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9 नवम्बर : पहाड़ों को हिलाने वाला विश्वास

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9 नवम्बर : पहाड़ों को हिलाने वाला विश्वास
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“यीशु ने उस को उत्तर दिया, ‘परमेश्‍वर पर विश्‍वास रखो। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई इस पहाड़ से कहे, “तू उखड़ जा, और समुद्र में जा पड़,” और अपने मन में सन्देह न करे, वरन् प्रतीति करे कि जो कहता हूँ वह हो जाएगा, तो उसके लिए वही होगा। इसलिए मैं तुम से कहता हूँ कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिए हो जाएगा।’” मरकुस 11:22-24

जब हम अपने बाइबल पढ़ते हैं, तो हमें कुछ पद ऐसे मिलते हैं जो सीधे और आसानी से समझ में आ जाते हैं। लेकिन दूसरी ओर, कुछ पद ऐसे भी होते हैं जिनके अर्थ को समझना हमारे लिए कठिन होता है।

यीशु कहता है, “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिए हो जाएगा।” हम अक्सर इस तरह के वचनों को नजरअंदाज करने या फिर इन्हें सैकड़ों शर्तों और व्याख्याओं में लपेटने के लिए प्रलोभित होते हैं। ऐसे पदों का गलत उपयोग हम में से कुछ को इतना डरा चुका है कि हम उनमें छिपे हुए प्रोत्साहन और चुनौती पर ध्यान ही नहीं देते।

इस साहसी आज्ञा में यीशु ने अपने अनुयायियों को याद दिलाया कि वे परमेश्वर पर भरोसा करें, क्योंकि वास्तव में विश्वास का महत्व इसी में है कि वह परमेश्वर में स्थापित हो। हमें न तो अपने विश्वास पर, और न ही अपने आप पर भरोसा करना चाहिए—हमें तो केवल परमेश्वर पर ही विश्वास होना चाहिए।

यीशु द्वारा प्रयुक्त रूपक—एक पहाड़ को समुद्र में फेंकने का आदेश देना—शायद शिष्यों के लिए परिचित था; यह रब्बियों द्वारा दिया जाने वाला एक सामान्य रूपक था, जिसका अर्थ ऐसे किसी काम को पूरा करना था, जो पहले असम्भव प्रतीत होता था।[1] शिष्य यीशु की बातों को इस प्रकार से नहीं समझे थे कि वह सचमुच उन्हें जैतून पहाड़ को मृत सागर में फेंकने का आदेश दे रहा है, जो उनसे 4,000 फीट नीचे था। वे यीशु के शब्दों को एक पारम्परिक कथन के रूप में समझे थे, जो यह दर्शाता था कि परमेश्वर अपने बच्चों के लिए असाधारण काम करना चाहता है।

हम प्रेरितों के काम की पुस्तक में विश्वास और प्रार्थना पर यीशु की शिक्षा के इस सत्य को जीवन्त रूप में देखते हैं। जब एक लंगड़ा भिखारी पतरस और यूहन्ना से पैसे माँगता है, तो पतरस उससे कहता है कि वह उठकर चले (प्रेरितों 3:6)। शायद उस क्षण पतरस यीशु के वचनों को याद कर रहा था और सोच रहा था, “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो, तो प्रतीति कर लो।”

जब हमारा विश्वास परमेश्वर पर केन्द्रित होता है, तो हम एक साहसी और अद्वितीय विश्वास रख सकते हैं—ऐसा विश्वास जो परमेश्वर के साथ असम्भव को भी सम्भव मानता है। हम जानते हैं कि हम उस परमेश्वर से बात कर रहे हैं जो हमारी सोच और कल्पना से भी कहीं अधिक कार्य करने में सक्षम है (इफिसियों 3:20-21)। यीशु हमसे यही कहते हैं कि मैं चाहता हूँ कि तुम इस तरह प्रार्थना करो, मानो तुम सचमुच एक ऐसे परमेश्वर पर विश्वास करते हो जो न तो कभी गलती करता है, न ही निर्दयी होता है, और न ही इस सृष्टि की शक्तियाँ उसे पराजित कर सकती हैं।

इन वचनों को सैकड़ों शर्तों में मत उलझाएँ। बस उन्हें वहीं रहने दें और उन पर मनन करें। इस सच्चाई का आनन्द लें कि परमेश्वर वह कर सकता है जो आपकी कल्पना से भी परे है। इस वास्तविकता में विश्राम करें कि उसके लिए कोई भी काम असम्भव नहीं है। और फिर . . . प्रार्थना करें!

  इफिसियों 3:14-21

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 6– 8; 2 तीमुथियुस 3


[1] एल्फ्रेड एदेरशेईम, द लाईफ ऐण्ड टाईम्स ऑफ जीज़स द मसायाह (लौंगमैंस, ग्रीन, ऐण्ड कं., 1898), खण्ड. 2, पृ. 376 (पाद टिप्पणी).

9 November : इतिहासाच्या शेवटाविषयी आश्‍चर्यपात्र  होणें.

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9 November : इतिहासाच्या शेवटाविषयी आश्‍चर्यपात्र  होणें.
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संकट सोसणाऱ्या तुम्हांला आमच्याबरोबर विश्रांती देणें, हे देवाच्या दृष्टीनें न्याय्य आहे… म्हणून प्रभू येशू प्रकट होण्याच्या समयी ते होईल; तो आपल्या सामर्थ्यवान दूतांसह स्वर्गातून अग्निज्वालेंसहित प्रकट होईल. तेव्हा जे देवाला ओळखत नाहींत व आपल्या प्रभू येशू ख्रिस्ताची सुवार्ता मानत नाहींत त्यांचा तो सूड उगवील. आपल्या पवित्र जनांच्या ठायीं गौरव मिळावा म्हणून, आणि त्या दिवशी विश्वास ठेवणार्‍या सर्वांच्या ठायीं आश्‍चर्यपात्र व्हावे म्हणून तो येईल, कारण आम्हीं दिलेल्या साक्षीवर तुम्हीं विश्वास ठेवला आहे. तेव्हा त्यांना प्रभूच्या समोरून व त्याच्या सामर्थ्याच्या गौरवापासून दूर करण्यात येऊन युगानुयुगाचा नाश ही शिक्षा त्यांना मिळेल (2 थेस्सल 1:7-10).

प्रभू येशूनें अभिवचन दिल्याप्रमाणें जेव्हां तो या जगांत परत येईल, त्यावेळी ज्यांनी सुवार्तेवर विश्वास ठेवला नाहीं त्यांच्याविषयी पौल म्हणतो, “त्यांना प्रभूच्या समोरून व त्याच्या सामर्थ्याच्या गौरवापासून दूर करण्यात येऊन युगानुयुगाचा नाश ही शिक्षा त्यांना मिळेल.” हे एक असें भयानक दृश्य असणार आहे कीं ज्यामुळें हे सत्य ऐकणाऱ्या सर्वांचा थरकांप उडायला पाहिजें.

आणि हो, आम्हीं जे विश्वास ठेवणारे आहों त्यां आम्हांला यांपासून किती सांत्वन मिळायला पाहिजें आणि कोणती गोष्ट पणास लागली आहे याविषयी आम्हांला किती गंभीर व्हावयाला पाहिजें. आह, जे सुवार्तेवर विश्वास ठेवीत नाहींत आणि सुवार्ता ज्यांच्या कानीही पडत नाहीं अशा लोकांविषयी आपली अंतःकरणें किती कळवळ्याने भरून गेलीं पाहिजेंत.

पण आमच्या सर्व संकटांत आम्हीं धीर धरावा म्हणून येथे पौल आम्हांला उत्तेजन आणि आशेचे दोन शब्द देतो. “संकट सोसणाऱ्या तुम्हांला आमच्याबरोबर विश्रांती देणें, हे देवाच्या दृष्टीनें न्याय्य आहे.” जर आपल्याला इतिहासाच्या शेवटाजवळ दुःखाची भयानक तीव्रता अनुभवास येत असेल, तर परमेश्वराचे वचन हे आहे: खंबीर असां: तारण जवळ आहे. तुमची संकटे शेवट हा नाहीं. आणि बाह्यरूपाने सामर्थ्यवान दिसणारे तुमचें शत्रू त्या दिवसावर पश्चाताप करून आक्रांत करतील ज्या दिवशी त्यांनी प्रभूच्या लोकांस स्पर्श केला होता.

पण मग उत्तेजन आणि आशेचा उत्तम शब्द येतो. प्रभू आल्यावर आपल्याला केवळ विश्रांती देणार नाहीं, तर आपल्याला सर्वप्रथम ज्यासाठीं उत्पन्न करण्यात आलें आहे, त्याचा सर्वात मोठा अनुभवहि आम्हांस प्राप्त होईल. आपण त्याचे गौरव पाहूं, आणि आपल्यामध्यें त्याचा गौरव होईल यासाठीं कीं सर्व जगानें ते पाहावें हे जाणून आपण आश्चर्यपात्र होऊं.

वचन 10: “आपल्याला पवित्र जनांच्या ठायीं गौरव मिळावा म्हणून, आणि त्या दिवशी विश्वास ठेवणाऱ्या सर्वांच्या ठायीं आश्चर्यपात्र व्हावें म्हणून तो येईल,” आपण आश्चर्यपात्र व्हावें यासाठींच आपल्याला घडविण्यात आलें होते. ज्याला वधस्तंभावर खिळण्यांत आले, जो मरणातून पुन्हां उठला, व जो परत येणार आहे असा जो गौरवी राजा, येशू ख्रिस्त ह्याच्यापेक्षा अधिक अद्भुत कांहींही नाहीं आणि कोणीही नाहीं. तो त्याचे गौरव प्राप्त करील, आणि आम्हांला परिपूर्ण, पापरहित, असें होण्याच्या आनंदाची प्राप्ती होईल व आपण सर्वात अद्भुत अशा गोष्टीचे आश्चर्यपात्र होऊं जिचा कधीच शेवट होणार नाहीं.

8 नवम्बर : प्रलोभन के विरुद्ध युद्ध

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8 नवम्बर : प्रलोभन के विरुद्ध युद्ध
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“तब तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के अधीन नहीं वरन् अनुग्रह के अधीन हो।” रोमियों 6:14

इस जीवन में हम कभी भी प्रलोभन से मुक्त नहीं होंगे। वास्तव में, जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमें यह एहसास होता है कि वही पुराने प्रलोभन—अक्सर नए रूप में—हमारे पीछे लगे रहते हैं, हमें उलझाने का और हमें गिराने का प्रयास करते रहते हैं। और यदि इतना ही पर्याप्त नहीं था, तो इनके साथ कई नए प्रलोभन भी आ जाते हैं!

हाँ, प्रलोभन एक वास्तविकता है, और इससे बचा नहीं जा सकता। लेकिन ऐसा क्यों होता है?

पहला कारण यह है कि वही अनुग्रह जो हमें परमेश्वर से मेल-मिलाप कराता है, हमें शैतान के विरोध में भी खड़ा कर देता है। पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि जब तक हमने मसीह में विश्वास नहीं किया था, तब तक शैतान हमें अपना मित्र होने का भ्रम देता रहा था। लेकिन जब परमेश्वर के अनुग्रह ने हमें परमेश्वर का मित्र बना दिया, तब उसने हमें परमेश्वर के पुरातन शत्रु का भी शत्रु बना दिया। यद्यपि शैतान परमेश्वर को उसके लोगों का उद्धार करने से रोक नहीं सकता, तौभी हमारा उद्धार होने के बाद वह अपनी पूरी शक्ति—अर्थात् प्रलोभन—हम पर डाल सकता है ताकि हमें गिराए।

दूसरी बात यह है कि जब हम नया जन्म प्राप्त कर लेते हैं, तब पाप हम पर शासन नहीं करता, लेकिन यह फिर भी हमारे प्राणों से युद्ध करता रहता है—और प्रलोभन उसका सबसे बड़ा हथियार है। हमें संसार से प्रलोभन मिलता है और सांसारिक वस्तुओं के बारे में हमसे कहता है, यदि तुम इसे प्राप्त कर लो, तो तुम सच में सुखी और आनन्दित हो जाओगे।” हमें अपने शरीर से भी प्रलोभन मिलता है। हमारा पुराना पापमय स्वभाव—जो इस वर्तमान जीवन में मसीह में विश्वास करने के बाद भी हमारे अन्दर रहता है—हमारे नए जीवन के विरुद्ध एक कठोर युद्ध लड़ता रहता है।

फिर भी, शैतान का प्रलोभन चाहे जितना भी प्रबल हो—और यह सचमुच प्रबल है—इसमें स्वयं हमें प्रलोभन में गिराने की शक्ति नहीं है। शैतान हमें संसार की चीज़ें दिखा सकता है, लेकिन वह हमें पाप करने के लिए विवश नहीं कर सकता।

इसलिए उन प्रलोभनों से भयभीत या निष्क्रिय मत बनें, जिनका आप सामना कर रहे हैं। अपने प्रलोभनों के विरुद्ध युद्ध में आपको यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आप जीतेंगे या हारेंगे। परमेश्वर ने पहले ही विजय घोषित कर दी है, जैसा कि यूहन्ना लिखता है: “जो तुम में है, वह उस से जो संसार में है, बड़ा है” (1 यूहन्ना 4:4)। युद्ध समाप्त हो चुका है और विजय सुनिश्चित हो चुकी है। संघर्ष अभी भी जारी रह सकते हैं, लेकिन वे युद्ध के अन्तिम परिणाम को बदल नहीं सकते।

आप इस समय किन प्रलोभनों से संघर्ष कर रहे हैं या उनके आगे झुक गए हैं? एक पल लेकर उन्हें नाम से पहचानें। फिर इस सत्य में सान्त्वना प्राप्त करें: वे प्रलोभन जितने भी शक्तिशाली हों, शैतान एक पराजित शत्रु है, और यीशु मसीह विजयी होकर राज्य करता है! आप में निवास करने वाली उसकी शक्ति आपको प्रलोभनों से लड़ने में समर्थ बनाती है, और उसकी मृत्यु आपके लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर आपको क्षमा करे!

रोमियों 6:1-14

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 3–5; 2 तीमुथियुस 2 ◊

8 November : ज्या गोष्टीचा आम्हीं आनंद घेतो, तिचा आम्हीं आदरहि करतो

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8 November : ज्या गोष्टीचा आम्हीं आनंद घेतो, तिचा आम्हीं आदरहि करतो
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“तू शब्बाथाची पायमल्ली करणार नाहींस, माझ्या पवित्र दिवशी आपला उद्योगधंदा करणार नाहींस, शब्बाथ आनंददिन आहे, परमेश्वराचा पवित्र व सन्मान्य दिन आहे असें म्हणून त्याचा आदर करशील; व त्या दिवशी आपलें कामकाज करणार नाहींस, आपला धंदा चालवणार नाहींस, वायफळ गोष्टी बोलत बसणार नाहींस. तर तू परमेश्वराच्या ठायीं हर्ष पावशील; तू देशाच्या उच्च स्थलांचे जयोत्साहाने आक्रमण करशील, असें मी करीन” (यशया 58:13)

देवाचे गौरव न करता देवाचा शोध घेणें शक्य आहे. जर तुम्हांला असें वाटते कीं तुम्हीं देवाचा जो शोध घेतां त्यांत त्याचे गौरव व्हावें, तर मग तुम्हीं त्याचा शोध घ्यावा तो तुम्हांला त्याच्या सहभागितेचा आनंद मिळावा म्हणून घ्या.

याचे उदाहरण म्हणून शब्बाथावर विचार करा. देवाचे लोक देवाचा पवित्र दिवस न पाळतां आपल्याच सुखविलासाचा शोध घेऊं पाहतांत म्हणून तो त्यांची कानउघाडणी करतो. “तू शब्बाथाची पायमल्ली करणार नाहींस. माझ्या पवित्र दिवशी आपला उद्योगधंदा करणार नाहींस.” पण त्याच्या बोलण्याचा अर्थ काय? प्रभूच्या दिवशी आपण आपल्या आनंदविलासात मग्न होऊ नये हा त्याचा अर्थ आहे का? नाहीं, कारण पुढे तो म्हणतो, “शब्बाथ आनंददिन आहे.” आणि 14 व्या वचनात तो म्हणतो, “तू त्याचा आदर करशील.” म्हणून तो त्यांना ज्या गोष्टीसाठीं दोष लावतोय ती ही कीं ते शब्बाथ दिवशी आपल्यां परमेश्वराच्या वैभवाठायीं आणि विश्रांतीठायीं आणि पावित्र्याठायीं, ज्याचा तो दिवस द्योतक आहे, हर्ष करण्याऐवजी स्वतःच्या कामकाजात रममाण होत आहेत.

ते पूर्णानंदाचा शोध घेतांत या गोष्टीसाठीं तो त्यांची कान-उघाडणी करित नाहींये. तर तें किती वायफळ गोष्टींत त्याचा शोध घेताहेत या साठीं तो त्यांची कानउघाडणी करत आहे. सी. एस. लुईस यांनी म्हटल्याप्रमाणें, “आम्हीं अगदी क्षुल्लक गोष्टींत आनंदी होतो.” त्यांनी आपला आनंद व समाधान यांचा शोध जगीक गोष्टींमध्यें घेऊ पाहिला आहे, आणि त्यामुळे त्यांनी त्यां गोष्टींचा परमेश्वरापेक्षा अधिक आदर केला आहे.

लक्ष द्या कीं शब्बाथाला “आनंद दिन” म्हणणें हे प्रभूच्या पवित्र दिवसाला “सन्मान्य दिन” म्हणण्यासारखे आहे. जर तू “शब्बाथ आनंददिन आहे, परमेश्वराचा पवित्र व सन्मान्य दिन आहे असें म्हणून त्याचा आदर करशील.” याचा अर्थ असा आहे कीं तुम्हांला ज्या गोष्टीमध्यें आनंद वाटतो तुम्हीं त्यां गोष्टींचा आदर करता. किंवा तुम्हांला ज्या गोष्टीमध्यें आनंद वाटतो त्यांचा तुम्हीं गौरव करता.

परमेश्वरामध्यें आनंद घेणें आणि परमेश्वराचा गौरव करणें ह्यां दोन्ही गोष्टीं एकच आहेत. त्याचा सनातन सत्संकल्प आणि आपला सनातन आनंद उपासनेच्या अनुभवात एक होतो. परमेश्वराचा दिवस यासाठींच आहे. खरोखर, संपूर्ण जीवनाचा उद्देश्य हाच आहे.

7 नवम्बर : पवित्र नगर

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7 नवम्बर : पवित्र नगर
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“फिर मैंने पवित्र नगर नए यरूशलेम को स्वर्ग से परमेश्‍वर के पास से उतरते देखा।” प्रकाशितवाक्य 21:2

यीशु के रूप में परमेश्वर स्वर्ग से नीचे आया और हम तक पहुँचा—और अन्त में, जब सब कुछ पूरा हो जाएगा, तो पवित्र नगर, नया यरूशलेम भी स्वर्ग से परमेश्वर के पास से उतर आएगा।

परमेश्वर एक नए यरूशलेम का निर्माण कर रहा है, जिसमें सभी युगों और सभी स्थानों के विश्वासी होंगे—आपके और मेरे जैसे लोग। हम उस नगर में वास करेंगे, जहाँ हम पूर्ण सामंजस्य में एक साथ रहेंगे; परमेश्वर का मुख हमारे सामने होगा, और हम उसकी पहचान के साथ चिह्नित होंगे (प्रकाशितवाक्य 22:4)। यह समुदाय इतनी विशाल और गौरवशाली भीड़ से बना होगा कि कोई इसे गिन नहीं सकता, क्योंकि इसमें हर जाति, हर जनजाति, हर राष्ट्र और हर भाषा के लोग शामिल होंगे (7:9)।

इस विशाल भीड़ का वर्णन प्रेरित यूहन्ना के समय में कलीसिया के लिए आशा और उत्साह का स्रोत था, और यह हमारे लिए भी ऐसा ही होना चाहिए। आरम्भिक कलीसिया संख्या में बहुत छोटी थी—मानवीय दृष्टि से बिल्कुल नगण्य, जैसा कि यह इतिहास के कई कालखण्डों में रही है। लेकिन यूहन्ना हमें बताता है कि वास्तव में कलीसिया कहीं अधिक विशाल, विस्तृत और महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके सदस्य नए यरूशलेम के नागरिक हैं, जो तीर्थ-यात्रियों की भाँति आगे बढ़ते जा रहे हैं, जब तक कि वे उसके स्वर्णिम मार्गों पर खड़े न हो जाएँ।

एक दिन, उस नगर में, असंख्य विश्वासियों की भीड़ परमेश्वर की आराधना करेगी, और हम अब्राहम से किए गए परमेश्वर के अन्तिम वचन की पूर्ति देखेंगे: “उसने उसको बाहर ले जा के कहा, ‘आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है? . . . तेरा वंश ऐसा ही होगा।’” (उत्पत्ति 15:5)

इस समय, यह सृष्टि विभाजन और अशान्ति से भरी हुई है। हम भाषा, राष्ट्रीयता और संस्कृति से बँटे हुए हैं—प्राचीन शत्रुता और आधुनिक सन्देहों से अलग-थलग हैं। लेकिन एक दिन, यह सब उलट दिया जाएगा। परमेश्वर एक नया समुदाय बना रहा है—एक बहु-जातीय, बहु-सांस्कृतिक नगर जो उसके राज्य और शासन के अधीन होगा। जब अन्ततः हम सब एक साथ लाए जाएँगे, जब स्वर्ग पृथ्वी पर आ जाएगा और मसीह के लोग जीवित होकर उसमें वास करेंगे, तब हम प्रभु यीशु मसीह के सुसमाचार के द्वारा एकसाथ जोड़े जाएँगे, क्योंकि यह सुसमाचार सब जातियों के लिए है।

क्या आप उस दिन की कल्पना कर सकते हैं? पूरी तरह से नहीं—परन्तु हाँ, इतने पर्याप्त रूप से कि यह आपको इस जीवन की परीक्षाओं और दबावों से आगे बढ़ने के लिए और उन सभी चीज़ों को त्यागने के लिए प्रेरित करे जो आपको पीछे खींचती हैं (इब्रानियों 12:1-2)। यह संसार आपका घर नहीं है; लेकिन एक दिन स्वर्गिक नगर नीचे आएगा, और वह आपका घर होगा। एक दिन, आप वही देखेंगे जो यूहन्ना ने अपने दर्शन में देखा था—और आप घर पहुँच चुके होंगे।

प्रकाशितवाक्य 22

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: एज्रा 1–2; 2 तीमुथियुस 1

7 November : देवाची प्रीति सशर्त आहे का?

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7 November : देवाची प्रीति सशर्त आहे का?
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“तो अधिक ‘कृपा करतो;’ म्हणून शास्त्र म्हणते, “देव गर्विष्ठांना विरोध करतो, आणि लीनांवर कृपा करतो.” म्हणून देवाच्या अधीन व्हा; आणि सैतानाला अडवा, म्हणजें तो तुमच्यांपासून पळून जाईल. देवाजवळ या म्हणजें तो तुमच्यांजवळ येईल.” (यशया 58:13)

याकोब येथें आम्हास शिकवतो कीं असा एक गोड किंवा मौल्यवान अनुभव आहे ज्याला “अधिक कृपा” पावणें आणि देवाचे “आमच्याजवळ येणें” असें म्हटलें जाते. नक्कीच हा एक अद्भुत अनुभव आहे – अधिक कृपा आणि देवाची विशेष अशी जवळीक. पण मी विचारतो : परमेश्वराच्या प्रीतिचा हा अनुभव बिनशर्त आहे का? नाहीं. असें नाहीं. आमचे स्वतःला लीन करणें आणि देवाजवळ येणें या दृष्टीने प्रीतिचा हा अनुभव सशर्त आहे. परमेश्वर “लीनांवर कृपा करतो… देवाजवळ या म्हणजें तो तुमच्यांजवळ येईल.”

देवाच्या प्रीतिचे अनमोल असें अनुभव आहेत ज्यांच्या प्राप्तीसाठीं आपणास गर्वाशी लढा देण्याची, लीन होण्याची आणि पूर्ण मनाने देवाच्या जवळ येण्याची गरज आहे. ह्यां अटी आहेत. म्हणजें, अशा अटी ज्यां पूर्ण व्हाव्यांत अशी कृति स्वतः देवच आमच्यामध्ये साधून देतो. पण तरी त्यां अशा अटी आहेंत ज्या आमच्यांत पूर्ण होतांत.

जर हे खरे असेल, तर माझ्या चिंतेचे प्रमुख कारण म्हणजें हे कीं देवाची प्रीति ही पूर्णपणें बिनशर्त आहे याविषयीची अशास्त्रीय आणि पवित्र शास्त्राच्या दृष्टीनें गाफील अशी आश्वासनें लोकांना त्या सर्व गोष्टी करण्यापासून थांबवू शकतांत ज्यां करण्यांस पवित्र शास्त्र त्यांना आज्ञा देते ज्यां पूर्ण केल्यानें त्यांना त्यां सर्व शांतीचा आनंद प्राप्त होतो जो प्राप्त करण्याची त्यांना तळमळ असते. आपण जर लोकांना “अटीविरहित” शांतीचे आश्वासन देण्याचा प्रयत्न करतो, तर आपण कदाचित त्यांना त्यां निरोगी आध्यात्मिक जीवनापासूनच दूर करून बसणार ज्याच उल्लेख पवित्र शास्त्रांत केलेला आहे.

निश्चितच, देवानें आपली प्रीतिने केलेली निवड, आणि ख्रिस्ताच्या मरणाद्वारे देवाची प्रकट झालेली प्रीति आणि त्याच प्रीतिने त्यानें आपल्याला दिलेला नवा जन्म, या सर्व गोष्टीं पूर्णपणें बिनशर्त आहेत या सत्याची आपण उच्च आणि अगदी स्पष्ट स्वरात घोषणा केली पाहिजें, यांत शंका नाहीं.

शिवाय, आपण अथकपणें या सुवार्तेची घोषणा केलीं पाहिजें कीं आमचे नीतिमान ठरविले जाणें हे ख्रिस्ताचे आज्ञापालन आणि त्यानें स्वतःचे केलेलें अर्पण यांवर आधारित आहे, आपल्या कर्मावर नाहीं (रोम 5:19, “कारण जसे त्या एकाच मनुष्याच्या आज्ञाभंगानें पुष्कळ जण पापी ठरलें होते, तसे ह्या एकाच मनुष्याच्या आज्ञापालनानें पुष्कळ जण नीतिमान ठरतील.”)

परंतु त्यांच बरोबर, आपण पवित्रशास्त्राच्या या सत्याची घोषणाहि करणें आवश्यक आहे कीं जो कोणी स्वतःला आपल्या दैनदिन जीवनांत लीन करतो आणि देवाजवळ येतो, त्याला देवाची कृपा आणि देवाचा जवळीकपणा यांचा परिपूर्ण आणि मधुर अशा आनंदाचा अनुभव प्राप्त होईल.

6 नवम्बर : आश्वासन की खोज

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6 नवम्बर : आश्वासन की खोज
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“एक मनुष्य यीशु के पास आया और उससे कहा, ‘हे गुरु, मैं कौन सा भला काम करूँ कि अनन्त जीवन पाऊँ?’ … यीशु ने उससे कहा, ‘यदि तू सिद्ध होना चाहता है तो जा, अपना माल बेचकर कंगालों को दे, और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा; और आकर मेरे पीछे हो ले।’ परन्तु वह जवान यह बात सुन उदास होकर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।” मत्ती 19:16, 21-22

धार्मिक नियमों और विधानों का पालन करके स्वर्ग में प्रवेश पाने का प्रयास न तो मन को शान्ति देता है, न सुरक्षा की भावना उत्पन्न करता है, और न ही हमें पापों की क्षमा का आश्वासन देता है। और न ही यह हमें अनन्त जीवन दिलाता है।

इसी क्षमा के आश्वासन की कमी ने एक युवा शासक को यीशु के पास जाने और साहसपूर्वक यह प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया। वह धनी था; लूका हमें यह भी बताता है कि वह एक प्रधान था—शक्तिशाली और प्रभावशाली (लूका 18:18)—ऐसा व्यक्ति जिसे संसार आदर की दृष्टि से देखता है और धन्य मानता है। इसके अलावा, वह परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने के प्रति गम्भीर था (मत्ती 19:20)। हमें यह सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है, “यदि कोई अनन्त जीवन प्राप्त कर सकता है, तो निश्चय ही यह व्यक्ति कर सकता है।” इसलिए इस व्यक्ति को शायद यह उम्मीद थी कि यीशु उसकी धार्मिकता की सराहना करेगा और उसे स्वर्गिक प्रतिफल का आश्वासन देगा।

लेकिन यीशु ने कोमलता से उसे यह दिखाया कि वह परमेश्वर की व्यवस्था का पूर्णतः पालन नहीं कर रहा था। वास्तव में, इस युवक ने सबसे पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण आज्ञा को तोड़ा था: उसने अपने पूरे हृदय, आत्मा, शक्ति और बुद्धि से परमेश्वर से प्रेम करने के बजाय अपने धन को अधिक प्रिय माना था। यही कारण था कि जब यीशु ने उसे अपने धन को छोड़कर उनका अनुसरण करने के लिए कहा, तो वह दुखी होकर चला गया। यीशु ने इस व्यक्ति को दिखाया कि परमेश्वर की आज्ञाएँ कोई सीढ़ी नहीं हैं, जिन्हें चढ़कर हम परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि वे एक दर्पण हैं, जो हमारी वास्तविक आत्मिक स्थिति को प्रकट करती हैं।

इस धनी युवक की समस्या उसके हृदय की थी। यही हमारी भी समस्या है। बाइबल कहती है कि हम परमेश्वर से स्वाभाविक रूप से विमुख हैं और स्वयं को सही सम्बन्ध में लाने में असमर्थ हैं। हमने परमेश्वर से पूरे हृदय से प्रेम नहीं किया है, क्योंकि हमने उससे अधिक अन्य चीजों से प्रेम किया है।

परमेश्वर की आज्ञाओं को पूरी तरह मानने और उससे प्रेम करने में इस युवक की असमर्थता हमारी भी असमर्थता है। कोई भी मनुष्य न तो ऐसा कर पाया है, न कर सकता है, और न ही कभी कर पाएगा कि वह परमेश्वर से पूरी तरह से प्रेम करे और उसकी सभी आज्ञाओं का सिद्ध रूप में पालन करे—सिवाय स्वयं यीशु के। और यही हमारे लिए शुभ समाचार है! हमारा उद्धार हमारे कार्यों पर निर्भर नहीं है। बल्कि, शान्ति, सुरक्षा, क्षमा, और परमेश्वर के साथ सही सम्बन्ध हमें तब प्राप्त होता है, जब हम पूरी तरह उसकी दया पर निर्भर होते हैं—जब हम उद्धार के उसके मुफ्त उपहार को स्वीकार करते हैं और जब हम यीशु के क्रूस पर किए गए बलिदान को नम्रता और कृतज्ञता के साथ ग्रहण करते हैं।

उस धनी युवक को दुखी होकर यीशु के पास से चले जाने की आवश्यकता नहीं थी। वह अपने अहंकार और आत्मनिर्भरता को त्याग सकता था। अपनी धार्मिकता और सम्पत्ति को थामे रहने के कारण निरन्तर अशान्ति में रहने के बजाय वह यीशु को पहले स्थान पर रखने के आनन्द को अनुभव कर सकता था। आत्मनिर्भरता सदैव व्यर्थ सिद्ध होगी और जैसा उसके साथ हुआ था वैसे ही हमें भी चिन्ता और असुरक्षा में डाल देगी। लेकिन यदि हम बालकों के समान विश्वास और भरोसे के साथ अपने उद्धारकर्ता के पास जाएँ, तो हम सच्ची शान्ति और अनन्त जीवन का आश्वासन प्राप्त कर सकते हैं।

इसलिए अपने हृदय में यीशु को सिंहासन पर बैठाएँ और आप जो कुछ हैं तथा आपके पास जो कुछ है, उसे उसकी सेवा में अर्पित करने के लिए तैयार रहें। यीशु के पास खाली हाथ आएँ और उस आनन्द तथा जीवन को प्राप्त करें, जो केवल वही दे सकता है।

मत्ती 19:16-30

पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: सपन्याह; कुलुस्सियों 4 ◊

6 November : एकमेकांवर आनंदानें प्रीति करा

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6 November : एकमेकांवर आनंदानें प्रीति करा
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“हे मनुष्या, बरें काय ते त्यानें तुला दाखवलें आहे; नीतीनें वागणें, आवडीनें दया करणें व आपल्या देवासमागमें राहून नम्रपणें चालणें ह्यांवाचून परमेश्वर तुझ्याजवळ काय मागतो?” (मीखा 6:8)

एखाद्या व्यक्तीला असें सांगण्यात आल्यामुळें कीं जेव्हां त्याला आनंद प्राप्त होतो तेव्हा दुसऱ्या व्यक्तीस आनंदाची प्राप्ती होईल , म्हणून आपण प्रेमास पात्र नाहीं असें कोणालाही कधीही वाटलें नाहीं. आवडीनें दया करणें मला आनंद देतो या आधारावर दयाळूपणाचे समर्थन करत असतांना माझ्यावर कधीही स्वार्थीपणाचा आरोप करण्यात आलेला नाहीं. या उलट, कुरकुर न करता करण्यात आलेंली प्रीतिची कृत्ये अस्सल असतांत.

आणि नाखुशीनें दया करणें चा योग्य पर्याय तटस्थपणें किंवा कर्तव्यबुद्धीनें दया करणें नसून, तर आनंदानें दया करणें हा आहे. अस्सल प्रीतिनें भरलेलें परिपूर्ण अंतःकरण दयाळूपणामध्यें आनंद करते (मीखा 6:8); ते फक्त दया करत नाहीं. ख्रिस्ती पूर्णानंद हे सत्य विचारात घेण्यास भाग पाडते.

“आपण देवावर प्रीति करतो व त्याच्या आज्ञा पाळतो तेव्हां त्यावरून आपल्याला कळून येते कीं, आपण देवाच्या मुलांवर प्रीति करतो. देवावर प्रीति करणें म्हणजें त्याच्या आज्ञा पाळणें होय; आणि त्याच्या आज्ञा कठीण नाहींत. कारण जे कांहीं देवापासून जन्मलेलें आहे ते जगावर जय मिळवते; आणि ज्यानें जगावर जय मिळवला तो म्हणजें आपला विश्वास.” (1 योहान 5:2-4)

ही वाक्ये उलट् क्रमानें वाचा आणि तर्कावर लक्ष द्या. प्रथम, जेव्हां आपण देवापासून जन्मलेलें असतो, तेव्हां आपल्याला ह्या जगावर जय मिळविण्याचे सामर्थ्य प्राप्त होते. देवाच्या आज्ञा कठीण नाहींत या कथनासाठीं पार्श्वभूमी किंवा आधार म्हणून ही गोष्ट आपल्या निदर्शनास आणण्यांत आली आहे (“कारण” या शब्दावर लक्ष द्या).

तर मग, देवापासून जन्मलेलें असल्यामुळेच आम्हास असें सामर्थ्य प्राप्त होते ज्याद्वारें आपण जगाच्या तिरस्कारावर विजय मिळवितो आणि देवाची इच्छा पाळतो. यापुढे आपल्यासाठीं त्याच्या आज्ञा “कठीण” नाहींत, तर त्यां आपल्या अंतःकरणाचे मनोदय व आनंद आहेत. ही परमेश्वराची खरी प्रीति आहे : केवळ आपण त्याच्या आज्ञांचे पालन करतो असें नाहीं, तर आता त्या कठीणहि नाहींत.

मग दुसऱ्या वचनांत असें सांगितलें आहे कीं देवाच्या मुलांवर आपण जी प्रीति करतो तिच्या खरेपणाचा पुरावा म्हणजें देवावर प्रीति करणें हा आहे. देवाच्या मुलांवर प्रीतिविषयी हे आपल्याला काय शिकवते?

ज्याअर्थी देवावर प्रीति हे कठीण काम जाणवत नसून आनंदानें त्याची इच्छा पूर्ण करणें आहे, आणि देवावर प्रीति ही देवाच्या मुलांवरील आमच्या प्रीतिचे मोजमाप आहे, त्याअर्थी देवाच्या मुलांवरील आपली प्रीति ही देखील नाखुशीनें नव्हे तर आनंदानें केली गेलेली असलीं पाहिजे.

ख्रिस्ती पूर्णानंद म्हणजें प्रामाणिकपणें केलेल्या प्रीतिची सेवा, कारण तो पूर्णानंद आम्हास नाखुशीनें आज्ञापालन करण्यांस नाहीं, तर आनंदानें आज्ञापालन करण्यास आवरून धरतो.

5 नवम्बर : इतिहास का रहस्य

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5 नवम्बर : इतिहास का रहस्य
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“उसकी पड़ोसिनों ने यह कहकर, ‘नाओमी के एक बेटा उत्पन्न हुआ है,’ लड़के का नाम ओबेद रखा। यिशै का पिता और दाऊद का दादा वही हुआ।” रूत 4:17

इतिहास महत्त्वपूर्ण है। आपका इतिहास महत्त्वपूर्ण है।

आप आज जो भी हैं, उसमें एक बड़ा योगदान आपके माता-पिता, आपके दादा-दादी, और उनके पूर्वजों का है। अनिवार्य रूप से, हम सभी अपने वंश के उत्पाद हैं—और इस कारण से, हम परमेश्वर की पूर्व-निर्धारित योजना का जीवन्त प्रमाण हैं, जिसने हमें इस समय और इस स्थान तक पहुँचाया है।

जब रूत ने ओबेद को जन्म दिया, जो नाओमी का पोता था, तो वह यह नहीं जान सकती थी कि आगे क्या होने वाला है। लेकिन इस घटनाक्रम का लेखक हमें बताता है कि ओबेद आगे चलकर महान राजा दाऊद का दादा बनेगा—और इस प्रकार, वह यीशु मसीह के पूर्वजों में से एक होगा। लेकिन परमेश्वर यह सब पहले से जानता था। यहाँ हम परमेश्वर की उद्धारकारी योजना को कार्य करते हुए देखते हैं। रूत और उसका परिवार अन्धी शक्तियों के नियन्त्रण में नहीं थे और न ही भाग्य की लहरों से उछाले जा रहे थे। ओबेद का जन्म परमेश्वर की देखभाल, सम्प्रभुता और प्रावधान की एक और याद दिलाता है—कि वह हमारे निर्णयों, जीवन के उतार-चढ़ाव और परिस्थितियों के पीछे कार्यरत रहता है और अपनी योजनाओं को पूरा करता रहता है।

यही सम्पूर्ण इतिहास का रहस्य है: परमेश्वर ने हमारे अतीत के सभी तत्वों को, चाहे वे कितने भी अलग-अलग क्यों न हों, इस तरह जोड़ दिया है कि वे हमें आज यहाँ तक ले आए हैं। इससे पहले कि हमारे नन्हे दिल यह समझ पाते कि क्या हो रहा है, परमेश्वर कृपा और दया के साथ हमारी देखभाल कर रहा था—उन माताओं के रूप में जो हमें भोजन देती थीं, उन पारिवारिक मित्रों के रूप में जो हमारी देखभाल करते थे, या उन दादा-दादी के रूप में जो हमारे पास आते थे।

आपके गर्भाधान के समय से ही परमेश्वर ने आपको सुरक्षित रखा है और आपका मार्गदर्शन किया है, यहाँ तक कि आपके सबसे अन्धकारमय दिनों में भी वह आपके साथ रहा है। आप और मैं केवल परमाणुओं का एक संयोग मात्र नहीं हैं। हम परमेश्वर की दिव्य सृष्टि हैं, और वह हमारी देखभाल कर रहा है। न केवल वह हमारी रक्षा करता है, बल्कि उसने हमें उद्धार भी दिया है। सृष्टि के आरम्भ से ही परमेश्वर ने व्यक्तियों और परिवारों के माध्यम से कार्य किया है, ताकि वह अपनी विशेष निज प्रजा को संजो सके। उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक, हमें परमेश्वर की इस उद्धारकारी और अनन्त योजना की झलक मिलती है। मोआबिन रूत का इस चुनी हुई प्रजा में शामिल किया जाना, परमेश्वर की सम्प्रभु और व्यापक दया को प्रमाणित करता है। उसने रूत और बोअज़ के इस अनपेक्षित विवाह को उपयोग करके एक ऐसा वंश तैयार किया, जिससे राजा दाऊद और अन्ततः मसीह का जन्म हुआ।

रूत जैसे उदाहरण से हमारा विश्वास इस बात में दृढ़ होना चाहिए कि परमेश्वर क्या-क्या कर सकता है। ऐसे उदाहरण से हमें साहस मिलना चाहिए कि हम अपने मित्रों और पड़ोसियों से कहें कि हमारे राष्ट्र में घटित होने वाले महिमामय काम और त्रासदियाँ, हमारे जीवन की खुशियाँ और दुख, और पारिवारिक जीवन के दुख-दर्द और निराशाएँ—इन सबका अन्तिम अर्थ मानव इतिहास या व्यक्तिगत जीवनकथा में नहीं, बल्कि परमेश्वर की योजना में पाया जाता है। उसने स्वयं को प्रेममय और पवित्र, व्यक्तिगत और अनन्त, सृष्टिकर्ता और उद्धारकर्ता, पालक और शासक के रूप में प्रकट किया है। उसने हमें मुक्ति की उस महान कथा में सम्मिलित किया है—एकमात्र ऐसी कथा जो अनन्तकाल तक बनी रहेगी।

यह एक शुभ समाचार है! जब दिन अन्धकारमय होते हैं और सन्देह वास्तविक लगते हैं, तब यह हमारे आत्मा के लिए भोजन बनता है। यह हमें यह आश्वासन देता है कि परमेश्वर हमें कभी नहीं छोड़ेगा। यह हमारे जीवन को सार्थक बनाता है।

मत्ती 1:1-18

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: हबक्कूक; कुलुस्सियों 3

5 November : तुम्हीं तुमच्यां तारणाकडे दुर्लक्ष करतां का?

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5 November : तुम्हीं तुमच्यां तारणाकडे दुर्लक्ष करतां का?
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“तर आपण एवढ्या मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष केल्यास आपला कसा निभाव लागेल?” (इब्री 2:3)

तुमचे तारण किती मोठे आहे ह्याची जाणीव तुम्हांला आहे का? कीं तुम्हीं त्याकडे दुर्लक्ष करतां?

तुम्हीं तुमच्यां ह्या मोठ्या तारणाकडे कसे पाहतां? कीं तुम्हीं त्याच्याशी तुमची अंतिम इच्छा आणि मृत्युपत्र, किंवा तुमच्यां कारचा अधिकार किंवा तुमच्यां घराचे विक्रीपत्र यांशी व्यवहार करावा तसे वागता? तुम्हीं त्यावर एकदा स्वाक्षरी केली आणि ते आता कुठेतरी फाईलच्या एका कपाटात आहे, पण तुमच्यां दृष्टीनें ती खरें पाहतां इतकी पण मोठी गोष्ट नाहीं. तुम्हीं त्या विषयीं क्वचितच विचार करता. रोज पडावा तसा त्याचा तुमच्यांवर काहीं फरक पडत नाहीं. मुळांत तुम्हीं त्याकडे दुर्लक्ष करता.

पण जेव्हां तुम्हीं तुमच्यां अशा मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष करता तेव्हां तुम्हीं खरोखर कशाकडे दुर्लक्ष करत असतां? “तुमच्यां मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष करूं नका!“ असें जेव्हां तो म्हणतो तेव्हां त्याला हेंच म्हणायचे आहे.

  • देवानें तुमच्यांवर प्रीति केलीं याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • सर्वशक्तिमान परमेश्वरानें तुम्हांला तुमच्यां पापांची क्षमा प्राप्त केलीं आणि तुम्हांला आपलें केलें आणि सुरक्षित केलें आणि तुम्हांला बळ दिलें व तो तुमचे मार्गदर्शनहि करित आहे याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • वधस्तंभावर ख्रिस्तानें त्याचे जीवन अर्पण केलें याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • विश्वासाद्वारें गणिले गेलेले जे नीतिमत्व त्याच्या विनामूल्य देणगीकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • देवाचा कोप तुमच्यांपासून दूर करण्यांत आला आणि देवाबरोबर तुमचा सुखद समेट करण्यांत आला त्याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • तुमच्यांत पवित्र आत्म्याचा निवास आणि जिवंत ख्रिस्ताची सहभागिता व तसेच त्याशी तुमचे सौख्य याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • येशू ख्रिस्ताच्या मुखावर प्रकट झालेल्या देवाच्या गौरवाचे तेज व त्याच्या तत्त्वाचे प्रतिरूप याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • कृपेच्या सिंहासनासमोर तुम्हांला जो विनामूल्य प्रवेंश दिला गेला आहे याकडे दुर्लक्ष करूं नका.
  • परमेश्वराच्या अभिवचनाच्या अफाट खजिन्याकडे दुर्लक्ष करूं नका.

हे खरोखर मोठे तारण आहे. त्याकडे दुर्लक्ष करणें म्हणजें अति दुष्टपणाच. इतक्या मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष करूं नका. कारण जर तुम्हीं दुर्लक्ष्य केलें तर न्यायाच्या दिवशी तुमचा कसा निभाव लागेल? लेखक हांच प्रश्न विचारत आहे: “एवढ्या मोठ्या तारणाकडे दुर्लक्ष केल्यास आपला कसा निभाव लागेल?”

म्हणून, ख्रिस्ती असणें ही एक अतिशय गंभीर बाब आहे – ही सामान्य गोष्ट नाहीं तर एक गंभीर विषय आहे. आपल्या मोठ्या तारणात आनंद करण्याविषयी आपल्याला कळकळ असली पाहिजे.

आपण या जगाद्वारें पापाच्या क्षणिक आणि आत्मघाती सुखविलासाकडे ओढले जाऊ नये. आपण परमेश्वराठायीं आमच्या सनातन आनंदाकडे दुर्लक्ष करूं नये – हेंच या तारणाचे ध्येय होय. एवढ्या मोठ्या तारणापासून दूर वाहवत जाण्यापेक्षा आपण आपलें डोळे उपटून काढलें तर बरे होईल.