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31 जुलाई : विश्वास में कदम उठाना

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31 जुलाई : विश्वास में कदम उठाना
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“विश्‍वास ही से अब्राहम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेने वाला था; और यह न जानता था कि मैं किधर जाता हूँ, तौभी निकल गया।” इब्रानियों 11:8

यदि हम यह समझने का प्रयास करना चाहते हैं कि विश्वास को क्रिया में कैसे बदलें और परमेश्वर के वचन को सत्य मानकर अपने जीवन में कैसे उतारें, तो हमें अब्राहम के जीवन से बेहतर उदाहरण और कहीं नहीं मिलेगा। रोमियों की पुस्तक में उसे सभी विश्वासियों का पिता कहा गया है (रोमियों 4:16)। उसने यह “निश्चय जाना कि जिस बात की उसने प्रतिज्ञा की है, वह उसे पूरा करने में भी समर्थ है” (पद 21), और यही विश्वास था जिसने उसे आज्ञाकारिता और क्रिया में प्रेरित किया।

परमेश्वर का अब्राहम को बुलावा महंगा और अटपटा था: “यहोवा ने अब्राम से कहा, ‘अपने देश, और अपने कुटुम्बियों, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा’” (उत्पत्ति 12:1)। अब्राहम से कहा गया था कि वह अपना देश, अपने मित्रों और अपने विस्तारित परिवार को छोड़ दे—अर्थात जो कुछ भी वह जानता था और जो उसे प्रिय था, वह सब छोड़ दे। लेकिन परमेश्वर ने केवल आज्ञा नहीं दी, बल्कि उसने अब्राहम को नए देश में आशीर्वाद देने का वादा किया कि वह उसे “एक बड़ी जाति” बनाएगा और उसका नाम महान करेगा (पद 2)।

और अब्राहम ने आज्ञा मानी और निकल पड़ा।

कोई ऐसा क्यों करेगा? अब्राहम के पास परमेश्वर की आज्ञा और उसके साथ दिए गए वादों के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। लेकिन यही उसके लिए पर्याप्त था! यही विश्वास है जो क्रिया में बदलता है। यही वह विश्वास है जो हर दिन और हर पीढ़ी में होना चाहिए: परमेश्वर के वचन को सत्य मानना और आज्ञाकारिता में कदम बढ़ाना।

एक बार मैंने स्कॉटलैंड के एक पासबान ग्राहम स्क्रॉगी को कहते सुना, “परमेश्वर का बुलावा कभी भी व्यक्ति को वहाँ नहीं छोड़ता जहाँ वह है। वास्तव में, यदि हम तब आगे नहीं बढ़ते जब परमेश्वर कहता है ‘जाओ,’ तो हम स्थिर नहीं रह सकते।” विश्वास में कदम न बढ़ाना हमें पीछे की ओर ले जाता है, भले ही हम एक भी कदम न उठाएँ।

लेकिन अब्राहम ने आगे बढ़ते हुए कदम उठाया। उसने आज्ञाकारिता में प्रस्थान किया, “यह नहीं जानते हुए कि वह कहाँ जा रहा था।” उसके लिए यह पर्याप्त था कि परमेश्वर ने उसे जाने के लिए कहा था, और इसलिए उसे यह जानने की आवश्यकता नहीं थी कि उसकी मंजिल क्या थी। और विश्वास में कदम बढ़ाकर अब्राहम ने परमेश्वर की योजना में कदम रख दिया, जो उसके लोगों को बचाने और अपनी संसार को आशीर्वाद देने की योजना थी। अब्राहम यह जानने वाला था कि वही जगह सबसे सही है जहाँ परमेश्वर आपको रखना चाहता है, और वही उद्देश्य सबसे महत्त्वपूर्ण है जिसे परमेश्वर आपसे पूरा करवाना चाहता है।

क्या परमेश्वर अपने वचन के माध्यम से आपसे कह रहा है कि आप विश्वास और आज्ञाकारिता में आगे बढ़ें? तो “यदि आज तुम उसका शब्द सुनो, तो अपने मनों को कठोर न करो” (इब्रानियों 3:15)। परमेश्वर की आज्ञा शायद आपके द्वारा योजना बनाई गई और सोची गई सभी चीजों के विपरीत हो, और यह आपसे वह सब छोड़ने की मांग कर सकती है जो आपके लिए सुरक्षा का प्रतीक है—लेकिन यदि वह बुला रहा है, तो आपको जाना ही होगा।

रोमियों 4

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 54–56; प्रेरितों 21:1-17 ◊

31 July : संकटे जे विश्वासाला चिरडून टाकतांत

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31 July : संकटे जे विश्वासाला चिरडून टाकतांत
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“तथापि त्यांच्यामध्यें मूळ नसल्याकारणाने ते अल्पकाळ टिकाव धरतांत; मग वचनामुळें संकट आलें किंवा छळ झाला म्हणजें ते लगेच अडखळतांत.” (मार्क 4:17)

दु:खें येतांत तेव्हां काहींचा विश्वास टिकाव धरण्याऐवजी तो अडखळतो. येशू हे जाणून होता; त्यानें पेरणी करणार्‍याचा जो दाखला दिला त्यांत त्यानें हे समजावून सांगितलें. काहीं लोक वचन ऐकताच ते आनंदाने ग्रहण करतांत, परंतु संकटे येताच ते विश्वासापासून पतन पावतांत.

यास्तव, संकटे आणि दु:खें यांमुळें प्रत्येक प्रसंगी विश्वास मजबूतच होतो असें नाहीं. कधी कधी संकटे आणि दु:खें विश्वासाला चिरडून टाकतांत. आणि मग येशूचे गोंधळ उडवणारे हे शब्द खरे ठरतांत, “ज्या कोणाजवळ नाहीं त्याच्यापासून जे आहे तेही काढून घेतले जाईल” (मार्क 4:25).

आपण भावी कृपेवर दृढ विश्वास ठेवून दु:ख सहन करावें याचे हे आव्हान आहे, जेणेंकरून आपला विश्वास अधिक दृढ व्हावा व तो व्यर्थ ठरू नये (1 करिंथ 15:2). “ज्याच्याजवळ आहे त्यास आणखी दिलें जाईल” (मार्क 4:25). आपल्यावर संकटे आणण्यामागे असलेला देवाचा हेतू जाणून घेणें हे संकटांद्वारे विश्वासात वाढण्याचे एक मुख्य साधन आहे.

जर तुम्हांला असं वाटत असेल कीं तुमच्यावर येणारे संकट व दुःख निरर्थक आहेत, किंवा तें देवाच्या नियंत्रणात नाहींत, किंवा तो लहरी किंवा क्रूर आहे, तर तुमचे संकट व दुःख हे तुम्हांला इतर सर्व गोष्टींपासून दूर पळ काढून देवाकडें धाव घेण्यांस प्रवृत्त करण्याऐवजी -कारण असेच व्हायला पाहिजें- ते तुम्हांला देवापासून दूर नेतील. म्हणून, आपण देवाच्या कृपेवर विश्वास ठेवतो तेव्हां हा विश्वास ठेवणें देखील महत्वाचे असते कीं तो ह्या कृपेचा पुरवठा दु:खाद्वारे सुद्धा करतो.

30 जुलाई : हमारी निर्बलता में उसकी शक्ति

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30 जुलाई : हमारी निर्बलता में उसकी शक्ति
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“तब यहोवा ने गिदोन से कहा, ‘जो लोग तेरे संग हैं वे इतने हैं कि मैं मिद्यानियों को उनके हाथ नहीं कर सकता, नहीं तो इस्राएली यह कहकर मेरे विरुद्ध अपनी बड़ाई मारने लगेंगे कि हम अपने ही भुजबल के द्वारा बचे हैं। इसलिए तू जाकर लोगों में यह प्रचार करके सुना दे, “जो कोई डर के मारे थरथराता हो, वह गिलाद पहाड़ से लौटकर चला जाए।”‘ तब बाइस हज़ार लोग लौट गए, और केवल दस हज़ार रह गए।” न्यायियों 7:2-3

परमेश्वर का उद्देश्य हर युग में अपने लोगों के लिए यह है कि हम पूरी तरह से उस पर निर्भर रहें। जब परमेश्वर ने गिदोन को इस्राएलियों को बचाने के लिए बुलाया, तो उसे एक अत्यधिक कठिन कार्य का सामना करना पड़ा: उसकी सेना को मिद्यानियों का सामना करना था। कहा जाता है कि उनकी सेना टिड्डी-दल की तरह विशाल थी, और “उनके ऊँट समुद्र तट की बालू के किनकों के समान गिनती से बाहर थे” (न्यायियों 7:12)। इसकी तुलना में गिदोन की 32,000 की सेना बहुत छोटी थी।

और फिर परमेश्वर ने उससे कहा, “जो लोग तेरे संग हैं वे इतने हैं कि मैं मिद्यानियों को उनके हाथ नहीं कर सकता।” और इस प्रकार 22,000 लोग सेना से चले गए। निस्सन्देह गिदोन गणना कर रहा था और सोच रहा था कि वह इतने कम सैनिकों के साथ इतनी बड़ी ताकत का मुकाबला कैसे कर सकता है। उसे यह नहीं पता था कि वह कमजोरी की आवश्यकता के बारे में एक सबक सीखने जा रहा था।

परमेश्वर हमारे हालात में हमेशा काम करता है, ताकि हम अपनी पूरी निर्भरता उस पर डाल सकें और उसके उद्धार के लिए अधिक गहरी स्तुति अर्पित कर सकें। जैसे आज हमारे जीवन में है, वैसे ही गिदोन के जीवन में भी परमेश्वर ने इस तथ्य को सुनिश्चित कर दिया कि वही एकमात्र परमेश्वर हैं। उसकी महिमा न तो किसी और के साथ साझा की जाएगी और न ही कोई और उसे चुराएगा। सीधे शब्दों में कहें, तो परमेश्वर पूरी तरह सक्षम हैं; हम नहीं हैं। तब भी और अब भी, वह हमें हमारी कमजोरी को विनम्रता से स्वीकारने की आवश्यकता दिखाता है, ताकि हम उसकी महानता को बढ़ा सकें।

सच तो यह है कि हमारा अहंकार अपनी सबसे अधिक कुरूपता तब दिखाता है जब वह आध्यात्मिक अहंकार के रूप में प्रकट होता है—जब हम अपने अनुभवों पर या परमेश्वर के लिए अपनी सफलताओं पर गर्व करने लगते हैं। यही प्रवृत्ति उन “बड़े से बड़े प्रेरितों” की थी, जिनका उल्लेख पौलुस ने 2 कुरिन्थियों 12:11 में किया था; वे बहुत शक्तिशाली लगते थे, उनके पास यह बताने के लिए ढेरों कहानियाँ थीं कि कैसे वे आत्मा की शक्ति से भरे हुए थे। लेकिन पौलुस ने बस इतना कहा, “यदि मैं घमण्ड करना चाहूँ भी तो मूर्ख न हूँगा, क्योंकि सच बोलूँगा; तौभी रुक जाता हूँ, ऐसा न हो कि जैसा कोई मुझे देखता है या मुझसे सुनता है, मुझे उससे बढ़कर समझे” (पद 6)। वह समझ गया था कि विनम्रता, कमजोरी, और अपर्याप्तता वे कुंजियाँ हैं, जो परमेश्वर के राज्य में उपयोगिता के लिए आवश्यक हैं।

इसीलिए परमेश्वर ने गिदोन की सेना को और भी घटाकर केवल 300 कर दिया (न्यायियों 7:7)। वह अपना उद्देश्य इतनी छोटी संख्या में लोगों से पूरा करने जा रहा था कि जब जीत प्राप्त होती, तो सभी को यह पता चलता कि जीत का स्रोत कौन था। और अपनी दया में होकर परमेश्वर आज भी हमारे लिए यही करता है। वह हमें याद दिलाता है कि जो लोग उसके उद्देश्य और योजना के लिए सबसे अधिक उपयोगी होते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं, जो संसार की नजर में कार्य को पूरा करने के लिए सक्षम नहीं होते—क्योंकि तब यह स्पष्ट हो जाता है कि यह उसका काम है, न कि उनका।

यदि आप अपने घमण्ड और आत्मनिर्भरता को पकड़े रखना चाहते हैं, तो यह आपके लिए बुरी खबर है। यदि आप प्रशंसा प्राप्त करना चाहते हैं, तो यह आपके लिए बुरी खबर है। लेकिन यह आपके लिए अद्‌भुत खबर है यदि आप जानते हैं कि आप उन कार्यों के लिए अपर्याप्त हैं जो परमेश्वर ने आपके सामने रखे हैं। आज आप जिन भी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनमें से कौन सी समस्याओं का समाधान करने में आप अपने आप को पूरी तरह से अयोग्य मानते हैं? उस पर निर्भर रहें और आज्ञाकारिता में आगे बढ़ें, और आप पाएँगे कि उसकी शक्ति आपकी कमजोरी में प्रकट होती है (2 कुरिन्थियों 12:9-10)—और आप उसकी अधिक प्रशंसा करेंगे।

न्यायियों 7:1-23

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 51–53; प्रेरितों 20:17-38

30 July : विश्वास बळकट करणारे दुःख

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30 July : विश्वास बळकट करणारे दुःख
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माझ्या बंधूंनो, नाना प्रकारच्या परीक्षांना तुम्हांला तोंड द्यावे लागते तेव्हा तुम्हीं आनंदच माना. तुम्हांला ठाऊक आहे कीं, तुमच्या विश्वासाच्या परीक्षेने धीर उत्पन्न होतो. (याकोब 1:2-3)

हे विचित्र वाटेल, पण आपण निरनिराळ्या दु:खांनी डळमळलें जातो यामागील मुख्य हेतू हा कीं त्याद्वारे आपला विश्वास अधिक खंबीर व्हावा.

विश्वास हा स्नायूंच्या ऊतीसारखा असतो : जर तुम्हीं त्यावर पुरेसा ताण दिला तर तो दुर्बळ होण्याऐवजी अधिक बळकट होतो. याकोबाला हेंच म्हणायचे आहे. तुमच्या विश्वासाला धमकाविण्यांत येते व त्याला नाना प्रकारच्या परीक्षांना तोंड द्यावे लागते आणि तो तोडून टाकण्याच्या पराकाष्ठेपर्यंत ताणला जातो, तेव्हा परिणामी त्यांत खंबीरपणें टिकून राहणारे बळ उत्पन्न होते. याकोब ह्याला धीर म्हणतो.

देवाला विश्वासांत इतका संतोष वाटतो कीं त्यांस तो शुद्ध आणि मजबूत ठेवण्यासाठीं तोडून टाकण्याच्या पराकाष्ठेपर्यंत त्याची परीक्षा घेतो. उदाहरणार्थ, 2 करिंथ 1:8-9 नुसार त्यानें पौलाबरोबर असेच केलें.

बंधुजनहो, आशियात आमच्यावर आलेंल्या संकटांविषयी तुम्हांला ठाऊक नसावे अशी आमची इच्छा नाहीं; ते असे कीं, आम्हीं आमच्या शक्तीपलीकडें अतिशयच दडपले गेलो; इतके कीं आम्हीं जगतो कीं मरतो असे आम्हांला झालें. फार तर काय, आम्हीं मरणारच असे आमचे मन आम्हांला सांगत होते; आम्हीं स्वत:वर नव्हे तर मृतांना सजीव करणार्‍या देवावर भरवसा ठेवावा, म्हणून हे झालें.

“म्हणून हे झालें” हे शब्द प्रकट करतांत कीं शक्तीपलीकडें असलेल्या या अतिशयच दुःखामागे देवाचा एक हेतू होता : तो हेतू हा कीं पौलाने स्वतःवर आणि त्याच्याकडें असलेल्या संसाधनांवर नव्हे तर देवावर भरवसा ठेवावा – विशेषतः मृतांना सजीव करणार्‍या देवाच्या वचनदत्त कृपेवर.

देव पूर्ण मनापासून ठेवलेल्या विश्वासाला इतके महत्त्व देतो कीं तो आवश्यक असल्यास आपल्यावर कृपा करून जगात असलेल्या त्या सर्व गोष्टीं आमच्यापासून दूर करू शकतो ज्यांवर आपण भरवसा ठेवण्याच्या परीक्षेंत पडू शकतो- अगदी जीवन देखील. यामागे त्याचा उद्देश्य हांच आहे कीं आपण आपल्या ह्या विश्वासात अधिक प्रगती करावी आणि त्यांत बळकट व्हावें कीं आपल्याला आवश्यक असलेल्या सर्व गोष्टींत तो स्वतः सर्व काहीं असेल.

आपल्याविषयी त्याची इच्छा ही आहे कीं स्तोत्रकर्त्यासोबत आपणही असे म्हणावे, “स्वर्गात तुझ्याशिवाय मला कोण आहे? पृथ्वीवर मला तुझ्याशिवाय दुसरा कोणीही प्रिय नाहीं. माझा देह व माझे हृदय ही खचली; तरी देव सर्वकाळ माझ्या जिवाचा आधार व माझा वाटा आहे (स्तोत्र 73:25-26).

29 जुलाई : हस्तक्षेप को स्वीकार करना

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29 जुलाई : हस्तक्षेप को स्वीकार करना
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“जब वह मन्दिर में टहल रहा था तो प्रधान याजक और शास्त्री और पुरनिए उसके पास आकर पूछने लगे, ‘तू ये काम किस अधिकार से करता है? और यह अधिकार तुझे किस ने दिया है कि तू ये काम करे?’” मरकुस 11:27-28

हम में से कोई भी नहीं चाहता कि कोई दूसरा हमारे काम में हस्तक्षेप करे।

जब कोई हमारे ध्यान की या हमारे द्वारा आज्ञापालन किए जाने की मांग करता है, तो हम स्वाभाविक तौर पर नकारात्मक रूप से प्रतिक्रिया करते हैं। सामान्य तौर पर, हम नहीं चाहते कि लोग हमें बताएँ कि हमें क्या करना चाहिए, और विशेष रूप से आध्यात्मिक मामलों में तो बिल्कुल भी नहीं। यह हमेशा लुभावना होता है कि हम इस विचार को स्वीकार कर लें, जो आजकल बहुत लोकप्रिय है, कि हमारी आध्यात्मिकता किसी और का मामला नहीं है—यह एक व्यक्तिगत मामला है जो केवल हमसे सम्बन्धित है।

इसीलिए जब हम सुसमाचार पढ़ते हैं, तो हम विशेष रूप से असहज महसूस कर सकते हैं क्योंकि यह स्पष्ट हो जाता है कि यीशु हमारे जीवनों में हस्तक्षेप करता है। हाँ, यह हमारे भले के लिए है—लेकिन फिर भी, वह हस्तक्षेप करता है। वास्तव में, अपनी आत्मकथा में, सी.एस. लुईस ने यीशु को “आध्यात्मिक हस्तक्षेपकर्ता” कहा है।

यीशु के सेवाकार्य की आरम्भ से ही लोगों ने महसूस किया कि वह अधिकार के साथ बोलता था (मरकुस 1:22, 27 देखें)। वह इस प्रकार से बातें बोलता था कि उन्हें न तो टाला जा सकता था और न ही उन्हें आसानी से नकारा जा सकता था। लेकिन लोग उसकी बातों का प्रतिरोध करने और उन्हें अस्वीकार करने के लिए मुक्त थे। उसकी अधिकारपूर्ण शिक्षाएँ धार्मिक शिक्षकों के लिए बगल में कांटे की तरह बन गईं, और उन्होंने यीशु का विरोध करना आरम्भ कर दिया। आखिरकार, वे उसे मारने की साजिश रचने लगे ताकि उन्हें अपने आध्यात्मिक जीवन को यीशु के सामने खोलने की आवश्यकता न पड़े (मरकुस 3:6)।

धार्मिक नेताओं की तरह हम भी अक्सर एक व्यक्तिगत आध्यात्मिकता पसन्द करते हैं, जो हमारे उद्देश्यों और जीवनशैली द्वारा ढाली जाती है: “मैं यह मानता हूँ। मैं इस पर दृढ़ हूँ। हमने हमेशा से यह किया है। हमारी परम्परा यह है।” यीशु आकर इन सब विचारों को उलट देता है, और मनुष्य द्वारा बनाई गई मान्यताओं को पलट देता है।

वास्तव में, यीशु ने पृथ्वी पर अपने सेवाकार्य के अन्त के समय घोषणा की कि सारा अधिकार उसे दिया गया है (मत्ती 28:18-19)। वह उस अधिकार को किसी के साथ साझा नहीं करता। वास्तव में, हमारे आध्यात्मिक जीवन का दायित्व उस पर है। अब हम उसके सामने सिर झुका कर उसे प्रभु और उद्धारक के रूप में स्वीकार करते हैं, या फिर एक दिन हम उसके सामने सिर झुका कर उसे केवल न्यायाधीश के रूप में मिलेंगे।

यीशु को हमारे अस्तित्व के एक छोटे से कोने में जोड़ लेना आसान और गैर-हस्तक्षेपकारी है; लेकिन यह पूरी तरह से अलग बात है कि हम “आध्यात्मिक हस्तक्षेपकर्ता” को हमारे जीवन के हर पहलू को उसके नियन्त्रण में लेने और हमसे पूर्ण आज्ञाकारिता की मांग करने की अनुमति दें। उसका पूर्ण अधिकार वह विषय है जिस पर हमें हर निर्णय में विचार करना चाहिए। इसलिए हमें यह असहज करने वाला प्रश्न पूछना पड़ता है: क्या मैं अपनी प्राकृतिक इच्छाओं के अनुसार और अपने द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार जी रहा हूँ? या क्या मैं हर दिन और हर तरीके से अपने उद्धारक के प्रति खुशी-खुशी समर्पण करने का प्रयास कर रहा हूँ?

यह तभी सम्भव है जब हम यीशु के अधिकार के सामने झुकते हैं, उसके प्रभुत्व को हमारे समय, हमारे कौशल, हमारे पैसे, हमारी हरेक चीज पर स्वीकार करते हैं, केवल तभी हम उसे प्रभु और उद्धारक के रूप में पूरी तरह से अपनाने और उसे एक मित्र और मार्गदर्शक के रूप में जानने का आनन्द ले सकते हैं। क्या आप किसी भी तरह से उसे दूर रखे हुए हैं? यही वह स्थान है जहाँ वह आपको उसे हस्तक्षेप करने की अनुमति देने के लिए कहता है; यही वह स्थान है जहाँ आपके पास उसे उस व्यक्ति के रूप में सच्चे तौर पर स्वीकार करने का अवसर है, जिसके पास सारा अधिकार है। वह निश्चित रूप से आपके जीवन में हस्तक्षेप करेगा—लेकिन इसका अधिकार केवल उसी के पास है, और केवल वही आपको स्वतन्त्र कर सकता है।

दानिय्येल 7:9-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 49–50; प्रेरितों 20:1-16 ◊

29 July : विश्वासासाठीं हुतात्मे झालेंल्यांसाठीं देवाची योजना

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29 July : विश्वासासाठीं हुतात्मे झालेंल्यांसाठीं देवाची योजना
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तेव्हा त्या प्रत्येकाला एकेक शुभ्र झगा देण्यात आला आणि त्यांना असे सांगण्यात आलें कीं, तुमच्या सोबतीचे दास व तुमचे बंधू तुमच्यासारखे जिवे मारले जाणार, त्यांची संख्या पूर्ण होईपर्यंत तुम्हीं आणखी थोडा वेळ विश्रांती घ्या. (प्रकटीकरण 6:11)

ख्रिस्ती धर्माची जवळजवळ तीनशे वर्षांची प्रारंभिक वाढ ही हुतात्म्यांच्या रक्ताने माखलेल्या मातीतून झाली.

सम्राट ट्राजन (सन सुमारे 98), ह्याच्या कारकिर्दीचा आरंभ होईपर्यंत छळ जरी कायदेशीर नव्हता तरी त्याची मोकळीक होती. सम्राट ट्राजनच्या कारकिर्दीपासून ते सम्राट डेशियसच्या कारकिर्दीच्या आरंभापर्यन्त (सन सुमारे 250 AD), छळ कायदेशीर झालेंला होता. डेशियस, जो ख्रिस्ती लोकांचा द्वेष करत होता आणि ज्याला त्याच्याद्वारे करण्यांत येणाऱ्या बेकायदेशीर सुधारणांवर त्यांच्या प्रभावाची धास्ती होती, ह्याच्या कारकिर्दीच्या आरंभापासून ते सन 311 मध्यें धार्मिक सहिष्णुतेचा प्रथम कायदा येईपर्यंत, ख्रिस्ती लोकांचा छळ केवळ कायदेशीरच नव्हता, तर सर्वत्र व्यापक आणि सामान्य झालेंला होता. 

एका लेखकाने या तिसऱ्या कालखंडातील परिस्थितीचे वर्णन पुढील शब्दांत केलें :

मंडळ्यांमध्यें सर्वत्र दहशत पसरली होती; आणि लॅप्सीची संख्या [ज्यांनी आपला जीव वाचविण्यासाठीं विश्वासापासून माघार घेतली होती] . . . फार मोठी होती. तरी, जे विश्वासांत खंबीरपणें टिकून राहिले आणि ज्यांनी शरण जाण्याऐवजी हौतात्म्य पत्करले, अशांची संख्या पण कमी नव्हती; आणि, छळ जसजसा व्यापक आणि तीव्र होत गेला, तसतसा ख्रिस्ती लोकांचा उत्साह आणि त्यांची प्रतिकार-शक्ती अधिकाधिक बळकट होत गेली.

या प्रमाणें, त्यां तीनशे वर्षांच्या काळांत ख्रिस्ती असणें हा जीवन आणि संपत्ती व कुटुंब यांसाठीं प्रचंड धोकादायक विश्वास होता. आपण कोणत्या गोष्टींवर अधिक प्रीति करतो याची ही परीक्षा होती. आणि या परीक्षेचा टोकाचा बिंदू म्हणजें हौतात्म्य पत्करणें.

आणि त्या हौतात्म्यपणावर एक अशा सार्वभौम देवाचे वर्चस्व होते ज्याने म्हटलें कीं त्यां हुतात्म्यांची संख्या ठराविक आहे. मंडळीरोपण करणें आणि तिला सुदृढ करणें यांत त्यांची विशेष भूमिका आहे. सैतानाचे तोंड बंद करण्यात त्यांची विशेष भूमिका आहे, जो सतत म्हणतो कीं देवाचे लोक त्याची सेवा केवळ यामुळें करतांत कारण त्यांचे जीवन सोयीस्कर आहे. ईयोब 1:9-11 चा हाच मुद्दा आहे.

हौतात्म्य ही काहीं अपघाती गोष्ट नाहीं. ही एखादी अशी गोष्ट नाहीं जी घडून आल्यावर स्वतः देव चक्रावून जातो. ती अनपेक्षित घटना नाहीं. आणि नक्कीच ही गोष्ट ख्रिस्ताचा प्रचार करण्यासाठीं तयार करण्यांत आलेंल्यां धोरणाचा पराभवहि नाहीं.

हौतात्म्य कदाचित पराभव वाटू शकतो. परंतु हा स्वर्गात आखलेल्या योजनेचाच भाग आहे ज्याची कल्पना कोणत्याही मानवी रणनीतीकाराने कधीहि केलीं नाहीं किंवा ज्याची रचना तो कधीहि करू शकणार नाहीं. आणि जे देवाच्या त्या कृपेवर विश्वास ठेवून शेवटपर्यंत टिकून राहतांत जी त्यांच्यासाठीं सर्व बाबतींत पुरेशी आहे ते सर्व ह्या योजनेंत विजयी होतांत.

28 जुलाई : चलने वाले बनो

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28 जुलाई : चलने वाले बनो
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“वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं।” याकूब 1:22

विश्वासियों के रूप में, हमारे जीवन में परमेश्वर के वचन की सच्चाई के प्रति प्रशिक्षित और समर्पित मन होने चाहिए, और हमें अपनी परिस्थितियों को प्रार्थना से भरना चाहिए (फिलिप्पियों 4:6-8)। फिर भी, यदि हम हमारे भीतर काम कर रही परमेश्वर की शक्ति का अनुभव और आनन्द लेना चाहते हैं, तो हमें उसे अभ्यास में लाना होगा, जो हम पवित्र पवित्रशास्त्र में सुनते हैं। हमें हर दिन पवित्रशास्त्र पर ध्यान केन्द्रित करने में तत्पर रहना चाहिए, और जब परमेश्वर का वचन पढ़ा जा रहा हो तब उसमें उपस्थित रहना चाहिए, लेकिन हमें कभी यह नहीं सोचने की गलती करनी चाहिए कि सिर्फ उपस्थित होना, ध्यान देना और ध्यान से सुनना पर्याप्त है। पवित्रशास्त्र कहता है, “वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं . . .।” (याकूब 1:22)।

यूहन्ना 13 में, यीशु अपनी मृत्यु से पहले की रात कुछ समय तक अपने शिष्यों को शिक्षा देने के बाद उनसे कहता है, “तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो” (यूहन्ना 13:17)। यदि आप सोचते हैं कि आप परमेश्वर का आशीर्वाद क्यों अनुभव नहीं कर रहे हैं, तो इसका कारण यह हो सकता है कि आप उसके वचन को अपने जीवन में लागू नहीं कर रहे हैं। प्रभु ने हमें समृद्ध निर्देश दिए हैं और उसने हमें हमारे सहायक के रूप में अपना आत्मा दिया है। अब हमारा दायित्व है कि हम अपने मन को परमेश्वर के वचन की सच्चाई में प्रशिक्षित करें और फिर जो हमने सीखा है, प्राप्त किया है, और सुना है, उसे करें।

यह कितने दुख की बात है जब कलीसियाएँ पुराने धूल भरे पुस्तकालयों जैसी बन जाती हैं, जहाँ इतने सारे जीवन होते हैं जो सच्चाई के खण्डों की तरह तो होते हैं, लेकिन बस वहाँ बैठे रहते हैं और कभी उपयोग में नहीं आते। जब हम सत्य के प्रति अधिक जागरूक होते हैं, तो प्रलोभन यह होता है कि हम सिर्फ बैठकर उस पर विचार करें और कभी भी उसके अनुसार कार्य न करें। याकूब इस प्रकार के जीवन को बहुत स्पष्ट शब्दों में बताता है: यह अपने आप को धोखा देना है। नहीं—कलीसिया को तो जीवित अनुभवों का एक भवन होना चाहिए। विश्वासियों के भीतर एक जीवन्तता होनी चाहिए, ताकि जब हम संसार की समस्याओं का सामना करें—जिन समस्याओं से हम खुद भी अछूते नहीं हैं—तो हम उन्हें उनकी वास्तविकता में देख सकें और परमेश्वर के वचन के सत्य को अपने जीवन में जीते हुए इन समस्याओं का सामना कर सकें।

आज ही संकल्प लें कि आप केवल सुनने वाले नहीं होंगे और इस प्रकार खुद को यह धोखा नहीं देंगे कि आप एक प्रगतिशील मसीही हैं, जबकि वास्तव में आप एक सूखते हुए मसीही हैं। वचन पर चलने वाले बनने का संकल्प लें। अब अपने जीवन पर ईमानदारी से विचार करें और उन क्षेत्रों की पहचान करें जहाँ आपने मसीह के लिए जीने के बारे में सुना है, लेकिन कभी सच में आज्ञा नहीं मानी। वही आपके जीवन का वह हिस्सा होगा, जिस बारे में पवित्र आत्मा आपको अभी कह रहा है, केवल सुनने वाले मत बनो। करने वाले बनो—क्योंकि उसी से आशीर्वाद मिलता है।

याकूब 1:19-27

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 46–48; प्रेरितों 19:21-41

28 July : आम्हींधैर्य का सोडत नाहीं

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28 July : आम्हींधैर्य का सोडत नाहीं
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म्हणून आम्हीं धैर्य सोडत नाहीं; परंतु जरी आमचा बाह्य देह क्षय पावत आहे, तरी अंतरात्मा दिवसानुदिवस नवा होत आहे. कारण आमच्यावर येणारे तात्कालिक व हलके संकट हे आमच्यासाठीं अत्यंत मोठ्या प्रमाणात सार्वकालिक गौरवाचा भार उत्पन्न करते; आम्हीं दृश्य गोष्टींकडें नाहीं तर अदृश्य गोष्टींकडें लक्ष लावतो; कारण दृश्य गोष्टी क्षणिक आहेत, पण अदृश्य गोष्टी सार्वकालिक आहेत. (2 करिंथ 4:16-18)

पौलाला जसा पूर्वी रस्ता दिसत होता तसा तो आता पाहू शकत नाहीं (कारण त्या काळी चष्मा नव्हता). जसे त्याला पूर्वी ऐकू येत असे तसे त्याला आता ऐकू येऊ शकत नाहीं (कारण त्या काळी श्रवणयंत्र नव्हते). मारहाणीपासून जसा तो पूर्वी बरा व्हायचा तसा तो आता लवकर बरा होऊ शकत नाहीं (कारण त्या काळी आजच्याप्रमाणें कोणतीही एंटीबायोटिक औषधे नव्हती). एका नगरातून दुसऱ्या नगरांकडें चालत जात असतांना त्याची शक्ती आता पूर्वीसारखी टिकत नाहीं. त्याच्या चेहऱ्यावर आणि मानेवर सुरकुत्या स्पष्ट दिसू लागल्या आहेत. त्याची स्मरणशक्ती आता पूर्वीसारखी तीक्ष्ण राहिलेली नाहीं. आणि तो कबूलहि करतो कीं ह्या सर्व दुर्बळपणामुळें त्याच्या विश्वासाला आणि आनंदाला आणि धैर्याला मोठा धोका होता.

तरी तो धैर्य सोडत नाहीं. का?

तो धैर्य सोडत नाहीं कारण कीं त्याचा अंतरात्मा दिवसानुदिवस नवा होत आहे. कसा?

त्याच्या अंतरात्म्याचे नवीनीकरण एका अशा गोष्टीमुळें होत असे जी पूर्णपणें अद्भुत अशी होती : अंतरात्म्याचे ते नवीनीकरण अशा गोष्टींकडें लक्ष लावल्यामुळें होत असे ज्यांना तो पाहू शकत नव्हता, म्हणजें ज्यां अदृश्य अशा होत्यां.

आम्हीं दृश्य गोष्टींकडें नाहीं तर अदृश्य गोष्टींकडें लक्ष लावतो; कारण दृश्य गोष्टी क्षणिक आहेत, पण अदृश्य गोष्टी सार्वकालिक आहेत. (2 करिंथ 4:18)

ह्याच कारणामुळें पौल धैर्य सोडत नव्हता : म्हणजें जे तो पाहू शकत नव्हता त्यांकडें तो लक्ष लावत होता. तर मग, त्यानें ज्या अदृश्य गोष्टींकडें लक्ष लावलें, तेव्हां त्याला काय दिसलें?

2 करिंथकर 5:7 मध्यें काहीं वचनांनंतर, तो म्हणतो, “आम्हीं विश्वासाने चालतो, डोळ्यांनी दिसते त्याप्रमाणें चालत नाहीं.” याचा अर्थ असा नाहीं कीं तिथे काय आहे याचा काहीं पुरावा नसताना देखील तो जणू अंधारात झेप घेत होता. याचा अर्थ असा आहे कीं आपण वर्तमान समयी ह्या जगात राहत असतांना ज्यां गोष्टीं वास्तविकरीत्या अति मौल्यवान आणि महत्त्वपूर्ण आहेंत त्यांची समज आपल्या भौतिक इंद्रियांच्या पलीकडें आहे.

आपण या अदृश्य गोष्टींकडें सुवार्तेच्या भिंगातून “पाहतो.” आम्हीं आमच्या धैर्याचे नूतनीकरण करतो—म्हणजें ज्यांनी ख्रिस्ताला देहरूपी साक्षात पाहिले त्यांनी दिलेंल्यां साक्षीमध्यें आपण पाहत असलेल्या अदृश्य, वस्तुनिष्ठ सत्याकडें आपली दृष्टि लावून आम्हीं आपली अंतःकरणें बळकट करतो.

 “अंधारातून उजेड प्रकाशित होईल” असे जो देव बोलला तो येशू ख्रिस्ताच्या मुखावरील देवाच्या गौरवाच्या ज्ञानाचा प्रकाश पाडण्यासाठीं आमच्या अंतःकरणात प्रकाशला आहे” (2 करिंथ 4:6). “येशू ख्रिस्ताच्या मुखावरील देवाच्या गौरवाच्या ज्ञानाचा प्रकाश.” ज्या क्षणी सुवार्तेद्वारे आमच्या अंतःकरणात हा प्रकाश पडतो त्या क्षणी ते आमच्या दृष्टींस पडते. 

हा प्रसंग घडला त्या क्षणी आम्हीं ख्रिस्ती झालो – मग आम्हांला ते समजले असो वा नसो. आणि आपणही पौलाबरोबर आपल्या अंतःकरणाच्या डोळ्यांनी पाहणें गरजेचे आहे, जेणेंकरून आपणही धैर्य सोडून देऊं नये.

27 जुलाई : उस पर ध्यान करो

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27 जुलाई : उस पर ध्यान करो
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“इसलिए उस पर ध्यान करो, जिसने अपने विरोध में पापियों का इतना विरोध सह लिया कि तुम निराश होकर साहस न छोड़ दो।” इब्रानियों 12:3

क्या कभी आप अपने विश्वास को त्यागने के प्रलोभन में पड़े हैं? शायद किसी कठिन सप्ताह के दौरान आपने अपनी परिस्थितियों पर विचार किया और सोचा, “इनमें से कोई भी बात मेरे लाभ के लिए काम नहीं कर रही है। अब समय आ गया है कि मैं मसीहत को भूलकर वैसे जीऊँ जैसे दूसरे जीते हैं।” ऐसे समय में, हमारे लिए यह देखना आसान होता है कि हमारे अविश्वासी दोस्त, परिवार और सहकर्मी अलग तरह से और अधिक आसान जीवन जी रहे होते हैं, और ऐसा लगता है कि उनका जीवन शानदार चल रहा है। जलन से भरी नज़रें सन्देह और भ्रम पैदा करती हैं और हमारी दृढ़ता को चुराकर हमें सीधा और सकरा रास्ता छोड़ देने के लिए उकसाती हैं।

भजनकार आसाफ का भी यही अनुभव रहा था। उसके “डग तो उखड़” ही गए थे, क्योंकि जब वह “दुष्‍टों का कुशल देखता था, तब उन घमण्डियों के विषय डाह करता था” जो “सदा आराम से” रह रहे थे (भजन 73:2-3, 12)। ऐसा लगता है कि यही अनुभव उन मसीहियों का भी रहा था, जिन्हें इब्रानियों की पुस्तक के लेखक ने स्वयं सम्बोधित किया। उन्होंने अभी तक विश्वास में दृढ़ रहने के लिए अपना लहू नहीं बहाया था (इब्रानियों 12:4), लेकिन यह स्पष्ट था कि उनके भीतर के पाप से संघर्ष और बाहर से आ रहे विरोध का सामना करने के लिए संघर्ष उनके ऊपर भारी पड़ रहा था।

अब उन्हें क्या करना चाहिए था? यीशु पर ध्यान करें। हिम्मत हारने और थकावट का बाइबल के अनुसार इलाज यह है कि हम अपनी दृष्टि उस पर रखें जिसने विरोध सहा—जो क्रूस पर मर गया—ताकि उस आनन्द को प्राप्त कर सके जो उसके सामने रखा था (इब्रानियों 12:2)।

हमारे जीवन में एक समय ऐसा आएगा जब हमें शब्दों, कामों या परिस्थितियों में अन्यायपूर्ण रीति से दुखों का सामना करना पड़ेगा—और हम यह स्वीकार कर सकते हैं कि हम अपनी पसलियों में भाला चुभाना और हाथों-पैरों में कीलें ठुकवाना नहीं चाहते। हम सभी को इस वास्तविकता का सामना करना पड़ेगा कि हमने उन पापों को अभी तक नहीं हराया है, जिनके साथ हम वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं।

हम सभी के सामने ऐसे दिन आएँगे जब हम दौड़ में नहीं रहना चाहते, जब दौड़ को छोड़ देने और उसमें से बाहर हो जाने का प्रलोभन हम पर आएगा। उन दिनों में आपको क्या करना चाहिए? परमेश्वर के वचन को सुनें जो कहता है, उस पर ध्यान करो। मसीह के जीवन पर ध्यान करो: वह कैसा था और उसका परिणाम क्या निकला। उसने महिमा का दरवाजा खोला; अब हम उसके पीछे उस रास्ते पर चल रहे हैं। यीशु पर ध्यान करो, जिसने अपनी दौड़ पूरी की और “परमेश्वर के सिंहासन की दाहिनी ओर जा बैठा” (इब्रानियों 12:2)। चाहे रास्ता कठिन चढ़ाई का हो या हवा हमारे खिलाफ हो, दिन-प्रतिदिन हम उसी पर ध्यान करते रहें और “वह दौड़ जिसमें हमें दौड़ना है धीरज से दौड़ें” (पद 1)।

फिलिप्पियों  3:3ब-16

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 43–45; प्रेरितों 19:1-20 ◊

27 July : जर तुम्हीं वासनांशी युद्ध करत नाहीं

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27 July : जर तुम्हीं वासनांशी युद्ध करत नाहीं
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जिवात्म्याबरोबर लढणार्‍या दैहिक वासनांपासून दूर राहा. (1 पेत्र 2:11)

एकदा मी एका माणसाला त्याच्या व्यभिचाराच्या जीवनाविषयी हटकले; आधी मी त्याची परिस्थिती समजून घेण्याचा प्रयत्न केला; मी त्याला त्याच्या पत्नीकडें परत जाण्याची विनंती केलीं. मग मी म्हटलें, “कसं आहे, येशूनें म्हटलें कीं तुम्हीं या पापाशी जर इतक्या गंभीरपणें युद्ध करत नसाल कीं जणू ते जिंकण्यासाठीं तुम्हीं तुमचा स्वतःचा डोळाच उपटून टाकण्यास तयार आहांत, तर तुम्हीं नरकात जाल आणि तेथे सर्वकाळ यातना भोगाल.”

विश्वासाचा दावा करणारा एक ख्रिस्ती म्हणून, तो माझ्याकडें केविलवाण्या शंकेने असा पाहू लागला जणू त्यानें त्याच्या आयुष्यात असे पूर्वी काहींही ऐकलें नव्हते; त्यानें विचारलें, “म्हणजें तुम्हांला असं वाटतं कीं एखादी व्यक्ती आपलें तारण गमावू शकते?”

अशाप्रकारे, मी प्रत्यक्ष अनुभवातून वारंवार हें शिकलो कीं असेहि अनेक ख्रिस्ती लोक आहेत जें तारणाविषयीचा असा दृष्टिकोन घेऊन जगतांत जो त्यांना खऱ्या जीवनापासून अलिप्त ठेवतो, जो बायबलमध्यें देण्यांत आलेंल्या धमकावण्यांपासून त्यांचे लक्ष दूर घालवितो, व जो आपण ख्रिस्ती असल्याचा दावा करणाऱ्या पापी व्यक्तीला बायबलमध्यें पापाविरुद्ध दिलेंल्यां इशाऱ्यांच्या आवाक्याबाहेर नेऊन ठेवतो. माझ्या मतें, ख्रिस्ती जीवनाविषयीचा असा दृष्टिकोन त्यां हजारो लोकांना खोटा दिलासा देत आहे जे खरे पाहता त्यां रुंद व पसरट मार्गावर आहेत ज्याचा शेवट नाश आहे (मत्तय 7:13).

येशूनें म्हटलें, जर तुम्हीं वासनांशी लढा देत नाहीं तर स्वर्गात तुमचा प्रवेश होणार नाहीं. “तुझा उजवा डोळा तुला पापास प्रवृत्त करत असेल तर तो उपटून टाकून दे; कारण तुझे संपूर्ण शरीर नरकात टाकले जावे ह्यापेक्षा तुझ्या एका अवयवाचा नाश व्हावा हे तुझ्या हिताचे आहे” (मत्तय 5:29). मुद्दा हा नाहीं कीं खरे ख्रिस्ती लोक पापा विरुद्धच्या त्यांच्या युद्धांत प्रत्येक वेळी यशस्वी होतांतच. मुद्दा हा आहे कीं आपण लढण्याचा संकल्प करतो, आपण निष्कलंक असे यशस्वी होतो हा मुद्दा नाहीं. आम्हीं पापाबरोबर समेट करत नाहीं; आम्हीं त्याशी युद्ध पुकारतो.

या युद्धांत जे पणांस लागते ते या जागाला एक हजार क्षेपणास्त्रांनी जरी उडविले, किंवा दहशतवाद्यांनी तुमच्या शहरावर बॉम्ब जरी टाकला, किंवा ग्लोबल वॉर्मिंगमुळें बर्फाचे डोंगर जरी वितळले, किंवा एड्सने सर्व राष्ट्रांना ग्रासून टाकलें त्याहीपेक्षा कितीतरी जास्त आहे. ही सर्व संकटे केवळ शरीरालाच जिवें मारू शकतांत. पण जर आपण वासनेशी लढलो नाहीं तर आपण आपला जीव गमावतो तो कायमचा, सर्वकाळासाठीं.

पेत्र म्हणतो कीं दैहिक वासनां जिवात्म्याबरोबर लढतांत (1 पेत्र 2:11). महायुद्ध किंवा दहशतवाद यांत असलेल्या कोणत्याही धोक्यापेक्षा या युद्धात जे पणास लागते तें अमर्यादपणें खूप आहेत. प्रेषित पौलाने “जारकर्म, अमंगळपणा, कामवासना, कुवासना व लोभ” यांची सूची दिल्यानंतर असे म्हटलें कीं “त्यामुळें देवाचा कोप होतो” (कलस्सै 3:5-6). आणि देवाचा कोप हा जगातील सर्व राष्ट्रांच्या कोपापेक्षा अति भयंकर आहे.

देव आम्हांला ती कृपा देवो कीं ज्याद्वारे आपण स्वतःच्या व प्रियजनांच्या जिवात्म्यांना गांभीर्याने घेऊं व त्यां विरुद्ध लढणाऱ्या वासनांशी आपलें युद्ध चालू ठेऊ.