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21 जुलाई : दूध से ठोस आहार की ओर

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21 जुलाई : दूध से ठोस आहार की ओर
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“समय के विचार से तो तुम्हें गुरु हो जाना चाहिए था, तौभी यह आवश्यक हो गया है कि कोई तुम्हें परमेश्‍वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए।” इब्रानियों 5:12

यदि आप अपने बेसमेंट में व्यायाम के लिए बहुत सारे उपकरण रखते हैं, लेकिन कभी वजन नहीं उठाते, न ही अपनी मांसपेशियों को प्रशिक्षित करते हैं और न ही अपने दिल की सेहत का ध्यान रखते हैं, तो वे सारे उपकरण बेकार होंगे। मांसपेशियाँ तभी बढ़ती हैं, जब उन्हें निरन्तर उपयोग में लाया जाता है। एक व्यक्तिगत प्रशिक्षक सहायक हो सकता है, लेकिन हमें खुद को प्रशिक्षित करने के लिए भी प्रतिबद्ध होना होगा। जब पौलुस ने तीमुथियुस से कहा, “भक्ति की साधना कर” (1 तीमुथियुस 4:7), तो वह प्रमुख रूप से यह कह रहा था कि कोई आदर्श व्यक्ति, नेता या मित्र उसके लिए परिश्रम नहीं कर सकता था।

जब हम अपनी मसीही यात्रा में बढ़ते हैं, तो हम बुनियादी सत्य सीखते हैं, जिन्हें हम धीरे-धीरे व्यवहार में लाते हैं और आध्यात्मिक विवेक में बढ़ते जाते हैं। यह प्रक्रिया हमें दूध से ठोस आहार की ओर (इब्रानियों 5:12-14), आध्यात्मिक शिशु से आध्यात्मिक परिपक्वता की ओर बढ़ने में मदद करती है, ताकि हम अन्ततः दूसरों को सिखाने में सक्षम हो सकें। यह परमेश्वर द्वारा स्थापित किया गया जीवन चक्र है, जिसका उद्देश्य उसके राज्य का विस्तार करना है।

एक और रूपक का उपयोग करते हुए, मसीही आस्था के बुनियादी सत्य महत्त्वपूर्ण हैं; हम मसीह के बारे में जो कुछ भी सीखते हैं, वह इन्हीं पर आधारित होता है। लेकिन हमेशा के लिए इन्हीं पर ध्यान केन्द्रित करना उत्पादक नहीं है। हमें मसीही जीवन में प्रगति करने में परिश्रम करना है, निरन्तर पवित्रता में बढ़ने का प्रयास करना है और यह प्रार्थना करनी है कि पवित्र आत्मा हमें उसकी प्रेरित वाणी में और गहराई से जाने में मदद करे।

परमेश्वर अपने बच्चों को अपने पुत्र के स्वरूप में जीवन से या उसके वचन के निर्देशन से अलग होकर रूपान्तरित नहीं करता। जब आप पवित्रशास्त्र में प्रशिक्षित होते हैं और उसे पकड़े रहते हैं, तब आप प्रगति करते हैं। क्या आपकी बाइबल प्रतिदिन अनुशासित उपयोग के संकेत दिखाती है? क्या आप योजनाबद्ध रीति से उन लोगों से सीखने का प्रयास करते हैं, इस यात्रा में आपसे आगे हैं, और क्या आप कठिन शिक्षाओं को समझने का प्रयास करते हैं, बजाय इसके कि उन्हें “विशेषज्ञों” के लिए छोड़ दें? और क्या आप इस उद्देश्य से पढ़ते, संघर्ष करते और ध्यान करते हैं कि मसीह से आपका प्रेम बढ़े और आपकी कलीसिया और समुदाय में दूसरों की सेवा करने की अपनी क्षमता बढ़े, बजाय इसके कि आप केवल अधिक ज्ञान प्राप्त करें? आपके बारे में कभी यह न कहा जाए कि आप अधिक वृद्धि नहीं कर सके और परमेश्वर के लोगों की मदद करने के लिए अधिक प्रयास नहीं कर सके। बढ़ने का प्रयास करें। इसके लिए परमेश्वर की मदद की आवश्यकता होगी—लेकिन जब हम उसे खोजते हैं, वह निश्चय ही हमारे प्रयासों को सम्मानित करेगा!

इब्रानियों 5:7 – 6:3

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 29–30; प्रेरितों 15:22-41 ◊

21 July : निरुत्साहाचा सामना करण्यासाठींआदर्श

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21 July : निरुत्साहाचा सामना करण्यासाठींआदर्श
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माझा देह व माझे हृदय ही खचली; तरी देव सर्वकाळ माझ्या जिवाचा आधार व माझा वाटा आहे. (स्तोत्र 73:26)

जसा कीं मराठीत हा शास्त्रपाठ आहे, या वचनातील क्रियापद शब्दशः केवळ “खचली” असें आहे, “खचू शकते” असे नाहीं. परमेश्वराने पिडलेला आसाफ नावाचा हा स्तोत्रकर्ता म्हणतो, “माझा देह व माझे हृदय ही खचली आहेंत!” मी खिन्न झालों आहे! मी निराश झालों आहे! पण मग लगेचच तो त्याच्या निराशेविरुद्ध एक व्यापक अशा दृष्टिक्षेपांतून अति जोमानें ऐलान करतो : “तरी देव सर्वकाळ माझ्या जिवाचा आधार व माझा वाटा आहे.”

स्तोत्रकर्ता नैराश्याने वैतागून खचत नाहीं. तर तो पलटवार करून आपल्या अविश्वासाबरोबर लढा देतो.

थोडक्यात, तो असे म्हणत आहे, “मी स्वतःमध्यें खूप अशक्त आणि असहाय्य असा आहे आणि मी या गोष्टींशी स्पर्धा करू शकत नाहीं. माझा देह मरणासन्न झाला आहे आणि माझे हृदय जवळजवळ मृत झालें आहे. पण या औदासिनपणाचे कारण काहींही असो, मी नमणार नाहीं. मी स्वतःवर नव्हें, तर देवावर विश्वास ठेवीन. तोच माझें सामर्थ्य व माझा वाटा आहे.”

पवित्र शास्त्रांत औदासिनतेंत बुडलेल्या जीवांशी संघर्ष करणाऱ्या पवित्र जनांची बरीच उदाहरणें आहेत. स्तोत्र 19:7 म्हणते, “परमेश्वराचे नियमशास्त्र परिपूर्ण आहे, ते मनाचे पुनरुज्जीवन करते.” हे या गोष्टीची स्पष्ट कबुली देणें आहे कीं पवित्र जनांच्या जीवाला कधी-कधी पुनरुज्जीवनाची गरज असते. आणि जर असे पुनरुज्जीवन करणें आवश्यक असेल तर एका अर्थाने ते “मृत” असे होते. त्यांना असेच वाटायचे.

दाविद स्तोत्र 23:2-3 मध्यें तेच सांगतो, “तो मला संथ पाण्यावर नेतो. तो माझा जीव ताजातवाना करतो” “आपल्या [देवाच्या] मनासारखा मनुष्य” (1 शमुवेल 13:14) असलेला दाविद ह्याच्या जीवाला सुद्धा पुनरुज्जीवनाची गरज होती. त्याचा  जीव तहानेने जणू मृतप्राय झाला होता आणि खचून गेला होता, तरी देव त्याचा जीव संथ पाण्याजवळ घेऊन गेला व त्याला पुन्हा जीवन दिलें.

देवानें या सर्व साक्षी बायबलमध्यें देऊन ठेवल्यात, जेणेंकरून आपण ज्यां ज्यां वेळी नैराश्याने खचतो, आपण त्यांचा उपयोग अविश्वासाशी लढा देण्यांस करावा. आणि आपण अविश्वासाला उद्ध्वस्त करणाऱ्या अशा देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेऊन लढतो: “देव सर्वकाळ माझ्या जिवाचा आधार व माझा वाटा आहे.” आम्हीं त्या उपदेशाने स्वतःला उत्तेजन देतो. आणि आम्हीं तो सैतानाच्या तोंडावर मारतो, व त्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवतो.

20 जुलाई : सच्चा तम्बू और मन्दिर

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20 जुलाई : सच्चा तम्बू और मन्दिर
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“इस पर यहूदियों ने उस से कहा, ‘तू जो यह करता है तो हमें कौन सा चिह्न दिखाता है?’ यीशु ने उनको उत्तर दिया, ‘इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।’” यूहन्ना 2:18-19

कुछ लोग बाइबल को केवल दार्शनिक जानकारी और आध्यात्मिक टुकड़ों का मिश्रण समझते हैं। यह बात सत्य से बहुत दूर है, क्योंकि बाइबल में परमेश्वर की हमारे संसार में हस्तक्षेप की खुलती हुई कहानी है। परमेश्वर के राज्य का विषय हमें इस कहानी के सूत्र को समझने और उसका अनुसरण करने का एक उपयोगी तरीका प्रदान करता है।

और हर राज्य में राजा का एक निवास स्थान होता है।

पुराने नियम के अधिकांश भाग में तम्बू वह स्थान था, जहाँ परमेश्वर इस्राएल के मध्य में निवास करता था। हालाँकि तम्बू परमेश्वर के लोगों के बीच था, फिर भी यह उनके लिए खुला नहीं था। यहाँ तक कि मूसा भी उस समय उसमें प्रवेश नहीं कर सकता था, जब परमेश्वर की महिमा का बादल उस पर आकर ठहरता था (निर्गमन 40:34-35)। फिर जब यरूशलेम उस देश की राजधानी बन गया, तब तम्बू का स्थान एक स्थाई भवन अर्थात मन्दिर ने ले लिया। अब परमेश्वर, अपनी प्रजा का राजा, अपनी प्रजा के और उनके देश की राजधानी में निवास कर रहा था। लेकिन फिर भी परमेश्वर तक पहुँचने का रास्ता उस पर्दे द्वारा अवरुद्ध था, जो मन्दिर के परम पवित्र स्थान को शेष मन्दिर से अलग करता था (निर्गमन 26:31-34)।

और फिर “वचन देहधारी हुआ” और सचमुच “हमारे बीच में डेरा किया” (यूहन्ना 1:14)।

नए नियम को पढ़ते समय हम पाते हैं कि जैसे पुराने नियम में लोग तम्बू में परमेश्वर से मिलने की उम्मीद करते थे, वैसे अब हम एक व्यक्ति को देखते हैं—जो स्वयं परमेश्वर है, जिसने मानव शरीर में निवास किया और हमारे बीच जीवन यापन किया। यूहन्ना की भाषा विशेष रूप से यह सन्देश देती है कि यीशु में परमेश्वर ने शारीरिक रूप से अपने लोगों के बीच निवास किया और अब अपने आत्मा के द्वारा अपने लोगों में निवास करता है (यूहन्ना 14:16-18)। वह हमारे बीच है। दूसरे शब्दों में, यीशु ही असली तम्बू है।

यीशु इसी बात को समझाना चाहता था, जब उसने मन्दिर को शुद्ध किया था और वहाँ धन्धा करने वाले व्यापारियों और पैसे बदलने वालों को बाहर निकाल था, और उससे पूछा गया था कि वह इतना दुस्साहस का काम किस अधिकार से कर रहा था (यूहन्ना 2:13-16), तो उसने उत्तर दिया, “इस मन्दिर को ढा दो, और मैं इसे तीन दिन में खड़ा कर दूँगा।” यूहन्ना यह बताता है कि जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, उसे दफन किया गया और वह मृतकों में से जी उठा, तब उनके शिष्य समझ गए कि “उसने अपनी देह के मन्दिर के विषय में कहा था” (पद 21)।

यीशु की मृत्यु के समय मन्दिर का पर्दा फट गया, यह संकेत देते हुए कि अब हम मसीह के द्वारा परमेश्वर की उपस्थिति में बिना किसी रुकावट के जा सकते हैं; लेकिन यह इस बात का संकेत भी था कि मन्दिर की अब कोई आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि उसका उद्देश्य अब पूरा हो गया था। इसके कुछ दशकों बाद यरूशलेम का मन्दिर सचमुच ढा दिया गया।

यदि हम परमेश्वर से मिलना चाहते हैं, तो हमें यीशु के पास जाना होगा। अब हमें किसी विशेष भवन या विशेष प्रतीकों या मन्दिरों की आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपने लोगों से मिलता है—जब हम एकत्र होते हैं और जब हम बिखरे होते हैं—किसी निर्धारित स्थान में नहीं बल्कि अपने पुत्र में, जो असली मन्दिर है। चाहे आज कोई भी दिन हो और आप जो भी कर रहे हों, आपको पवित्र परमेश्वर से साक्षात मिलने से कोई नहीं रोक सकता। आज राजा स्वयं आप में निवास करता है।

यूहन्ना 2:13-22

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 26–28; प्रेरितों 15:1-21

20 July : प्रत्येक गरजेसाठीं कृपा

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20 July : प्रत्येक गरजेसाठीं कृपा
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तू माझ्याकडें वळून माझ्यावर कृपा कर; आपल्या दासाला आपलें सामर्थ्य दे. (स्तोत्र 86:16)

आपल्यावर भविष्यात कृपा व्हावीं अशी सर्व प्रार्थनावीर स्तोत्रकर्ता खंड न पडू देता विनवणी करत असत. देवानें आपली प्रत्येक गरज पूर्ण करावीं अशी ते वारंवार प्रार्थना करतांत. आपण आपल्या प्रत्येक आणीबाणीच्या परिस्थितीसाठीं भविष्यातील कृपेवर दररोज कसे अवलंबून राहावें याचा ते सर्व मिळून आम्हाल्यासाठीं एक सुंदर कित्ता घालून देत आहेत  .

  • त्यांना मदतीची गरज असते तेव्हा ते कृपेसाठीं धावा करतांत : “हे परमेश्वरा, ऐक, माझ्यावर दया कर; हे परमेश्वरा, मला साहाय्य कर!” (स्तोत्र 30:10).
  • ते अशक्त असतांत तेव्हां : “तू माझ्याकडें वळून माझ्यावर कृपा कर; आपल्या दासाला आपलें सामर्थ्य दे” (स्तोत्र 86:16).
  • त्यांना रोग व आजार यांपासून बरे होण्याची गरज असते तेव्हां : “हे परमेश्वरा, मी गळून गेलो आहे म्हणून माझ्यावर दया कर; माझी हाडे ठणकत आहेत, हे परमेश्वरा, मला बरे कर” (स्तोत्र 6:2).
  • त्यांचे शत्रूं त्यांची पिळवणूक करतांत तेव्हां : “हे परमेश्वरा, माझ्यावर दया कर, मला मृत्युद्वारातून उठवणार्‍या, माझा द्वेष करणार्‍यांपासून मला झालेंली पीडा पाहा” (स्तोत्र 9:13).
  • ते एकाकीं पडलेले असतांत तेव्हां : “माझ्याकडें वळून मला प्रसन्न हो; कारण मी निराश्रित व दीन आहे” (स्तोत्र 25:16).
  • ते शोक करीत असतांत तेव्हां : “हे परमेश्वरा, माझ्यावर कृपा कर, कारण मी संकटात आहे; माझे नेत्र, माझा जीव, माझे शरीर ही दुःखाने क्षीण झाली आहेत” (स्तोत्र 31:9).
  • ते पापांत पडतांत तेव्हां: “हे परमेश्वरा, माझ्यावर कृपा कर; माझ्या जिवाला बरे कर; मी तुझ्याविरुद्ध पाप केलें आहे!” (स्तोत्र 41:4).
  • ते राष्ट्रांमध्यें देवाच्या नावाचा गौरव व्हावा म्हणून व्याकूळ होतांत तेव्हां : “देवानें आमच्यावर दया करावी व आम्हांला आशीर्वाद द्यावा. . . ह्यासाठीं कीं, पृथ्वीवर तुझा मार्ग कळावा, तू सिद्ध केलेंले तारण सर्व राष्ट्रांना विदित व्हावे” (स्तोत्र 67:1-2).

खचितच, प्रार्थना हा विषय पवित्रजनांचा आत्मा आणि भविष्यातील कृपेचे अभिवचन यांच्यातील विश्वासाची मजबूत साखळी आहे, यांत शंका नाहीं. आपण सेवेला प्रार्थनेद्वारे टिकून ठेवावें असे जर देवानें प्रयोजन केलेंलें असेल, तर मग सेवा ही भविष्यातील कृपेवरील विश्वासाने टिकून राहावी असे प्रयोजन केलेंलें असणें स्वाभाविक आहे.

19 जुलाई : अटल रूप से जुड़े हुए

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19 जुलाई : अटल रूप से जुड़े हुए
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“अतः यदि मसीह में कुछ शान्ति, और प्रेम से ढाढ़स, और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करुणा और दया है, तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो, और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो।” फिलिप्पियों 2:1-2

मसीही बनने का अनुभव कुछ हद तक विवाह करने जैसा होता है। दो अविवाहित व्यक्ति विवाह के बन्धन में एक हो जाते हैं और उनका जीवन अविच्छेदनीय रूप से आपस में जुड़ जाता है। इसी तरह, जब हम मसीह को उसके सम्पूर्ण प्रेम में स्वीकार करते हैं और उस उद्धार को स्वीकार करते हैं, जो उसने क्रूस पर हमारे लिए प्राप्त किया है, तो हम उसके साथ एक हो जाते हैं—और फिर कभी पहले जैसे नहीं रहते।

जैसा कि प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पियों को याद दिलाया था, आज हम भी उस प्रोत्साहन को पहचान सकते हैं जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के साथ हमारे मिलन का परिणाम है। उसके साथ हमारा सम्बन्ध परमेश्वर के अनुग्रह का एक उपहार है और हम यह जानकर सुरक्षित महसूस कर सकते हैं कि हम जहाँ कहीं भी जाएँ वह अपने आत्मा की शक्ति से हमारे साथ होता है। यदि आप विश्वास द्वारा मसीह के साथ एक हो गए हैं, तो वह आपके अपने हाथों और पैरों से भी अधिक आपके निकट है। आपका जीवन हमेशा के लिए प्रभु के साथ जुड़ गया है।

21वीं सदी के जीवन की एक प्रमुख कठिनाई यह है कि हम में से कई लोग कभी-कभी अकेले, बिना किसी साथी के और बिछड़े हुए महसूस करते हैं, भले ही हम बहुत सारे लोगों के बीच में ही क्यों न हों। हम अपने इस अलगाव की भावना को सतही बातचीत या हल्की मुस्कान से छिपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कभी-कभी हम लोगों के बीच से आते हुए खुद को बुरी तरह खोया हुआ महसूस करते हैं।

वास्तव में, मसीहियों को इस निराशा का अनुभव करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम मसीह के साथ अपने मिलन का आश्वासन जानते हैं और अनुभव करते हैं। वह हमें पूरी तरह से जानता है और हमें अनन्त प्रेम करता है। इसे जानने से हमें बड़ी सान्त्वना मिलती है!

जिस “सान्त्वना” का उल्लेख पौलुस यहाँ पर करता है, वह केवल एक साधारण, आरामदायक भावना नहीं है; यह शब्द कुछ ऐसा वर्णित करता है, जिसमें शक्ति और आकर्षण शामिल होता है। यह एक क्रियाविशेषण है: सान्त्वना हमारे एक दूसरे के साथ सम्बन्ध में बहती है, क्योंकि आत्मा हमें न केवल अपने आप से बल्कि स्वर्ग पहुँचने से पहले हमें एक दूसरे से भी जोड़ता है। जितना अधिक हम मसीह के साथ अपने मिलन के लाभों का आनन्द लेते हैं—जिसमें सबसे अनमोल स्वयं मसीह है—उतना ही हम अपने विश्वासी भाई-बहनों के अधिक निकट आते हैं और अधिक प्रेमपूर्ण बनते जाते हैं।

फिर भी, जबकि ऐसी सान्त्वना हमें आशीषित करती है, यह हमें उत्तरदायी भी बनाती है। मसीह की दया और करुणा के हमारे ज्ञान से हमें एक दूसरे के प्रति स्नेह और सहानुभूति दिखाने की प्रेरणा मिलनी चाहिए, क्योंकि हम उसके साथ अपने मिलन में बढ़ते जाते हैं। यह सम्भव है कि जीवन के संघर्षों के कारण हम कठोर हो जाएँ, यह सम्भव है कि हम उस अनुग्रह की कमी महसूस करें जो कोमलता में प्रकट होता है, यह भी सम्भव है कि हम अपने आप में इतने व्यस्त हो जाएँ कि हम दूसरों से प्रेम करने में विफल हो जाएँ।

आज आपको किस प्रकार की सान्त्वना या प्रोत्साहन की आवश्यकता है? अपने मसीह के साथ मिलन पर विचार करें और उन्हें उसी में पाएँ। फिर आत्मा से पूछें कि वह आपको किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाए जिसे आज सान्त्वना या प्रोत्साहन की आवश्यकता है और मसीह की सान्त्वना को उनके पास लाने का माध्यम बनें।

कुलुस्सियों  3:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 23–25; प्रेरितों 14 ◊

19 July : त्याची वेळ अचूक आहे

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19 July : त्याची वेळ अचूक आहे
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तर मग आपल्यावर दया व्हावी आणि ऐन वेळी साहाय्यासाठीं कृपा मिळावी, म्हणून आपण धैर्याने कृपेच्या राजासनाजवळ जाऊ (इब्री 4:16)

ह्या मूल्यवान वचनाचे मराठीत असलेले भाषांतर अचूक आणि योग्यच आहे, मुख्यत ‘ऐन वेळी’  हे शब्द. हे शब्द संकेत देतांत कीं जेव्हा आपल्याला ‘ऐन वेळी’  देवाची गरज लागते, तेव्हा लगेच तो आमच्या साहाय्यासाठीं धावून येतो. या वचनाचा शब्दशः मुद्दा आहे ‘ऐन वेळी.’

सर्व सेवा ही भावी सेवा असते – एक क्षण दूर, किंवा एक महिना दूर, किंवा एक वर्ष, किंवा एक दशक दूर. त्या दृष्टिने, आपल्या अपुरेपणावर चिंतन करण्यासाठीं आपल्याकडें पुरेसा वेळ आहे. आणि त्या विचाराने जेव्हा आपल्या मनाचा थरकाप उडतो, आपण प्रार्थनेकडें वळले पाहिजे.

प्रार्थना विश्वासाचेच एक स्वरूप आहे जी आपल्याला आजच उद्याच्या सेवेसाठीं समर्थ बनविणाऱ्या कृपेशी जोडते. वेळ खरोखर महत्वाची आहे.

जर ती कृपा वेळेपूर्वी आली किंवा वेळ निघून गेल्यावर आली तर काय होईल? या संदर्भात अत्यंत मौल्यवान असलेल्या वचनाचे इब्री लोकांस 4:16 चे इंग्रजीचे भाषांतर स्पष्ट नाहीं. ते समजण्यासाठीं आम्हांला अधिक शाब्दिक अभिव्यक्ती आवश्यक आहे. आणि ते अभिवचन म्हणजें केवळ “गरजेच्या वेळी साहाय्यासाठीं ” कृपा मिळते असे नाहीं, तर असे कीं कृपा देवऐन वेळी  देतो.

मुद्दा असा आहे कीं प्रार्थना योग्य वेळी सहाय्यासाठीं भावी कृपेचा शोध घेण्याचा मार्ग आहे. देवाची ही कृपा सदैव “कृपेच्या राजासनाजवळ” ऐन वेळी मिळते. “कृपेचे राजासना” या वाक्यांशाचा अर्थ असा आहे कीं भविष्यातील कृपा विश्वाच्या त्या राजाकडून मिळते जो स्वतःच्या अधिकारयुक्त निर्णयाने ती वेळ ठरवतो (प्रेषितांची कृत्ये 1:7).

त्याची वेळ अचूक आणि पूर्ण आहे, परंतु आपल्या सीमित दृष्टीने ती ऐन वेळी प्रकट होणारी अशी कृपा आहे: “[त्याच्या] दृष्टीने सहस्र वर्षें कालच्या गेलेल्या दिवसासारखी, रात्रीच्या प्रहरासारखी आहेत” (स्तोत्र 90:4). जागतिक स्तरावर, तो राष्ट्रांचा उदय व त्यांच्या पतनाचे समय ठरवितो (प्रेषित 17:26). आणि वैयक्तिक दृष्टीने, “माझे दिवस [त्याच्या]  हाती आहेत” (स्तोत्र 31:15).

आपण भविष्यातील कृपेच्या वेळेबद्दल काळजी करतो तेव्हा आपण “कृपेच्या राजासनावर” जाऊन चिंतन केलेंले बरे. आपल्यासाठीं ती वेळ जर योग्य असेल तर कोणतीही गोष्ट कृपा पाठवण्याच्या देवाच्या योजनेत अडथळा आणू शकत नाहीं. भविष्यातील कृपा नेहमीच ऐन वेळी मिळणारी कृपा आहे.

18 जुलाई : परमेश्वर का राजा

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18 जुलाई : परमेश्वर का राजा
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“फिर परमेश्‍वर ने उससे (याकूब से) कहा, ‘मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ। तू फूले–फले और बढ़े; और तुझ से एक जाति वरन् जातियों की एक मण्डली भी उत्पन्न होगी, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे।’” उत्पत्ति 35:11

न्यायियों की पुस्तक इस्राएलियों की कहानी बताती है, जब उनके नेता यहोशू के निधन के बाद वे प्रतिज्ञा के देश में निवास करने लगे। यह एक निराशाजनक कहानी है क्योंकि लोग बहुत जल्दी बगावत करने लगे, और एक ऐसा चक्र आरम्भ हुआ जो इस पुस्तक में बार-बार दोहराया जाता है। पहला, लोग पाप करते; दूसरा, परमेश्वर उन्हें पराजित और उत्पीड़ित होने देता; तीसरा, वे मदद के लिए रोते; और चौथा, परमेश्वर एक न्यायाधीश या नेता को उठाकर इस्राएल के शत्रुओं को हराता और देश में शान्ति स्थापित करता। लेकिन शान्ति कभी लम्बे समय तक नहीं रहती थी और यह चक्र फिर से दोहराया जाता था।

न्यायियों की अवधि के दौरान, इस्राएल धार्मिक, सामाजिक, नैतिक और आर्थिक दृष्टि से ढह रहा था। इसके परिणामस्वरूप, लोग सोचने लगे कि यदि एक राजा नियुक्त किया जाए तो जीवन बहुत बेहतर हो जाएगा, जैसा कि परमेश्वर ने याकूब से कहा था कि एक राजा का उदय होगा। फिर भी, अपने आस-पास के राष्ट्रों के समान बनने की इच्छा में उन्होंने परमेश्वर के राजत्व को नकार दिया और इस प्रकार उस अवस्था को त्याग दिया जो उन्हें अद्वितीय बनाती थी। उन्होंने परमेश्वर-तन्त्र के स्थान पर एक राज-तन्त्र की मांग की। और ऐसे राजा की तलाश करने के बजाय जो परमेश्वर की अधीनता में रहकर शासन करता और उन्हें परमेश्वर के नियमों के आज्ञापालन में स्थापित रखता, वे ऐसे राजा की तलाश करने लगे जो परमेश्वर के बजाय स्वयं उनपर शासन करे।

अद्‌भुत बात यह है कि इस्राएलियों की पापपूर्ण इच्छाओं के बावजूद परमेश्वर ने उनकी मांग को पूरा किया। इस्राएल के बहुत से राजा हुए, लेकिन कभी वह राजा नहीं आया जिसकी उन्हें सचमुच जरूरत थी। अभी एक और महान राजा आने वाला था।

इसमें भी परमेश्वर ने अपनी योजना को पूरा किया। उसने लोगों की संकीर्ण दृष्टि और दूसरे राष्ट्रों के राजा जैसे राजा की मांग को अपने परम उद्देश्य को पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया, जिसके माध्यम से ऐसा राजा आने पर था जो अन्ततः सब राष्ट्रों पर शासन करेगा। आग चलकर इस्राएल के राजवंश में यीशु का जन्म हुआ—वह आने वाला राजा जिसकी प्रतिज्ञा परमेश्वर ने की थी—वह जिसका “न तो यहूदा से राजदण्ड छूटेगा, न उसके वंश से व्यवस्था देने वाला अलग होगा; और राज्य-राज्य के लोग उसके अधीन हो जाएँगे।” (उत्पत्ति 49:10)। सच्चा राज्य मसीह द्वारा स्थापित किया जाएगा, जो परमेश्वर के अधिकार के तहत शासन करेगा और जो अयोग्य लोगों के लिए परमेश्वर का सर्वोत्तम उपहार होगा।

देखिए कितना महान है परमेश्वर, जो अपनी योजनाओं में मूर्खतापूर्ण मांगों और बुरी इच्छाओं को भी समेट लेता है! परमेश्वर हमारे चुनावों और गलतियों से बहुत बड़ा है। वह हर गलत कदम पर पूरी तरह से शासन करता है। चाहे हम इस्राएल की तरह कभी-कभी असफल हो जाते हैं, तौभी हम निश्चिन्त हो सकते हैं कि अपने उद्देश्यों को पूरा करते हुए परमेश्वर हमारी विफलताओं पर विजय प्राप्त करेगा। और आज हम किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति की सेवा करने के बजाय खुशी-खुशी उसके राजा की आज्ञाओं का पालन कर सकते हैं।

2 शमूएल 7

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 20–22; प्रेरितों 13:26-52

18 July : आध्यात्मिक कृपादानांत असलेली देवाची कृपा

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18 July : आध्यात्मिक कृपादानांत असलेली देवाची कृपा
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प्रत्येकाला जसे कृपादान मिळाले आहे तसे देवाच्या नानाविध कृपेच्या चांगल्या कारभार्‍यांप्रमाणें ते एकमेकांच्या कारणी लावा. (1 पेत्र 4:10)

जेव्हा आपण आपल्या आध्यात्मिक कृपादानांचा उपयोग करतो तेव्हा आपण कृपेचे कारभारी म्हणून भूमिका पार पाडत असतो – कालच्या कृपेचे कारभारी नव्हे, तर आजच्या कृपेचे, जी आमच्या गरजेच्या प्रत्येक क्षणी आम्हांला दिली जात असते. आणि ही भविष्यातील कृपा म्हणजें “नानाविध कृपा” आहे. ही कृपा नानाविध रंग आणि नानाविध आकार आणि नानाविध स्वरूपांत येत असते. याच एका कारणामुळें मंडळीत असलेली अध्यात्मिक कृपादाने इतकीं नानाविध आहेत. तुम्हांला देवानें जे कृपादान दिलें आहे त्याचे कार्यकारी गुणधर्म देवाच्या गौरवाच्या अशा छटा नानाविध दाखवेल ज्यां छटा देवानें मला दिलेंल्यां कृपादानांतून कधीही दिसून येणार नाहींत. 

ख्रिस्ताच्या मंडळीत जितक्या नानाविध गरजा आहेत तितक्या नानाविध भावी कृपा आहेत – आणि बरेच काहीं. अध्यात्मिक कृपादानांचा उद्देश त्या गरजा पूर्ण करण्यासाठीं देवाची कृपा प्राप्त करणें आणि ती एकमेकांच्या कारणी लावणें हा आहे.

आता एखाद्याला प्रश्न पडेल, “तुम्हीं भावी कृपेचा संदर्भ देण्यासाठीं पेत्राचेच वचन का घेतले? पुरुष एक कारभारी म्हणून आधीच हाताशी असलेला आपला घरगुती प्रपंच सांभाळत नसतो का?”

भावी कृपेचा संदर्भ देण्यासाठीं मी पेत्राचा उल्लेख केला याचे मुख्य कारण हे कीं हा कारभार कसा साध्य होतो यावर पुढील वचन प्रकाश टाकते, आणि त्या वचनाचा संदर्भ त्या भावी कृपेकडें संकेत देतो जी खंड न पडता पुरविली जाते. ते वचन असे म्हणते, “सेवा करणार्‍याने, ती आपण देवानें दिलेंल्या शक्तीने करत आहोत, अशी करावी; ह्यासाठीं कीं, सर्व गोष्टींत देवाचा गौरव येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे व्हावा; गौरव व पराक्रम हे युगानुयुग त्याचे आहेत. आमेन.” (1 पेत्र 4:11). मूळ भाषेंत हा शब्दांश “देव पुरवत असलेल्या” आहे, “देवानें पुरवलेल्या” नाहीं. तुम्हीं सेवा करत असताना, तुम्हांला जे करणें अगत्याचे असते ते साध्य करण्यासाठीं देवाच्या सतत पुरवल्या जाणाऱ्या कृपेच्या सामर्थ्याने सेवा करा.

उद्या जेव्हा तुम्हीं ख्रिस्तात असलेल्या एखाद्या बंधूची सेवा करण्यासाठीं तुमचे आध्यात्मिक कृपादान कारणी लावाल तेव्हा तुम्हीं ती सेवा “देव पुरवत असलेल्या सामर्थ्याने” कराल — आणि तो पुरवठा आज नाहीं, तर उद्या होईल. “जसे तुमचे दिवस असतील, तसे तुमचे सामर्थ्य असेल” (अनुवाद 33:25 : संपादकाचे भाषांतर).

आपण ज्या सामर्थ्याने सेवा करतो ते “सामर्थ्य” देव आपल्याला दिवसेंदिवस, क्षणाक्षणाला पुरवत असतो. तो असे करतो कारण जो त्या सामर्थ्याचा खंड न पडता पुरवठा करतो त्या अविनाशी देवाचाच त्यामुळें सर्व गौरव होतो. “सेवा करणार्‍याने, ती आपण देवानें दिलेंल्या शक्तीने करत आहोत, अशी करावी; ह्यासाठीं कीं, सर्व गोष्टींत देवाचा गौरव येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे व्हावा.”

17 जुलाई : अविश्वास से बचकर रहना

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17 जुलाई : अविश्वास से बचकर रहना
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“अतः जैसा पवित्र आत्मा कहता है, ‘यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मन को कठोर न करो, जैसा कि क्रोध दिलाने के समय और परीक्षा के दिन जंगल में किया था। जहाँ तुम्हारे बापदादों ने मुझे जाँचकर परखा और चालीस वर्ष तक मेरे काम देखे।’” इब्रानियों 3:7-9

इस्राएलियों के प्रतिज्ञा के देश में प्रवेश करने से पहले परमेश्वर ने उन्हें कनान में बारह जासूस भेजने का आदेश दिया था। उन जासूसों में से दो, यहोशू और कालेब, अपनी “अल्पसंख्यक रिपोर्ट” के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसमें उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि देश अधिकार में ले लिए जाने के लिए तैयार था। लेकिन लोगों ने उनकी बात नहीं मानी, और परमेश्वर पर अविश्वास दर्शाया। परमेश्वर पर विश्वास करने के सारे प्रमाण मौजूद होने के बावजूद उन्होंने अपनी समझ पर भरोसा करने का फैसला ले लिया।

सन्देह के उस पल में लोगों में यह डर आ गया कि यदि वे कालेब और यहोशू की बात मान कर परमेश्वर की शक्ति पर भरोसा करते हुए एक शक्तिशाली शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए कदम बढ़ाएँगे, तो वे मारे जाएँगे (गिनती 13:25-14:4)। परमेश्वर ने तुरन्त न्याय-दण्ड भेजा: परमेश्वर द्वारा दिए गए प्रतिज्ञा के देश का आनन्द लेने के बजाय एक पूरी पीढ़ी ने अपना जीवनभर मरुभूमि में बिता दिया और उस आनन्द का अनुभव नहीं कर पाए जो परमेश्वर ने उन्हें दिया था (गिनती 14:21-23)।

इस्राएलियों की तरह आप और मैं भी अविश्वास की ओर प्रवृत्त हो सकते हैं। इब्रानियों का लेखक हमें चेतावनी देता है, “हे भाइयो, चौकस रहो कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो तुम्हें जीवते परमेश्‍वर से दूर हटा ले जाए” (इब्रानियों 3:12)। ऐसी चेतावनी नहीं दी जाती यदि हमारे हृदय पाप और अविश्वास के खतरे में न होते! हम पाप करना चाहते हैं। हम अपनी ही राह पर चलना चाहते हैं। हम विश्वास करना नहीं चाहते।

अविश्वास हमें इस प्रकार कठोर कर देता है कि जब बाइबल पढ़ी जाती है, तो परमेश्वर का वचन हमारे हृदय और मन में उस बीज की तरह नहीं आता जो तैयार भूमि में बोया जाता है, इसके बजाय हमारे हृदय और मन उस तिरछी छत की तरह हो जाते हैं, जिस पर वर्षा की बूँदें नहीं रुकतीं। जितना अधिक बाइबल सिखाई जाती है, हम पर उसका प्रभाव उतना ही अधिक उस कठोर सतह के जैसे हो जाता है, जिसके पार कुछ भी नहीं जा सकता।

इसलिए सावधान रहें, ताकि आपका हृदय पवित्रशास्त्र के सत्यों के प्रति अभेद्य न हो जाए। सावधानी बरतें कि आप ऐसे व्यक्ति न बन जाएँ जो बाइबल का बचाव करता है, दूसरों से इसके बारे में बात करता है, और उद्धरण देता है, लेकिन साथ ही अपने हृदय को परमेश्वर द्वारा कही गई बातों के खिलाफ कठोर करता रहता है।

हम ऐसे अविश्वास से अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं? दूसरों को यह याद रखने के लिए प्रेरित करें कि परमेश्वर ने मसीह के द्वारा क्या किया है, और उनसे यह भी कहें कि वे आपके लिए भी ऐसा ही करें (कुलुस्सियों 3:16)। और उसी आत्मा से, जिसने पवित्रशास्त्र को लिखा है, कहें कि वह आपके हृदय में काम करे जब आप उसकी आवाज़ सुनते हैं। जब आपको परमेश्वर की शक्ति और देखभाल की याद दिलाई जाती है, और आत्मा आपके अन्दर काम करता है, तो आपका हृदय परमेश्वर के वचन के बीजों को ग्रहण करने के लिए कोमल हो जाएगा।

लूका 13:18-35

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 18–19; प्रेरितों 13:1-25 ◊

17 July : ख्रिस्तावर विश्वास जाहीर करण्यासाठीं लागणारे सामर्थ्य

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17 July : ख्रिस्तावर विश्वास जाहीर करण्यासाठीं लागणारे सामर्थ्य
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प्रेषित मोठ्या सामर्थ्याने प्रभू येशूच्या पुनरुत्थानाविषयी साक्ष देत होते; आणि त्या सर्वांवर मोठी कृपा होती.. (प्रेषितांची कृत्ये 4:33)

जर उद्या आपल्यावर अशी वेळ आली कीं ज्यामध्यें आपल्याला ख्रिस्ताची साक्ष काहीं बिकट परिस्थितीत द्यावी लागेल, तर अशा स्थितींस हाताळण्यासाठीं आवश्यक गुरुकिल्ली आमची बुद्धिमत्ता नाहीं; गुरुकिल्ली असेल ती आम्हांवर केलीं जाणारी भावी विपुल कृपा.

इतर सर्व सुवार्तीकांच्या तुलनेंत, प्रेषितांना मरणांतून उठलेल्या ख्रिस्ताविषयीं ठोस आणि विश्वासाकडें घेऊन जाणारी साक्ष देण्यासाठीं कोणाच्या मदतीची गरज वाटली नाहीं असे दिसते. ते तीन वर्षे त्याच्यासोबत होते. त्यांनी त्याला मरतांना पाहिले होते. त्यांनी त्याला वधस्तंभावर खिळल्यानंतर पुनरुत्थानाद्वारे जिवंत झालेंलें पाहिले होते. त्यांच्याकडें असलेल्या साक्षीच्या शस्त्र-सामग्रीत त्यांच्याकडें “पुष्कळ अचूक पुरावे” होते (प्रेषितांची कृत्ये 1:3). तुम्हांला असे वाटेल कीं, इतर सर्व सुवार्तीकांच्या तुलनेंत, मंडळी स्थापनेच्या त्या सुरुवातीच्या दिवसांत साक्षी देण्याचे त्यांचे कार्य त्यांनी भूतकाळात जे गौरव पहिले होते, ज्याची आठवण अद्यापही ताजीतवानी होती,  त्या बळावर टिकून राहिलेले असावे.

पण प्रेषितांची कृत्ये हे पुस्तक आपल्याला तसे सांगत नाहीं. विश्वासूपणाने आणि परिणामकारकपणें साक्ष देण्याचे जे सामर्थ्य त्यांना मिळाले ते मुख्यत्वे ह्यामुळें नाहीं कीं त्यांना त्यांच्यावर भूतकाळात झालेंल्या कृपेची आठवण होती; तर ते सामर्थ्य त्यांना त्यांच्यावर असलेल्या “मोठ्या कृपेच्या” नवीन आगमनातून मिळाले होते. “त्या सर्वांवर मोठी कृपा होती.” यामुळेंच प्रेषितांनी जें केलें तें ते करू शकलें, आणि आमच्या साक्षी देण्याच्या कार्यात देखील असेच होत असते.

आम्हीं ख्रिस्ताविषयीची साक्ष देत असतांना तिचे सामर्थ्य वाढवण्यासाठीं देवानें कितीही चिन्हे आणि चमत्कार दाखवले तरी ते जसें स्तेफनाच्या साक्षींच्या वेळी घडून आलें तसेच आमच्याही वेळी येतील. “स्तेफन कृपा1 व सामर्थ्य ह्यांनी पूर्ण होऊन लोकांत मोठी अद्भुते व चिन्हे करत असे” (प्रेषितांची कृत्ये 6:8). स्तेफनाला सर्व गोष्टींसाठीं आवश्यक असलेली कृपा ही देवाकडून येत होती – अगदी तो मरत असतांना त्याला जे सहन करावे लागणार होते त्यासाठीं देखील.

भावी काळांत आम्हांवर केलीं जाणारी अद्भुत कृपा आणि सामर्थ्य हेच आहे जे आपल्याला एखाद्या विशेष सेवेच्या वेळी ओढवलेल्या संकटात मदत करू शकेल. हे एक नव्याने प्राप्त झालेंल्या सामर्थ्याचे कार्य असते ज्याद्वारे देव “आपल्या कृपेच्या वचनाविषयी साक्ष” देतो (प्रेषित 14:3; इब्री 2:4 देखील पहा). सामर्थ्य देणारी ही अखंड कृपा सत्याच्या अखंड कृपेची साक्ष देते.