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29 सितम्बर : हमारा सहानुभूतिपूर्ण चरवाहा

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29 सितम्बर : हमारा सहानुभूतिपूर्ण चरवाहा
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उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उससे कहा, ‘मत रो।’ तब उसने पास आकर अर्थी को छूआ, और उठाने वाले ठहर गए। तब उसने कहा, ‘हे जवान, मैं तुझ से कहता हूँ, उठ!’” लूका 7:13-14

परमेश्वर के राज्य का आगमन संसार की शक्तियों और अधिकारियों पर किसी शानदार या नाटकीय विजय से नहीं हुआ, बल्कि उससे कहीं अधिक रूपान्तरणकारी कारक अर्थात इसके राजा की महान करुणा के द्वारा हुआ।

यीशु के जीवन-वृतान्तों में सुसमाचार लेखक हमें बार-बार ऐसे प्रसंगों से परिचित कराते हैं, जो मसीह की अनुपम करुणा को दर्शाते हैं। इन घटनाओं में मसीह का सामर्थ्य उस समय प्रकट होता है, जब वह अपनी करुणा प्रदर्शित करता है। उदाहरण के लिए, अपने सुसमाचार के सातवें अध्याय में लूका एक शोकाकुल विधवा के प्रति यीशु की सहानुभूति को दर्शाता है—एक ऐसी प्रतिक्रिया जो उसकी महानता के बारे में किसी भी सन्देह को दूर कर देती है।

लूका के वृतान्त के इस भाग में वर्णित स्त्री सचमुच संकट में थी। उसका पति पहले ही मर चुका था, और अब उसका पुत्र भी चल बसा था। प्राचीन मध्य-पूर्वी समाज में इसका अर्थ था कि वह किसी भी प्रकार की सुरक्षा या आजीविका के सहारे से वंचित हो गई थी। अब वह दुख, अकेलेपन, और अस्थिरता से भरे जीवन का और साथ ही अपने वंश के अन्त का भी सामना कर रही थी।

लेकिन फिर यीशु इस स्त्री के जीवन की चरम परिस्थिति में आया और “उसे देख कर प्रभु को तरस आया, और उससे कहा, ‘मत रो।’”

इस कोमल चरवाहे के हृदय में करुणा जगाने के लिए केवल इतना ही काफ़ी था कि उसने इस शोक-सन्तप्त स्त्री को देखा। यहाँ पर प्रयुक्त शब्द “तरस” शाब्दिक रूप से दर्शाता है कि “उसकी अन्तड़ियाँ हिल उठीं”—हमारे शब्दों में कहें तो “उसका पेट मरोड़ खा उठा।” जब यीशु—जिसके द्वारा और जिसके लिए सब कुछ रचा गया—इस टूटे हुए संसार में दुख और शोक को देखता है, तो वह इसे गहराई से अनुभव करता है। वह एक ऐसा राजा है, जो अपनी प्रजा की दिल से चिन्ता करता है।

और भी अधिक सुन्दर बात यह है कि यीशु के पास इस विधवा की आवश्यकता को पूरा करने का सामर्थ्य था और उसने वह किया जो केवल वही कर सकता था: मरे हुए को जीवन देना। उसने केवल एक मरे हुए पुत्र को उसकी शोकग्रस्त माँ को लौटा कर उसका दुख ही दूर नहीं किया, बल्कि उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि यीशु ने भीड़ (और हम सब) के सामने स्वयं को अपनी सम्पूर्ण शक्ति, दयालुता, और अधिकार के साथ—यहाँ तक कि मृत्यु पर भी अधिकार के साथ प्रकट किया।

ऐसे दृश्य हमें दिखाते हैं कि यीशु केवल बीमारी और मृत्यु—जो मानवजाति के सबसे बड़े शत्रु हैं—के बारे में केवल टिप्पणी ही नहीं करता, या केवल उनके लिए रोता ही नहीं है, बल्कि वह उन्हें पराजित भी करता है। वह शोकाकुलों की पुकार को सुनता है और उन्हें सान्त्वना देता है—केवल सांसारिक और अस्थाई रूप में नहीं, बल्कि एक अन्तिम, परिपूर्ण और अनन्त तरीके से, जब वह विश्वास करने वाले सब लोगों को स्वयं को उद्धार के साधन के रूप में प्रदान करता है।

आपका राजा न केवल अनन्त रूप से सामर्थी है; वह अनन्त रूप से करुणामय भी है। और उसमें मौजूद ये दोनों गुण पर्याप्त हैं कि वह आपको इस संसार के हर दुख और शोक से पार ले जाए—जब तक कि आप उसके सामने खड़े न हो जाएँ, और वह आपकी आँखों से हर आँसू पोंछ न दे।

लूका 7:1-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 22–23; यूहन्ना 13:1-20 ◊

29 September : अविश्वासाशी सुयुद्ध करा

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29 September : अविश्वासाशी सुयुद्ध करा
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आणि ह्या सर्वांबरोबरच जिच्या योगे त्या दुष्टाचे सगळे जळते बाण तुम्हांला विझवता येतील, ती विश्वासाची ढाल हाती घ्या व उभे राहा. तारणाचे शिरस्त्राण व आत्म्याची तलवार म्हणजें देवाचे वचन, ही घ्या. (इफिस 6:16-17)

जेव्हा जेव्हा मला म्हातारपणाची भीती वाटते, तेव्हा तेव्हां मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो, “तुमच्या वृद्धापकाळापर्यंतही मीच तो आहे; तुमचे केस पिकत तोपर्यंत मी तुम्हांला वागवीन; निर्माणकर्ता मीच आहे, वागवणारा मीच आहे, मी खांद्यांवर वागवून तुमचा बचाव करीन” (यशया 46:4).

जेव्हा जेव्हा मला मरणाची भीती वाटते, तेव्हा तेव्हा मी हे अभिवचन घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो “कारण आपल्यातील कोणी स्वतःकरता जगत नाहीं आणि कोणी स्वतःकरता मरत नाहीं. कारण जर आपण जगतो तर प्रभूकरता जगतो, आणि जर आपण मरतो तर प्रभूकरता मरतो; म्हणून आपण जगलो किंवा मेलो तरी आपण प्रभूचेच आहोत. कारण ख्रिस्त ह्यासाठीं मरण पावला व पुन्हा जिवंत झाला कीं, त्यानें मेलेल्यांचा व जिवंतांचाही प्रभू असावे” (रोमकरांस 14:7-9).

माझ्या विश्वासाचा नाश होऊन मीं देवापासून दूर जात आहे अशी भीती मला वाटते, तेव्हा तेव्हां मी ही अभिवचनें घेऊन अविश्वासाशी सुयुद्ध करतो, “ज्याने तुमच्या ठायीं चांगले काम आरंभले तो ते येशू ख्रिस्ताच्या दिवसापर्यंत सिद्धीस नेईल” (फिलिप्पैकर 1:6) ); आणि, “ह्यामुळें ह्याच्या द्वारे देवाजवळ जाणार्‍यांना पूर्णपणें तारण्यास हा समर्थ आहे; कारण त्यांच्यासाठीं मध्यस्थी करण्यास हा सर्वदा जिवंत आहे” (इब्री 7:25).

या युद्धांत मजबरोबर सहभागी व्हां! चला, आपण युद्ध करू, इतर लोकांशी नाहीं तर आपल्या स्वतःच्या अविश्वासाशी. देवाच्या अभिवचनांवर अविश्वास हे सर्व भीतीचे मूळ आहे, आणि हे इतर पुष्कळ पापांचे देखील मूळ आहे. आत्म्याची तलवार हे देवाचे वचन आहे, असे पौलाने इफिस 6:17 मध्यें म्हटले आहे : जिच्या योगे त्या दुष्टाचे सगळे जळते बाण तुम्हांला विझवता येतील, ती विश्वासाची ढाल हाती घ्या (वचन 16) – म्हणजें देवाच्या त्याच वचनावर विश्वास. तर मग, आपल्या डाव्या हातांत ढाल आणि उजव्या हातांत तलवार घ्या आणि आपण विश्वासाचे जे सुयुद्ध ते करूया.

बायबल हाती घ्या व उभे राहा, व पवित्र आत्म्याकडें मदतीसाठीं आरोळी मारा, त्याची अभिवचने तुमच्या हृदयात ठेवा आणि चांगली लढाई लढा – जेणेंकरून तुम्हीं भावी कृपेवर विश्वास ठेवीत जिवंत राहावें.

28 सितम्बर : असली विश्वास का प्रमाण

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28 सितम्बर : असली विश्वास का प्रमाण
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“जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो? जो कोई मेरे पास आता है और मेरी बातें सुनकर उन्हें मानता है, मैं तुम्हें बताता हूँ कि वह किसके समान है : वह उस मनुष्य के समान है, जिसने घर बनाते समय भूमि गहरी खोदकर चट्टान पर नींव डाली।” लूका 6:46-48

यीशु चाहता है कि हमारे मुख की बातें और जीवन का व्यवहार एक-दूसरे के अनुरूप हों। इसलिए वह अपने “मैदानी उपदेश” के अन्त में एक बहुत ही टटोलने वाला प्रश्न पूछता है: “जब तुम मेरा कहना नहीं मानते तो क्यों मुझे ‘हे प्रभु, हे प्रभु,’ कहते हो?” यीशु ने देखा कि लोग जो कह रहे थे और जो कर रहे थे, उसमें गहरा विरोधाभास था। इसलिए उसने उन्हें एक गहन आत्मिक मूल्यांकन का बुलावा दिया—जो बुलावा वह आज हमें भी देता है। जैसा वह उनके लिए चाहता था, वैसा ही वह हमारे लिए भी चाहता है कि हमारे मुख से निकलने वाली यीशु में विश्वास की घोषणा के साथ-साथ हमारे जीवन में उसके प्रति नैतिक आज्ञापालन भी दिखे।

यीशु ने यह नहीं सिखाया कि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश आज्ञाकारिता के अच्छे कामों के द्वारा होता है। उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह से, केवल विश्वास के द्वारा, और बिना किसी अन्य चीज़ के मिलता है (इफिसियों 2:8)। हम मसीह के पास केवल एक ही चीज़ लेकर आते हैं—हमारा पाप, जिससे हमें क्षमा की आवश्यकता है। तो फिर यीशु क्या सिखा रहा है? बहुत सीधी बात: केवल उन्हीं लोगों ने सच में यीशु की बात को सुना है और सुसमाचार से परिवर्तित हुए हैं, जो उसकी आज्ञा मानते हैं—अर्थात जो अपने विश्वास को अपने कर्मों के द्वारा व्यक्त करते हैं। जैसा सुधारवादियों ने कहा था: “उद्धार अकेले विश्वास से होता है, लेकिन उद्धार देने वाला वह विश्वास अकेला नहीं होता।” प्रेरित यूहन्ना भी यीशु की बात को दोहराते हुए अपनी पहली चिट्ठी में लिखता है: “यदि हम कहें कि उसके साथ हमारी सहभागिता है और फिर अन्धकार में चलें, तो हम झूठे हैं और सत्य पर नहीं चलते” (1 यूहन्ना 1:6)। बाइबल हमें बार-बार दिखाती है कि हम यीशु की बातों को जैसे सुनते हैं और उनका पालन करते हैं, उसका महत्त्व अनन्तकाल तक जाता है, क्योंकि यह हमारे विश्वास की सच्ची अवस्था और वास्तविकता को प्रकट करता है।

किसी भी मात्रा में धार्मिक कर्मकाण्ड या आध्यात्मिक बातें हमारे गुप्त व्यवहार को परमेश्वर से छिपा नहीं सकते। प्रेरित पौलुस बहुत स्पष्ट रूप से कहता है: “जो कोई प्रभु का नाम लेता है, वह अधर्म से बचा रहे” (2 तीमुथियुस 2:19)। हम इस आदेश की मांग की गम्भीरता को कम करने का प्रयास न करें। यही असली विश्वास का प्रमाण है।

यद्यपि कोई भी मनुष्य सिद्ध जीवन नहीं जीता, तौभी हम सभी को एक बदला हुआ जीवन जीने के लिए बुलाया गया है। हम अब मसीह के प्रभुत्व के अधीन हैं। उसका आत्मा हममें वास करता है। क्या हम पूरी तरह सफल होंगे? नहीं। लेकिन हम भिन्न होंगे, और हमारे जीवन में यह निरन्तर दिखेगा कि हम “मूरतों से परमेश्‍वर की ओर फिरे हैं, ताकि जीवते और सच्चे परमेश्‍वर की सेवा करें” (1 थिस्सलुनीकियों 1:9)। इसलिए अपने जीवन पर विचार करें। क्या आप यीशु को “प्रभु” कहते हैं? बहुत अच्छा! लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है: क्या आप अपने जीवन में कोई ऐसा प्रमाण दिखा सकते हैं—उन बातों में जो आप नहीं करते, उन कामों में जो आप करते हैं, उन प्रलोभनों में जिनसे आप लड़ते हैं, उन गुणों में जिन्हें आप पाने का प्रयास करते हैं, और उस क्षमा में जिसे आप पश्चात्ताप पूर्वक मांगते हैं—कि यीशु वास्तव में आपका प्रभु है?

याकूब 2:14-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 20–21; यूहन्ना 12:27-50

28 September : आमचे कल्याण हेच त्याचे गौरव आहे

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28 September : आमचे कल्याण हेच त्याचे गौरव आहे
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“तू तर जेव्हा जेव्हा प्रार्थना करतोस तेव्हा तेव्हा ‘आपल्या खोलीत जा व दार लावून घेऊन’ आपल्या गुप्तवासी पित्याची ‘प्रार्थना कर’ म्हणजें तुझा गुप्तदर्शी पिता तुला उघडपणें तिचे फळ देईल.” (मत्तय 6:6)

ख्रिस्ती हेडोनिझम -म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट- या सिद्धांतावर एक सामान्य आक्षेप हा घेतला जातो कीं हा सिद्धांत मनुष्याच्या हितांना देवाच्या गौरवापेक्षा अधिक महत्व देतो – म्हणजें हे शिक्षण माझ्या आनंदाला देवाच्या सन्मानाच्या वर स्थान देते. परंतु खरे पाहता, ख्रिस्ती हेडोनिझमचा हा अर्थ नाहीं हे मीं ठामपणें सांगतो.

ठामपणें सांगायचे तर, आम्हीं ख्रिस्ती हेडोनिस्ट म्हणून आमच्या सर्व शक्तीने आमचे हित आणि आमच्या आनंदाचा पाठपुरावा करण्याचा प्रयत्न करतो. आम्हीं तरुण जोनाथन एडवर्ड्स यांच्या पुढील संकल्पाचे समर्थन करतो : “संकल्प : मी माझ्यासाठीं दुसऱ्या जगात शक्य तितका आनंद मिळवण्याचा प्रयत्न करीन -सर्व शक्तीने, सामर्थ्याने, श्रमाने आणि आवेशाने, किबहुंना आक्रमक वृत्तीनेहि, माझ्याकडून शक्य होईल तितके, किंवा माझ्या मनांत येईल तितके, मीं अनुसरू शकतो अशा कोणत्याही मार्गाने.”

परंतु आपल्याला बायबलमधून (आणि एडवर्ड्सकडून!) ही ज्ञानप्राप्ती झालीं आहे कीं देवाला आपल्यावर -आम्हा पापी लोकांवर, ज्यांना त्याची नितांत गरज आहे- त्याची कृपा ओतण्याद्वारे त्याच्या गौरवाच्या परिपूर्णतेचा महिमा वाढवणें आवडते.

म्हणून, आपल्या हितांचा आणि आपल्या आनंदाचा पाठलाग करणें, मग त्यासाठीं आपल्याला आपलें जीवन गमवावे लागलें तरी, हे देवाचा सम्मान आणि त्याचा आनंद यांपेक्षा आणि देवाचे जे गौरव यापेक्षा कधीही वर नाहीं, तर हा पाठलाग नेहमीच देवामध्यें असतो. बायबलमधील सर्वात मौल्यवान सत्यांपैकीं एक हे आहे कीं देवाच्या कृपेच्या विपुलतेचा महिमा करणें हे पापी लोकांचे त्याच्यामध्यें आणि केवळ त्याच्यामध्यें आपला आनंद शोधणें आहे!

जेव्हा आपण लहान बालकांसारखे स्वतःला लीन-दीन करतो आणि मी माझा समर्थ या वृत्तीचे कुपोषण करतो, तर आपल्या पित्याच्या मिठीत असलेल्या आनंदाकडें हर्षाने धाव घेतो, तेव्हा त्याच्या कृपेचा महिमा वाढतो आणि आपल्या जिवाची तळमळ तृप्त होते. आपलें कल्याण आणि त्याचे गौरव परस्पर विलीन झालें.

जेव्हा येशू मत्तय 6: 6 मध्यें असे अभिवचन देतो, “तुझा गुप्तदर्शी पिता तुला उघडपणें तिचे फळ देईल,” तेव्हां हे ते फळ आहे ज्याच्या पाठीस आपण लागावें अशी देव आपल्याठायीं इच्छा बाळगतो. तो आपल्याला अशा आनंदाचे आमिष देत नाहीं जो तो आपल्याला देऊ करत नाहीं! पण हे फळ – हा आनंद –जेव्हां आम्हीं लोकांनी आपलें गौरव करावें या वृत्तीपासून दूर जातो आणि देवाचा शोध घेण्यासाठीं आपल्या खोलीत जातो तेव्हां काठोकाठ वाहणारा तो हा आनंद आहे.

यास्तव, ख्रिस्ती हेडोनिस्ट, म्हणजें सुख हेच अंतिम उद्दिष्ट या सिद्धांतावर विश्वास ठेवणारे लोक, हे त्यांच्या आनंदाला देवाच्या गौरवावर उंच स्थान देत नाहींत. तर ते आपल्या आनंदाचा शोध प्रत्यक्ष देवामध्यें घेतांत, आणि ‘जेव्हा आपण देवामध्यें सर्वात जास्त तृप्त असतो, तेव्हा देव आपल्यामध्यें सर्वात जास्त गौरव पावतो’ हे महान सत्य शोधून काढतांत.

27 सितम्बर : वे अपने फल से पहचाने जाते हैं

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27 सितम्बर : वे अपने फल से पहचाने जाते हैं
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“कोई अच्छा पेड़ नहीं जो निकम्मा फल लाए, और न तो कोई निकम्मा पेड़ है जो अच्छा फल लाए। हर एक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है।” लूका 6:43-44

छात्र हमेशा अपने शिक्षकों की शिक्षा का प्रतिबिम्ब होते हैं। चाहे कोई छात्र अपने शिक्षक की क्षमताओं से कहीं आगे क्यों न बढ़ जाए, वह हमेशा उस मार्गदर्शन का ऋणी रहेगा जो उसे मिला था।

जब यीशु ने पेड़ों और उनके फलों के बारे में कहा, तो उनका ध्यान अपने समय के आत्मिक अगुवों की ओर था। इस शिक्षा के माध्यम से उसने हमें एक चेतावनी दी—कि हम गलत शिक्षक का चुनाव न करें। और हम यह कैसे जानें कि कौन-सा शिक्षक अच्छा है और कौन बुरा? यीशु कहता है—उसके फलों से, अर्थात् उनकी शिक्षा और आचरण से जो परिणाम निकलते हैं, वे बताएँगे कि वह शिक्षक कैसा है।

जब हम फलों की बात करते हैं, तो हम शिक्षक के चरित्र के सम्बन्ध में बात कर रहे हैं—और चरित्र को केवल बोलने की कला या प्रतिभा से नहीं परखा जा सकता। यीशु ने जब दाखलता और डाली की बात की, तो वहाँ यह स्पष्ट होता है कि फलवन्त होने का अर्थ मसीह के समान होना है (यूहन्ना 15:1–8)। हर पेड़ उसके फल से पहचाना जाता है। इसलिए आत्मा का फल—प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम (गलातियों 5:22–23)—एक अच्छे शिक्षक के जीवन में स्पष्ट रूप से प्रकट होगा।

हमें शिक्षक की शिक्षा की सामग्री को भी परखना चाहिए। पौलुस ने जब अपने प्रिय सेवक तीमुथियुस को लिखा, तो उसने इस मसले पर कहा: “अपनी चौकसी रख”—अर्थात् अपने चरित्र की—“और अपने उपदेश की चौकसी रख” (1 तीमुथियुस 4:16)। क्योंकि हर वह व्यक्ति जो बाइबल लेकर आता है, जरूरी नहीं कि आपके हित में ही बोलता हो। हर वह व्यक्ति जो मसीह का नाम लेता है, जरूरी नहीं कि वह परमेश्वर के वचन का सच्चा शिक्षक हो। झूठे भविष्यवक्ताओं की भरमार है। इसलिए मसीही विश्वासियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे बाइबल से सीखें, न केवल पवित्रता में बढ़ने के लिए, बल्कि सही शिक्षा को पहचानने के लिए भी—जो कि एक परमेश्वर-भक्त शिक्षक की पहचान है। हमें इस तथ्य से भी ढाढ़स मिलना चाहिए कि पवित्र आत्मा हमारे भीतर निवास करता है, जो हमें सब बातों की शिक्षा देता है और सत्य व असत्य के बीच अन्तर समझने की बुद्धि देता है (1 यूहन्ना 2:27)।

एक शिक्षक के चरित्र और उसकी शिक्षा की सामग्री में गहरा सम्बन्ध होता है—और इसका सीधा असर उस व्यक्ति पर पड़ता है जो उससे शिक्षा प्राप्त करता है। इसलिए अपने आत्मिक शिक्षकों और मार्गदर्शकों का चुनाव सोच-समझकर करें। उनकी बोलने की कला या सांस्कृतिक समझदारी या आत्मविश्वास या हास्य या लोकप्रियता को मत देखें—बल्कि देखें कि उनका चरित्र कैसा है और वे क्या सिखा रहे हैं। क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि आपके जीवन में वही फल दिखाई देगा, जो आप अपने शिक्षक से सीखते हैं। जब लोग आपके पास आएँगे, तो वे क्या पाएँगे? क्या वे आलोचना, कटुता, अभिमान या आत्म-धार्मिकता पाएँगे? क्या वे उत्साह की कमी और विश्वास की दुर्बलता पाएँगे? या फिर, क्या वे प्रेम, आनन्द, शान्ति और धार्मिकता के मधुर फल को चख पाएँगे?

2 तीमुथियुस 2:15-26

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 18–19; यूहन्ना 12:1-26 ◊

27 September : अधिक उत्तम अभिवचनाचे सामर्थ्य

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27 September : अधिक उत्तम अभिवचनाचे सामर्थ्य
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मी मोकळेपणाने चालेन, कारण मी तुझ्या नीतिनियमांचा आश्रय केला आहे. (स्तोत्र 119:45, माझे भाषांतर)

स्वातंत्र्य हे पूर्णानंदाचा एक आवश्यक घटक आहे. आपल्याला ज्या गोष्टीचा तिटकारा वाटतो तिजपासून जर आपण बंधमुक्त नाहीं आणि ज्यां गोष्टीवर आपण प्रीति करतो ती करण्यासाठीं जर आपण स्वतंत्र नाहीं तर आपल्यापैकीं कोणीही आनंदी असणार नाहीं.

आपल्याला हे खरे स्वातंत्र्य कुठे मिळते? स्तोत्र 119:45 म्हणते, “मी मोकळेपणाने चालेन, कारण मी तुझ्या नीतिनियमांचा आश्रय केला आहे.”

येथें जे चित्र आहे ते मोकळेपणाने वावरण्यासंबंधीचे आहे. वचन आपल्याला क्षुल्लक शहाणपणापासून बंधमुक्त करते. “परमेश्वराने शलोमोनला……समुद्रकाठच्या वाळूप्रमाणें मोजमाप काढता येत नाहीं इतके फार मोठे शहाणपण व अगाध समज दिली होती” (1 राजे 4:29). वचन आपल्याला आपल्या जिवावर उठलेल्या बंदिवासातून बंधमुक्त करते. “त्यांनी मला प्रशस्त ठिकाणी आणले” (स्तोत्र 18:19).

येशूनें म्हटलें, “तुम्हांला सत्य समजेल व सत्य तुम्हांला बंधमुक्त करील” (योहान 8:32). तो हे बोलत असतांना त्याच्या मनात जे स्वातंत्र्य होते ते पापाच्या गुलामगिरीपासून मुक्तीचे स्वातंत्र्य होते (योहान 8:34). किंवा, सकारात्मक दृष्टिने सांगायचे तर, ते स्वातंत्र्य पवित्रतेसाठीं असलेले स्वातंत्र्य आहे.

देवाच्या कृपेची अभिवचने ते सामर्थ्य देतांत ज्यामुळें देवानें आम्हांकडून पवित्र जीवनाविषयी केलेंली अपेक्षा आम्हांला भीतीदायक आणि बंधन वाटण्या ऐवजी स्वातंत्र्याचा अनुभव बनवते. पेत्राने देवाच्या अभिवचनांच्या बंधमुक्त करणाऱ्या सामर्थ्याचे वर्णन यां शब्दांत केलें : “त्यांच्या योगे मोलवान व अति महान अशी वचने आपल्याला देण्यात आली आहेत, ह्यासाठीं कीं, त्यांच्या द्वारे तुम्हीं वासनेपासून उत्पन्न होणारी जगातील भ्रष्टता चुकवून ईश्वरी स्वभावाचे वाटेकरी व्हावे” (2 पेत्र 1:4 ).

याचा अर्थ असा कीं, आपण देवाच्या अभिवचनांवर विश्वास ठेवतो, तेव्हा आपण अधिक उत्तम अभिवचनाच्या सामर्थ्याने भ्रष्टता व कामवासना यांचे मूळ उपटून काढतो.

काल्पनिक खोट्या सुखांचे सामर्थ्य मोडून टाकणारे हे वचन किती आवश्यक आहे! तर मग, देवाच्या वचनाने आपला मार्ग प्रकाशित व्हावा आणि ते आपल्या मनात जपून राहावे म्हणून आपण किती जागरूक असले पाहिजे!

“तुझे वचन माझ्या पावलांसाठीं दिव्यासारखे व माझ्या मार्गावर प्रकाशासारखे आहे” (स्तोत्र 119:105). “मी तुझ्याविरुद्ध पाप करू नये म्हणून मी आपल्या मनात तुझे वचन जपून ठेवले आहे” (स्तोत्र 119:11).

26 सितम्बर : तिनका और लट्ठा

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26 सितम्बर : तिनका और लट्ठा
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“जब तू अपनी ही आँख का लट्ठा नहीं देखता, तो अपने भाई से कैसे कह सकता है, ‘हे भाई; ठहर जा तेरी आँख से तिनके को निकाल दूँ’? हे कपटी, पहले अपनी आँख से लट्ठा निकाल, तब जो तिनका तेरे भाई की आँख में है, उसे भली भाँति देखकर निकाल सकेगा।” लूका 6:42

मुझे एक बार की घटना याद है—मैं एक परीक्षा में डेस्क पर बैठा था, जैसे ही मैंने प्रश्न-पत्र पलटा, तुरन्त ही मैं इधर-उधर देखने लगा कि क्या बाकी सभी लोग भी पहले प्रश्न को देखकर उतने ही परेशान हैं जितना मैं था। तभी शिक्षक की सख़्त आवाज़ आई: “दूसरों को मत देखो, खुद पर ध्यान दो!”

यीशु भी इन पदों में कुछ ऐसा ही कहता है—एक प्रभावशाली उपमा के ज़रिए वह अपने श्रोताओं को यह सिखाता है कि दूसरों के पापों की ओर अंगुली उठाने से पहले उन्हें अपने पापों से निपटना चाहिए। यीशु ने “तिनके” के लिए जिस शब्द का प्रयोग किया है, वह आमतौर पर भूसे या लकड़ी के बहुत ही छोटे कणों के लिए इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत, “लट्ठे” का भाव किसी घर की छत का भार-वहन करने वाली बड़ी लकड़ी से है। अगर मेरी आँख में ऐसा लट्ठा है, तो यह स्पष्ट है कि दूसरे की आँख का तिनका निकालने से पहले मेरी आँख के लट्ठे को निकाला जाना ज़रूरी है।

पतित मनुष्यों के रूप में हम अक्सर यह सोचने की प्रवृत्ति रखते हैं कि अपनी आत्मिक स्थिति का ध्यान रखने से पहले दूसरों की आत्मिक स्थिति को सुधारना हमारी प्राथमिक ज़िम्मेदारी है। लेकिन मसीह ने हमें इसलिए नहीं बुलाया है कि हम प्राथमिक और प्रारम्भिक रूप से पहले दूसरों की आँखों से तिनके निकालें। नहीं, वह कहता है कि पवित्रशास्त्र के प्रकाश में और उसके द्वारा ठहराए गए मापदण्ड के अनुसार हमें स्वयं को परखना है।

यीशु की यह शिक्षा हमारे सामने एक बड़ी चुनौती रखती है। कई बार हम दूसरों की गलतियों को इस बहाने उजागर करते हैं कि हम उनकी आत्मिक भलाई चाहते हैं। लेकिन यदि हमने पहले अपने ही पापों के प्रति ईमानदारी और कठोरता नहीं दिखाई, तो वह केवल पाखण्ड है! हम अक्सर इस झूठे विचार का शिकार हो जाते हैं कि यदि मैं तुम्हारी गलती पकड़ लूँ और तुम्हें सुधार दूँ, तो शायद मुझे अपने पापों से निपटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। दूसरों की दशा पर बात करना अक्सर अपने हृदय की सच्चाई से सामना करने से आसान लगता है।

यदि हम वास्तव में दूसरों की सहायता करना चाहते हैं, तो पहले हमें अपने हृदय की गम्भीर अवस्था को पहचानना होगा—जैसा कि रॉबर्ट मुरे म’शेन ने कहा था: “सभी पापों के बीज मेरे हृदय में हैं।”[1] जब हम यह सच्चाई स्वीकार कर लेते हैं और उस पर विश्वास करते हैं, तब जब हम दूसरों की ओर जाते हैं, तो हम नम्रता और प्रेम के निम्न स्तर पर खड़े होते हैं, न कि अहंकार और पूर्वानुमान के ऊँचे स्तर पर। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच का अन्तर सम्पूर्ण जीवन का अन्तर है।

यहूदा 20-25

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 16–17; यूहन्ना 11:28-57


[1] एण्ड्रू बोनार, मेमोयर ऐण्ड रिमेंस ऑफ रॉबर्ट मुरे म’शेन (बैनर ऑफ ट्रुथ, 1995) में उद्धृत, पृ. 153.

26 September : देवाच्या सार्वभौम सामर्थ्यावर विश्वास ठेवत जगणें

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26 September : देवाच्या सार्वभौम सामर्थ्यावर विश्वास ठेवत जगणें
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जे आपण विश्वास ठेवणारे त्या आपणांविषयीच्या त्याच्या सामर्थ्याचे अपार महत्त्व. . . (इफिस 1:19)

देवाचे अपार सामर्थ्य हे देवाच्या सार्वकालिक गौरवांत असलेले युगानुयुगाचे व खंबीर आश्रयस्थान आहे मग या पृथ्वीवर कोणत्याही परिस्थिती उद्भवल्या तरी त्यानें काहीं फरक पडत नाहीं. आणि हाच दृढ विश्वास देवानें केलेंले पाचारण पूर्ण आज्ञाधारकपणें अनुसरण्याचा स्रोत आणि सामर्थ्य आहे.

सर्वसमर्थ देव हा तुमचा आश्रय आहे या सत्यापेक्षा अधिक स्वतंत्र करणारे, अधिक पराक्रमी किंवा अधिक बळकट करणारे काहीं आहे का — तेहि दिवसभर, दररोज, जीवनातील सर्वसामान्य आणि असामान्य अशा सर्व घडामोडींमध्यें?

जर आपण यावर विश्वास ठेवला, जर आपण खरोखरच देवाच्या सर्वसमर्थपणाचे हे सत्य समजून घेतले तर आपल्या वैयक्तिक जीवनात आणि आपल्या सेवाकार्यात किती बदल घडून येतील! तारण करण्याच्या देवाच्या संकल्पांसाठीं आपण किती नम्र आणि सामर्थ्यवान बनू!

देवाचा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष हा देवाच्या लोकांसाठीं आश्रयस्थान आहे. आणि सर्वसमर्थ देवाचा हा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष तुमचे आश्रयस्थान आहे असा विश्वास तुम्हीं ठेवतां, तेव्हा तुम्हांला असा आनंद, असे एक स्वातंत्र्य आणि असे सामर्थ्य प्राप्त होते जे आमच्या जीवनाला येशू ख्रिस्ताप्रत मौलिक आज्ञाधारकपणाने व्यापून टाकते.

देवाचा सर्वसमर्थपणाचा गुणविशेष हा त्याच्या कराराच्या लोकांसाठीं आदर, शत्रूकडून सूड आणि आश्रयस्थान आहे.

मी तुम्हांला त्याच्या कृपेच्या कराराच्या अटी स्वीकारण्यासाठीं आव्हाहन करतो : आपल्या पापापासून वळा आणि प्रभु येशू ख्रिस्तावर विश्वास ठेवा; आणि सर्वसमर्थ देवाचा सर्वसमर्थपणाचा जो गुणविशेष आहे तो तुमच्या जिवासाठीं आदर, तुमच्या शत्रूंकडून सूड आणि तुमच्या जीवनाचा आश्रय ठरेल – सर्वकाळासाठीं.

25 सितम्बर : क्षमाशीलता की विशालता

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25 सितम्बर : क्षमाशीलता की विशालता
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“क्षमा करो, तो तुम्हें भी क्षमा किया जाएगा। दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा।” लूका 6:37-38

हमारे हृदय और सोच को जितनी जल्दी कोई चीज़ भ्रष्ट कर सकती है, वह है क्षमा न करने वाला हृदय। लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सत्य है: सच्चे दिल से क्षमा देने के अनुभव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है, जो हमें इतनी जल्दी आन्तरिक स्वतन्त्रता, आनन्द और शान्ति देता है। वास्तव में, किसी को क्षमा करने की हमारी तत्परता ही हमारे आत्मिक जीवन की एक कसौटी है; जब हम पूरे दिल से क्षमा करते हैं, तो यह प्रमाण होता है कि हम वास्तव में परमप्रधान परमेश्वर के पुत्र और पुत्रियाँ हैं (लूका 6:35)।

हमें क्षमा किए जाने और हमारी ओर से क्षमा दिए जाने की इच्छा को यीशु प्रायः एक साथ रखता है (लूका 11:4 देखें)। इसलिए जब हम क्षमा करने के अभ्यास की बात करते हैं, तो सबसे पहले यह पूछा जाना चाहिए: हमें क्षमा कहाँ से प्राप्त होती है? उत्तर है—सच्ची क्षमा का स्रोत केवल परमेश्वर ही है। परमेश्वर की दया की प्रचुरता से ही क्षमा बहती है।

क्षमा हमारी आत्मा के जीवन और स्वास्थ्य के लिए उतनी ही आवश्यक है, जितना शारीरिक भोजन हमारे शरीर के लिए। पवित्रशास्त्र बार-बार हमें यह याद दिलाता है कि परमेश्वर एक क्षमाशील परमेश्वर है। भजनकार कहता है: “हे याह, यदि तू अधर्म के कामों का लेखा ले, तो हे प्रभु, कौन खड़ा रह सकेगा? परन्तु तू क्षमा करने वाला है” (भजन संहिता 130:3-4)। इसी तरह भविष्यद्वक्ता दानिय्येल कहता है: “तू दया का सागर और क्षमा की खान है” (दानिय्येल 9:9)। और परमेश्वर का पुत्र, जब उसपर थूका गया, उसे अपमानित किया गया, उसके वस्त्र छीन लिए गए, क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया और दो अपराधियों के बीच तड़पता हुआ छोड़ दिया गया—तब भी उसने यह कहा: “हे पिता, इन्हें क्षमा कर” (लूका 23:34)। परमेश्वर की क्षमा की भावना अतुलनीय है।

यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा जब हम परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं, तो हमें भी अपने पिता और प्रभु का अनुकरण करते हुए क्षमा का अभ्यास करना है। यह मसीही जीवन का इतना मूलभूत हिस्सा है कि यीशु यहाँ तक कहता है कि यदि हम क्षमा करने को तैयार नहीं हैं, तो हमें गम्भीरता से यह पूछना चाहिए कि क्या हम वास्तव में क्षमा किए गए हैं—अर्थात्, क्या हमने सच में सुसमाचार को अपने हृदय में ग्रहण किया है? (मत्ती 6:14-15 देखें)। यदि आपने अपने हृदय में क्षमा न करने का भाव छिपा रखा है, तो उसे अनदेखा न करें, न ही उसे छोटा समझें। इसके बजाय, सुसमाचार को उसमें प्रवेश करने दें। यह विचार करें कि मसीह के द्वारा आपको कितनी बड़ी क्षमा मिली है। अपने पिता की क्षमाशील प्रकृति को याद करें, जिसे आपको अपने जीवन में प्रकट करना चाहिए। क्षमा न करने के भाव को एक विनाशकारी बोझ और जीवन को खोखला कर देने वाला प्रभाव समझें। विशेष रूप से यह सोचें: किसे क्षमा करना है, और कैसे? यही वह मार्ग है जिस पर चलकर हम उस शान्ति और स्वतन्त्रता का अनुभव कर सकते हैं, जो क्षमा देने से आती है—वैसी ही क्षमा जैसी हमें स्वयं मिली है।

लूका 7:36-50

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 14–15; यूहन्ना 11:1-27 ◊

25 September : देवाचे वचन जीवनाधार आहे

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25 September : देवाचे वचन जीवनाधार आहे
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तेव्हा तो त्यांना म्हणाला: “आज मी ज्या नियमशास्त्रामधील आज्ञा तुमच्यापुढे जाहीर केल्या आहेत, त्याला हृदयात साठवून ठेवा आणि तुमच्या मुलाबाळांना काळजीपूर्वक रीतीने त्यांचे पालन करण्यास शिकवा. कारण हे केवळ पोकळ शब्द नाहींत—तर ते तुमचे जीवन आहे. त्याद्वारे यार्देनेच्या पलीकडें असलेला जो देश तुम्हीं ताब्यात घेणार आहात, त्या देशात तुम्हीं दीर्घकाल जगाल.” (अनुवाद 32:46-47)

देवाचे वचन म्हणजें थट्टामस्करी नाहीं; हा जीवन आणि मरणाचा प्रश्न आहे. जर तुम्हीं शास्त्रवचनांना खेळ किंवा पोकळ शब्द समजता तर तुम्हीं खऱ्या जीवनास मुकाल.

आपलें हे भौतिक जीवन देवाच्या वचनावर अवलंबून आहे, कारण त्याच्या शब्दाने आपल्याला निर्माण केलें गेले होते (स्तोत्र 33:6; इब्री 11:3), आणि “आपल्या सामर्थ्याच्या शब्दाने विश्वाधार आहे” (इब्री 1:3).

आणि आपल्या आध्यात्मिक जीवनाचा आरम्भ देवाच्या वचनाने होतो : “त्यानें स्वतःच्या इच्छेने आपल्याला सत्यवचनाने जन्म दिला.” (याकोब 1:18). “देवाच्या जिवंत व सर्वकाल टिकणार्‍या’ शब्दाच्या द्वारे पुन्हा जन्म पावलेले आहात” (1 पेत्र 1:23).

आपण देवाच्या वचनाद्वारे केवळ पुन्हा जन्म पावलेले नाहीं, तर आपण जगतो तेही केवळ देवाच्या वचनाने : “मनुष्य केवळ भाकरीने नव्हे, तर परमेश्वराच्या मुखातून निघणार्‍या वचनाने जगेल” (मत्तय 4:4; अनुवाद 8 :3).

तर मग आपलें भौतिक जीवन देवाच्या वचनाद्वारे निर्माण झालें आहे आणि त्याद्वारेच टिकून राहते, त्याचप्रमाणें आपलें आध्यात्मिक जीवन देखील देवाच्या वचनाने नव्याने जन्मलेले आहे आणि टिकून राहते. देवाच्या वचनाच्या जीवन देणाऱ्या सामर्थ्याची साक्ष देण्यासाठीं अशा किती तरी गोष्टी सांगता येतील!

खरंच, बायबल “हे केवळ पोकळ शब्द नाहींत” — ते तुमचे जीवन आहे! सर्व आनंदाचा पाया जीवन आहे. जे चिरकाळ टिकून राहते, म्हणजें ज्याद्वारे आपली निर्मिती झालीं आणि आपल्याला राखले जाते, त्यापेक्षा मूलभूत व महत्वाचे काहींही नाहीं.

हे सर्व केवळ देवाच्या सामर्थ्यवान वचनामुळें आहे. त्याच सामर्थ्याने, तो आमचे आध्यात्मिक जीवन अस्तित्वात आणण्यासाठीं आणि त्याचे पालनपोषण करण्यासाठीं पवित्र शास्त्रात बोलला आहे. म्हणून, बायबल हे केवळ पोकळ शब्द नाहींत, तर तुमचे जीवन आहे – तुमच्या आनंदाचा पाया आणि प्रकाश!