ArchivesAlethia4India

9 जानेवारी : फक्त थोडा वेळ

Alethia4India
Alethia4India
9 जानेवारी : फक्त थोडा वेळ
Loading
/

आपल्या सार्वकालिक गौरवांत यावें म्हणून ज्यानें ख्रिस्तामध्यें तुम्हांला पाचारण केलें तो सर्व कृपेचा देव तुम्हीं थोडा वेळ दु:ख सोसल्यावर, स्वतः तुम्हांला पूर्ण, दृढ व सबळ करील. (1 पेत्र 5:10)

आमच्या दैनंदिन जीवनांतील दु:ख आणि सर्वसामान्य ताणतणाव यांमुळें आपण कधीकधी आरोळी मारतो , “हे देवा, आणखी किती काळ? आज मला ज्यां वेदना होत आहेत, त्यांपलीकडें मीं पाहू शकत नाहीं. उद्याचा दिवस आपणाबरोंबर काय घेऊन येईल? त्यां दु:खांत सुद्धा तूं मजबरोंबर असशील का?”

हा प्रश्न अत्यंत महत्वाचा आहे, कारण येशूनें म्हटलें, “जो शेवटपर्यंत टिकाव धरून राहील तोच तारला जाईल” (मार्क 13:13). “ज्यांचा नाश होईल अशा ‘माघार घेणार्‍यांपैकीं” असणे हा विचारहि डोक्यांत येता आपण थरथरतो (इब्री 10:39). आम्हीं “तळ्यांत-मळ्यांत” चा बालिश खेळ खेळत नाहीये. देवाच्या भावी कृपेवर आमच्या विश्वासासाठीं दुःख हा एक भीतिजनक अडथळा आहे.

म्हणूनच, पेत्राला दु:खी व कष्टी झालेंल्या ख्रिस्ती विश्वासणाऱ्यांना पुढील अभिवचन देतांना ऐकणें मोठे सांत्वन देणारी गोष्ट आहे, आपल्या सार्वकालिक गौरवांत यावें म्हणून ज्यानें ख्रिस्तामध्यें तुम्हांला पाचारण केलें तो सर्व कृपेचा देव तुम्हीं थोडा वेळ दु:ख सोसल्यावर, स्वतः तुम्हांला पूर्ण, दृढ व सबळ करील.” (1 पेत्र 5:10).

आपल्याला दिलेलीं ही खात्री कीं तो आमच्या सहनशीलतेच्या पलीकडे विलंब करणार नाहीं, आणि ही कीं आपण आपल्यांत असलेल्या ज्या वैगुणांवर शोक करितो ते तो नाहींशी करील, आणि ही कीं प्रारंभापासून जे विस्कटलेले आहें ते सर्वकांही तो सर्वकाळासाठीं स्थापित करेल – ही खात्री “सर्व कृपेचा देव” ह्याच्याकडून देण्यांत आलेली आहें.

देव ‘थोडक्या कृपेचा देव’ नाहीं – म्हणजे गतकाळाच्या कृपेप्रमाणे. तर तो “सर्व कृपेचा देव” आहे — आणि त्यांत भावी कृपेचा सर्व अमर्याद व अक्षय साठा समाविष्ट आहे जिच्यांत आपल्याला शेवटपर्यंत टिकाव धरून राहणे अगत्याचें आहे.

भावीकाळांत होणाऱ्या त्या कृपेवरील विश्वास, जिला गतकाळांत झालेल्या कृपेचे स्मरण ठेऊन दृढ केलें जातें, जीवनाकडे जाणाऱ्या अरुंद आणि कठीण मार्गावर टिकाव धरून राहण्याची गुरुकिल्ली किंवा सूत्र आहे.

8 जनवरी: कड़वाहट से जूझना

Alethia4India
Alethia4India
8 जनवरी: कड़वाहट से जूझना
Loading
/

“अरामी लोग दल बाँधकर इस्राएल के देश में जाकर वहाँ से एक छोटी लड़की बन्दी बनाकर ले आए थे और वह नामान की पत्नी की सेवा करती थी। उसने अपनी स्वामिनी से कहा, ‘यदि मेरा स्वामी शोमरोन के भविष्यद्वक्ता के पास होता, तो क्या ही अच्छा होता! क्योंकि वह उसको कोढ़ से चंगा कर देता।’”  2 राजाओं 5:2-3

पीड़ा अपने आप में किसी व्यक्ति को परमेश्वर के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध में नहीं ले जाती। जो लोग परमेश्वर का वचन सुनते तो हैं परन्तु उस पर विश्वास के साथ प्रत्युत्तर नहीं देते, उनके समान हम भी जब विश्वास और आशा के बिना पीड़ा का सामना करते हैं, तो हम कड़वाहट से भर जाएँगे, क्योंकि हमारा हृदय परमेश्वर के प्रति नरम होने के विपरीत कठोर हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, पीड़ा हमें या तो परमेश्वर की ओर भागने पर बाध्य कर देगी या उससे दूर कर देगी। परखे जाने पर हमें अपने आप से यह पूछना चाहिए, “क्या यह परीक्षा मुझे कड़वा और कठोर बना रही है, या यह मुझे प्रेमपूर्ण और कोमल बना रही है?”

2 राजाओं की पुस्तक के मध्य में, राजाओं और भविष्यद्वाक्ताओं की कहानियों के बीच, एक छोटी इस्राएली लड़की के उदाहरण के माध्यम से हम बहुत बड़ी व्यथा से सामना होने पर कोमलता और दीनता का एक असाधारण चित्र देखने पाते हैं। अरामी लोग एक आक्रमण के समय इस छोटी लड़की को बन्दी बनाकर ले आए थे; वे उसे उसके परिवार और इस्राएल से दूर ले गए थे और उसे एक अरामी सेनाध्यक्ष नामान की सेवा करने के लिए बाध्य किया गया था। उस छोटी बच्ची और उसके परिवार के लिए यह एक अति-अकल्पनीय त्रासदी थी!

फिर भी, उसकी इतनी अधिक पीड़ा में भी हम उसके कोमल हृदय की एक झलक पाते हैं। यह जानने पर कि उसके स्वामी को कुष्ठ रोग है, इस बच्ची ने नामान की पत्नी को बताया कि वह कैसे ठीक हो सकता है। यदि उसने अपने आप को कड़वाहट से भरने दिया होता, तो जिस समय घर में यह बात फैली थी कि उसका स्वामी बीमार है, वह कहती कि अच्छा हुआ, यह इसी के लायक था।  परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। वह अपने शत्रु के लिए सबसे उत्तम बात चाह रही थी, न कि सबसे बुरे होने की आशा कर रही थी। यह एक उल्लेखनीय बात है। वह ऐसा कैसे कर पाई थी? क्योंकि सम्भवतः अपने खालीपन और अपने परिवार से अलग हो जाने के दुख से सामना होने पर वह बार-बार अपने प्रेममय परमेश्वर और उसकी प्रतिज्ञाओं की ओर देखती होगी।

जब हम पीड़ा से होकर जा रहे हों और जब हम उन लोगों की सेवा करना चाहते हों जो गम्भीर यातनाओं में हैं, तो हमें एक कोमल और खुले हृदय को विकसित करना नहीं भूलना चाहिए। क्या ऐसा करना सरल होगा? कदापि नहीं! किन्तु परमेश्वर की विश्वासयोग्यता इतनी विस्तृत, इतनी व्यापक है, कि वह हमें हमारी सबसे तीव्र पीड़ा में भी सहारा दे सकती है। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में परमेश्वर की ओर मुड़ें और उसकी विश्वासयोग्यता और प्रावधान द्वारा शान्ति प्राप्त करें। ऐसा करने पर आप “उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें जो किसी प्रकार के क्लेश में हों” (2 कुरिन्थियों 1:4)।

2 कुरिन्थियों 5:6-21

8 जानेवारी: जे तुम्हीं हरवूं शकत नाहीं ते मिळवां

Alethia4India
Alethia4India
8 जानेवारी: जे तुम्हीं हरवूं शकत नाहीं ते मिळवां
Loading
/

येशूनें त्यांच्याकडे निरखून पाहून म्हटलें, “मनुष्यांना हें अशक्य आहे, परंतु देवाला नाहीं; ‘देवाला सर्व कांहीं शक्य आहे.”

(मार्क 10:27)

येथें जागतिक दर्जाचें ख्रिस्ती होण्यासाठीं आणि आंतरराष्ट्रीय पातळीवर सुवार्ता प्रसाराच्या कामासाठीं स्वतःला समर्पित करण्यासाठीं येशूपासून दोन मोठ-मोठे उत्तेजनं आहेत. एक तर पाठवलेलें किंवा पाठवणारे म्हणून.

1. मनुष्यांना अशक्य असणारी प्रत्येक गोष्ट देवाला शक्य आहे (मार्क 10:27). मनानें कठोर असलेल्या पापीजनांचे मन-परिवर्तन हे देवाचे कार्य आहे आणि ते त्याच्या सार्वभौम योजनेनुसार होईलच. आपल्या दुर्बळपणामुळें आपल्याला घाबरण्याची किंवा खचून जाण्याची गरज नाहीं. युद्ध परमेश्वराचे आहे आणि तोंच विजय देईल.

2. ख्रिस्त आमच्या वतीनें काम करेल असें अभिवचन तो देतो, आणि तो आपल्यासाठीं अशा रीतीनें सर्वकांही असेल कीं, जेव्हां सुवार्तिक म्हणून आपलें जीवन संपेल, तेव्हां आपण खूप कांही त्याग केला आहें असें आपण म्हणूं शकणार नाहीं (मार्क 10:29-30).

जेव्हां आपण सुवर्तेचे मिशनरी या नात्यानें त्याचे नियम पाळतो तेव्हां आपल्याला समजून येतें कीं या कार्यामुळें उद्भवणारें वेदनादायक दुष्परिणाम हें सुद्धा आमच्या कल्याणासाठींच कार्य करतात. आपले आध्यात्मिक आरोग्य आणि आपला आनंद शंभरपटीने वाढतो. आणि जेव्हां आपण मरतो त्यावेळीं आपण खरें मरण मरत नाहीं. आपल्याला सार्वकालिक जीवन प्राप्त होतें.

मीं तुम्हांला असें विनवित नाहीं कीं तुम्हीं ख्रिस्तासाठीं तुमचें धैर्य आणि बलिदान व्यर्थ लेखावें. मीं तुम्हांला इतकेंच विनवितों कीं तुम्हांकडे असलेल्या सर्व गोष्टींचा त्याग करा, म्हणजे तुम्हांला तुमच्या खोलवर असलेल्या आंतरिक इच्छांना तृप्त करणारे जीवन मिळेल. मीं तुम्हांला विनवितों कीं राजांचा जो राजा त्याच्या सेवेंसाठीं उभे राहण्याच्या श्रेष्ठत्वामुळें तुम्हीं सर्व गोष्टीं केरकचरा अशा लेखा. मीं तुम्हांला विनवितों कीं तुम्हीं दुकानांतून विकत घेतलेल्या तुमच्या चिंध्या काढून टाका आणि देवाच्या राजदूतांचे वस्त्र धारण करा.

तुमचा छळ आणि उपासमार होईल याची मीं तुम्हांला खात्री देतो- परंतु त्यानंतर येणारा आनंद लक्षात ठेवा! “नीतिमत्त्वाकरितां ज्यांचा छळ झाला आहें ते धन्य, कारण स्वर्गाचें राज्य त्यांचे आहे” (मत्तय 5:10).

8 जानेवारी 1956 रोजी, जिम इलियट आणि त्यांच्याबरोंबर काम करणारे चार मिशनरी सहकारी जेव्हां साठ लोकसंख्या असलेल्या इक्वाडोरच्या वाओरानी आदिवासी जमातीपर्यंत सुवार्ता पोहोचवण्याचा प्रयत्न करित होतें तेव्हां त्या जमातीच्या पाच जणांनी त्या सर्वांना जिवें मारलें.

चार तरुण स्त्रियांनी आप-आपलें नवरें गमावलें आणि नऊ मुलांनी आप-आपलें वडील गमावलें. एलिझाबेथ इलियटने तिच्या पुस्तकांत लिहिलें कीं जगानें या घटनेला भयावह शोकांतिका म्हटलें. नंतर ती पुढें लिहिते , “जगानें जिम इलियटच्या सैद्धांतिक विश्वास कथनाच्या दुसर्‍या खंडाचें सत्य ओळखलेलें नाहीं: ‘जो मनुष्य अशी गोष्ट  मिळविण्यासाठीं जी तो कधीच हरवूं शकत नाहीं अशा गोष्टीचा त्याग करतो जी तो सांभाळू शकत नाहीं, तो मूर्ख असूच शकत नाहीं.'”

7 जनवरी: सुसमाचार की अभिव्यक्ति

Alethia4India
Alethia4India
7 जनवरी: सुसमाचार की अभिव्यक्ति
Loading
/

“केवल इतना करो कि तुम्हारा चाल–चलन मसीह के सुसमाचार के योग्य हो।”  फिलिप्पियों 1:27

प्रति दिन . . . जिस तरह से हम कपड़े पहनते हैं, जिस तरह से हम मुस्कुराते हैं या गुस्सा करते हैं, जिस तरह से हमारा चाल-चलन होता है, हम जो बोलते हैं और हमारे बोलने का लहजा, उसके द्वारा हम सदैव अपने आस-पास के लोगों को बताते रहते हैं कि कौन सी बात वास्तव में महत्त्व रखती है और जीवन वास्तव में क्या है।

मसीहियों के लिए ऐसी अभिव्यक्तियाँ सुसमाचार के अनुरूप होनी चाहिए। इसलिए पौलुस ने फिलिप्पियों को उनके विश्वास और उनके व्यवहार, अर्थात उनके द्वारा अपनाए गए विश्वास वचन और उनके द्वारा प्रदर्शित आचरण के बीच की खाई को पाटने का बुलावा दिया। आज के समय में हमारे लिए मसीह की बुलाहट इससे भिन्न नहीं है। फिर भी, चाहे हम अपने विश्वास में कितने भी परिपक्व क्यों न हों और हम इस खाई को कितना भी क्यों न पाट लें, कुछ न कुछ उससे बढ़कर करने की आवश्यकता सदा बनी रहती है।

पौलुस का वाक्यांश “तुम्हारा चाल-चलन” यूनानी भाषा के क्रिया शब्द politeuesthe से आया है, जिसका अनुवाद अंग्रेजी की NIV बाइबल “तुम्हारा आचरण” के रूप में करती है। इस शब्द का उद्‌गम polis शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है “नगर,” और यही हमें पुलिस (police) और राजनीति (politics) जैसे अन्य शब्द प्रदान करता है। बहुत वास्तविक अर्थों में, पौलुस मसीही नागरिकता और आचरण को सम्बोधित कर रहा है। जबकि हम अपने आप को परमेश्वर के नगर के वासी समझते हैं, तब हम यह सीखने पाते हैं कि उस दूसरे नगर, अर्थात मनुष्य के नगर में परदेसी और राजदूत के रूप में रहने का क्या अर्थ है। जब हम विश्वास और व्यवहार के बीच की खाई को पाटते हैं, तभी अन्य लोगों को उनके साथ किए गए हमारे व्यवहार के द्वारा स्वर्ग का पूर्वाभास मिल सकेगा।

तो हमारे कार्यों से किस तरह की अभिव्यक्ति होनी चाहिए? केवल इतनी कि मसीह का सुसमाचार प्रेम का सुसमाचार है। हम इसे यूहन्ना के शब्दों में इस प्रकार देखते हैं, “प्रेम इसमें नहीं कि हमने परमेश्वर से प्रेम किया, पर इसमें है कि उसने हमसे प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा। हे प्रियो, जब परमेश्वर ने हमसे ऐसा प्रेम किया, तो हमको भी आपस में प्रेम रखना चाहिए” (1 यूहन्ना 4:10-11)। दूसरे शब्दों में, जैसे परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, वैसे ही हमें अपने आस-पास के लोगों से भी प्रेम करना चाहिए। यहाँ तक कि उन लोगों से भी जिन्हें हम या दूसरे लोग अनाकर्षित या अप्रिय मानते हैं, और हमें यह प्रेम आशा और आनन्द के साथ करना चाहिए! प्रेम का यह सन्देश वह चुनौती है जो पौलुस हमें देता है।

केवल तुम्हारे कहे गए शब्दों में ही नहीं,

केवल तुम्हारे द्वारा अंगीकार किए गए कामों में ही नहीं,

परन्तु सबसे अनजानी रीतियों से मसीह प्रकट होता है। [1]

तो आज आप कैसे कपड़े पहनेंगे, आज जब आप मुसकुराएँगे और जब क्रोधित होंगे, आज आपका चाल-चलन कैसा होगा, और आज आपके बोलचाल और उसका लहजा क्या होगा, इन सबके बारे में थोड़ा रुककर सोचें। आप संसार के सामने किस तरह की अभिव्यक्तियाँ प्रदान कर रहे हैं? उन्हें ऐसी होने दें जो प्रेम के सुसमाचार के अनुरूप हों।

1 यूहन्ना 4:7-21

7 जानेवारी : नाकारलेलीं  आणि पुरवलेलीं कृपा

Alethia4India
Alethia4India
7 जानेवारी : नाकारलेलीं  आणि पुरवलेलीं कृपा
Loading
/

आपणांला पुष्कळ संकटांत टिकून देवाच्या राज्यांत जावें लागतें. (प्रेषितांची कृत्ये 14:22)

आंतरिक शक्तीची गरज फक्त रोजच्या ताणतणावानें भरलेल्यां उणीवांतूनच उद्भवत नाहीं, तर वेळोवेळीं येणारी दु:खें आणि संकटें यांतून सुद्धा उद्भवतें. आणि ती संकटें येतांतच.

आपण स्वर्गाच्या वाटेवर असतांना आमच्या भाराक्रांत झालेल्या मनाबरोंबर दु:खाची जोड अटळ आहे. जेव्हां दु:ख येते तेव्हां आपलीं मनें डगमगून खचूं शकतांत आणि जीवनाकडें घेऊन जाणारा अरुंद मार्ग कदाचित कठीण वाटू शकतो. अरुंद रस्ता आणि उंच टेकड्या हेंच स्वतःमध्यें अगदी कठीण असतांत ज्यां जुन्या खटारगाडीच्या शक्तीची मर्यादेपर्यन्त कसोटी घेतांत. पण अशात जर गाडीच नादुरुस्त झालीं तर काय करायचं?

पौलानें त्याच्या जीवनांत असलेल्या काहीं दुःखामुळें हाच प्रश्न उचलून तीनदा ओरड केलीं. त्याच्या शरीरांत असलेल्या काट्याचे पीडानिवारण व्हावें अशी त्यानें विनंती केलीं. पण देवाच्या कृपेच्या ज्यां स्वरूपासाठीं त्यानें विनंती केलीं त्या स्वरूपांत त्याला ती मिळाली नाहीं. तर ती दुसऱ्या स्वरूपांत मिळाली. ख्रिस्तानें उत्तर दिलें, “माझी कृपा तुला पुरे आहे; कारण अशक्तपणातच माझी शक्ती पूर्णतेस येते” (2 करिंथ 12:9).

येथें आपण पाहूं शकतो कीं पीडानिवारण नसलेल्या दुःखात कृपा ही ख्रिस्ताच्या पोषक शक्तीच्या स्वरूपांत दिलीं जातें – म्हणजे आपण असें म्हणूं शकतो कीं ज्यां वर्तुळांत एका स्वरूपाची कृपा नाकारली जातें तेव्हां तिथेंच एका दुसर्‍या स्वरूपाची कृपा पुरवली जातें. आणि पौलानें या भावी कृपेचा पुरेशेपणा लक्ष्यांत घेऊन विश्वासानें असा प्रतिसाद दिला: “म्हणून ख्रिस्ताच्या सामर्थ्याची छाया माझ्यावर राहावी म्हणून मीं विशेषेंकरून आपल्या अशक्तपणाची प्रौढी फार आनंदानें मिरवीन” (2 करिंथ 12:9). 

तर मग, देव अनेकदा “नाकारलेली कृपा” च्या वर्तुळात “पुरवलेली कृपा” ओतून आशीर्वादित करतो.

उदाहरणार्थ, (लेखक त्यांचा अनुभव सांगतात) जुलैच्या एका भयंकर उष्ण दिवशी, आमच्या कारवरील पाण्याचें पंप नादुरुस्त झालें आणि आम्हीं टेनेसी या आंतरराज्यात एका अशा ठिकाणी अडकून बसलो जेथून वीस मैल दूरवर कोणतेंहि शहर नव्हतें.

आमचीं गाडी चांगली चालावी आणि आम्हीं आमच्या गंतव्यस्थानी सुखरूप पोहचावें अशी मीं त्या दिवशी सकाळीच प्रार्थना केलीं होती. पण आता मात्र गाडी पूर्णपणें बंद पडलीं होती. आम्हांला त्रासमुक्त प्रवासाची कृपा नाकारलीं गेलीं. आम्हीं आमच्या गाडीभोंवतीं उभें राहून ये-जा करणाऱ्यांना थांबविण्याचा प्रयत्न केला, पण कोणीच थांबत नव्हतें. मग माझा मुलगा अब्राहम (त्यावेळी सुमारे अकरा वर्षाचा) असें म्हणाला, “बाबा, आपण प्रार्थना केली पाहिजें.” म्हणून आम्हीं गाडीच्या मागे नतमस्तक झालों आणि देवाला भावी कृपेसाठीं– म्हणजें गरजेच्या वेळीं लागणाऱ्या मदतीसाठीं –प्रार्थना केलीं. प्रार्थना केल्यांवर आम्हीं आमच्या नजरा वर केल्यां, तर पाहिले काय, तर एक पिकअप वाहन समोर एका बाजूला उभें होतें.

त्या वाहनाचा चालक एक मेकॅनिक होता जो काम करण्यासाठीं सुमारे वीस मैल प्रवासांवर होता. तो म्हणाला कीं तो गाडीचा स्पेअर पार्ट घेण्यासाठी शहरांत जायला तयार आहे आणि परत येऊन गाडी दुरुस्त करेल. मीं पण त्याच्याबरोंबर शहरांत गेलों आणि त्याला सुवार्ता सांगण्याची मला संधी मिळाली. जाऊन परत येण्याच्या ह्या प्रवासाला साधारण पाच तास लागले असतील.

तर आमच्या प्रार्थनेच्या ह्या उत्तराबाबंत उल्लेखनीय गोष्ट अशी कीं ते उत्तर ‘नाकारलेल्या प्रार्थनेच्या’ वर्तुळात आलें. आमचा प्रवास सुखरूप आणि त्रासमुक्त व्हावा अशी आम्हीं प्रार्थना केलीं होतीं. देवानें आम्हांला संकटांत पाडलें. पण जिथें एक कृपा नाकारली गेलीं, तिथें त्यानें आम्हांला एक दुसरी कृपा पुरवलीं. आणि जी कृपा माझ्यासाठीं, त्या अविश्वासू मेकॅनिकसाठीं आणि हे सर्व पाहत असलेल्या माझ्या अकरा वर्षांच्या मुलांच्या विश्वासासाठीं सर्वोत्तम होती त्या कृपेसाठीं मीं देवाच्या बुद्धीवर विश्वास ठेवायला शिकूं  लागलों.

आपल्याला यांत आश्चर्य वाटू नये कीं ज्यां दुःखांपासून देवानें आपणांस सुखरूप ठेवावें अशी प्रार्थना आपण त्याला केलीं होती, तो आम्हांला नेमक्या त्यांच दुःखांत पाडून आपणांला एका मागून एक अशी अद्भुत कृपा पुरवितो. आपल्या कल्याणासाठीं आणि त्याच्या गौरवासाठी त्याची कृपा कधीं आणि कशी द्यावीं हे त्याला चांगले कळते. 

6 जनवरी: परमेश्वर के वचन को संजोना

Alethia4India
Alethia4India
6 जनवरी: परमेश्वर के वचन को संजोना
Loading
/

“हे मेरे पुत्र, मेरी बातों को माना कर, और मेरी आज्ञाओं को अपने मन में रख छोड़। मेरी आज्ञाओं को मान, इससे तू जीवित रहेगा, और मेरी शिक्षा को अपनी आँख की पुतली जान; उनको अपनी उँगलियों में बाँध, और अपने हृदय की पटिया पर लिख ले।”  नीतिवचन 7:1-3

जब मुझे भूख लग रही हो तब खाने के सामान की खरीदारी करना मेरे लिए जोखिम भरी बात होती है। मुझे लगता है कि मैं खाने की ऐसी चीजें खरीदने के लिए प्रलोभित हो जाता हूँ, जो सामान्य परिस्थितियों में मुझे कदापि पसन्द न आएँ। परन्तु मैं अकेला ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ, राजा सुलैमान के अनुसार: “सन्तुष्ट होने पर मधु का छत्ता भी फीका लगता है, परन्तु भूखे को सब कड़वी वस्तुएँ भी मीठी जान पड़ती हैं” (नीतिवचन 27:7)।

यही सिद्धान्त पवित्रता की हमारी खोज पर भी लागू हो सकता है। आत्मिक रूप से भूखे रहकर अपने दिन बिताना एक वास्तविक संकट है, क्योंकि हमने परमेश्वर के वचन को भोजन के रूप में अच्छे से खाया नहीं है।

यदि हम अपनी पवित्रता बनाए रखने के लिए कोई सार्थक प्रयास करने जा रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि हम न केवल परमेश्वर के वचन को पढ़ें; किन्तु उसे संजो कर भी रखें।  जब सुलैमान, इस्राएल का वह राजा जिसे परमेश्वर ने ऐसी बुद्धि दी जो सबसे बढ़कर थी (1 राजाओं 3:3-14), अपने बेटे से कहता है कि उसके वचनों को “माना कर,” उन्हें “मन में रख छोड़,” उन्हें “अपनी आँख की पुतली जान,” उन्हें “बाँध” रख, और उन्हें अपने हृदय पर “लिख ले,” तो वह ऐसी भाषा का प्रयोग करता है, जो परमेश्वर के वचन को संजोने के भाव तक पहुँचा देती है।

परमेश्वर के वचन को इस तरह से समझने के लिए हमें बाइबल का उपयोग अध्ययन किए जाने वाली किसी पाठ्यपुस्तक, या तर्कों के लिए प्रमाण-पत्रों की किसी पुस्तक, या फिर एक प्रतिज्ञा की किसी पुस्तक से कहीं बढ़ कर करना होगा, जिन्हें हम कभी-कभार ही देखते हैं। परमेश्वर के वचन को संजोने के लिए हमें भजनकार के उस दृष्टिकोण की खोज करने की आवश्यकता है, जो अपने समय के घमण्डियों और ठट्ठा करने वालों से अपने आप को दूर रखते हुए परमेश्वर के साथ चलने वाले व्यक्ति के बारे में यों कहता है, “वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात दिन ध्यान करता रहता है” (भजन संहिता 1:2)।

 परमेश्वर के वचन से प्रसन्न रहने, अर्थात उसे अपने जीवन को चलाने और मार्गदर्शन करने देने, तथा पवित्रता के लिए सरगर्मी रखने के बीच एक सीधा सम्बन्ध है। यदि हम पवित्रशास्त्र को संजोने में विफल रहते हैं, तो प्रश्न यह नहीं है कि क्या  हम पवित्रता के सन्दर्भ में ठोकर खाएँगे या नहीं,  परन्तु प्रश्न यह है कि ऐसा कब  होगा।

हममें से प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में छिपे रहने का स्थान देकर अपनी चाल को शुद्ध रख सकता है (भजन संहिता 119:9)। क्या आपने पवित्रशास्त्र को कण्ठस्थ करने की कोई योजना बनाई है? मैं आपको प्रोत्साहित करना चाहता हूँ कि आप बाइबल के किसी एक पद को स्मरण करने का संकल्प लें, चाहे आप हर दूसरे दिन, प्रतिदिन, साप्ताहिक रूप से या जैसे भी ऐसा करना चाहें। एक योजना बनाएँ और उस पर टिके रहें।

परमेश्वर के वचन का आनन्द लें और सन्तुष्ट रहें। पवित्रशास्त्र को संजोएँ और पवित्र बनें।

     भजन संहिता 119:1-16

6 जानेवारी:

Alethia4India
Alethia4India
6 जानेवारी:
Loading
/

आपण खर्‍या अंतःकरणानें……जवळ येऊं. (इब्रीलोकांस पत्र 10:22)

या शास्त्रपाठांत आपल्याला जी आज्ञा दिलीं आहें ती म्हणजे आपण देवाजवळ यावें. इब्रीलोकांस पत्र लिहिण्या मागे लेखकाचा महान उद्देश्य हाच आहे कीं आपण देवाजवळ यावें, कीं त्याच्याबरोंबर आपली सहभागिता असावीं, कीं आपण देवापासून कोडगे झालेल्या अशा ख्रिस्ती जीवनांत स्वस्थ होऊन बसू नये.

जवळ येण्याची ही क्रिया शारीरिक क्रिया नाहीं. हे स्वर्गापर्यंत पोहंचण्यासाठीं स्वतःच्या कर्तृत्वानें बाबेलचा बुरुज बांधावा असें ते नाहीं. हे मुळांत चर्चच्या इमारतीच्या आंत जावें असें नाहीं. किंवा उपदेशानंतर पुल्पिट समोर जाऊन उभें राहावें असेंहि ते नाहीं. तर ही अंत:करणांत होणारी अदृश्य क्रिया आहे. ही एक अशी क्रिया आहे जीं तुम्हीं अगदी शांतपणे उभे असतांना, किंवा हॉस्पिटलच्या बेडवर आजारी पडलेलें असतांना किंवा कामावर जात असतांना ट्रेन किंवा बसमध्यें करूं शकता.

सुवार्तेचा हांच केंद्रबिंदू आहे, तिचें मर्म आहे – गेथशेमाने बाग आणि उत्तम शुक्रवार याचविषयी आहे – कीं देवानें आपल्याला स्वतःच्या जवळ आणण्यासाठीं अद्भुत आणि मोलवान अशी महत्कृत्यें केलीं आहेत. त्यानें आपल्या पुत्राला दु:ख व मरण सोसण्यासाठीं पाठवलें आहें, जेणेंकरून त्याच्याद्वारें आपण जवळ यावें. त्यानें तारणाच्या महान योजनेंत जे सर्व केलें तें आपण जवळ यावें म्हणून केलें. आणि ती जवळीक आपल्या आनंदासाठी आणि त्याच्या गौरवासाठीं आहे.

त्याला आमची गरज नाहीं. आपण त्याच्यापांसून विभक्त झालों तरी तो निराश्रित किंवा दरिद्री होत नाहीं. त्रिएकतेच्या परिपूर्ण सहवासांत उल्हासित राहण्यासाठीं त्याला आपली गरज नाहीं. परंतु आपण पापीं असून सुद्धा त्यानें त्याच्या पुत्राद्वारें आपल्याला एका वास्तविक जगांत म्हणजें स्वतःच्या सान्निध्यांत जिथें आपला आत्मा सर्वस्वी आणि सर्वकाळासाठीं तृप्त होऊं शकतो, फुकट प्रवेश देऊन आपणांवर मोठी दया दाखवलीं. “तुझ्या सान्निध्यांत पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातांत सौख्यें सदोदित आहेत” (स्तोत्र 16:11).

तुम्हीं हा लेख वाचत असतांच तुमच्यासाठीं ही देवाची इच्छा आहे. म्हणूनच ख्रिस्त मरण पावला: यासाठीं कीं तुम्हीं देवाजवळ यावें.

5 जनवरी : हमारा महान महायाजक

Alethia4India
Alethia4India
5 जनवरी : हमारा महान महायाजक
Loading
/

“क्योंकि हर एक महायाजक मनुष्यों में से लिया जाता है और मनुष्यों ही के लिए उन बातों के विषय में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, ठहराया जाता है कि भेंट और पाप बलि चढ़ाया करे . . . यह आदर का पद कोई अपने आप से नहीं लेता, जब तक कि हारून के समान परमेश्वर की ओर से ठहराया न जाए। वैसे ही मसीह ने भी महायाजक बनने की बड़ाई अपने आप से नहीं ली, पर उसको उसी ने दी, जिसने उससे कहा था, ‘तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे उत्पन्न किया है’; इसी प्रकार वह दूसरी जगह में भी कहता है, ‘तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिए याजक है।’”  इब्रानियों 5:1, 4-6

याजक पद और बलिदान पद्धति की अवधारणा हमारे समकालीन संसार से बहुत भिन्न है, किन्तु इसे समझना मसीही जीवन का आधार है। पुराने नियम के इस्राएल में पशु बलि की प्रथा कोई मानव निर्मित व्यवस्था नहीं थी जिसे परमेश्वर तक पहुँचने और मनुष्यों को उसके लिए स्वीकार्य बनाए जाने के निरर्थक प्रयास के रूप में ठहराया गया था। इसके विपरीत, इसका उद्देश्य परमेश्वर के वाचा के लोगों को उसके चरित्र, उसकी अपेक्षाओं और उसके छुटकारे की योजना की भव्यता को समझने में सहायता करना था (और वह आज भी इस तरह से हमारी सहायता कर सकती है)। इसके सभी सूक्ष्म विवरणों के द्वारा परमेश्वर अपने लोगों को प्रभु यीशु मसीह के पूर्ण और सिद्ध कार्य की ओर इंगित कर रहा था, जो उसके लोगों का महान महायाजक और उनकी ओर से चढ़ाए जाने वाले एक सिद्ध बलिदान दोनों के रूप में आने वाला था।

ऐतिहासिक रूप से इस्राएल का महायाजक मूसा के भाई हारून की वंशावली से आया होगा और उसे “अपने भाइयों में प्रमुख” माना जाता होगा (लैव्यव्यवस्था 21:10)। इस व्यक्ति ने उन्हीं सामाजिक परिस्थितियों, दबावों और परीक्षणों का अनुभव किया होगा, जिनका वह प्रतिनिधित्व कर रहा था जिससे उसे उनकी ओर से एक अति-करुणामय मध्यस्थ बनने में सहायता मिली होगी।

तथापि यीशु के आगमन से बहुत पहले हेरोदेस महान और अन्य शासकों ने महायाजकीय नियुक्तियों का ऐतिहासिक रूप भ्रष्ट कर दिया था, जो अपने लिए महायाजकों का चयन स्वयं किया करते थे। वे यह नहीं समझते थे कि महायाजक का पद मनुष्य द्वारा दिया जाने वाला कोई सम्मान नहीं होता अपितु परमेश्वर की ओर से एक बुलावा होता है, जैसा कि हारून के लिए ठहराया गया था। महायाजकों का काम किसी राजनीतिक समूह का प्रतिनिधित्व करना नहीं था; उनका कार्य था परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व स्वयं परमेश्वर के सामने करना।

यही एक कारक है जो यीशु को सबसे उत्कृष्ट महायाजक बनाता है: उसके महायाजक बनने की महिमा में उसकी पहल सम्मिलित नहीं थी; इसके विपरीत, उसे उसके पिता द्वारा ठहराया गया था। उसने स्वीकार किया कि “यदि मैं आप अपनी महिमा करूँ, तो मेरी महिमा कुछ नहीं; परन्तु मेरी महिमा करने वाला मेरा पिता है, जिसे तुम कहते हो कि ‘वह तुम्हारा परमेश्वर है’” (यूहन्ना 8:54)। उसने उन्हीं कठिनाइयों को सिद्धता के साथ सहन किया जिनका हम सामना करते हैं। पापरहित होने के बाद भी वह हमारे पापों के कारण सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समक्ष गया। दीनता की आत्मा में होकर यीशु हमें धार्मिकता की ओर प्रेरित करता है। क्योंकि उसने वास्तव में सिद्ध बलिदान चढ़ाया, क्योंकि वह स्वयं सिद्ध बलिदान था, इस कारण आप और मैं अभी और सदा के लिए परमेश्वर की उपस्थिति का आनन्द उठा सकते हैं। कोई भी पाप या पीड़ा, कोई भी निराशा या हताशा, इस महिमामय वास्तविकता को नहीं बदल सकती कि आपके पास सदा के लिए एक याजक है, और इसलिए आपके पास सदा के लिए उसके साथ एक स्थान है।

 इब्रानियों 4:14-5:10

5 जानेवारी: आमचा नांगी नसलेला शत्रू

Alethia4India
Alethia4India
5 जानेवारी: आमचा नांगी नसलेला शत्रू
Loading
/

जे तुम्हीं आपल्या अपराधांनी व देहस्वभावाची सुंता न झाल्यानें मेलेले होतां त्या तुम्हांस त्यानें त्याच्याबरोंबर जिवंत केलें, त्यानें आपल्या सर्व अपराधांची क्षमा केलीं; आपल्याविरुद्ध असलेलें म्हणजे आपल्याला प्रतिकूल असलेलें विधींचे ऋणपत्र त्यानें खोडलें व वधस्तंभाला खिळून त्यानें ते रद्द केलें. त्यानें सत्ताधीशांना व अधिकार्‍यांना नाडून त्यांच्याविरुद्ध वधस्तंभावर जयोत्सव करून त्यांचे उघडउघड प्रदर्शन केलें. (कलस्सैकरांस 2:13-15)

‘ख्रिस्ताबरोंबर एक होणे’ ह्याचा विश्वासनाऱ्यांसाठीं खूप मोठा बदल घडून येतो याचें कारण म्हणजें हे कीं ख्रिस्तानें कॅल्व्हरीच्या वधस्तंभावर सैतानावर निर्णायक म्हणजें अंतिम विजय मिळविला. त्यानें सैतानाला ह्या जगातून बाहेर काढून टाकलें नाहीं, तर त्यानें त्याच्या हातांतून मरणदंडाचे शस्त्रच हिसकावून त्याला कायमचे नि:शस्त्र केलें.

आता तो विश्वासणाऱ्यांवर अशा कोणत्याहि पापाचा आरोप लावू शकत नाहीं ज्याची क्षमा नाहीं. तोच एक असा आरोप आहे जो आपला नाश करूं शकतो. आणि म्हणूनच, तो आपला पूर्णपणे विनाश करण्यांस असमर्थ आहे. तो आपल्याला शारीरिक इजा करूं शकतो व आपल्या भावना दुखावू शकतो – इतकेंच काय, तर तो आपल्याला जिवें सुद्धा मारू शकतो. तो आपल्याला परीक्षेंत पाडू शकतो आणि लोकांना आपल्याविरुद्ध चिथावू शकतो. पण तो आपला नाश करूं शकत नाही.

कलस्सैकरांस 2:13-15 मधील निर्णायक विजय “आपल्या विरुद्ध असलेलें म्हणजे आपल्याला प्रतिकूल असलेलें विधींचे ऋणपत्र” वधस्तंभाला खिळिलें गेलें या वस्तुस्थितीमुळे झाला आहे. सैतानाने विधींच्या त्या ऋणपत्राला आपल्याविरुद्ध मुख्य आरोपपत्र बनविलें होते. पण तो स्वर्गाच्या न्यायसभेंत सादर करू शकेल असें कोणतेही आरोपपत्र आता त्याच्याकडें नाहीं. एक गोष्ट जी त्याला आपल्या विरोधांत प्रमुखपणे करायची होती तीच करण्यांस आता तो असहाय्य आहे: आम्हांला मरणदंडास पात्र ठरविणें. आता तो तसें शकत नाही. ख्रिस्तानें आमचा मरणदंड स्वतःवर घेतला. सैतान नि:शस्त्र झाला.

हे आपण आणखी एका पद्धतीने मांडू शकतो, ते म्हणजे इब्रीलोकांस पत्र 2:14-15 मध्ये असलेलें शब्द : “[ख्रिस्त मानव बनला] हेतु हा कीं, मरणावर सत्ता गाजवणारा म्हणजे सैतान, ह्याला मरणानें शून्यवत करावें, आणि जे मरणाच्या भयानें आयुष्यभर दास्याच्या बंधनात होते त्या सर्वांना मुक्त करावें.”

मृत्यू आजहि आपला शत्रू आहे. पण त्याला दुर्बळ करण्यांत आलें आहें. त्या सर्पाचे विष पिळून काढून टाकण्यांत आलें आहें. त्याची प्राणघातक नांगी तोडून टाकण्यांत आली आहें. मरणाची नांगी तर पाप होते, आणि नियमशास्त्राची अट पापाचे बळ होते. परंतु ख्रिस्ताचा धन्यवाद असों ज्यानें नियमशास्त्राच्या अटी पूर्ण केल्या. “अरे मरणा, तुझा विजय कोठें? अरे मरणा, तुझी नांगी कोठें?” (1 करिंथ 15:55).

4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट

Alethia4India
Alethia4India
4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट
Loading
/

“मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ; उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ।”  फिलिप्पियों 4:11-12

हम असन्तोष से भरे समाज में रहते हैं। विज्ञापन हमें ईर्ष्यालु बनाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। यद्यपि वास्तविक समस्या वह समाज नहीं है, जिसमें हम रहते हैं परन्तु हमारे अपने हृदय और मन की स्थिति है। हम उन बातों के द्वारा सन्तुष्टि से बहुत दूर कर दिए जाते हैं, जो हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए शोर मचाती हैं, जैसे कि उपाधियाँ, सम्पत्ति, प्रभाव या प्रसिद्धि। फिर भी, ये सभी और अन्य बहुत-सी ऐसी बातें हमें यह विश्वास दिलाकर कि इतना तो कभी पूरा नहीं पड़ेगा, हमें उसमें आनन्द मनाने की भावना को लूट लेना चाहती हैं, जो हमें परमेश्वर ने दिया है। और इन्हें प्राप्त कर लेने का यह प्रयास कभी खत्म नहीं होता।

यद्यपि पौलुस न केवल यह कह सकता था कि वह सन्तुष्ट था, अपितु यह भी कि वह “जिस दशा में” भी हो, वह उसमें सन्तुष्ट रह सकता है। यही तो वह चीज है, जिसको हर कोई खोज रहा है! तो फिर इसका रहस्य क्या था? यह था प्रभु यीशु मसीह की पर्याप्तता में अपनी व्यक्तिगत पहचान और जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्थापित करना। पौलुस ने प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए धैर्य और लचीलापन बनाए रखने का समर्थन नहीं किया या आत्मनिर्भरता का कोई झूठा सुसमाचार प्रस्तुत नहीं किया। कदापि नहीं, उसका सन्तोष परमेश्वर की इच्छा के आगे अपने हृदय और मन को अधीन करने का परिणाम था, भले ही वह किसी भी परिस्थिति का सामना क्यों न करे।

सब लोग हर प्रकार की परिस्थिति में नहीं रह चुके हैं। सब लोग नहीं जानते कि किसी दूसरे की परिस्थिति में रहना कैसा होता है। परन्तु पौलुस यह जानता था। वह जानता था कि धनवान होना और पोषित होना क्या होता है, और वह जानता था कि निर्धन होना और वंचित रहना क्या होता है। यदि उसका सन्तोष परिस्थितियों का परिणाम होता तो उसका जीवन लगातार उतार-चढ़ाव भरा होता, एक क्षण वह मोहक विलासिता में चूर होता और अगले ही क्षण उस विलासिता की अनुपस्थिति से पूरी तरह पराजित। ऐसी अस्थिर आत्मा ने पौलुस को निष्क्रिय कर दिया होता, जिससे वह मसीह की सेवा करने में असमर्थ हो जाता।

पौलुस सामान्य आवश्यकताओं वाला एक सामान्य व्यक्ति था। रोम की एक कालकोठरी से तीमुथियुस को लिखे एक पत्र में पौलुस ने लिखा कि “मेरे पास शीघ्र आने का प्रयत्न कर . . . बागा . . . और पुस्तकें विशेष करके चर्मपत्रों को लेते आना” (2 तीमुथियुस 4:9, 13)। दूसरों ने उसे छोड़ दिया था और उसके पास कुछ वस्तुओं की घटी थी। हाँ, पौलुस को कपड़े, पुस्तकें और एक साथी चाहिए था। किन्तु वह जानता था कि वह इनके बिना भी ठीक से रह सकेगा, क्योंकि उसकी शान्ति उनसे किसी बड़ी बात में निहित थी।

पौलुस की तरह आपका सन्तोष भी अन्ततः यीशु के साथ आपके मेल किए जाने पर आधारित हो सकता है और ऐसा होना भी चाहिए। पूरी तरह से उसके हो जाने और पूरी तरह से उसके अधिकार के अधीन रहने के अतिरिक्त अन्य सभी महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर दें। जब आप मसीह को जान लेते हैं और जान जाते हैं कि वह कितना अद्‌भुत है, कि वह आपका सब कुछ है, चाँदी से अधिक मूल्यवान है, सोने से अधिक महँगा है, हीरों से अधिक सुन्दर है, और आपके पास जो कुछ भी है, वह उसके तुल्य कुछ भी नहीं है,[1] तब आपका अपनी परिस्थितियों को देखने का तरीका और आपकी सन्तुष्टि का मापदण्ड पूरी तरह से बदल जाएगा।

भजन संहिता 73.