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13 फेब्रुवारी : परिपूर्ण असें नगर

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13 फेब्रुवारी : परिपूर्ण असें नगर
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त्यानें त्यांच्यासाठीं नगर तयार केलें आहे. (इब्री 11:16)

तिथें कोणतेहि प्रदूषण नाहीं, किंवा भित्तिचित्र नाहीं, वा कचरा नाहीं, रंगाचे पापुद्रे काढणें नाहीं किंवा निकामी वस्तूंची खोली नाहीं, वाळलेलें गवत किंवा तुटलेल्या बाटल्या नाहींत, चवाठ्यांवर तापलेल्या चर्चा नाहींत, सर्वांसमक्ष तोंडावर फटकारणें नाहीं, घरगुती भांडणे किंवा हिंसा नाहीं, रात्र-प्रहरी धोके नाहीं, जाळपोळ नाहीं किंवा खोटे बोलणे किंवा चोरी करणे किंवा जीवें मारणे नाहीं, वा तोडफोड नाहीं आणि कुरूपता तर नाहींच. 

देवाचे हें नगर परिपूर्ण असें असेल, कारण देव स्वतः तिथें आपली वस्ती करील. तो त्यां नगरांत वावरील, संभाषण करील आणि त्याचा प्रत्येक कानाकोपरा स्वतःच्या उपस्थितीने भरून टाकील. जे काही चांगले व मनोरम व पवित्र व अनुकूल व सत्य व हर्षाने भरलेले आहे ते सर्व तिथें असेल, कारण देव स्वतः तिथें आपली वस्ती करील.

तिथें परिपूर्ण न्याय केला जाईल आणि ज्यांनी या जगात ख्रिस्ताची आज्ञापालन करून जें जें दु:ख भोगले त्यां प्रत्येक दु:खाचे हजारपट प्रतिफळ दिलें जाईल. आणि ते कधीहि क्षय पावणार नाहीं. किंबहुना, अनंतकाळ जसजसा वाढत जाणाऱ्या आनंदासह सार्वकालिकतेंत विस्तारत जातो, तसतसा त्या प्रतिफळाचा उजळपणा अधिकच तेजस्वी होईल.

जेव्हां तुम्हीं ह्या नगराची पृथ्वीवरील इतर सर्व गोष्टींपेक्षा अधिक उत्कंठा धरतां, तेव्हां तुम्हीं देवाचा आदर करता, जो इब्री 11:10 नुसार, त्यां नगराचा योजक व उभारणारा आहे. आणि देवाचा आदर केला जातो तेव्हां तो प्रसन्न होतो व आपणाला तुमचा देव म्हणवून घ्यायला त्याला तुमची लाज वाटत नाहीं.

12 फरवरी : एकता की कुंजी

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12 फरवरी : एकता की कुंजी
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“जिस (यीशु मसीह) में तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाए जाते हो।”  इफिसियों 2:22

जब कोई व्यक्ति विश्वास के द्वारा मसीह के पास आता है, तो उसकी पहचान में व्यापक रूप से परिवर्तन हो जाता है। इफिसियों 2 में पौलुस ने जिस भाषा का प्रयोग किया है, उसके अनुसार एक मरा हुआ पापी अब मसीह में जीवित है; कोप की सन्तान अब परमेश्वर की सन्तान है। परन्तु यह नई पहचान केवल व्यक्तिगत नहीं है। हम में से कोई भी मसीह में अकेला नहीं है; हम सभी परमेश्वर के लोगों के साथ  उसमें हैं। यही कारण है कि इफिसियों 2 में पौलुस अनुग्रह के हमारे व्यक्तिगत अनुभव से परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले सामूहिक कार्य की ओर आगे बढ़ता है। पौलुस हमें बताता है, “तुम अब विदेशी और मुसाफिर नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्‍वर के घराने के हो गए हो” (पद 19)। मसीह द्वारा निर्मित किया जा रहा यह “एक नया मनुष्य” (पद 15) अनुग्रह के संगी वारिसों की भीड़ के साथ महिमामय रीति से घिरा होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारी व्यक्तिगत मानवीय पहचान व्यर्थ हो जाती है। हमारी पृष्ठभूमि और हमारा स्वरूप, अर्थात हमारा लिंग, जाति और व्यक्तिगत इतिहास मसीह में विलुप्त नहीं हो जाते। हम वही रहते हैं जो हम हैं, अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप में बनाए गए तथा उसके उद्देश्यों के अनुसार गढ़े गए हैं। परन्तु जो बात हमें मसीह में  एक करती है, अर्थात् मसीह के साथ  हमारी एकता, वह शेष सभी बातों से बढ़कर है।

हमें सावधान रहना चाहिए कि कहीं हम यह न भूल जाएँ कि हमारी यह एकता किस कारण से हमें मिली है। कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान के तत्वों को बाधाओं में—प्रतिष्ठा, वर्ण, वर्ग, व्यक्तित्व के प्रकार या व्यक्तिगत प्राथमिकताओं की बाधाओं में—बदल देने के प्रलोभन में गिर सकता है। मसीही होने के नाते हमें यह स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए कि ऐसी भूल हो जाना कितनी सरल बात है। यदि हम स्वयं को ऐसी गलती के लिए दोषी पाएँ, तो हमें पश्चाताप करने और उस बात के विषय में शोक करने के लिए तैयार रहना चाहिए जो परमेश्वर को पसन्द नहीं आती।

मसीही एकता की कुंजी सुसमाचार है। पौलुस जानता था कि केवल परमेश्वर ही कठोर हृदयों को नरम कर सकता है, केवल परमेश्वर ही अन्धी आँखें खोल सकता है और केवल परमेश्वर ही अलग-अलग लोगों को एक साथ लाकर उन्हें कुछ ऐसा बना सकता है, जो वास्तव में महिमामय रीति से एक हों। परमेश्वर “एक नया मनुष्य” निर्मित कर रहा है और वह उस नए मनुष्य को अपनी कलीसिया के रूप में निर्मित कर रहा है। मसीह में परमेश्वर एक “पवित्र मन्दिर” (इफिसियों 2:21) निर्मित कर रहा है, जो “आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिए एक साथ बनाया जाता है।” जाति, वर्ग या प्रतिष्ठा के आधार पर पक्षपात के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है, जहाँ परमेश्वर अपने आत्मा के द्वारा वास करता है। एक दिन आप अनन्त काल के लिए मसीह और उसके लोगों के साथ अपने मिलन की पूर्णता का अनुभव करेंगे; परन्तु उस काम को अभी प्रारम्भ होना आवश्यक है और होना भी चाहिए। जिस तरह से आप अपने समय का उपयोग करते हैं और जिस तरह से आप अपनी कलीसिया में अपने भाइयों और बहनों के बारे में सोचते हैं, उनके लिए प्रार्थना करते हैं और उनसे बात करते हैं, इन सब बातों के द्वारा आज आपके पास उस एकता को पोषण देने का विशेषाधिकार है।

हम दिन-प्रतिदिन निर्मित होते जा रहे हैं,

जैसे-जैसे क्षण बीतते जा रहे हैं,

हमारा मन्दिर, जिसे शायद संसार न देख सके;

अनुग्रह से प्राप्त होने वाली प्रत्येक जीत

अनन्त काल के लिए किए जा रहे हमारे निर्माण में

अपना स्थान अवश्य पाएगी।

1 कुरिन्थियों 13

12 फेब्रुवारी : लिंकन व देवाची कृपा-योजना

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12 फेब्रुवारी : लिंकन व देवाची कृपा-योजना
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अहाहा, देवाच्या बुद्धीची व ज्ञानाची संपत्ती किती अगाध आहे! त्याचे निर्णय किती गहन आणि त्याचे मार्ग किती अगम्य आहेत (रोमकरांस  11:33)

अब्राहम लिंकन, ज्यांचा जन्म 1809 साली आजच्याच दिवशी झाला होता, तें त्यांच्या चाळीशीत धर्माबाबत संशयी व तर कधी कधी धर्माचा उपहास करणारे असें देखील होते. पण कश्याप्रकारे ते वैयक्तिकरित्या स्वतःवर व देशावर आलेले संकट यामुळें देवापासुन दूर  जाण्याऐवजी देवा जवळ आले हे पाहणे लक्षवेधी आहे. 

1862 साली जेव्हां लिंकन 53 वर्षाचे होते तेव्हां त्यांचा मुलगा विली याचे निधन झालें, त्या “दु:खातून बाहेर पडण्यासाठीं त्यांची पत्नी न्यू एज या गूढवादी शिक्षणाकडे वळाली”, तर लिंकन हे न्यूयॉर्क एव्हेन्यू, प्रेस्ब्यटेरियन चर्च वॉशिंग्टन येथील पाळक फिनेयास गर्ली यांचा शिक्षणाकडे वळाले.

आणि जसा कीं श्रीमान गरले उल्लेख करतांत, अनेक वैयक्तिक चर्चां नंतर लिंकन यांचा “ख्रिस्तामध्यें नवा जन्म झाला.” लिंकन यांनी अनेक वेळा उघड केलें कीं, “ख्रिस्ताला सोडून मी कुठेच जाऊ शकत नाही, या भावनेने मी अनेक वेळा माझ्या गुडघ्यांवर येऊन प्रार्थना केलीं.”

त्याच बरोबर, जखमी व मरण पावलेले सैनिक यांची यातना त्यांना रोज व्यथित करीत असें. वॉशिंग्टन येथें जखमी सैनिकांसाठीं पन्नास दवाखाने होते व कॅपीटॉलच्या इमारतीमध्ये जखमींसाठीं दोन हजार बेड उपलब्ध केले गेले होते.

या तात्पुरत्या स्वरुपाच्या दवाखान्यामध्ये रोज पन्नास सैनिकांचा मृत्यू होत असे. या सर्व गोष्टींमुळे लिंकन देवाच्या कृपेच्या अधिक जवळ येत गेलें. “ज्याने हे जग निर्माण केले, त्यावर आज देखील त्याचीच सत्ता आहे, यावर विश्वास ठेवण्याऐवजी आपण कांहीच करूं शकत नाहीं.

त्यांचा हत्येच्या एक महिना अगोदर, आपल्या दुसर्‍या कार्यकालाच्या भाषणाच्या वेळी त्यांनी गृहयुद्‌ध व देवाची कृपायोजना यांतील परस्पर संबंधावर आपलं सर्वात प्रसिद्ध वक्तव्य केलं. देव हा संयुक्त किंवा संघ राज्याच्या बाजूने नाही हे त्यांचे उदद्गार खूप उल्लेखणीय आहेत . देवाच्या स्वताच्या योजना असतात व तो दोन्ही बाजू कडील पापासाठीं कुठलीहि सबब (काही केले तरी अद्दल घडणार नाही अशी स्थिती) मानत नाही.

               आम्हीं  एकनिष्ठेने आशा करतो – आम्हीं तत्परतेने प्रार्थना करतो –कीं हे युद्धाचे मोठे अरिष्ट लवकरच संपुष्टात यावें.

तरी सुद्धा, देवाची इच्छा असेल कीं ते सुरू रहावे, दासांनी दोनशे वर्ष कष्ट करून मिळवलेल्या संपतीचा पूर्ण -हास झाला तरी, जो पर्येंत चाबकाच्या फट्कयांनी सांडलेल्या रक्ताच्या प्रत्येक थेंबाची परतफेड तलवारीने होत नाही तो पर्येंत जरी युद्धं सुरू राहिले तरी देखील, आणि तीन हजार वर्षापूर्वी जसें नमूद केले होते, तें आजहि ओरड करून सांगितले गेलें पाहिजें कीं, “देवाचे सर्व न्याय योग्य व नीतिमान आहेत, हेच सत्य आहे.”

मी तुम्हां सर्वांकरिता, ज्यांनी काही तरी गमावले आहे, जे अतोनात दु:खात आहेत व जे वेदनेत आहेत, अशी प्रार्थना करितो,  कीं जशी लिंकन यांना आली तशी तुम्हाला देखील या गोष्टीची प्रचिती यावी, कीं आपण हताश होऊन सर्व दोष नियतीवर न देता, देवाचे अगाध ज्ञान व त्याच्या कृपा-योजनांवर आपण गाढ भरवंसा ठेवावा.

11 फरवरी : राज्य के वारिस होना

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11 फरवरी : राज्य के वारिस होना
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“क्या तुम नहीं जानते कि अन्यायी लोग परमेश्‍वर के राज्य के वारिस न होंगे?”  1 कुरिन्थियों 6:9

विश्वासियों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि यीशु मसीह के राज्य में हमें सदस्यता मिल चुकी है। यही वह बात है जो मसीहियों को अद्वितीय बनाती है। अब हम एक बिलकुल नए राज्य के सदस्य हैं। हो सकता है कि हम काले या गोरे, अमीर या गरीब, पुरुष या स्त्री हों, किन्तु जो बात हमें एक करती है, वह है एक ही राजा, अर्थात् यीशु के प्रति हमारी निष्ठा। हम उसके निर्देशों पर चलते हैं, हम उसके दल के साथ आनन्दित होते हैं और हम उसकी आज्ञा का पालन करने में प्रसन्न होते हैं।

परमेश्वर का राज्य एक धर्मी राज्य है। उसका चरित्र सिद्ध है, उसके मानक उत्कृष्ट हैं और वह पाप को नहीं देख सकता। इसलिए पौलुस चेतावनी देता है कि जो लोग उसके चरित्र को नकारते हैं और उसके मानकों को अस्वीकार करते हैं “वे परमेश्वर के राज्य के वारिस नहीं होंगे।” दुष्टता, विद्रोह और आत्मनिर्भरता से चिह्नित जीवनशैली मसीह की प्रभुता के साथ मेल नहीं खाती और इस कारण इस तरह से जीवन बिताने का निर्णय उसके राज्य की सीमाओं से बाहर रहने का निर्णय है।

हमें ध्यान देना है कि पौलुस यहाँ अधर्म के छोटे-मोटे कामों का उल्लेख नहीं कर रहा है। मसीह के राज्य का कोई भी सदस्य अनन्त महिमा के इस पार पाप रहित जीवन नहीं जीता। इसके विपरीत, पौलुस किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख कर रहा है, जो निरन्तर पाप में लगा रहता है या उससे घृणा नहीं करता। वह ऐसे जीवन की बात कर रहा है जो घोषित करता हो कि “मैं नहीं चाहता कि परमेश्वर मेरी इच्छाओं में हस्तक्षेप करे, फिर भी मैं इस धारणा के साथ जीना चाहता हूँ कि मैं उसके राज्य का हूँ और उसके सभी लाभ भी चाहता हूँ।”

परमेश्वर अपने राज्य की सीमाओं का निर्धारण करता है। यह बात पूर्णतः सत्य है कि सारे मनुष्य उसके राज्य के नागरिक नहीं होगे, फिर चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उनका विश्वास चाहे कुछ भी क्यों न हो, या वे चाहे कुछ भी क्यों न चाहते हों! यह धारणा बहुत ही स्वीकार्य लग सकती है, परन्तु परमेश्वर का वचन ऐसा कदापि नहीं सिखाता। केवल परमेश्वर यह निर्धारित करता है और उसके अतिरिक्त कोई अन्य यह तय नहीं कर सकता कि उसके राज्य में कौन होगा।

परमेश्वर कहता है कि न्याय का एक दिन आएगा। निस्सन्देह, यीशु अपनी महिमा में वापस आएगा और “सब जातियाँ उसके सामने इकट्ठा की जाएँगी; और वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा” कि वे या तो परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करें या अनन्त विनाश में भेजे जाएँ (मत्ती 25:32)। परमेश्वर का राज्य ऐसा कुछ नहीं है, जिसे यीशु पुरातन से चली आ रही प्रणाली में मौजूद किसी दोष को ठीक करने के लिए लेकर आया हो। इसकी योजना अनन्तकाल से थी।

आने वाले न्याय के कारण सुसमाचार प्रचार में तत्परता की भावना उत्पन्न होनी चाहिए और इससे हममें हमारे पाप के प्रति सच्चरित्रता और निर्दयता उत्पन्न होनी चाहिए। हमें संसार के सामने यीशु के रूप में एक ऐसा जीवित उद्धारकर्ता प्रस्तुत करना चाहिए, जो ठीक वही करेगा जिसे करने के बारे में उसने कहा था और हमें स्वयं को भी यही प्रचार करना चाहिए। केवल अपने पाप को पहचानने और उद्धारकर्ता की हमारी आवश्यकता को पहचानने के द्वारा ही यह सम्भव है कि हम परमेश्वर के इस अनन्त राज्य के वारिस बन सकेंगे।      लूका 13:22-30

11 फेब्रुवारी : श्रेष्ठ दासत्व

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11 फेब्रुवारी : श्रेष्ठ दासत्व
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कारण गुलाम असून ज्याला प्रभूमध्ये पाचारण झालें, तो गुलामगिरीतून मोकळा केलेला प्रभूचा मनुष्य आहे; तसेच मोकळे असताना ज्याला पाचारण झालें तो ख्रिस्ताचा दास आहे. (1 करिंथकरांस 7:22)

पौलानें “प्रभू” चा पर्यायी शब्द “धनी”  आणि “ख्रिस्त” चा पर्यायी शब्द मशीहा उपयोगात आणला असतां तर माझ्यामते ते अधिक बरें झालें असतें.

पौल आम्हांला गुलामगिरीतून मोकळे केलें जाण्याच्या कृतीचा परस्पर संबंध येशू बरोंबर ह्या अर्थानें जोडतो कीं तो आमचा धनी आहे  (“गुलामगिरीतून मोकळा केलेला प्रभूचा मनुष्य”). आणि तो आपल्या नव्या दासत्वाचा (“ख्रिस्ताचा दास”)  परस्पर संबंध येशू बरोंबर ह्या अर्थानें जोडतो कीं तो आमचा मशीहा आहे. ही गोष्ट जरा विलक्षण वाटते कारण मशीहा जेव्हां आला तो ते आपल्या लोकांना त्यांना कैद करणाऱ्यांपासून सोडविण्यांस आला होता; आणि धनी आपल्या दासांवर प्रभूत्व करतांत.

तो असे का म्हणतो? तो मशीहाचा संबंध (मुक्तीऐवजी) गुलामगिरीला आणि मुक्तीचा संबंध (गुलामीऐवजी) धन्याला का जोडतो?

प्रस्ताव : या पर्यायाचे आपल्या नव्या स्वातंत्र्यावर दोन परिणाम, आणि आपल्या नव्या दासत्वावर दोन परिणाम झालें आहेत.

एकीकडे, जेव्हां तो आम्हांला “गुलामगिरीतून मोकळा केलेला प्रभूचा मनुष्य” असें म्हणतो, तेव्हां तो आपल्या नव्या स्वातंत्र्याची खात्री देतो त्यांच वेळीं तिला मर्यादितहि करतो :

1. त्याचे प्रभुत्व इतर सर्व प्रभूंवर आहे (म्हणजे तो प्रभूंचा प्रभू आहे); त्यामुळे आम्हांला मोकळे केलें जाणें हें निर्विवाद आहे — म्हणजे पूर्णपणे सुरक्षित.

2. परंतु, जरी आपण इतर सर्व प्रभूंपासून स्वतंत्र केलें गेलों असलों, तरी आपण त्याच्यापासून स्वतंत्र नाही. आपले स्वातंत्र्य कृपेनें मर्यादित आहे. येशू आपला धनी आहे.

तर दुसरीकडे, जेव्हां तो आम्हांला “ख्रिस्ताचा दास” म्हणतो, तेव्हां तो आपल्या ह्या नव्या गुलामगिरीला विसावा देणारी व गोड असें नवे स्वरूप देतो :

1. मशीहा आपल्या लोकांना त्यांना बंदिस्त करणाऱ्याच्या बंधनांतून सोडवून विसाव्याच्या मोकळ्या ठिकाणी आणण्यासाठीं त्यांना आपल्या ताब्यात घेतो. “त्याच्या सत्तावृद्धीला व शांतीला अंत नसणार” (यशया 9:7).

2. मग तो त्यांना अत्यंत गोड असा आनंद देण्यासाठीं त्यांना स्वतःचे लोक बनवतो. “पहाडातल्या मधाने मी तुला तृप्त करीन” (स्तोत्र 81:16). आणि तो खडक तर ख्रिस्त, म्हणजे मशीहा आहे.

म्हणून, प्रिय ख्रिस्ती बंधुजनहो, यांत आनंद करा: “ज्याला प्रभूमध्ये पाचारण झालें, तो गुलामगिरीतून मोकळा केलेला प्रभूचा मनुष्य आहे” – धनी. “तसेच मोकळे असताना ज्याला पाचारण झालें तो ख्रिस्ताचा दास आहे” –मशीहा जो दासत्वाला विसावा देणारी व गोड अशी गोष्ट बनवितो.

10 फरवरी : परमेश्वर ने विश्राम किया

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10 फरवरी : परमेश्वर ने विश्राम किया
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“और परमेश्‍वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उसमें उसने सृष्टि की रचना के अपने सारे काम से विश्राम लिया।”  उत्पत्ति 2:3

मानवता सृष्टि का चरमोत्कर्ष है। हम केवल उच्च श्रेणी के वानर नहीं हैं; परमेश्वर की सारी सृष्टि में से केवल हम ही उसके स्वरूप में बनाए गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। हम एक सृष्टि हैं क्योंकि हमें एक सृष्टिकर्ता ने बनाया है, किन्तु हम सारी सृष्टि में अद्वितीय भी हैं क्योंकि हमें परमेश्वर की समानता में बनाया गया है। मनुष्य के पास वह गरिमा है, जो उससे अलग नहीं की जा सकती और परमेश्वर चाहता है कि हम अपने सृष्टिकर्ता का आदर करें और उसके साथ सम्बन्ध में बने रहें।

यदि मनुष्य सृष्टि का चरमोत्कर्ष है, तो विश्राम सृष्टि का चरम लक्ष्य है। जब परमेश्वर ने अपना सृजनात्मक कार्य पूरा किया, तो उसने विश्राम किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसने अपने बनाए संसार में उपस्थित रहना या सक्रिय रहना बन्द कर दिया, अपितु इसका अर्थ यह है कि उसने सृजन के कार्य से विश्राम किया। उसमें आगे को कोई संशोधन करने या जोड़े जाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किसी भी वस्तु को किसी कमी के कारण खोलकर फिर से बनाने की आवश्यकता नहीं थी। और परमेश्वर की महान योजना, अर्थात् मनुष्यों के लिए उसकी इच्छा यह है कि हम भी उसके साथ विश्राम के अद्‌भुत, निरन्तर बने रहने वाले दिन में रह सकें।

उत्पत्ति 1 में दिया गया सृष्टि के सृजन का विवरण पहले छः दिनों में से प्रत्येक के लिए “साँझ हुई फिर भोर हुआ” वाक्यांश को दोहराता है। लेकिन जब सातवें दिन की बात आती है, तो इस चक्र में बदलाव आता है। दूसरे शब्दों में, सातवाँ दिन तो एक निरन्तर चलते रहने वाला वह दिन है जिसमें परमेश्वर अपने लिए एक प्रजा को पा लेने का यत्न कर रहा है। वह मानवजाति को अपने साथ एक सम्बन्ध में लेकर आ रहा है, उनके लिए प्रावधान कर रहा है, उनकी रक्षा कर रहा है, उन्हें एक-दूसरे के साथ संगति प्रदान कर रहा है और उन्हें अपनी सृष्टि पर अधिकार दे रहा है।

जैसा कि दस आज्ञाओं में निर्देश दिया गया है कि विश्रामदिन का एक उद्देश्य इस्राएलियों को जीवन के लिए परमेश्वर के सर्वोच्च अभिप्राय के बारे में समझ प्रदान करना था (निर्गमन 20:8-11)। विश्राम करने और चिन्तन करने के द्वारा उन्हें विचार करना था कि परमेश्वर के लोगों के रूप में परमेश्वर की प्रभुता और आशीष में होकर जीने का अर्थ क्या-क्या हो सकता है।

जब यीशु लोगों को अपने पास बुलाता है, तो वह कहता है, “हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा . . . और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे” (मत्ती 11:28-29)। इब्रानियों का लेखक इस विचार को लेता है और घोषणा करता है कि “परमेश्‍वर के लोगों के लिए सब्त का विश्राम बाकी है” (इब्रानियों 4:9)। जो अदन की सुन्दरता में रचा गया और पतन की घटना में नष्ट हो गया, वह एक दिन पुनः स्थापित हो जाएगा जब हम परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करेंगे। अभी हम अपने पापों को यीशु के पास लाने के विश्राम का अनुभव करते हैं जिससे कि हम उनसे छुटकारा पा सकें और अपनी चिन्ताओं को यीशु के पास लाने के विश्राम का अनुभव करते हैं जिससे कि हम उनमें सहायता पा सकें। हम एक दिन अपने सिद्ध परमेश्वर की पवित्रता से भरे हुए एक पुनर्स्थापित संसार में पुनरुत्थान के जीवन के सिद्ध विश्राम का अनुभव करेंगे। हमारे ताकते रहने को सन्तुष्टि प्रदान करने और इस संसार में हमारे सबसे अच्छे और सबसे बुरे दिनों में हमारे हृदयों के ध्यान को फिर से उन्मुख कर देने की आशा यही है। एक दिन हम वास्तव में शान्ति में विश्राम करने पाएँगे।

जैसे-जैसे हम इस भविष्य की ओर बढ़ते जा रहे हैं, तो परमेश्वर का आदर्श ही वह आदर्श होना चाहिए जिसका हम अनुकरण करते हैं। जैसा कि परमेश्वर ने आज्ञा दी है, हमें विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिए स्मरण रखना है और उन सभी बातों पर विचार करने के लिए समय निकालना है जो वह हमारे लिए चाहता है, उसके साथ सहभागिता के जीवन का आनन्द लेने के लिए समय निकालना है और उसके साथ उस कार्य में लगना है जब वह सक्रिय रूप से ऐसे लोगों को पा लेने का यत्न कर रहा है जिसे वह अपनी प्रजा कह सके।      

भजन संहिता 8

10 फेब्रुवारी : तारणदायी विश्वास सहज समाधानी होत नाही

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10 फेब्रुवारी : तारणदायी विश्वास सहज समाधानी होत नाही
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ज्या देशातून ते निघाले होते त्या देशाला उद्देशून हे म्हणणे असते तर त्यांना परत जाण्याची संधी होती. पण आता ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजे स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात…. (इब्री 11:15-16)

विश्वास हा देवानें प्रतिज्ञा केलेल्या भविष्याकडे पाहतो आणि त्याची “उत्कंठा” धरतो. “पण आता ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजे स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात.” यावर क्षणभर विचार करा.

असे बरेच लोक आहेत जे तारणदायी विश्वासाचे स्वरूप बदलून त्याचे कार्यकारी महत्व कमी करतांत, म्हणजे ते त्याची अशी व्याख्या करतांत कीं विश्वास हा जणू मनुष्याच्या स्वतंत्र इच्छेनें घेतलेला निर्णय आहे, ज्यांमध्यें तो कशाची उत्कंठा करतो किंवा कशाचा शोध घेतो यांत कांहीच बदल घडून येत नाहीं. परंतु बायबलमध्यें दिलेल्या महान विश्वासाचा अध्याय, इब्री 11, यांत असलेल्या या वचनाचा मुख्य मुद्दा हा आहे कीं विश्वासाने जगणे आणि मरणे याचा अर्थ नव्या उत्कंठा धरणे आणि नव्या तृप्तींचा शोध घेणे असा होतो.

वचन 14 म्हणते कीं प्राचीन काळातील पवित्र लोक (ज्यांची इब्री 11 मध्ये त्यांच्या विश्वासाबद्दल प्रशंसा केलीं जात आहे)   स्वतःच्या अशा देशाचा शोध करित होते जे ह्या जगापेक्षा वेगळे आहे. आणि वचन 16 म्हणते कीं ते वर्तमान पृथ्वीवरील जीवन जे कांही देऊं करते त्यापेक्षा अधिक चांगल्या गोष्टीची उत्कंठा करित होते : “ते अधिक चांगल्या देशाची म्हणजे स्वर्गीय देशाची उत्कंठा धरतात.”

त्यांना देवानें इतके घट्ट पकडले होते कीं, देवावांचून त्यांना इतर कोणत्याहि गोष्टींत समाधान नव्हते.

तर मग, खरा तारणदायी विश्वास हा आहे: देवाची अभिवचने दुरून पाहणे, आणि आपण जी मूल्ये धरतो त्यांत बदल घडवून आणणे जेणेकरुन आपण जगाने जे काही देऊं केले आहे त्यापेक्षा अधिक देवाच्या अभिवचनांची उत्कंठा धरतो आणि त्यांचा शोध घेतो आणि त्यांवर विश्वास ठेवतो.

9 फरवरी : हियाव के साथ प्रार्थना करना

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9 फरवरी : हियाव के साथ प्रार्थना करना
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“क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है; और जो ढूँढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाएगा … अतः: जब तुम बुरे होकर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा!”  लूका 11:10, 13

जब कोई किशोरी, जिसको अभी-अभी अपना ड्राइविंग लाइसेंस मिला हो, अपनी माँ या पिता से गाड़ी की चाबियाँ माँगती है, तो सामान्यतः वह कोई अस्पष्ट, आधे-अधूरे मन से किया गया निवेदन नहीं होता। इसके विपरीत, उसका मन उसमें लगा हुआ होता है और उसकी इच्छा साफ दिखाई दे रही होती है, मानो वह कह रही हो, “कृपया मुझे गाड़ी की चाबियाँ दें। मुझे गाड़ी चाहिए। मैं गाड़ी ले जाना चाहती हूँ। मुझे यह आपसे अभी चाहिए।”

इसी प्रकार, यीशु अपने चेलों को प्रार्थना में परमेश्वर से निवेदन करने के तरीके सिखाने के लिए जिन क्रियाओं का उपयोग करता है, अर्थात् माँगना, ढूँढना, खटखटाना, वे तीव्र इच्छा, अनुरूपता और स्पष्टता को व्यक्त करते हैं। ऐसा लगता है, जैसे वह कह रहा हो कि मैं चाहता हूँ कि तुम इस प्रकार प्रार्थना करो जिसमें विनयपूर्ण, हठी संकल्प हो। मैं चाहता हूँ कि तुम ढूँढो और ढूँढते रहो, और मैं चाहता हूँ कि तुम आग्रहपूर्ण सत्यता के साथ खटखटाओ।

वह आपको और मुझे हमारे स्वर्गिक पिता के सामने आने और केवल अपनी माँग रखने के लिए आमन्त्रित कर रहा है।

हालाँकि हमें इस बारे में सावधान रहना चाहिए कि हम क्या  माँग रहे हैं। जब हम प्रभु के समक्ष अपने निवेदन प्रस्तुत कर रहे हों, तो उन्हें आत्मा द्वारा संयमित किया जाना चाहिए, जिसे जॉन कैल्विन “परमेश्वर के वचन की लगाम” कहते हैं।[1] दूसरे शब्दों में, बाइबल सिखाती है कि हम उन बातों को पूरे हियाव के साथ माँग सकते हैं जिन्हें परमेश्वर भली और उचित कहता है,  जैसे कि उसकी सहायता, जिससे कि हम अपने शरीरों को जीवित बलिदान के रूप में चढ़ा सकें, सुसमाचार के साक्षी के रूप में बढ़ सकें, या आराधना करने की अपनी अभिलाषा बढ़ा सकें। परन्तु हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम परमेश्वर से चालाकी से काम निकलवा सकते हैं, यह माँग करते हुए कि वह हमें वह सब कुछ दे, जो हमारे जीवन को सुगम या समृद्ध बनाए। यह भी सम्भव है, “माँगो और . . . पाओ नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो” (याकूब 4:3)।

हमें साहसपूर्वक तो माँगना है, किन्तु हमें दीनता के साथ भी माँगना है। हमें परमेश्वर से महान कार्य करने के लिए कहना है, और फिर हमें उसका उत्तर स्वीकार करना है। यह पहले से ही प्रमाणित हो चुका है कि परमेश्वर सदैव हमें वह नहीं देगा जो हम माँगते हैं, तब भी जब हम जो माँगते हैं वह अपने आप में भला और ईश्वरीय हो। हमारी प्रार्थनाएँ सदैव उसकी भली और सम्प्रभु इच्छा के अनुसार नहीं होती हैं। हम सदैव यह निर्धारित नहीं कर सकते कि हमारे लिए क्या भला है, किन्तु परमेश्वर सदैव जानता है कि उसकी सन्तानों के लिए सर्वोत्तम क्या है। इसलिए जब हम परमेश्वर के सामने अपनी विनतियों को लाते हैं, तो हमें उसके वचन को अपने मार्गदर्शक के रूप में देखना चाहिए और स्मरण रखना चाहिए कि वह हमारे जीवन के लिए अपनी योजनाओं को पूरा करने और हमें अपने पुत्र के स्वरूप के अनुरूप बनाने के लिए काम कर रहा है।

इसलिए परमेश्वर के सामने आएँ और केवल अपनी माँग रखें। आपके निवेदन विशिष्ट होने चाहिएँ, साहसिक होने चाहिएँ और परमेश्वर के वचन के अनुकूल होने चाहिएँ और तब आप आशा कर सकते हैं और निस्सन्देह चाहत रख सकते हैं कि परमेश्वर उनका ठीक वैसा ही उत्तर देगा, जैसा उसे उचित जान पड़ता है।
कुलुस्सियों 1:9-12

9 फेब्रुवारी : धन, यौन-क्रीडा आणि सामर्थ्य,यांपेक्षाउत्तम

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9 फेब्रुवारी : धन, यौन-क्रीडा आणि सामर्थ्य,यांपेक्षाउत्तम
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म्हणून आपले धैर्य सोडू नका, त्याचे प्रतिफळ मोठे आहे. (इब्री 10:35)

आपण देवाचे श्रेष्ठत्व ह्या जगाने आपल्याला जें काही देऊ केलें आहे त्यापेक्षा मोठे प्रतिफळ मानावें. जर आपण देवाचे श्रेष्ठत्व मोठे प्रतिफळ मानले नाही तर मग आपणहि नाश होत असलेल्यां लोकांसारखे ह्या जगावर प्रीति करणारे व त्यांच्यासारखे जीवन जगणारे ठरू.

म्हणून, हें जग ज्यां गोष्टींकडे वेड्यासारखे धावते त्यां गोष्टी विचारात घ्या आणि तुलनेने देव किती चांगला आणि स्थिर आहे यावर विचार करा. धन किंवा यौन-क्रीडा किंवा कोणतेहि सामर्थ्य घ्या आणि मृत्यूच्या संबंधात त्यांवर विचार करा. मृत्यू या सर्वांना गिळून टाकील. जर तुम्हीं त्यासाठीं जगत आहां, तर तुम्हाला जास्त काही मिळणार नाही आणि जे थोडके मिळेल तेहि तुम्हीं गमावाल.

पण देवाचे धन कल्पनेपलीकडे उत्तम आहे आणि ते टिकून राहते. ते मृत्यूलाहि पार करते. हे पैशापेक्षा उत्तम आहे कारण देव सर्व पैशाचा स्वामी आहे आणि तो आपला पिता आहे. आम्हीं त्याचे वारस आहोत. “सर्वकाही तुमचे आहे; आणि तुम्हीं ख्रिस्ताचे आहात आणि ख्रिस्त देवाचा आहे” (1 करिंथकरांस 3:22-23). अहाहा!

हे यौन-क्रीडेपेक्षा उत्तम आहे. येशूनें कधीही लैंगिक संबंध ठेवले नाहीत, आणि तो मनुष्यांमध्यें सर्वात सिद्ध आणि पूर्ण मानव होता. यौन-क्रीडा ही छाया आहे — एक प्रतिमा — एका मोठ्या सत्याची, नातेसंबंधाची आणि आनंदाची छाया जिच्या तुलनेंत सर्वात रोमांचक यौन-क्रीडा देखील जांभई दिल्यासारखी वाटेल.

देवाचे प्रतिफळ अधिकार किंवा सामर्थ्य यांपेक्षा उत्तम आहे. सर्वसमर्थ देवाची संतती व्हावे यांपेक्षा कोणतीही मानवी-शक्ती मोठी नाही. “आपण देवदूतांचा न्यायनिवाडा करणार आहोत हे तुम्हांला ठाऊक आहे ना?” (1 करिंथकरांस 6:3). “मी जसा विजय मिळवून आपल्या पित्याबरोबर त्याच्या राजासनावर बसलो, तसा जो विजय मिळवतो त्याला मी आपल्या राजासनावर आपल्याबरोबर बसू देईन ” (प्रकटीकरण 3:21).

या विषयावर आपण आणखी पुष्कळ बोलूं शकतो, कारण हा विषय वाढतच जाईल. जग आपल्याला जे काही देऊं पाहते, देव अधिक श्रेष्ठ आणि सनातन आहे.

कोणतीहि तुलना नाही. देव विजयी होतो – प्रत्येक वेळी. तर प्रश्न हा आहे: तो आमच्या जवळ आहे का? काय आपण या मती गुंग जगाच्या थडग्यांतून जागे होऊन बाहेर निघून जे खरोखर वास्तविक, असीम मौल्यवान आणि सार्वकालिक आहे त्याकडे पाहणार आणि त्यावर विश्वास ठेवणार आणि त्यांत आनंद मानणार आणि त्यावर प्रीति करणार का?

8 फरवरी : हमारा स्वर्गिक मित्र

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8 फरवरी : हमारा स्वर्गिक मित्र
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“तुम में से कौन है कि उसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास जाकर उससे कहे, ‘हे मित्र; मुझे तीन रोटियाँ दे। क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।’ … मैं तुम से कहता हूँ, यदि उसका मित्र होने पर भी उसे उठकर न दे, तौभी उसके लज्जा छोड़कर माँगने के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा। और मैं तुम से कहता हूँ कि माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा।”  लूका 11:5-9

शायद हम सोचें कि परमेश्वर के बारे में बात करना उसके साथ हमारे सम्बन्ध की मुख्य अभिव्यक्ति होती है। तौभी हमारे लिए यह सम्भव है कि परमेश्वर को घनिष्ठता से जाने बिना भी, कि वह वास्तव में है कौन, हम उसके बारे में बात करते रह सकते हैं। परमेश्वर के साथ हमारे व्यक्तिगत सम्बन्ध का प्रमाण प्रायः हमारे सार्वजनिक शब्दों में नहीं, बल्कि हमारी निजी प्रार्थनाओं में पाया जाता है, अर्थात् इसमें नहीं कि हम उसके बारे में  क्या कहते हैं, अपितु इसमें कि हम उस से  क्या कहते हैं। निस्सन्देह, जैसा कि रॉबर्ट मुर्रे मैकाएन ने कहा था, “एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने घुटने टेकते समय जो होता है, वह वास्तव में वही होता है—उससे अधिक वह कुछ नहीं है।”

यहीं पर एक चुनौती भी है! क्योंकि यदि हम सच कहें, तो हमारी कई प्रार्थनाएँ एक गतिहीन या दूरस्थ सम्बन्ध को दर्शाती हैं, न कि उस गतिशीलता को जो एक स्नेह से भरी मित्रता की पहचान होनी चाहिए। परन्तु यदि यह हमारी सच्चाई है, तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि हम इस बात में अकेले नहीं हैं। यीशु के चेले भी अपने स्वर्गिक पिता के साथ घनिष्ठता बढ़ाना चाहते थे, किन्तु उन्हें पता था कि ऐसा कैसे करना सिखाने के लिए उन्हें प्रभु की आवश्यकता है (लूका 11:1)। और उत्तर के रूप में यीशु ने उन्हें वह प्रार्थना सिखाने के बाद, जिसे हम “प्रभु की प्रार्थना” कहते हैं, उन्हें एक मित्र के साहसिक निवेदन के बारे में एक दृष्टान्त सुनाया।

यीशु अपनी कहानी में दोनों व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध को स्थापित करते हुए अपना दृष्टान्त आरम्भ करता है। वह बताता है कि वे मित्र हैं। फिर वह आगे समझाता है कि कैसे पहला व्यक्ति, यात्रा करके आए एक अतिथि का आतिथ्य करने की इच्छा रखते हुए आधी रात को दूसरे के घर रोटी माँगने जाता है। यहाँ यह सम्भावना भी थी कि उसके निवेदन के कारण उसके मित्र का पूरा परिवार जाग जाता। यीशु कहता हैं कि उसके साहसिक हठ के कारण दूसरा व्यक्ति उठता है और पहले व्यक्ति को वह दे देता है, जिसकी उसे आवश्यकता होती है।

यीशु की कहानी से हमें यह समझने की आवश्यकता है कि यदि एक सच्ची मानवीय मित्रता ऐसी उदार प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि जब हम प्रार्थना में परमेश्वर के पास आते हैं, तो वह हमें कभी भी वह वस्तु देने से मना नहीं करेगा जिसकी हमें सच में आवश्यकता है। उस व्यक्ति का निवेदन साहसिक तो है, किन्तु बोझ डालने वाला भी है, तौभी उसका मित्र उसकी सुनता है और उसके हठ के कारण स्वीकार भी करता है। तो फिर हम कितना अधिक आश्वस्त हो सकते हैं कि जब हम सच्चे, दीन हृदय से अपने स्वर्गिक पिता के पास जाएँगे, तो वह उत्तर देने के लिए तत्पर होगा।

परमेश्वर के सामने आश्वासन रखने का अर्थ गुस्ताखी करना नहीं है। इसके विपरीत, यीशु के द्वारा उसने हमारे साथ जो मित्रता स्थापित की है, उसके कारण हम उसके सिंहासन के सामने हियाव रख सकते हैं। यीशु के कारण हम अपने सृष्टिकर्ता से एक घनिष्ठ मित्र के समान “लज्जा छोड़कर” बात कर सकते हैं। कितना अद्‌भुत विचार है यह! परमेश्वर के लिए कोई भी समय आधी रात का समय नहीं होता और न ही कभी ऐसा क्षण आएगा, जब हमारे मित्र के रूप में उसके पास जाने से उसे असुविधा होगी। हमें केवल खटखटाना है।

इफिसियों 1:15-23