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12 मार्च : परिवर्तनकारी पछतावा

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12 मार्च : परिवर्तनकारी पछतावा
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“जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चाँदी के सिक्के प्रधान याजकों और पुरनियों के पास फेर लाया और कहा, ‘मैं ने निर्दोष को घात के लिए पकड़वाकर पाप किया है!’ उन्होंने कहा, ‘हमें क्या? तू ही जान।’ तब वह उन सिक्कों को मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को फाँसी दी।”  मत्ती 27:3-5

यीशु को पकड़वाने के बाद यहूदा का क्या हुआ? “उसने अपना मन बदल लिया।” इस वाक्यांश का अनुवाद भी कितनी सहायक रीति से किया गया है, “वह पछताया।” ऐसा लगता है कि उसी क्षण यहूदा का हृदय परिवर्तित हो गया, और इसके साथ ही उसका दृष्टिकोण भी बदल गया।

हम जिस यहूदा को गतसमनी के बगीचे में देखते हैं, जो हथियार लिए लोगों की एक बड़ी भीड़ का नेतृत्व करते हुए यीशु को धृष्टता और निर्लज्ज कटुता के साथ गिरफ्तार कराता है, वह यहूदा नहीं है जिसे हम यहाँ घण्टों बाद प्रधान याजकों और पुरनियों के सामने देखते हैं। उसके कठोर हृदय का स्थान अब पश्चाताप की भावना ने ले लिया है, जिसने उसकी आत्मा को जकड़ लिया है।

एक क्षण के लिए यहूदा के अनुभव के बारे में सोच कर देखें और इसे एक चेतावनी बन जाने दें कि पाप सर्वदा झूठी आशा प्रदान करता है। पाप करने से पहले के क्षण प्रायः उसके बाद के क्षणों से बिल्कुल अलग महसूस होते हैं। यह वही बड़ा बदलाव है, जो आदम और हव्वा ने अपनी अनाज्ञाकारिता के बाद अदन के बगीचे में महसूस किया था। उन्हें उस क्षण में, जब उन्होंने फल खाने का निर्णय लिया, जो कुछ भी पता था और जो कुछ भी उन्होंने उस विद्रोह के कार्य में आशा की थी, वह सब उनके मुँह में धूल बनकर रह गया। (उत्पत्ति 3:6-8)। इसी प्रकार, यीशु को उसके शत्रुओं के हाथों पकड़वाने में जो कुछ भी यहूदा को आकर्षक लग रहा था, वह जल्दी ही उसके लिए कुछ भी नहीं रह गया था।

जब हम पाप करते हैं तो वे सभी मोहक, मादक प्रभाव, जो हमें विद्रोह करने के लिए आकर्षित करते हैं, एक क्षण में ही खत्म हो जाते हैं। जो सोने के समान चमक रहा था वह व्यर्थ वस्तु बन जाती है। केवल यह स्पष्ट तथ्य रह जाता है कि मैंने एक पवित्र, प्रेमपूर्ण परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है।

इस तरह का परिवर्तनकारी पछतावा होने पर हमारे पास विकल्प यह होता है कि हम पश्चाताप करें और परमेश्वर से मेल कर लें या निराश होकर अपने आप को दोषी ठहराएँ। दुखद रूप से, यहूदा ने बाद वाला विकल्प चुना। उसका अपराध इतना बड़ा था कि निश्चय ही हर चेहरा उसे दोषी ठहरा रहा था, वह जो भी आवाज सुन रहा था वह उसे चुभ रही थी, उसकी आत्मा की हर प्रतिध्वनि उसे दोषी ठहरा रही थी। जो धन उसे दिया गया था, वह उसने प्रधान याजकों को लौटाकर अपने अपराध को कम करने का प्रयास किया, तौभी सिक्कों की थैली का भार अपने ऊपर से हटाकर वह अपने हृदय पर पड़े बोझ नहीं हटा पाया। अपने को अलगाव की इस स्थिति में और किसी प्रकार के सुधार की आशा से परे महसूस करते हुए वह एक भयानक मौत मारा गया। हो सकता है कि आज आप भी अपने पाप के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर रहे हों। हो सकता है कि आपने अपने आप सब ठीक करने का प्रयास किया तो हो, किन्तु बोझ अभी भी बना हुआ है। यदि ऐसा है तो यह जान लें कि यहूदा की कहानी को आपकी बनने की आवश्यकता नहीं है। आप मसीह की ओर फिर सकते हैं। वह स्वतन्त्रता और क्षमा प्रदान करता है, एक ऐसा जूआ देता है जो सहज है और एक ऐसा बोझ देता है जो हल्का है (मत्ती 11:28-30)। इसी कारण मसीह मरा कि यहूदा जैसे पापी विश्वासघातियों को छुटकारा दे सके।

अगली बार जब पाप हमें अपनी ओर आने का संकेत करे तो यहूदा का उदाहरण हमारे लिए चेतावनी के रूप में मौजूद है। इस समय कौन से पाप आपको विशेष रूप से लुभा रहे हैं? याद रखें कि वे जैसे पहले दिखाई देते हैं, वे बाद में वैसे नहीं लगेंगे। प्रलोभन के क्षणों के लिए सहायता और अपराध-बोध के क्षणों के लिए आशा उपलब्ध है। परमेश्वर की क्षमा हमारे पछतावे और पश्चाताप की प्रतीक्षा कर रही है। आपको केवल इतना करना है कि उसकी ओर मुड़ें।       

भजन संहिता 51

March 12 : जेव्हां घडविणारा आपल्यां बाजूनें असतो

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March 12 : जेव्हां घडविणारा आपल्यां बाजूनें असतो
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“जो आपल्यां उत्पन्नकर्त्याशी वाद घालतो त्यास धिक्कार असो! तो मातीच्या खापर्‍यापैकीं एक आहे. तू काय करतोस असे माती आपल्यां घडणा-याला म्हणेल काय? तुला हात नाहींत असे तुझे कृत्य तुला म्हणेल काय?” ( यशया 45:9)

देवाचा प्रतापीपणा अधिक उंचविला जातो जेव्हां आपण त्याच्याकडें एक निर्माणकर्ता ज्यानें शून्यातून हे विश्व निर्माण केलें, या दृष्टीने पाहतो. देव शून्यतेला आज्ञा करतो, आणि ती त्याची आज्ञा पाळते आणि शून्यातून विश्व निर्माण होते.

शून्यातून त्यानें माती घडवली, व त्या मातीतून त्यानें आपल्यांला घडवले- देवाची कलाकृती (यशया 45:9) – त्याच्या मालकींचे लोक, त्याच्या  गौरवाकरिता नेमून ठेवलले व त्याच्यावर पूर्णपणे अवलंबून असलेले. “परमेश्वर हाच देव आहे हे जाणा ; त्यानेंच आम्हांला उत्पन्न केलें; आम्हीं त्याचेंच आहों, आम्हीं त्याची प्रजा, त्याच्या कुरणातील कळप आहों” (स्तोत्र 100:3). दुसर्‍याच्या मालकींचे मेंढरू व पात्र असणे ही एक नम्र करणारी गोष्ट आहे.

आज सकाळी मी यशयाचे पुस्तक वाचत असताना मला देवाच्या प्रतापीपणाविषयीं आणखी एक वचन सापडले. जेव्हां मी ते वचन देवाच्या संपूर्ण सामर्थ्याशी व उत्पन्नकर्त्याच्या असलेल्यां अधिकाराशी एकत्र केलें, तेव्हां त्याचें एक ज्वलंत मिश्रण होऊन माझ्या मनात एक स्फोट झाला. धडाम!

यशया 33:21 म्हणते, “प्रतापी परमेश्वर आम्हांसाठीं असेल!”

आम्हांसाठीं! आम्हांसाठीं! निर्माणकर्ता आम्हांसाठीं आहे, आमच्या विरुद्ध नाहीं.   सर्व शक्तिनिशी आणि जे त्यानें घडवले आहे त्यावर संपूर्ण अधिकारासह – तो आम्हांसाठीं आहे!

“हे देवा, तुझी आशा धरून राहणार्‍यांचे इष्ट काम करणारा असा तुझ्याशिवाय दुसरा कोणी प्राचीन कालापासून ऐकण्यात आलेला नाहीं, त्याचें नाव आलेले नाहीं, कोणी तो डोळ्यांनी पाहिला नाहीं” (यशया 64:4). “देव आपल्यांला अनुकूल असल्यांस आपल्यांला प्रतिकूल कोण?” (रोम 8:31). 

तुम्हीं आणखी कोणत्या गोष्टीचा विचार करू शकता का, जी  इतकीं सांत्वन देणारी, खात्री देणारी व आनंद देणारी आहे कीं, हा प्रतापी परमेश्वर तुमच्यासाठीं आहे?

11 मार्च : उसकी युक्ति के अनुसार

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11 मार्च : उसकी युक्ति के अनुसार
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“तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?”  1 कुरिन्थियों 4:7

हम इसे कई तरीकों से छिपाते हुए अलग-अलग नाम देते हैं, किन्तु ईर्ष्या ऐसे इवेंजेलिकल पापों में से एक है जो प्रायः “सहनीय” माना जाता है। इसकी सम्भावना बहुत कम है कि यह आपको उन “दस सबसे अधिक किए जाने वाले” पापों की सूची में मिले जिसके विरुद्ध कोई पास्टर अपनी कलीसिया को चेतावनी देता हो या एक-दूसरे के साथ अपने संघर्षों के बारे में बात करते समय विश्वासी इसका उल्लेख प्रायः करते हों। तो भी, यह परमेश्वर की सूची में है और प्रायः पवित्रशास्त्र में इसका उल्लेख किया गया है। वास्तविकता यह है कि ईर्ष्या कुछ सबसे घिनौने पापपूर्ण व्यवहारों की सूची के बीच पाई जाती है, जिनका नए नियम की पत्रियों में उल्लेख किया गया है क्योंकि इसे बहुत गम्भीरता से लिया जाना चाहिए (उदाहरण के लिए, रोमियों 13:13 देखें)।

जब पौलुस ने कुरिन्थियों को पत्र लिखा था, उस समय से आज तक कुछ विशेष बदलाव नहीं आया है। सामान्य स्थानीय कलीसिया अभी भी ईर्ष्या के कारण बहुत अधिक अराजकता तथा विभाजन के कारण जूझ रही है और ईर्ष्या द्वारा उत्पन्न संकटों में से एक सम्भावना यह है कि हम सन्देह करने लगें कि क्या परमेश्वर जानता भी है कि वह वरदानों का वितरण किस प्रकार कर रहा है।

पौलुस कलीसिया के इन घमण्डी, विभाजित, ईर्ष्यालु सदस्यों से कहता है कि तुम्हारे पास जो कुछ भी है वह तुमने किसी दूसरे से पाया है  और वरदानों का देने वाला वह जगत का सृष्टिकर्ता, गलतियाँ नहीं करता। तो फिर वे, और हम भी, इस प्रकार अहंकार पूर्वक कैसे रह सकते हैं, मानो सृष्टि का नियन्त्रण हम अधिक अच्छे ढंग से कर सकते हैं? अपनी ऊँचाई, परिधि, गति या अपनी किसी भी योग्यता को क्या हमने निर्धारित किया है? हमें किसने विशिष्ट बनाया है? परमेश्वर ने! हमारा डी.एन.ए. परमेश्वर की ओर से नियोजित है। हमारी परिस्थितियाँ ठीक वैसी ही हैं जैसी परमेश्वर ने युक्ति की है, और वह गलतियाँ नहीं करता। डाह एक पाप इसलिए है, क्योंकि यह एक ऐसा रवैया है जो कहता है कि परमेश्वर भला नहीं है या वह नहीं जानता कि हमारे लिए क्या भला है। डाह मूर्तिपूजा जैसी लगती है।

एक संगीत मण्डल के रूप में जीवन के मंच जब हम बाँसुरी जैसा एक यन्त्र बजा रहे हों और अपने से कुछ ही दूरी पर एक बड़ी तुरही को ऊँचे और शक्तिशाली स्वरों के साथ बजती हुई देखें, तब हो सकता है कि हम अपने आप से यह कहना चाहें, “कोई भी मुझे नहीं सुन पा रहा। मेरा स्वर पर्याप्त रूप से ऊँचा नहीं है।” वहीं से अपनी स्थिति के बारे में कड़वाहट की भावना और तुरही वादक के प्रति ईर्ष्या की भावना उत्पन्न होती है। परन्तु हमारी बाँसुरी जैसे वाद्य यन्त्र की ध्वनि का भी एक कारण है। यह वह वाद्य यन्त्र है जिसे हमें ही बजाना है। इसलिए इसे आनन्द से और उत्कृष्टता के साथ बजाएँ!

परमेश्वर द्वारा दिए गए वरदानों का उपयोग करने के हमारे प्रयासों में हम एक-दूसरे से ईर्ष्या क्यों करते हैं? हम अपने उस आनन्द को असन्तोष के हाथों क्यों छिन जाने देते हैं, जो उसने हमें मुक्त रूप से प्रदान किया है? उसने किसी और के लिए जो किया है, उसके कारण हम क्यों उसके प्रति अन्धे हो जाते हैं कि उसने हमारे लिए क्या किया है, विशेषकर अपनी उपस्थिति में हमें अनन्त धरोहर देने में? इस एक सत्य को हम सभी को अभ्यास करने की आवश्यकता है, “परमेश्वर ने मुझे वही दिया है जो मुझे चाहिए, मैं बिल्कुल वैसा ही रचा गया हूँ जैसी उसकी इच्छा थी, और जो कुछ उसने मुझे दिया है और जो कुछ नहीं दिया है, वह मेरे भले और उसकी महिमा के लिए है।”

ईर्ष्या को अपने ऊपर हावी न होने दें। इसके विपरीत, जिस भूमिका के लिए आपको बनाया गया है, उसे आनन्द के साथ जीएँ। क्योंकि आप उसके बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए हैं, जिन्हें परमेश्‍वर ने पहले से हमारे करने के लिए तैयार किया है और आपको वरदान में दिया है (इफिसियों 2:10)। उसको ही आज अपने लिए पर्याप्त होने दें।       1 तीमुथियुस 6:6-12

March 11 : दोन अमर्याद सबळ आणि मृदु सत्य

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March 11 : दोन अमर्याद सबळ आणि मृदु सत्य
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“मी आरंभीच शेवट कळवितो. होणार्‍या गोष्टी घडविण्यापूर्वी त्या मी प्राचीन काळापासून सांगत आलो आहे; माझा संकल्प सिद्धीस जाईल, माझा मनोरथ मी पूर्ण करीन . ” ( यशया 46:10 )

“सार्वभौमता” हा शब्द (“ट्रिनिटी”- त्रेकय ह्या शब्दाप्रमाणेच) पवित्र शास्त्रात आढळत नाहीं. आपण त्याचा उपयोग हे सत्य सांगण्यास करतो कीं, देवच ह्या जगाचा सर्वोच्च नियंत्रक आहे, मोठ्यातल्यां मोठ्या आंतरराष्ट्रीय घडामोडी व जंगलातील लहानातील लहान पाखराचे झाडावरून पडणे, ह्या सर्व गोष्टींवर त्याचें सर्वोच्च नियंत्रण आहे.

बायबल हा सिद्धांत अशाप्रकारे मांडतो : …मीच देव आहे, दुसरा कोणी नव्हे, माझ्यासमान कोणीच नाहीं…… ‘माझा संकल्प सिद्धीस जाईल, माझा मनोरथ मी पूर्ण करीन. (यशया 46:9–10.) आणि : तो (देव) आकाशातील आपल्यां सैन्याचे व पृथ्वीवरील रहिवाशांचे इच्छेस येईल ते करतो; “तू असे काय करतोस?” असे त्याचा हात धरून कोणाच्याने त्याला म्हणवत नाहीं” (दानीएल 4:35). आणि : “तो न बदलणारा आहे, त्याला त्यापासून कोण फिरवणार? आपल्यां मनास येते ते तो करतो; जे मला नेमले आहे ते तो घडवून आणत आहे; अशा पुष्कळ गोष्टी त्याच्याजवळ आहेत” (इयोब  23:13–14). आणि : “आमचा देव स्वर्गात आहे; त्याला योग्य दिसते ते सर्व तो करतो” (स्तोत्र 115:3).

ही शिकवण विश्वासणा-या करीत खूप मौल्यवान असण्याचे एक कारण हे आहे कीं, जे देवावर विश्वास ठेवतात त्यांचावर दया व कृपा करणे हा देवाचा मनोरथ आहे (इफिस 2:7, स्तोत्र 37:3-7, नीति 29:25).  देवाच्या सार्वभौमतेचा अर्थ असा होतो कीं आपल्यांकरिता असलेली त्याची योजना कधीच विफल होत नाहीं ती अपयशी होऊंच शकत नाहीं.

“जे देवावर प्रीति करतात” व ” जे त्याच्या संकल्पा प्रमाणे बोलाविलेलें” आहेंत, त्यांच्या बरोबर अशी कोणतीच गोष्ट घडत नाहीं जी सखोलपणे, दीर्घपणे व त्यांच्या सर्वोच्च कल्यांणाकरिता कार्य करीत नाहीं ( रोम 8:28 ; स्तोत्र 84:11 ). 

यासाठींच मी म्हणतो कीं देवाची दया व त्याचें सार्वभौमत्व हे माझ्या जीवनाचे दोन स्तंभ आहेत. ते माझ्या भविष्याची आशा आहेत, माझ्या सेवाकार्याचे बळ आहेत, माझ्या ईश्वरविज्ञानाचा केंद्रबिंदू आहेत, माझ्या विवाहाचा बंध आहेत, माझ्या सर्व रोगांचे औषध आहेत आणि माझ्या सर्व निराशेचा उपाय आहेत.

आणि जेव्हां मी मृत्युच्या पायरीवर येईन ( आता किंवा कालांतराने ) तेव्हां ही दोन सत्य माझ्या मृत्यूशय्येच्या बाजूला उभी असतील आणि अमर्याद बळाने आणि कोमलतेने मला उंचावून देवाकडें नेतील.

10 मार्च : अकेले पड़ जाने का झूठ

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10 मार्च : अकेले पड़ जाने का झूठ
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“हे परमेश्‍वर, कब तक! क्या तू सदैव मुझे भूला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रहेगा?”  भजन संहिता 13:1

लोग कहते हैं कि जब आप मौज-मस्ती कर रहे होते हैं, तो समय बहुत तेज़ी से बीतता हुआ प्रतीत होता है। किन्तु जब परिस्थितियाँ कम उत्साही हो जाती हैं, तो जीवन धीमी गति से चलता हुआ प्रतीत होता है। हम अपने आप को यह सोचते हुए पाते हैं, “मुझे नहीं पता कि मैं कभी इन परिस्थितियों से बाहर निकल पाऊँगा या नहीं। और मुझे नहीं पता कि मैं इन्हें कैसे सहन कर पाऊँगा।”

भजन संहिता 13 में बार-बार पूछा जाने वाला एक प्रश्न यह है, “कब तक? कब तक?” यहाँ पर दाऊद की परिस्थितियों का तो वर्णन नहीं किया गया है, किन्तु वह स्पष्ट रूप से भुला दिया गया और त्यागा हुआ महसूस कर रहा है, जो एक ऐसी भावना है जिसे हम सभी समझ सकते हैं। यह वैसा ही है, जैसा हम किसी प्रियजन को खो देने पर महसूस करते हैं या जब हमें लगता है कि हमें अकेले ही किसी परीक्षा की घाटी से होकर जाना होगा।

अकेला पड़ जाना निस्सन्देह कुचल देने वाला अनुभव होता है। परन्तु यहाँ दाऊद ने जो लिखा है, वह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। वह महसूस कर रहा है कि स्वयं परमेश्वर ने ही उसे अकेला छोड़ दिया है।

यही भावना सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के कई अन्य लोगों में भी दिखाई देती है। यशायाह की पुस्तक में निर्वासन में गए हुए परमेश्वर के लोग चिल्लाते हैं, “यहोवा ने मुझे त्याग दिया है, मेरा प्रभु मुझे भूल गया है” (यशायाह 49:14)। मसीही पथ पर चलने वाले यात्रियों का, अर्थात् यीशु के सच्चे अनुयायियों और सेवकों का भी कभी-कभी यह कहने का मन करता है, “मुझे लगता है कि प्रभु ने सच में हमें भुला दिया है। यदि उसने सच में हमें भुला न दिया होता, यदि वह अब भी हमारे साथ होता तो हम इस स्थिति में कैसे होते? यदि वह सच में हमारी रक्षा कर रहा होता तो निश्चित रूप से हमें इन परीक्षाओं को नहीं झेलना पड़ता।”

फिर भी दाऊद की इस उभरती हुई निराशा में हम पाते हैं कि उसका अनुभव (जैसा कि प्रायः हमारे साथ भी होता है) वास्तविकता को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा है। और दाऊद में इस बात को स्वीकारने की आत्मिक परिपक्वता और दीनता है कि जो उसे सच लग रहा है , वह उससे मेल नहीं खा रहा जो वह जानता है  कि वास्तव में सच है। इसलिए वह स्वयं को परमेश्वर की महाकरुणा, उसके उद्धार और उसकी उदारता की याद दिलाता है, और संघर्ष और पीड़ा में होते हुए भी उन बातों में आनन्दित रहने का संकल्प लेता है (भजन संहिता 13:5-6)।

मसीही जीवन का आशा से भरा तनाव यही है। हम पूछ रहे होते हैं, “हे प्रभु, कब तक? हे परमेश्वर, आप कहाँ हैं?” जबकि हम अपने हृदयों को याद दिला रहे होते हैं कि परमेश्वर ने हमसे प्रेम करना, हमें छुड़ाना या हमारे भीतर काम करना समाप्त नहीं किया है।

त्याग दिए जाने के झूठ पर विश्वास न करें, जिसे आपकी भावनाएँ आपके सामने परोसती रहती हैं। अपने भुलक्कड़ लोगों के प्रति परमेश्वर की शान्ति प्रदान करने वाले इस प्रत्युत्तर में विश्राम प्राप्त करें, “क्या यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाए और अपने जन्माए हुए लड़के पर दया न करे? हाँ, वह तो भूल सकती है, परन्तु मैं तुझे नहीं भूल सकता। देख, मैं ने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोदकर बनाया है; तेरी शहरपनाह सदैव मेरी दृष्टि के सामने बनी रहती है” (यशायाह 49:15-16)। अपने बच्चों के लिए परमेश्वर का संरक्षण सूर्य के समान है, वह स्थाई है। यहाँ तक कि जब बादल इसे अवरुद्ध कर देते हैं, तब भी वह वहाँ होता है। यह सर्वदा वहाँ होता है।

क्या आप आज परमेश्वर की स्थिरता पर भरोसा करेंगे? जब आप अगली बार त्यागा हुआ महसूस करें तो यह जान लें कि परमेश्वर अपने हाथों को देखता है, जिन पर उसकी प्रत्येक सन्तान का नाम खुदा हुआ है और वह कहता है कि तुम यहीं हो। मैं तुम्हें नहीं भूला हूँ।       

भजन संहिता 13

March 10 : आपण कोकर्‍याची भक्ति करूया

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March 10 : आपण कोकर्‍याची भक्ति करूया
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ही गुंडाळी उघडण्यास किंवा तिच्यात पाहण्यास योग्य असा कोणी आढळला नाहीं म्हणून मला फार रडू आले “. (प्रकटीकरण 5:4)

तुम्हीं कधी असा विचार केला आहे का, कीं तुमच्या प्रार्थना स्वर्गामधील सुवासा सारख्या आहेत?  प्रकटीकरण 5 वाचल्यांवर हेच चित्र समोर तयार होते. स्वर्गामधील जीवनाची ही एक झलक आहे.

प्रकटीकरण 5 मध्यें आपण पाहतो कीं, सर्वसमर्थ देव हातामध्यें गुंडाळी घेऊन राजासनावर बसला आहे. या गुंडाळीवर सात शिक्के आहेत. ती गुंडाळी उघडण्यासाठीं हे सात शिक्के फोडावे लागणार आहेत.

मला असे वाटते कीं गुंडाळीचे उघडणे हे मुक्तिच्या इतिहासाच्या शेवटच्या दिवसाचे दर्शक आहे, आणि शिक्क्यांचे फोडले जाणे हे आपली त्या दिवसाकडील वाटचालीच्या इतिहासाचे दर्शक आहे.

प्रकटीकरण 5:4 मध्यें सुरवातीला, योहान रडत असतो कारण ती गुंडाळी उघडण्यास कोणी योग्य नाहीं. तेव्हां स्वर्गातील वडीलमंडळापैकीं एक जण योहानाला म्हणतो कीं, “रडू नकोस; पाहा, ‘यहूदा’ वंशाचा ‘सिंह’, दाविदाचा ‘अंकुर’ ह्याने जय मिळवला; म्हणून तो तिचे सात शिक्के फोडून ती उघडण्यास योग्य ठरला आहे” ( प्रकटीकरण 5:5).

क्रूसावरील मरण स्वीकारून, येशूनें  मुक्तिच्या इतिहिसातील होऊ घातलेल्यां घटनां उघडण्याचा व त्याच्या लोकांना त्यातून विजयी वाटचाल करीत नेण्याचा अधिकार मिळवला.

पुढच्या वचनामध्यें, सिंहाचे चित्रण कोक-या प्रमाणे करण्यात आले आहे, “ज्याचा जणू काय वध करण्यात आला होता, असा कोकरा उभा राहिलेला मी पहिला” (प्रकटीकरण 5:6). येशूच्या क्रूसावरील विजयाचे हे सुंदर चित्रण आहे, नाहीं का? वधला असला तरी, उभा असलेला, खाली झोपलेला नाहीं!

हे तितक्याच खात्रीचे आहे जसे सिंहाने त्याच्या शत्रूला गिळंकृत केलें आहे – पण त्यानें हा विजय त्याच्या शत्रूंकडून स्वत:चा वध करून प्राप्त केला आहे !

त्यामुळे, कोकरा आता देवाच्या हातातून मुक्तीच्या इतिहासाची गुंडाळी घेऊन उघडण्यास समर्थ झाला आहे. हा किती राजेशाही क्षण आहे, जेव्हां स्वर्गामधील चोवीस वडील भक्ति करण्यास त्याच्या पाया पडत आहेत.

तुम्हांला ठाऊक आहे का, कीं धुपाने भरलेल्यां सोन्याच्या वाट्या काय आहेत? प्रकटीकरण 5:8 सांगते कीं “त्या पवित्र जनांच्या ‘प्रार्थना’ होत.” याचा अर्थ असा होत नाहीं का, कीं आपल्यां प्रार्थना स्वर्गातल्यां सुगंधा प्रमाणे आहेत, देवाच्या राजासना समोर व कोक-या समोर एका सुवासा प्रमाणे आहेत?

जेव्हां मी विचार करतो कीं माझ्या प्रार्थना साठवून ख्रिस्ताच्या स्वर्गातील भक्तिमध्यें सादर केल्यां जातात, तेव्हां मला अधिक जोमाने प्रार्थना करण्याचे सामर्थ्य व उत्तेजन प्राप्त होते.

तर आपण खाली आपल्यां प्रार्थनांद्वारें ख्रिस्ताला मान, गौरव व आपली भक्ति सादर करू, आणि आपल्यां प्रार्थना स्वर्गीय मंडळीद्वारें ख्रिस्त, जो वधला गेला होता, त्याला सुंगधी धुपाप्रमाणे सादर केल्यां जातात यात दुहेरी आनंद मानू.

9 मार्च : सीखने के लिए एक अवसर

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9 मार्च : सीखने के लिए एक अवसर
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“मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो।”  मत्ती 11:29

जब बच्चे स्कूल से घर पहुँचते हैं, तो उनके माता-पिता उनसे क्या पूछते हैं?

कुछ लोग पूछते होंगे कि “क्या तुमने आज कुछ सीखा?” किन्तु कई लोग कुछ ऐसा कहते होंगे कि “क्या तुमने आज मज़ा किया?”

स्कूली शिक्षा के सम्बन्ध में यह महत्त्व नहीं रखता कि कौन सा प्रश्न पूछा जाता है और उसके परिणामस्वरूप कौन सी प्राथमिकता उजागर होती है। किन्तु कलीसिया के बारे में भी प्रायः यही प्रश्न पूछा जाता है कि क्या हमने आज कलीसिया में मज़ा  किया? क्या हमने कलीसिया का आनन्द  लिया?

इसके विपरीत, हमें जो पूछना चाहिए वह यह है, “हम यीशु के बारे में और यीशु से क्या सीख  रहे हैं?”

यीशु हमें उससे सीखने का अवसर देने का महान विशेषाधिकार प्रदान करता है। चारों सुसमाचारों में उसकी शिक्षा जीवन के बड़े प्रश्नों को सम्बोधित करती है, अर्थात् मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं कहाँ जा रहा हूँ? क्या जीवन का कोई महत्त्व है भी?

यीशु मसीह को व्यक्तिगत प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में जानना इन बड़े विषयों के बारे में लोगों के सोचने के तरीके को बदल देता है। यह समय के बारे में, संसाधनों के बारे में, आजीविका के बारे में, या फिर वे किस तरह के व्यक्ति से विवाह करना चाहेंगे या वे किस तरह का जीवनसाथी बनना चाहते हैं, इस बारे में उनके दृष्टिकोण को बदल देता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि यीशु को सच में जानने का अर्थ है उसे अपने जीवन पर अधिकारी बनने के लिए आमन्त्रित करना। जैसे-जैसे हम उससे सीखते हैं, सब कुछ बदल जाता है।

यीशु के पास आना इस बात को सीखने और उसके प्रति प्रत्युत्तर देने से आरम्भ होता है कि मसीह, अर्थात् अधर्मियों (जो कि हम हैं) के लिए धर्मी (जो कि वह है) ने पापों के कारण एक बार दुख उठाया ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए (1 पतरस 3:18)। केवल मस्तिष्क में इस बात की जानकारी का होना इस बात पर विश्वास करने, इस पर भरोसा करने और जिसने हमें यह सब दिया है उसका जूआ प्रसन्नता के साथ अपने ऊपर उठा लेने के बराबर नहीं है।

हम सभी ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने जीवन की पहेली को सुलझाने के प्रयास में लगे हैं और पहेली के टुकड़ों को जितना हो सके उतना एक साथ जोड़ने का यत्न कर रहे हैं, और हम सब भी कभी न कभी ऐसी परिस्थिति में रह चुके हैं। किन्तु जब तक हम परमेश्वर से सीखने के लिए तैयार नहीं होंगे तब तक वे टुकड़े एक साथ नहीं जुड़ सकेंगे। परन्तु अब हम वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, हमारी बौद्धिक क्षमता के कारण नहीं अपितु इसलिए क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा यह चुनता है कि हम उसको जानें।

क्या आप अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यीशु से सीखने के लिए तैयार हैं? क्या आप उसकी शिक्षाओं का पालन करने और अपने आप को उसके अधिकार के अधीन रखने के काम को एक विशेषाधिकार के रूप में देखते हैं, न कि एक बोझ के रूप में? सुनिश्चित करें कि आप सुसमाचार के सत्य को सीखने के प्रत्येक अवसर का लाभ उठाएँगे, जो आपके हृदय की तृष्णा को तृप्त करेगा और दिन-प्रतिदिन आपके जीवन को परिवर्तित करता जाएगा।

      इफिसियों 4:17 – 5:2

March 9 : देव तुमची काळजी घेतो

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March 9 : देव तुमची काळजी घेतो
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“म्हणून देवाच्या पराक्रमी हाताखाली लीन व्हा, ह्यासाठीं कीं, त्यानें योग्य वेळी तुम्हांला उंच करावे. त्याच्या वर तुम्हीं आपली सर्व चिंता टाका कारण तो तुमची काळजी घेतो.” (1 पेत्र 5:6-7)

भविष्याबद्दल काळजी करणे हे गर्व करण्यासारखे का आहे ?

देव अशा प्रकारे उत्तर देईल ( यशया 51:12  – दुसर्‍या शब्दात ):

मी- परमेश्वर, तुझा निर्माणकर्ता – तुमचे सांत्वन करणारा मी, केवळ मीच आहे, तुझी काळजी घ्यायचे मी वचन देतो; जे तुला धमकावतात, ते तर मर्त्य लोक आहेत. त्यामुळे तुझ्या भयाचा असा अर्थ होतो कीं तुझा माझ्यावर विश्वास नाहीं – आणि तुझी काळजी घेण्याकरिता तुझा, तुझ्या स्वत:च्या संसाधनांवर देखील विश्वास नाहीं, तरी तू माझ्या भविष्यातील कृपेवर विश्वास ठेवण्यापेक्षा स्वत: च्या कमकुवत स्वयंपूर्णेतेवर अवलंबून आहेस. त्यामुळे तुझे सर्व थऱथऱ कापणे- कितीही कमकुवत असेल तरी – ते तुझा गर्व प्रकट करते.

यावर उपाय? स्वतावर विसंबून राहण्याऐवजी देवावर विसंबून रहा, आणि भविष्यातील कृपेसाठीं देवाच्या स्वयंसिद्ध अभिवचनांच्या सामर्थ्यावर भरवसा ठेवा.

1 पेत्र 5:6-7 मध्यें, तुम्हीं पाहू शकता कीं, चिंता करणे हे एक प्रकारच्या गर्वा प्रमाणे आहे, “देवा च्या…. पराक्रमी हाताखाली…. लीन व्हा” (आणि वचन 7)” त्याच्यावर तुम्हीं आपली सर्व चिंता टाका”  यातील व्याकरण पहा. वचन 7 हे नवीन वाक्य नाहीं, ते संयुक्त वाक्य आहे, ते एकमेकाला जोडलेले आहे. ते आपण अशा शब्दांत मांडू शकतो : “त्याच्यावर तुम्हीं ‘आपली’ सर्व ‘चिंता टाकून लीन व्हा.”

याचा अर्थ देवावर आपल्यां सर्व चिंता टाकणे म्हणजे त्याच्या पराक्रमी हाताखाली लीन होणे असा होतो. हे असे म्हणण्यासारखे आहे कीं, “नम्रपणे जेव…. आपले तोंड बंद ठेवून,” किंवा, “लक्षंपूर्वक गाडी चालव …. तुझी दृष्टि रस्त्यावर ठेवून,” किंवा, “दानशूर हो…. कोणाला तरी घरी भोजनाला आमंत्रित करून,” किंवा,  स्वत:ला लीन कर…. सर्व भय देवावर टाकून.”

स्वत:ला नम्र करण्याचा एक मार्ग म्हणजे आपल्यां सर्व चिंता देवावर टाकणे. याचा अर्थ, देवावर सर्व चिंता टाकण्यामध्यें आपला गर्व अडथळा निर्माण करतो. याचा अर्थ, आपली गैरवाजवी चिंता एक प्रकारचा गर्वच आहे. कितीही कमकुवत वाटला किंवा दिसला तरी.

तर मग, आपली चिंता देवावर टाकणे हे गर्वाच्या विपरीत कसे आहे ? कारण गर्व हे मान्य करीत नाहीं कीं त्याला चिंता आहेत. किंवा आपण त्यांची काळजी स्वत: घेऊ शकत नाहीं. जर गर्वाला हे मान्य करायचे असेल कीं आपले भयावर नियंत्रण नाहीं, तरी देखील त्याला यावरील उपाय, कीं आपण दुसर्‍या कोणावर तरी विसंबून राहायचे जो आपल्यांपेक्षा जास्त सामर्थ्यशाली आणि ज्ञानी आहे, ते मान्य करायचे नसते.  

दुसर्‍या शब्दात सांगायचे झाले तर, गर्व हा एक प्रकारचा अविश्वास आहे, ज्याला देवाच्या भविष्यातील कृपेवर विश्वास ठेवायचा नसतो. पण याउलट, विश्वास हे मान्य करतो कीं त्याला सहाय्याची गरज आहे. गर्व हे मान्य करीत नाहीं. विश्वास देवाच्या सहाय्यावर भरवसा ठेवून राहतो, गर्व हे नाहीं करत. विश्वास सर्व चिंता देवावर टाकतो, गर्व टाकींत नाहीं.

ह्यास्तव, गर्वाच्या अविश्वासावर लढा द्यायचा असेल तर हे कबूल करावें कीं मला चिंता आहेत, आणि देवाचे भविष्यातील कृपेचे अभिवचन “तो तुमची काळजी करतो” याचे मनात जतन करा. आणि मग सर्व चिंता त्याच्या सामर्थ्यशाली बाहुंवर सोपवून द्या.

8 मार्च : अब्राहम की आशा

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“न अविश्वासी होकर परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा पर संदेह किया, पर विश्वास में दृढ़ होकर परमेश्‍वर की महिमा की।”  रोमियों 4:20

अब्राहम के सन्तान पैदा होने से पहले ही परमेश्वर ने उससे प्रतिज्ञा की थी कि उसके वंशज संख्या में वृद्धि करके एक विशाल जनसमूह बन जाएँगे। समय बीतता गया और ऐसा लगने लगा कि अब्राहम और उसकी पत्नी सारा को कभी कोई सन्तान नहीं होगी। ऐसा लग रहा था कि प्रतिज्ञा पूरी न हो सकेगी, इसलिए अब्राहम और सारा ने प्रतीक्षा न करते हुए स्वयं ही इस विषय में कुछ करने का निर्णय लिया। सारा ने अपनी दासी हाजिरा को अब्राहम के लिए एक सन्तान उत्पन्न करने का प्रस्ताव दिया और हाजिरा ने एक बच्चे को जन्म दिया, जिसका नाम इश्माएल रखा गया। फिर भी परमेश्वर ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसने जो वंशज देने की प्रतिज्ञा की थी, वे इश्माएल की वंशावली से नहीं आने वाले थे। परमेश्वर अब्राहम और सारा को दिखा रहा था कि यदि उसकी प्रतिज्ञा को पूरा होना है, तो केवल वही इसे पूरा कर सकता है। अब्राहम को एक काम दिया गया और वह था परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा करना, एक ऐसी प्रतिज्ञा पर जिसके पूर्ण होने में भारी कठिनाइयाँ थीं और इसलिए उसे पूर्ण करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता थी।

वर्ष बीतते गए और सारा अभी भी गर्भवती न हुई। परमेश्वर फिर से अब्राहम के पास आया और उसे आश्वस्त किया कि इतनी आयु हो जाने के बाद भी सारा एक बेटे को जन्म देगी। अन्ततः, नब्बे साल की आयु में उसने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम इसहाक रखा गया, जिसका अर्थ है “वह हँसता है।” अब्राहम, जो एक बार इसहाक के जन्म की सम्भावना पर सन्देह करते हुए हँसा था (उत्पत्ति 17:17), वह अब निश्चित रूप से विस्मय से अभिभूत था।

परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करता है। नब्बे साल की स्त्री के लिए सन्तान को जन्म देना असम्भव बात है, परन्तु परमेश्वर ऐसा करने में सक्षम है। इस वृद्ध दम्पति को दी गई एक वारिस की प्रतिज्ञा को पूरा होने के लिए अन्य किसी भी बात से बढ़कर जीवन के अलौकिक वरदान की आवश्यकता थी। परमेश्वर के दिव्य हस्तक्षेप के बिना कोई सन्तान नहीं हो सकती थी, अर्थात् कोई जन्म हो ही नहीं सकता था। इसी प्रकार, परमेश्वर के हस्तक्षेप के बिना कोई आत्मिक जीवन नहीं हो सकता। किन्तु उसके सामर्थ्य से एक नया जीवन मिल सकता है, एक सच्चा जीवन! आदि से ही परमेश्वर अपने लोगों को सिखा रहा था कि किसी भी जीवन में सुसमाचार को जड़ पकड़ने के लिए आश्चर्यकर्म की आवश्यकता पड़ती है।

परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी करता है। और अपने लोगों से की गई उसकी प्रतिज्ञाएँ बहुत सारी हैं, वे सभी शोभायमान हैं और वे सब मसीह में “हाँ” के साथ हैं (2 कुरिन्थियों 1:20)। हमारा काम बसी यही है कि हम वही करें जो अब्राहम ने करना सीखा था, अर्थात् परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना, भले ही उनका पूरा होना बहुत दूर की बात या असम्भव क्यों न लगता हो। और फिर, एक ऐसी प्रतिज्ञा जिसके पूरे होने में भारी कठिनाइयाँ हों, उसे पूरा करने के लिए एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आवश्यकता होती है, और वही तो वह परमेश्वर है, जिसे आप और मैं पिता कहकर पुकारते हैं।

क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसे यह याद दिलाने की आवश्यकता है कि परमेश्वर आज भी अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है? यदि सच कहें तो हम सभी को यह बात याद दिलाए जाने की आवश्यकता है। अब्राहम के समान केवल परमेश्वर पर ही अपनी आशा रखें। वह अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में सक्षम है और केवल उसके सामर्थ्य से ही वे पूरी हो सकेंगी। किन्तु आप तो जानते हैं कि परमेश्वर आश्चर्यकर्म करता है, केवल इतना करें कि आईने में देखें और याद करें कि सितारों को उनके स्थान पर रखने और संसार को बनाए रखने में जिस दिव्य सामर्थ्य की आवश्यकता है, उसी सामर्थ्य ने आपके हृदय को जागृत किया है, आप में विश्वास पैदा किया है और आपको अनन्त जीवन दिया है।       उत्पत्ति 15:1-21

March 8 : तुमच्या मनाची कवाडे उघडा

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March 8 : तुमच्या मनाची कवाडे उघडा
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 “चेपलेला बोरू तो मोडणार नाहीं, मिणमिणती वात तो विझविणार नाहीं.” (यशया 42:3)

 बर्‍याच आठवड्यानंतर मनाला उत्तेजन देणारे शब्द माझ्या वाचनात आले, जे यशया 42:1-3 यातून होते, जे येशू त्याच्या आत्मिक शक्तीचा वापर कशाप्रकारे करेल याविषयीं सांगतात. 

तुम्हांला एखाद्या चेपलेल्यां बोरू प्रमाणे वाटते का – ईस्टर लिलीच्या फुलाप्रमाणे, ज्याची फांदी चेपलेली आहे व त्यामुळे काहींच सत्व न मिळाल्यांमुळे ते फूल खाली पडले आहे. तुम्हांला कधी असे वाटते का, कीं तुमचा विश्वास जळत्या ज्वालेमध्यें एका लहान ठिणगी प्रमाणे आहे- वाढदिवसाच्या विझवीलेल्यां मेणबत्तीच्या वातेतील लहानश्या ठिणगी प्रमाणे?

धीर धरा! ख्रिस्ताचा आत्मा हा उत्तेजनाचा आत्मा आहे, तो तुमचे फूल तोडून टाकणार नाहीं, तो तुमच्यातील ठिणगी विझविणार नाहीं.

“परमेश्वराचा आत्मा माझ्यावर आला आहे, कारण दीनांस सुवार्ता सांगण्यास त्यानें मला अभिषेक केला” (लूक 4:18). “तुमच्यावर न्याय्यत्वाचा सूर्य उदय पावेल, त्याच्या पंखांच्या ठायी आरोग्य असेल” (मलाखी 4:2). “[तो] मनाचा सौम्य व लीन आहे……‘तुमच्या जिवांना विसावा मिळेल” (मत्तय 11:29). “परमेश्वराची प्रतीक्षा कर; खंबीर हो, हिम्मत धर; परमेश्वराचीच प्रतीक्षा कर” (स्तोत्र 27:14).

आपल्यांला दु:ख वाटू शकते कीं, आपण एक मोठी ज्वाला नसून, केवळ एक ठिणगी आहोंत. पण ऐका! आणि उत्तेजन प्राप्त करून घ्या: होय, मोठ्या आगीमध्यें व ठिणगीमध्यें खूप मोठा फरक आहे. पण ठिणगी असण्यामध्यें आणि ठिणगी नसण्यामध्यें देखील खूप मोठा फरक आहे. विश्वासच नसणे या पेक्षा मोहरीच्या दाण्याएवढा विश्वास, हा डोंगरा एवढा विश्वास होण्यापेक्षा जास्त सोयीस्कर आहे.

देवाच्या अभिवचनाची कवाडे उघडा आणि पवित्र आत्म्याला तुमच्या मनाच्या प्रत्येक खोलीमध्यें फुंकर घालू द्या. देवाचा पवित्र आत्मा कधीच मोडणार नाहीं किंवा विझवीणार नाहीं. तो तुमचे मस्तक उंच करील, व तुमच्यातील ठिणगीला वारा देऊन एक ज्वाला बनवेल. तो उत्तेजनाचा आत्मा आहे.