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6 जानेवारी:

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आपण खर्‍या अंतःकरणानें……जवळ येऊं. (इब्रीलोकांस पत्र 10:22)

या शास्त्रपाठांत आपल्याला जी आज्ञा दिलीं आहें ती म्हणजे आपण देवाजवळ यावें. इब्रीलोकांस पत्र लिहिण्या मागे लेखकाचा महान उद्देश्य हाच आहे कीं आपण देवाजवळ यावें, कीं त्याच्याबरोंबर आपली सहभागिता असावीं, कीं आपण देवापासून कोडगे झालेल्या अशा ख्रिस्ती जीवनांत स्वस्थ होऊन बसू नये.

जवळ येण्याची ही क्रिया शारीरिक क्रिया नाहीं. हे स्वर्गापर्यंत पोहंचण्यासाठीं स्वतःच्या कर्तृत्वानें बाबेलचा बुरुज बांधावा असें ते नाहीं. हे मुळांत चर्चच्या इमारतीच्या आंत जावें असें नाहीं. किंवा उपदेशानंतर पुल्पिट समोर जाऊन उभें राहावें असेंहि ते नाहीं. तर ही अंत:करणांत होणारी अदृश्य क्रिया आहे. ही एक अशी क्रिया आहे जीं तुम्हीं अगदी शांतपणे उभे असतांना, किंवा हॉस्पिटलच्या बेडवर आजारी पडलेलें असतांना किंवा कामावर जात असतांना ट्रेन किंवा बसमध्यें करूं शकता.

सुवार्तेचा हांच केंद्रबिंदू आहे, तिचें मर्म आहे – गेथशेमाने बाग आणि उत्तम शुक्रवार याचविषयी आहे – कीं देवानें आपल्याला स्वतःच्या जवळ आणण्यासाठीं अद्भुत आणि मोलवान अशी महत्कृत्यें केलीं आहेत. त्यानें आपल्या पुत्राला दु:ख व मरण सोसण्यासाठीं पाठवलें आहें, जेणेंकरून त्याच्याद्वारें आपण जवळ यावें. त्यानें तारणाच्या महान योजनेंत जे सर्व केलें तें आपण जवळ यावें म्हणून केलें. आणि ती जवळीक आपल्या आनंदासाठी आणि त्याच्या गौरवासाठीं आहे.

त्याला आमची गरज नाहीं. आपण त्याच्यापांसून विभक्त झालों तरी तो निराश्रित किंवा दरिद्री होत नाहीं. त्रिएकतेच्या परिपूर्ण सहवासांत उल्हासित राहण्यासाठीं त्याला आपली गरज नाहीं. परंतु आपण पापीं असून सुद्धा त्यानें त्याच्या पुत्राद्वारें आपल्याला एका वास्तविक जगांत म्हणजें स्वतःच्या सान्निध्यांत जिथें आपला आत्मा सर्वस्वी आणि सर्वकाळासाठीं तृप्त होऊं शकतो, फुकट प्रवेश देऊन आपणांवर मोठी दया दाखवलीं. “तुझ्या सान्निध्यांत पूर्णानंद आहे; तुझ्या उजव्या हातांत सौख्यें सदोदित आहेत” (स्तोत्र 16:11).

तुम्हीं हा लेख वाचत असतांच तुमच्यासाठीं ही देवाची इच्छा आहे. म्हणूनच ख्रिस्त मरण पावला: यासाठीं कीं तुम्हीं देवाजवळ यावें.

5 जनवरी : हमारा महान महायाजक

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5 जनवरी : हमारा महान महायाजक
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“क्योंकि हर एक महायाजक मनुष्यों में से लिया जाता है और मनुष्यों ही के लिए उन बातों के विषय में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, ठहराया जाता है कि भेंट और पाप बलि चढ़ाया करे . . . यह आदर का पद कोई अपने आप से नहीं लेता, जब तक कि हारून के समान परमेश्वर की ओर से ठहराया न जाए। वैसे ही मसीह ने भी महायाजक बनने की बड़ाई अपने आप से नहीं ली, पर उसको उसी ने दी, जिसने उससे कहा था, ‘तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे उत्पन्न किया है’; इसी प्रकार वह दूसरी जगह में भी कहता है, ‘तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिए याजक है।’”  इब्रानियों 5:1, 4-6

याजक पद और बलिदान पद्धति की अवधारणा हमारे समकालीन संसार से बहुत भिन्न है, किन्तु इसे समझना मसीही जीवन का आधार है। पुराने नियम के इस्राएल में पशु बलि की प्रथा कोई मानव निर्मित व्यवस्था नहीं थी जिसे परमेश्वर तक पहुँचने और मनुष्यों को उसके लिए स्वीकार्य बनाए जाने के निरर्थक प्रयास के रूप में ठहराया गया था। इसके विपरीत, इसका उद्देश्य परमेश्वर के वाचा के लोगों को उसके चरित्र, उसकी अपेक्षाओं और उसके छुटकारे की योजना की भव्यता को समझने में सहायता करना था (और वह आज भी इस तरह से हमारी सहायता कर सकती है)। इसके सभी सूक्ष्म विवरणों के द्वारा परमेश्वर अपने लोगों को प्रभु यीशु मसीह के पूर्ण और सिद्ध कार्य की ओर इंगित कर रहा था, जो उसके लोगों का महान महायाजक और उनकी ओर से चढ़ाए जाने वाले एक सिद्ध बलिदान दोनों के रूप में आने वाला था।

ऐतिहासिक रूप से इस्राएल का महायाजक मूसा के भाई हारून की वंशावली से आया होगा और उसे “अपने भाइयों में प्रमुख” माना जाता होगा (लैव्यव्यवस्था 21:10)। इस व्यक्ति ने उन्हीं सामाजिक परिस्थितियों, दबावों और परीक्षणों का अनुभव किया होगा, जिनका वह प्रतिनिधित्व कर रहा था जिससे उसे उनकी ओर से एक अति-करुणामय मध्यस्थ बनने में सहायता मिली होगी।

तथापि यीशु के आगमन से बहुत पहले हेरोदेस महान और अन्य शासकों ने महायाजकीय नियुक्तियों का ऐतिहासिक रूप भ्रष्ट कर दिया था, जो अपने लिए महायाजकों का चयन स्वयं किया करते थे। वे यह नहीं समझते थे कि महायाजक का पद मनुष्य द्वारा दिया जाने वाला कोई सम्मान नहीं होता अपितु परमेश्वर की ओर से एक बुलावा होता है, जैसा कि हारून के लिए ठहराया गया था। महायाजकों का काम किसी राजनीतिक समूह का प्रतिनिधित्व करना नहीं था; उनका कार्य था परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व स्वयं परमेश्वर के सामने करना।

यही एक कारक है जो यीशु को सबसे उत्कृष्ट महायाजक बनाता है: उसके महायाजक बनने की महिमा में उसकी पहल सम्मिलित नहीं थी; इसके विपरीत, उसे उसके पिता द्वारा ठहराया गया था। उसने स्वीकार किया कि “यदि मैं आप अपनी महिमा करूँ, तो मेरी महिमा कुछ नहीं; परन्तु मेरी महिमा करने वाला मेरा पिता है, जिसे तुम कहते हो कि ‘वह तुम्हारा परमेश्वर है’” (यूहन्ना 8:54)। उसने उन्हीं कठिनाइयों को सिद्धता के साथ सहन किया जिनका हम सामना करते हैं। पापरहित होने के बाद भी वह हमारे पापों के कारण सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समक्ष गया। दीनता की आत्मा में होकर यीशु हमें धार्मिकता की ओर प्रेरित करता है। क्योंकि उसने वास्तव में सिद्ध बलिदान चढ़ाया, क्योंकि वह स्वयं सिद्ध बलिदान था, इस कारण आप और मैं अभी और सदा के लिए परमेश्वर की उपस्थिति का आनन्द उठा सकते हैं। कोई भी पाप या पीड़ा, कोई भी निराशा या हताशा, इस महिमामय वास्तविकता को नहीं बदल सकती कि आपके पास सदा के लिए एक याजक है, और इसलिए आपके पास सदा के लिए उसके साथ एक स्थान है।

 इब्रानियों 4:14-5:10

5 जानेवारी: आमचा नांगी नसलेला शत्रू

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5 जानेवारी: आमचा नांगी नसलेला शत्रू
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जे तुम्हीं आपल्या अपराधांनी व देहस्वभावाची सुंता न झाल्यानें मेलेले होतां त्या तुम्हांस त्यानें त्याच्याबरोंबर जिवंत केलें, त्यानें आपल्या सर्व अपराधांची क्षमा केलीं; आपल्याविरुद्ध असलेलें म्हणजे आपल्याला प्रतिकूल असलेलें विधींचे ऋणपत्र त्यानें खोडलें व वधस्तंभाला खिळून त्यानें ते रद्द केलें. त्यानें सत्ताधीशांना व अधिकार्‍यांना नाडून त्यांच्याविरुद्ध वधस्तंभावर जयोत्सव करून त्यांचे उघडउघड प्रदर्शन केलें. (कलस्सैकरांस 2:13-15)

‘ख्रिस्ताबरोंबर एक होणे’ ह्याचा विश्वासनाऱ्यांसाठीं खूप मोठा बदल घडून येतो याचें कारण म्हणजें हे कीं ख्रिस्तानें कॅल्व्हरीच्या वधस्तंभावर सैतानावर निर्णायक म्हणजें अंतिम विजय मिळविला. त्यानें सैतानाला ह्या जगातून बाहेर काढून टाकलें नाहीं, तर त्यानें त्याच्या हातांतून मरणदंडाचे शस्त्रच हिसकावून त्याला कायमचे नि:शस्त्र केलें.

आता तो विश्वासणाऱ्यांवर अशा कोणत्याहि पापाचा आरोप लावू शकत नाहीं ज्याची क्षमा नाहीं. तोच एक असा आरोप आहे जो आपला नाश करूं शकतो. आणि म्हणूनच, तो आपला पूर्णपणे विनाश करण्यांस असमर्थ आहे. तो आपल्याला शारीरिक इजा करूं शकतो व आपल्या भावना दुखावू शकतो – इतकेंच काय, तर तो आपल्याला जिवें सुद्धा मारू शकतो. तो आपल्याला परीक्षेंत पाडू शकतो आणि लोकांना आपल्याविरुद्ध चिथावू शकतो. पण तो आपला नाश करूं शकत नाही.

कलस्सैकरांस 2:13-15 मधील निर्णायक विजय “आपल्या विरुद्ध असलेलें म्हणजे आपल्याला प्रतिकूल असलेलें विधींचे ऋणपत्र” वधस्तंभाला खिळिलें गेलें या वस्तुस्थितीमुळे झाला आहे. सैतानाने विधींच्या त्या ऋणपत्राला आपल्याविरुद्ध मुख्य आरोपपत्र बनविलें होते. पण तो स्वर्गाच्या न्यायसभेंत सादर करू शकेल असें कोणतेही आरोपपत्र आता त्याच्याकडें नाहीं. एक गोष्ट जी त्याला आपल्या विरोधांत प्रमुखपणे करायची होती तीच करण्यांस आता तो असहाय्य आहे: आम्हांला मरणदंडास पात्र ठरविणें. आता तो तसें शकत नाही. ख्रिस्तानें आमचा मरणदंड स्वतःवर घेतला. सैतान नि:शस्त्र झाला.

हे आपण आणखी एका पद्धतीने मांडू शकतो, ते म्हणजे इब्रीलोकांस पत्र 2:14-15 मध्ये असलेलें शब्द : “[ख्रिस्त मानव बनला] हेतु हा कीं, मरणावर सत्ता गाजवणारा म्हणजे सैतान, ह्याला मरणानें शून्यवत करावें, आणि जे मरणाच्या भयानें आयुष्यभर दास्याच्या बंधनात होते त्या सर्वांना मुक्त करावें.”

मृत्यू आजहि आपला शत्रू आहे. पण त्याला दुर्बळ करण्यांत आलें आहें. त्या सर्पाचे विष पिळून काढून टाकण्यांत आलें आहें. त्याची प्राणघातक नांगी तोडून टाकण्यांत आली आहें. मरणाची नांगी तर पाप होते, आणि नियमशास्त्राची अट पापाचे बळ होते. परंतु ख्रिस्ताचा धन्यवाद असों ज्यानें नियमशास्त्राच्या अटी पूर्ण केल्या. “अरे मरणा, तुझा विजय कोठें? अरे मरणा, तुझी नांगी कोठें?” (1 करिंथ 15:55).

4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट

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4 जनवरी: मसीह में सन्तुष्ट
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“मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ; उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ।”  फिलिप्पियों 4:11-12

हम असन्तोष से भरे समाज में रहते हैं। विज्ञापन हमें ईर्ष्यालु बनाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। यद्यपि वास्तविक समस्या वह समाज नहीं है, जिसमें हम रहते हैं परन्तु हमारे अपने हृदय और मन की स्थिति है। हम उन बातों के द्वारा सन्तुष्टि से बहुत दूर कर दिए जाते हैं, जो हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए शोर मचाती हैं, जैसे कि उपाधियाँ, सम्पत्ति, प्रभाव या प्रसिद्धि। फिर भी, ये सभी और अन्य बहुत-सी ऐसी बातें हमें यह विश्वास दिलाकर कि इतना तो कभी पूरा नहीं पड़ेगा, हमें उसमें आनन्द मनाने की भावना को लूट लेना चाहती हैं, जो हमें परमेश्वर ने दिया है। और इन्हें प्राप्त कर लेने का यह प्रयास कभी खत्म नहीं होता।

यद्यपि पौलुस न केवल यह कह सकता था कि वह सन्तुष्ट था, अपितु यह भी कि वह “जिस दशा में” भी हो, वह उसमें सन्तुष्ट रह सकता है। यही तो वह चीज है, जिसको हर कोई खोज रहा है! तो फिर इसका रहस्य क्या था? यह था प्रभु यीशु मसीह की पर्याप्तता में अपनी व्यक्तिगत पहचान और जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्थापित करना। पौलुस ने प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करते हुए धैर्य और लचीलापन बनाए रखने का समर्थन नहीं किया या आत्मनिर्भरता का कोई झूठा सुसमाचार प्रस्तुत नहीं किया। कदापि नहीं, उसका सन्तोष परमेश्वर की इच्छा के आगे अपने हृदय और मन को अधीन करने का परिणाम था, भले ही वह किसी भी परिस्थिति का सामना क्यों न करे।

सब लोग हर प्रकार की परिस्थिति में नहीं रह चुके हैं। सब लोग नहीं जानते कि किसी दूसरे की परिस्थिति में रहना कैसा होता है। परन्तु पौलुस यह जानता था। वह जानता था कि धनवान होना और पोषित होना क्या होता है, और वह जानता था कि निर्धन होना और वंचित रहना क्या होता है। यदि उसका सन्तोष परिस्थितियों का परिणाम होता तो उसका जीवन लगातार उतार-चढ़ाव भरा होता, एक क्षण वह मोहक विलासिता में चूर होता और अगले ही क्षण उस विलासिता की अनुपस्थिति से पूरी तरह पराजित। ऐसी अस्थिर आत्मा ने पौलुस को निष्क्रिय कर दिया होता, जिससे वह मसीह की सेवा करने में असमर्थ हो जाता।

पौलुस सामान्य आवश्यकताओं वाला एक सामान्य व्यक्ति था। रोम की एक कालकोठरी से तीमुथियुस को लिखे एक पत्र में पौलुस ने लिखा कि “मेरे पास शीघ्र आने का प्रयत्न कर . . . बागा . . . और पुस्तकें विशेष करके चर्मपत्रों को लेते आना” (2 तीमुथियुस 4:9, 13)। दूसरों ने उसे छोड़ दिया था और उसके पास कुछ वस्तुओं की घटी थी। हाँ, पौलुस को कपड़े, पुस्तकें और एक साथी चाहिए था। किन्तु वह जानता था कि वह इनके बिना भी ठीक से रह सकेगा, क्योंकि उसकी शान्ति उनसे किसी बड़ी बात में निहित थी।

पौलुस की तरह आपका सन्तोष भी अन्ततः यीशु के साथ आपके मेल किए जाने पर आधारित हो सकता है और ऐसा होना भी चाहिए। पूरी तरह से उसके हो जाने और पूरी तरह से उसके अधिकार के अधीन रहने के अतिरिक्त अन्य सभी महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर दें। जब आप मसीह को जान लेते हैं और जान जाते हैं कि वह कितना अद्‌भुत है, कि वह आपका सब कुछ है, चाँदी से अधिक मूल्यवान है, सोने से अधिक महँगा है, हीरों से अधिक सुन्दर है, और आपके पास जो कुछ भी है, वह उसके तुल्य कुछ भी नहीं है,[1] तब आपका अपनी परिस्थितियों को देखने का तरीका और आपकी सन्तुष्टि का मापदण्ड पूरी तरह से बदल जाएगा।

भजन संहिता 73.

4 जानेवारी: अपूर्ण ख्रिस्ती लोकांसाठीं आशा

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4 जानेवारी: अपूर्ण ख्रिस्ती लोकांसाठीं आशा
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कारण पवित्र होणार्‍यांना त्यानें एकाच अर्पणानें सर्वकाळचें पूर्ण केलें आहें. (इब्री 10:14)

हा शास्त्रलेख आपल्यांसारख्या अपूर्ण पाप्यांसाठीं उत्तेजनानें भरलेला आहे, आणि त्यांत पवित्र जीवनासाठीं विपुल प्रेरणा आहे.

म्हणजेंच तुम्हीं तुमच्या स्वर्गीय पित्याच्या दृष्टीनें पूर्ण आणि सिद्ध आहांत अशी खात्री तुम्हीं बाळगू शकता, पण तुम्हीं स्वतःमध्यें पूर्ण आहांत असें नाही, तर नेमके ह्यामुळें कीं तुम्हीं आता पूर्ण नसता “पवित्र केले जात आहांत “, “पवित्र बनविलें जात आहांत” – म्हणजें असें कीं, देवाच्या अभिवचनांवर विश्वासाद्वारें, तुम्हीं तुमच्या हेलकावणाऱ्या अपूर्णतेपासून अंशा- अंशानें वाढत जाणाऱ्या पवित्रतेकडें वाटचाल करित आहांत. हाच इब्री 10:14 चा प्रमुख मुद्दा आहे.

तुमचा विश्वास तुमच्यांत पापाचा त्याग करण्याची आणि पवित्रतेत अंशा-अंशानें प्रगती करण्याची उत्कंठा निर्माण करतो का? हा असा विश्वास आहे कीं जो अपूर्णतेच्या ढगाळ स्थितिंतहि ख्रिस्ताकडे पाहून म्हणूं शकतो, “तूं तर मला तुझ्या दृष्टीनें पूर्वींच पूर्ण केलें आहेस.”

हा विश्वास म्हणतो, “ख्रिस्ता, आज मीं पाप केलें आहें. पण मला माझ्या पापाचा वीट आला आहे. कारण तूं नियमशास्त्रातील आचार माझ्या अंत:करणात लिहिलें आहेस, म्हणून तें पाळण्याची मला उत्कंठा लागली आहें. आणि जें काहीं तुझ्या दृष्टीनें मान्य व आवडणारे आहे तें तूं माझ्यामध्यें साधून देत आहेस (इब्री 13:21). आणि म्हणून, जीं पापें अद्यापहि माझ्या हांतून होतांत त्यां पापांचा मला वीट आला आहें; इतकेंच नव्हें, तर मला माझ्या मनांत उद्भवणाऱ्या पापी विचारांचा सुद्धा वीट आला आहें.”

हाच तो खऱा आणि अस्सल विश्वास आहे ज्याद्वारें आम्हीं तारले जातो. हाच तो विश्वास आहे जो पुढील वचनांचा गोड आस्वाद घेऊं शकतो : “कारण पवित्र होणार्‍यांना त्यानें एकाच अर्पणानें सर्वकाळचें पूर्ण केलें आहें.” हा बलवानांचा गर्विष्ठपणा नाहीं. ही त्यां दुर्बळ पाप्यांची ओरड आहे ज्यांना तारणकर्त्याची गरज आहे.

मीं तुम्हांला हाक मारतो, तुम्हांला विनंती करतो कीं, इतके दुर्बळ व्हां कीं ख्रिस्तावर तुमचा असा विश्वास शोभून दिसला पाहिजें.

3 जनवरी : प्रत्येक प्रतिज्ञा की पूर्ति

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3 जनवरी : प्रत्येक प्रतिज्ञा की पूर्ति
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“अब्राहम की सन्तान, दाऊद की सन्तान, यीशु मसीह की वंशावली।”  मत्ती 1:1

हो सकता है कि नए नियम का आरम्भ हमें पहली बार देखने पर प्रेरणादायक न लगे। वास्तव में, यदि कोई पहली बार बाइबल पढ़ रहा हो और मलाकी की पुस्तक के अन्त तक पहुँच गया हो, जो कि आगे आने वाले की ओर प्रत्याशा से संकेत करती है, तो अगली पुस्तक का आरम्भ उनके इस उत्साह को डगमगा सकता है, जो वंशावली से होता है। हो सकता है कि वे (और हम भी!) मत्ती को छोड़ किसी दूसरे सुसमाचार से आरम्भ करने के लिए प्रलोभित हो जाएँ।

तथापि इस बात को स्मरण रखें कि पुराने नियम में परमेश्वर ने अपने लोगों से जो प्रतिज्ञाएँ की थीं, वे सभी अपने पूरे होने की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब हम नए नियम को पढ़ते हैं, तब हमें आभास होता है कि वास्तव में वह इससे अधिक उपयुक्त रीति से आरम्भ नहीं हो सकता था क्योंकि मत्ती की वह वंशावली अब्राहम से लेकर दाऊद तक और अन्ततः यीशु तक की एक रेखा खींचती है, जो इन सभी प्रतिज्ञाओं की पूर्ति करता है।

इसी प्रकार मरकुस भी अपने पूरे सुसमाचार में हमें उन भविष्यद्वक्ताओं की ओर वापस लेकर जाता है, जिन्होंने उस आने वाले की ओर संकेत दिया था। मरकुस इस असाधारण वास्तविकता के लिए परिवेश तैयार करने के लिए पुराने नियम का उपयोग करता है, जब वह अगले वाक्य को “जैसा यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक में लिखा है . . .” (मरकुस 1:2) से आरम्भ करता है। और जब वह यीशु के कहे पहले शब्दों को इस प्रकार दर्ज करता है कि “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है” (पद 15)। यीशु के चेलों को वह देखने का सौभाग्य मिला, जिसे भविष्यद्वक्ता और राजा देखने की लालसा करते थे (लूका 10:24 देखें)—एक ऐसा सौभाग्य जो आज भी परमेश्वर के वचन के ज्ञानवर्धक कार्य के माध्यम से जारी है।

नया नियम हमें यह दिखाता है कि जिस साधन के द्वारा परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ पूरी होती हैं, उसे दो शब्दों में अभिव्यक्त किया जा सकता है। वे शब्द हैं यीशु मसीह।  परमेश्वर ने इस्राएल से उन शब्दों और श्रेणियों का उपयोग करके अपनी प्रतिज्ञाएँ कीं जिन्हें वे समझ सकते थे, अर्थात राष्ट्र  और मन्दिर  जैसे शब्द। मसीह के आगमन ने सुसमाचार के प्रकाश में पुराने नियम की इन अवधारणाओं को दोबारा से परिभाषित किया। हम पाते हैं कि पुराने नियम की सभी भविष्यद्वाणियाँ मसीह में, अर्थात मसीह के व्यक्तित्व द्वारा और मसीह के व्यक्तित्व में पूरी होती हैं। इस कारण इस्राएल के राज्य में किसी नए मन्दिर की खोज करने के विपरीत हम उसके पुत्र प्रभु यीशु के द्वारा परमेश्वर से मिलते हैं; उसके आत्मा के द्वारा हममें से प्रत्येक में उसके वास करने का आनन्द उठाते हैं; और हमारे जीवन को अभी और सदा के लिए बदल देने के लिए मसीह के राज्य की वास्तविकता को देखते हैं।

परमेश्वर के पुत्र का आगमन पुराने नियम की श्रेणियों की सीमाओं को तोड़ देता है। यह परमेश्वर के लोगों के लिए बेचैनी उत्पन्न करने के लिए नहीं, अपितु रोमांच से भर देने के लिए है! मसीह परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं की पूर्ण पूर्ति है। वह परमेश्वर के सभी भव्य आश्वासनों की वास्तविकता है। तो अब यह देखने के लिए और प्रतीक्षा न करें कि परमेश्वर अपनी प्रत्येक प्रतिज्ञा को कैसे पूरा करेगा। अब हम जानते हैं कि इनमें से प्रत्येक प्रतिज्ञा मसीह के द्वारा तृप्त हुई थी, हुई है और सदा होती रहेगी। उसने आपके साथ रहने, आपके लिए और आपके द्वारा कार्य करने और आपको पूर्णता के एक अनन्त राज्य में लाने की प्रतिज्ञा की है। ऐसे समय अवश्य आते हैं, जब उन प्रतिज्ञाओं को थामे रखना कठिन होता है। जब वे समय आते हैं तो हम अब्राहम और दाऊद की वंशावली से उत्पन्न हुए उस व्यक्ति की ओर फिर से देखते हैं, जो आत्मा के द्वारा गर्भ में आया, जो यह घोषणा करने में सक्षम था कि “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है” और जो क्रूस पर लटका और कब्र से निकल आया, जिससे कि परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाएँ उसमें “हाँ” बन जाएँ।      मत्ती 1:1-18.

3 जानेवारी: अति अल्प विश्वास

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3 जानेवारी: अति अल्प विश्वास
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ह्यावरून हें इच्छा बाळगणार्‍यावर नव्हे किंवा धावपळ करणार्‍यावर नव्हे, तर दया करणार्‍या देवावर अवलंबून आहे. (रोमकरांस 9:16)

वर्षाच्या अगदी सुरुवातीलाच आपण हें स्पष्ट समजून घेऊया की येशूवर विश्वास ठेवणारें म्हणून या वर्षी देवाकडून आपल्याला जे काहीं मिळेल, तीं केवळ त्याची दया आहे. जे काही सुख किंवा जे काही दुःख आपल्या वाट्याला येतील तें सर्व दया करणार्‍या देवापासून असतील.

ख्रिस्त ह्याकरितां जगात आला: “असे की….परराष्ट्रीयांनीं त्याच्या दयेमुळें देवाचें गौरव करावें” (रोमकरांस 15:9). शिवाय, “त्यानें आपल्या महादयेनुसार आपल्याला पुन्हा जन्म दिला” (1 पेत्र 1:3). “आपल्यावर दया व्हावी” (इब्री 4:16) अशी आम्हीं रोज प्रार्थना करतो; आणि आता आपण “सार्वकालिक जीवनासाठीं आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताच्या दयेची वाट” पाहत आहों (यहूदा 1:21). जर कोणी ख्रिस्ती मनुष्य विश्वासू असल्याचें सिद्ध करतो, तर तो ते “विश्वासू होण्याची दया प्रभूद्वारें झाली आहे” म्हणून करतो (1 करिंथकर 7:25).

लूक 17:5-6 मध्ये, प्रेषित प्रभूला विनंती करतात, “आमचा विश्वास वाढवा!” तेव्हां येशू म्हणतो, “तुम्हांमध्यें मोहरीच्या दाण्याएवढा विश्वास असेल, तर ह्या तुतीला, ‘तू मुळांसकट उपटून समुद्रांत लाविली जा,’ असें तुम्हीं सांगताच ती तुमचें ऐकेल.” म्हणजें, आपल्या ख्रिस्ती जीवनांत आणि सेवेंत घडणाऱ्या गोष्टी ह्या आपल्या विश्वासाच्या बळकटीमुळें किंवा परिमाणामुळें होत नाहींत, कारण झाडे मुळांसकट उपटून टाकणे हे त्यामुळें होत नाहीं. ते देव करतो. म्हणून, सर्वात कमी विश्वास जों खऱ्या अर्थाने आम्हांला ख्रिस्ताशी जोडतो तो विश्वास त्याच्या सामर्थ्याद्वारें आपल्यासाठीं गरजेच्या असलेल्या सर्व गोष्टीं घडवून आणावयांस पुरेसा आहे.

पण ज्यां ज्यां प्रसंगी तुम्हीं यशस्वीपणें प्रभूची आज्ञा पाळता त्या त्या प्रसंगांचे काय? तुमचा आज्ञाधारकपणा तुम्हाला दयेसाठीं विनवणी करणाऱ्यांच्या श्रेणीतून बाहेर काढते का? लूक 17:7-10 च्या पुढील वचनांमध्ये येशू असें उत्तर देतो :

“तुम्हांपैकीं असा कोण आहे कीं, त्याचा नांगरणारा किंवा मेंढरें राखणारा दास शेतातून आल्यावर तो त्याला म्हणेल, ‘आतांच येऊन जेवावयाला बैस.’ उलट ‘माझें जेवण तयार कर, माझें खाणेंपिणें होईपर्यंत कंबर बांधून माझी सेवा कर, आणि मग तूं खा व पी,’ असें तो त्याला म्हणणार नाहीं काय? सांगितलेली कामें दासानें केलीं म्हणून तो त्याचे उपकार मानतो काय? त्याप्रमाणें तुम्हांला सांगितलेली सर्व कामें केल्यावर आम्हीं निरुपयोगी दास आहों, आम्हीं आमचे कर्तव्य केलें आहे, असें म्हणा.”

यांवरून मीं असे मानतो कीं, पूर्ण आज्ञाधारकपणा आणि सर्वात कमी विश्वास यां दोन्हीं गोष्टीं देवाकडून एकच गोष्ट प्राप्त करून घेतांत : ती म्हणजें कृपा. फक्त मोहरीच्या दाण्याएवढा विश्वास जरी असेल, तर तो झाड हलविणारीकृपा प्राप्त करून देण्याइतपत हितकारक ठरतो. आणि निष्कपट आज्ञाधारकपणा आपल्याला पूर्णपणे दयेवर विसंबून ठेवतो.

शेवटी मुख्य मुद्दा हा आहे : देवाच्या दयेचे निमित्त किंवा स्वरूप काहीही असो, दयेचे अपात्र लाभार्थी म्हणून आपली जी लायकी आहे, त्यापलीकडें आपण कधींच जात नाहीं. जी गोष्ट प्राप्त होण्यांस आपली पात्रता नाही त्यां गोष्टींसाठीं आपण नेहमी पूर्णपणे विसंबून राहतो.

ह्यास्तव या, आपण स्वतःला नम्र करूं, आणि आनंद करूं आणि “त्याच्या दयेमुळें देवाचें गौरव करूं!”

2 जनवरी: अपने परमेश्वर को देखो

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2 जनवरी: अपने परमेश्वर को देखो
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“हे सिय्योन को शुभ समाचार सुनाने वाली, ऊँचे पहाड़ पर चढ़ जा; हे यरूशलेम को शुभ समाचार सुनाने वाली, बहुत ऊँचे शब्द से सुना, ऊँचे शब्द से सुना, मत डर; यहूदा के नगरों से कह, ‘अपने परमेश्वर को देखो!’”  यशायाह 40:9

भविष्यद्वक्ता यशायाह के जीवनकाल में परमेश्वर के लोगों को एक पराए देश में बन्दी बना लिया गया था। वे निराश हो चुके थे, यहाँ तक कि प्रभु की स्तुति के गीत भी नहीं गा पा रहे थे (भजन संहिता 137:1-4 देखें)। फिर भी जब वे बँधुआई की उस स्थिति में थे, तब परमेश्वर अपने लोगों के पास शान्ति प्रदान करने वाले शब्दों के साथ आया (यशायाह 40:1), वह शान्ति जो केवल उसकी प्रतिज्ञा के पूरे होने में ही मिलती है: कि यहोवा का तेज प्रगट होगा और ऐसा केवल इस्राएल के लिए नहीं परन्तु सम्पूर्ण मानवजाति के लिए होगा।

यह शुभ समाचार ऐसा नहीं था कि इस बारे में चुप रहा जा सके। अवश्य था कि परमेश्वर के लोग विजयी जयघोष करते और अपनी आशा की महिमा से एक-दूसरे को मोहित कर देते। इसका वर्णन एक बार इस प्रकार भी किया गया था कि “जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे” उन्होंने “बड़ा उजियाला देखा” (यशायाह 9:2)।

इस पतित संसार के अन्धकार और स्वर्ग के उजियाले के बीच का अन्तर एक अनोखा चित्रण है, जो यशायाह की पूरी पुस्तक में और निस्सन्देह पूरी बाइबल में दिखाई देता है। अन्धकार वह परिणाम है जो परमेश्वर के लिए उदासीनता होने, उसके विरुद्ध विद्रोह करने और उसके कहे अनुसार कार्य करने की अनिच्छा के होने से आता है। केवल एक ही ऐसा सन्देश है जो ऐसे अन्धकार में उजियाला लेकर आता है, जो हृदय और मन को तरोताजा कर देता है, और वह यह है “अपने परमेश्वर को देखो!”

यह सन्देश आज भी परमेश्वर के लोगों के लिए उतना ही प्रासंगिक है जितना कि यशायाह के समय में था। प्रायः अन्धकार बहुत अधिक लगता है और कभी-कभी उजियाला बहुत धुँधला दिखाई देता है। फिर भी, प्रायः इन अनिश्चित समयों में आशा का सन्देश भी प्रकट होता है। परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है कि “तब यहोवा का तेज प्रगट होगा और सब प्राणी उसको एक संग देखेंगे; क्योंकि यहोवा ने आप ही ऐसा कहा है” (यशायाह 40:5)। अन्ततः परमेश्वर ने इस प्रतिज्ञा को पूरा किया, जब उसने देह धारण किया और हमारे बीच में अपनी उपस्थिति ठहराई।

जब यूहन्ना ने अपना सुसमाचार लिखा, तो उसने उसी दृश्य को देखा जिसकी ओर यशायाह ने देख रहा था, और कहा कि “और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूहन्ना 1:14)। वह जगत की ज्योति था—वह  स्वयं—और “ज्योति अन्धकार में चमकती है, और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया” (पद 5)। यशायाह उसका वर्णन कर रहा था जो आने वाला था। परन्तु हम यूहन्ना की तरह उस पूरे किए गए कार्य पर विचार करने में सक्षम हैं कि यही वह महिमा है, जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी और जो अब प्रकाशित हुई है।

हमारे अन्धकार को मिटाकर और उद्धार को लेकर परमेश्वर हमारे पास आया है। आप अपने परमेश्वर को पहले चरनी में, फिर क्रूस पर, फिर कब्र से बाहर निकलते हुए और अब ऊँचे स्थान पर राज्य करते हुए देख सकते हैं। अन्धकार को देख पाना कठिन नहीं है, किन्तु फिर भी हमें ज्योति की ओर देखना चाहिए क्योंकि वहाँ हमें आशा मिलती है, जो भय को दूर करती है और वह शुभ समाचार मिलता है, जो इस योग्य है कि उसे सबको सुनाया जाए। इसलिए आज अपने परमेश्वर को देखें!

2 जानेवारी: येशूनें मरणाचे काय केलें

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2 जानेवारी: येशूनें मरणाचे काय केलें
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ज्याअर्थी माणसांना एकदांच मरणें व त्यानंतर न्याय होणें नेमून ठेवलें आहे, त्याअर्थी ख्रिस्त ‘पुष्कळांची पापें स्वतःवर घेण्यासाठीं’ एकदांच अर्पिला गेला, आणि जे त्याची वाट पाहतात त्यांना पापसंबंधात नव्हे तर तारणासाठीं तो दुसर्‍यांदा दिसेल. (इब्री 9:27-28).

येशूच्या मरणानें आमच्या पापांचा भार वाहून नेला. हा सिद्धांत ख्रिस्ती धर्माचे मर्म आहे, आणि सुवार्तेचा मुख्य विषय आहे आणि जगात देवानें मानवाच्या मुक्तीसाठीं केलेल्या महान कार्याचे मर्म आहे. ख्रिस्त मरण पावला तेव्हां त्यानें पापें स्वतःवर वाहून नेलीं. जीं पापें त्यानें वाहून नेलीं तीं त्याची स्वतःची पापें नव्हती. तर त्यानें इतरांनी केलेल्या पापांसाठी मरण सोसले, ह्यासाठीं कीं त्यांनी पापांपासून मुक्त व्हावें.

तुमच्या जीवनातील सर्वात मोठ्या अडचणीचे हेच समाधान आहे, मग तुम्हाला ती अडचण मोठी वाटत असों वा नसों. आपण पापी असतानांहि देवा बरोबर आपले नाते कसे पुनर्स्थापित होऊ शकतें या प्रश्नाचे उत्तर आहे. आणि याचे उत्तर असें कीं ख्रिस्ताचा मृत्यू हा “पुष्कळांची पापें स्वतःवर घेण्यासाठीं” एकदांच केलेलें अर्पण आहे. त्यानें आमची पापें उचलून तीं वधस्तंभावर नेलीं आणि जे मरण आम्हीं मरावयास पात्र होतो त्या मरणानें तो तेथे मरण पावला. तर आता माझ्या मरणाशी ह्याचा काय संबंध आहे? “[माझ्यासाठी] एकदांच मरणें नेमून ठेवलें आहे.” म्हणजे आता माझे मरण हे माझ्यासाठीं पापदंडस्वरूपाचे नाही. यापुढे माझे मरण पापसंबंधात असलेला दंड नाही. माझे पाप वाहून दूर करण्यांत आलें आहे. ख्रिस्ताच्या मृत्यूनें माझी “पापे नाहीशी” करण्यात आलीं आहेत. ख्रिस्तानें ती शिक्षा स्वतःवर घेतली.

मग मीं अजूनहि शरीराने का मरतो? कारण देवाची अशी इच्छा आहे की पापाच्या भयंकर भयावहतेची कायमस्वरूपी साक्ष म्हणून मरण सांप्रतकाळी जगामध्येच कायम असावें, आणि ते त्याच्या स्वतःच्या लेकरांमध्येहि कायम असावें. जेव्हां आम्हीं मरतो तेव्हां त्या मरणाद्वारे आपण ह्या जगात पापाचें आजहि कायम असलेलें बाह्य परिणाम प्रकट करतो.

पण देवाच्या मुलांसाठी हे ऐहिक मरण आता त्यांच्यावर असलेला त्याचा कोप नाही. तें मरण आता आम्हांसाठीं दंडाज्ञा नाही, तर आमच्या तारणाचे प्रवेशद्वार बनलें आहे.

1 जनवरी: सृष्टि का राजा

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1 जनवरी: सृष्टि का राजा
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“आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।” उत्पत्ति 1:1

ऐसा कोई समय नहीं था जब परमेश्वर अस्तित्व में नहीं था। समय से पहले, कुछ भी होने से पहले, परमेश्वर था। और चूंकि उसका गुण अपरिवर्तनीय है, इसलिए वह सदा से त्रिएकता, अर्थात, परमेश्वर पिता, परमेश्वर पुत्र और परमेश्वर पवित्र आत्मा में होकर सदा से ही अस्तित्व में रहा है।

बाइबल पढ़ते समय हम पाते हैं कि त्रिएकता का प्रत्येक सदस्य सृष्टि के सृजन में सम्मिलित था: परमेश्वर पिता ने पहल की, परमेश्वर आत्मा को सबके ऊपर “मण्डराते हुए” वर्णित किया गया है, और जो कुछ भी उत्पन्न हुआ उस सब के सृजन का कर्ता परमेश्वर पुत्र था (उत्पत्ति 1:2-3; यूहन्ना 1:3)।

“सभी वस्तुएँ उज्ज्वल और सुन्दर, सभी प्राणी बड़े और छोटे” इन सब को हमें विस्मय में डाल देना चाहिए; ये सभी परमेश्वर की आज्ञा से रचे गए थे। और वह न केवल इन सभी का सृष्टिकर्ता है; वरन वह उन सब का प्रभु भी है जो उसने बनाया है। सारी प्रकृति उसके हाथों में है, उसके नियन्त्रण में है। जब हम लहरों को किनारे से टकराते हुए देखते हैं, तो यह जानना बहुत ही प्रोत्साहक होता है कि उनमें से प्रत्येक, परमेश्वर के सम्प्रभु प्रभुत्व के परिणामस्वरूप वहाँ है। वह अपनी सृष्टि से दूर कहीं चला नहीं गया है, न ही वह कभी जाएगा।

यह याद रखना महत्त्वपूर्ण है कि परमेश्वर सर्वोपरि भी है। वह सबसे ऊपर, सबसे परे, और उसने जो कुछ भी बनाया है उस सबसे अलग, अपने सिंहासन पर विराजमान है। यही बात मसीहियत को सर्वेश्वरवाद से अलग करती है, अर्थात इस सोच से कि प्राकृतिक संसार परमेश्वर की अभिव्यक्ति है और इसलिए सब कुछ किसी न किसी तरह उसका एक भाग है। इस आस्था के अनुसार, हम किसी मक्खी को मारने या चींटी पर पैर रखने का दुस्साहस कदापि न करेंगे क्योंकि वे कीड़े दिव्य हैं। इसी प्रकार, हम पेड़ नहीं काटेंगे, न ही माँस खाएँगे, क्योंकि ये भी “परमेश्वर के अंग” हैं। इस तरह की शिक्षाएँ गलत और भ्रमित करने वाली होती हैं और मूर्तिपूजा की ओर ले जाती हैं। पवित्रशास्त्र बार-बार यह स्पष्ट करता है कि लोग “सृजनहार को छोड़कर सृष्टि” की उपासना करना पसन्द करेंगे (रोमियों 1:25)। जब हम किसी अच्छी चित्रकारी को देखते हैं, तो हम उस चित्रकारी की प्रशंसा करते हैं और उसका आनन्द लेते हैं, और फिर हम चित्रकार की प्रशंसा करते हैं, और यह उचित भी है। सम्पूर्ण सृष्टि परमेश्वर का चित्र-फलक है, और यह सब “उसके अनदेखे गुण, अर्थात उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्वरत्व” (पद 20) का वर्णन करता है।

केवल परमेश्वर की ही आराधना की जानी चाहिए, क्योंकि सृष्टि उसके सामर्थ्य से और उसकी महिमा के लिए ही अस्तित्व में है। उसके अस्तित्व का कोई आरम्भ या अन्त नहीं है, और वह सदा तक राज्य करेगा। वही राजा है। आज उसकी बढ़ाई उसी रीति से करें, जिसके योग्य केवल वही है। टहलते समय या खिड़की से बाहर देखते हुए, जैसे-जैसे आप उसकी बनाई हुई वस्तुओं में उसकी सुन्दरता को देखते जाएँ, उसकी स्तुति करते जाएँ। उसकी स्तुति करें, जब वह अपने सम्प्रभु हाथ से आपको थामे हुए सृष्टि पर राज्य करता है।