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21 जुलाई : दूध से ठोस आहार की ओर

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21 जुलाई : दूध से ठोस आहार की ओर
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“समय के विचार से तो तुम्हें गुरु हो जाना चाहिए था, तौभी यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्‍वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए।” इब्रानियों 5:12

यदि आप अपने बेसमेंट में व्यायाम के लिए बहुत सारे उपकरण रखते हैं, लेकिन कभी वजन नहीं उठाते, न ही अपनी मांसपेशियों को प्रशिक्षित करते हैं और न ही अपने दिल की सेहत का ध्यान रखते हैं, तो वे सारे उपकरण बेकार होंगे। मांसपेशियाँ तभी बढ़ती हैं, जब उन्हें निरन्तर उपयोग में लाया जाता है। एक व्यक्तिगत प्रशिक्षक सहायक हो सकता है, लेकिन हमें खुद को प्रशिक्षित करने के लिए भी प्रतिबद्ध होना होगा। जब पौलुस ने तीमुथियुस से कहा, “भक्ति की साधना कर” (1 तीमुथियुस 4:7), तो वह प्रमुख रूप से यह कह रहा था कि कोई आदर्श व्यक्ति, नेता या मित्र उसके लिए परिश्रम नहीं कर सकता था।

जब हम अपनी मसीही यात्रा में बढ़ते हैं, तो हम बुनियादी सत्य सीखते हैं, जिन्हें हम धीरे-धीरे व्यवहार में लाते हैं और आध्यात्मिक विवेक में बढ़ते जाते हैं। यह प्रक्रिया हमें दूध से ठोस आहार की ओर (इब्रानियों 5:12-14), आध्यात्मिक शिशु से आध्यात्मिक परिपक्वता की ओर बढ़ने में मदद करती है, ताकि हम अन्ततः दूसरों को सिखाने में सक्षम हो सकें। यह परमेश्वर द्वारा स्थापित किया गया जीवन चक्र है, जिसका उद्देश्य उसके राज्य का विस्तार करना है।

एक और रूपक का उपयोग करते हुए, मसीही आस्था के बुनियादी सत्य महत्त्वपूर्ण हैं; हम मसीह के बारे में जो कुछ भी सीखते हैं, वह इन्हीं पर आधारित होता है। लेकिन हमेशा के लिए इन्हीं पर ध्यान केन्द्रित करना उत्पादक नहीं है। हमें मसीही जीवन में प्रगति करने में परिश्रम करना है, निरन्तर पवित्रता में बढ़ने का प्रयास करना है और यह प्रार्थना करनी है कि पवित्र आत्मा हमें उसकी प्रेरित वाणी में और गहराई से जाने में मदद करे।

परमेश्वर अपने बच्चों को अपने पुत्र के स्वरूप में जीवन से या उसके वचन के निर्देशन से अलग होकर रूपान्तरित नहीं करता। जब आप पवित्रशास्त्र में प्रशिक्षित होते हैं और उसे पकड़े रहते हैं, तब आप प्रगति करते हैं। क्या आपकी बाइबल प्रतिदिन अनुशासित उपयोग के संकेत दिखाती है? क्या आप योजनाबद्ध रीति से उन लोगों से सीखने का प्रयास करते हैं, इस यात्रा में आपसे आगे हैं, और क्या आप कठिन शिक्षाओं को समझने का प्रयास करते हैं, बजाय इसके कि उन्हें “विशेषज्ञों” के लिए छोड़ दें? और क्या आप इस उद्देश्य से पढ़ते, संघर्ष करते और ध्यान करते हैं कि मसीह से आपका प्रेम बढ़े और आपकी कलीसिया और समुदाय में दूसरों की सेवा करने की अपनी क्षमता बढ़े, बजाय इसके कि आप केवल अधिक ज्ञान प्राप्त करें? आपके बारे में कभी यह न कहा जाए कि आप अधिक वृद्धि नहीं कर सके और परमेश्वर के लोगों की मदद करने के लिए अधिक प्रयास नहीं कर सके। बढ़ने का प्रयास करें। इसके लिए परमेश्वर की मदद की आवश्यकता होगी—लेकिन जब हम उसे खोजते हैं, वह निश्चय ही हमारे प्रयासों को सम्मानित करेगा!

इब्रानियों 5:7 – 6:3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 29–30; प्रेरितों 15:22-41 ◊

20 जुलाई : सच्चा तम्बू और मन्दिर

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20 जुलाई : सच्चा तम्बू और मन्दिर
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“इस पर यहूदियों ने उस से कहा, ‘तू जो यह करता है तो हमें कौन सा चिह्न दिखाता है?’ यीशु ने उनको उत्तर दिया, ‘इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।’” यूहन्ना 2:18-19

कुछ लोग बाइबल को केवल दार्शनिक जानकारी और आध्यात्मिक टुकड़ों का मिश्रण समझते हैं। यह बात सत्य से बहुत दूर है, क्योंकि बाइबल में परमेश्वर की हमारे संसार में हस्तक्षेप की खुलती हुई कहानी है। परमेश्वर के राज्य का विषय हमें इस कहानी के सूत्र को समझने और उसका अनुसरण करने का एक उपयोगी तरीका प्रदान करता है।

और हर राज्य में राजा का एक निवास स्थान होता है।

पुराने नियम के अधिकांश भाग में तम्बू वह स्थान था, जहाँ परमेश्वर इस्राएल के मध्य में निवास करता था। हालाँकि तम्बू परमेश्वर के लोगों के बीच था, फिर भी यह उनके लिए खुला नहीं था। यहाँ तक कि मूसा भी उस समय उसमें प्रवेश नहीं कर सकता था, जब परमेश्वर की महिमा का बादल उस पर आकर ठहरता था (निर्गमन 40:34-35)। फिर जब यरूशलेम उस देश की राजधानी बन गया, तब तम्बू का स्थान एक स्थाई भवन अर्थात मन्दिर ने ले लिया। अब परमेश्वर, अपनी प्रजा का राजा, अपनी प्रजा के और उनके देश की राजधानी में निवास कर रहा था। लेकिन फिर भी परमेश्वर तक पहुँचने का रास्ता उस पर्दे द्वारा अवरुद्ध था, जो मन्दिर के परम पवित्र स्थान को शेष मन्दिर से अलग करता था (निर्गमन 26:31-34)।

और फिर “वचन देहधारी हुआ” और सचमुच “हमारे बीच में डेरा किया” (यूहन्ना 1:14)।

नए नियम को पढ़ते समय हम पाते हैं कि जैसे पुराने नियम में लोग तम्बू में परमेश्वर से मिलने की उम्मीद करते थे, वैसे अब हम एक व्यक्ति को देखते हैं—जो स्वयं परमेश्वर है, जिसने मानव शरीर में निवास किया और हमारे बीच जीवन यापन किया। यूहन्ना की भाषा विशेष रूप से यह सन्देश देती है कि यीशु में परमेश्वर ने शारीरिक रूप से अपने लोगों के बीच निवास किया और अब अपने आत्मा के द्वारा अपने लोगों में निवास करता है (यूहन्ना 14:16-18)। वह हमारे बीच है। दूसरे शब्दों में, यीशु ही असली तम्बू है।

यीशु इसी बात को समझाना चाहता था, जब उसने मन्दिर को शुद्ध किया था और वहाँ धन्धा करने वाले व्यापारियों और पैसे बदलने वालों को बाहर निकाल था, और उससे पूछा गया था कि वह इतना दुस्साहस का काम किस अधिकार से कर रहा था (यूहन्ना 2:13-16), तो उसने उत्तर दिया, “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।” यूहन्ना यह बताता है कि जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, उसे दफन किया गया और वह मृतकों में से जी उठा, तब उनके शिष्य समझ गए कि “उसने अपनी देह के मन्दिर के विषय में कहा था” (पद 21)।

यीशु की मृत्यु के समय मन्दिर का पर्दा फट गया, यह संकेत देते हुए कि अब हम मसीह के द्वारा परमेश्वर की उपस्थिति में बिना किसी रुकावट के जा सकते हैं; लेकिन यह इस बात का संकेत भी था कि मन्दिर की अब कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उसका उद्देश्य अब पूरा हो गया था। इसके कुछ दशकों बाद यरूशलेम का मन्दिर सचमुच ढा दिया गया।

यदि हम परमेश्वर से मिलना चाहते हैं, तो हमें यीशु के पास जाना होगा। अब हमें किसी विशेष भवन या विशेष प्रतीकों या मन्दिरों की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपने लोगों से मिलता है—जब हम एकत्र होते हैं और जब हम बिखरे होते हैं—किसी निर्धारित स्थान में नहीं बल्कि अपने पुत्र में, जो असली मन्दिर है। चाहे आज कोई भी दिन हो और आप जो भी कर रहे हों, आपको पवित्र परमेश्वर से साक्षात मिलने से कोई नहीं रोक सकता। आज राजा स्वयं आप में निवास करता है।

यूहन्ना 2:13-22

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 26–28; प्रेरितों 15:1-21

19 जुलाई : अटल रूप से जुड़े हुए

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19 जुलाई : अटल रूप से जुड़े हुए
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“अतः यदि मसीह में कुछ शान्ति, और प्रेम से ढाढ़स, और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करुणा और दया है, तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो।” फिलिप्पियों 2:1-2

मसीही बनने का अनुभव कुछ हद तक विवाह करने जैसा होता है। दो अविवाहित व्यक्ति विवाह के बन्धन में एक हो जाते हैं और उनका जीवन अविच्छेदनीय रूप से आपस में जुड़ जाता है। इसी तरह, जब हम मसीह को उसके सम्पूर्ण प्रेम में स्वीकार करते हैं और उस उद्धार को स्वीकार करते हैं, जो उसने क्रूस पर हमारे लिए प्राप्त किया है, तो हम उसके साथ एक हो जाते हैं—और फिर कभी पहले जैसे नहीं रहते।

जैसा कि प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पियों को याद दिलाया था, आज हम भी उस प्रोत्साहन को पहचान सकते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ हमारे मिलन का परिणाम है। उसके साथ हमारा सम्बन्ध परमेश्वर के अनुग्रह का एक उपहार है और हम यह जानकर सुरक्षित महसूस कर सकते हैं कि हम जहाँ कहीं भी जाएँ वह अपने आत्मा की शक्ति से हमारे साथ होता है। यदि आप विश्वास द्वारा मसीह के साथ एक हो गए हैं, तो वह आपके अपने हाथों और पैरों से भी अधिक आपके निकट है। आपका जीवन हमेशा के लिए प्रभु के साथ जुड़ गया है।

21वीं सदी के जीवन की एक प्रमुख कठिनाई यह है कि हम में से कई लोग कभी-कभी अकेले, बिना किसी साथी के और बिछड़े हुए महसूस करते हैं, भले ही हम बहुत सारे लोगों के बीच में ही क्यों न हों। हम अपने इस अलगाव की भावना को सतही बातचीत या हल्की मुस्कान से छिपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कभी-कभी हम लोगों के बीच से आते हुए खुद को बुरी तरह खोया हुआ महसूस करते हैं।

वास्तव में, मसीहियों को इस निराशा का अनुभव करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम मसीह के साथ अपने मिलन का आश्वासन जानते हैं और अनुभव करते हैं। वह हमें पूरी तरह से जानता है और हमें अनन्त प्रेम करता है। इसे जानने से हमें बड़ी सान्त्वना मिलती है!

जिस “सान्त्वना” का उल्लेख पौलुस यहाँ पर करता है, वह केवल एक साधारण, आरामदायक भावना नहीं है; यह शब्द कुछ ऐसा वर्णित करता है, जिसमें शक्ति और आकर्षण शामिल होता है। यह एक क्रियाविशेषण है: सान्त्वना हमारे एक दूसरे के साथ सम्बन्ध में बहती है, क्योंकि आत्मा हमें न केवल अपने आप से बल्कि स्वर्ग पहुँचने से पहले हमें एक दूसरे से भी जोड़ता है। जितना अधिक हम मसीह के साथ अपने मिलन के लाभों का आनन्द लेते हैं—जिसमें सबसे अनमोल स्वयं मसीह है—उतना ही हम अपने विश्वासी भाई-बहनों के अधिक निकट आते हैं और अधिक प्रेमपूर्ण बनते जाते हैं।

फिर भी, जबकि ऐसी सान्त्वना हमें आशीषित करती है, यह हमें उत्तरदायी भी बनाती है। मसीह की दया और करुणा के हमारे ज्ञान से हमें एक दूसरे के प्रति स्नेह और सहानुभूति दिखाने की प्रेरणा मिलनी चाहिए, क्योंकि हम उसके साथ अपने मिलन में बढ़ते जाते हैं। यह सम्भव है कि जीवन के संघर्षों के कारण हम कठोर हो जाएँ, यह सम्भव है कि हम उस अनुग्रह की कमी महसूस करें जो कोमलता में प्रकट होता है, यह भी सम्भव है कि हम अपने आप में इतने व्यस्त हो जाएँ कि हम दूसरों से प्रेम करने में विफल हो जाएँ।

आज आपको किस प्रकार की सान्त्वना या प्रोत्साहन की आवश्यकता है? अपने मसीह के साथ मिलन पर विचार करें और उन्हें उसी में पाएँ। फिर आत्मा से पूछें कि वह आपको किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाए जिसे आज सान्त्वना या प्रोत्साहन की आवश्यकता है और मसीह की सान्त्वना को उनके पास लाने का माध्यम बनें।

कुलुस्सियों  3:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 23–25; प्रेरितों 14 ◊

18 जुलाई : परमेश्वर का राजा

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18 जुलाई : परमेश्वर का राजा
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“फिर परमेश्‍वर ने उससे (याकूब से) कहा, ‘मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ। तू फूले–फले और बढ़े; और तुझ से एक जाति वरन् जातियों की एक मण्डली भी उत्पन्न होगी, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।’” उत्पत्ति 35:11

न्यायियों की पुस्तक इस्राएलियों की कहानी बताती है, जब उनके नेता यहोशू के निधन के बाद वे प्रतिज्ञा के देश में निवास करने लगे। यह एक निराशाजनक कहानी है क्योंकि लोग बहुत जल्दी बगावत करने लगे, और एक ऐसा चक्र आरम्भ हुआ जो इस पुस्तक में बार-बार दोहराया जाता है। पहला, लोग पाप करते; दूसरा, परमेश्वर उन्हें पराजित और उत्पीड़ित होने देता; तीसरा, वे मदद के लिए रोते; और चौथा, परमेश्वर एक न्यायाधीश या नेता को उठाकर इस्राएल के शत्रुओं को हराता और देश में शान्ति स्थापित करता। लेकिन शान्ति कभी लम्बे समय तक नहीं रहती थी और यह चक्र फिर से दोहराया जाता था।

न्यायियों की अवधि के दौरान, इस्राएल धार्मिक, सामाजिक, नैतिक और आर्थिक दृष्टि से ढह रहा था। इसके परिणामस्वरूप, लोग सोचने लगे कि यदि एक राजा नियुक्त किया जाए तो जीवन बहुत बेहतर हो जाएगा, जैसा कि परमेश्वर ने याकूब से कहा था कि एक राजा का उदय होगा। फिर भी, अपने आस-पास के राष्ट्रों के समान बनने की इच्छा में उन्होंने परमेश्वर के राजत्व को नकार दिया और इस प्रकार उस अवस्था को त्याग दिया जो उन्हें अद्वितीय बनाती थी। उन्होंने परमेश्वर-तन्त्र के स्थान पर एक राज-तन्त्र की मांग की। और ऐसे राजा की तलाश करने के बजाय जो परमेश्वर की अधीनता में रहकर शासन करता और उन्हें परमेश्वर के नियमों के आज्ञापालन में स्थापित रखता, वे ऐसे राजा की तलाश करने लगे जो परमेश्वर के बजाय स्वयं उनपर शासन करे।

अद्‌भुत बात यह है कि इस्राएलियों की पापपूर्ण इच्छाओं के बावजूद परमेश्वर ने उनकी मांग को पूरा किया। इस्राएल के बहुत से राजा हुए, लेकिन कभी वह राजा नहीं आया जिसकी उन्हें सचमुच जरूरत थी। अभी एक और महान राजा आने वाला था।

इसमें भी परमेश्वर ने अपनी योजना को पूरा किया। उसने लोगों की संकीर्ण दृष्टि और दूसरे राष्ट्रों के राजा जैसे राजा की मांग को अपने परम उद्देश्य को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया, जिसके माध्यम से ऐसा राजा आने पर था जो अन्ततः सब राष्ट्रों पर शासन करेगा। आग चलकर इस्राएल के राजवंश में यीशु का जन्म हुआ—वह आने वाला राजा जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की थी—वह जिसका “न तो यहूदा से राजदण्ड छूटेगा, न उसके वंश से व्यवस्था देने वाला अलग होगा; और राज्य-राज्य के लोग उसके अधीन हो जाएँगे।” (उत्पत्ति 49:10)। सच्चा राज्य मसीह द्वारा स्थापित किया जाएगा, जो परमेश्वर के अधिकार के तहत शासन करेगा और जो अयोग्य लोगों के लिए परमेश्वर का सर्वोत्तम उपहार होगा।

देखिए कितना महान है परमेश्वर, जो अपनी योजनाओं में मूर्खतापूर्ण मांगों और बुरी इच्छाओं को भी समेट लेता है! परमेश्वर हमारे चुनावों और गलतियों से बहुत बड़ा है। वह हर गलत कदम पर पूरी तरह से शासन करता है। चाहे हम इस्राएल की तरह कभी-कभी असफल हो जाते हैं, तौभी हम निश्चिन्त हो सकते हैं कि अपने उद्देश्यों को पूरा करते हुए परमेश्वर हमारी विफलताओं पर विजय प्राप्त करेगा। और आज हम किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति की सेवा करने के बजाय खुशी-खुशी उसके राजा की आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं।

2 शमूएल 7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 20–22; प्रेरितों 13:26-52

17 जुलाई : अविश्वास से बचकर रहना

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17 जुलाई : अविश्वास से बचकर रहना
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“अतः जैसा पवित्र आत्मा कहता है, ‘यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मन को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय और परीक्षा के दिन जंगल में किया था। जहाँ तुम्हारे बापदादों ने मुझे जाँचकर परखा और चालीस वर्ष तक मेरे काम देखे।’” इब्रानियों 3:7-9

इस्राएलियों के प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश करने से पहले परमेश्वर ने उन्हें कनान में बारह जासूस भेजने का आदेश दिया था। उन जासूसों में से दो, यहोशू और कालेब, अपनी “अल्पसंख्यक रिपोर्ट” के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसमें उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि देश अधिकार में ले लिए जाने के लिए तैयार था। लेकिन लोगों ने उनकी बात नहीं मानी, और परमेश्वर पर अविश्वास दर्शाया। परमेश्वर पर विश्वास करने के सारे प्रमाण मौजूद होने के बावजूद उन्होंने अपनी समझ पर भरोसा करने का फैसला ले लिया।

सन्देह के उस पल में लोगों में यह डर आ गया कि यदि वे कालेब और यहोशू की बात मान कर परमेश्वर की शक्ति पर भरोसा करते हुए एक शक्तिशाली शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए कदम बढ़ाएँगे, तो वे मारे जाएँगे (गिनती 13:25-14:4)। परमेश्वर ने तुरन्त न्याय-दण्ड भेजा: परमेश्वर द्वारा दिए गए प्रतिज्ञा के देश का आनन्द लेने के बजाय एक पूरी पीढ़ी ने अपना जीवनभर मरुभूमि में बिता दिया और उस आनन्द का अनुभव नहीं कर पाए जो परमेश्वर ने उन्हें दिया था (गिनती 14:21-23)।

इस्राएलियों की तरह आप और मैं भी अविश्वास की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं। इब्रानियों का लेखक हमें चेतावनी देता है, “हे भाइयो, चौकस रहो कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो तुम्हें जीवते परमेश्‍वर से दूर हटा ले जाए” (इब्रानियों 3:12)। ऐसी चेतावनी नहीं दी जाती यदि हमारे हृदय पाप और अविश्वास के खतरे में न होते! हम पाप करना चाहते हैं। हम अपनी ही राह पर चलना चाहते हैं। हम विश्वास करना नहीं चाहते।

अविश्वास हमें इस प्रकार कठोर कर देता है कि जब बाइबल पढ़ी जाती है, तो परमेश्वर का वचन हमारे हृदय और मन में उस बीज की तरह नहीं आता जो तैयार भूमि में बोया जाता है, इसके बजाय हमारे हृदय और मन उस तिरछी छत की तरह हो जाते हैं, जिस पर वर्षा की बूँदें नहीं रुकतीं। जितना अधिक बाइबल सिखाई जाती है, हम पर उसका प्रभाव उतना ही अधिक उस कठोर सतह के जैसे हो जाता है, जिसके पार कुछ भी नहीं जा सकता।

इसलिए सावधान रहें, ताकि आपका हृदय पवित्रशास्त्र के सत्यों के प्रति अभेद्य न हो जाए। सावधानी बरतें कि आप ऐसे व्यक्ति न बन जाएँ जो बाइबल का बचाव करता है, दूसरों से इसके बारे में बात करता है, और उद्धरण देता है, लेकिन साथ ही अपने हृदय को परमेश्वर द्वारा कही गई बातों के खिलाफ कठोर करता रहता है।

हम ऐसे अविश्वास से अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं? दूसरों को यह याद रखने के लिए प्रेरित करें कि परमेश्वर ने मसीह के द्वारा क्या किया है, और उनसे यह भी कहें कि वे आपके लिए भी ऐसा ही करें (कुलुस्सियों 3:16)। और उसी आत्मा से, जिसने पवित्रशास्त्र को लिखा है, कहें कि वह आपके हृदय में काम करे जब आप उसकी आवाज़ सुनते हैं। जब आपको परमेश्वर की शक्ति और देखभाल की याद दिलाई जाती है, और आत्मा आपके अन्दर काम करता है, तो आपका हृदय परमेश्वर के वचन के बीजों को ग्रहण करने के लिए कोमल हो जाएगा।

लूका 13:18-35

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 18–19; प्रेरितों 13:1-25 ◊

16 जुलाई : सेवा के लिए बुलाए गए

“यीशु ने उनसे कहा, ‘मेरे पीछे चले आओ, तो मैं तुम को मनुष्यों के पकड़ने वाले बनाऊँगा।’ वे तुरन्त जालों को छोड़कर उसके पीछे हो लिए।” मत्ती 4:19-20

क्या आपने कभी ऐसा किया है कि आप कहीं गए, मान लीजिए किसी रेस्टोरेंट, डॉक्टर के ऑफिस, या किसी दुकान में गए और वहाँ किसी कर्मचारी से पूछा कि वे जो कुछ करते हैं, वह वे क्यों करते हैं? शायद वे अपने परिवार का पालन-पोषण करने की कोशिश कर रहे हैं। हो सकता है कि उन्हें इस क्षेत्र में बचपन से गहरी रुचि रही हो। कई उत्तरों के बीच शायद आप कभी किसी को यह कहते हुए सुनें, “यह मेरा बुलावा है।” एक वास्तविक अर्थ में वे नए नियम के दृष्टिकोण से सेवाकार्य को सटीक रूप से व्यक्त करते हैं।

जो लोग मसीह में हैं, वे सभी सेवा के जीवन के लिए बुलाए गए हैं। ऐसा नहीं है कि मसीह के पास तो हम सभी बुलाए गए हैं, लेकिन केवल कुछ ही आगे बढ़कर सेवा करते हैं; सेवा मसीही शिष्यत्व का एक अभिन्न हिस्सा है। जब यीशु ने अपने शिष्यों को “मनुष्यों के मछुआरे” बनने के लिए कहा, तो वास्तव में वह उन्हें यह कह रहा था, मेरे पास तुम्हारे लिए एक काम है। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे सेवाकार्य में भाग लो।

चाहे एक मसीही को परमेश्वर के वचन का प्रचारक या शिक्षक होने के लिए, युवाओं के लिए बाइबल अध्ययन के अगुवे के रूप में, कलीसिया के बच्चों की कक्षा में स्वयंसेवक के रूप में, या फिर अपनी फैक्ट्री या दफ्तर में गवाह के रूप में, घर में बच्चों की परवरिश करने वाले माता-पिता के रूप में, या एक बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने वाले बच्चों के रूप में, या किसी अन्य भूमिका में बुलाया गया हो, परमेश्वर का सेवा का बुलावा समान रूप से लागू होता है। “पूर्णकालिक सेवकों” और “अल्पकालिक सेवकों” के बीच का अन्तर उनके महत्त्व का नहीं बल्कि केवल कार्य का अन्तर है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात सेवा है।

बाइबल के दृष्टिकोण में सेवा महानता का रास्ता नहीं है; सेवा ही महानता है। “मनुष्य का पुत्र इसलिए नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिए आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिए अपना प्राण दे” (मरकुस 10:45)। हम त्यागपूर्ण सेवा इस उम्मीद में नहीं करते कि हमारी “तरक्की” होगी, जैसे किसी नौकरी या शिक्षा के क्षेत्र में होती है, न ही हम सेवा इसलिए करते हैं ताकि एक दिन हम सेवा करना बन्द कर दें। यीशु कहता है, “यदि कोई बड़ा होना चाहे, तो सबसे छोटा और सबका सेवक बने” (मरकुस 9:35)। जब हमारे कार्य इस विरोधाभास को दर्शाते हैं, तब सारी महिमा परमेश्वर को मिलती है।

मसीही सेवा अन्ततः वह सेवाकार्य है, जो जी उठे प्रभु यीशु की सेवा है, जिसे उसके लोगों के बीच और उनके माध्यम से किया जाता है। प्रेरित पौलुस इसे स्पष्ट रूप से समझ गया था, इसीलिए उसने लिखा, “मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझमें जीवित है और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझसे प्रेम किया और मेरे लिए अपने आप को दे दिया।” (गलातियों 2:20)।

यीशु ने हमारे लिए अपना जीवन दे दिया ताकि वह हमारे जीवन को हमसे ले सके और उसे अपने जीवन के रूप में हमारे माध्यम से जी सके। यदि आप इसे समझते हैं, तो आप सचमुच उसी तरह सेवा कर पाएँगे जैसा यीशु ने की—और आपका जीवन अत्यन्त मूल्यवान हो जाएगा, जोकि आपकी अपनी सेवा करते हुए कभी नहीं हो सकता। इसलिए आज हम अपनी बुलाहट में जीएँ।

मरकुस 9:30-37

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 16–17; प्रेरितों 12

15 जुलाई : परमेश्वर की इच्छा का रहस्य

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15 जुलाई : परमेश्वर की इच्छा का रहस्य
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“क्योंकि उसने अपनी इच्छा का भेद उस भले अभिप्राय के अनुसार हमें बताया, जिसे उसने अपने आप में ठान लिया था कि समयों के पूरे होने का ऐसा प्रबन्ध हो कि जो कुछ स्वर्ग में है और जो कुछ पृथ्वी पर है, सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” इफिसियों 1:9-10

जब आप एक नई इमारत के निर्माण को बाहर से देखते हैं, तो बाहर लगे चबूतरों और बोरियों के पीछे जो कुछ हो रहा होता है, वह एक रहस्य जैसा प्रतीत हो सकता है। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि कुछ न कुछ अवश्य आकार ले रहा है, लेकिन आर्किटेक्ट के अलावा किसी और के लिए इसका अन्तिम परिणाम पूरी तरह से कल्पना कर पाना कठिन हो सकता है।

पुराने नियम की पटकथा के आगे बढ़ते हुए परमेश्वर की इच्छा का रहस्य इन्हीं चबूतरों और बोरियों के समान है, जो बाइबल की पटकथा के कुछ हिस्सों को ढक देता है। लेकिन फिर पौलुस कहता, “समय पूरा हुआ” (गलातियों 4:4)। यहाँ तक कि जब भविष्यद्वक्ताओं ने भी उस आने वाले के बारे में भविष्यद्वाणी की, तो वे अपने लेखन में दिए गए संकेतों और सुरागों के पीछे के पूरे अर्थ का केवल अनुमान ही लगा सकते थे (1 पतरस 1:10-11)।

बाइबल की भाषा में “रहस्य” कोई ऐसी पहेली नहीं है, जिसे मनुष्य की बुद्धि से हल किया जा सके। बल्कि यह एक गुप्त बात है, जिसे स्वयं परमेश्वर अपने समय पर प्रकट करेगा। परमेश्वर के आत्मा के काम के माध्यम से परमेश्वर के कई रहस्य हमारी समझ में स्पष्ट होते जाते हैं। उसके काम के बिना हम इन्हें समझ नहीं सकते।

अपने पुनरुत्थान के बाद, जब यीशु को इम्माऊस के मार्ग में दुखी यात्रियों से बात करने का मौका मिला, तो उसने उन्हें एक प्रेमपूर्ण लेकिन रणनीतिक तरीके से उत्तर दिया (लूका 24:18-27)। पहले, वे उसे पहचान नहीं पाए और पूछा, “क्या तू यरूशलेम में अकेला परदेशी है, जो नहीं जानता कि इन दिनों में उसमें क्या-क्या हुआ है?” (कितना विडम्बनापूर्ण है!) यीशु ने केवल इतना उत्तर दिया, “कौन सी बातें?” वह इन बातों को उनके मुख से सुनना चाहता था।

फिर, जब उन्होंने उसकी क्रूसीकरण और पुनरुत्थान का घटनाक्रम साझा किया, तो उसने उनसे कहा, “हे निर्बुद्धियो, और भविष्यद्वक्ताओं की सब बातों पर विश्वास करने में मन्दमतियो!” वे अब भी रहस्य को समझ नहीं पाए थे—और इसलिए लूका हमें बताता है, प्रभु ने इसे उनके लिए स्पष्ट किया: “‘क्या यह अवश्य न था कि मसीह ये दुख उठाकर अपनी महिमा में प्रवेश करे?’ तब उसने मूसा से और सभी भविष्यद्वक्ताओं से आरम्भ करके सारे पवित्रशास्त्र में से अपने विषय में लिखी बातों का अर्थ उन्हें समझा दिया।”

“उसकी इच्छा का रहस्य” परमेश्वर के लोगों पर प्रकट किया गया है और वास्तव में प्रकट किया जा रहा है, ताकि “सब कुछ वह मसीह में एकत्र करे।” एक दिन जब पिता द्वारा अपने अधिकार से ठहराया गया समय पूरा होगा, तब यह एकता पूरी तरह से सम्पूर्ण हो जाएगी।

अन्ततः सारे चबूतरे और बोरे हटा दिए जाएँगे, और हम इमारत को उसकी पूर्णता में देखेंगे। उस दिन तक हम इस बात के लिए आभारी रह सकते हैं कि प्रभु ने उद्धार का रहस्य हम पर प्रकट कर दिया है, और हम उसकी स्तुति करते हुए उसकी सेवा कर सकते हैं, यह विश्वास करते हुए कि चाहे हम उसकी योजनाओं या उनकी पूर्णता को पूरी तरह से न समझ पाएँ, तो भी वह दिव्य आर्किटेक्ट अपने लोगों की भलाई और अपने पुत्र की महिमा के लिए सब कुछ सही तरीके से पूरा कर रहा है।

प्रकाशितवाक्य  5:1-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 13–15; प्रेरितों 11 ◊

14 जुलाई : प्राणों का एकमात्र उपचार

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14 जुलाई : प्राणों का एकमात्र उपचार
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“अराम के राजा का नामान नामक सेनापति अपने स्वामी की दृष्‍टि में बड़ा और प्रतिष्ठित पुरुष था, क्योंकि यहोवा ने उसके द्वारा अरामियों को विजयी किया था। वह शूरवीर था, परन्तु कोढ़ी था।” 2 राजाओं 5:1.

प्रत्येक दृष्टिकोण से यह प्रतीत होता था कि नामान ने सब कुछ हासिल कर लिया था।

नामान सीरिया के प्रसिद्ध शहर दमिश्क का रहने वाला एक व्यक्ति था। लेबनान के पहाड़ों से निकलने वाली दो नदियाँ, जो अत्यन्त सुन्दरता से भरे एक उपजाऊ नखलिस्तान में बहती थीं, जहाँ यह शहर स्थित था। यह समृद्धि और सुख-विलास का स्थान था, और कला, संगीत, और मनोरंजन के सांस्कृतिक आकर्षण प्रदान करता था। सीरियाई सेना के सफल सेनापति के रूप में नामान के पास शक्ति और प्रतिष्ठा की एक ईर्ष्यालु स्थिति थी और उसे उसके राजा सहित हर व्यक्ति उच्च सम्मान देता था। और निस्सन्देह, शक्ति और प्रतिष्ठा के साथ उसने बहुत सारी सम्पत्ति भी अर्जित की थी।

अर्थात, वह ऐसा व्यक्ति था जिसके पास सब कुछ था। बस एक चीज को छोड़कर। नामान के जीवन में एक ऐसा आयाम था, जो बाकी सारी चीजों पर काले बादल की तरह छाया डालता था। उसकी कई गर्वित उपलब्धियों को इस एक वाक्यांश ने धुंधला कर दिया था: “परन्तु वह कोढ़ी था।” जो कुछ भी उसने हासिल किया था—उसकी कई उपलब्धियाँ और अपार सम्पत्ति—उसकी समस्या से निपटने के लिए कुछ भी नहीं कर सका। वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था . . . और उसकी कोढ़ी अवस्था उसका जीवन बर्बाद कर रही थी।

जो शारीरिक स्थिति नामान को कष्ट दे रही थी, वह उस आध्यात्मिक स्थिति का चित्र है जिसमें हम सभी फँसे हुए हैं। उसकी कोढ़ी अवस्था घावों और कुरूपता से भरी संक्रामक स्थिति थी। बाइबल में यह पाप से संक्रमित मानव-प्रकृति का एक आदर्श चित्र है।

जब हम स्वयं और अपने सन्दर्भ के बारे में दूसरों से बताते हैं, तो हम यह सूचीबद्ध कर सकते हैं कि हम किसे जानते हैं, हम कहाँ-कहाँ गए हैं, और हमने क्या-क्या हासिल किया है। फिर भी इन सबके अन्त में, मसीह के बिना, हम निस्सन्देह उसी छोटे शब्द की ओर बढ़ रहे हैं, जैसा नामान के साथ हुआ था: परन्तु . . .

कोढ़ ने नामान की उच्च पदवी की कोई परवाह नहीं की और पाप भी हमारी किसी स्थिति की कोई परवाह नहीं करता। “सभी ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हो गए हैं” (रोमियों 3:23), और “सभी” का अर्थ सचमुच में “सभी” है। कोई भी पुरुष या महिला इस समावेशी कथन से बाहर नहीं है। कोई भी सम्पत्ति हमें पाप से नहीं छुटकारा दिला सकती और कोई भी अच्छाई उसे ढक नहीं सकती। हम सभी अपनी आत्माओं के कोढ़ से पीड़ित हैं, जिसका मसीह के अलावा और कोई इलाज नहीं है।

जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हमारी पदवी और सम्पत्ति हमारी सबसे बड़ी समस्या से नहीं निपट सकती, केवल तब ही हम यीशु की ओर मुड़ सकते हैं, जो हमारा महान चिकित्सक है, जिसने हमारी स्थिति को अपने ऊपर ले लिया ताकि हम स्वस्थ हो सकें। यीशु एक कोढ़ी से सम्पर्क करने और उसे छूने के लिए तैयार था, लेकिन ऐसा करके चाहे उसने लोगों की दृष्टि में स्वयं को अपवित्र कर लिया तौभी उसने उस व्यक्ति को पूरी तरह से स्वस्थ कर दिया। ठीक इसी प्रकार, क्रूस पर उसने पाप को अपने ऊपर ले लिया ताकि हम परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी हो सकें (2 कुरिन्थियों 5:21)।

आज, आपके चारों ओर बहुत सारे नामान हैं: ऐसे लोग जो प्रतिष्ठा, शक्ति और सम्पत्ति का आनन्द लेते हैं—ऐसे लोग जिन्होंने सब कुछ हासिल तो कर लिया है, लेकिन फिर भी पाप के कारण बर्बाद हो चुके हैं और न्याय का सामना कर रहे हैं। यह सत्य दूसरों से ईर्ष्या करने की हमारी भावना को कमजोर करता है और इसके बजाय दया को प्रेरित करता है। जैसा कि नामान को अपनी कोढ़ी अवस्था के लिए इलाज की आवश्यकता थी, वैसे ही हर पुरुष और महिला को पाप के लिए समाधान की आवश्यकता है—और आप उस इलाज को जानते हैं।

लूका 5:12-32

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 10–12; प्रेरितों 10:24-48

13 जुलाई :हमारा कर्ज चुका दिया गया है

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13 जुलाई :हमारा कर्ज चुका दिया गया है
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“उसने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, और विधियों का वह लेख जो हमारे नाम पर और हमारे विरोध में था मिटा डाला, और उसे क्रूस पर कीलों से जड़कर सामने से हटा दिया है।” कुलुस्सियों 2:13-14

क्यों ऐसा हुआ कि यीशु मसीह पृथ्वी पर आया, क्रूस पर मरा और मृतकों में से जीवित हुआ? ताकि विश्वास करने वालों के लिए शाश्वत मोक्ष दिया जा सके और उन्हें परमेश्वर के परिवार में गोद लेने का प्रबन्ध किया जा सके। यह ऐसी वास्तविकता है, जिसका कोई और धर्म दावा नहीं कर सकता: परमेश्वर ने स्वयं मनुष्य के पाप का कर्ज़ चुकाया ताकि हम उसकी सन्तान कहला सकें। गीतकार इस भुगतान के अद्‌भुत पहलू को इस प्रकार व्यक्त करता है:

ओ परिपूर्ण मोक्ष, रक्त से खरीदा गया!

प्रत्येक विश्वासी के लिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा;

सबसे बुरा अपराधी जो सच्चे दिल से विश्वास करता है,

उसी क्षण वह यीशु से माफी प्राप्त करता है। [1]

मसीह के मोक्ष के साथ हमारी मुलाकात वैसी ही है, जैसे “वृद्ध महिला बैट्टी” की कहानी, जो भारी वित्तीय कर्ज़ के कारण गरीबी में जी रही थी। एक दिन, एक मसीही सेवक और उसकी मण्डली ने बैट्टी के जीवन में हस्तक्षेप करने का निर्णय लिया और उसका कर्ज़ चुका दिया। वह सेवक बैट्टी के घर गया और उसके दरवाजे पर खटखटाता रहा—लेकिन गिरफ्तारी के डर से उसने पहले कुछ बार दरवाजे की दस्तक को नजरअंदाज कर दिया। जब वह अन्ततः उसे यह खुशखबरी बता पाया, तो बैट्टी ने उसे देखा और कहा, “जरा सोचिए: मैंने आपके लिए दरवाजा बन्द कर दिया था। मैं डर के मारे आपको अन्दर नहीं आने दे रही थी, और देखिए, आप इतना अच्छा उपहार लेकर आए हैं।”

कभी न कभी, हम सभी इस वृद्ध बैट्टी जैसे रहे हैं। एक समय हम जानते थे कि हम पाप के कर्ज़ में थे। हम पछतावे से दबे हुए थे, हम डरते थे कि लोग हमारे दरवाजे पर दस्तक देंगे और हमारी समस्याओं को दूसरों के सामने खोलकर रख देंगे। सबसे अधिक, हम परमेश्वर से डरते थे, क्योंकि उसके हाथ की दस्तक केवल न्याय का संकेत प्रतीत होती थी। लेकिन फिर हमें यह पता चला कि मसीह में परमेश्वर हमारे जीवन के दरवाजे पर दस्तक देता है ताकि हमें वह न दे जो हमें हमारे कर्ज़ के कारण मिलना चाहिए, बल्कि वह दे जो उसके प्रेम ने जीत लिया है: एक ताज़ा आरम्भ, एक कोरा कागज, एक नई कहानी। हमारा कर्ज़ माफ कर दिया गया, और हमने खुशी से अपने जीवन के दरवाजे को खोला और हमारे उद्धारकर्ता, मित्र, और प्रभु के रूप में उसका स्वागत किया।

एक मसीही होने का अर्थ है भुगतान किए जा चुके कर्ज़ के एहसास में जीना। अब हम पाप और उसके दण्ड के दास नहीं रहे; इसके बजाय हम स्वतन्त्र किए गए हैं और परमेश्वर की सन्तान के रूप में गोद लिए गए हैं। और अब, परमेश्वर के पुत्र और पुत्री के रूप में गोद लिए जाने के कारण ही हमें यह महान विशेषाधिकार प्राप्त हुआ है कि हम परमेश्वर को हमारे स्वर्गिक पिता के रूप में पुकार सकते हैं और उसे इतना नजदीकी रूप से जान सकते हैं। अब हम अपने कर्ज़ को थामे हुए अपने दरवाजे के पीछे नहीं छिपते, क्योंकि हमने उस स्वतन्त्रता का स्वाद चखा है, जो दस्तक देकर आई और हमने उसे अपने जीवन में स्वीकार किया।

यह जानने से हमें कितनी अद्‌भुत शान्ति मिलती है कि हमारा कर्ज़ माफ कर दिया गया! यह जानने से हमें कितना अद्‌भुत आनन्द मिलता है कि हमारे जीवित परमेश्वर के सामने हमारी स्थिति चिन्तित कर्ज़दारों से बदलकर गोद लिए गए पुत्रों और पुत्रियों की हो गई है। अब प्रश्न यह है: ये सत्य आपके स्वयं को देखने के दृष्टिकोण को और आज आपके सामने रखे कार्य को देखने के दृष्टिकोण को कैसे बदलेंगे?

  गलातियों 4:21 – 5:1

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 7–9; प्रेरितों 10:1-23 ◊


[1] फैनी क्रोस्बी, “टू गॉड बी द ग्लोरी” (1875).

12 जुलाई : धन्यवाद देने का बुलावा

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12 जुलाई : धन्यवाद देने का बुलावा
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“हे सारी पृथ्वी के लोगो, यहोवा का जयजयकार करो! . . . उसके फाटकों से धन्यवाद, और उसके आँगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश करो!” भजन 100:1, 4

सौवाँ भजन, जिसमें आराधना का बुलावा दिया गया है, भजन संहिता की पुस्तक का बहुत प्रसिद्ध भजन है। लेकिन इससे इतना अधिक परिचित होने के कारण हो सकता है कि हम इसे बहुत हल्के में लेने लग जाएँ। विभिन्न कारणों की वजह से ऐसे अंशों का अध्ययन करना आसान होता है, जिससे हम कम परिचित होते हैं, क्योंकि तब हम अध्ययन में आलसी नहीं होते। हम यह मानने की गलती नहीं करते कि हम उसे पहले से ही जानते हैं।

हमें कभी भी धन्यवाद के बुलावे को इतना हल्के में नहीं लेना चाहिए कि हम इसे केवल एक आम बात समझ कर अनदेखा कर दें। यह भजन हमें कुछ करने के लिए प्रेरित करता है! परमेश्वर के लोग होने के नाते हमें आनन्द से भरी आराधना और धन्यवाद से भरी स्तुति करने के लिए बुलाया गया है।

“जयजयकार करो” का अर्थ ऊर्जावान और आनन्द से भरी आराधना का बुलावा है। ऐसी स्तुति को किसी मजबूरी के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, मानो हमने कुछ अप्रिय चीज खा ली हो। इसके बजाय, यह हमारे जीवन में परमेश्वर के काम का प्रत्युत्तर होना चाहिए। सी. एस. लुईस इस बारे में इस प्रकार कहते हैं कि हम “आनन्द से चौंक” जाएँ। आराधना का अवसर सच्चे विश्वासियों की आत्मा को उन्नत करता है—और कोई भी इस प्रोत्साहन से बाहर नहीं है। परमेश्वर ने “सारी पृथ्वी” को अपनी महिमा के लिए बनाया है।

यह बुलावा हमें “उसके आँगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश” करने का आमन्त्रण भी देता है। लंदन में बकिंघम पैलेस के बाहर एक सामान्य व्यक्ति के अनुभव पर विचार करें, जहाँ आप बस अपनी नाक उसके बाड़ में घुसाकर दूर से शाही परिवार की एक झलक पाने की उम्मीद करते हैं। फाटकों को जानबूझकर बन्द किया गया है ताकि शाही परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। लेकिन हमारे परमेश्वर पिता के साथ हमारा अनुभव ऐसा नहीं है। यीशु की मृत्यु ने मन्दिर के परदे को दो टुकड़ों में फाड़ दिया (मत्ती 27:51) और हमारे लिए जीने का एक नया रास्ता खोला। यीशु के द्वारा हमें पिता तक पहुँच प्राप्त हुई है और फाटक अब स्वागत के लिए खुले पड़े हैं।

हमारी आनन्द से भरी आराधना और धन्यवाद से भरी स्तुति हमारे हालात या भावनाओं से जुड़ी नहीं होनी चाहिए। धन्यवाद की असली नींव यह ज्ञान है कि हमारा प्रभु ही परमेश्वर है और उसने हमें अपने आँगन में आमन्त्रित किया है, ताकि हम उसके सिंहासन के चारों ओर उसकी प्रजा के तौर पर और साथ ही उसकी सन्तान के तौर पर भी खड़े हो सकें। इसे पहचानने का अर्थ यह है कि हम एक दृढ़ आधार पर खड़े हैं ताकि हम सभी भजनकार के साथ कह सकें:

उसने मुझे सत्यानाश के गड़हे

और दलदल की कीच में से उबारा,

और मुझ को चट्टान पर खड़ा करके मेरे पैरों को दृढ़ किया है।

उसने मुझे एक नया गीत सिखाया

जो हमारे परमेश्‍वर की स्तुति का है।” (भजन 40:2-3)

एक दिन आप उसके आँगनों में खड़े होंगे। तब तक प्रत्येक रविवार आप अपनी स्थानीय कलीसिया में—जो उस स्वर्गिक सिंहासन कक्ष का दूतावास है—खड़े हो सकते हैं और भविष्य के उस दिन की प्रत्याशा में प्रभु के लिए आनन्द से गा सकते हैं।

भजन 100

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 4– 6; प्रेरितों 9:23-43