें कि यीशु यहाँ पतरस के दिल, उसके प्रेम और उसकी भक्ति की ही चिन्ता कर रहा था। हाँ, यह सच है कि अन्य गुण आवश्यक और उपयोगी हैं, लेकिन मसीह के प्रति हमारा प्रेम अनिवार्य है। हमारा प्रेम कहाँ टिका है? क्या वह अस्थिर रेत पर आधारित है या एक दृढ़ चट्टान पर?

फिर भी, जब मसीह हमारे प्रेम को पुनर्स्थापित करता है, तब भी वह हमें अपने राज्य का सेवाकार्य सौंपता है। यीशु ने अभी भी पतरस को अपनी कलीसिया के निर्माण के लिए चुना। यह कितना आश्चर्यजनक है कि यीशु ने अपने “मेमनों” की देखभाल उस चेले को सौंपी, जिसने (यहूदा को छोड़कर) उसे सबसे अधिक चोट पहुँचाई थी और जिसके शब्दों और कार्यों में सबसे अधिक अन्तर था। लेकिन यह हमारे लिए भी कितना उत्साहजनक है कि यीशु ने ऐसा किया! क्योंकि यदि वह पतरस जैसे व्यक्ति को उपयोग करने के लिए तैयार था, तो वह मुझ जैसे और आपके जैसे व्यक्ति को भी उपयोग कर सकता है।

यीशु ने पतरस को बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी दी, लेकिन यह ज़िम्मेदारी पतरस के लिए एक परीक्षा भी थी। मसीह के प्रति प्रेम की परीक्षा यह है कि हमारा जीवन आज्ञाकारिता और कर्म को कैसे प्रदर्शित करता है। प्रेरितों की पुस्तक हमें दिखाती है कि कैसे पतरस ने परमेश्वर के आत्मा के सामर्थ्य से इस परीक्षा का उत्तर दिया।

डगमगाती चट्टान, अर्थात पतरस की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि हमारा परमेश्वर अनुग्रह देने वाला और दूसरा अवसर देने वाला परमेश्वर है। हमारी कमजोरियाँ हमें यह दिखाती हैं कि हमें एक ऐसी शक्ति की आवश्यकता है जो हमारी अपनी नहीं है, बल्कि उस महान शाश्वत चट्टान, अर्थात मसीह में पाई जाती है। इसलिए यह जानते हुए कि वही सामर्थ्य हमारे लिए हमारे उद्धारकर्ता की ओर से उपलब्ध है—जो हमारे लिए मरा, और जिसने हमें अपनी सेवा के लिए बुलाया है—आप निश्चिन्त होकर अपने दिन में आगे बढ़ सकते हैं और प्रेमपूर्वक उसकी आज्ञा का पालन कर सकते हैं।

प्रेरितों 5:17-42

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 35–36; यूहन्ना 17

4 October : अखंड आनंद

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4 October : अखंड आनंद
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 “मी तुझे नाव त्यांना कळवले आहे आणि कळवीन; ह्यासाठीं कीं, जी प्रीति तू माझ्यावर केलीं ती त्यांच्यामध्यें असावी आणि मी त्यांच्यामध्यें असावे.” (योहान 17:26)

येशूनें त्याच्या मरणाच्या आदल्या रात्री हीच प्रार्थना केलीं होती. जे अति आनंददायक त्याचा तुम्हीं अफाट ऊर्जा आणि पूर्ण आवेशाने सर्वकाळ आनंद घ्यावयांस समर्थ व्हावें याची कल्पना करा. हा आमचा वर्तमान अनुभव नाहीं. या जगात आपण आणि आपली अंतिम आत्मतृप्ती यांमध्यें तीन गोष्टी आडकाठी बनून उभ्या आहेत.

एक आडकाठी म्हणजें ही कीं, या सृष्ट जगात आपल्या जिवाची अगम्य तहान तृप्त करू शकेल असे वैयक्तिक मूल्य असलेली एकही गोष्ट नाहीं.

दुसरी ही कीं, त्या अविनाशी धनाचे जे मूल्य आहे त्यामानाने त्याचा आनंद घेण्याची ताकद आपल्यात नाहीं.

आणि तिसरी आडकाठी जी आमच्या या अंतिम आत्मतृप्तीच्या मार्गात उभी आहे ती म्हणजें जो आनंद आपल्याला येथें मिळतो तो तात्पुरता आहे. येथें कांहींही टिकत नाहीं. पण जर योहान 17:26 मधील येशूचे ध्येय आणि प्रार्थना खरी ठरली तर हे सर्व बदलेल. त्यानें अशी प्रार्थना केलीं कीं “जी प्रीति तू माझ्यावर केलीं ती त्यांच्यामध्यें असावी.” ज्याच्याविषयी देव संतुष्ट आहे त्या आपल्या पुत्रावर असलेली त्याची असीम प्रीति, तीच आमच्यामध्येंही! 

जर पुत्रामध्यें असलेला देवाचा आनंद हा पुत्रामध्यें आपला आनंद झाला, तर आपल्या आनंदाचा गंतव्य, म्हणजें येशू, ह्याचे वैयक्तिक मूल्य अविनाशी असणार. तो कधीही कंटाळवाणा किंवा निराश करणारा किंवा आडकाठी होणार नाहीं.

देवाचा जो पुत्र ह्याच्यापेक्षा मोठ्या अशा कोणत्याही खजिन्याची कल्पना देखील केलीं जाऊ शकत नाहीं.

शिवाय, या अविनाशी खजिन्याचा आनंद घेण्याची आपली शक्ती मानवी दुर्बळतेमुळें मर्यादित राहणार नाहीं. आपण पुत्राचा आनंद त्याच्या पित्यामध्यें असलेल्या आनंदसह घेऊ. येशूनें यासाठींच प्रार्थना केलीं होती!

त्याच्या पुत्रामध्यें देवाचा आनंद हा आपल्यामध्यें त्याचा आनंद होईल आणि तोच आनंद आपला देखील होईल  – पुत्रामध्यें आपला आनंद. आणि या आनंदाचा अंत नाहीं, कारण पित्याचा किंवा पुत्राचा कधीही अंत होणार नाहीं.

त्यांची एकमेकांवरील प्रीति हीच त्यांच्यावरील आपली प्रीति होईल आणि म्हणूनच त्यांच्यावर आपली प्रीति कधीही विरणार नाहीं, कीं थंडावणारही नाहीं.

3 अक्तूबर : परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित

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3 अक्तूबर : परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित
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“‘हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।’ यह बात सारी मण्डली को अच्छी लगी।” प्रेरितों 6:4-5

यद्यपि पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा से परिपूर्ण घटनाएँ और उसके परिणामस्वरूप हुआ सेवाकार्य असाधारण थे, तौभी प्रेरितों और उनके अनुयायियों ने यह कहना आरम्भ नहीं कर दिया कि अब परमेश्वर का आत्मा मुझे सिखाता है; इसलिए मुझे किसी और की सुनने की आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, जब वे पवित्र आत्मा से भर गए, तो वे परमेश्वर के वचन के अधिकारपूर्ण प्रचार और शिक्षा को पूरी तत्परता से सुनने लगे। यह हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देता है: परमेश्वर का आत्मा सदैव परमेश्वर के लोगों को उसके वचन के प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित करता है।

इसी कारण प्रेरितों की पुस्तक प्रचार की केन्द्रीयता से भरी हुई है। प्रेरितों ने पहचाना कि परमेश्वर द्वारा अपने लोगों को अपने पुत्र की छवि में नया बनाने का सर्वोच्च साधन उसका वचन है, और उसका आत्मा उसके वचन के माध्यम से कार्य करता है। प्रेरितों 6 में हम यह देखते हैं कि प्रेरितों ने उन लोगों को किस प्रकार प्राथमिकता और संरक्षण दिया, जिन्हें शिक्षा देने के लिए बुलाया और तैयार किया गया था। प्रेरितों ने यह गम्भीर जिम्मेदारी समझी कि उन्हें परमेश्वर के वचन को लोगों के सामने प्रस्तुत करने के लिए सेवक बनाए जाने का सौभाग्य मिला है।

पुराने नियम की पुस्तकें भविष्यवक्ताओं के “वचनों” का उल्लेख करती हैं; इस शब्द का अनुवाद “भारी भविष्यवाणी” भी किया जा सकता है (उदाहरण के लिए, यशायाह 13:1 देखें)। यह हृदय और मन पर पड़े उस भार को दर्शाता है, जो परमेश्वर के सत्य को लोगों तक पहुँचाने की महान जिम्मेदारी के कारण उत्पन्न होता है। उन्नीसवीं शताब्दी में सी. एच. स्पर्जन ने इस भार को स्वीकार करते हुए यह घोषणा की थी कि उनका पुलपिट इंग्लैंड के राजा के सिंहासन से अधिक प्रभावशाली है, क्योंकि वह वहाँ परमेश्वर के सिंहासन से मिले सन्देश को लेकर खड़े होते थे और मसीही सैद्धान्तिक शिक्षा के सत्य का प्रचार करते थे।

हमें उन लोगों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए, जिन्हें पवित्रशास्त्र की सच्चाइयों को सिखाने के लिए बुलाया गया है—चाहे वे किसी मण्डली को सिखाते हों, छोटे बच्चों को सिखाते हों, या किसी अन्य सन्दर्भ में सिखाते हों। यह कोई छोटी बात नहीं है कि कोई व्यक्ति नियमित रूप से एक पवित्र परमेश्वर और उसके लोगों के बीच खड़ा होकर उसके वचन की घोषणा करे। यह एक भारी उत्तरदायित्व होने के साथ-साथ एक अद्‌भुत विशेषाधिकार भी है।

जैसे हमें अपने शिक्षकों और प्रचारकों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, वैसे ही हमें स्वयं भी विनम्र और उत्सुक होकर परमेश्वर के वचन की अधिकारपूर्ण शिक्षा को सुनने और सीखने के लिए तत्पर रहना चाहिए। प्रारम्भिक कलीसिया ने इस समर्पण का उदाहरण स्थापित किया, जब उन्होंने प्रेरितों की शिक्षा के प्रति स्वयं को समर्पित किया (प्रेरितों 2:42)। आज भी हमें उसी प्रकार समर्पित रहना चाहिए; हमें उस शिक्षा के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए, जो प्रेरितों को प्रकट किए गए नए नियम के सत्यों पर आधारित है और जो पुराने नियम की सैद्धान्तिक शिक्षा की नींव पर निर्मित है।

हमें अपना समय व्यर्थ की चीज़ों में नहीं लगाना चाहिए—जैसे ऐसे टीवी कार्यक्रम देखने में जो केवल हमारे विचारों की पुष्टि करें, ऐसी पुस्तकें या वीडियो गेम में जो हमें वास्तविकता से दूर ले जाएँ। इसके बजाय, हमें परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। उसे ही अपना आत्मिक भोजन बनाएँ और आप पाएँगे कि प्रतिदिन परमेश्वर का आत्मा आपको उसकी सच्चाइयों और आनन्द में और भी गहराई तक ले जाता है।

भजन 119:81-96

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 33–34; यूहन्ना 16 ◊

3 October : अंतिम, सार्वभौम, सर्वसमर्थ अशी प्रीति

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3 October : अंतिम, सार्वभौम, सर्वसमर्थ अशी प्रीति
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“परमेश्वर, परमेश्वर, दयाळू व कृपाळू देव, मंदक्रोध, स्थिर प्रीति व विश्वासूपण यात उदंड.” (निर्गम 34:6)

देव प्रीति व विश्वासूपण यात उदंड आहे.

तुलना म्हणून माझ्या मनात दोन चित्र येतात:

1. देवाचे मन पाण्याच्या सतत वाहणाऱ्या एका अशा झऱ्यासारखे आहे जे पर्वताच्या शिखरावरून प्रीति आणि विश्वासूपण यांचे बुड-बुडे फुलवते. हा झरा शतकानुशतके अखंडपणें वाहत राहतो.

2. किंवा देवाचे मन जणू एखाद्या ज्वालामुखीसारखे आहे जे प्रीतिच्या उष्णतेने इतके तापते कीं तिचा पर्वताच्या शिखरावर स्फोट होतो आणि मग प्रीति आणि विश्वासूपण ही लाव्हा बनून वर्षानुवर्षे वाहतांत.

जेव्हा देव “उदंड” ह्या शब्दाचा उपयोग करतो — “स्थिर प्रीति व विश्वासूपण यात उदंड” — तेव्हा अर्थ हा आहे कीं त्याच्या प्रीतिच्या झऱ्याला सीमा नाहींत हे आपण समजून घ्यावे आणि अनुभवाने जाणून घ्यावे अशी त्याची इच्छा आहे. तुम्हीं या डोंगराळ प्रदेशात वाहणाऱ्या झऱ्यातून दिवसभर, वर्षानुवर्षे, पिढ्यानपिढ्या पिऊ शकता, तरी तो कधीही कोरडा पडणार नाहीं.

तुम्हीं असे म्हणण्याचे देखील धाडस करू शकता कीं देव अशा सरकारसारखा आहे जो गरजेच्या प्रत्येक प्रसंगी अधिक पैसे छापतो. अविनाशी, नाहीं का? तरी, एक फरक आहे. देव जे सर्व पैसे छापतो त्याची बरोबरी करणारा असा सोनेरी प्रीतिचा उदंड खजिना देवाकडे आहे. सरकार स्वप्नांच्या दुनियेत जगते. परंतु देवाचे देवपणच या उदंड संसाधनांचा अत्यंत वास्तववादी उगम आहे.

देवाचे अंतिम देवपण, सार्वभौम स्वातंत्र्य आणि त्याचे सर्वसमर्थपण हे तो ज्वालामुखी आहे ज्यातून प्रीति उदंडपणें फुटून वाहते. देवाच्या ह्या परिपूर्ण थोरपणाचा असा अर्थ होतो कीं त्याला स्वतःमध्यें कोणतीही कमतरता भरून काढण्याची गरज नाहीं. उलट त्याचा हा उदंड स्वयंभूपणाचा (आत्मनिर्भरतेचा) गुण आपल्यावर त्याच्या प्रीतिचा वर्षाव करतो, म्हणजें आम्हां पापी लोकांवर – ज्यांना त्याची गरज आहे, आणि ज्याने येशूमध्यें स्वतःला उत्तम देणगी म्हणून दिलें.  

आपण त्याच्या प्रीतिवर डोळे झाकून अवलंबून राहू शकतो कारण आपण त्याच्या अंतिम देवपणावर, त्याच्या स्वतंत्र सार्वभौमत्वावर आणि त्याच्या अमर्याद सामर्थ्यावर विश्वास ठेवतो.

2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा

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2 अक्तूबर : पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा
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“उसने अपनी इच्छा का भेद उस भले अभिप्राय के अनुसार हमें बताया, जिसे उसने अपने आप में ठान लिया था कि समयों के पूरे होने का ऐसा प्रबन्ध हो कि जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” इफिसियों 1:9-10

अपने निबन्ध “ऑन फेयरी स्टोरीज़” में जे. आर. आर. टोल्किन उन कारणों के बारे में लिखते हैं, जिनकी वजह से लोग परीकथाओं की ओर आकर्षित होते हैं। ऐसी कहानियाँ अक्सर हमारे दैनिक समाचारों के विपरीत होती हैं: जहाँ वास्तविक जीवन में युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, महामारी और दिल टूटने की घटनाएँ होती हैं, वहीं परीकथाएँ सुखद अन्त प्रस्तुत करती हैं, जो मानव हृदय की गहरी इच्छाओं को प्रतिबिम्बित करता है। टोल्किन सुझाव देते हैं कि इन इच्छाओं की जड़ में यह तड़प है कि मसीह इस संसार को सही करे—सभी चीज़ों को एक साथ लाए, सब कुछ पुनर्स्थापित करे, और संसार को उतना ही सुन्दर बनाए, जितना यह आदम के विद्रोह से पहले था। क्या आप भी नहीं चाहते कि परमेश्वर सब कुछ ठीक कर दे? क्या आप भी उस सुखद अन्त की लालसा नहीं रखते?

पवित्रशास्त्र में, और हमारे जीवन में भी, हमें बार-बार याद दिलाया जाता है कि हम अभी वहाँ तक नहीं पहुँचे हैं। हम एक पतित संसार में रहते हैं, जहाँ अलगाव, निराशा और विघटन व्याप्त है। पहले आदम ने पाप किया, और मृत्यु और अराजकता उसका परिणाम बनी। लेकिन फिर दूसरा आदम आया ताकि वह पहले आदम द्वारा किए गए काम को सुधार कर सब कुछ पुनर्स्थापित कर सके और वह पूरा कर सके जो कोई और नहीं कर सकता था। परमेश्वर सब कुछ ठीक करेगा। वास्तव में, उसने इसका आरम्भ कर भी दिया है।

पहली शताब्दी की कलीसियाओं को लिखे अपने पत्रों में पौलुस ने उनकी कठिनाइयों को पहचाना और उन्हें कम करके नहीं आँका; लेकिन उसने हमेशा अपने पाठकों को यह याद दिलाया कि एक दिन ऐसा आएगा “जब दुख समाप्त होंगे और पीड़ाएँ मिट जाएँगी,” और हमारी सभी इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी।[1] उसने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे अपनी आँखें परम लक्ष्य पर टिकाए रखें, ताकि वे अपने तत्कालीन संघर्षों का सामना कर सकें।

जो उन्हें तब चाहिए था, वही हमें अब चाहिए। यदि आप केवल उन परिस्थितियों पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, जो आपके सामने हैं और परमेश्वर के पुनर्स्थापना की प्रतिज्ञा को अपनी दृष्टि में नहीं लाएँगे, तो आप वास्तव में अपने सामने आने वाली समस्याओं से नहीं निपट पाएँगे। वे आपके नियन्त्रण से बाहर लगने लगेंगी। वे आपको निराश कर देंगी। वे आपकी आशा और आनन्द को छीन लेंगी। चाहे समस्याएँ वैश्विक हों, राष्ट्रीय हों, या व्यक्तिगत, सबसे अच्छा तरीका यही है कि आप परमेश्वर के वचन पर ध्यान केन्द्रित करें और याद रखें कि परमेश्वर का वचन परमेश्वर की योजना के बारे में क्या कहता है। एक सुखद अन्त होगा। एक समय आएगा जब सब कुछ एक सिद्ध राजा के अधीन एकजुट होगा।

वह क्या है जो आज आपको परेशान कर रहा है? समय के मामलों को पवित्र आत्मा की सहायता के द्वारा एक शाश्वत दृष्टिकोण से देखें और आप उसकी सिद्ध योजना में सुरक्षा प्राप्त करेंगे। आप इस संसार की पूरी कहानी के सभी विवरण अभी नहीं जान सकते, लेकिन आप यह ज़रूर जान सकते हैं कि जो लोग मसीह पर विश्वास रखते हैं, उनके लिए अन्तिम दृश्य एक ऐसा सुखद अन्त लाएगा जिससे अनन्तता का आरम्भ होगा—और यह कोई परीकथा नहीं है।

  यशायाह 65:17-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 30–32; यूहन्ना 15


[1] स्टूअर्ट टाऊण्ट, “देयर इज़ ए होप” (2007).

2 October : देव सनकी (मूडी) नाहीं

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2 October : देव सनकी (मूडी) नाहीं
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राष्ट्रांच्या मसलती परमेश्वर निरर्थक करतो; लोकांचे संकल्प निष्फळ करतो. परमेश्वराची योजना सर्वकाळ टिकते; त्याच्या मनातील संकल्प पिढ्यानपिढ्या कायम राहतात. (स्तोत्र 33:10-11)

“आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” (स्तोत्र 115:3). या शास्त्रलेखाचा अर्थबोध हा आहे कीं देवाला ज्या गोष्टींमध्यें आनंद मिळतो त्यां सर्व करण्याचा त्याला अधिकार आणि  सामर्थ्य आहे. देव सार्वभौम आहे या कथनाचा अर्थ हाच आहे.

काहीं क्षण यावर विचार करा : जर देव सार्वभौम आहे आणि त्याच्या इच्छेस येईल ते सर्व करण्यांस तो समर्थ आहे, तर त्याचा कोणताही संकल्प निष्फळ होऊ शकत नाहीं. “राष्ट्रांच्या मसलती परमेश्वर निरर्थक करतो; लोकांचे संकल्प निष्फळ करतो. परमेश्वराची योजना सर्वकाळ टिकते; त्याच्या मनातील संकल्प पिढ्यानपिढ्या कायम राहतात” (स्तोत्र 33:10-11).

आणि जर त्याचा कोणताही संकल्प निष्फळ होऊ शकत नाहीं, तर तो सर्व जीवितांमध्यें सर्वात अधिक आनंदी असला पाहिजे.

हाच असीम, ऊर्ध्वलोकीं आनंद तो झरा आहे ज्यातून ख्रिस्ती हेडोनिस्ट म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट हा सिद्धांत मानणारा मनुष्य सातत्यानें पितो आणि जो अधिक खोलवर जाऊन प्यावयांस तळमळतो.

जगावर राज्य करणारा देव आनंदी नसता तर काय झालें असते याची तुम्हीं कल्पना करू शकता का? देव जर आकाशातल्या एखाद्या दैत्याप्रमाणें कुरकुर करणारा, चिडचिडपणानें वेडापिसा होणारा आणि दु:खाने खिन्न होऊन बसणारा असता तर? जर देव निराश, वैफल्यग्रस्त, खिन्न आणि हताश आणि असमाधानी आणि विषादपूर्ण वृत्तीचा असतां तर?

आपण दाविदाबरोबर असे म्हणू शकलो असतो का, “हे देवा, तू माझा देव आहेस; मी आस्थेने तुझा शोध करीन; शुष्क, रुक्ष व निर्जल प्रदेशात माझा जीव तुझ्यासाठीं तान्हेला झाला आहे, माझ्या देहालाही तुझी उत्कंठा लागली आहे” (स्तोत्र 63:1)? मला असे वाटत नाहीं.

आपण लेकरें म्हणून परमेश्वराला असे गणूं जसे एक निराश झालेला, खिन्न आणि हताश, व असंतुष्ट असा बाप असलेलीं बालकें त्याला गणतील. ते त्याच्यामध्यें आनंद करूं शकत नाहींत. ते फक्त त्याला त्रास न देण्याचा प्रयत्न करू शकतात किंवा कदाचित थोड्याफार स्वार्थासाठीं त्याचे ऐकण्याचा प्रयत्न करतील.

पण आमचा परमेश्वर तसा नाहीं. तो कधीही नैराश्याने किंवा असमाधानामुळें लहरी माणसासारखा चिडत नाहीं. आणि, स्तोत्र 147:11 मध्यें सांगितल्याप्रमाणें, “जे परमेश्वराचा आदर करतात,जे त्याच्या दयेची आशा धरतात त्यांच्याबरोबर तो आनंदित होतो.” म्हणून या देवाला टाळणें, वा त्याच्यापासून पळ काढणें किंवा त्याचा खिन्नपणा क्रोधाद्वारे प्रकट होऊ नये म्हणून दिवाणखान्यात डोकावून सुद्धा न पाहणें हा ख्रिस्ती हेडोनिस्टचा उद्दिष्ट नाहीं. नाहीं, उलट त्याच्या स्थिर प्रीतिची आशा धरणें हे आपले उद्दिष्ट असते. त्याच्याकडे धाव घेणें हे आपले उद्दिष्ट असते. देवामध्यें आनंद करणें, देवामध्यें हर्ष करणें, त्याचा सहवास आणि त्याची कृपा यांना आपल्या हृदयांत जपणें व त्यांत आनंद करणें हे आपले उद्दिष्ट आहे.

1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा

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1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा
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“जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते-कराहते मेरी हड्डियाँ पिघल गईं। क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; और मेरी तरावट धूप काल की सी झुर्राहट बनती गई।” भजन 32:3-4

जो लोग मनोविज्ञान, मनोरोग और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्रों में काम करते हैं, वे अक्सर इस तथ्य का सामना करते हैं कि किसी व्यक्ति के हृदय और मन में जो कुछ हो रहा है, उसका गहरा प्रभाव उसके शरीर में भी दिखाई देता है। परमेश्वर का वचन इस सम्बन्ध पर प्रकाश डालता है और फिर और भी गहराई तक जाता है, क्योंकि यह हमें बताता है कि हमारे शरीर की स्थिति और हमारी आत्मा की स्थिति के बीच एक सम्बन्ध है।

भजन 32 में, दाऊद परमेश्वर से बहुत व्यक्तिगत रूप से बात करता है और उस बोझ को स्वीकार करता है, जिसे उसने तब अनुभव किया जब वह अन्धकार में छिपा रहा और बतशेबा के साथ किए गए अपने पाप और उसके पति ऊरिय्याह की हत्या को स्वीकार करने से इनकार करता रहा (2 शमूएल 11 देखें)। दाऊद के माध्यम से पवित्र आत्मा हमें सिखाता है कि एक व्याकुल विवेक, पश्चाताप की कमी और हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के बीच एक सम्बन्ध है। जो लोग दाऊद के निकट थे, शायद वे यह नहीं जान सके थे कि उसकी आत्मा के भीतर क्या चल रहा था, लेकिन वे उसके शरीर में हो रहे परिवर्तनों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे।

जो विवरण वह देता है, वह अन्य स्थानों पर दिए गए उसके विवरण को और अधिक स्पष्ट करता है: “मेरा हृदय धड़कता है, मेरा बल घटता जाता है; और मेरी आँखों की ज्योति भी मुझ से जाती रही। मेरे मित्र और मेरे संगी मेरी विपत्ति में अलग हो गए, और मेरे कुटुम्बी भी दूर जा खड़े हुए” (भजन 38:10-11)। यह बहुत ही विनाशकारी चित्र प्रस्तुत करता है।

दाऊद ने अपनी स्थिति को पहचाना कि यह एक दण्ड था। बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि वासना, अतिरेक और परमेश्वर की आज्ञाओं की अवहेलना के स्वाभाविक परिणाम निकलते हैं (रोमियों 1:24-25 देखें)—और इन सभी में दाऊद दोषी था। दुर्बलता, वज़न घटना, अनिद्रा, अस्वीकृति की भावना, उदासी, चिन्ता और निराशा अक्सर उन लोगों को सताती है, जो अपने पाप को परमेश्वर से छिपाने और स्वयं इन्हें स्वीकार न करने का प्रयास करते हैं।

जिस बात ने दाऊद को पुनः स्थापित किया, वह कोई स्वास्थ्य सुधार योजना या जल्दी सोने जाना नहीं था, बल्कि उसके पाप की जड़ से निपटना था: “जब मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया . . . तब तूने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया” (भजन 32:5)। परमेश्वर ने अपनी शक्ति से दाऊद को तब तक दबाए रखा, जब तक कि उसने अपने पाप को परमेश्वर के हाथों में सौंपकर उससे समाधान नहीं माँगा। यह हमारे लिए आशीष है कि परमेश्वर हमें हमारे पाप को भूलने नहीं देता—जब हमें अपनी आत्मिक बीमारी के कारण शारीरिक भारीपन का अनुभव होता है। यह हमें वह करने के लिए प्रेरित करने का उसका तरीका है, जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता है, अर्थात अपने पाप को स्वीकार करना और उसकी क्षमा माँगना।

क्या आप कोई पाप छिपा रहे हैं? उसे छिपाएँ नहीं; उसे स्वीकार करें। जब दाऊद ने परमेश्वर की क्षमा माँगी, तो उसे अपने कष्टों से मुक्तिदायक राहत मिली। आप भी उसी आनन्द का अनुभव कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर के वचन की प्रतिज्ञा है कि “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)।

भजन 51

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 27–29; यूहन्ना 14 ◊

1 October : सर्व-समाधानी विषय

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1 October : सर्व-समाधानी विषय
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परमेश्वरामध्यें आनंद कर, म्हणजें तो तुझे मनोरथ पूर्ण करील. (स्तोत्र 37:4)

आनंदाचा शोध “आम्हांला वाटेल तर आम्हीं घेऊं” असा वैकल्पिक विषय नाहीं, तर ही आज्ञा आहे (स्तोत्रांमध्यें दिलेलीं): “परमेश्वरामध्यें आनंद कर, म्हणजें तो तुझे मनोरथ पूर्ण करील” (स्तोत्र 37:4).

स्तोत्रकर्त्यांनी असेच करण्याचा प्रयत्न केला : “जशी हरिणी पाण्याच्या प्रवाहासाठीं धापा टाकते, तसा हे देवा, माझा जीव तुझ्यासाठीं धापा टाकतो. माझा जीव देवासाठीं, जिवंत देवासाठीं तहानेला आहे. मी केव्हा देवासमोर येऊन हजर होईन” (स्तोत्र 42:1-2). “हे देवा, तू माझा देव आहेस; मी कळकळीने तुझा शोध घेईन; शुष्क आणि रूक्ष आणि निर्जल ठिकाणी माझा जीव तुझ्यासाठीं तान्हेला झाला आहे” (स्तोत्र 63:1).

या तहानेच्या उद्देश्यामागे तृप्त करणारा असा समतुल्य झरा आहे जेव्हां स्तोत्रकर्ता म्हणतो कीं लोक “तुझ्या घरातल्या समृद्धीमुळें तृप्त होतील. तू आपल्या बहुमोल नदीतून त्यांना मनसोक्त पिण्यास देशील” (स्तोत्र 36:8).

मला असा शोध लागला कीं देवाचा चांगुलपणा, जो आमच्या उपासनेचा मुख्य पाया आहे, अशी गोष्ट नाहीं कीं तुम्हीं कुठल्यातरी निरुत्साही भक्तीने त्याच्या आदर करता. नाहीं, हे असे कांहींतरी आहे ज्यामध्यें आम्हांला आनंद घ्यावयाचा असतो: “परमेश्वर किती चांगला आहे, ह्याचा अनुभव घेऊन पाहा!” (स्तोत्र 34:8). अनुभव. अनुभव! अनुभव घेऊन पाहा.

“तुझी वचने माझ्या जिभेला किती मधुर लागतात! माझ्या तोंडाला ती मधापेक्षा गोड लागतात!” (स्तोत्र 119:103).

सी.एस. लुईस यांनी म्हटल्याप्रमाणें, स्तोत्रांत वर्णिलेला परमेश्वर हा “सर्व-समाधानी विषय” आहे. त्याच्या लोकांना त्याच्यामध्यें जो “काठोकाठ वाहणारा आनंद” मिळतो त्या आनंदासाठीं ते हर्ष-वर्धनाणें त्याची उपासना करतात (स्तोत्र 43:4). तो तृप्तीदायक आणि सर्वकाळ वाहणाऱ्या आनंदाचा झरा आहे: “तुझ्या सान्निध्यात पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातात सौख्ये सदोदित आहेत” (स्तोत्र 16:11).

30 सितम्बर : एक मन, एक उद्देश्य, एक आत्मा

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30 सितम्बर : एक मन, एक उद्देश्य, एक आत्मा
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“मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।” फिलिप्पियों 2:2-3

हालाँकि यह निश्चित रूप से लाभदायक है कि कलीसिया के सदस्य सेवाकार्यों में पहल करें, फिर भी विश्वासियों की एक स्वस्थ मण्डली व्यक्तिगत विचारों और योजनाओं द्वारा नहीं चलती। यदि कलीसिया को वास्तव में मसीह की अधीनता में रहना है, तो पहले हमारे मन सुसमाचार में एकजुट होने चाहिएँ। यदि यह एकता नहीं है, तो हम अपने स्वार्थी और प्रतिस्पर्धात्मक इच्छाओं और योजनाओं द्वारा ही संचालित होंगे।

बाइबल हमारे मन के विषय में बहुत कुछ कहती है, क्योंकि जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही हम बनते हैं। जब हम अपने मन को सही सोच के लिए प्रशिक्षित करते हैं, तब हम ठीक से प्रेम करना और एक आत्मा तथा एक उद्देश्य में साथ मिलकर सेवा करना सीखते हैं। हमारे मानसिक संघर्ष का एक भाग हमारी पुरानी, स्वार्थी, मानवीय प्रकृति में फँसा हुआ होता है। हमारी सबसे बड़ी ठोकरों में से एक घृणा नहीं बल्कि आत्म-प्रेम होता है: हम घमण्ड की प्रवृत्ति रखते हैं, जो हमारे प्रभु के स्वभाव के पूर्णतः विपरीत है, और हमारी नम्रता की कमी हमारे आस-पास के लोगों के साथ सामंजस्य के अनुभव में बाधा बनती है। यहाँ तक कि हमारे अच्छे कार्य भी अक्सर दूषित उद्देश्यों से भरे होते हैं।

यदि हमें मसीह में एक होना है, तो हम अपने ही तरीके पर अड़े नहीं रह सकते। इसके विपरीत, हमें “एक दूसरे को अपने से अच्छा समझना” सीखना होगा। इसका अर्थ है कि हम अपने से पहले दूसरों की अच्छाइयों को याद करें, कि हम पहले यह सोचें कि दूसरों के लिए क्या अच्छा होगा बजाय इसके कि हमारे लिए क्या सुविधाजनक होगा, और यह कि हम दूसरों के जीवन और संघर्षों में भाग लेने को तैयार हों बजाय इसके कि उनसे दूर खड़े रहें। सच्ची नम्रता कभी सबसे आगे वाली सीट नहीं लेती या हर बात का आरम्भ “मैं” से नहीं करती। वास्तव में यह “वह शून्यता है जो परमेश्वर को उसका सामर्थ्य दिखाने के लिए स्थान देती है।”[1] पौलुस हमें बताता है कि यह वह गुण है, जो स्वयं यीशु मसीह में था: “हम में से हर एक अपने पड़ोसी को उसकी भलाई के लिए प्रसन्न करे कि उसकी उन्नति हो। क्योंकि मसीह ने अपने आप को प्रसन्न नहीं किया” (रोमियों 15:2-3)।

जब हम पहले अपने बारे में सोचते हैं, तब परमेश्वर के वचन को लागू करना कठिन हो जाता है—बल्कि असम्भव हो जाता है। लेकिन जब हम दूसरों को पहले रखना सीखते हैं, तब हम उनके हितों की चिन्ता करने के लिए अधिक तत्पर हो जाते हैं। और ऐसा करके हम मसीह की देह में वास्तव में एक हो सकते हैं। आप निश्चित ही कुछ ऐसे लोगों को जानते होंगे जिनके जीवन में यह आत्मिक नम्रता दिखाई देती है। उनके लिए अभी परमेश्वर का धन्यवाद करें और यह प्रार्थना करें कि आप देख सकें कि कैसे आप उनके उदाहरण का और सबसे बढ़कर, स्वयं मसीह के उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं। उसने आपकी ज़रूरतों को अपनी सुविधा से भी अधिक—यहाँ तक कि अपने जीवन से भी अधिक महत्त्वपूर्ण समझा। पौलुस की हम सबके लिए यह चुनौती है: “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो” (फिलिप्पियों 2:5)।

  यूहन्ना 3:22-36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 24–26; यूहन्ना 13:21-38


[1] एण्ड्रू मुरे, ह्युमिलिटी: दि ब्यूटी ऑफ होलीनेस, द्वितीय संस्करण (1896), पृ. 50.

30 September : बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध

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30 September : बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध
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शेवटी, माझ्या बंधूंनो, प्रभूमध्यें आनंद करा. (फिलिप्पै 3:1)

आपण देवामध्यें आनंद करतो तेव्हां त्याचा गौरव होतो हें शिक्षण मला कोणी कधीही दिलें नव्हतें – कीं देवामध्यें आनंद करणें नेमकीं हीच बाब आपण करत असलेल्या देवाच्या स्तुतीला आपला ढोंगीपणा नाहीं तर देवाचा सन्मान बनवते.

पण जोनाथन एडवर्ड्स यांनी ही गोष्ट स्पष्टपणें आणि ठामपणें सांगितलीं :

देव मनुष्यांमध्यें देखील स्वतःचे गौरव करून घेतो असें दोन मार्ग आहेत : (1) तो त्यांना दर्शन देऊन. . . त्यांची समज उघडतो तेव्हां; (2) जेव्हां तो त्यांच्या अंतःकरणात आपलें वचन प्रकट करून त्यांच्याशी बोलतो तेव्हां त्याला ओळखून त्यांना होणारा हर्ष आणि आनंद, आणि त्याचा लाभ याद्वारे देवाचा गौरव केवळ त्याच्या गौरवाचे झालेंलें प्रकटीकरण याद्वारेच होत नाहीं, तर त्याच्यामध्यें जो आनंद ते करतांत त्याद्वारे सुद्धा त्याचा गौरव होतो. . .

त्याचा गौरव पाहणारे जेव्हां आनंद करतांत : तेव्हां केवळ गौरव पाहण्यापेक्षा जे त्या गौरवांत आनंदही करतांत तेव्हां त्याचा अधिक गौरव होतो. . . . जो मनुष्य देवाच्या गौरवाविषयी आपलें केवळ विचार व्यक्त करतो तो देवाचा तितका गौरव करत नाहीं जितका तो मनुष्य जो त्या गौरवाचे कौतुक करतो आणि त्यात आनंद करतो, देवाचा गौरव करतो.

हा माझ्यासाठीं एक धक्कादायक शोध होता. जर मला विश्वातील सर्वांत मौल्यवान वास्तव म्हणून देवाचा गौरव करायचा असेल तर मला त्याच्यामध्यें आनंदाचा शोध घेणें अगत्याचे आहे. उपासना करतांना आनंद करणें हा निव्वळ पर्याय नाहीं, तर उपासनेचा अत्यावश्यक घटक आहे. खरंच, उपासनेचे सार हेच – देवाच्या गौरवामध्यें आनंद करणें.

असे लोक जे देवाची स्तुती तर करतांत, परंतु आनंद न करताच त्याची स्तुती करतांत त्यांच्यासाठीं आमच्याकडें एक नाव आहे. त्यांना आपण ढोंगी म्हणतो. येशू म्हणाला, “अहो ढोंग्यांनो, तुमच्याविषयी यशयाने यथायोग्य संदेश दिला कीं, ‘हे लोक [तोंड घेऊन माझ्याकडें येतांत व] ओठांनी माझा सन्मान करतांत, परंतु त्यांचे अंतःकरण माझ्यापासून दूर आहे’” (मत्तय 15:7-8). ही वस्तुस्थिती – कीं देवाचा खरा सम्मान म्हणजें परिपूर्ण आनंद आणि हे कीं मनुष्याच्या जीवनाचा मुख्य हेतू देवाच्या गौरवासाठीं या आनंदाचा खोलवर शोध घेणें हाच आहे – हा कदाचित मी आजवर केलेंला बंधमुक्त करणारा असा प्रचंड शोध होता.