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30 अगस्त : सही समय पर की गई प्रार्थना

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30 अगस्त : सही समय पर की गई प्रार्थना
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“‘अब हे प्रभु, उनकी धमकियों को देख; और अपने दासों को यह वरदान दे कि तेरा वचन बड़े हियाव से सुनाएँ’ . . . जब वे प्रार्थना कर चुके, तो वह स्थान जहाँ वे इकट्ठे थे हिल गया, और वे सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गए, और परमेश्‍वर का वचन हियाव से सुनाते रहे।” प्रेरितों 4:29, 31

जब हमें लगता है कि हमारा समाज अधिक दृढ़ता से सुसमाचार से मुँह मोड़ रहा है और पवित्रशास्त्र के दावों का बड़ी आक्रामकता से विरोध कर रहा है, तो स्वाभाविक सवाल यह होता है: हमें क्या करना चाहिए? हमारी प्रतिक्रिया यह नहीं होनी चाहिए कि हमें क्या आरामदायक लगता है, बल्कि यह होनी चाहिए कि बाइबल क्या कहती है।

प्रारम्भिक कलीसिया सामाजिक उथल-पुथल से अपरिचित नहीं थी। यह जानते हुए कि आशा और उद्धार मसीह के मृत्यु और पुनरुत्थान में ही पाया जाता है, पतरस ने पिन्तेकुस्त के दिन निडर होकर प्रचार किया, बस कुछ सप्ताह बाद ही जब उसने यीशु को जानने और उनका अनुयायी होने से इनकार किया था (प्रेरितों 2:1-41)। पतरस और अन्य प्रेरितों का साहसी प्रचार कलीसिया के त्वरित विकास का कारण बना—लेकिन साथ ही यह विश्वासियों के लिए हिंसा और उत्पीड़न का कारण भी बना (पद 1-22)।

तो फिर हमें यह पढ़ते हुए कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उन्होंने परमेश्वर के सामने अपनी आवाज उठाई। उन्हें जिस विरोध का सामना करना पड़ रहा था, वे उसे जानते थे और उन्होंने ज्ञान के साथ, बाइबल के तरीके से, और साहस से प्रार्थना की।

“अब हे प्रभु . . .” यदि हमसे यह प्रार्थना पूरी करने के लिए कहा जाए, तो हम शायद परमेश्वर से धमकियों को दूर करने, विरोध को दबाने, या उत्पीड़न से बचाने के लिए कहेंगे। हालाँकि प्रारम्भिक विश्वासियों की प्रार्थना यह नहीं थी। इसके बजाय, उन्होंने यह प्रार्थना की कि वे “बड़े हियाव से” सुसमाचार का प्रचार करें।

उनकी प्रार्थना आज भी प्रासंगिक है। निस्सन्देह, यीशु मसीह की कलीसिया की इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है: आत्मा से प्रेरित और मसीह पर केन्द्रित साहस। हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसे विभिन्न विचारों और तनावों का मिश्रण आकार दे रहा है। इसी सन्दर्भ में परमेश्वर ने हमें यह कहने के लिए बुलाया है: “मैं सुसमाचार से नहीं लजाता, इसलिए कि वह हर एक विश्वास करने वाले के लिए, पहले तो यहूदी फिर यूनानी के लिए, उद्धार के निमित्त परमेश्‍वर की सामर्थ्य है” (रोमियों 1:16)।

जब हम ऐसा करते हैं, तो हमें यह याद रखना चाहिए कि सुसमाचार के केन्द्र में क्रूस है। यदि हम सचमुच साहस के साथ ये शब्द बोलना चाहते हैं, तो हम यशायाह के शब्दों में यह घोषणा करेंगे कि क्रूस पर यीशु “हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ” (यशायाह 53:5)। जैसा कि रिको टाइस ने बताया है, इसका मतलब यह है कि हमें दर्द की सीमा को पार करने और विरोध करने वाले लोगों की शत्रुता का जोखिम उठाने के लिए साहसी होना होगा, ताकि हम उन लोगों के बीच भूख पा सकें जिनमें परमेश्वर पहले से काम कर रहा है।[1]

सम्पूर्ण सुसमाचार सम्पूर्ण कलीसिया को सम्पूर्ण संसार तक पहुँचाने के लिए दिया गया है। चाहे आप संगीतकार, अभियन्ता, किसान या फार्मासिस्ट हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; परमेश्वर का आदेश हममें से प्रत्येक के लिए यह है कि हम उसके वचन और सुसमाचार के रहस्य को बोलें।

तो क्या आप साहस के साथ साहस के लिए प्रार्थना करने के लिए तैयार हैं? आसान या आरामदायक या स्वस्थ या प्रशंसा पाने वाले जीवन के लिए नहीं, बल्कि एक साक्षी के जीवन के लिए? क्या आप प्रारम्भिक कलीसिया की प्रार्थना को प्रतिदिन अपनी प्रार्थना बनाएँगे, यह माँगते हुए कि आप परमेश्वर के आत्मा से भरपूर और साहसी हों, ताकि आप किसी भी क़ीमत पर सुसमाचार को ऐसे संसार के साथ साझा कर सकें, जो सत्य के लिए तरस रहा है?

  प्रेरितों 4:1-22

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 129–131; 2 कुरिन्थियों 9 ◊


[1] ऑनेस्ट इवेंजेलिज़म (द गुड बुक कम्पनी, 2015), p 15.

30 August : मंडळीची वाढ ही देवाच्या पद्धतीने होते

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30 August : मंडळीची वाढ ही देवाच्या पद्धतीने होते
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म्हणजें देहाद्वारे झालेंली मुले देवाची मुले आहेत असे नाहीं तर अभिवचनानुसार जन्मलेली मुलेच संतान अशी गणण्यात येतांत. (रोम 9:8)

कल्पना करा कीं जुन्या करारातील अब्राहाम एक पाळक आहे. परमेश्वर म्हणतो, “मी तुला आशीर्वाद देईन आणि तुझ्या सेवेची भरभराट करीन.” पण मंडळी मात्र मुलबाळ नसलेली अशा वांझ अवस्थेतआहे.

अब्राहाम काय करतो? तो स्वर्गाच्या अलौकिक हस्तक्षेपाचा बेत हाणून पाडण्याचा प्रयत्न करू लागतो. तो म्हातारा होत आहे. त्याची पत्नी अजूनही वांझ आहे. म्हणून तो स्वर्गाच्या अलौकिक हस्तक्षेपावाचूनच देवाच्या अभिवचनानुसार असलेल्या पुत्राला जन्मास घालण्याचे ठरवतो. तो त्याच्या बायकोची दासी हागार हिच्याशी लैंगिक संबंध स्थापित करतो (उत्पत्ति 16:4). परंतु परिणामी “अभिवचनानुसार असलेल्या मुलाऐवजी” “देहाद्वारे झालेंले मुल” म्हणजें इश्माएल ह्याचा जन्म होतो.

देव अब्राहामाला आश्चर्याचा धक्का देत असे म्हणतो, “[तुझी पत्नी सारा] तिच्या पोटी तुला एक मुलगा देईन” (उत्पत्ति 17:16). हे ऐकून अब्राहाम देवाचा धावा करून म्हणतो, “इश्माएल तुझ्यासमोर जगला म्हणजें झालें!” (उत्पत्ति 17:18). त्याच्या स्वतःच्या नैसर्गिक, मानवी प्रयत्नांद्वारे असलेले काम ह्याद्वारे देवाचे अभिवचन पूर्णत्वास यावें अशी त्याची इच्छा आहे. पण देव म्हणतो, “नाहीं, नाहीं, तुझी बायको सारा हिच्याच पोटी तुला मुलगा होईल” (उत्पत्ति 17:19).

पण सारा 90 वर्षांची झाली आहे. तिचे आतापर्यंतचे आयुष्य वांझ अवस्थेंतच आहे, शिवाय ती आधीच रजोनिवृत्तीतून गेलेली आहे (उत्पत्ति 18:11). अब्राहाम 100 वर्षांचा झाला आहे. अभिवचनानुसार मुलासाठीं एकमात्र आशा जर असेल तर ती म्हणजें अद्भुत, अलौकिक हस्तक्षेपच.

“अभिवचनानुसार मूल” होण्याचा अर्थ असा आहे – त्याचा “जन्म रक्त, अथवा देहाची इच्छा, अथवा मनुष्याची इच्छा ह्यांपासून” होत नाहीं; तर देवापासून” होतो (योहान 1:13). या जगात देवाची मुलें तिच गणली जातांत जीं अलौकिकरित्या अभिवचनानुसार जन्मलेलीं आहेत. गलतीकरांस 4:28 मध्यें पौल म्हणतो, “बंधुजनहो, इसहाकाप्रमाणें तुम्हीं [ख्रिस्ती लोक], अभिवचनाची संतती आहात.” तुमचा जन्म “देहस्वभावानुसार” नाहीं, तर “आत्म्यानुसार” झाला आहे (गलती 4:29).

परत एकदा कल्पना करा कीं अब्राहाम एक पाळक आहे. त्याला जसे वाटते कीं मंडळीची वाढ ही देवानें दिलेंल्या अभिवचनानुसार व्हावीं त्याप्रमाणें ती वाढत नाहींये. तो अलौकिक हस्तक्षेपाची वाट पाहत थकला आहे. म्हणून तो केवळ मानवी माध्यम असलेल्या “हागारे” कडें वळतो आणि पवित्र आत्म्याच्या अलौकिक कार्यावाचून आपण “लोकांना आकर्षित” करू शकतो असे ठरवतो.

तथापि, ही इसहाकीं मंडळी नसून इश्माएली मंडळी असेल- म्हणजें देहाद्वारे झालेंली मुले, देवाची मुले नाहीं. देव आम्हांला अशा घातक यशापासून वाचवो. सर्व प्रकारे कष्ट करा. परंतु निर्णायक, अलौकिक कार्यासाठीं नेहमी परमेश्वराकडें पहा. “लढाईच्या दिवसासाठीं घोडा सज्ज करतांत, पण यश देणें परमेश्वराकडें असते” (नीतिसूत्रे 21:31).

29 अगस्त : एक नाम जो अद्वितीय है

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29 अगस्त : एक नाम जो अद्वितीय है
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“यहोवा के नाम की स्तुति करो, क्योंकि केवल उसी का नाम महान है; उसका ऐश्वर्य पृथ्वी और आकाश के ऊपर है।” भजन 148:13

परमेश्वर ने हमें अपना नाम प्रकट करके स्वयं को हम पर प्रकट किया है। जब हम परमेश्वर के नाम के बारे में सोचते हैं, तो हमें उसके स्वभाव—उसकी वास्तविकता, उसके चरित्र और उसके गुणों—के बारे में सोचना चाहिए। उसका नाम उसे हर किसी से और हर चीज़ से अलग करता है, क्योंकि यह उसके सम्पूर्ण अस्तित्व का प्रतिनिधित्व करता है।

निर्गमन 3 में मूसा और जलती हुई झाड़ी में परमेश्वर से उसकी मुलाकात की घटना परमेश्वर के नाम और उसके चरित्र के बीच के सम्बन्ध को दर्शाती है। जब मूसा झाड़ी के पास आया, तो परमेश्वर ने उससे कहा कि वह अपने पैरों से जूते उतार दे, क्योंकि वह पवित्र भूमि पर खड़ा था। इसके बाद जब परमेश्वर ने मूसा को फिरौन के पास जाकर इस्राएलियों की मुक्ति की माँग करने की आज्ञा दी, तो मूसा ने पूछा, “जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे कहूँ, ‘तुम्हारे पितरों के परमेश्‍वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,’ तब यदि वे मुझ से पूछें, ‘उसका क्या नाम है?’ तब मैं उनको क्या बताऊँ?” परमेश्वर ने उत्तर दिया, “मैं जो हूँ सो हूँ” (निर्गमन 3:13-14)।

परमेश्वर ने “मैं हूँ” कहकर अपने नाम को प्रकट किया। इस उत्तर के द्वारा उसने स्वयं को सभी झूठे देवताओं से अलग कर दिया, जिन्हें वास्तव में “मैं नहीं हूँ” कहना चाहिए। मूर्तियाँ मनुष्यों के हाथों से बनाई जाती हैं—या फिर आज के समय में अक्सर हमारे हृदयों के भीतर गढ़ी जाती हैं। कारीगर उन्हें लकड़ी, पत्थर, या हाथी दाँत से बनाते हैं और उन्हें किसी चबूतरे पर स्थापित करते हैं। फिर भी, वे अनिवार्य रूप से गिर जाती हैं और उन्हें फिर से खड़ा करने की आवश्यकता होती है। एक मूर्ति हमारी सेवा की माँग करती है, लेकिन यह हमें बचा नहीं सकती। यह कभी भी वह पूरा नहीं करती जिसका यह वादा करती है।

परन्तु सम्पूर्ण सृष्टि के रचयिता के लिए यह उचित और सही है कि वह “मैं हूँ” के रूप में जाना जाए, क्योंकि वह किसी और के समान नहीं है। वह कभी उत्पन्न नहीं हुआ। वह पूर्णतः आत्म-विद्यमान और आत्म-निर्भर है। उसे किसी भी व्यक्ति या वस्तु की आवश्यकता नहीं है। जो कुछ उसके पास सदा से था, वह उसके पास अब भी है। उसका न तो कोई आरम्भ है और न अन्त। वह अपनी सभी प्रतिज्ञाओं को पूर्ण करता है। वह अनन्त जीवन और असीम सामर्थ्य का परमेश्वर है।

हमारा एकमात्र उद्देश्य यह है कि हम केवल उसी के नाम को ऊँचा उठाएँ। हम सभी इस बात के लिए संघर्ष करते हैं कि हम मूर्तियों के आगे न झुकें—वे बनाई गई चीज़ें जिन्हें हम पूजते हैं और जिनके सामने यह सोचकर बलिदान चढ़ाते हैं कि वे हमें जीवन देंगी। परन्तु यदि हम परमेश्वर की आराधना सही रीति से करना चाहते हैं, तो हमें अपने जीवन की सभी मूर्तियों को उसके सामने गिरने देना होगा। वही एकमात्र सृष्टिकर्ता है, वही “मैं हूँ” है—वही जो स्वर्ग और पृथ्वी पर राज्य करता है।

यशायाह 46:3-11

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 126–128; 2 कुरिन्थियों 8

29 August : ख्रिस्त येशूमध्यें असणें म्हणजें सहा गोष्टीं

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29 August : ख्रिस्त येशूमध्यें असणें म्हणजें सहा गोष्टीं
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[देवानें] आमच्या कृत्यांप्रमाणें नव्हे तर स्वत:च्या संकल्पाप्रमाणें व कृपेप्रमाणें आम्हांला तारले व पवित्र पाचारणाने पाचारले आहे; ही कृपा युगांच्या काळापूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं आपल्यावर करण्यात आली होती. (2 तीमथ्य 1:9)

“ख्रिस्त येशूमध्यें” असणें हे एक अद्भुत सत्य आहे. ख्रिस्ताशी एकरूप होणें चित्तथरारक आहे. ख्रिस्ताशी बांधलेलें.

जर तुम्हीं “ख्रिस्तात” आहांत तर तुमच्या बाबतींत ते काय आहे हे ऐका:

1. जगाच्या स्थापनेपूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं तुम्हांवर कृपा करण्यात आली होती. दुसरा तीमथ्य 1:9, “ही कृपा युगांच्या काळापूर्वी ख्रिस्त येशूच्या ठायीं आपल्यावर करण्यात आली होती.”

2. देवानें जगाच्या स्थापनेपूर्वी तुम्हांला ख्रिस्ताच्या ठायीं निवडून घेतले. इफिस 1:4, “[देवानें] जगाच्या स्थापनेपूर्वी आपल्याला ख्रिस्ताच्या ठायीं निवडून घेतले.”

3. ख्रिस्त येशूमध्यें देवानें तुमच्यावर अशी प्रीति केलीं जिच्यापासून तुम्हांला कोणतीही गोष्ट विभक्त करू शकणार नाहीं. रोमकरांस 8:38-39, “कारण माझी खातरी आहे कीं, मरण, जीवन, देवदूत, अधिपती, वर्तमानकाळच्या गोष्टी, भविष्यकाळच्या गोष्टी, बले, उंची, खोली, किंवा दुसरी कोणतीही सृष्ट वस्तू, ख्रिस्त येशू आपला प्रभू ह्याच्यामध्यें देवाची आपल्यावरील जी प्रीति आहे तिच्यापासून आपल्याला विभक्त करायला समर्थ होणार नाहीं.”

4. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हांला मुक्ती आणि तुमच्या सर्व अपराधांची क्षमा मिळाली आहे. इफिस 1:7, “[ख्रिस्तात] त्याच्या रक्ताच्या द्वारे खंडणी भरून मिळवलेली मुक्ती, म्हणजें आपल्या अपराधांची क्षमा, आपल्याला मिळाली आहे.”

5. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हीं देवासमोर नीतिमान ठरला आहांत आणि ख्रिस्ताच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्व हे तुमचे नीतिमत्त्व गणण्यात आलें आहे. दुसरे करिंथ 5:21, “[ख्रिस्ताला] पाप ठाऊक नव्हते त्याला [देवानें]  तुमच्या-आमच्याकरता पाप असे केलें; ह्यासाठीं कीं, आपण त्याच्या ठायीं देवाचे नीतिमत्त्व असे व्हावे.”

6. ख्रिस्त येशूमध्यें तुम्हीं नवी उत्पत्ती आणि देवाचे पुत्र झाला आहांत. दुसरे करिंथ 5:17, “म्हणून जर कोणी ख्रिस्ताच्या ठायीं असेल तर तो नवी उत्पत्ती आहे; जुने ते होऊन गेले; पाहा, ते नवे झालें आहे.” गलती 3:26, “तुम्हीं सर्व ख्रिस्त येशूवरील विश्वासाच्या द्वारे देवाचे पुत्र आहात.”

माझी तुमच्यासाठीं अशी प्रार्थना आहे कीं “ख्रिस्त येशूमध्यें” असण्याचा जो अतुल्य विशेषाधिकार तुम्हांला प्राप्त झाला आहे त्यावर चिंतन करण्यापासून आणि त्याचा आनंद घेण्यापासून तुम्हीं कधीही खचून जाऊ नये.

28 अगस्त : पश्चाताप की यात्रा

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28 अगस्त : पश्चाताप की यात्रा
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“मैं ये बातें तुम्हें इसलिए लिखता हूँ कि तुम पाप न करो; और यदि कोई पाप करे, तो पिता के पास हमारा एक सहायक है, अर्थात् धर्मी यीशु मसीह।” 1 यूहन्ना 2:1

मसीही विश्वास क्षमा के सन्देश पर आधारित है। अन्य धर्म नैतिकता सिखा सकते हैं, वे हमें ऐसी विधियाँ दे सकते हैं जो हमारे जीवन को व्यवस्थित करने या हमें एक अच्छा इंसान महसूस कराने में मदद करें। परन्तु मसीही विश्वास उन लोगों के लिए है जो अयोग्य, खोए हुए, संघर्षरत और पापी हैं। यह उन लोगों के लिए है, जिन्हें यह सुनने की आवश्यकता है कि वे क्षमा प्राप्त कर सकते हैं। अर्थात, यह सभी के लिए है।

सुसमाचार का केन्द्र-बिन्दु यह नहीं है कि हमें क्या करना चाहिए, बल्कि यह कि परमेश्वर ने हमारे लिए क्या किया है। परमेश्वर की दया ही है जो हममें क्षमा पाने की इच्छा उत्पन्न करती है—और केवल जब हम यीशु में विश्वास रखते हैं, तभी हमें पूर्ण रूप से क्षमा प्राप्त होती है। जब हम पश्चाताप और विश्वास के साथ उसकी ओर मुड़ते हैं, तब हम पीछे मुड़कर यह कह सकते हैं कि हम पाप के दण्ड से बचा लिए गए हैं। जो कुछ हमारे विरुद्ध था, जो कुछ हमें परमेश्वर को जानने और उसकी प्रेम और भलाई को अनुभव करने से रोक रहा था—वह सारा दण्ड जो हमें मिलना चाहिए था—वह सब प्रभु यीशु मसीह के क्रूस पर किए गए उद्धारक कार्य के द्वारा मिटा दिया गया है।

विश्वासी होने के नाते हम आनन्दित हो सकते हैं—और होना भी चाहिए—कि अब पाप हम पर शासन नहीं करता। फिर भी, वास्तविकता यह है कि इस सांसारिक जीवन में हम अभी भी पाप करते हैं। हम अभी भी परमेश्वर के मापदण्ड तक पहुँचने में असफल होते हैं। और जब ऐसा होता है, तो शत्रु हमारे कानों में फुसफुसाता है, “क्या तू वास्तव में उद्धार पाया है? क्या परमेश्वर तुझे इस बार भी क्षमा करेगा?” इस पर हमारा उत्तर होना चाहिए, “हाँ, मैं उद्धार पाया हुआ हूँ; और हाँ, वह मुझे क्षमा करेगा, क्योंकि जिसने मेरे लिए प्राण दिए, वह इस समय भी मेरे लिए परमेश्वर के सामने वकालत कर रहा है।”

परमेश्वर से क्षमा पाना हमें पाप करने की स्वतन्त्रता नहीं देता। वास्तव में, प्रेरित यूहन्ना ने लिखा कि “तुम पाप न करो” (1 यूहन्ना 2:1)। जब हम पाप करते हैं, तो परमेश्वर में जो आनन्द हमने पाया है, वह धुंधला पड़ने लगता है। वह हमारा स्वर्गिक पिता बना रहता है, परन्तु यदि हम अपने हृदय में पाप को स्थान देते हैं, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी कि हम उन आशिषों का पूरा आनन्द नहीं उठा सकेंगे जो वह हमारे लिए रखना चाहता है।

इसलिए, हम अपने प्रभु की आज्ञाओं का पालन करने का प्रयास करते हैं, परन्तु चूंकि हम इसे पूरी तरह नहीं कर सकते, इसलिए हमें अपने प्रभु के सामने निरन्तर पश्चाताप करते रहना भी आवश्यक है। यीशु ने यूहन्ना 13 में दैनिक पश्चाताप की आवश्यकता और महत्त्व को उजागर किया, जब वह अपने शिष्यों के पैर धोने वाला था और पतरस ने कहा, “तू मेरे पाँव कभी न धोने पाएगा!” इसके जवाब में यीशु ने कहा, “यदि मैं तुझे न धोऊँ, तो मेरे साथ तेरा कुछ भी साझा नहीं” (यूहन्ना 13:8)। जब तक यीशु हमें नहीं धोता, तब तक हमें क्षमा नहीं मिलती—और उसके बाद भी, वह प्रतिदिन हमारे पश्चाताप और विश्वास के द्वारा हमें शुद्ध करता रहता है।

एक दिन जब हम स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, तो पाप की उपस्थिति से भी मुक्त कर दिए जाएँगे। परन्तु उस महान दिन तक हमारा मसीही जीवन एक पश्चाताप की यात्रा बना रहेगा। आप उद्धार पा चुके हैं। आप उद्धार पाएँगे। लेकिन अभी, इसी क्षण, परमेश्वर की करुणा से प्रतिदिन पश्चाताप करते हुए और यीशु की ओर लौटते हुए आप उद्धार पा रहे हैं।

रोमियों 7:7 – 8:2

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 123–125; 2 कुरिन्थियों 7 ◊

28 August : येशूच्या नावामुळेंमाझ्या दुष्टाईची क्षमा झालीं

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28 August : येशूच्या नावामुळेंमाझ्या दुष्टाईची क्षमा झालीं
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हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर; कारण ती फार झाली आहे. (स्तोत्र 25:11)

न्याय्य काय आहे हे जाणून घेण्यासाठीं, देव स्वतःहून ऊंच अशा कोणत्याही अधिकाराशी मसलत करत नाहीं. त्याचा आपला अधिकारच या विश्वातील अंतिम अधिकार आहे. म्हणून, देवासाठीं जे योग्य आहे ते करणें म्हणजें त्याच्या या अंतिम अधिकाराशी जे सुसंगत आहे तेच करणें.

देवाला ज्यांविषयी अमर्याद आवेश आहे आणि जी त्याला परम आनंद आणि प्रसन्नता देणारी आहे ती एक अति मोलवान गोष्ट म्हणजें त्याचे स्वतःचे नीतिमत्व, जो त्याची स्वतःची परिपूर्णता व त्याचा सन्मान आहे. आणि आपल्या परिपूर्णतेसाठीं त्याला असलेल्या या अमर्याद  आवेशाच्या विरुद्ध जर तो कधी गेला तर तो अनीतिमान ठरेल – तो एक मूर्तिपूजक ठरेल.  

असा नीतिमान देव आपल्यासारख्या देव-निंदक अशा पापी लोकांवर कशी प्रीति करू शकतो? परंतु सुवार्तेच्या बाबतींत थक्क करून टाकणारी गोष्ट म्हणजें हीच आहे कीं जे तारण तो आम्हांला देऊ करतो त्याचा पाया त्याचे स्वतःचे दिव्य नीतिमत्त्व आहे.

पित्याला आपल्या प्रिय पुत्राबद्दल असलेला अमर्याद आदर तोच माझ्यासारख्या एका दुष्ट पाप्यावर त्यां पुत्रामध्यें अशी प्रीति करणें व माझा स्वीकार करणें हे त्याच्यासाठीं शक्य करतो, कारण त्यानें आपल्या मरणाने आपल्या पित्याचा अधिकार आणि गौरव प्रमाणित केला आहे.

ख्रिस्तानें जें केलें त्यामुळें, आपण स्तोत्रकर्त्याच्या प्रार्थनेला नाविन्याने समजून तीच प्रार्थना करू शकतो, “हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर; कारण ती फार झाली आहे” (स्तोत्र 25:11). या प्रार्थनेविषयी नवी समज ही आहे कीं, आपण फक्त अशी प्रार्थना करण्याऐवजी कीं “तू आपल्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर,” आपण ख्रिस्तामुळें आता अशी प्रार्थना करतो, “हे परमेश्वरा, तू येशूच्या नावासाठीं माझ्या दुष्टाईची क्षमा कर.”

पहिले योहान 2:12 येशूला उद्देशून म्हणते, “मुलांनो, मी तुम्हांला लिहितो, कारण त्याच्या नावामुळें तुमच्या पापांची तुम्हांला क्षमा झाली आहे,”. येशूनें आता पापाचे प्रायश्चित्त केलें आहे आणि पित्याचे गौरव प्रमाणित केलें आहे जेणेंकरून “त्याच्या नावामुळें” आपल्या “दुष्टाईची क्षमा” केलीं जावीं.

देव नीतिमान आहे. तो पापाला दंड दिल्यावाचून ते असेच झाकत नाहीं. जर कोण्या पापी मनुष्याला दोषमुक्त करण्यांत आलें तर, कोणी असा आहे जो देवानें त्या पापी व्यक्तीला असेच क्षमा केलें हा डाग त्याजवर लागू नये म्हून देवाच्या गौरवाचे असीम मूल्य प्रमाणित करण्यासाठीं मरण पावतो. ख्रिस्तानें तेच केलें. म्हणून, “हे परमेश्वरा, तू आपल्या नावासाठीं” आणि “येशूच्या नावामुळें” ही दोन्ही संबोधणें एकच आहेत. आणि म्हणूनच आम्हीं पापांच्या क्षमेसाठीं मोठ्या खात्रीने प्रार्थना करतो.

27 अगस्त : अनुग्रह प्राप्त करना

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27 अगस्त : अनुग्रह प्राप्त करना
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“परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्‍टि नूह पर बनी रही।” उत्पत्ति 6:8

आम धारणा में नूह एक आत्मिक योद्धा और विश्वास का नायक माना जाता है। परन्तु सच्चाई यह है कि वह भी एक साधारण मनुष्य था। वह भी बाकी सभी की तरह अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रहता था, अपनी जीविका कमाता था और अपने बच्चों का पालन-पोषण करता था।

नूह की कहानी आरम्भ होने से पहले पवित्रशास्त्र हमें बताता है: “यहोवा ने देखा कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है वह निरन्तर बुरा ही होता है। और यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ” (उत्पत्ति 6:5-6)। यहाँ कोई भेदभाव नहीं किया गया है। इसमें कोई अपवाद नहीं है कि सम्पूर्ण मानवजाति दुष्टता में लिप्त थी और नूह भी इससे अछूता नहीं था।

सन्देश स्पष्ट है: सभी ने पाप किया था। सभी परमेश्वर से विमुख हो गए थे। सभी को न्याय का सामना करना था। लेकिन तभी एक महत्त्वपूर्ण वाक्य आता है— “परन्तु . . . नूह . . .।” पाप और न्याय की वास्तविकता के बावजूद, परमेश्वर के अनुग्रह के कारण एक दिव्य परिवर्तन आता है। परमेश्वर का अनुग्रह, जो न तो समझाया जा सकता है और न ही कमाया जा सकता है, नूह पर प्रकट हुआ। यही एकमात्र बात थी जिसने उसे बाकी मनुष्यजाति से अलग किया। परमेश्वर ने नूह और उसके परिवार को अपने अनुग्रह के पात्र के रूप में चुना और उसके साथ एक ऐसा सम्बन्ध स्थापित किया, जो पहले अस्तित्व में नहीं था। इसी अनुग्रह के कारण, नूह “धर्मी पुरुष” बना, जो “परमेश्वर ही के साथ-साथ चला” (उत्पत्ति 6:9)।

नूह परमेश्वर से कोई विशेष अधिकार नहीं माँग सकता था। उसके स्वयं के किसी गुण या प्रयास के कारण नहीं, बल्कि परमेश्वर ने पूर्णतः अपनी कृपा से नूह के जीवन में अनायास ही हस्तक्षेप किया।

बहुत से लोग मानते हैं कि अनुग्रह केवल नए नियम में पाया जाता है और पुराने नियम में तो केवल आग, गन्धक, व्यवस्था और न्याय की ही बात होती है, और अनुग्रह केवल यीशु के आने पर ही आता है। परन्तु सच्चाई यह है कि अनुग्रह न केवल सृष्टि से पहले अस्तित्व में था, बल्कि पूरे इतिहास में न्याय के मध्य भी प्रकट होता रहा है। बाइबल के प्रत्येक पृष्ठ पर अनुग्रह प्रकट होता है।

पूरी बाइबल में ही अनुग्रह प्रकट होता रहता है। नूह ने परमेश्वर के वचन के प्रति आज्ञाकारिता में एक नाव का निर्माण किया, जबकि उसके पास केवल परमेश्वर का वचन ही था जिस पर वह भरोसा कर सकता था। जब हम अनुग्रह को उसकी पूर्णता में अनुभव करते हैं, तो यह हमें विनम्र बना देता है और परमेश्वर को महान करता है। यह हमें यह एहसास कराता है कि जीवन परमेश्वर और उसकी भलाई के बारे में है, न कि हमारे बारे में। यह हमें उसके वचन पर विश्वास करने और उसकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए प्रेरित करता है।

आज आपको संसार से अलग करने वाली एकमात्र बात वही है जिसने नूह को उसकी पीढ़ी से अलग किया था—परमेश्वर का अवर्णनीय और अपरिवर्तनीय अनुग्रह। इसलिए आत्मिक घमण्ड और सांसारिक समझौते से सावधान रहें। हममें से कोई भी इतना बुद्धिमान नहीं है कि उद्धार के आनन्द को स्वयं समझ सके, और न ही इतना अच्छा कि उसे पाने के योग्य हो सके। आप और मैं इसके योग्य नहीं हैं—फिर भी, परमेश्वर ने हमारे जीवनों में हस्तक्षेप किया है। जब परमेश्वर का अनुग्रह हमारे हृदय को छू लेगा, केवल तब ही हम नूह की तरह इस संसार के मार्ग पर नहीं, बल्कि अपने सृष्टिकर्ता के मार्ग पर चलेंगे, और आज्ञाकारिता से भरी विनम्रता और आत्मविश्वास से भरी आशा के साथ जीवन जीएँगे। केवल अनुग्रह ही ऐसा प्रभाव डाल सकता है।

उत्पत्ति 6

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 120–122; 2 कुरिन्थियों 6

27 August : येशू आपल्या सर्व शत्रूंना तुडवील

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27 August : येशू आपल्या सर्व शत्रूंना तुडवील
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नंतर शेवट होईल, तेव्हा सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य ही नष्ट केल्यावर तो देवपित्याला राज्य सोपवून देईल. (1 करिंथ 15:24)

ख्रिस्ताच्या राज्याची व्याप्ती किती आहे?

पुढील वचन, 1 करिंथ 15:25 सांगते, “कारण आपल्या ‘पायांखाली सर्व शत्रू ठेवीपर्यंत’ त्याला राज्य केलें पाहिजे.” येथें प्रयुक्त केलेंला शब्द “सर्व” त्याच्या राज्याची व्याप्ती सूचित करतो.

त्याचप्रमाणें वचन 24 मध्यें प्रयुक्त केलेंला शब्द “सर्व” देखील तेंच सूचित करतो : “नंतर शेवट होईल, तेव्हा सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य ही नष्ट केल्यावर तो देवपित्याला राज्य सोपवून देईल.”

असा कोणताही रोग नाहीं, व्यसन नाहीं, महाकाय नाहीं, वाईट सवय नाहीं, दोष नाहीं, दुर्गुण नाहीं, दुर्बलता नाहीं, स्वभाव नाहीं, मन:स्थिती नाहीं, गर्व नाहीं, आत्म-दया नाहीं, कलह नाहीं, मत्सर नाहीं, विकृती नाहीं, लोभ नाहीं, आळशीपणा नाहीं कीं ज्यांवर ख्रिस्त आपल्या प्रतिष्ठेचा शत्रू म्हणून विजय मिळविणार नाहीं.

आणि या अभिवचनांत असलेले उत्तेजन असें कीं जेव्हा तुम्हीं तुमच्या विश्वासाच्या आणि तुमच्या पवित्रतेच्या शत्रूंशी युद्ध करण्यासाठीं सज्ज होता तेव्हा युद्ध लढणारे तुम्हीं एकटे नाहीं.

येशू ख्रिस्त हा वर्तमान समयी, या युगातच, त्याच्या सर्व शत्रूंना आपल्या पायाखाली ठेवत आहे. सर्व आधिपत्य, सर्व अधिकार व सामर्थ्य यांवर विजय मिळविला जाईल.

म्हणून, लक्षात ठेवा कीं ख्रिस्ताच्या राज्याचा प्रसार हा तुमच्या जीवनात आणि या विश्वात असलेल्या त्याच्या गौरवाच्या सर्वात लहान आणि सर्वात मोठ्या शत्रूपर्यंत पोहोचतो. सर्व शत्रूंचा पराभव केला जाईल.

26 अगस्त : धैर्यवान उद्धारकर्ता

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26 अगस्त : धैर्यवान उद्धारकर्ता
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“उन्होंने उसे जगाकर उससे कहा, ‘हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नष्ट हुए जाते हैं?’ तब उसने उठकर आँधी को डाँटा, और पानी से कहा, ‘शान्त रह, थम जा!’ और आँधी थम गई और बड़ा चैन हो गया; और उनसे कहा, ‘तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्‍वास नहीं?’” मरकुस 4:38-40

जब तूफ़ान आया और चेलों को भय ने घेर लिया, तब यीशु ने केवल शान्ति ही नहीं, बल्कि उनकी प्रतिक्रिया के प्रति अद्‌भुत धैर्य भी दिखाया।

उन्होंने यीशु पर यह आरोप लगाया कि उसे इस बात की चिन्ता नहीं थी कि वे नष्ट हो रहे हैं। लेकिन यीशु ने उन्हें नहीं, बल्कि हवा और लहरों को डाँटा। यह कितनी अद्‌भुत बात है! संसार में किसी भी शिक्षक के पास यीशु के चेलों से अधिक धीमी गति से सीखने वाले छात्र नहीं थे—परन्तु यह भी सच है कि न ही किसी अन्य शिक्षक में उसके समान धैर्य और क्षमा करने की क्षमता थी।

यीशु का धैर्य केवल इस घटना तक सीमित नहीं था; अपने पूरे सेवाकार्य के दौरान वह अपने चेलों की कमजोरियों और असफलताओं के प्रति लगातार धैर्यवान रहा। मरकुस 6 में केवल पाँच रोटियों और दो मछलियों से पाँच हज़ार लोगों को भोजन खिलाने के बाद जब चेलों ने उसे पानी पर चलते देखा, तब भी उन्होंने उस पर सन्देह किया। लेकिन यीशु ने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया, “ढाढ़स बाँधो : मैं हूँ; डरो मत” (मरकुस 6:50)। आगे भी, जब उसने बार-बार अपनी मृत्यु की आवश्यकता और उद्देश्य के बारे में समझाया, तो चेलों ने उसे समझने या स्वीकार करने में कठिनाई महसूस की (मरकुस 8:31-33; 9:30-32; 10:32-34)। यहाँ तक कि पुनरुत्थान के बाद भी यीशु ने चेलों को इस बात के लिए नहीं डाँटा कि वे उसकी भविष्यवाणी के अनुसार उसके जी उठने से चकित हो गए थे। इसके विपरीत, उसने प्रेम और धैर्य के साथ उनसे गहरे प्रश्न पूछे और अपनी सच्ची पहचान को उनपर प्रकट किया।

हम चेलों में अपने कमज़ोर विश्वास को प्रतिबिम्बित होता हुआ देख सकते हैं। यदि हम उनके स्थान पर होते, तो शायद हम भी उसी तरह डरकर भाग-दौड़ कर रहे होते और अपने सन्देह तथा शिकायतें यीशु के सामने रख रहे होते। लेकिन आज भी, हमारे भय और सन्देह के बावजूद मसीह हमें धैर्यपूर्वक सम्भालता है। वह हमें हमारे एक क्षण के अविश्वास के कारण अस्वीकार नहीं करता। वह हमारी कायरता के कारण हमें त्याग नहीं देता। उसके समान कोई और शिक्षक है ही नहीं।

इसलिए जब हम मसीह के इस अद्वितीय धैर्य के भागीदार हुए हैं, तो हमें भी यही धैर्य दूसरों के प्रति दिखाना चाहिए। यदि आप माता-पिता, कोच, प्रबन्धक, सेवकाई नेता, शिक्षक, या केवल एक मित्र भी हैं, तो यीशु के उदाहरण को याद रखें। यदि हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारे डगमगाते विश्वास को सहन करे, तो हमें भी दूसरों के प्रति और यहाँ तक कि अपने स्वयं के प्रति भी ऐसा ही धैर्य रखना चाहिए।

सबसे बढ़कर, हमें केवल यीशु के उदाहरण का अनुसरण करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी सिद्धता का आनन्द लेने के लिए बुलाया गया है। उसका धैर्य कभी असफल नहीं होगा। वह अपनी देखभाल में रहने वालों की कभी उपेक्षा नहीं करता और न ही उन्हें छोड़ता है। आपके पापों और आपके संघर्षों के कारण उसकी सहनशीलता का बाँध कभी नहीं टूटता। वह आज भी आपके साथ धैर्यवान रहेगा। वह आपका उद्धारकर्ता, आपका निस्तारक, आपका हमेशा धैर्यवान शिक्षक—आपका यीशु है।

निर्गमन 33:18 – 34:8

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: भजन 119:89-176; 2 कुरिन्थियों 5 ◊

26 August : छाया आणि झरे

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26 August : छाया आणि झरे
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परमेश्वराचे वैभव चिरकाल राहो! परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होवो! तो पृथ्वीकडें पाहतो तेव्हा ती कापते; तो पर्वतांना स्पर्श करतो तेव्हा ते धुमसतांत. माझ्या जिवात जीव आहे तोपर्यंत मी परमेश्वराचे गुणगान गाईन; मी जिवंत आहे तोपर्यंत माझ्या देवाचे स्तोत्र गाईन. मी केलेंले त्याचे मनन त्याला गोड वाटो; परमेश्वराच्या ठायीं मला हर्ष होईल.. (स्तोत्र 104:31-34)

परमेश्वराला आपल्या कृतींपासून आनंद होतो कारण त्यां कृती आपल्याला त्यांच्या पलीकडें म्हणजें प्रत्यक्ष देवाकडें पाहण्याचा संकेत देतांत.

देवाची इच्छा ही आहे कीं आपण या सृष्टीत दिसून येणारी त्याची हस्तकृती पाहून थक्क व भयभीत व्हावें. पण आपण त्यां कृतींचे कौतुक करावें म्हणून नाहीं. त्याची इच्छा अशी आहे कीं आपण त्याच्या सृष्टीकडें पाहून असे म्हणावें : जर त्याचे फक्त अंगुलीकार्य (स्तोत्र 8:3) इतके शहाणपण आणि सामर्थ्य आणि भव्यता आणि वैभव आणि सौंदर्य यांनी परिपूर्ण आहे, तर हा परमेश्वर स्वतः कसा असावा!

ही अंगुलीकार्ये फक्त त्याच्या वैभवाची केवळ मागची बाजू आहेत, कीं जणू आपण ती काचातून खोल अंधकारांत पाहत आहों. मग या सर्वांचा जो निर्माणकर्ता, प्रत्यक्षात त्याचा महिमा पाहणें म्हणजें काय असेल! फक्त त्याच्या हस्तकृतीच नाहीं! अब्ज आकाशगंगा देखील मनुष्याच्या जिवाला संतुष्ट करू शकणार नाहींत. परमेश्वर आणि केवळ परमेश्वर हाच आमच्या आत्म्याची तहान तृप्त करू शकतो.

जोनाथन एडवर्ड्स यांनी ही गोष्ट पुढीलप्रमाणें अभिव्यक्त केलीं :

परमेश्वरापासून आनंद हे ते एकमेव सुख आहे जे आपल्या आत्म्यांची तहान तृप्त करू शकते. स्वर्गात जावून देवाचा पूर्ण आनंद घेणें हे येथें असलेल्यां सर्व-सुखांच्या निवासस्थानांपेक्षा अमर्यादपणें श्रेष्ठ आहे. . . . [ह्यां] फक्त छाया मात्र आहेत. पण देव हा वास्तविक रूप आहे. ह्यां गोष्टी केवळ विखुरलेला प्रकाश आहे; पण देव हा सूर्य आहे. हे फक्त झरे आहेत; पण देव हा महासागर आहे.

म्हणूनच स्तोत्र 104 ची शेवटची 31-34 ही वचनें प्रत्यक्षांत देवावर लक्ष केंद्रित करून या स्तोत्राचा समारोप करतांत. “माझ्या जिवात जीव आहे तोपर्यंत मी परमेश्वराचे गुणगान गाईन. . . परमेश्वराच्या ठायीं मला हर्ष होईल.” शेवटी ज्यां गोष्टीं आपली अंतःकरणें आश्चर्याने भरून टाकतील आणि आपल्या मुखांत सार्वकालिक स्तुती भरतील त्यां गोष्टीं हा समुद्र किंवा हे पर्वत किंवा दऱ्याखोरी किंवा पाण्याचे झरे किंवा ढग किंवा मोठमोठ्या आकाशगंगा नसतील, तर तो स्वतः देव असेल जो सर्वांमध्यें सर्वकाहीं पूर्ण करतो.