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12 अगस्त : दया का ऐलान

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12 अगस्त : दया का ऐलान
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“तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुँचा : ‘उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा, उसका उस में प्रचार कर।’ तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था।” योना 3:1-3

परमेश्वर दूसरा मौका देने वाला परमेश्वर है।

योना ने अपनी अवज्ञा के कारण नीनवे को आने वाले न्याय के बारे में चेतावनी देने के लिए परमेश्वर की आवाज़ का पालन करने के बजाय भागने का निर्णय लिया। लेकिन जब बुलावा दूसरी बार आया, तो उसने दूसरी बार आलसी होकर काम नहीं किया। अपनी असफलता और परमेश्वर की कृपा को जानकर वह पहले ही अवसर पर उन्हें प्रचार करने के लिए तत्पर दिखाई दिया।

जब हम आखिरकार योना को लोगों को पश्चाताप का बुलावा देते हुए पढ़ते हैं, तो हम यह कल्पना कर सकते हैं कि उसके ऊपर अपने स्वयं के अनुभवों का बोझ कितना अधिक होगा, जब वह अवज्ञा पर आने वाले दिव्य न्याय के बारे में बता रहा होगा। उसने चेतावनी दी, और इसमें निश्चित रूप से यह व्यक्तिगत गवाही भी शामिल थी कि परमेश्वर पापी लोगों को भी सबसे कठिन परिस्थितियों में से बचाने के लिए इच्छुक और सक्षम है। हालाँकि वह बाद में यह साबित करेगा कि उसने परमेश्वर की कृपा की विशालता और सीमा को पूरी तरह से नहीं समझा था (योना 4:1-3), परन्तु परमेश्वर की जो कृपा योना पर हुई थी, वह निश्चित रूप से उसके सन्देश में नीनवेवासियों तक पहुँची थी। जिस व्यक्ति को जल-जन्तु के रूप में दिव्य प्रावधान से दूसरा मौका मिला था, उसने अब एक ऐसे नगर को दूसरा मौका दिया था जो परमेश्वर से पूरी तरह विमुख हो चुका था।

क्या आप यह समझ पाए हैं कि परमेश्वर दूसरा (और तीसरा और चौथा) मौका देने वाला परमेश्वर है? क्या आप यह समझ पाए हैं कि न तो आप परमेश्वर की कृपा से तेज भाग सकते हैं या न ही उसकी कृपा की अथाह गहराइयों में पहुँच सकते हैं? यदि आप यह समझ गए हैं, तो आप निश्चित रूप से दूसरों को सुसमाचार का सन्देश देंगे। और जिस तरह से आप इसे साझा करेंगे, वह परमेश्वर की दी हुई कृपा को दर्शाएगा। यदि मसीही लोग अपने विश्वास के बारे में बात करते हुए कठोर, दयाहीन और कर्मकाण्डवादी प्रतीत होते हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अभी तक अपने दिलों को परमेश्वर की कृपा, अनुग्रह और प्रेम से पर्याप्त रूप से कोमल नहीं किया है। लेकिन यदि किसी मसीही के शब्दों और कार्यों में परमेश्वर की कृपा का आकर्षण और सौम्यता है, तो यह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उसने ऐसी कृपा को स्वयं अनुभव किया है।

भजन लेखक चार्ल्स वेस्ले ने, जिसे परमेश्वर की कृपा ने जीत लिया था, यह घोषणा की:

कृपा की गहराई! क्या मेरे लिए अब भी कृपा बची है?

क्या मेरा परमेश्वर अपने क्रोध को सह सकता है? मुझे, सबसे बड़े पापी को बचा सकता है?

मैंने लम्बे समय तक उसकी कृपा का विरोध किया है: लम्बे समय तक उसे क्रोध दिलाया है;

मैंने उसकी पुकारों को नहीं सुना; बार-बार असफलताओं से उसे दुखी किया . . .

उद्धारकर्ता मेरे लिए वहाँ खड़ा है, अपने घाव दिखाता है और अपने हाथ फैलाता है:

परमेश्वर प्रेम है! मैं जानता हूँ, मैं महसूस करता हूँ; यीशु रोता है, लेकिन फिर भी मुझसे प्रेम करता है।[1]

अभी परमेश्वर की कृपा पर विचार करें—कि कैसे वह आपको विश्वास तक लाया है, आपके प्रति धीरज धरता है और आपको क्षमा करता रहता है। उसके साथ आपके व्यवहार में जो आश्चर्य की भावना है, वह आपकी कहानी में झलकनी चाहिए जब आप दूसरों को उसकी उद्धारक प्रेम कथा सुनाते हैं। और यदि कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे आप परमेश्वर की दया दिखाने में असफल रहे हों या जब अवसर था तब उसे उसके बारे में बताने से चूक गए हों, तो अब उसके लिए एक दूसरा अवसर मिलने की प्रार्थना करें—और जब वह अवसर मिले, तो उसे पकड़ लें।

  भजन 30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 84–86; 1 पतरस 2 ◊


[1] चार्ल्स वैस्ले, “डेप्थ ऑफ मर्सी” (1740).

11 अगस्त : किनारा सामने है

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11 अगस्त : किनारा सामने है
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“तब योना ने उसके पेट में से अपने परमेश्‍वर यहोवा से प्रार्थना करके कहा, ‘मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उस ने मेरी सुन ली है; अधोलोक के उदर में से मैं चिल्ला उठा, और तू ने मेरी सुन ली।’” योना 2:1-2

यह वचन संघर्षशील विश्वासियों के लिए हैं, प्रभु से विमुख हो चुके विश्वासियों के लिए है और हम में से उन लोगों के लिए है जो अपनी अवज्ञा के कारण गहरे संकट में हैं।

योना की पुस्तक का जोर योना की परेशानियों पर नहीं बल्कि परमेश्वर के प्रावधान पर है। परमेश्वर ने योना को उसके पाप और अवज्ञा से बचाने के लिए असाधारण उपायों का उपयोग किया। भविष्यद्वक्ता यह स्वीकार करता है कि यह परमेश्वर ही था जिसने उसे “गहरे सागर में समुद्र की थाह तक डाल दिया” (योना 2:3)। हाँ, यह नाविक थे जिन्होंने योना को समुद्र में फेंका था, लेकिन योना ने पहचाना कि जो कुछ भी हुआ था वह परमेश्वर के सर्वशक्तिमान हाथ के नीचे हुआ था और नाविक तो केवल परमेश्वर के कार्य का माध्यम बने थे। परमेश्वर ने उसका पीछा किया और उसे उफनते समुद्र में फेंक दिया ताकि वह उस स्थिति में आ सके जहाँ वह कह सके, “मैं ने संकट में पड़े हुए यहोवा की दोहाई दी, और उस ने मेरी सुन ली है।”

इसके अलावा, बड़े जल-जन्तु के पेट में भविष्यद्वक्ता ने परमेश्वर से अलग होने का दर्द महसूस किया, मानो वह कह रहा हो “मैं [उसके] सामने से निकाल दिया गया हूँ” (योना 2:4)। योना के लिए समुद्र में लगभग डूब जाने का शारीरिक आतंक और जल-जन्तु द्वारा निगले जाने का भय उतना अधिक नहीं था, जितना उसके परमेश्वर से सदा के लिए अलग हो जाने का था। योना परमेश्वर के प्रेम को जानता था; वह जानता था कि परमेश्वर की उपस्थिति में होना क्या होता है। वह यह समझ गया था कि परमेश्वर से अलग होने का क्या अर्थ होता है, हालाँकि उसने स्वयं ही परमेश्वर से अलग होने का चुनाव किया था—और यही पाप का विकृत पहलू है।

यह हमारे लिए कितना महत्त्वपूर्ण सन्देश है! जब हम परमेश्वर से दूर हो जाते हैं, तो वह हमसे मिलने के लिए आँधियों और घाटियों में आता है, जो हमारी परिस्थितियों को बदलता है ताकि वह हमारा ध्यान आकर्षित कर सके, जो हमें अकेला और अलग महसूस करने देता है, ताकि हम कह सकें, “यह वह स्थान नहीं है जहाँ मुझे होना चाहिए। यह वह नहीं है जो परमेश्वर मेरे लिए चाहता है। मैं इस परिस्थिति से बाहर नहीं निकल सकता। लेकिन वह सक्षम है।”

आज आप गहरी असफलता और पछतावे की भावना से जूझ रहे हो सकते हैं। आप भाग रहे थे। आपने परमेश्वर की स्पष्ट आवाज़ की अवज्ञा की और छिपने की कोशिश की। लेकिन आपकी कहानी वहीं खत्म नहीं होनी चाहिए। अपनी कृपा और दया में परमेश्वर तय कर चुका है कि वह आपको बचाएगा और उस कार्य को पूरा करेगा, जिसे उसने आपके जीवन में आरम्भ किया है (फिलिप्पियों 1:6)। मसीही जीवन में हमेशा पश्चाताप की आवश्यकता होती है, लेकिन कभी भी निराश होने का कोई कारण नहीं होता।

जब योना किनारे पर पहुँचा, तो यह इसलिए नहीं हुआ क्योंकि वह इसके योग्य था। यह परमेश्वर के अनुग्रह के कारण हुआ था। इसी तरह, केवल परमेश्वर ही है जो हमारे पाप और अवज्ञा में हमारे पास आता है, ताकि वह हमें शुद्ध करे, हमें बचाए और उसके उद्देश्यों के लिए हमें फिर से स्थापित करे। क्या आप आज किनारा देख पा रहे हैं?

योना 2

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 81– 83; 1 पतरस 1

10 अगस्त : समस्त सृष्टि का प्रभु

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10 अगस्त : समस्त सृष्टि का प्रभु
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“योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिए उठा, और याफा नगर को जाकर तर्शीश जानेवाला एक जहाज़ पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके साथ यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए। तब यहोवा ने समुद्र में एक प्रचण्ड आँधी चलाई, और समुद्र में बड़ी आँधी उठी, यहाँ तक कि जहाज़ टूटने पर था।” योना 1:3-4

हम सृष्टि पर नियन्त्रण नहीं रखते। लेकिन परमेश्वर रखता है—और इसलिए वह हमारी सारी प्रशंसा और आराधना के योग्य है।

महासागरों पर—वास्तव में सम्पूर्ण सृष्टि पर—परमेश्वर का नियन्त्रण भजनकारों के कार्य में निरन्तर प्रशंसा का कारण था। जब हम भजनों को पढ़ते हैं, तो हम बार-बार पाते हैं कि सृष्टि की रचना पर, महासागरों पर, यहाँ तक कि उनके ज्वारों और लहरों के उतार-चढ़ाव पर भी परमेश्वर के नियन्त्रण रखने के परम सामर्थ्य की प्रशंसा करने में परमेश्वर के लोग आनन्दित होते हैं।

उदाहरण के लिए हम भजन 33 में देखते हैं कि “वह समुद्र का जल ढेर के समान इकट्ठा करता; वह गहिरे सागर को अपने भण्डार में रखता है” (पद 7)। यह एक नाटकीय चित्र है—और यह परमेश्वर की उत्कृष्टता और महिमा का हिस्सा है। जैसे हम एक जग नींबू पानी को हिला कर उसे एक बर्तन में से दूसरे बर्तन में डाल सकते हैं, वैसे ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर पृथ्वी के सभी महासागरों को इकट्ठा करके मटकों में रख सकता है। इसलिए यह कितना सही और उचित है कि हम अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर की आराधना श्रद्धा और आदर के साथ करें!

इसी तरह, सृष्टि पर परमेश्वर की सत्ता हमें उसके प्रावधान पर विश्वास करने के लिए प्रोत्साहित करती है। योना की कहानी में आगे हम पाते हैं कि प्रभु ने “रेंड़ का पेड़ उगाकर बढ़ाया,” परमेश्‍वर ने “एक कीड़े को भेजा,” और “परमेश्‍वर ने पुरवाई बहाकर लू चलाई” ताकि वह योना और नीनवे के लोगों के लिए अपनी योजनाओं को पूरा कर सके (योना 4:6-8)। यह उस समय के और आज के परमेश्वर-विहीन लोगों की मानसिकता से बहुत अलग है।

योना के जहाज के चालक समुद्र को एक अप्रत्याशित और निरंकुश प्राचीन शक्ति मानते थे, जिसकी दया पर वे सभी बन्दी थे। उसी तरह, आज हम इस विचार का सामना करते हैं कि “प्रकृति माँ” एक ऐसी निर्दयी ताकत है, जिसे वश में नहीं किया जा सकता। लेकिन सच्चाई यह है कि सभी चीजें, सम्पूर्ण सृष्टि, परमेश्वर के सेवक हैं (भजन 119:91)। हम भाग्य के सागर में बहने या अंधी, निराकार शक्तियों के प्रहार सहने के लिए छोड़ नहीं दिए गए हैं। नहीं, परमेश्वर “तारों को गिनता, और उनमें से एक-एक का नाम रखता है” (भजन 147:4)।

केवल सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता प्रभु ही सागर को ढेरों में इकट्ठा कर सकता है और सम्पूर्ण सृष्टि को अपने निर्देशों का पालन करने का आदेश दे सकता है। केवल यही नहीं, वह अपने आदेशों को अपने लोगों के भले के लिए निर्देशित करता है। वह बड़ा तूफान जिसे परमेश्वर ने समुद्र पर भेजा था, जब योना का जहाज तर्शीश की ओर जा रहा था, वह उसके ऊपर शाप नहीं था, बल्कि यह उसे अपने परमेश्वर के प्रति विश्वासपूर्वक आज्ञाकारिता में वापस लौटने के लिए एक पुकार थी। जो कुछ परमेश्वर ने योना पर भेजा, उससे परमेश्वर ने उसे बचाया भी। कितना अद्‌भुत है: परमेश्वर ने एक बड़ी आँधी की शक्ति को केवल एक भटके हुए बच्चे को घर वापस लाने के लिए बुलाया।

सचमुच, सभी चीजें परमेश्वर की महिमा और उसके लोगों के भले के लिए व्यवस्थित हैं—जिसमें आप भी शामिल हैं। यही वह परमेश्वर है जिसकी हम वन्दना करते हैं, यही वह परमेश्वर है जिस पर हम विश्वास करते हैं, और यही वह परमेश्वर है जिसे हम अपने जीवन अर्पित करते हैं। आज इस सत्य को अपनी जुबान पर रखें: “यहोवा महान और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है” (भजन 145:3)।

भजन 145

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 79– 80; प्रेरितों 28 ◊

9 अगस्त : अवज्ञा और हिचकिचाहट

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9 अगस्त : अवज्ञा और हिचकिचाहट
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“योना यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को भाग जाने के लिए उठा, और याफा नगर को जाकर तर्शीश जाने वाला एक जहाज़ पाया; और भाड़ा देकर उस पर चढ़ गया कि उनके साथ यहोवा के सम्मुख से तर्शीश को चला जाए।” योना 1:3

अवज्ञा का मार्ग हमेशा एक नीचे की ओर जाने वाला मार्ग होता है—जब तक कि परमेश्वर हस्तक्षेप नहीं करता।

योना ने जब नीनवेवासियों को पश्चाताप का सन्देश देने के लिए प्रभु के आदेश से भागने की जल्दी की, तो वह नीचे की ओर “याफा नगर को” गया, जहाज़ के “निचले भाग में” उतर गया और फिर नीचे “पहाड़ों की जड़ तक पहुँच गया” (योना 2:6), जहाँ वह जल-जन्तु के पेट में बन्द हो गया था।

जब परमेश्वर से भागने की कोशिश में योना जहाज के निचले भाग में गहरी नींद में सो रहा था, “तब यहोवा ने समुद्र में एक प्रचण्ड आँधी चलाई . . . यहाँ तक कि जहाज़ टूटने पर था” (1:4)। फिर भी, प्रचण्ड तूफान और नाविकों की उत्तेजित गतिविधियों के बीच—जो चिल्ला रहे थे, रो रहे थे, प्रार्थना कर रहे थे, और अपना सामान समुद्र में फेंक रहे थे—योना सो रहा था।

योना इतना थका हुआ कैसे हो सकता था? निश्चित रूप से, वह परमेश्वर से भागने के अपने निर्णय के कारण शारीरिक और मानसिक रूप से थक गया होगा। जबकि अवज्ञा उस पल में रोमांचक हो सकती है—यह एक क्षणिक उत्तेजना दे सकती है—परन्तु अन्त में यह हमेशा थकावट का कारण बनती है। यह पैने पर लात मारने जैसा होता है (प्रेरितों 26:14)। परमेश्वर के वचन के विरुद्ध हमारे विद्रोह के बाद और फिर हर किसी से छुपने की इच्छा में बिस्तर की एकान्तता में शरण लेने के बाद जो नींद आती है, उससे अधिक दुखदायी या निराशाजनक नींद शायद ही कोई और हो।

योना चाहता था कि परमेश्वर उसे अकेला छोड़ दे। परन्तु परमेश्वर बहुत दयालु था कि उसने ऐसा नहीं किया। इसलिए परमेश्वर ने एक तूफान भेजा और उस तूफान ने जहाज के कप्तान को योना को खोजने और उसे जगाने के लिए भेजा। कप्तान ने वही शब्द इस्तेमाल किया जो परमेश्वर ने पहले योना से कहा था: “उठ, अपने देवता की दोहाई दे!” (योना 1:6, विशेष रूप से बल दिया गया है; 1:2 से तुलना करें)।

यहाँ हमें एक बड़ी हिचकिचाहट का चित्र देखने को मिलता है—न केवल योना द्वारा उसे दिए गए काम को पूरा करने की हिचकिचाहट, बल्कि परमेश्वर की हिचकिचाहट भी, जो अपने सेवक को उसकी पापी हालत और दुखों में अकेला नहीं छोड़ना चाहता। वे तीन दिन, जो योना को विशाल जल-जन्तु के पेट में बिताने थे, इस सत्य का और भी प्रमाण देते हैं। यद्यपि योना की अवज्ञा के कारण दण्ड मिलना चाहिए था, परमेश्वर जल्द ही उसे समुद्र में नष्ट होने से बचाने वाला था और उसे वापिस भेजने वाला था, ताकि वह नीनवेवासियों में न्याय और दया का सन्देश प्रचार कर सके।

परमेश्वर हमारी अवज्ञा में बार-बार हमारे पास आता है और हमें हमारे पाप में धसने नहीं देता। भले ही हम अपनी अंगुलियाँ अपने कानों में डालकर यह दिखाएँ कि हम उसे नहीं सुन रहे हैं और भले ही हम पूरी तरह से उसकी आज्ञा मानने से मना कर दें, परमेश्वर अपने भटकते हुए बच्चों का पीछा करता है। वह हमें इतना प्यार करता है कि वह हमें हमारी अपनी चालों में छोड़ना नहीं चाहता। हम अपने पाप में फँसे रहकर परमेश्वर की दया से भाग नहीं सकते, क्योंकि वह हमें कभी नहीं छोड़ेगा और कभी नहीं त्यागेगा।

योना 1

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 77–78; प्रेरितों 27:27-44

7 अगस्त : हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है

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7 अगस्त : हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है
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“क्योंकि तुम ने नाशवान नहीं पर अविनाशी बीज से, परमेश्‍वर के जीवते और सदा ठहरने वाले वचन के द्वारा नया जन्म पाया है। क्योंकि ‘हर एक प्राणी घास के समान है, और उसकी सारी शोभा घास के फूल के समान है। घास सूख जाती है, और फूल झड़ जाता है, परन्तु प्रभु का वचन युगानुयुग स्थिर रहता है।’” 1 पतरस 1:23-25

सुसमाचार केवल अच्छे इरादों वाले लोगों को अपने जीवन में थोड़ा सा धर्म जोड़ने के लिए प्रेरणा देने वाली बात नहीं है। परमेश्वर का वचन विद्रोही हृदय का सामना करता है और उसे आज्ञाकारिता का आदेश देता है। यह ऐसा सन्देश है जो मरे हुए को जीवित कर देता है।

यह परिवर्तन कैसे होता है? केवल परमेश्वर के आत्मा के द्वारा। परमेश्वर का आत्मा ही वह काम करता है, जो किसी और तरीके से या किसी और साधन से नहीं हो सकता: यह नया जीवन लाने का कार्य है।

स्वभाव से हम सभी परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही हैं। कोई भी उसकी खोज नहीं करता (रोमियों 3:11)। भले ही मैं खुद को एक अनीश्वरवादी, एक खोजी या खुले विचारों वाला कहूँ, तो वास्तव में मैं विद्रोही ही हूँ। और परमेश्वर “अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है” (प्रेरितों 17:30)। परमेश्वर हम सभी को पूरी तरह से मुड़ जाने के लिए बुलाता है—पाप और विद्रोह से निर्णायक रूप से मुँह मोड़ने और उसके राज्य के अधीन आने के लिए बुलाता है।

यदि कोई चमत्कार न हो तो हम ऐसा नहीं कर सकते। यदि हमें खुद छोड़ दिया जाए, तो हम मरे हुए हैं और हमारे पास शाश्वत जीवन की कोई आशा नहीं है। शुक्र है कि परमेश्वर के आत्मा का कार्य ही यह है—हमारे लिए वह चमत्कार करना। नया जीवन कुछ ऐसा है जो परमेश्वर अपने द्वारा ही उत्पन्न करता है, न कि कुछ ऐसा जो हम खुद उत्पन्न करें। पवित्र आत्मा हमें पाप के प्रति दोषी ठहराता है और यह यकीन दिलाता है कि यीशु अपने क्रूस पर मृत्यु के द्वारा इससे निपट चुका है।

पवित्रशास्त्र इस बारे में बिल्कुल स्पष्ट है: जब हम पापों में मरे हुए थे, तब हमें मसीह में जीवित किया गया (इफिसियों 2:1-5)। आत्मा हमें समझाता है कि हम अकेले इसका सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं—अर्थात, हमारे पास एक गहरी और अन्तर्निहित समस्या है, जिसे हम ठीक नहीं कर सकते। हमें एक चमत्कार की आवश्यकता है। और परमेश्वर यही करता है। वह नया जीवन लाता है। वह हमें अपनी कृपा से बचाता है।

हमारे बारे में जो कुछ भी है वह धुंधला हो जाता है; जैसे पतरस हमें याद दिलाता है, हम सभी एक दिन घास के समान मुरझा जाएँगे। लेकिन एक बीज है जो अमरता उत्पन्न करता है, जो पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे भीतर बोया जाता है और जो अनन्त काल तक खिलता और फलता रहेगा: वह जीवन जो सुसमाचार के द्वारा नया जन्म लेता है। परमेश्वर का वचन हमेशा के लिए बना रहता है, और वह व्यक्ति भी जो उसमें कार्य करने वाले आत्मा के द्वारा नया जीवन प्राप्त करता है।

एक बार जब यह हमारे साथ होता है, तो हम बाइबल को केवल एक इतिहास की किताब या प्रेरणादायक कहानी के रूप में नहीं देखते। आत्मा के कार्य से यह एक प्रकाश बन जाता है, जो सच्चे जीवन को प्रकाशित करता है और हमारी आँखें यह समझने के लिए खुल जाती हैं कि परमेश्वर कौन है। यही कारण है कि हम बाइबल का अध्ययन करते हैं: ताकि हम उस परमेश्वर को बेहतर तरीके से देख सकें और जान सकें, जिसने हमें बचाया और जिसके साथ हम अनन्तकाल तक रहेंगे।

सो, यीशु का प्रेम आपको उसकी ओर आकर्षित करे। यीशु का आनन्द आपको उसकी सेवा करने की शक्ति दे। जो शान्ति और सन्तोष यीशु को जानने में आता है, वह आपको स्थिरता और स्पष्टता प्रदान करे जब आप यह विचार करते हैं कि आप कहाँ थे, कहाँ हैं, और कहाँ जा रहे हैं। आपका भौतिक शरीर अमर नहीं है; लेकिन आप अमर हैं।

भजन 119:65-80

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 72–73; प्रेरितों 26

6 अगस्त : महान विभाजन

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6 अगस्त : महान विभाजन
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“क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं, वरन् अलग कराने आया हूँ।” लूका 12:51

क्या यीशु पृथ्वी पर शान्ति लाने आया था, जैसा कि स्वर्गदूतों ने पहले क्रिसमस पर गाया था (लूका 2:14)? या फिर वह विभाजन लाने आया था, जैसा कि वह स्वयं यहाँ घोषित करता है?

हाँ।

सबसे पहले, हमें इस स्पष्ट विरोधाभास को स्वीकार करना चाहिए। यीशु अपने ही प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है, “क्या तुम समझते हो कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ; नहीं . . .” यह कथन न केवल स्वर्गदूतों की घोषणा से असंगत लगता है, बल्कि उसके अपने शिष्यों को शान्तिदूत बनने की दी गई शिक्षा (मत्ती 5:9) से भी टकराता प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि यीशु अपने पूरे सांसारिक सेवाकाल के बल देने वाले उद्देश्य का खण्डन कर रहा है, क्योंकि वह स्वयं को विभाजन और असहमति से जोड़ता है। तो फिर, हम यीशु के इन दोनों दावों—कि वे शान्ति भी लाएगा और विभाजन भी—को कैसे समझें?

जब यीशु ने कहा कि वह विभाजन लाने आया है, तो इसका सीधा सम्बन्ध उस कार्य से है जो उसने शान्ति स्थापित करने के लिए किया। दूसरे शब्दों में, जब हम इस शुभ सन्देश को समझते हैं कि “[परमेश्वर] ने उसे, जो पाप से अज्ञात था, हमारे लिए पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ” (2 कुरिन्थियों 5:21), तो हम फिर कभी पहले जैसे नहीं रह सकते। यह इतना महान कार्य है कि यह उदासीनता का कारण नहीं बन सकता।

जब हमारे हृदय का नवीनीकरण होता है, तो हमारे बारे में सब कुछ बदल जाता है—हमारे मूल्य, हमारा ध्यान, हमारा उद्देश्य, हमारे सपने सब बदल जाते हैं। अब हम अपने सृष्टिकर्ता के साथ मेल में हैं, और हम अपने आप से भी शान्ति में रह सकते हैं। लेकिन एक न एक दिन यह रूपान्तरण विभाजनकारी साबित होगा। जब हम परमेश्वर के साथ अपनी शान्ति के इस अद्‌भुत कार्य को साझा करते हैं, इसके बारे में बोलते हैं, और इसे अपने जीवन में जीते हैं, तो हमें उपेक्षा, विरोध, और न्याय का सामना करना पड़ेगा—कभी-कभी अपने ही घर के लोगों से, जैसा कि यीशु ने चेतावनी दी थी (लूका 12:52-53)।

यीशु का पृथ्वी पर शान्ति लाना वास्तव में उस गहरे विभाजन और संघर्ष को उजागर करता है, जो आदम और हव्वा के विद्रोह के बाद से सृष्टिकर्ता और उसके स्वरूपधारी प्राणियों के बीच मौजूद रहा है। आपके वचन और कार्य, जो इस संसार के तरीकों से नहीं बल्कि स्वर्गिक आज्ञाओं से निर्देशित होते हैं, उसी विभाजन को प्रकट करेंगे। हममें से कई लोगों के लिए मसीह में विश्वास करने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ यह विभाजन जीवन का एक कठिन और पीड़ादायक सत्य है।

फिर भी, हम सबके लिए एक महान आशा है: यीशु का अन्तिम उद्देश्य विभाजन नहीं बल्कि शान्ति है। बाइबल पूरी तरह स्पष्ट करती है कि “शान्ति का राजकुमार” (यशायाह 9:6) एक दिन अनन्त काल में राज्य करेगा। इस बीच किसी भ्रम में न रहें: यीशु का अनुसरण करने की एक कीमत है—एक ऐसी कीमत जिसे आप उसके आत्मा की शक्ति से आनन्दपूर्वक चुका सकते हैं, जब आप विभाजन का जोखिम उठाते हुए परमेश्वर की शान्ति के इस दिव्य प्रस्ताव को दूसरों तक पहुँचाते हैं।

प्रेरितों 17:1-15

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 70–71; प्रेरितों 25 ◊

5 अगस्त : नष्ट और पुनः स्थापित

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5 अगस्त : नष्ट और पुनः स्थापित
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“तू ने यह क्या किया है?” उत्पत्ति 3:13

स्कॉटलैंड के हाइलैण्ड्स में कई ऐसे किले हैं, जो अब निर्जन और खण्डहर हो चुके हैं। शाम की सुनहरी रोशनी में यह पहचानना कठिन नहीं है कि कभी ये स्थान कितने भव्य महल रहे होंगे। भले ही अब उनमें न खिड़कियाँ बची हैं, न भव्य गलीचे, और न ही उनमें रहने वाले लोग, फिर भी इन प्राचीन संरचनाओं की भव्यता उनके पूर्व वैभव की गवाही देती है, भले ही अब वे नष्ट हो चुके हों।

यह संसार भी ऐसे ही नष्ट हुए वैभव से भरा है, क्योंकि यह संसार मनुष्यों से भरा है। आदम और हव्वा परमेश्वर की रचनात्मक कलाकृति की पराकाष्ठा थे, और परमेश्वर उनके साथ पूरी तरह सन्तुष्ट था। वे भलाई करने की प्रवृत्ति के साथ बनाए गए थे। लेकिन जब उन्होंने उस सिंहासन की लालसा की, जिस पर वे कभी बैठ ही नहीं सकते थे—परमेश्वर का सिंहासन—तो वे अपने स्थान और उन विशेषाधिकारों को खो बैठे जिनका आनन्द लेने के लिए वे सृजे गए थे।

सर्प ने हव्वा को बहकाने के लिए सबसे पहले परमेश्वर के वचन पर सन्देह उत्पन्न किया, बड़ी ही चतुराई से उसकी सत्यता को चुनौती दी—और वह फँस गई। उसने उस झूठ पर विश्वास कर लिया कि परमेश्वर भलाई करने के लिए भरोसेमन्द नहीं है। जब सन्देह का बीज बो दिया गया, तो सर्प ने उसे महत्वाकांक्षा से सींचा। एक बार जब हव्वा के मन में अनिश्चितता का सन्देह उत्पन्न हुआ, तो गर्व का आकर्षण उसके लिए असहनीय हो गया।

फल खाना केवल इस कारण गलत था, क्योंकि परमेश्वर ने उसे खाने से मना किया था। फिर भी, तत्काल सन्तुष्टि के अवसर ने आदम और हव्वा को ऐसा अंधा कर दिया कि वे अपने भविष्य के कार्यों के दर्दनाक परिणामों और उनके परिचित वैभव की बर्बादी को देख न सके। और, जैसे कि उनकी अवज्ञा ही पर्याप्त न थी, उन्होंने धोखे और अवज्ञा के बीच अपनी जिम्मेदारी को भी अस्वीकार कर दिया।

आदम और हव्वा की तरह हम भी यह मानने के लिए प्रवृत्त होते हैं कि अन्तिम सत्य का निर्णय करने वाले हम स्वयं हैं, न कि परमेश्वर। जब हम अपने सृष्टिकर्ता परमेश्वर को रास्ते से हटाने का निर्णय कर लेते हैं, जो एक सच्चा और अधिकारपूर्ण वचन बोलता है, तो हम उसे हमारी आज्ञाकारिता की माँग करने के अधिकार से वंचित कर देते हैं। लेकिन जब हम परमेश्वर के शासन को अस्वीकार कर देते हैं, तो हम अपने स्वयं के स्वामी नहीं बन जाते; बल्कि हम धोखे, अंधकार, निराशा और मृत्यु जैसे कई छोटे स्वामियों के अधीन हो जाते हैं।

“तू ने यह क्या किया?” (उत्पत्ति 3:13) हम सभी ने इस झूठ पर विश्वास किया है कि हमारी राह परमेश्वर की राह से बेहतर है। लेकिन परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजने की हद तक जाकर यह दिखाया कि हमारी कठोर विद्रोही प्रकृति उसकी उस करुणा से अभिभूत हो सकती है, जो “जीवन से भी उत्तम” है (भजन 63:3)। उसने अपने वचन का प्रकाश हमारे हृदयों में प्रकट किया है, जिससे हम उसकी महिमा को अब और अनन्त काल तक देख सकें और पुनः उसकी छवि में ढाले जाएँ तथा उस वैभव में पुनः स्थापित किए जाएँ, जिसे परमेश्वर ने सदा अपने स्वरूपधारी प्राणियों के लिए चाहा था। उसकी भलाई को देखना और उसके शासन के अधीन आना ही हमें धोखे, अंधकार, निराशा और यहाँ तक कि मृत्यु से भी स्वतन्त्र करता है।

उत्पत्ति 3

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 68– 69; प्रेरितों 24

4 अगस्त : कोई आदर्श स्थान नहीं

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4 अगस्त : कोई आदर्श स्थान नहीं
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“मैं मकिदुनिया होकर तुम्हारे पास आऊँगा, क्योंकि मुझे मकिदुनिया होकर जाना ही है। परन्तु सम्भव है कि तुम्हारे यहाँ ही ठहर जाऊँ और शरद ऋतु तुम्हारे यहाँ काटूँ, तब जिस ओर मेरा जाना हो उस ओर तुम मुझे पहुँचा देना . . . परन्तु मैं पिन्तेकुस्त तक इफिसुस में रहूँगा, क्योंकि मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है, और विरोधी बहुत से हैं।” 1 कुरिन्थियों 16:5-6, 8-9

प्रेरित पौलुस की प्रशंसा करने के कई कारण हैं, लेकिन यहाँ एक ऐसा कारण है जिसे कम ही उल्लेख किया जाता है: वह हमेशा आगे की योजना बनाता था। वह किसी भी क्षेत्र में निष्क्रिय नहीं रहता था। वह एक सेनापति की तरह था, जो युद्ध मुख्यालय में मानचित्र का अध्ययन करते हुए कहता, “अब हम आगे कहाँ बढ़ सकते हैं? अगली टुकड़ी को कहाँ भेजा जा सकता है? शत्रु को कहाँ खोजा जा सकता है?” अपने धर्मी उद्देश्य के कारण वह कहीं भी अधिक समय तक आराम से नहीं रहा।

पौलुस से हम यह सीख सकते हैं कि परमेश्वर की सेवा के लिए कोई आदर्श स्थान नहीं है, लेकिन हम जहाँ भी हों, वहीं उसकी सेवा कर सकते हैं। उसने अपने पत्रों में इफिसुस, मकिदुनिया और कुरिन्थुस जैसे विभिन्न स्थानों में सेवा करने का उल्लेख किया है—लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति चाहे जो भी रही हो, उसने यह समझ लिया था कि उसे बस अविश्वासियों को सुसमाचार सुनाना था और विश्वासियों को प्रोत्साहित करना था। वह अपने बुलावे को जानता था कि जब एक स्थान पर उसकी सेवा पूरी हो जाती, तो उसे अगले स्थान पर आगे बढ़ जाना था।

पौलुस आराम या सुविधा की चिन्ता नहीं करता था। उसने कभी नहीं चाहा की कि व एड्रियाटिक सागर के किनारे एक छोटे से कुटीर में शान्तिपूर्वक सेवानिवृत्त हो जाए। यहाँ तक कि जब वह कह सकता था कि “मेरे लिए वहाँ एक बड़ा और उपयोगी द्वार खुला है,” तब भी उसने स्वीकार किया कि उसके “विरोधी बहुत से हैं।” उसने चुनौतियों को स्वीकार किया और विरोध को एक बाधा के बजाय एक महान विशेषाधिकार माना।

हम में से बहुत से लोग यह मानने के लिए प्रेरित किए गए हैं कि यदि हम परमेश्वर के साथ संगति में हैं और यदि हम वास्तव में वहीं हैं जहाँ हमें होना चाहिए, तो जीवन सुचारू रूप से चलेगा। यह विचार भले ही लोकप्रिय हो, लेकिन बाइबल के अनुसार यह सही नहीं है। क्या हम वास्तव में सोचते हैं कि हम शैतान का सामना कर पाएँगे और उसके जलते हुए तीर हम तक नहीं पहुँचेंगे? क्या हम सोचते हैं कि हम शत्रु के क्षेत्र में प्रवेश करेंगे और हमारा कोई विरोध नहीं होगा? हमें ऐसे लोग बनने के लिए नहीं बुलाया गया है, जो आरामदायक और सुविधाजनक मसीही समुदायों में सन्तोषपूर्वक रहते हैं, जहाँ कोई विरोध न हो। यह सम्भव है कि हमारी गवाही इतनी कमजोर हो जाए कि हम मसीह के लिए प्रभावहीन हो जाएँ, लेकिन ऐसा होना आवश्यक नहीं है, और न ही ऐसा होना चाहिए।

आज भी हमारे चारों ओर वही परिस्थितियाँ हैं, जिनका सामना पौलुस ने किया था: मूर्तिपूजा, यौन अनैतिकता, नस्लवाद, धार्मिक कट्टरता, और अन्य अनेक बुराइयाँ। परमेश्वर ने चाहे आपको जहाँ भी रखा हो, वहीं आपके पास उसके राज्य की सेवा करने का अवसर है, भले ही आपको विरोध का सामना क्यों न करना पड़े। मेरे प्रिय मित्र एरिक अलेक्ज़ेण्डर ने एक बार मुझसे कहा था, “परमेश्वर की सेवा करने के लिए कोई आदर्श स्थान नहीं है—सिवाय वहाँ के जहाँ उसने तुम्हें रखा है!”

रोमियों 15:17-33

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 66– 67; प्रेरितों 23:16-35 ◊

3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य

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3 अगस्त : सर्वसिद्ध राज्य
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“जो सिंहासन पर बैठा था, उसने कहा, ‘देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूँ!’” प्रकाशितवाक्य 21:5

हर कोई हमेशा जानना चाहता है कि कहानी का अन्त कैसे होता है। प्रकाशितवाक्य की पुस्तक हमें अन्तिम पृष्ठ पर झाँकने का अवसर देती है, ताकि हम इतिहास के अन्त की ओर अधिक विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द के साथ बढ़ सकें।

पवित्रशास्त्र बहुत स्पष्ट रूप से दिखाता है कि पूरा मानव इतिहास एक अन्तिम लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। यह एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है; परमेश्वर ने मनुष्य को यह जानने के लिए बनाया है कि मृत्यु के बाद भी कुछ अस्तित्व में है। वास्तव में, उसने हमारे मन में अनादि-अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है (सभोपदेशक 3:11)।

हर धर्म और विचारधारा इतिहास को समझने का प्रयास करती है। उदाहरण के लिए, हिन्दू धर्म सिखाता है कि हम जिस वास्तविकता में हैं, वह किसी गन्तव्य की ओर नहीं बढ़ रही है, बल्कि वास्तव में चक्रों में घूम रही है—अर्थात इतिहास चक्रीय है। नास्तिक प्रकृतिवाद तर्क देता है कि इतिहास की कोई पद्धति नहीं है, कोई उद्देश्य या अन्तिम लक्ष्य नहीं है; इतिहास केवल परमाणुओं के पुनः संयोजन की कहानी है (और हम भी उसी का हिस्सा हैं)। लेकिन मसीही लोग मानते हैं कि बाइबल इतिहास को रैखिक रूप में प्रस्तुत करती है: इसका एक प्रारम्भिक बिन्दु था, इसका एक समापन बिन्दु होगा, और यह एक उद्देश्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है। मसीह का जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और वापसी पूरे मानव इतिहास की केन्द्रीय विषयवस्तु है। इसलिए पूरी मानवजाति की कहानी को इसी ढांचे के भीतर देखा जाना चाहिए। यीशु वापिस आएगा; वह परमेश्वर की अनन्त उद्धार योजना को पूरा करेगा और उसके सिद्ध राज्य को स्थापित करेगा। वह सब कुछ नया और सिद्ध बना देगा।

यीशु जो सिद्ध राज्य लेकर आएगा, वह क्या है? यह एक ऐसा राज्य है, जिसका केन्द्र उसका क्रूस है। यह एक ऐसा राज्य है, जो हृदयों और जीवनों को बदलता है, और इसके नागरिक यीशु को राजा मानकर उसे दण्डवत करते हैं। यह प्रेम और न्याय, करुणा और शान्ति का राज्य है। यह राज्य बढ़ रहा है और पृथ्वी के छोर तक फैल रहा है—और निर्धारित समय पर, जो हमारे लिए अज्ञात है, परमेश्वर पिता अपने पुत्र को राष्ट्रों को उसकी विरासत के रूप में देगा (भजन 2:8)।

यहाँ तक कि अभी भी, परमेश्वर अपनी सम्प्रभु योजना और अपनी इच्छा के रहस्य को पूरा कर रहा है। जब यूहन्ना अन्त समय के बारे में लिखता है, तो वह हमें याद दिलाता है कि “उद्धार के लिए हमारे परमेश्वर का . . . जय–जयकार हो” (प्रकाशितवाक्य 7:10)। यदि उद्धार किसी और के हाथ में होता या इसे भाग्य पर छोड़ दिया जाता, तो परमेश्वर की योजना पूरी नहीं हो सकती थी। लेकिन वह इतिहास का रचयिता और भविष्य का शासक है। उसने अपनी प्रजा को बचाने का निश्चय किया है, और वह इसे पूरा करेगा। एक दिन हम उसे यह कहते हुए सुनेंगे, “ये बातें पूरी हो गई हैं” (प्रकाशितवाक्य 21:6)।

परमेश्वर ने यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा हमारे उद्धार का कार्य प्रारम्भ कर दिया है, और एक दिन वह सभी चीज़ों को एक ही प्रधान—यीशु—के अधीन कर देगा। इसलिए यदि हम मसीह के साथ जुड़े हुए हैं, तो हम “जयवन्त से भी बढ़कर हैं” (रोमियों 8:37) और पुत्र के साथ अनन्तकाल तक राज्य करने के लिए सक्षम हैं। हमारी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए? विश्वास, आत्मविश्वास और आनन्द! क्योंकि भले ही हम नहीं जानते कि हमारे जीवन में आगे क्या होगा, लेकिन हम यह अवश्य जानते हैं कि कहानी का अन्त कैसा होगा—और हमारी अनन्तता कैसे प्रारम्भ होगी। इसलिए हम उत्सुकता से यह प्रार्थना करते हैं, “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है . . . तेरा राज्य आए” (मत्ती 6:9-10)।

यशायाह 60

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 63– 65; प्रेरितों 23:1-15

2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना

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2 अगस्त : आत्मा की भरपूरी में जाना
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“दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इससे लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ, और आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते रहो।” इफिसियों 5:18-19

जीवन के कुछ क्षण ऐसे होते हैं जब सब कुछ एक साथ होता हुआ प्रतीत होता है, जैसे किसी बच्चे का जन्म या किसी नए देश में स्थानान्तरण। मसीह में नया जीवन प्रारम्भ करना शायद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब हम यीशु पर विश्वास करते हैं, तो एक साथ कई परिवर्तन होते हैं: हम विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, हम परमेश्वर के परिवार में गोद लिए जाते हैं, हमें उसके पुत्र और पुत्रियों के रूप में एक नई पहचान दी जाती है, और—जैसा कि इस वचन में दर्शाया गया है—हमारे भीतर पवित्र आत्मा का वास होता है।

जब कोई यीशु पर विश्वास करता है, तो पवित्र आत्मा उसमें वास करने लगता है, उसे वह इच्छा और सामर्थ्य प्रदान करता है जो परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए आवश्यक है। आत्मा की यह परिपूर्णता मसीही अनुभव का मूलभूत सत्य है। यह हर उस व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, जो मसीह पर विश्वास करता है। फिर भी, सच्चाई यह है कि विश्वासियों के रूप में हम हमेशा परमेश्वर के आत्मा की परिपूर्णता में नहीं जीते। यह सम्भव है कि हमारी अवज्ञा के कारण हम हमारे भीतर रहने वाले आत्मा को दुखी कर देते हैं (इफिसियों 4:30)। यह भी सम्भव है कि हम उससे अधिक किसी अन्य चीज़ के प्रभाव में अधिक आ जाएँ—यही कारण है कि पौलुस यहाँ यह स्पष्ट करता है कि हम एक साथ शराब और आत्मा दोनों के प्रभाव में नहीं रह सकते।

हमें यह समझना होगा कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान हैं, तो हम कभी भी उसके पितृत्व से बाहर नहीं आ सकते; लेकिन अवज्ञा में जीने से हम उसके पितृ-संरक्षण, उपस्थिति और आनन्द से वंचित हो सकते हैं। जो बच्चा अपने माता-पिता की पूरी तरह अवहेलना करता है, वह भले ही नाश्ते की मेज़ पर बैठा हो, तब भी वह जानता है कि वे अभी भी उसके माता-पिता हैं और वह अभी भी उनका बेटा है, लेकिन ऐसा होने पर भी उसके इस रिश्ते का आनन्द कम हो जाएगा। हमारे साथ भी यही होता है: हम अवज्ञा में नहीं जी सकते—ऐसा नहीं हो सकता कि एक ओर तो हम अपने जीवन में किसी अन्य प्राथमिकता, विचार या पदार्थ को अपना मार्गदर्शक बना लें और दूसरी ओर हम आत्मा की परिपूर्णता में भी जीएँ।

यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसे हम स्वयं हल कर सकते हैं। हम खुद को पवित्र आत्मा से नहीं भर सकते। हम केवल परमेश्वर से पवित्र आत्मा की परिपूर्णता को ही प्राप्त नहीं करते, बल्कि उसका आनन्द भी उसी के द्वारा सम्भव होता है। हम स्वयं को नहीं भर सकते, लेकिन हमें स्वयं को भरे जाने के लिए तैयार और खुले अवश्य रखना चाहिए। हर मसीही जीवन की अपेक्षा यही है कि यह आत्मा से भरे होने का प्रमाण—जिसे पौलुस “आत्मा का फल” (गलातियों 5:22) कहता है—धीरे-धीरे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट हो।

आपके जीवन की और हर एकत्रित कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम सब आत्मा से भरे जाएँ—कि हम किसी और चीज़ के बजाय उसके द्वारा निर्देशित हों। यही सच्चे रूपान्तरण, आनन्द, शान्ति और प्रेम को लाता है। यही हमें प्रेरित करता है कि हम न केवल अपने ओठों से, बल्कि अपने हृदय में भी मसीह की स्तुति के गीत गाएँ। इसलिए प्रार्थना करें कि वह आपको नए सिरे से भर दे:

हे पवित्र आत्मा, मेरे हृदय पर उतर,

इसे संसार से अलग कर, इसकी हर धड़कन में प्रवाहित हो;

मेरी निर्बलता के बावजूद, तू शक्तिशाली है,

मुझे वैसा प्रेम करना सिखा, जैसा मुझे करना चाहिए।[1]

  यहेजकेल 11:14-20

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 60– 62; प्रेरितों 22 ◊


[1] जॉर्ज क्रोली, “स्पिरिट ऑफ गॉड, डिसेण्ड अपोन माई हार्ट” (1854).