ArchivesAlethia4India

9 अक्तूबर : प्रतिज्ञा के साथ शपथ

Alethia4India
Alethia4India
9 अक्तूबर : प्रतिज्ञा के साथ शपथ
Loading
/

“इसलिए जब परमेश्‍वर ने प्रतिज्ञा के वारिसों पर और भी साफ रीति से प्रगट करना चाहा कि उसका उद्देश्य बदल नहीं सकता, तो शपथ को बीच में लाया। ताकि दो बे-बदल बातों के द्वारा, जिनके विषय में परमेश्‍वर का झूठा ठहरना अनहोना है, दृढ़ता से हमारा ढाढ़स बंध जाए, जो शरण लेने को इसलिए दौड़े हैं कि उस आशा को जो सामने रखी हुई है प्राप्त करें। वह आशा हमारे प्राण के लिए ऐसा लंगर है जो स्थिर और दृढ़ है, और परदे के भीतर तक पहुँचता है।” इब्रानियों 6:17-19

एक शपथ का उन दोनों व्यक्तियों के लिए अत्यधिक महत्त्व होना चाहिए, जो शपथ ले रहा है और जिसे शपथ दी जा रही है। इसमें उच्चतम उपलब्ध शक्ति को एक निर्णायक साक्षी बनाया जाता है, ताकि किसी के शब्दों पर सन्देह समाप्त किया जा सके और दी गई प्रतिज्ञा की विश्वसनीयता की पुष्टि की जा सके। हालाँकि लोग बार-बार झूठ बोलने और शपथें तोड़ने के माध्यम से शपथों का मज़ाक उड़ाते हैं, फिर भी इसके द्वारा किसी के शब्दों की निष्ठा प्रकट होती है।

स्वाभाविक रूप से, शपथ केवल उस व्यक्ति के चरित्र के बराबर होती है जो इसे लेता है। इसलिए हम जानते हैं कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ भरोसेमंद हैं, और इसका यदि कोई अन्य कारण नहीं है तो केवल यह कारण ही पर्याप्त है कि ये स्वयं परमेश्वर ने दी हैं। उसे अपनी प्रतिज्ञा को शपथ से सुनिश्चित करने की आवश्यकता नहीं थी; केवल परमेश्वर द्वारा अपने लोगों को दी गई प्रतिज्ञा ही काफी है कि हम उस पर विश्वास करें। फिर भी, उसने एक और कदम आगे बढ़ाते हुए खुद की शपथ ली, क्योंकि उसके स्वयं से बड़ा और कोई है ही नहीं जिसकी वह शपथ ले सकता।

परमेश्वर हमें निराशा के संसार से आशा की वास्तविकता में लाया है, और हमारी आत्माओं का लंगर सुरक्षित और निश्चित है। यह एक अचल वस्तु से बंधा हुआ है, अर्थात परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से और उस परमेश्वर द्वारा, जो झूठ नहीं बोल सकता, अदृश्य स्वर्गिक क्षेत्र में बांधा गया है। वास्तव में ये प्रतिज्ञाएँ इतनी सुरक्षित हैं कि इन्हें दूसरों के साथ प्रचार में साझा करना उन्हें आकर्षक बनाता है, क्योंकि हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जो निराशा से भरा हुआ है और एक ऐसी संस्कृति में जीते हैं जो अपने असन्तोष को नकली मुस्कान, छुट्टियों और भौतिक लाभों से ढकने की कोशिश करती है।

कितना अद्‌भुत है कि हम ऐसे लोग हो सकते हैं जो विश्वास में दृढ़ हैं, और अपने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के लंगर से सुरक्षित हैं। यीशु मसीह हमारे विश्वास के योग्य है और हम यह जान सकते हैं कि “परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में ‘हाँ’ के साथ हैं” (2 कुरिन्थियों 1:20), जिसका जीवन, मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण हमारे लिए एक ऐतिहासिक और शाश्वत विजय का कारण बने हैं।

परमेश्वर की कौन सी प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करना और उन्हें अपने जीवन का आधार बनाना आपको सबसे कठिन लगता है? याद रखें कि ये प्रतिज्ञाएँ किसने दी हैं। वह वही परमेश्वर हैं जिसने निस्सन्तान और वृद्ध अब्राहम को शपथ दी थी कि उसका वंश आकाश के तारों के समान अनगिनत होगा और जिसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। वह वही परमेश्वर हैं जिसने अपने शिष्यों को शपथ दी थी कि उसे ठुकराया और मारा जाएगा, और फिर तीन दिनों के बाद वह फिर से जीवित हो जाएगा और जिसने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। याद रखें कि जिन प्रतिज्ञाओं पर आपको विश्वास करने में कठिनाई हो रही है, वे प्रतिज्ञाएँ किसने दी हैं। याद रखें कि वह किस तरह का परमेश्वर है। वही आपके आत्मा का लंगर और आपके भविष्य की आशा है।

भजन 105

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 47–48; यूहन्ना 20 ◊

9 October : देवाचे कृपा-प्रदर्शक शहाणपण

Alethia4India
Alethia4India
9 October : देवाचे कृपा-प्रदर्शक शहाणपण
Loading
/

आम्हीं तर वधस्तंभावर खिळलेला ख्रिस्त गाजवतो; हा यहूद्यांना अडखळण व हेल्लेण्यांना मूर्खपणा असा आहे खरा, परंतु पाचारण झालेंल्या यहूदी व हेल्लेणी अशा दोघांनाहीं ख्रिस्त हा देवाचे सामर्थ्य व देवाचे शहाणपण आहे. (1 करिंथ 1:23-24)

आम्हांवर आमच्या सृष्टीकर्त्याची दंडाज्ञा आहे आणि त्याच्या गौरवाचे मूल्य जपण्यासाठीं त्यानें आमच्या पापावर सार्वकालिक क्रोध ओतून आपला नाश करावा म्हणून तो स्वतःच्या नीतिमान चारित्र्यामुळें बाध्य आहे या अरिष्टकारक वर्तमानाला घातक असे सुवार्तेचे एक अद्भुत वर्तमान आहे.

हे असे सत्य आहे जे कोणीहि निसर्गाकडून शिकू शकत नाहीं. सुवार्तेचे हे सत्य शेजाऱ्यांना कळवणें आवश्यक आहे आणि मंडळीमध्यें त्याची घोषणा केलीं गेली पाहिजे आणि सुवार्तीक हेच सत्य घेऊन जगांत गेलें पाहिजे.

उत्तम बातमी अशी कीं आपण संपूर्ण मानवजातीला दंडाज्ञा देऊ नये पण तरीही आपल्या न्यायीपणाच्या सर्व अटी पूर्ण व्हाव्यांत अशी व्यवस्था देवानें स्वतः केलीं आहे.

पापी लोकांचा हिशेब चुकता करण्याचा आणि आपले न्यायीपण कायमस्वरूपी जपण्याचा एक मार्ग म्हणजें नरक. पण आणखी एक मार्ग आहे. आणि देवानें त्या दुसऱ्या मार्गाचे प्रयोजन केलें. हेच ते शुभवृत्त.

देवाचे शहाणपण हे कीं देवानें देवाच्या न्यायाशी तडजोड न करता आम्हीं देवाच्या क्रोधापासून सोडविले जावे असा प्रीतिचा मार्ग देवानें स्वतः नियोजित केला आहे. हा तो मार्ग : शुभवर्तमान. मी ते पुन्हा सावकाशपणें सांगतो : देवाचा सुज्ञपणा हा कीं देवानें देवाच्या न्यायाशी तडजोड न करता आम्हीं देवाच्या क्रोधापासून सोडविले जावे असा प्रीतिचा मार्ग देवानें स्वतः नियोजित केला आहे.

आणि हे शहाणपण काय आहे? पापी लोकांसाठीं देवाच्या पुत्राचे मरणें! “आम्हीं तर वधस्तंभावर खिळलेला ख्रिस्त गाजवतो. . . देवाचे सामर्थ्य व देवाचे शहाणपण” (1 करिंथ 1:23-24).

ख्रिस्ताचे मरण हे देवाचे शहाणपण आहे ज्याद्वारे देवाची प्रीति पापी लोकांना देवाच्या क्रोधापासून वाचवते, आणि त्याचवेळी ख्रिस्तामध्यें देवाचे नीतिमत्वहि टिकवून ठेवते आणि उघडपणें प्रदर्शित करते.

8 अक्तूबर : घर्षण पर विजयी होना

Alethia4India
Alethia4India
8 अक्तूबर : घर्षण पर विजयी होना
Loading
/

“जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो, अर्थात् सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो; और मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न करो।” इफिसियों 4:1-3

घर्षण का एक उपोत्पाद गर्मी है: जब दो या दो से अधिक वस्तुएँ एक-दूसरे से रगड़ती हैं, तो तापमान बढ़ता है। इसी प्रकार, जब आप पापी लोगों को एक साथ रखते हैं—यहाँ तक कि कलीसिया में भी, जहाँ पाप अब शासन नहीं करता, लेकिन उसकी उपस्थिति अभी भी है—वहाँ घर्षण होना तय है। हमें इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हम सही आकार में बनाई गई ईंटें नहीं हैं, जो बड़ी सुन्दरता से एक साथ फिट हो जाती हैं। हम खुरदरे और अधूरे लोग हैं। लेकिन फिर भी, हमें घर्षण के कारण अपने अन्तिम उद्देश्य से विचलित नहीं हो जाना चाहिए।

घर्षण को नजरअंदाज करने से वह गायब नहीं होगा; इसके बजाय, जब हम मसीह पर ध्यान केन्द्रित करते हैं और उसे महत्त्व देते हैं जिसे वह विश्वासियों की मण्डली के लिए महत्त्व देता है, जैसे कि आतिथ्य, एक-दूसरे के बोझों को सहन करना, आपसी प्रोत्साहन, प्रार्थना और दान, तब हम घर्षण पर विजयी होते हैं। ये मूल्य हमें यह पूछने के लिए प्रेरित नहीं करते कि “मसीह की देह मेरे लिए क्या कर सकती है?” बल्कि यह कि “मैं मसीह की देह के लिए क्या कर सकता हूँ?” जब हम इस दृष्टिकोण से काम करते हैं, तब हमारी आत्म-दया, गुस्सा और चिन्ताएँ दूर होना शुरू होते हैं।

इसलिए जबकि घर्षण की उम्मीद की जानी चाहिए, फिर भी इसे सहन नहीं किया जाना चाहिए। विश्वासियों के रूप में, हमें विनम्र और पश्चाताप करने वाले दिलों के प्रमाण दिखाने चाहिएँ। जब हम ऐसा नहीं करते, तो यह उपयुक्त हो जाता है कि कलीसिया के अन्य लोग हमारी मदद करें और यदि आवश्यक हो तो हमें प्रेमपूर्वक चुनौती दें और अनुशासित करें। सुधार काल के दौरान कलीसिया के अगुवों ने कहा था कि एक कलीसिया सच्ची कलीसिया तब होती है, जब उसमें परमेश्वर का वचन सुनाया जाता है, संस्कारों का पालन किया जाता है, और कलीसियाई अनुशासन का पालन किया जाता है।

कलीसिया में पश्चाताप न करने वाली विभाजनकारी प्रवृत्तियों को सहन करना न केवल घर्षण से उत्पन्न होने वाली गर्मी को अनियन्त्रित छोड़ने की अनुमति देता है, बल्कि यह विनाश का कारण भी बन सकता है। हम किसी को अपने भोजन कक्ष की मेज पर बैठने और हमारे परिवारों केवल इस कारण नष्ट करने की अनुमति नहीं देंगे क्योंकि उनका रवैया बुरा है; फिर भी यह कितना आसान है कि हम कलीसिया में घर्षण और विभाजन को सहन कर लें ताकि यह प्रतीत हो सके कि हम एक अच्छा, आरामदायक स्थान प्रदान कर हैं। लेकिन हमें कठिन मार्ग अपनाना होगा। कलीसिया का भविष्य इसी पर निर्भर करता है।

घर्षण आएगा। हम गलतियाँ करेंगे। इसलिए हमें एक-दूसरे के साथ प्रेम से सहन करना होगा। हमें एक-दूसरे के प्रति धैर्य रखना होगा। हमें हर सम्भव “यत्न” करना होगा ताकि हम उस एकता को बनाए रख सकें जो आत्मा हममें लाता है, जब वह हमें विश्वास के द्वारा परमेश्वर के परिवार में लाता है (इफिसियों 4:3)। दूसरे शब्दों में, हमें मसीह की तरह बनना होगा, क्योंकि उसका निःस्वार्थ अगापे प्रेम ही है जो हमें सिखाता है कि हम एक-दूसरे से बलिदानी प्रेम कैसे करें और संघर्ष पर कैसे विजयी हों। एकता एक कीमती उपहार है, और इसलिए घर्षण को सम्बोधित किया जाना चाहिए—नम्रता और धैर्य से, लेकिन फिर भी इसे सम्बोधित किया जाना चाहिए। शायद आज आपको किसी से बात करने की आवश्यकता है। शायद आज आपको किसी से पश्चाताप करने की आवश्यकता है, या किसी को क्षमा करने की आवश्यकता है, या कलीसिया के किसी सदस्य के साथ उनके घर्षण को सुलझाने में मदद करने के लिए उनके साथ चलने की आवश्यकता है।

याकूब 3:13-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 45–46; यूहन्ना 19:23-42

8 October : आमचे हित करण्यांत देवाचा आनंद

Alethia4India
Alethia4India
8 October : आमचे हित करण्यांत देवाचा आनंद
Loading
/

आणि मी त्यांच्याशी सर्वकाळचा करार करीन; तो असा कीं मी त्यांचे हित करण्यापासून माघार घेणार नाहीं; मी आपले भय त्यांच्या मनात उत्पन्न करीन, म्हणजें ते माझ्यापासून माघार घेणार नाहींत. मी त्यांच्याविषयी आनंद पावून त्यांचे कल्याण करीन व मी मनापासून जिवाभावाने त्यांची ह्या देशात खरोखर लागवड करीन.” (यिर्मया 32:40-41)

आपल्याकडून देवाचे गुणगान व्हावें हा त्याचा शोध आणि त्याच्यामध्यें आपल्या सर्व आनंदाचा शोध, हे दोन्हीं उद्यमांचा शेवट एकच आहेत. त्याचा गौरव व्हावा म्हणून देवाची मोहीम आणि आपण केवळ त्याच्यामध्यें संतुष्ट राहावे ही आमची मोहीम ह्या दोन्हीं गोष्टींचा कळस यांत आहे : देवामध्यें आमचा आनंद, जो स्तुतीने भरून वाहतो.

देवाच्या बाजूने, स्तुती ही त्याच्या लोकांच्या अंतःकरणात त्याच्या स्वतःच्या वैभवाची गोड प्रतिध्वनी आहे.

आमच्या बाजूने, स्तुती ही त्या संतुष्टीचा शिखर आहे जी देवाच्या सहवासात राहण्याने प्राप्त होते.

या शोधाचा मती गुंग करणारा निहीतार्थ हा आहे कीं देवाची ती सर्वसमर्थ शक्ती जी देवाच्या अंत:करणाला त्याचा स्वतःच्या गौरवाचा शोध घेण्यांस चालना देते तीच सर्वसमर्थ शक्ती जे त्याच्यामध्यें आपला आनंद शोधतात त्यांच्या अंतःकरणाला आपण संतुष्ट करावे म्हणून देखील त्याला चालना देते.

बायबलचे शुभवर्तमान हेच कीं देव त्याच्यावर आशा ठेवणाऱ्यांची अंतःकरणें संतुष्ट करण्यापासून कदापि माघार घेत नाहीं. अगदी उलट आहे : जी गोष्ट आपल्याला सर्वात जास्त आनंद देऊ शकते देव त्यांच गोष्टीमध्यें त्याच्या पूर्ण अंतःकरणाने आणि पूर्ण जिवाने आनंद करतो. “मी त्यांच्याविषयी आनंद पावून त्यांचे कल्याण करीन व मी मनापासून जिवाभावाने त्यांची ह्या देशात खरोखर लागवड करीन” (यिर्मया 32:41) हे शब्द अद्भुत आहेत.

देव आपल्या पूर्ण अंतःकरणाने आणि पूर्ण जिवाने सार्वकालिक आनंदाच्या शोधाच्या आमच्या ह्या मोहीमेत सामील होतो कारण त्याच्यामध्यें असलेल्या त्या आनंदाचा सर्वोच्च शिखर त्याच्या अपरिमित महानतेचा गौरव आहे.

7 अक्तूबर : एक प्रतिष्ठित जीवन

Alethia4India
Alethia4India
7 अक्तूबर : एक प्रतिष्ठित जीवन
Loading
/

“जब यह देखा गया कि दानिय्येल में उत्तम आत्मा रहती है, तब उसको उन अध्यक्षों और अधिपतियों से अधिक प्रतिष्ठा मिली; वरन् राजा यह भी सोचता था कि उसको सारे राज्य के ऊपर ठहराए। तब अध्यक्ष और अधिपति राजकार्य के विषय में दानिय्येल के विरुद्ध दोष ढूँढ़ने लगे; परन्तु वह विश्वासयोग्य था, और उसके काम में कोई भूल या दोष न निकला, और वे ऐसा कोई अपराध या दोष न पा सके।” दानिय्येल 6:3-4

बन्दी बनाकर बेबीलोन ले जाए जाने के बाद दानिय्येल को उत्कृष्ट इस्राएली युवकों के एक विशेष समूह का हिस्सा बनाया गया, जिन्हें राजा नबूकदनेस्सर के दरबार में कार्यभार सौंपे गए थे। हालाँकि उसे निर्वासन में ले जाया गया था, उसका नाम बदल दिया गया था और वह अपने परिवार तथा परिचितों से दूर था, फिर भी दानिय्येल ने अपने दिल में यह ठान लिया था कि वह राजा के खाने और पीने से स्वयं को अपवित्र नहीं करेगा (दानिय्येल 1:12-16)। वह अपने समय की नैतिक गिरावट के बीच एक साहसी व्यक्ति के रूप में खड़ा हुआ और अपनी सत्यनिष्ठा पर अडिग रहा।

दानिय्येल ने जिस सरकार में काम किया, उसमें अपने जीवन की गुणवत्ता से उसने स्वयं को अलग किया। अब तक उसकी निष्ठा निर्विवाद प्रमाणित हुई थी। वह निरन्तरता वाला व्यक्ति था, जिसे उसने कई साम्राज्यों के दौरान प्रदर्शित किया। उसके पास कठिनाइयों का सामना करने और उन्हें पार करने की असाधारण क्षमता थी, और साथ ही परमेश्वर द्वारा दी गई बुद्धिमत्ता थी, जिसने उसे ऐसा परामर्श देने में सक्षम बनाया, जिसने मानव इतिहास की दिशा बदल डाली।

हालाँकि दानिय्येल जिन सरकारी पदों पर कार्यरत था, वे भ्रष्टाचार से प्रभावित हो सकते थे, तौभी उसने सभी प्रकार की बेईमानी को न कहकर खुद को अलग किया। वह न तो लापरवाह था और न ही अनैतिक, और न ही उसके सार्वजनिक कार्यों और निजी जीवन के बीच कोई अन्तर था। वह अपने साथियों की नजरों में निर्दोष था। यहाँ तक कि उसके विरोधी भी, जो उसकी विशिष्टता से जलते थे और उसे नापसन्द करते थे, उसके खिलाफ कोई आरोप नहीं लगा सके।

ईर्ष्या से भरे हुए, इन अधिकारियों ने अन्ततः दानिय्येल के खिलाफ साजिश रचने का निर्णय लिया। वे उसके परमेश्वर के प्रति उसकी अडिग प्रतिबद्धता को या इस तथ्य को पसन्द नहीं करते थे कि वह अधिकार वाले एक पर नियुक्त था। वे यह नहीं सहन कर सके कि वह अपने जीवन से परमेश्वर की शक्ति और पवित्रता के प्रति एक अडिग विश्वास को प्रदर्शित करता था। पवित्र जीवन अक्सर इस प्रकार के तिरस्कार को लाता है। दानिय्येल को इसलिए नहीं फँसाया गया था क्योंकि वह बुरा व्यक्ति था, बल्कि इसलिए क्योंकि वह सत्य के लिए खड़ा था। वह उन बातों से प्यार करता था जो परमेश्वर को प्रिय है, और उसे अपने जीवन में उतारता था।

क्या आपके जीवन में भी इसी तरह का विश्वास पाया जाता है? क्या आपके कर्म आपके परमेश्वर के बारे में सत्य को प्रकट करते हैं? क्या आप सत्यनिष्ठा के प्रति एक जुनून को पोषित करने के लिए तैयार हैं? क्या आप परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के बारे में अधिक चिन्तित हैं, बजाय इसके कि लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं? यीशु ने अपने अनुयायियों को चेतावनी दी थी कि वे उसके कारण निन्दित होंगे और उसके लिए पीड़ा सहेंगे (मत्ती 5:11), जब वे ऐसा जीवन जीएँगे, जो उनके पिता की महिमा और प्रशंसा करेगा (पद 14-16)। दानिय्येल के समान समर्पण के साथ जीवन जीएँ; इस बात में स्पष्ट रहें कि आप उन बातों से प्यार करें जो परमेश्वर को प्रिय हैं, और फिर उन्हें अपनी जीवन में उतारें।

1 पतरस 2:9-17

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 42–44; यूहन्ना 19:1-22 ◊

7 October : आम्हीं आशा धरून राहतो, तो कार्य करतो

Alethia4India
Alethia4India
7 October : आम्हीं आशा धरून राहतो, तो कार्य करतो
Loading
/

हे देवा, तुझी आशा धरून राहणार्‍यांचे इष्ट काम करणारा असा तुझ्याशिवाय दुसरा कोणी प्राचीन कालापासून ऐकण्यात आलेला नाहीं, त्याचे नाव आलेले नाहीं, कोणी तो डोळ्यांनी पाहिला नाहीं. (यशया 64:4)

माझ्यासाठीं काम करून देवाला त्याचे देवपण प्रदर्शित करणें आवडते हे सत्य, आणि हे कीं माझ्यासाठीं तो जे करतो ते सर्व मी त्याच्यासाठीं केलेंल्या कोणत्याही कामाअगोदर आहे, कीं बहुंना त्याच्याद्वारे साध्य केलेलीं कृति आहे, मला इतर सर्व गोष्टींपेक्षा अधिक आनंद देणारं आहे.

तो आपल्यासाठीं काम करतो असे म्हणणें प्रथमदर्शनी स्वतःविषयी अभिमान बाळगण्यासारखे आणि देवाला कमी लेखण्यासारखे दिसू शकते. पण असे वाटण्याचे कारण म्हणजें मी एक नियोक्ता आहे आणि देवाला नोकरीची गरज आहे हा चुकीचा संभ्रम. देव हा आपल्यासाठीं काम करतो असें बायबल म्हणते तेव्हा त्याचा तो अर्थ होत नाहीं. देव त्याची “आशा धरून राहणार्‍यांचे इष्ट काम” करतो असे यशया म्हणतो तेव्हा त्याच्या मनात असला अर्थ अजिबात नव्हतां (यशया 64:4).

देव माझ्यासाठीं काम करतो असे म्हणण्याचा योग्य अर्थ हा आहे कीं मी दीन-दरिद्री आहे आणि मला सुटकेची गरज आहे. मी दुर्बळ आहे म्हणून मला एका सामर्थी व्यक्तीची गरज आहे. माझ्या जिवाला धोका आहे म्हणून मला एका रक्षकाची गरज आहे. मी मूर्ख आहे म्हणून मला कोणीतरी शहाणा अशा व्यक्तीची गरज आहे. मी हरवलेला आहे म्हणून मला सोडविणाऱ्याची गरज आहे.

देव माझ्यासाठीं काम करतो असे म्हणणें म्हणजें मी काम करण्यांस असमर्थ आहे. मला मदतीची नितांत गरज आहे.

आणि ह्यामुळें माझे नव्हे तर देवाचे गौरव होते. गौरव हे देणाऱ्याला प्राप्त होते. स्तुती जो सामर्थ्यवान त्याची केलीं जाते.

देव तुमच्यासाठीं काम करतो याविषयी बायबल काय काय म्हणते ते ऐका आणि स्वतःचा भार उचलून चालण्याच्या ओझ्यातून मुक्त व्हा. ते काम त्याला करू द्या.

1. “हे देवा, तुझी आशा धरून राहणार्‍यांचे इष्ट काम करणारा असा तुझ्याशिवाय दुसरा कोणी प्राचीन कालापासून ऐकण्यात आलेला नाहीं.” (यशया 64:4).

2. आणि त्याला कांहीं उणें आहे, म्हणून माणसांच्या हातून त्याची सेवा घडावी असेही नाहीं; कारण जीवन, प्राण व सर्वकांहीं तो स्वतः सर्वांना देतो” (प्रेषित 17:25).

3. “कारण मनुष्याचा पुत्रही सेवा करून घेण्यास नाहीं, तर सेवा करण्यास व पुष्कळांच्या मुक्तीसाठीं आपला जीव खंडणी म्हणून अर्पण करण्यास आला आहे” (मार्क 10:45).

4. “परमेश्वराचे नेत्र अखिल पृथ्वीचे निरीक्षण करीत असतात, जे कोणी सात्त्विक चित्ताने त्याच्याशी वागतात त्यांचे साहाय्य करण्यात तो आपले सामर्थ्य प्रकट करतो.” (2 इतिहास 16:9).

5. “मला भूक लागली तरी मी तुला सांगणार नाहीं. . . संकटसमयी माझा धावा कर; मी तुला मुक्त करीन आणि तू माझा गौरव करशील” (स्तोत्र 50:12, 15).

6. “तुमच्या वृद्धापकाळापर्यंतही मीच तो आहे; तुमचे केस पिकत तोपर्यंत मी तुम्हांला वागवीन; निर्माणकर्ता मीच आहे, वागवणारा मीच आहे, मी खांद्यांवर वागवून तुमचा बचाव करीन” (यशया 46:4).

7. “तरी जो कांहीं मी आहे तो देवाच्या कृपेने आहे आणि माझ्यावर त्याची जी कृपा झाली आहे ती व्यर्थ झाली नाहीं; परंतु ह्या सर्वांपेक्षा मी अतिशय श्रम केलें, ते मी केलें असे नाहीं, तर माझ्याबरोबर असणार्‍या देवाच्या कृपेने केलें” (1 करिंथ 15:10).

8. “परमेश्वर जर घर बांधत नाहीं तर ते बांधणार्‍यांचे श्रम व्यर्थ आहेत” (स्तोत्र 127:1).

9. “सेवा करणार्‍याने, ती आपण देवानें दिलेल्या शक्तीने करत आहोत, अशी करावी; ह्यासाठीं कीं, सर्व गोष्टींत देवाचा गौरव येशू ख्रिस्ताच्या द्वारे व्हावा” (1 पेत्र 4:11).

10. “भीत व कापत आपले तारण साधून घ्या; कारण इच्छा करणें व कृती करणें हे तुमच्या ठायीं आपल्या सत्संकल्पासाठीं साधून देणारा तो देव आहे” (फिलिप्पै 2:12-13).

11. “मी लावले, अपुल्लोसाने पाणी घातले, पण देव वाढवत गेला” (1 करिंथ 3:6).

6 October : आनंदी देव

Alethia4India
Alethia4India
6 October : आनंदी देव
Loading
/

धन्यवादित (म्हणजें आनंदी) देवाच्या गौरवाची जी सुवार्ता मला सोपवलेली आहे तिला हे अनुसरून आहे. (1 तीमथ्य 1:10-11)

देवाच्या गौरवाचा एक प्रमुख पैलू म्हणजें त्याचा आनंद.

देव हा अपरिमित आनंदी नाहीं आणि तरीही अपरिमित असा गौरवी मात्र तो असू शकतो अशी कल्पनाहीं प्रेषित पौल करू शकत नव्हता. अपरिमित गौरवी असणं म्हणजें अपरिमित आनंदी असणं. त्यानें “धन्यवादित देवाच्या गौरवाची” ह्या वाक्प्रचाराचा उपयोग केला, कारण देव जितका आनंदी आहे तितका आनंदी असणें ही त्याचा बाबतींत एक गौरवशाली गोष्ट आहे – अपरिमित आनंदी.

देव आपल्या कल्पनेपलीकडे आनंदी आहे ह्या अनाकलनीय वस्तुस्थितीमध्येंच देवाचे  गौरव आहे.

ही सुवार्ता आहे : “धन्यवादित (म्हणजें पूर्णानंदी) देवाच्या गौरवाची सुवार्ता.” हा बायबलमधूनच घेतलेला शास्त्र-संदर्भ आहे! देव गौरवीपणें आनंदी आहे हे शुभवृत्त आहे.

कोणीही मनुष्य एका दुःखी देवाबरोबर सर्वकाळ राहावयास पाहणार नाहीं. जर देव दु:खी असेल, तर सुवार्तेचे ध्येय हे आनंदाचे ध्येय नाहीं, म्हणजें ती मुळीच सुवार्ता नाहीं असाच त्याचा अर्थ होईल.

पण, खरे पाहतां, येशू आम्हाला एका आनंदी देवासोबतच सर्वकाळ राहण्यासाठीं बोलावितो जेव्हा तो म्हणतो, “तू आपल्या धन्याच्या आनंदात सहभागी हो” (मत्तय 25:23). येशू प्रकट झाला आणि मरण पावला ते यासाठीं कीं त्याचा आनंद – देवाचा आनंद – आम्हांमध्यें असावा आणि आमचा आनंद पूर्ण व्हावा (योहान 15:11; 17:13). म्हणून, सुवार्ता ही “आनंदी देवाच्या गौरवाची सुवार्ता” आहे.

देवाचा अपरिमित आनंद हा प्रामुख्याने त्याच्या पुत्रामध्यें असलेला त्याचा आनंद आहे. म्हणजें जेव्हा आपण देवाच्या आनंदात सहभागी होतो, तेव्हा आपण त्या आनंदात सहभागी होतो जो पित्याला त्याच्या पुत्राच्या ठायीं आहे.

ह्याच उद्देश्याने येशूनें पित्याचे नाव आपल्याला कळवलें आहे. योहान 17 मधील त्याच्या महान प्रार्थनेच्या शेवटी, तो आपल्या पित्याला म्हणाला, “मी तुझे नाव त्यांना कळवले आहे आणि कळवीन; ह्यासाठीं कीं, जी प्रीति तू माझ्यावर केलींस ती त्यांच्यामध्यें असावी आणि मी त्यांच्यामध्यें असावे” (योहान 17:26). त्यानें आम्हांला देवाचे नांव कळविले, जेणेंकरून त्याच्या पुत्रामध्यें असलेला देवाचा जो आनंद तोच आपल्यामध्येंही असावा आणि त्याच्यामध्यें आपला आनंद असावा.

6 अक्तूबर : पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा

Alethia4India
Alethia4India
6 अक्तूबर : पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा
Loading
/

“पवित्रशास्त्र . . . तुझे मसीह पर विश्‍वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिए बुद्धिमान बना सकता है। सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिए लाभदायक है, ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिए तत्पर हो जाए।” 2 तीमुथियुस 3:15-17

पवित्रशास्त्र का अधिकार, पर्याप्तता, अचूकता और निष्कपटता परमेश्वर और उसकी कलीसिया के निरन्तर कार्य के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हैं। जब तक हम सुसमाचार के दिव्य स्रोत के प्रति आश्वस्त नहीं होते, तब तक हम इसे खोए हुए और पीड़ित संसार तक नहीं ले जा सकते। जैसा कि जे. सी. राइल ने लिखा है, यदि मसीहियों के पास बाइबल एक “दिव्य पुस्तक के रूप में नहीं है, जिस पर वे अपनी सैद्धान्तिक शिक्षा और आचरण का आधार बना सकें, तो उनके पास न तो वर्तमान शान्ति या आशा के लिए कोई ठोस आधार होगा और न ही मानवजाति का ध्यान आकर्षित करने का कोई अधिकार होगा।”[1]

पौलुस ने इसी विषय पर तीमुथियुस को याद दिलाया कि “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है।” दूसरे शब्दों में, बाइबल कोई मानव निर्मित ग्रंथ नहीं है, जिसमें दिव्यता का समावेश किया गया हो; बल्कि यह एक दिव्य उपहार है जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के माध्यम से दिया है। इसकी प्रत्येक पुस्तक, अध्याय, वाक्य और शब्द मूल रूप से परमेश्वर की प्रेरणा से दिए गए हैं।

अन्य मसीही सैद्धान्तिक शिक्षाओं के समान पवित्रशास्त्र की सैद्धान्तिक शिक्षा को समझना भी एक चुनौती हो सकता है। लेकिन किसी बात को समझने में आने वाली कठिनाई उसकी सच्चाई को कम नहीं करती। इसके अलावा, जब पवित्रशास्त्र के सिद्धान्त की बात आती है, तो कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें हम वस्तुनिष्ठ रूप से देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि बाइबल पूर्ण रूप से एक संगठित और सामंजस्यपूर्ण रचना है। यह तीस से अधिक लेखकों द्वारा लगभग पन्द्रह सौ वर्षों की अवधि में लिखी गई थी, फिर भी वे सभी लेखक एक ही कहानी बताते हैं—इस संसार का वर्णन करना, इसके सृष्टिकर्ता के चरित्र को उजागर करना, मानव हृदय की समस्या को दर्शाना, और परमेश्वर के मेमने के बलिदान के माध्यम से उद्धार के अद्‌भुत मार्ग की ओर संकेत करना—और उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक एक ही कहानी को बताया गया है!

बाइबल समय, संस्कृति, लिंग और बुद्धिमत्ता की सीमाओं को पार कर जाती है। कुछ पुस्तकें किसी विशेष व्यक्ति, युग या स्थान के लिए उपयुक्त हो सकती हैं, लेकिन कोई अन्य पुस्तक ऐसी नहीं है, जो हर दिन और हर युग की चुनौतियों का सामना इतनी पूर्णता से कर सके और जीवन के मूलभूत प्रश्नों का उत्तर दे सके। परमेश्वर के वचन की गहराइयों को सबसे महान बुद्धिजीवी भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते, और फिर भी छोटे बच्चे तक इसे पढ़कर इसके सत्य को जान सकते हैं और अपने जीवन को परिवर्तित कर सकते हैं।

पवित्रशास्त्र का अधिकार, पर्याप्तता, अचूकता और निष्कपटता ही वह आधार हैं, जिन पर हमें खड़े रहना है; और इस कार्य को करने के लिए हमारे पास दिव्य सहायता भी उपलब्ध है। जिस पवित्र आत्मा ने परमेश्वर के वचन को प्रेरित किया, वही पवित्र आत्मा उस वचन को प्रकाशित भी करता है और हमें यह विश्वास दिलाता है कि यह परमेश्वर का दिया हुआ वचन है, जिससे हम उसमें विश्वास करें जो देहधारी वचन है। जब आत्मा यह कार्य आपके भीतर करता है, तब आपका विश्वास केवल एक बौद्धिक स्वीकृति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आपको परमेश्वर के वचन को और अधिक जानने और समझने की भूख से भर देता है—उसके लिए जो न केवल इसका लेखक है बल्कि इसका केन्द्र भी है।

  भजन 12

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 40–41; यूहन्ना 18:19-40


[1] बाइबल इंस्पिरेशन: इट्स रियैलिटी एण्ड नेचर (विलियम हण्ट, 1877), पृ. 6.

5 अक्तूबर : आत्मा से भरी निडरता

Alethia4India
Alethia4India
5 अक्तूबर : आत्मा से भरी निडरता
Loading
/

परन्तु यदि तू चढ़ाई करते डरता हो, तो अपने सेवक फूरा को संग लेकर छावनी के पास जाकर सुन, कि वे क्या कह रहे हैं; उसके बाद तुझे उस छावनी पर चढ़ाई करने का साहस होगा।” न्यायियों 7:10-11

डर में पीछे हटना हमेशा आसान होता है, जबकि विश्वास में आगे बढ़ना कठिन। पीछे हटना आसान तो है, लेकिन कभी भी बेहतर नहीं है।

गिदोन डर के बारे में और उसकी वजह से होने वाली हिचकिचाहट के बारे में बहुत कुछ जानता था। जब परमेश्वर के दूत ने उसे इस्राएल का नेतृत्व करने के लिए बुलाया, तब उसने संकोच किया (न्यायियों 6:13, 15)। जब इस्राएल के शत्रु उससे युद्ध करने के लिए इकट्ठा हुए, तब भी उसने संकोच किया (पद 36-40)। और ऐसा प्रतीत होता है कि युद्ध से ठीक पहले, जिसमें परमेश्वर ने उसे विजय का आश्वासन दिया था, वह फिर से संकोच कर रहा था (7:9-10)। इसी डर और संकोच के बीच परमेश्वर ने उससे बात की। ध्यान दें कि गिदोन के डर को देखकर भी परमेश्वर अनुग्रह और धैर्य से उससे बात करता है, “परन्तु यदि तू चढ़ाई करते डरता हो . . .” और उसे अपने सेवक के साथ शत्रु शिविर में जाने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह गिदोन के भय को ध्यानपूर्वक सम्बोधित करने का एक संवेदनशील तरीका है। परमेश्वर ने यह स्वीकार किया कि मानवीय दृष्टिकोण से गिदोन के पास डरने के ठोस कारण थे! वह एक ऐसे शत्रु के खिलाफ युद्ध में जा रहा था, जिसकी सेना उसके सैनिकों की तुलना में हजारों में अधिक थी। लेकिन परमेश्वर ने उसे उसके डर के लिए डाँटा नहीं, बल्कि उसे आत्मविश्वास से भरने का कारण दिया।

गिदोन की तरह हमें भी प्रभु के ऐसे ही दयालु शब्दों की जरूरत है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हम अपनी सारी चिन्ताएँ उस पर डाल सकते हैं (1 पतरस 5:7)। हम अपने सारे बोझ और भय उसके चरणों में रख सकते हैं। हमें यह अनुमति दी गई है कि हम उसके पास जाकर कहें कि हमें नहीं पता कि हमें क्या करना चाहिए। और उसका उत्तर हमेशा अनुग्रह और करुणा से भरा होता है।

जो बात इस कहानी को और भी सुन्दर बनाती है, वह है गिदोन की परमेश्वर की कोमल प्रेरणा के प्रति प्रतिक्रिया। जब वह अपने सेवक के साथ छिपकर शत्रु शिविर में जाता है, तो वह दो सैनिकों को एक स्वप्न के बारे में चर्चा करते हुए सुनता है, जिसमें एक सैनिक इसकी व्याख्या इस प्रकार करता है कि वे “गिदोन की तलवार” से हार जाएँगे क्योंकि “उसी के हाथ में परमेश्वर ने मिद्यान को सारी छावनी समेत कर दिया है” (न्यायियों 7:14)। जब गिदोन यह सुनता है और महसूस करता है कि परमेश्वर ने सचमुच उसके लिए पहले से ही वह कार्य कर दिया है जो वह स्वयं कभी नहीं कर सकता था, तो वह क्या करता है? “उसने आराधना की” (पद 15)। इस प्रतिक्रिया में बहुत गहराई है। असम्भव परिस्थितियों का सामना करते हुए, लेकिन परमेश्वर की प्रतिज्ञा में आश्वस्त होकर, यह भयभीत, कमजोर और अप्रत्याशित अगुवा परमेश्वर की स्तुति में अपना हृदय उण्डेल देता है और फिर परमेश्वर से मिले साहस से अपनी सेना को एकत्र करता है। उसकी निडरता एक गुप्त, निजी क्षण से आई थी, जो उसने परमेश्वर के साथ बिताया था।

यह महत्त्वपूर्ण है कि हम उस अन्तर को समझें जो मनुष्यों द्वारा संचालित योजनाओं और आत्मा से भरी वास्तविक निडरता के बीच है। मानवीय योजनाएँ केवल एक मानवीय प्रयास होती हैं और जल्दी ही बिखर सकती हैं; लेकिन आत्मा से मिलने वाली निडरता केवल तब पाई जाती है, जब हम परमेश्वर के सामने दीन होते हैं, अपनी अपर्याप्तता को स्वीकार करते हैं, और उसके सामर्थ्य को याद रखते हैं। यही वह ठोस स्थान है जिस पर हम खड़े हो सकते हैं। डर का समाधान स्वयं को महान मान लेना नहीं है, जैसा कि बहुत से लोग दावा करते हैं। इसका समाधान यह है कि हम परमेश्वर को महान मानें और उसकी शक्ति पर विश्वास करें, जो हमें एक पवित्र और विनम्र निडरता प्रदान कर सकता है।

आप इस समय किससे डर रहे हैं? किस बात को लेकर आप संकोच कर रहे हैं, जबकि परमेश्वर आपको आज्ञाकारिता में आगे बढ़ने के लिए बुला रहा है? अपने भय को परमेश्वर के पास लाएँ। उससे प्रार्थना करें कि वह आपको वह सामर्थ्य दिखाए जो आप में नहीं है। फिर उस पर भरोसा करें, उसकी आराधना करें, और उसकी आज्ञा का पालन करें।

यहोशू 1:1-11

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: यहेजकेल 37–39; यूहन्ना 18:1-18 ◊

5 October : परतफेड केलीं जाईल व न्याय मिळेल

Alethia4India
Alethia4India
5 October : परतफेड केलीं जाईल व न्याय मिळेल
Loading
/

प्रिय जनहो, सूड उगवू नका, तर देवाच्या क्रोधाला वाट द्या; कारण असा शास्त्रलेख आहे कीं, “सूड घेणें मजकडे आहे, मी परतफेड करीन,” असे प्रभू म्हणतो.” (रोमकरांस 12:19)

तुमच्या सर्वांवर कधी ना कधी अन्याय किंवा अत्याचार झालाच आहे. शक्यता तुमच्यापैकीं बहुतेकांवर एखाद्या व्यक्तीनें गंभीर अत्याचार केला असेल आणि त्यानें आजपर्यंत क्षमा मागितली नाहीं किंवा त्याची योग्य परतफेड करण्यासाठीं समाधानकारक असे कांहींही केलें नाहीं.

आणि तुमच्या त्या दुखावलेल्या भावना विसरून उद्भवलेली कटुता सोडून देण्याच्या मार्गातील सर्वांत मोठे अडखळण म्हणजें हे ठराविक मत – जे योग्यच आहे – कीं परतफेड केलीं गेलीच पाहिजे, कीं ज्यांच्यावर भयंकर अत्याचार झाला आहे ते लोक अत्याचार करणाऱ्याला जर असेच सुटून जाऊ देतील तर ह्या विश्वाची नैतिक व्यवस्था कोलमडून जाईल आणि प्रत्येकावर अन्याय होईल.

हे ठराविक मत द्वेष सोडून क्षमा करण्यांत अडखळण आहे. परंतु हे एकमेव अडखळण नाहीं. आम्हाला सामोरे गेलें पाहिजे अशी आमची स्वतःची पापे देखील आहेतच. पण खरे अडखळण वर सांगितल्याप्रमाणेंच आहे.

आम्हाला असे वाटते कीं अपराध्यांना दंड न देता मोकळे सोडून देणें म्हणजें आपल्याला न्याय मिळणार नाहीं हे मान्य करणें होय. आणि आम्हांला ते मान्य नसते.

म्हणून आपण आपल्या मनांत राग धरून राहतो, आणि ती घटना किंवा ते शब्द यांची पुन्हा पुन्हा आठवण करून स्वतःच्या भावनांशी खेळतो : असे व्हायला नको होते; असे व्हायला नको होते; जे झालें ते खूप चुकीचे होते; जे झालें ते खूप चुकीचे होते. मी इथे इतका दुःखी आहे आणि तो (किंवा ती) मात्र आनंदी व सुखी आहे, हे कसे? हे खूप चुकीचे आहे. हे खूप चुकीचे आहे! आम्हीं घडलेल्या प्रकाराला असेच विसरू शकत नाहीं. आणि आपल्या अं:तकरणात भरण-पोषण केलेली ही कटुता प्रत्येक गोष्टीला विषाक्त करू लागते.

रोमकरांस 12:19 मधील हे अभिचचन आपल्याला देवानें आपल्यावरील सूडाचे हे ओझे उचलून घेण्यासाठीं दिलें आहे.

” सूड उगवू नका, तर देवाच्या क्रोधाला वाट द्या.” म्हणजें काय?

क्रोधाचे हे ओझे खाली टाकून देणें, आपल्यावर अन्याय झाल्याच्या भावनेने दुःखाचे पोषण करण्याची जणू कांही एक प्रथाच, ती टाकून देणें, याचा अर्थ असा होत नाहीं कीं तुमच्यावर कोणताही मोठा अत्याचार झाला नव्हता. अत्याचार तर झालाच आहे.

पण याचा अर्थ असाही नाहीं कीं न्याय मिळत नाहीं. याचा अर्थ असा नाहीं कीं तुम्हांला निर्दोष सिद्ध केलें जाणार नाहीं. याचा अर्थ असा नाहीं कीं अपराधी असेच मोकळे सुटून गेलेंत. नाहीं, ते असेच मोकळे सुटून गेलें नाहीं.

याचा अर्थ असा कीं, जेव्हा तुम्हीं सूडाचे ओझे खाली टाकतां, तेव्हा परमेश्वर ते उचलतो.

सूड उगण्याचा हा धूर्त मार्ग नाहीं. तर  सूड घेणें ज्याच्याकडे आहे त्याला सूड घेण्यासाठीं वाट देणें. सूड घेणें मजकडे आहे, असे प्रभू म्हणतो. तू ते ओझे खाली टाक, मी ते उचलीन. मी परतफेड करीन व तुला न्याय मिळेल. किती अद्भुत सुटका. मला हे ओझे उचलण्याची गरज नाहीं. हे सत्य सुटकेचा नि:श्वास सोडण्यासारखे आहे, कदाचित आयुष्यांत पहिल्यांदाच, आणि असे वाटते कीं आता तुम्हीं आपल्या वैर्‍यांवर फक्त प्रीति करण्यास मोकळे आहात.