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12 दिसम्बर : परम न्याय

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12 दिसम्बर : परम न्याय
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“यदि भला काम करके दुख उठाते हो और धीरज धरते हो, तो यह परमेश्‍वर को भाता है। और तुम इसी के लिए बुलाए भी गए हो, क्योंकि मसीह भी तुम्हारे लिए दुख उठाकर तुम्हें एक आदर्श दे गया है कि तुम भी उसके पद–चिह्नों पर चलो।” 1 पतरस 2:20-21

सी.एच. स्पर्जन ने एक बार लन्दन में अपने मण्डली से कहा, “मेरे प्रिय मित्र, यदि आप यह नियम बना लें कि कोई भी आपको अपमानित करे या आपके साथ अनादर से पेश आए और आप उसे बिना बदला दिए नहीं छोड़ेंगे, तो आपको प्रतिदिन भोर को परमेश्वर से प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं कि वह आपको उस संकल्प को निभाने में सहायता करे।”[1] उनका भाव यह था: अपने सम्मान की रक्षा करना और जिन्होंने हमें चोट पहुँचाई है उनसे बदला लेना हमारे स्वभाव का हिस्सा है। परन्तु दुख सहना और न्याय का कार्य परमेश्वर पर छोड़ना हमारे प्राकृतिक स्वभाव के विरुद्ध है।

वास्तव में, न्याय करना एक ऐसी ज़िम्मेदारी है, जिसके लिए हम पूर्णतः अयोग्य हैं। जब हम प्रतिघात करते हैं, तो हमें यह नहीं पता होता कि कितनी तीव्रता से करना है; और जब कोई हमें कठोर शब्द कहता है, तो हम अक्सर उससे कहीं अधिक कटुता से उत्तर देते हैं। भीतर-ही-भीतर हम यह सोचते हैं कि हम घृणा को घृणा से हरा देंगे, परन्तु ऐसा करके तो हम बुराई को और बढ़ा देते हैं। निश्चित रूप से, बुराई का दण्ड मिलना चाहिए—और वह मिलेगा भी। परन्तु यह दण्ड देना हमारा काम नहीं है।

केवल परमेश्वर ही न्याय करने और दण्ड देने में सिद्ध और सम्पूर्ण है। वही हर अन्याय को ठीक करेगा। एक सिंहासन है जो इस संसार के किसी भी न्याय-आसन से ऊँचा है, और एक दिन उसी सिंहासन पर सभी भ्रष्ट निर्णय, गलत न्याय और मानव न्याय की विफलताएँ ठीक की जाएँगी।

यह सच्चाई हमें प्रतिशोध की आड़ लेने की अनुमति नहीं देती। हमें अपने शत्रुओं के लिए कुछ और नहीं, केवल उनका उद्धार ही चाहना चाहिए। जिन्होंने हमारा तिरस्कार किया है, हमारे विरुद्ध कार्य किया है, या हमें नीचा दिखाया है—उनके प्रति हमारी जिम्मेदारी स्पष्ट है: हमें उनके लिए आशीष की कामना करनी है और उनके लिए प्रार्थना करनी है (मत्ती 5:44; लूका 6:28)।

यीशु हमारा आदर्श है: “वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दुख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्चे न्यायी के हाथ में सौंपता था” (1 पतरस 2:23)। आपके साथ उससे अधिक अन्याय नहीं होगा जितना यीशु के साथ हुआ, इसलिए हर परिस्थिति में आपको वैसा ही प्रत्युत्तर देना है जैसा उसने दिया।

आपको किस परिस्थितियों में और किन लोगों के साथ अधिक कठोरता से प्रतिघात करने का प्रलोभन होता है, बजाय इसके कि आप बुराई का प्रत्युत्तर भलाई से दें? उन लोगों के साथ भलाई करने में परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए तीन बातें आपकी सहायता करेंगी।

पहला, अपनी दृष्टि यीशु पर स्थिर रखें। जब आप मसीह को क्रूस पर यह कहते देखते हैं, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34), तो उसके बाद प्रतिशोध की भावना को बनाए रखना अत्यन्त कठिन हो जाता है।

दूसरा, परमेश्वर के अनुग्रह पर विस्मित हो जाएँ। इस बात को याद रखें कि आप स्वाभाविक रूप में कौन थे और अनुग्रह से आप क्या बन गए हैं। जो व्यक्ति सचमुच परमेश्वर के अनुग्रह से विस्मित होता है, वह दूसरों के लिए बुरा नहीं चाहता।

तीसरा, अनन्तकाल पर और परमेश्वर के ऊँचे सिंहासन पर ध्यान केन्द्रित करें। आपकी वर्तमान स्थिति सम्पूर्ण चित्र नहीं है। आपको इस संसार में ही न्याय देखने की आवश्यकता नहीं है। इसलिए परमेश्वर से यह प्रार्थना करें कि वह आपको भलाई करने और सहनशील बने रहने में सहायता दे, चाहे आपके साथ बुराई ही क्यों न हो रही हो। वह आपको वही करने में सहायता देने को तत्पर है, जो उसके वचन के अनुसार सही है।

तीतुस 2:11-14; 3:1-7

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 4– 6; लूका 15:1-10 ◊


[1] “ओवरकम इवल विद गुड,” द मैट्रोपोलिटन टैबरनैकल पुलपिट 22, क्रं. 1317, पृ. 556.

11 दिसम्बर : परमेश्वर के वचन में बढ़ना

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11 दिसम्बर : परमेश्वर के वचन में बढ़ना
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“मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने-अपने पापों की क्षमा के लिए यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे।” प्रेरितों 2:38

यदि आप कुछ समय से मसीही हैं, तो आपने यह अवश्य अनुभव किया होगा कि परमेश्वर के वचन का अध्ययन करना—चाहे व्यक्तिगत रूप से हो या रविवार को कलीसिया में—कई बार केवल एक औपचारिकता बन सकता है। सुसमाचार इतना सरल प्रतीत होता है कि हम उसे नजरअन्दाज करने के खतरे में पड़ जाते हैं—परन्तु हमारी निर्बलता में हमें बार-बार उसके सत्य के प्रचार को सुनने की आवश्यकता होती है। आज भी हमें वही सुसमाचार सुनने की आवश्यकता है, जो हमने उस पहले दिन सुना था जब हमने विश्वास किया था। हम अपने मसीही जीवन को “सत्य के वचन . . . [हमारे] उद्धार के सुसमाचार” (इफिसियों 1:13) से अलग नहीं कर सकते, क्योंकि परमेश्वर ने इन दोनों को एक-दूसरे से जोड़ा है। परमेश्वर का आत्मा, परमेश्वर के वचन के द्वारा, परमेश्वर की प्रजा को स्थिर रखता है।

इसीलिए पतरस ने जब पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा पाया, तो सबसे पहला कार्य यह किया कि खड़ा होकर एक लम्बा उपदेश दिया; और जैसे-जैसे लोगों ने परमेश्वर का वचन सुना और उस पर ध्यान दिया, वे व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से बढ़ते गए (प्रेरितों 2)। इसके विपरीत, जब परमेश्वर का वचन नहीं सुनाया जाता, तो कलीसिया नहीं बढ़ती। क्यों? क्योंकि आत्मा तब कार्य करता है जब वचन सुना जाता है, और वचन तब सुना जाता है जब आत्मा कार्य करता है। प्रेरितों 2 का उपदेश बाइबल में केवल इसलिए नहीं दिया गया है कि वह दिखाए कि उन लोगों ने विश्वास कैसे किया, बल्कि इसलिए भी दिया गया है कि यह आपके विश्वास को भी मजबूत करे और आपको उत्साहित करे।

जब आत्मा कार्य करता है, तो वचन को सुनने का परिणाम यह होता है: जब पतरस ने उस दिन प्रचार किया, तो सुनने वालों के “हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, ‘हे भाइयो, हम क्या करें?’” (प्रेरितों 2:37)। अर्थात् उनके हृदय में पाप-बोध उत्पन्न हुआ। पतरस ने उत्तर दिया, “मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने-अपने पापों की क्षमा के लिए यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (पद 38)। और उन्होंने वैसा ही किया। अतः वहाँ समर्पण भी था। अन्ततः, नए विश्वासी प्रेरितों की शिक्षा को सुनने, रोटी तोड़ने और प्रार्थना करने के लिए एकत्र हुए (पद 42)। अतः वहाँ संगति भी थी। पाप-बोध, समर्पण, और संगति—और यह सब एक आत्मा-प्रेरित उपदेश से प्रारम्भ हुआ!

हमारे विश्वास में वृद्धि में मन और हृदय दोनों की भूमिका है। हमारी यह ज़िम्मेदारी है कि हम स्वयं को बाइबल आधारित शिक्षा के अधीन रखें, और व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के वचन का अध्ययन करें, यह प्रार्थना करते हुए कि परमेश्वर का आत्मा हमें बाइबल के पृष्ठों में मसीह को दिखाए और हमें उससे और अधिक प्रेम करना सिखाए। यदि आप इस समय पवित्रशास्त्र पढ़ने या अपने मसीही जीवन में केवल औपचारिकता निभा रहे हैं, तो उस प्रारम्भिक स्थान पर लौट आएँ जहाँ से आपने आरम्भ किया था। परमेश्वर के वचन में सुसमाचार को पढ़ें। अपने में पाप-बोध को आने दें और अपने उद्धारकर्ता पर भरोसा करने तथा उसकी सेवा करने का नया संकल्प लें। उन विश्वासियों की संगति में पूरी तरह सम्मिलित हो जाएँ जिन्हें परमेश्वर ने आपके आत्मिक लाभ के लिए आपको दिया है। और परमेश्वर से यह प्रार्थना करें कि वह अपने आत्मा के द्वारा आप में कार्य करे, ताकि वह प्रतिबद्धता और उत्साह जो यरूशलेम की उस कलीसिया में था, आपके जीवन का भी अनुभव बन जाए।

प्रेरितों 2:22-41

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहोशू 1–3; लूका 14:25-35

10 दिसम्बर : भले काम करने में साहस न छोड़ें

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10 दिसम्बर : भले काम करने में साहस न छोड़ें
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“हम भले काम करने में साहस न छोड़ें, क्योंकि यदि हम ढीले न हों तो ठीक समय पर कटनी काटेंगे।” गलातियों 6:9

यदि आप मेरी तरह हैं, तो आप निश्चित ही अपने विद्यालय के जीवन में कुछ ऐसे विषयों को याद कर सकते हैं, जिन्हें पढ़ते समय आप निराशा से अपनी पुस्तकों को देखते थे। शायद आपको ऐसा लगा हो कि शिक्षक ने आपको “निराशाजनक” मान लिया है। ऐसा वातावरण सीखने के लिए बहुत कठिन होता है। जॉन कैल्विन ने भी इसी प्रकार की बात कही थी: “सत्य की ओर ध्यान देने से हमें सबसे अधिक कोई बात यदि दूर कर सकती है, तो वह यह है कि हमें निराशाजनक और आशाहीन समझा जाए।”[1]

मसीही जीवन में भी हमें कई बार ऐसे ही निराशाजनक अनुभव होता है—जब हम “हम भले काम करने में साहस” छोड़ने लगते हैं। हो सकता है कि हमने परमेश्वर के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के कई प्रयास आरम्भ तो किए हों, परन्तु फिर हमने उन्हें त्याग दिया—क्योंकि हम या तो उनके प्रभाव से हताश हो गए, या फिर अपने ही पापों से जूझने और पवित्रता में बढ़ने की असफलता से थक गए। परन्तु हमें दृढ़ रहना है!

जब हम प्रभु की आज्ञाओं का पालन करने में परिश्रम करते हैं, परमेश्वर हमें बदलने और बढ़ाने के लिए हमारे भीतर कार्य करता है (फिलिप्पियों 2:12-13)। और प्रेरित यूहन्ना ने अपने समय के विश्वासियों को मसीह में उनके विश्वास का आश्वासन देते हुए कहा: “हम जानते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं; क्योंकि हम भाइयों से प्रेम रखते हैं” (1 यूहन्ना 3:14, अतिरिक्त बल दिया गया है)। हममें से कितने लोग इस वाक्य को इस प्रकार पूरा करते? फिर भी स्वयं प्रभु यीशु ने कहा: “यदि आपस में प्रेम रखोगे, तो इसी से सब जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो” (यूहन्ना 13:35)।

इसलिए हार मत मानें। जब प्रेरित पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को लिखा, तो उसने उनके अद्‌भुत उदाहरण की सराहना की: “हम तुम्हारे विश्‍वास के काम, प्रेम के परिश्रम, और हमारे प्रभु यीशु मसीह में आशा की धीरता को लगातार स्मरण करते हैं।” (1 थिस्सलुनीकियों 1:3)। जो बात थिस्सलुनीके की कलीसिया के लिए सत्य थी, वह हमारे लिए भी सत्य हो सकती है। उनकी तरह हमारा विश्वास भी व्यावहारिक, स्पष्ट और दृढ़ बना रह सकता है। वे केवल क्षणिक उत्साह से भरे लोग नहीं थे; उन्होंने निरन्तर मसीही भलाई के कार्य किए।

भलाई करना थका देने वाला काम है, परन्तु हमें इससे थक नहीं जाना है। क्योंकि एक दिन, महिमा का राजा धर्मियों से कहेगा: “तुमने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया” (मत्ती 25:40)। जब तक वह दिन न आ जाए, तब तक हमें यह विशेषाधिकार मिला है कि हम प्रभु यीशु मसीह की सेवा और आज्ञाकारिता में अटल आशा के साथ लगे रहें। इसलिए सोचें कि आप भटके हुए लोगों, परदेशियों, बन्द कैदियों, विधवाओं, और दरिद्रों के प्रति मसीही दया के कौन से ठोस कार्य कर रहे हैं? क्या यह समय है कि “हम भले काम करने” में उसकी सेवा करने और आरम्भ करने, या पुनः आरम्भ करने के लिए परमेश्वर का सामर्थ्य और उद्देश्य माँगें?”

प्रेरितों 6:1-7

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: हाग्गै; लूका 14:1-24 ◊


[1] कॉमैण्ट्रीज़ ऑन दि अपिस्टल ऑफ पॉल टू द हिब्रूज़, अनुवादक जॉन ओवेन, इब्रानियों 6:9.

9 दिसम्बर : एक भीतरी मामला

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9 दिसम्बर : एक भीतरी मामला
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“प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा से खिंचकर और फँसकर परीक्षा में पड़ता है। फिर अभिलाषा गर्भवती होकर पाप को जनती है और पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है।याकूब 1:14-15

हर पाप भीतर से ही जन्म लेता है।

हम परमेश्वर के स्वरूप में रचे गए प्राणी हैं, और हमारे भीतर अनेक प्रकार की इच्छाएँ हैं—जो स्वयं में बुरी नहीं हैं। परन्तु पतन के कारण हमारी हर लालसा में बुराई की अद्‌भुत सम्भावना छिपी है। परमेश्वर द्वारा दी गई इच्छाएँ भी विकृत होकर दुष्टता के लिए उपयोग की जा सकती हैं।

हम बुराई की अपनी प्रवृत्ति के दोष को शैतान, अपने मित्रों, वंशानुगत प्रवृत्तियों, या वातावरण पर डालने में माहिर हैं। परन्तु पवित्रशास्त्र कहता है कि हम अपनी ही लालसाओं द्वारा प्रलोभन में पड़ते हैं। परमेश्वर की अवज्ञा करने और विकृत या दुष्ट इच्छाओं को पूरा करने की लालसा हमारे भीतर से ही उत्पन्न होती है।

शैतान हमें लुभा सकता है, परन्तु परमेश्वर की अवज्ञा का निर्णय करना हमारा कार्य होता है। प्रभु यीशु ने यह अत्यन्त स्पष्ट रूप से कहा: “जो मनुष्य में से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।” (मरकुस 7:20) हर प्रलोभन हमारे सामने तब आता है, जब हम अपनी ही लालसा से खिंच कर बहकाए जाते हैं। और जब हम प्रलोभन के सामने झुक जाते हैं, तो वह अन्त में मृत्यु को जन्म देता है।

प्रलोभन की आकर्षक शक्ति मछलियों की मूर्खता में स्पष्ट दिखती है। वे चारा देखती हैं—जो चमकता है, लुभाता है—और वे उस पर झपट पड़ती हैं . . . और काँटे में फँस जाती हैं! यदि चारा पर्याप्त आकर्षक हो, तो मछली उस काँटे को अनदेखा नहीं कर सकती।

क्या हम वास्तव में मछलियों से अधिक समझदार हैं? जब चारा मनभावन दिखता है, तो हम स्वयं को समझाने लगते हैं कि शायद उसमें काँटा नहीं है। परन्तु काँटा होता है। “पाप जब बढ़ जाता है तो मृत्यु को उत्पन्न करता है।” पाप का मार्ग न्याय की ओर ले जाता है, और यह मार्ग हमारे जीवन पर ऐसे चिह्न छोड़ जाता है, जिन्हें समय कभी नहीं मिटा सकता—हालाँकि अपनी दया में परमेश्वर उन अनुभवों का भी छुटकारा कर सकता है।

जब तक हम इस पृथ्वी पर जीवित हैं, हम कभी प्रलोभन से मुक्त नहीं होंगे। उत्पत्ति में, परमेश्वर ने कैन को चेतावनी दी, “पाप द्वार पर छिपा रहता है; और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तुझे उस पर प्रभुता करनी है।” (उत्पत्ति 4:7)। यह एक अत्यन्त सटीक चित्रण है: पाप सदा हमारे भीतर छिपा रहता है, और हम पर झपटने के अवसर की प्रतीक्षा करता रहता है।

इसलिए संकल्प लें कि आप पाप के हर बढ़ते कदम का प्रतिकार करेंगे। यह प्रतिदिन की लड़ाई है। आज यह ठान लें कि ऐसी किसी भी वस्तु के लिए आप अपनी आँखों को भटकने नहीं देंगे, मन को विचार नहीं करने देंगे, या हृदय को आकर्षित नहीं होने देंगे, जो आपको मसीह से दूर करती है। कैसे? अपनी इच्छाओं से प्रश्न करना सीखें: “क्या यह एक ईश्वरीय इच्छा है जिसे मुझे पोषित करना चाहिए, या एक पापपूर्ण लालसा है जिससे मुझे लड़ना चाहिए?” और परमेश्वर के पूरे अस्त्र-शस्त्र पहनना सीखें: “विश्‍वास की ढाल लेकर स्थिर रहो जिससे तुम उस दुष्‍ट के सब जलते हुए तीरों को बुझा सको” (इफिसियों 6:16)। क्योंकि अपने उद्धारकर्ता और प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा ही आपको स्थिर खड़े रहने का सामर्थ्य मिलता है—और जब आप गिरते हैं, तब क्षमा भी मिलती है।

1 कुरिन्थियों 10:1-13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 9–10; लूका 13:22-35

8 दिसम्बर : सन्तोष में वृद्धि

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8 दिसम्बर : सन्तोष में वृद्धि
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“हर एक बात और सब दशाओं में मैंने तृप्त होना, भूखा रहना, और बढ़ना–घटना सीखा है।” फिलिप्पियों 4:12

सन्तोष का दुर्लभ स्वभाव हमारे युग के लिए नया नहीं है। 17वीं शताब्दी में भी यह विषय इतना महत्त्वपूर्ण था कि प्युरिटन जेरेमायाह बरोज़ ने इस पर एक सम्पूर्ण पुस्तक लिखी—“दि रेअर ज्यूल ऑफ क्रिश्चियन कण्टेण्टमेण्ट”—जो आज भी मसीही भक्ति की एक उत्कृष्ट कृति मानी जाती है। फिर भी आज के पुस्तकालयों में यह पुस्तक शायद ही मिलती है। इसके स्थान पर, हम अधिकतर ऐसी पुस्तकें पाते हैं, जो इस भ्रान्ति को बढ़ावा देती हैं कि हमारी सन्तुष्टि सांसारिक बातों पर निर्भर करती है—जैसे सम्पत्ति की अधिकता या इच्छाओं की पूर्ति।

यदि हम अपने साथ ईमानदार हों, तो हमें मानना पड़ेगा कि हम लोभ की लहरों में बहुत आसानी से बह जाते हैं। हम एक असन्तोषी आत्मा से घिरे रहते हैं, जो सीधा हमारे हालातों से जुड़ा होता है। छोटे बच्चों की तरह, हम हमें मिलने वाली वस्तुओं से अक्सर असन्तुष्ट रहते हैं या इस बात से खिन्न रहते हैं कि हमारे मित्रों के पास अधिक है। इसका परिणाम यह होता है कि हम अपनी आर्थिक, सामाजिक या शारीरिक परिस्थितियों को “सुधारने” के लिए हर सम्भव प्रयास करने लगते हैं।

यह मान लेना आसान है कि या तो आत्म-त्याग या फिर इच्छापूर्ति, लोभ का उत्तर हैं। उदाहरण के लिए, एक झूठे नम्र भाव में मैं यह कह सकता हूँ कि मुझे कश्मीरी ऊन के स्वेटर में कोई रुचि नहीं है, बल्कि केवल ऐसे खुरदरे स्वेटर पसन्द हैं जो मुझे खुजली और चकत्ते देते हैं—परन्तु यह तो केवल मेरे अन्दर एक झूठी “पवित्रता” के घमण्ड को जन्म देगा। दूसरी ओर, मैं यह सोच सकता हूँ कि यदि मैं जितने हो सकें उतने स्वेटर खरीद लूँ, तो शायद मेरी लालसा समाप्त हो जाए!

परन्तु ये दोनों मार्ग प्रभु की महिमा नहीं करते। बल्कि जो मार्ग प्रभु को महिमा देता है, वह यह है कि हम उसी में आशा रखें, जो अपने असीम धन में से हमें आनन्दित करने के लिए उत्तम उपहार प्रदान करता है। यद्यपि हम भौतिक धन में आशा नहीं रखते, तौभी मसीही लोग यह पहचानते हैं कि हर उपहार परमेश्वर के करुणामयी प्रावधान का परिणाम है और जब हम उस उपहार का आनन्द उस रीति से लेते हैं, जैसे वह अपने वचन में हमें सिखाता है, तब हम उसे महिमा देते हैं। हम इन वस्तुओं का आनन्द लेने के लिए स्वतन्त्र हैं, परन्तु हम उन्हें परमेश्वर के स्थान पर न रखें, न ही उनका ऐसा पीछा करें या उनकी ऐसी सेवा करें जैसे वे हमारी आवश्यकताओं को पूरा करेंगे या हमारी आत्मा को तृप्त कर देंगे। सन्तोष तब आता है जब हम स्मरण रखते हैं कि यीशु मसीह ही प्रभु है—और उसके सिवाय और कोई नहीं।

हमारे लिए ऐसा व्यवहार स्वाभाविक नहीं है। आपको और मुझे, पौलुस की तरह, विश्वास में परिपक्व होते हुए इसे सीखना पड़ता है। चाहे वह किसी उदास दिन पर हमारा मनोभाव हो, या एक पदोन्नति से वंचित रह जाने पर हमारी प्रतिक्रिया, या कोई और परिस्थिति—प्रश्न यही रहना चाहिए: मसीह की सम्पूर्ण परिपूर्णता के बारे में ऐसा क्या है, जो यह सिद्ध करता है कि वह मेरे लिए पर्याप्त है, ताकि मैं इस स्थिति में सन्तोष पा सकूँ? सन्तोष एक दुर्लभ रत्न है—और जो इसे पाता है, वह एक अमूल्य खजाना पाता है।

भजन 16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 6– 8; लूका 13:1-21 ◊

7 दिसम्बर : परमेश्वर के साथ चलना

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7 दिसम्बर : परमेश्वर के साथ चलना
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“मतूशेलह के जन्म के पश्चात हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा . . . हनोक परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्‍वर ने उसे उठा लिया।” उत्पत्ति 5:22, 24

सच्चा विश्वास कोई क्षणिक चमक नहीं है। यह एक निर्णायक कार्य भी है और एक स्थायी मनोवृत्ति भी।

हमें बताया गया है कि हनोक “परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा”—परन्तु यह आरम्भ से ऐसा नहीं था। उत्पत्ति 5 से यह स्पष्ट होता है कि हनोक के जीवन में ऐसा समय था, जब विश्वास का आरम्भ हुआ। वास्तव में, हमें बताया गया है कि “मतूशेलह के जन्म के पश्चात हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा।” सम्भव है कि अन्य जीवन-परिवर्तनकारी अनुभवों की भाँति, पिता बनने की ज़िम्मेदारी और चुनौतियों ने शीघ्र ही हनोक को उसकी अपनी सीमाएँ दिखा दी हों। जो भी कारण रहा हो, ऐसा प्रतीत होता है कि हनोक के जीवन में एक ऐसा क्षण आया जब उसने अपने ऊपर विश्वास करना और अपने बल पर निर्भर रहना छोड़ दिया, और परमेश्वर पर विश्वास करना और उस पर निर्भर रहना आरम्भ कर दिया।

परन्तु हनोक का विश्वास केवल सोच-समझकर किया गया चुनाव ही नहीं था, बल्कि वह एक स्थायी सम्बन्ध भी था। विश्वास एक निर्णायक कार्य के रूप में आरम्भ होता है और उसी प्रकार निरन्तर बना रहता है। हनोक “परमेश्‍वर के साथ-साथ चलता रहा” और फिर “वह लोप हो गया।” और उसके इस स्थायी विश्वास के परिणामस्वरूप, परमेश्वर ने उसे उठा लिया। उसने मृत्यु का स्वाद नहीं चखा।

हनोक के जीवन के अन्त का यह लगभग अद्वितीय अनुभव उस महिमामय देह की ओर संकेत करता है, जिसे हर विश्वासी प्रभु यीशु मसीह की वापसी पर प्राप्त करेगा। पौलुस स्पष्ट करता है कि “तुरही फूँकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएँगे, और हम बदल जाएँगे। क्योंकि अवश्य है कि यह नाशवान देह अविनाश को पहन ले, और यह मरनहार देह अमरता को पहन ले” (1 कुरिन्थियों 15:52–53)। जब हम परमेश्वर के साथ चलते हैं—इस सच्चाई को स्मरण रखते हुए कि हमारे जीवन का हर आयाम उसकी प्रभुता और योजना के अधीन है—तो हमारे अनन्त भविष्य में एकत्रित किया जाना हमारे शरीर और हमारे स्थान को तो बदलेगा, परन्तु हमारी संगति को नहीं।

हनोक का यह स्थायी सम्बन्ध परमेश्वर के साथ, अन्ततः उसकी उपस्थिति के अनन्त आनन्द में परिणत हुआ। यदि हम अनन्त काल को अपने परमेश्वर की आराधना में बिताने वाले हैं, तो पृथ्वी पर उसकी आराधना करके हम ऐसे काम का आरम्भ कर रहे हैं, जिसका कभी अन्त नहीं होगा। यदि हम अनन्तकाल उसकी संगति और स्तुति में बिताएँगे, तो यहाँ का हमारा अनुभव वहाँ की तैयारी है। अतः आज उसके साथ चलें। उसकी उपस्थिति के प्रति सचेत रहें। उसके अनुग्रह और सामर्थ्य पर निर्भर रहें। उससे क्षमा माँगने में तत्पर रहें। उसकी अगुवाई को पहचानने में सतर्क रहें। आज उसके साथ चलें—जब तक कि आज ही वह दिन न बन जाए जब आप उसे आमने-सामने देखें।

1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 3–5; लूका 12:32-59

6 दिसम्बर : जागते रहना

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6 दिसम्बर : जागते रहना
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“अब तुम्हारे लिए नींद से जाग उठने की घड़ी आ पहुँची है; क्योंकि जिस समय हमने विश्‍वास किया था, उस समय के विचार से अब हमारा उद्धार निकट है . . . जैसा दिन को शोभा देता है, वैसा ही हम सीधी चाल चलें, न कि लीला–क्रीड़ा और पियक्‍कड़पन में, न व्यभिचार और लुचपन में, और न झगड़े और डाह में।” रोमियों 13:11, 13

“लापरवाह बातों से जानें जा सकती हैं”—यह एक प्रसिद्ध अभियान था जो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाया गया था। सरकार चाहती थी कि लोग अपने आस-पास के खतरे को लेकर सतर्क रहें: यह जानते हुए कि शत्रु कान लगाए बैठा है और जुबान की जरा-सी चूक भी घातक सिद्ध हो सकती है। इसी प्रकार, प्रेरित पौलुस हमारे मसीही जीवन के लिए भी ऐसी ही एक चेतावनी देता है: लापरवाही जानलेवा हो सकती है।

लापरवाही हमें खतरे के घेरे में ले आती है। बहुत से लोग आत्मिक दृष्टि से एक प्रकार की नैतिक नींद में जी रहे हैं—जागृत और सतर्क रहने के बजाय वे आत्मिक शिथिलता में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इससे हम शत्रु के लिए एक आसान लक्ष्य बन जाते हैं। शुद्धता के जीवन में जागते और सतर्क रहने के इन दो मुख्य कारणों पर ध्यान दें।

पहला, प्रेरित पतरस हमें चेतावनी देता है: “तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जने वाले सिंह के समान इस खोज में रहता है कि किस को फाड़ खाए” (1 पतरस 5:8)। आइए खुद को धोखा न दें—पाप एक शिकारी है। शत्रु एक सिंह है। याद करें कि प्रभु ने कैन से क्या कहा था जब वह अपने भाई से क्रोधित था: “पाप द्वार पर छिपा रहता है; और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और तुझे उस पर प्रभुता करनी है” (उत्पत्ति 4:7)।

क्या आप जानते हैं कि कौन एक आसान शिकार होता है? एक संगति से दूर रहने वाला मसीही। जब हम आत्मिक संगति से कट जाते हैं, तो हम असुरक्षित और उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाते हैं। धर्मी संगति में चलना हमें सचेत और स्थिर बनाता है। हम दिन के बच्चे हैं—अतः हमें अन्धकार की ओर आकर्षित नहीं होना चाहिए, क्योंकि अन्धकार अलगाव और गुमराही को जन्म देता है। शुद्धता के प्रति उत्साह का अर्थ है कि हम ज्योति में चलें और उन लोगों के साथ चलें, जो ज्योति के पुत्र हैं।

दूसरा, हमें जागते और सतर्क रहना चाहिए क्योंकि अनन्तता हमारी प्रतीक्षा कर रही है। इब्रानियों 11 के नायकों को “विश्वास के वीर” किस कारण कहा गया? क्योंकि वे अपने से परे एक नगर की प्रतीक्षा में थे—एक ऐसा नगर जिसका आधार और रचयिता स्वयं परमेश्वर है (इब्रानियों 11:10)।

मूसा को ही देखें: उसने तात्कालिक सुख-सुविधा के प्रलोभन के आगे हार नहीं मानी। उसने क्षण भर की विलासिता के लिए अपनी आत्मा नहीं बेची। उसने मिस्र के ऐश्वर्य के कारण अपना सेवाकार्य, भविष्य और परिवार नहीं छोड़ा। और इसका कारण क्या था? “उसने मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा, क्योंकि उसकी आँखें फल पाने की ओर लगी थीं” (इब्रानियों 11:26)। मूसा निष्कलंक नहीं था—और हम भी नहीं हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम मसीह के लिए शुद्ध और पवित्र जीवन न जीएँ। क्योंकि हमारी मुक्ति का दिन निकट आता जा रहा है, और हम चाहते हैं कि जब प्रभु यीशु प्रकट हो, तो वह हमें तैयार और चौकस पाए।

आपका अतीत चाहे जैसा भी रहा हो, चाहे हाल ही में आपके कदम लड़खड़ाए हों या निराशाएँ आई हों, अभी भी समय है कि आप जाग जाएँ और सतर्क हो जाएँ। शत्रु तो सोएगा नहीं, लेकिन जागृत रहने वाले का प्रतिफल अनन्त जीवन है। आज ही परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपके हृदय पर शुद्धता के जीवन की प्रतिबद्धता अंकित कर दे, ताकि आप आज सावधानीपूर्वक और सीधा चलें—सिर ऊँचा करके और अपनी दृष्टि उस महिमामय दिन पर केन्द्रित करके, जब आपकी मुक्ति पूर्ण हो जाएगी।

इफिसियों 6:10-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एस्तेर 1–2; लूका 12:1-31 ◊

5 दिसम्बर : उसने स्वयं को दीन किया

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5 दिसम्बर : उसने स्वयं को दीन किया
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“और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा . . . उसकी परिपूर्णता में से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात् अनुग्रह पर अनुग्रह।” यूहन्ना 1:14, 16

अभिनेता स्टीव मैक्वीन का जीवन अत्यन्त रोचक, यद्यपि कई बार भ्रष्ट और अस्त-व्यस्त रहा। उनका देहान्त 1980 में हुआ, परन्तु इससे पहले कि बीमारी उन्हें अपना ग्रास बना लेती, एक विश्वासयोग्य पास्टर ने उन्हें सुसमाचार सुनाया और उन्होंने नम्र होकर मसीह में विश्वास किया। उनके जीवन-परिवर्तन के बाद, वे नियमित रूप से बाइबल अध्ययन और रविवार की आराधना में भाग लेते रहे, लेकिन बिना किसी सार्वजनिक प्रशंसा के। वे इस सत्य से विस्मित रहते थे कि यद्यपि उनका जीवन तलाकों, व्यसनों और नैतिक पतनों से भरा था, फिर भी परमेश्वर ने उन्हें ऐसा प्रेम दिखाया।

मैक्वीन इस सच्चाई को समझने लगे कि परमेश्वर ने उन्हें “शून्य” बना दिया, ताकि जब वे अपनी शून्यता को पहचानें, तब परमेश्वर उन्हें “कुछ” बना सके। यही कार्य परमेश्वर हमारे साथ भी करता है।

इसमें हम मसीह यीशु की पद्धति का अनुसरण करने के लिए बुलाए गए हैं। अपने जन्म के दिन से ही मसीह ने अपनी शाश्वत अतुल्य महिमा को त्याग दिया, ताकि वह इस पतित और असहाय संसार में हमारे लिए आ सके। वह रथ पर सवार होकर नहीं, परन्तु चरनी में आया; वह राजदण्ड लेकर नहीं, परन्तु एक गौशाला में आया। यीशु जितना स्वर्गिक राजा है, उतना ही वह पृथ्वी पर दास बना।

यह कहना कि उसने अपने आप को “शून्य” कर दिया, यह नहीं दर्शाता कि वह परमेश्वर होना छोड़कर मनुष्य बन गया और फिर से परमेश्वर बन गया। जब हम पढ़ते हैं, “वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया,” तो हमें इस विस्मयकारी विरोधाभास पर मनन करना चाहिए कि हमारे अद्‌भुत उद्धारकर्ता ने अपने आप को मानवता में उण्डेल दिया, लेकिन अपने ईश्वरत्व को नहीं छोड़ा। वह पूर्णतः परमेश्वर है और पूर्णतः मनुष्य भी!

हमारी सीमित मानवीय बुद्धि कभी-कभी मसीह के ईश्वरत्व पर इतना ध्यान देती है कि हम यह भूल जाते हैं कि वह हमारे समान पूर्णतः मानव था; और कभी-कभी हम उसकी मानवता में इतने खो जाते हैं कि उसका ईश्वरत्व दृष्टि से हमारी ओझल हो जाता है। परन्तु पवित्रशास्त्र मसीह के इन दोनों स्वभावों को पूर्ण सामंजस्य में रखता है: वह मनुष्य के रूप में पाया गया (फिलिप्पियों 2:8), परन्तु वह केवल वही नहीं था जो बाहरी दृष्टि से प्रतीत होता था।

यीशु में वह सामर्थ्य था जो बाहरी रूप से दिखाई नहीं देता था। वह देखने में तो अन्य पुरुषों के समान प्रतीत होता था, परन्तु ऐसा कोई अन्य मनुष्य नहीं है जो आँधी-तूफान के मध्य में नौका में खड़ा होकर समुद्र को शान्त कर दे। केवल परमेश्वर ही लंगड़े को चला सकता है या अन्धे को दृष्टि दे सकता है। केवल वही मनुष्य स्वर्गदूतों की आराधना और सम्पूर्ण सृष्टि की स्तुति का अधिकारी है। फिर भी यीशु ने जब देहधारण किया, तो यह सोचकर नहीं आया कि मुझे इससे क्या लाभ मिलेगा? बल्कि वह इस उद्देश्य के साथ आया कि “मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे” (मरकुस 10:45)।

उसने सब कुछ छोड़ने और “शून्य” बनने को स्वीकार किया, ताकि अपनी शून्यता को स्वीकार करने वाले लोगों को परमेश्वर “सब कुछ” दे सके। वह देहधारी हुआ ताकि वह सेवा कर सके, और उसने उन सब के लिए दीनता का उत्तम आदर्श प्रस्तुत किया, जो उसका अनुसरण करना चाहते हैं। आज जब आप अपने कार्यों और जिम्मेदारियों में लगें हैं, तो क्या आप यीशु के इस नम्र आदर्श की ओर दृष्टि करेंगे?

फिलिप्पियों  2:1-13

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 34–36; लूका 11:29-54

4 दिसम्बर : परमेश्वर की सन्तान

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4 दिसम्बर : परमेश्वर की सन्तान
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“परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं।” यूहन्ना 1:12-13

कुछ कलीसियाओं में यह आम बात है कि वे परमेश्वर की सार्वभौमिक पितृत्व और मानवजाति के भाईचारे की बात करते हैं। परन्तु हमें ऐसे दावों की सीमाओं के प्रति सजग रहना चाहिए। यह बात एक अर्थ में सत्य है कि हम सब सृष्टि के भाव से परमेश्वर की सन्तान हैं, परन्तु नया नियम यह भी स्पष्ट करता है कि साथ ही हम “क्रोध की सन्तान” हैं (इफिसियों 2:3)—जो खोए हुए हैं और जिन्हें परमेश्वर के परिवार में ग्रहण किए जाने की आवश्यकता है।

हम स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की सन्तान नहीं बनते। यह न तो मानव वंशानुक्रम का परिणाम है, न ही किसी मानवीय प्रयास का। कोई भी जन्म से परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं करता—इसीलिए यीशु ने नीकुदेमुस से कहा, जो कि एक धार्मिक पुरुष था और यहूदी वंशावली में निर्दोष था, कि उसे नए सिरे से जन्म लेना अवश्य है (यूहन्ना 3:3)। परमेश्वर की सन्तान बनना एक आत्मिक प्रक्रिया है—ऐसा कार्य जिसे परमेश्वर अपनी दया और अनुग्रह से हमारे लिए करता है।

अपने शारीरिक जन्म के विषय में सोचें। उस पर आपका कोई नियन्त्रण नहीं था। यह आपकी अपनी उपलब्धि नहीं थी। मसीह में नया जन्म भी ऐसा ही है। जब परमेश्वर किसी को नया जन्म देता है, तो जो नया जीवन उत्पन्न होता है वह केवल उसी की प्रभुता के कारण सम्भव होता है। वही हमें अपनी सन्तान बनने का अधिकार देता है।

कहा जाता है कि सम्राट नेपोलियन एक बार अपने घोड़े पर से लगभग गिर ही गया था जब उसने लगाम छोड़ दी ताकि अपने साथ रखे दस्तावेज़ पढ़ सके। जैसे ही घोड़ा बेकाबू हुआ, एक युवा सैनिक ने तुरन्त हस्तक्षेप किया और घोड़े की लगाम थाम ली। नेपोलियन ने उसकी ओर मुड़कर कहा, “धन्यवाद, कप्तान।” सैनिक ने तुरन्त पूछा, “किस टुकड़ी का, श्रीमान?” सम्राट ने उत्तर दिया, “मेरे अंगरक्षकों का।”[1]

क्षणमात्र में उस सैनिक को पदोन्नत कर दिया गया, उसे सेनापति के मुख्यालय में प्रवेश का अधिकार मिल गया और वह सम्राट के अधिकारियों में सम्मिलित हो गया। जब लोगों ने उससे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रहा है, तो वह उत्तर दे सकता था: “मैं सम्राट के आदेश से अंगरक्षकों का कप्तान हूँ।”

यदि आपने यीशु को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता ग्रहण किया है, तो आप परमेश्वर की सन्तान हैं। परमेश्वर ने आपके जीवन पर एक नई पहचान की मुहर लगा दी है, जिसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। आप इस महान आश्वासन के साथ जीवन जी सकते हैं कि राजाओं के राजा और आपके उद्धार के सेनापति यीशु ने आपको परमेश्वर की सन्तानों में गिने जाने के योग्य बना दिया है। यही वह महान सत्य है जो अब आपकी पहचान का केन्द्र है—फिर चाहे आप कोई भी हों और आपकी परिस्थिति कोई भी हो। यही वह सत्य है जो आपको हर दिन सिर उठाकर, आत्मविश्वास से जीने में समर्थ बनाता है, यह जानते हुए कि जो भी हो, आप परमेश्वर की सन्तान हैं।

  1 यूहन्ना 2:28 – 3:3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 32–33; लूका 11:1-28 ◊


[1] जेम्स मोण्ट्गोमेरी बोइस, दि गॉस्पल ऑफ जॉन: ऐन एक्सपोज़िशनल कॉमैण्ट्री (ज़ोण्डरवन, 1975), खण्ड. 1, पृ. 89.

3 दिसम्बर : परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देना

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3 दिसम्बर : परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देना
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“वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।” यूहन्ना 1:11

बहुत से अभिनेता यह सोचते हैं कि वे हैमलेट की भूमिका निभाने के योग्य हैं। परन्तु अनेक बार, वे वास्तव में उस योग्य नहीं होते। उनमें वह क्षमता और अनुभव नहीं होता, जो इस गहन भूमिका के लिए अपेक्षित है—हालाँकि यह तथ्य उन्हें इसका प्रयास करने से रोकता नहीं है!

इसी प्रकार, हर पुरुष और स्त्री अपने जीवन में किसी न किसी समय परमेश्वर के अधिकार को चुनौती देने के प्रलोभन में पड़ते हैं और यह भ्रम पाल लेते हैं कि वे वह भूमिका निभा सकते हैं जो केवल वही निभा सकता है। अक्सर हम अपनी परिस्थितियों में उसकी दिव्य योजना और नियन्त्रण पर भरोसा करने में असफल होते हैं। इसके स्थान पर, हम उसके सम्पूर्ण प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते हैं। हम उस स्थान को छीनने का प्रयास करते हैं, जो केवल सृष्टिकर्ता परमेश्वर का है।

परमेश्वर के अधिकार का विरोध कोई नई बात नहीं है। जब यीशु पुराने नियम की भविष्यवाणियों की पूर्ति के रूप में इस पृथ्वी पर आया, तब भी अपने सेवा-काल में वह अपने ही लोगों द्वारा अस्वीकार किया गया। इस्राएल मसीह की प्रतीक्षा कर रहा था—परन्तु जब वह आया, तब उन्होंने उसके अधिकार पर प्रश्न उठाया और उसकी पहचान को अस्वीकार कर दिया। वे भविष्यवाणियों को जानते थे, परन्तु उनकी पूर्ति को नहीं पहचान सके।

यहूदी धार्मिक अगुवों और अन्यजाति शासकों द्वारा क्रूस पर मारे जाने से कुछ दिन पहले यीशु ने दुष्ट किसानों का दृष्टान्त कहा, जिन्होंने दाख-वाटिका के स्वामी के पुत्र को अस्वीकार किया और उसे मार डाला। प्रभु ने इस दृष्टान्त के द्वारा मुख्य याजकों, शास्त्रियों और अगुवों के आत्मिक अन्धेपन को उजागर किया, जो उससे उसके कार्यों का हिसाब मांग रहे थे (मरकुस 12:1–12)। वे समझ गए थे कि यीशु स्वयं को परमेश्वर का पुत्र कह रहा था। परन्तु जब यीशु ने स्पष्ट रूप से उन्हें चेतावनी दी कि वे उन किसानों जैसे हैं, जिन्होंने स्वामी के पुत्र को मार डाला, तब दुख की बात है कि वे उसी क्षण उसे पकड़ने का षड्यन्त्र रचने लगे!

हमें यह सोचने का प्रलोभन हो सकता है: “वे धार्मिक अगुवे कितने घमण्डी थे, जो सृष्टि के राजा के सामने खड़े होकर उसके अधिकार को चुनौती दे रहे थे!” परन्तु सच तो यह है कि हम भी पहले उनसे भिन्न नहीं थे। अपने पापपूर्ण स्वभाव में, हम भी उस पुत्र को ग्रहण नहीं करना चाहते थे जिसे परमेश्वर ने भेजा था। हम अन्धकार में रहना पसन्द करते थे। सच कहें तो, वह अन्धकार हमें भाता था!

यूहन्ना इस सत्य को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है जब वह कहता है, “ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उनके काम बुरे थे” (यूहन्ना 3:19)। मनुष्य स्वाभाविक रूप से यह नहीं करते कि वे बैठकर सुसमाचार की ज्योति को अपने हृदय में आने की प्रतीक्षा करें। परन्तु अपने अनुग्रह में, परमेश्वर अन्धों की आँखें खोलता है, जिससे वे उसके पुत्र की पहचान को देखें, उस पर विश्वास करें और उसकी आराधना करें।

यही कारण है कि बाइबल हमेशा “आज” की बात करती है। मसीह के लिए जीवन जीने का कोई दिन आज से उत्तम नहीं है। हम विश्वासियों को भी, अपने मसीही जीवन में निरन्तर पश्चाताप और पुनर्स्थापना के लिए बुलाया गया है। हमें अपने जीवन में वह स्थान नहीं हथियाना है, जो केवल परमेश्वर के लिए आरक्षित है। जब हमारे हृदय अपने पाप के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, और जब हम उसके धीरज और दया को अनुभव करते हैं, तो उसकी भलाई हमें पवित्रता की ओर ले जाती है। और जब आप अपने जीवन के केन्द्र में परमेश्वर को रखते हैं—उसे वह भूमिका निभाने देते हैं जो केवल उसी के योग्य है—तब आप आनन्द और आत्मविश्वास के साथ उस भूमिका को पूरा कर सकते हैं जो उसने आपको दी है, अर्थात वह जीवन जीना जो उसने आपको उपहारस्वरूप दिया है, और उस उद्देश्य को पूरा करना जिसके लिए उसने आपको जीवन के “मंच” पर बुलाया—एक ऐसा जीवन जो उसे जानने, उससे प्रेम करने, और उसकी सेवा करने में व्यतीत होता है।

मरकुस 12:1-12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: 2 इतिहास 30–31; लूका 10:25-42