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1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा

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1 अक्तूबर : शरीर और आत्मा
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“जब मैं चुप रहा तब दिन भर कराहते-कराहते मेरी हड्डियाँ पिघल गईं। क्योंकि रात दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; और मेरी तरावट धूप काल की सी झुर्राहट बनती गई।” भजन 32:3-4

जो लोग मनोविज्ञान, मनोरोग और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्रों में काम करते हैं, वे अक्सर इस तथ्य का सामना करते हैं कि किसी व्यक्ति के हृदय और मन में जो कुछ हो रहा है, उसका गहरा प्रभाव उसके शरीर में भी दिखाई देता है। परमेश्वर का वचन इस सम्बन्ध पर प्रकाश डालता है और फिर और भी गहराई तक जाता है, क्योंकि यह हमें बताता है कि हमारे शरीर की स्थिति और हमारी आत्मा की स्थिति के बीच एक सम्बन्ध है।

भजन 32 में, दाऊद परमेश्वर से बहुत व्यक्तिगत रूप से बात करता है और उस बोझ को स्वीकार करता है, जिसे उसने तब अनुभव किया जब वह अन्धकार में छिपा रहा और बतशेबा के साथ किए गए अपने पाप और उसके पति ऊरिय्याह की हत्या को स्वीकार करने से इनकार करता रहा (2 शमूएल 11 देखें)। दाऊद के माध्यम से पवित्र आत्मा हमें सिखाता है कि एक व्याकुल विवेक, पश्चाताप की कमी और हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के बीच एक सम्बन्ध है। जो लोग दाऊद के निकट थे, शायद वे यह नहीं जान सके थे कि उसकी आत्मा के भीतर क्या चल रहा था, लेकिन वे उसके शरीर में हो रहे परिवर्तनों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे।

जो विवरण वह देता है, वह अन्य स्थानों पर दिए गए उसके विवरण को और अधिक स्पष्ट करता है: “मेरा हृदय धड़कता है, मेरा बल घटता जाता है; और मेरी आँखों की ज्योति भी मुझ से जाती रही। मेरे मित्र और मेरे संगी मेरी विपत्ति में अलग हो गए, और मेरे कुटुम्बी भी दूर जा खड़े हुए” (भजन 38:10-11)। यह बहुत ही विनाशकारी चित्र प्रस्तुत करता है।

दाऊद ने अपनी स्थिति को पहचाना कि यह एक दण्ड था। बाइबल स्पष्ट रूप से बताती है कि वासना, अतिरेक और परमेश्वर की आज्ञाओं की अवहेलना के स्वाभाविक परिणाम निकलते हैं (रोमियों 1:24-25 देखें)—और इन सभी में दाऊद दोषी था। दुर्बलता, वज़न घटना, अनिद्रा, अस्वीकृति की भावना, उदासी, चिन्ता और निराशा अक्सर उन लोगों को सताती है, जो अपने पाप को परमेश्वर से छिपाने और स्वयं इन्हें स्वीकार न करने का प्रयास करते हैं।

जिस बात ने दाऊद को पुनः स्थापित किया, वह कोई स्वास्थ्य सुधार योजना या जल्दी सोने जाना नहीं था, बल्कि उसके पाप की जड़ से निपटना था: “जब मैंने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया . . . तब तूने मेरे अधर्म और पाप को क्षमा कर दिया” (भजन 32:5)। परमेश्वर ने अपनी शक्ति से दाऊद को तब तक दबाए रखा, जब तक कि उसने अपने पाप को परमेश्वर के हाथों में सौंपकर उससे समाधान नहीं माँगा। यह हमारे लिए आशीष है कि परमेश्वर हमें हमारे पाप को भूलने नहीं देता—जब हमें अपनी आत्मिक बीमारी के कारण शारीरिक भारीपन का अनुभव होता है। यह हमें वह करने के लिए प्रेरित करने का उसका तरीका है, जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता है, अर्थात अपने पाप को स्वीकार करना और उसकी क्षमा माँगना।

क्या आप कोई पाप छिपा रहे हैं? उसे छिपाएँ नहीं; उसे स्वीकार करें। जब दाऊद ने परमेश्वर की क्षमा माँगी, तो उसे अपने कष्टों से मुक्तिदायक राहत मिली। आप भी उसी आनन्द का अनुभव कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर के वचन की प्रतिज्ञा है कि “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)।

भजन 51

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 27–29; यूहन्ना 14 ◊

30 सितम्बर : एक मन, एक उद्देश्य, एक आत्मा

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30 सितम्बर : एक मन, एक उद्देश्य, एक आत्मा
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“मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।” फिलिप्पियों 2:2-3

हालाँकि यह निश्चित रूप से लाभदायक है कि कलीसिया के सदस्य सेवाकार्यों में पहल करें, फिर भी विश्वासियों की एक स्वस्थ मण्डली व्यक्तिगत विचारों और योजनाओं द्वारा नहीं चलती। यदि कलीसिया को वास्तव में मसीह की अधीनता में रहना है, तो पहले हमारे मन सुसमाचार में एकजुट होने चाहिएँ। यदि यह एकता नहीं है, तो हम अपने स्वार्थी और प्रतिस्पर्धात्मक इच्छाओं और योजनाओं द्वारा ही संचालित होंगे।

बाइबल हमारे मन के विषय में बहुत कुछ कहती है, क्योंकि जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही हम बनते हैं। जब हम अपने मन को सही सोच के लिए प्रशिक्षित करते हैं, तब हम ठीक से प्रेम करना और एक आत्मा तथा एक उद्देश्य में साथ मिलकर सेवा करना सीखते हैं। हमारे मानसिक संघर्ष का एक भाग हमारी पुरानी, स्वार्थी, मानवीय प्रकृति में फँसा हुआ होता है। हमारी सबसे बड़ी ठोकरों में से एक घृणा नहीं बल्कि आत्म-प्रेम होता है: हम घमण्ड की प्रवृत्ति रखते हैं, जो हमारे प्रभु के स्वभाव के पूर्णतः विपरीत है, और हमारी नम्रता की कमी हमारे आस-पास के लोगों के साथ सामंजस्य के अनुभव में बाधा बनती है। यहाँ तक कि हमारे अच्छे कार्य भी अक्सर दूषित उद्देश्यों से भरे होते हैं।

यदि हमें मसीह में एक होना है, तो हम अपने ही तरीके पर अड़े नहीं रह सकते। इसके विपरीत, हमें “एक दूसरे को अपने से अच्छा समझना” सीखना होगा। इसका अर्थ है कि हम अपने से पहले दूसरों की अच्छाइयों को याद करें, कि हम पहले यह सोचें कि दूसरों के लिए क्या अच्छा होगा बजाय इसके कि हमारे लिए क्या सुविधाजनक होगा, और यह कि हम दूसरों के जीवन और संघर्षों में भाग लेने को तैयार हों बजाय इसके कि उनसे दूर खड़े रहें। सच्ची नम्रता कभी सबसे आगे वाली सीट नहीं लेती या हर बात का आरम्भ “मैं” से नहीं करती। वास्तव में यह “वह शून्यता है जो परमेश्वर को उसका सामर्थ्य दिखाने के लिए स्थान देती है।”[1] पौलुस हमें बताता है कि यह वह गुण है, जो स्वयं यीशु मसीह में था: “हम में से हर एक अपने पड़ोसी को उसकी भलाई के लिए प्रसन्न करे कि उसकी उन्नति हो। क्योंकि मसीह ने अपने आप को प्रसन्न नहीं किया” (रोमियों 15:2-3)।

जब हम पहले अपने बारे में सोचते हैं, तब परमेश्वर के वचन को लागू करना कठिन हो जाता है—बल्कि असम्भव हो जाता है। लेकिन जब हम दूसरों को पहले रखना सीखते हैं, तब हम उनके हितों की चिन्ता करने के लिए अधिक तत्पर हो जाते हैं। और ऐसा करके हम मसीह की देह में वास्तव में एक हो सकते हैं। आप निश्चित ही कुछ ऐसे लोगों को जानते होंगे जिनके जीवन में यह आत्मिक नम्रता दिखाई देती है। उनके लिए अभी परमेश्वर का धन्यवाद करें और यह प्रार्थना करें कि आप देख सकें कि कैसे आप उनके उदाहरण का और सबसे बढ़कर, स्वयं मसीह के उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं। उसने आपकी ज़रूरतों को अपनी सुविधा से भी अधिक—यहाँ तक कि अपने जीवन से भी अधिक महत्त्वपूर्ण समझा। पौलुस की हम सबके लिए यह चुनौती है: “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो” (फिलिप्पियों 2:5)।

  यूहन्ना 3:22-36

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 24–26; यूहन्ना 13:21-38


[1] एण्ड्रू मुरे, ह्युमिलिटी: दि ब्यूटी ऑफ होलीनेस, द्वितीय संस्करण (1896), पृ. 50.

29 सितम्बर : हमारा सहानुभूतिपूर्ण चरवाहा

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29 सितम्बर : हमारा सहानुभूतिपूर्ण चरवाहा
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उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उससे कहा, ‘मत रो।’ तब उसने पास आकर अर्थी को छूआ, और उठाने वाले ठहर गए। तब उसने कहा, ‘हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!’” लूका 7:13-14

परमेश्वर के राज्य का आगमन संसार की शक्तियों और अधिकारियों पर किसी शानदार या नाटकीय विजय से नहीं हुआ, बल्कि उससे कहीं अधिक रूपान्तरणकारी कारक अर्थात इसके राजा की महान करुणा के द्वारा हुआ।

यीशु के जीवन-वृतान्तों में सुसमाचार लेखक हमें बार-बार ऐसे प्रसंगों से परिचित कराते हैं, जो मसीह की अनुपम करुणा को दर्शाते हैं। इन घटनाओं में मसीह का सामर्थ्य उस समय प्रकट होता है, जब वह अपनी करुणा प्रदर्शित करता है। उदाहरण के लिए, अपने सुसमाचार के सातवें अध्याय में लूका एक शोकाकुल विधवा के प्रति यीशु की सहानुभूति को दर्शाता है—एक ऐसी प्रतिक्रिया जो उसकी महानता के बारे में किसी भी सन्देह को दूर कर देती है।

लूका के वृतान्त के इस भाग में वर्णित स्त्री सचमुच संकट में थी। उसका पति पहले ही मर चुका था, और अब उसका पुत्र भी चल बसा था। प्राचीन मध्य-पूर्वी समाज में इसका अर्थ था कि वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा या आजीविका के सहारे से वंचित हो गई थी। अब वह दुख, अकेलेपन, और अस्थिरता से भरे जीवन का और साथ ही अपने वंश के अन्त का भी सामना कर रही थी।

लेकिन फिर यीशु इस स्त्री के जीवन की चरम परिस्थिति में आया और “उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उससे कहा, ‘मत रो।’”

इस कोमल चरवाहे के हृदय में करुणा जगाने के लिए केवल इतना ही काफ़ी था कि उसने इस शोक-सन्तप्त स्त्री को देखा। यहाँ पर प्रयुक्त शब्द “तरस” शाब्दिक रूप से दर्शाता है कि “उसकी अन्तड़ियाँ हिल उठीं”—हमारे शब्दों में कहें तो “उसका पेट मरोड़ खा उठा।” जब यीशु—जिसके द्वारा और जिसके लिए सब कुछ रचा गया—इस टूटे हुए संसार में दुख और शोक को देखता है, तो वह इसे गहराई से अनुभव करता है। वह एक ऐसा राजा है, जो अपनी प्रजा की दिल से चिन्ता करता है।

और भी अधिक सुन्दर बात यह है कि यीशु के पास इस विधवा की आवश्यकता को पूरा करने का सामर्थ्य था और उसने वह किया जो केवल वही कर सकता था: मरे हुए को जीवन देना। उसने केवल एक मरे हुए पुत्र को उसकी शोकग्रस्त माँ को लौटा कर उसका दुख ही दूर नहीं किया, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि यीशु ने भीड़ (और हम सब) के सामने स्वयं को अपनी सम्पूर्ण शक्ति, दयालुता, और अधिकार के साथ—यहाँ तक कि मृत्यु पर भी अधिकार के साथ प्रकट किया।

ऐसे दृश्य हमें दिखाते हैं कि यीशु केवल बीमारी और मृत्यु—जो मानवजाति के सबसे बड़े शत्रु हैं—के बारे में केवल टिप्पणी ही नहीं करता, या केवल उनके लिए रोता ही नहीं है, बल्कि वह उन्हें पराजित भी करता है। वह शोकाकुलों की पुकार को सुनता है और उन्हें सान्त्वना देता है—केवल सांसारिक और अस्थाई रूप में नहीं, बल्कि एक अन्तिम, परिपूर्ण और अनन्त तरीके से, जब वह विश्वास करने वाले सब लोगों को स्वयं को उद्धार के साधन के रूप में प्रदान करता है।

आपका राजा न केवल अनन्त रूप से सामर्थी है; वह अनन्त रूप से करुणामय भी है। और उसमें मौजूद ये दोनों गुण पर्याप्त हैं कि वह आपको इस संसार के हर दुख और शोक से पार ले जाए—जब तक कि आप उसके सामने खड़े न हो जाएँ, और वह आपकी आँखों से हर आँसू पोंछ न दे।

लूका 7:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 22–23; यूहन्ना 13:1-20 ◊

28 सितम्बर : असली विश्वास का प्रमाण

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28 सितम्बर : असली विश्वास का प्रमाण
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“जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो? जो कोई मेरे पास आता है और मेरी बातें सुनकर उन्हें मानता है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह किसके समान है : वह उस मनुष्य के समान है, जिसने घर बनाते समय भूमि गहरी खोदकर चट्टान पर नींव डाली।” लूका 6:46-48

यीशु चाहता है कि हमारे मुख की बातें और जीवन का व्यवहार एक-दूसरे के अनुरूप हों। इसलिए वह अपने “मैदानी उपदेश” के अन्त में एक बहुत ही टटोलने वाला प्रश्न पूछता है: “जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो?” यीशु ने देखा कि लोग जो कह रहे थे और जो कर रहे थे, उसमें गहरा विरोधाभास था। इसलिए उसने उन्हें एक गहन आत्मिक मूल्यांकन का बुलावा दिया—जो बुलावा वह आज हमें भी देता है। जैसा वह उनके लिए चाहता था, वैसा ही वह हमारे लिए भी चाहता है कि हमारे मुख से निकलने वाली यीशु में विश्वास की घोषणा के साथ-साथ हमारे जीवन में उसके प्रति नैतिक आज्ञापालन भी दिखे।

यीशु ने यह नहीं सिखाया कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश आज्ञाकारिता के अच्छे कामों के द्वारा होता है। उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह से, केवल विश्वास के द्वारा, और बिना किसी अन्य चीज़ के मिलता है (इफिसियों 2:8)। हम मसीह के पास केवल एक ही चीज़ लेकर आते हैं—हमारा पाप, जिससे हमें क्षमा की आवश्यकता है। तो फिर यीशु क्या सिखा रहा है? बहुत सीधी बात: केवल उन्हीं लोगों ने सच में यीशु की बात को सुना है और सुसमाचार से परिवर्तित हुए हैं, जो उसकी आज्ञा मानते हैं—अर्थात जो अपने विश्वास को अपने कर्मों के द्वारा व्यक्त करते हैं। जैसा सुधारवादियों ने कहा था: “उद्धार अकेले विश्वास से होता है, लेकिन उद्धार देने वाला वह विश्वास अकेला नहीं होता।” प्रेरित यूहन्ना भी यीशु की बात को दोहराते हुए अपनी पहली चिट्ठी में लिखता है: “यदि हम कहें कि उसके साथ हमारी सहभागिता है और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं और सत्य पर नहीं चलते” (1 यूहन्ना 1:6)। बाइबल हमें बार-बार दिखाती है कि हम यीशु की बातों को जैसे सुनते हैं और उनका पालन करते हैं, उसका महत्त्व अनन्तकाल तक जाता है, क्योंकि यह हमारे विश्वास की सच्ची अवस्था और वास्तविकता को प्रकट करता है।

किसी भी मात्रा में धार्मिक कर्मकाण्ड या आध्यात्मिक बातें हमारे गुप्त व्यवहार को परमेश्वर से छिपा नहीं सकते। प्रेरित पौलुस बहुत स्पष्ट रूप से कहता है: “जो कोई प्रभु का नाम लेता है, वह अधर्म से बचा रहे” (2 तीमुथियुस 2:19)। हम इस आदेश की मांग की गम्भीरता को कम करने का प्रयास न करें। यही असली विश्वास का प्रमाण है।

यद्यपि कोई भी मनुष्य सिद्ध जीवन नहीं जीता, तौभी हम सभी को एक बदला हुआ जीवन जीने के लिए बुलाया गया है। हम अब मसीह के प्रभुत्व के अधीन हैं। उसका आत्मा हममें वास करता है। क्या हम पूरी तरह सफल होंगे? नहीं। लेकिन हम भिन्न होंगे, और हमारे जीवन में यह निरन्तर दिखेगा कि हम “मूरतों से परमेश्‍वर की ओर फिरे हैं, ताकि जीवते और सच्चे परमेश्‍वर की सेवा करें” (1 थिस्सलुनीकियों 1:9)। इसलिए अपने जीवन पर विचार करें। क्या आप यीशु को “प्रभु” कहते हैं? बहुत अच्छा! लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है: क्या आप अपने जीवन में कोई ऐसा प्रमाण दिखा सकते हैं—उन बातों में जो आप नहीं करते, उन कामों में जो आप करते हैं, उन प्रलोभनों में जिनसे आप लड़ते हैं, उन गुणों में जिन्हें आप पाने का प्रयास करते हैं, और उस क्षमा में जिसे आप पश्चात्ताप पूर्वक मांगते हैं—कि यीशु वास्तव में आपका प्रभु है?

याकूब 2:14-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 20–21; यूहन्ना 12:27-50

27 सितम्बर : वे अपने फल से पहचाने जाते हैं

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27 सितम्बर : वे अपने फल से पहचाने जाते हैं
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“कोई अच्छा पेड़ नहीं जो निकम्मा फल लाए, और न तो कोई निकम्मा पेड़ है जो अच्छा फल लाए। हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।” लूका 6:43-44

छात्र हमेशा अपने शिक्षकों की शिक्षा का प्रतिबिम्ब होते हैं। चाहे कोई छात्र अपने शिक्षक की क्षमताओं से कहीं आगे क्यों न बढ़ जाए, वह हमेशा उस मार्गदर्शन का ऋणी रहेगा जो उसे मिला था।

जब यीशु ने पेड़ों और उनके फलों के बारे में कहा, तो उनका ध्यान अपने समय के आत्मिक अगुवों की ओर था। इस शिक्षा के माध्यम से उसने हमें एक चेतावनी दी—कि हम गलत शिक्षक का चुनाव न करें। और हम यह कैसे जानें कि कौन-सा शिक्षक अच्छा है और कौन बुरा? यीशु कहता है—उसके फलों से, अर्थात् उनकी शिक्षा और आचरण से जो परिणाम निकलते हैं, वे बताएँगे कि वह शिक्षक कैसा है।

जब हम फलों की बात करते हैं, तो हम शिक्षक के चरित्र के सम्बन्ध में बात कर रहे हैं—और चरित्र को केवल बोलने की कला या प्रतिभा से नहीं परखा जा सकता। यीशु ने जब दाखलता और डाली की बात की, तो वहाँ यह स्पष्ट होता है कि फलवन्त होने का अर्थ मसीह के समान होना है (यूहन्ना 15:1–8)। हर पेड़ उसके फल से पहचाना जाता है। इसलिए आत्मा का फल—प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम (गलातियों 5:22–23)—एक अच्छे शिक्षक के जीवन में स्पष्ट रूप से प्रकट होगा।

हमें शिक्षक की शिक्षा की सामग्री को भी परखना चाहिए। पौलुस ने जब अपने प्रिय सेवक तीमुथियुस को लिखा, तो उसने इस मसले पर कहा: “अपनी चौकसी रख”—अर्थात् अपने चरित्र की—“और अपने उपदेश की चौकसी रख” (1 तीमुथियुस 4:16)। क्योंकि हर वह व्यक्ति जो बाइबल लेकर आता है, जरूरी नहीं कि आपके हित में ही बोलता हो। हर वह व्यक्ति जो मसीह का नाम लेता है, जरूरी नहीं कि वह परमेश्वर के वचन का सच्चा शिक्षक हो। झूठे भविष्यवक्ताओं की भरमार है। इसलिए मसीही विश्वासियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे बाइबल से सीखें, न केवल पवित्रता में बढ़ने के लिए, बल्कि सही शिक्षा को पहचानने के लिए भी—जो कि एक परमेश्वर-भक्त शिक्षक की पहचान है। हमें इस तथ्य से भी ढाढ़स मिलना चाहिए कि पवित्र आत्मा हमारे भीतर निवास करता है, जो हमें सब बातों की शिक्षा देता है और सत्य व असत्य के बीच अन्तर समझने की बुद्धि देता है (1 यूहन्ना 2:27)।

एक शिक्षक के चरित्र और उसकी शिक्षा की सामग्री में गहरा सम्बन्ध होता है—और इसका सीधा असर उस व्यक्ति पर पड़ता है जो उससे शिक्षा प्राप्त करता है। इसलिए अपने आत्मिक शिक्षकों और मार्गदर्शकों का चुनाव सोच-समझकर करें। उनकी बोलने की कला या सांस्कृतिक समझदारी या आत्मविश्वास या हास्य या लोकप्रियता को मत देखें—बल्कि देखें कि उनका चरित्र कैसा है और वे क्या सिखा रहे हैं। क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके जीवन में वही फल दिखाई देगा, जो आप अपने शिक्षक से सीखते हैं। जब लोग आपके पास आएँगे, तो वे क्या पाएँगे? क्या वे आलोचना, कटुता, अभिमान या आत्म-धार्मिकता पाएँगे? क्या वे उत्साह की कमी और विश्वास की दुर्बलता पाएँगे? या फिर, क्या वे प्रेम, आनन्द, शान्ति और धार्मिकता के मधुर फल को चख पाएँगे?

2 तीमुथियुस 2:15-26

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 18–19; यूहन्ना 12:1-26 ◊

26 सितम्बर : तिनका और लट्ठा

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26 सितम्बर : तिनका और लट्ठा
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“जब तू अपनी ही आँख का लट्ठा नहीं देखता, तो अपने भाई से कैसे कह सकता है, ‘हे भाई; ठहर जा तेरी आँख से तिनके को निकाल दूँ’? हे कपटी, पहले अपनी आँख से लट्ठा निकाल, तब जो तिनका तेरे भाई की आँख में है, उसे भली भाँति देखकर निकाल सकेगा।” लूका 6:42

मुझे एक बार की घटना याद है—मैं एक परीक्षा में डेस्क पर बैठा था, जैसे ही मैंने प्रश्न-पत्र पलटा, तुरन्त ही मैं इधर-उधर देखने लगा कि क्या बाकी सभी लोग भी पहले प्रश्न को देखकर उतने ही परेशान हैं जितना मैं था। तभी शिक्षक की सख़्त आवाज़ आई: “दूसरों को मत देखो, खुद पर ध्यान दो!”

यीशु भी इन पदों में कुछ ऐसा ही कहता है—एक प्रभावशाली उपमा के ज़रिए वह अपने श्रोताओं को यह सिखाता है कि दूसरों के पापों की ओर अंगुली उठाने से पहले उन्हें अपने पापों से निपटना चाहिए। यीशु ने “तिनके” के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया है, वह आमतौर पर भूसे या लकड़ी के बहुत ही छोटे कणों के लिए इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत, “लट्ठे” का भाव किसी घर की छत का भार-वहन करने वाली बड़ी लकड़ी से है। अगर मेरी आँख में ऐसा लट्ठा है, तो यह स्पष्ट है कि दूसरे की आँख का तिनका निकालने से पहले मेरी आँख के लट्ठे को निकाला जाना ज़रूरी है।

पतित मनुष्यों के रूप में हम अक्सर यह सोचने की प्रवृत्ति रखते हैं कि अपनी आत्मिक स्थिति का ध्यान रखने से पहले दूसरों की आत्मिक स्थिति को सुधारना हमारी प्राथमिक ज़िम्मेदारी है। लेकिन मसीह ने हमें इसलिए नहीं बुलाया है कि हम प्राथमिक और प्रारम्भिक रूप से पहले दूसरों की आँखों से तिनके निकालें। नहीं, वह कहता है कि पवित्रशास्त्र के प्रकाश में और उसके द्वारा ठहराए गए मापदण्ड के अनुसार हमें स्वयं को परखना है।

यीशु की यह शिक्षा हमारे सामने एक बड़ी चुनौती रखती है। कई बार हम दूसरों की गलतियों को इस बहाने उजागर करते हैं कि हम उनकी आत्मिक भलाई चाहते हैं। लेकिन यदि हमने पहले अपने ही पापों के प्रति ईमानदारी और कठोरता नहीं दिखाई, तो वह केवल पाखण्ड है! हम अक्सर इस झूठे विचार का शिकार हो जाते हैं कि यदि मैं तुम्हारी गलती पकड़ लूँ और तुम्हें सुधार दूँ, तो शायद मुझे अपने पापों से निपटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। दूसरों की दशा पर बात करना अक्सर अपने हृदय की सच्चाई से सामना करने से आसान लगता है।

यदि हम वास्तव में दूसरों की सहायता करना चाहते हैं, तो पहले हमें अपने हृदय की गम्भीर अवस्था को पहचानना होगा—जैसा कि रॉबर्ट मुरे म’शेन ने कहा था: “सभी पापों के बीज मेरे हृदय में हैं।”[1] जब हम यह सच्चाई स्वीकार कर लेते हैं और उस पर विश्वास करते हैं, तब जब हम दूसरों की ओर जाते हैं, तो हम नम्रता और प्रेम के निम्न स्तर पर खड़े होते हैं, न कि अहंकार और पूर्वानुमान के ऊँचे स्तर पर। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच का अन्तर सम्पूर्ण जीवन का अन्तर है।

यहूदा 20-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 16–17; यूहन्ना 11:28-57


[1] एण्ड्रू बोनार, मेमोयर ऐण्ड रिमेंस ऑफ रॉबर्ट मुरे म’शेन (बैनर ऑफ ट्रुथ, 1995) में उद्धृत, पृ. 153.

25 सितम्बर : क्षमाशीलता की विशालता

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25 सितम्बर : क्षमाशीलता की विशालता
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“क्षमा करो, तो तुम्हें भी क्षमा किया जाएगा। दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा।” लूका 6:37-38

हमारे हृदय और सोच को जितनी जल्दी कोई चीज़ भ्रष्ट कर सकती है, वह है क्षमा न करने वाला हृदय। लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सत्य है: सच्चे दिल से क्षमा देने के अनुभव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, जो हमें इतनी जल्दी आन्तरिक स्वतन्त्रता, आनन्द और शान्ति देता है। वास्तव में, किसी को क्षमा करने की हमारी तत्परता ही हमारे आत्मिक जीवन की एक कसौटी है; जब हम पूरे दिल से क्षमा करते हैं, तो यह प्रमाण होता है कि हम वास्तव में परमप्रधान परमेश्वर के पुत्र और पुत्रियाँ हैं (लूका 6:35)।

हमें क्षमा किए जाने और हमारी ओर से क्षमा दिए जाने की इच्छा को यीशु प्रायः एक साथ रखता है (लूका 11:4 देखें)। इसलिए जब हम क्षमा करने के अभ्यास की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए: हमें क्षमा कहाँ से प्राप्त होती है? उत्तर है—सच्ची क्षमा का स्रोत केवल परमेश्वर ही है। परमेश्वर की दया की प्रचुरता से ही क्षमा बहती है।

क्षमा हमारी आत्मा के जीवन और स्वास्थ्य के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितना शारीरिक भोजन हमारे शरीर के लिए। पवित्रशास्त्र बार-बार हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर एक क्षमाशील परमेश्वर है। भजनकार कहता है: “हे याह, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा ले, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकेगा? परन्तु तू क्षमा करने वाला है” (भजन संहिता 130:3-4)। इसी तरह भविष्यद्वक्ता दानिय्येल कहता है: “तू दया का सागर और क्षमा की खान है” (दानिय्येल 9:9)। और परमेश्वर का पुत्र, जब उसपर थूका गया, उसे अपमानित किया गया, उसके वस्त्र छीन लिए गए, क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया और दो अपराधियों के बीच तड़पता हुआ छोड़ दिया गया—तब भी उसने यह कहा: “हे पिता, इन्हें क्षमा कर” (लूका 23:34)। परमेश्वर की क्षमा की भावना अतुलनीय है।

यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा जब हम परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं, तो हमें भी अपने पिता और प्रभु का अनुकरण करते हुए क्षमा का अभ्यास करना है। यह मसीही जीवन का इतना मूलभूत हिस्सा है कि यीशु यहाँ तक कहता है कि यदि हम क्षमा करने को तैयार नहीं हैं, तो हमें गम्भीरता से यह पूछना चाहिए कि क्या हम वास्तव में क्षमा किए गए हैं—अर्थात्, क्या हमने सच में सुसमाचार को अपने हृदय में ग्रहण किया है? (मत्ती 6:14-15 देखें)। यदि आपने अपने हृदय में क्षमा न करने का भाव छिपा रखा है, तो उसे अनदेखा न करें, न ही उसे छोटा समझें। इसके बजाय, सुसमाचार को उसमें प्रवेश करने दें। यह विचार करें कि मसीह के द्वारा आपको कितनी बड़ी क्षमा मिली है। अपने पिता की क्षमाशील प्रकृति को याद करें, जिसे आपको अपने जीवन में प्रकट करना चाहिए। क्षमा न करने के भाव को एक विनाशकारी बोझ और जीवन को खोखला कर देने वाला प्रभाव समझें। विशेष रूप से यह सोचें: किसे क्षमा करना है, और कैसे? यही वह मार्ग है जिस पर चलकर हम उस शान्ति और स्वतन्त्रता का अनुभव कर सकते हैं, जो क्षमा देने से आती है—वैसी ही क्षमा जैसी हमें स्वयं मिली है।

लूका 7:36-50

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 14–15; यूहन्ना 11:1-27 ◊

24 सितम्बर : जीवन बोलो, दोष नहीं

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24 सितम्बर : जीवन बोलो, दोष नहीं
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“दोष मत लगाओ, तो तुम पर भी दोष नहीं लगाया जाएगा। दोषी न ठहराओ, तो तुम भी दोषी नहीं ठहराए जाओगे।” लूका 6:37

अक्सर हम इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि हमें दूसरों पर दोष लगाने का अधिकार है—क्योंकि यह हमारी पापमयी प्रवृत्ति को भाता है। सच कहें तो, जैसे ही हमें नेतृत्व या अधिकार की कोई भी स्थिति मिलती है—चाहे वह छोटी हो या बड़ी—हमें आश्चर्यजनक रूप से जल्दी यह प्रलोभन घेर लेता है कि हम दया दिखाने की बजाय दोष लगाने लगें।

हमें याद रखना चाहिए कि हम दोष लगाने के योग्य नहीं हैं। क्यों? क्योंकि हम किसी दूसरे के दिल को नहीं पढ़ सकते। हम किसी के इरादों का सही आकलन नहीं कर सकते। केवल परमेश्वर ही यह कह सकता है: “हृदय और मन का परखने वाला मैं ही हूँ, और मैं तुममें से हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला दूँगा” (प्रकाशितवाक्य 2:23)। चूंकि आप और मैं परमेश्वर नहीं हैं, इसलिए हम दोष लगाने के अधिकारी नहीं हैं। हम यीशु की इस आज्ञा को सबसे ज़्यादा और सबसे आसानी से किस तरह तोड़ते हैं? अपनी जीभ से। हम दूसरों की बदनामी करके उनके चरित्र पर दोष लगा देते हैं। मसीही समाज में हम अक्सर बड़ी चालाकी से इस तरह की चुगली को प्रार्थना निवेदन या चिन्ता के रूप में पेश करते हैं—लेकिन सच्चाई यह है कि अक्सर हमें यह कहने में एक अजीब-सी खुशी मिलती है: “क्या तुमने उसके बारे में यह सुना है?” “क्या तुम जानते हो उसने ऐसा क्यों किया?” “तुम्हें मालूम है उसके साथ क्या हुआ?” यह वही भाव है जो फरीसियों में था—दूसरों को दोषी ठहराकर खुद को ऊँचा दिखाना। यह प्रवृत्ति आज भी मसीहियों के बीच जीवित है।

इसीलिए हमें अपने शब्दों के प्रयोग को लेकर बेहद सतर्क रहना चाहिए। अपनी जीभ दोष लगाने की बजाय, हमें पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें जीवनदायक शब्द बोलने का सामर्थ्य दे। मुँह खोलने से पहले हमें मिशनरी एमी कार्माइकल की इस सलाह को याद रखना चाहिए और स्वयं से पूछना चाहिए: “क्या जो मैं कहने जा रहा हूँ, वह दयालु है? क्या वह सत्य है? क्या वह आवश्यक है?” पवित्रशास्त्र इस विषय पर पूर्णतः स्पष्ट है। वास्तव में, नीतिवचन की पुस्तक हमें सिखाती है: “मूर्ख का विनाश उसकी बातों से होता है, और उसके वचन उसके प्राण के लिए फन्दे होते हैं,” लेकिन “विश्वासयोग्य मनुष्य बात को छिपा रखता है” (नीतिवचन 18:7; 11:13)।

हमें यीशु में एक ऐसा उद्धारकर्ता मिला है, जिसका लहू हमारे हर लापरवाह शब्द और हर निन्दात्मक टिप्पणी से हमें शुद्ध करता है—एक ऐसा उद्धारकर्ता जो हमें उस पापी प्रवृत्ति से क्षमा करता है, जो हमें परमेश्वर की भूमिका हथिया लेने की ओर खींचती है। इस सच्चाई के प्रकाश में, हमें प्रतिदिन अपनी जीभ के पापों के लिए पश्चाताप करना चाहिए और पवित्र आत्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारे मन में एक नई लालसा उत्पन्न करे—कि हमारे मुँह के वचन और हमारे हृदय का ध्यान उसके सम्मुख ग्रहण योग्य हों (भजन संहिता 19:14)।

लूका 6:37-45

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 11–13; यूहन्ना 10:22-42

23 सितम्बर : पिता की दया की अनुकरण करना

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23 सितम्बर : पिता की दया की अनुकरण करना
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“अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, और भलाई करो, और फिर पाने की आशा न रखकर उधार दो; और तुम्हारे लिए बड़ा फल होगा, और तुम परमप्रधान के सन्तान ठहरोगे, क्योंकि वह उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो।” लूका 6:35-36

“जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो”—यीशु के प्रसिद्ध धन्य-वचनों की शिक्षा का सार है (लूका 6:20-23), और वास्तव में यह हर विश्वासी के जीवन का एक उत्तम आदर्श वाक्य हो सकता है। ये शब्द उस हर बात पर बल देते हैं, जो यीशु पहले ही हमें दूसरों के प्रति हमारे व्यवहार के बारे में सिखा चुका है—विशेषकर उनके प्रति जो प्रभु के प्रति हमारी निष्ठा के कारण हमसे बैर रखते हैं (पद 22)।

हालाँकि, यह बात हमें एक प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करती है: दयालु होना वास्तव में कैसा दिखता है? हमारा बुद्धिमान और कोमल चरवाहा यीशु हमें इस सिद्धान्त को स्वयं ही समझने के लिए नहीं छोड़ देता। इसके विपरीत, वह हमें यह स्पष्ट रूप से बताता है कि हमारे स्वर्गिक पिता की दया का अनुकरण करना कैसा दिखता है।

परमेश्वर “उन पर जो धन्यवाद नहीं करते और बुरों पर भी कृपालु है।” और चूंकि हम उसकी सन्तान हैं, इसलिए हमें भी यही दया दिखाने के लिए बुलाया गया है—अर्थात अपने शत्रुओं से प्रेम करना, बुराई के बदले भलाई करना, और बिना किसी प्रतिफल की आशा किए दूसरों को देना। ध्यान दें कि यीशु यहाँ किसी प्रकार की छूट या ऐसा न करने का कोई बहाना नहीं देता।

जब यीशु हमें परमेश्वर की दया के वाहक बनने के लिए बुलाता है, तो उसी क्षण वे हमें यह भी बताता है कि हमें दूसरों पर दोष नहीं लगाना है (लूका 6:37)। वह यह नहीं कह रहा कि हम अपने रिश्तों में सही-गलत की परख करने की क्षमता को एक ओर रख दें। हमें सत्य और असत्य या भलाई और बुराई में भेद करना बन्द नहीं कर देना है। यीशु यह भी नहीं कह रहा कि हम पापों को अनदेखा करें या गलतियों को न सुधारें। बल्कि जब यीशु कहता है कि “दोष मत लगाओ,” तो वह एक प्रकार की आत्म-धर्मी, खुद को ऊँचा समझने वाली, कपटी और कठोर आलोचना वाली प्रवृत्ति को गलत ठहरा रहा है—एक ऐसा दृष्टिकोण जो केवल दूसरों की गलतियाँ उजागर करता है और हमेशा कटुता की भावना लेकर आता है।

एक निर्दयी मनोदशा पूरी तरह से यीशु की उस प्रेरणा के विरुद्ध है, जिसमें उसने हमसे कहा है कि हम अपने मित्रों और शत्रुओं दोनों के प्रति दया दिखाएँ। हममें से हर किसी को अपने भीतर किसी भी प्रकार की आलोचनात्मक भावना को पहचानकर उसे जड़ से उखाड़ फेंकना है, और उसकी जगह कोमलता और समझदारी को देना है।

यही वह तरीका है जिससे हम दूसरों को वह दया दिखाते हैं, जो परमेश्वर ने हम पर दिखाई है। एक (सम्भवतः काल्पनिक) कहानी बताई जाती है कि जब रानी एलीज़ाबेथ द्वितीय छोटी थीं, तो उनकी माँ उन्हें और उनकी बहन मार्गरेट को किसी पार्टी में जाने से पहले कहा करती थीं: “याद रखना: तुम शाही सन्तान हो, इसलिए शाही व्यवहार करना।” उनका आचरण उन्हें शाही परिवार का सदस्य नहीं बनाता था, लेकिन यह दिखाता था कि वे उस परिवार के सदस्य हैं।

मसीही भाइयो और बहनो, आप और मैं इस सृष्टि के शाही परिवार के सदस्य हैं, और इस सृष्टि का राजा हमारा पिता है। यह निश्चित करें कि आपका व्यवहार यह दर्शाए कि आप कौन हैं और किसके हैं। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो

इफिसियों 4:25 – 5:2

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 8–10; यूहन्ना 10:1-21 ◊

22 सितम्बर : प्रेम का नियम

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22 सितम्बर : प्रेम का नियम
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“मैं तुम सुनने वालों से कहता हूँ कि अपने शत्रुओं से प्रेम रखो; जो तुम से बैर करें, उनका भला करो।” लूका 6:27

जब आप बाइबल पढ़ते हैं और उसमें मसीही आस्था का वर्णन पाते हैं, और फिर आप अपने आप को देखते हैं, तो क्या कभी आप यह सोचते हैं कि क्या आप सचमुच एक मसीही हैं या नहीं? मुझे पता है कि मैं ऐसा करता हूँ।

विश्वासियों के रूप में हमारा आश्वासन और परमेश्वर का हमसे प्रेम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कुछ मसीही सिद्धान्तों का अपने जीवन में कितने अच्छे तरीके से पालन करते हैं; बल्कि ये दोनों हमारे लिए मसीह द्वारा क्रूस पर किए गए काम पर निर्भर करते हैं। फिर भी, बाइबल हमें वर्तमान में अपनी मुक्ति के प्रमाण देखने के बारे में सिखाती है। यदि हम सचमुच अपने स्वर्गिक पिता के बच्चे हैं, तो हमें दूसरों के प्रति एक ऐसा प्रेम दिखाना होगा जो यीशु के हमारे लिए प्रेम के समान हो।

यीशु हमें लोगों से इस प्रकार प्रेम करने के लिए कहता है, जो उनके आकर्षण, योग्यता या अनुराग्यता से सम्बन्धित न हो। हम जानते हैं कि परमेश्वर हमसे ठीक ऐसा ही प्रेम करता है—उसका प्रेम इस बात पर आधारित नहीं है कि हमने अपना व्यवहार ठीक किया है, हम उसके ध्यान के योग्य हैं या हम उसकी सेवा में सहायक अथवा उपयोगी हैं। इन सभी बातों से परमेश्वर का प्रेम हमारे लिए बढ़ता नहीं है। नहीं—“परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिए मरा” (रोमियों 5:8, अतिरिक्त बल जोड़ा गया)।

इसलिए, हमारी आस्था का सबसे बड़ा मापदण्ड प्रेम है—वह प्रेम जो उस प्रेम को दर्शाता है जो हमें इतनी अधिकता में प्राप्त हुआ है। हम अगापे प्रेम में संलग्न होते हैं—शर्त-रहित, बलिदानी प्रेम—क्योंकि यह परमेश्वर के चरित्र और उसके द्वारा हमारे लिए किए गए कामों का एक प्रकट रूप है। हम अपने शत्रुओं से इस प्रकार का प्रेम इस कारण नहीं करते क्योंकि हम उन्हें उनके असली रूप में नहीं देख पाते, बल्कि इसलिए क्योंकि हमने अपने स्वयं के लिए परमेश्वर के प्रेम को देखा है। यीशु कहता है कि जब हम दूसरों को जैसा वे हैं वैसे देखते हैं—उनकी सारी कुरूपता और नफरत, उनके सारे शाप, उनके सारे द्वेष, और हमसे उधार लिए हुए को न चुकाना—तो हमें इसके बारे में यथार्थवादी होना चाहिए, और फिर उनसे प्रेम करना चाहिए। यीशु कहता है, जब तुम यह सारी शत्रुता देखो, तो मैं चाहता हूँ कि तुम अपने शत्रुओं से प्रेम करो।

स्वभाव से, हम इस प्रकार के प्रेम को दिखाने में असमर्थ हैं। लेकिन ज़रा सोचिए कि यदि हम तैयार हों कि हर अपने दैनिक जीवन में और असाधारण परिस्थितियों में भी मसीह जैसा प्रेम दर्शाएँ—एक ऐसा प्रेम जो उनके लिए भी भलाई चाहता है जिन्होंने हमारे प्रति शत्रुता दिखाई हो—तो हम अपनी संस्कृति में कितना बड़ा बदलाव ला सकते हैं। यह निश्चित रूप से एक क्रान्तिकारी परिवर्तन होगा और इसमें कोई सन्देह नहीं है।

प्रेरितों 9:10-28

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 5–7; यूहन्ना 9:24-41