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20 अप्रैल : सर्वशक्तिमान प्रभु, कोमल चरवाहा

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20 अप्रैल : सर्वशक्तिमान प्रभु, कोमल चरवाहा
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“देखो, प्रभु यहोवा सामर्थ्य दिखाता हुआ आ रहा है, वह अपने भुजबल से प्रभुता करेगा; देखो, जो मजदूरी देने की है वह उसके पास है और जो बदला देने का है वह उसके हाथ में है। वह चरवाहे के समान अपने झुण्ड को चराएगा, वह भेड़ों के बच्चों को अँकवार में लिए रहेगा और दूध पिलाने वालियों को धीरे-धीरे ले चलेगा।” यशायाह 40:10-11

संयुक्त राज्य अमेरिका कभी भी सम्प्रभुओं या उनकी सम्प्रभुता के प्रति उत्साही नहीं रहा है। हम ऐसे व्यक्ति को पसन्द करते हैं, जिसे हम एक पद पर वोट देकर चुन सकें और आवश्यकता पड़ने पर उसे पुकार सकें—और जब चाहें तो उसे हटा भी सकें! और यदि हम ईमानदारी से कहें, तो हमारे परमेश्वर के प्रति भी हमारा दृष्टिकोण प्रायः ऐसा ही होता है। हम नियन्त्रण करना पसंद करते हैं, न कि नियन्त्रित होना।

हालाँकि, परमेश्वर को न तो हम अपने नियन्त्रण में रख सकते हैं और न ही उसे अपने स्वरूप में ढाल सकते हैं। वह सर्वशक्तिमान प्रभु है, जिसका अस्तित्व हमारी मानव दुर्बलता और सीमित स्वभाव के ठीक विपरीत है। हम घास और बसन्त के फूलों की तरह हैं, जो मुरझा जाते हैं और झड़ जाते हैं। परमेश्वर के साथ ऐसा नहीं होता, जो सभी कालों से सब कुछ पर शासन और राज्य करता है। यहाँ तक कि उसका वचन भी हमेशा के लिए स्थिर है (यशायाह 40:6-8)।

अपनी सम्प्रभुता में परमेश्वर ने एक अद्‌भुत विजय प्राप्त की है: पाप और मृत्यु पर विजय। अपनी विशाल बुद्धिमत्ता में, वह जो विधाता है, एक मानव रूप में यीशु बनकर आया, उस व्यवस्था-विधान का पालन किया और उसे पूरा किया जो उसने स्वयं दिया था, और फिर पापियों की जगह मरकर हमारे ऋण का भुगतान किया और हमें शाश्वत जीवन दिया। जैसा कि पतरस ने अपने प्रचार में कहा, “उसी को परमेश्‍वर ने मृत्यु के बन्धनों से छुड़ाकर जिलाया; क्योंकि यह अनहोना था कि वह उसके वश में रहता” (प्रेरितों 2:24)। यही है उसकी  विजय।

हालाँकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान प्रभु है, वह हमारा कोमल चरवाहा भी है। वह अपनी प्रजा के पास ऐसे नहीं आता, जैसे एक कड़क जनरल युद्धभूमि में जाता है; इसके बजाय वह अपनी भेड़ों को अपने पास रखते हुए दया के साथ उनका मार्गदर्शन करता है। जो लोग पहले उदास, पराए और दोषी थे, और मृत्यु के डर में जी रहे थे, वे अब स्वतन्त्र किए गए हैं। विजय-घोष के साथ वह कहता है, “मैंने तेरे उस नाम से, जो तू ने मुझे दिया है उनकी रक्षा की। मैंने उनकी चौकसी की, और विनाश के पुत्र को छोड़ उनमें से कोई नष्ट नहीं हुआ” (यूहन्ना 17:12)।

हम परमेश्वर की सम्प्रभुता में आनन्दित हो सकते हैं, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान और कोमल है, वह चरवाहा है जो खोई हुई भेड़ों को लाने और अपना उद्देश्य पूरा करने में व्यस्त है। जब वह काम करता है, तो उसकी आवाज़ सुनाई देती है और बहरे सुनने लगते हैं, उसकी रोशनी चमकती है और अंधे देखने लगते हैं। हम इस कोमल चरवाहे के दिल में समेटे गए हैं और यह विश्वास रख सकते हैं कि यह संसार हमारे सर्वशक्तिमान पिता का है।

मसीही जीवन में एक चुनौती यह है कि परमेश्वर के बारे में हमारा दृष्टिकोण इतना बड़ा हो कि हम उसे “प्रभु परमेश्वर” के रूप में जानें, जो “शक्ति के साथ आता है” और जिसके सामने हम श्रद्धा और सम्मान के साथ आते हैं, जो “एक चरवाहे के समान अपनी भेड़ों की चरवाही करेगा” और जिसका अनुसरण हम घनिष्ठ मित्रता में करते हैं। प्रभु यीशु शेर और मेमना दोनों है (प्रकाशितवाक्य 5:5-6)। आपको इनमें से किसे याद रखना और उसके अनुसार जीना सबसे कठिन लगता है? दोनों को याद रखें और आप अपने सम्प्रभु और अपने चरवाहे के रूप में उसका आज्ञापालन करेंगे और उसमें आनन्दित होंगे।

यहेजकेल 34:11-24

19 अप्रैल : छुटकारे के लिए चेतावनियाँ

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19 अप्रैल : छुटकारे के लिए चेतावनियाँ
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“इसलिए जो समझता है, ‘मैं स्थिर हूँ,’ वह चौकस रहे कि कहीं गिर न पड़े।” 1 कुरिन्थियों 10:12

एक जीवनी में, लेखक जब लिखते हैं और पाठक जब पढ़ते हैं, तो उन्हें मुख्य पात्र के दोषों को छुपाने का एक बड़ा प्रलोभन होता है। इसके विपरीत, पवित्रशास्त्र अपने नायकों के दोषों, असफलताओं और पापों को छुपाने का कोई प्रयास नहीं करता। और आत्मिक विजय के बाद ही प्रायः पराजय का खतरा सबसे अधिक महसूस होता है।

विश्वास की एक विजय में नूह ने आज्ञापालन करते हुए जहाज बनाना जारी रखा, जबकि अभी बारिश की एक बूँद भी नहीं गिरी थी। लेकिन हम पढ़ते हैं कि बाढ़ के बाद नूह ने अपनी नशे की स्थिति में क्या-क्या होने दिया (उत्पत्ति 9:20-27 देखें)। अब्राम विश्वास के मार्ग पर चला, लेकिन बाद में उसने मिस्र में जाने पर अपने झूठ के कारण अपने को और अपने परिवार को शर्मिन्दा किया (12:10-20)। दाऊद ने गोलियत पर विजय प्राप्त की, लेकिन बाद में वह व्यभिचार (और सम्भवतः बलात्कार), हत्या और अराजकता जैसे कुकृत्य कर बैठा (2 शमूएल 11 से आगे)।

ये सभी पात्र महान व्यक्ति थे, जिन्होंने परमेश्वर के कार्य में बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, और जिन्होंने असफलताएँ भी झेलीं। वे ऊँचे पर खड़े हुए, और फिर जोर से गिरे। बाइबल हमें इन उदाहरणों को बहाने बनाने के लिए नहीं, बल्कि चेतावनी देने के रूप में देती है, ताकि जब सब कुछ ठीक चल रहा हो, तो हम आत्म-सन्तुष्ट न हो जाएँ, दूसरों से बहुत अधिक उम्मीद न करें—और वास्तव में, खुद से भी ज्यादा उम्मीद न करें!

थियोलॉजियन ए. डब्ल्यू. पिंक हमें याद दिलाते हैं, “परमेश्वर इसे इस प्रकार होने की अनुमति देता है कि श्रेष्ठ से श्रेष्ठ मनुष्य भी केवल मनुष्य ही होते हैं। चाहे वे कितने ही प्रतिभाशाली क्यों न हों और परमेश्वर की सेवा में कितने ही समृद्ध और महान क्यों न हों, यदि परमेश्वर की सहायक शक्ति एक क्षण के लिए भी उनसे हटा ली जाए, तो यह शीघ्र ही स्पष्ट हो जाएगा कि वे ‘मिट्टी के बर्तन’ मात्र हैं। कोई भी व्यक्ति तब तक नहीं खड़ा रहता जब तक उसे दिव्य अनुग्रह का समर्थन प्राप्त न हो। सबसे अनुभवी संत भी, यदि उसे अपने हाल पर छोड़ दिया जाए, तो वह तुरन्त पानी की तरह कमजोर और चूहे की तरह डरपोक दिखाई देगा।”[1]

दयालु परमेश्वर हमें अकेला नहीं छोड़ता: वह हमें धार्मिकता, उद्धार, सत्य, और उसका वचन प्रदान करता है, ताकि हम हर परीक्षा और प्रलोभन को न केवल सहन कर सकें, बल्कि उनमें मजबूत खड़े रह सकें। जब हम अपने अन्दर उन्हीं कमजोरियों और असफलताओं को पहचान लेते हैं, जो नूह, अब्राम, और दाऊद जैसे नायकों ने अनुभव की थीं, तब हम परमेश्वर की कृपा और शक्ति पर निर्भर हो जाते हैं, जो हमें हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के द्वारा सहारा देती है, जो हमारा एकमात्र सच्चा “मुक्ति का मार्ग” है (1 कुरिन्थियों 10:13)। यह हमारे लिए एक अनुस्मारक के रूप में काम करे कि आप अपनी विश्वास-यात्रा में आगे बढ़ रहे हैं, पवित्रता में वृद्धि कर रहे हैं, या परमेश्वर के राज्य के लिए संसार को प्रभावित करने में अपनी शक्ति, बुद्धि या चरित्र के कारण नहीं, बल्कि परमेश्वर के अनुग्रह के कारण सफल हो रहे हैं। जो व्यक्ति इसे सच में जानता है, वह आत्म-सन्तोष को एक गम्भीर खतरा मानता है और प्रार्थना को अनिवार्य समझता है, क्योंकि वह जानता है कि केवल प्रभु ही है जो उसे हर दिन, हर क्षण खड़ा रख सकता है। क्या आप यह जानते हैं?

1 कुरिन्थियों 10:1-13

18 अप्रैल : परमेश्वर बेहतर जानता है

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18 अप्रैल : परमेश्वर बेहतर जानता है
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“हे यहोवा, न तो मेरा मन गर्व से और न मेरी दृष्‍टि घमण्ड से भरी है; और जो बातें बड़ी और मेरे लिए अधिक कठिन हैं, उनसे मैं काम नहीं रखता। निश्चय मैं ने अपने मन को शान्त और चुप कर दिया है, जैसा दूध छुड़ाया हुआ लड़का अपनी माँ की गोद में रहता है, वैसे ही दूध छुड़ाए हुए लड़के के समान मेरा मन भी रहता है।” भजन 131:1-2

एक बच्चे से उसकी माँ का दूध छुड़ाना उसके लिए पीड़ादायी हो सकता है, लेकिन यह स्वस्थ विकास और परिपक्वता के लिए आवश्यक होता है। आज के पश्चिमी समाज में यह प्रक्रिया बहुत छोटी उम्र में उसका व्यक्तित्व पूरी तरह से विकसित होने से पहले ही हो जाती है। जब यह भजन लिखा गया था, तब बच्चे से उसकी माँ का दूध छुड़ाने की प्रक्रिया आमतौर पर तीन वर्ष की उम्र के आसपास होती थी।

इसलिए बच्चे के लिए यह एक उलझन भरा संघर्ष हो सकता है, क्योंकि वह कुछ ऐसा छोड़ने की कोशिश कर रहा होता है, जिससे उसे पहले आनन्द मिलता था। लेकिन एक बार जब बच्चा दूध छोड़ देता है, तो वह “शान्त और स्थिर” हो जाता है; अब वह यह समझ जाता है कि उसकी जरूरत अब भी पूरी होगी, और अब वह अपनी माँ के साथ समय का आनन्द ले सकता है, और अब ऐसा वह उससे कुछ पाने के लिए नहीं करेगा, बल्कि इसलिए क्योंकि वह उसकी माँ है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि दूध छुड़ाया हुआ बच्चा यह भी सीख लेता है कि उसकी माँ जानती है कि उसके लिए सबसे अच्छा क्या है, भले ही उससे एक आरामदायक चीज़ को ले लिया गया हो और यह फैसला उसके तीन साल के नजरिए से उलझन भरा लग रहा हो।

दूध छुड़ाए हुए बच्चे के समान हमें भी आध्यात्मिक बच्चों के रूप में यह समझ लेना चाहिए कि हम हमेशा अपने लिए यह फैसला नहीं कर पाते कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। हमें भरोसा रखना चाहिए कि हमारा स्वर्गिक पिता बेहतर जानता है। फिर भी, बहुत बार हमारे गर्वीले हृदय हमें परमेश्वर के रहस्यमय तरीके पर सवाल उठाने के लिए उकसाते हैं। हम जानना चाहते हैं कि हम क्यों दर्द, परेशानी या हानि का सामना कर रहे हैं, लेकिन हम यह पहचान नहीं पाते कि हमारे सवाल हमारे अहंकार को प्रकट कर सकते हैं।

सवाल अवश्य होंगे; ये हमारी यात्रा का हिस्सा होते हैं। लेकिन सच्चा सन्तोष तब मिलता है, जब हम अपने सवालों को संयमित करना सीख लेते हैं। सन्तोष कहता है, “भले ही मैं समझ न सकूँ, फिर भी मैं भरोसा करूँगा।” हमें इसका ध्यान रखना चाहिए कि अपने अहंकार में हम यह न माँगने लग जाएँ कि कुम्हार हमें बताए कि उसने बर्तन को इस तरह से क्यों बनाया (यशायाह 45:9)। परमेश्वर की सिद्ध इच्छा और तरीके रहस्यमय होते हैं, लेकिन वे हमेशा अच्छे होते हैं, क्योंकि वह हमारा पिता है।

प्रभु की सहायता से, हम खुद को यह सिखा सकते हैं कि हम उसके प्रावधान पर ध्यान केन्द्रित करें और खुद को याद दिलाएँ कि हमारी परिस्थितियाँ अस्थाई हैं, कि हमारा पिता जानता है कि वह इनमें क्या कर रहा है, और यह भी कि ये परिस्थितियाँ हमारे आनन्द और महिमा को हमसे छीन नहीं सकतीं, जो अन्ततः मसीह में हमारे लिए हैं। इस प्रकार, हमारी आत्मा शान्त हो सकती है।

मसीही जीवन में, सन्तोष अक्सर भ्रम और असुविधा के अनुभव के माध्यम से पाया जाता है, जब हम यह कहना सीख जाते हैं, “मेरा पिता यहाँ प्रभारी है और मेरे अच्छे के लिए काम कर रहा है क्योंकि मैं उसकी सन्तान हूँ। मुझे समझने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं उस पर भरोसा कर सकता हूँ। मेरे पास वह है, और वह मेरे लिए पर्याप्त है। इस तूफान में भी मेरी आत्मा शान्त है।” यह कितनी अद्‌भुत सच्चाई है जिसे आज कहा जा सकता है!

भजन 34

17 अप्रैल : डर से विश्वास की ओर

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17 अप्रैल : डर से विश्वास की ओर
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“मरियम मगदलीनी ने जाकर चेलों को बताया, ‘मैं ने प्रभु को देखा, और उसने मुझ से ये बातें कहीं।’” यूहन्ना 20:18

वह क्या है जो डर को विश्वास में बदल डालता है?

यीशु की क्रूस पर मृत्यु के बाद उसके चेले पूरी तरह से टूट चुके थे, और निराश तथा उत्पीड़न के डर से एक साथ इकट्ठे थे। उनमें से एक, यहूदा, पहले ही आत्महत्या करके मर चुका था। एक और, पतरस, दबाव में आकर अपने अगुवा और शिक्षक यीशु को नकार चुका था, जिसे उन्होंने निर्दयता से मारे जाते हुए देखा था। ऐसा लग रह था मानो उनकी आशाएँ और सपने उसी के साथ मर गए थे। फिर भी, कुछ ही सप्ताह बाद ये निराश लोग यरूशलेम की सड़कों पर खड़े होकर साहस के साथ ऐलान कर रहे थे कि यीशु मसीह मृतकों में से जी उठा है। इन लोगों का भयावह डर साहसिक विश्वास में कैसे बदल गया था? क्या हममें भी वही बदलाव आ सकता है? इसका उत्तर केवल मृतकों में से जी उठा यीशु है।

चेलों की यहूदी पृष्ठभूमि ने उन्हें यह विश्वास दिलाया था कि मसीह प्रकट होगा और हमेशा के लिए रहेगा। इस मान्यता के कारण आरम्भ में वे यीशु की मृत्यु से न केवल निराश हो गए थे, बल्कि यह उन्हें प्रतापी विजय के स्थान पर सम्पूर्ण पराजय प्रतीत हो रहा था। किन्तु यीशु की मृत्यु के बाद अब अचानक साहस के साथ यह प्रचार करने का, कि यीशु ही वास्तव में मसीह है, एक ही सम्भव कारण हो सकता था: उन्होंने मृतकों में से जी उठे मसीह को देख लिया था। यदि ऐसा न हुआ होता, तो वे या तो स्नेही भाव से या फिर कटु भाव से केवल इतना ही याद रखते कि यीशु उनका प्यारा शिक्षक था। एक मृत व्यक्ति में कैसी माफी और आशा प्राप्त की जा सकती है? लेकिन मृतकों में से जी उठे मसीह के साथ अब अचानक सब कुछ बदल जाता है।

बाइबल हमें प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ बताती है कि चेलों ने मृतकों में से जी उठे मसीह से मुलाकात की (जैसे यूहन्ना 20:11–21:23 में)। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि चेलों ने उनके ऊपर हावी हो चुके उनके विश्वास के कारण पैदा हुए भ्रम में यीशु को देखा था। लेकिन याद रखें कि आरम्भ में उन्होंने उसके जी उठने पर विश्वास नहीं किया था! वास्तव में, पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि वे बन्द दरवाजों के पीछे डर और निराशा में बैठे थे (20:19)। और यदि उन्होंने मृतकों में से जी उठे और शासन करते हुए मसीह की कल्पना कर भी ली होती, तो वे शायद ऐसे यीशु के बारे में नहीं सोचते, जो झील के किनारे पर मछली पका कर खा रहा था, जिसके शरीर पर क्रूस पर मारे जाने के निशान अभी भी थे, और जो सड़कों पर चलता था और कई तरीकों से उनसे मिलता था। न ही वे खुद को इतने डरपोक व्यक्तियों के रूप में चित्रित करते, और न ही उस समय के समाज में महिलाओं की गवाही को शामिल करते (जिसे उस संस्कृति में मान्य नहीं माना जाता था)। इसके बजाय, वे अपने को बहादुर और प्रमुख व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करते, जो खाली क़ब्र के पहले गवाह थे। खाली क़ब्र के लिए कोई भी वैकल्पिक व्याख्या उस विश्वास से भी अधिक “विश्वास” की माँग करती है, जो हमें परमेश्वर के वचन में प्रकट किया गया है।

पुनरुत्थान सब कुछ बदल देता है। हमें यीशु के मृतकों में से जी उठने के आस-पास के तथ्यों पर विचार करना चाहिए—लेकिन यह हमें जो शानदार शुभ समाचार देता है, उस पर भी हमें विचार करना चाहिए। यीशु के शारीरिक पुनरुत्थान के बिना मसीही आस्था निरर्थक है; “तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है” (1 कुरिन्थियों 15:17)। लेकिन चूंकि यीशु सचमुच मृतकों में से जी उठा है और सचमुच शासन कर रहा है, तो फिर माफी केवल उसी में मिलती है और किसी में नहीं, और आशा केवल उसी में मिलती है और किसी में नहीं। क्या आपने विश्वास की आँखों से प्रभु को मृतकों में से जी उठे हुए और शासन करते हुए देखा है? तो फिर आप, मरियम और चेलों के समान अपने सन्देहपूर्ण डर को विश्वास में बदलते हुए देखेंगे, क्योंकि आप इस आशा को अपने हृदय में और इस डरे हुए संसार में साहसिक रूप से घोषित करेंगे।

यूहन्ना 20:1-18

16 अप्रैल : कोई सामान्य मृत्यु नहीं

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16 अप्रैल : कोई सामान्य मृत्यु नहीं
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“जब यीशु ने वह सिरका लिया, तो कहा, ‘पूरा हुआ’; और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिए।” यूहन्ना 19:30

यीशु की मृत्यु के आस-पास की घटनाएँ मुख्य रूप से रोमी न्याय क्षेत्र के लिए सामान्य बात थी।

मुकद्दमे, पिटाई, अपमानजनक जुलूस, और दर्दनाक तरीके से क्रूस पर चढ़ाना, ये सभी अपराधियों को मृत्युदण्ड देने में शामिल सैनिकों के लिए सामान्य कार्य थे। फिर भी, जो सामान्य नहीं था, वह था वह अंधकार जो भरी दोपहर को पूरे घटनाक्रम पर छा गया (मत्ती 27:45), मानो परमेश्वर ने इस दुखद दृश्य पर अपनी आँखें बन्द कर ली हों। यह एक सामान्य मृत्युदण्ड होने के साथ-साथ सम्पूर्ण शाश्वतता में सबसे बड़ा मोड़ भी था।

इसे इतना महत्त्वपूर्ण बनाने वाली बात यह थी कि उस मध्य क्रूस पर लटका हुआ व्यक्ति कौन था: कोई और नहीं, बल्कि स्वयं देहधारी परमेश्वर। हमें इस पर कभी भी आश्चर्यचकित होने से नहीं रुकना चाहिए:

सूरज ने कैसे अंधकार में अपना चेहरा छिपा लिया,

और अपनी महिमा को बन्द कर लिया,

जब मसीह, महान सृष्टिकर्ता, मरा,

मनुष्य के पापों के लिए।[1]

पवित्रशास्त्र क्रूस पर मसीह की शारीरिक पीड़ा पर ज्यादा बल नहीं देता। उसने निश्चित रूप से भयानक शारीरिक दर्द सहा, लेकिन “उसके शरीर की पीड़ा उसके आत्मिक दुखों के सामने कुछ भी नहीं थी; यही उसके दुखों का वास्तविक रूप था।”[2] यीशु ने परमेश्वर पिता से सम्बन्ध के दृष्टिकोण से दूर हो जाने की पीड़ा और दर्द को पूरी तरह से अनुभव किया—शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से। आप अपने जीवन में जो भी अनुभव करते हैं, यह बात जान लीजिए कि यीशु ने इससे भी बुरा अनुभव किया है और इस प्रकार वह समझता है कि आप कैसा महसूस करते हैं। केवल इतना ही नहीं, उसने आपके लिए अकल्पनीय वेदना को भी सहा। जब समय सही आया, तब मसीह ने विजयपूर्वक कहा, “यह पूरा हुआ”—tetelestai : कर्ज चुका दिया गया और अब समाप्त हो चुका है।

मसीह की क्रूस पर मृत्यु को अक्सर ऊँचा उठाए गए क्रूस के साथ दिखाया जाता है, जिसके सामने एक भीड़ खड़ी है। जबकि वास्तविकता में, एक बार जब क्रूस को गड्ढे में खड़ा कर दिया गया था, तो उसके पैर ज़मीन के बहुत करीब रहे होंगे। इसी तरह, मसीह का जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान हमारे जीवन के ऊपर ऊँचा नहीं है, बल्कि हमारे जीवन से नजदीकी रूप से जुड़ा हुआ है। नहीं, यीशु की मृत्यु कोई सामान्य मृत्यु नहीं थी, बल्कि एक ऐसी मृत्यु थी जो विश्वास के माध्यम से सच्चा जीवन देने की प्रतिज्ञा करती है। सब कुछ बदल जाता है, जब हम उस क्रूस पर हुई सभी घटनाओं पर विचार करते हैं और अपने आप से कहते हैं:

मेरे लिए घायल, मेरे लिए घायल,

वह वहाँ क्रूस पर मेरे लिए घायल हुआ;

मेरे पाप समाप्त हो गए, और अब मैं स्वतन्त्र हूँ,

सिर्फ इसलिए क्योंकि यीशु मेरे लिए घायल हुआ।[3]

लूका 22:7-20

15 अप्रैल : एक चुनाव

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15 अप्रैल : एक चुनाव
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“पिलातुस ने एक दोष–पत्र लिखकर क्रूस पर लगा दिया, और उसमें यह लिखा हुआ था, ‘यीशु नासरी, यहूदियों का राजा।’” यूहन्ना 19:19

जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, तो उसके क्रूस के ऊपर एक दोष-पत्र लिखकर लगाया गया, जिसमें उसे “यहूदियों का राजा” घोषित किया गया। यद्यपि यह दोष-पत्र एक व्यंग्य के रूप में लगाया गया था, तौभी यह एक सत्य को प्रकट कर रहा था, जिसे सभी देख पा रहे थे: यीशु वास्तव में एक राजा था और आज भी राजा है! फिर भी हमें स्वयं से यह सवाल पूछना चाहिए: क्या मैं सच में अपना जीवन ऐसे जीता हूँ जैसे यीशु मेरे  जीवन का राजा है?

पवित्रशास्त्र बताता है कि यह दोष-पत्र तीन भाषाओं में लिखा गया था—अरामी में, जो पहली सदी में यरूशलेम में और उसके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश यहूदियों की भाषा थी; लातिनी में, जो रोमी साम्राज्य की आधिकारिक भाषा थी; और यूनानी में, जो व्यापार और संस्कृति की लोकप्रिय भाषा थी (यूहन्ना 19:20)। इन तीन भाषाओं में, उस समय के ज्ञात संसार के गवाहों को यह पढ़ने का अवसर मिला कि यीशु राजा है। इस चिह्न को पढ़ने के बाद सारे संसार को यह निर्णय करना पड़ा कि यीशु उनके लिए कौन था।

हम यीशु की मृत्यु की कहानी में लोगों के विभिन्न रूपों में उस संसार का और हमारे अपने संसार का एक छोटा सा दृष्टिकोण देखते हैं। पिलातुस में हम गर्वीले, संकोची और गणनात्मक राजनेता को देखते हैं। उन सैनिकों में जो यीशु को क्रूस पर कीलों से जड़ रहे थे, हम उन्हें देखते हैं जो अपने नियमित कारोबार को अंजाम देने में लगे हुए हैं। उन लोगों में जो प्रभु का उपहास कर रहे थे, हम ऐसे लोगों को देखते हैं, जिनका ईश्वर से सम्पर्क सिर्फ इतना है कि वे उसका मजाक उड़ाते हैं। दर्शकों की उस भीड़ में, हम उन लोगों को देखते हैं जिनकी किसी भी शाश्वत बात में कोई रुचि नहीं है। लेकिन फिर, अंधेरे के बीच, पास के एक क्रूस पर हम एक निराश और मरते हुए चोर को देखते हैं, जो उद्धारकर्ता की ओर आशा से देखता है—और उसे पा लेता है। और यीशु के पास खड़े उसके परिवार और दोस्तों में हम शोकित लेकिन वफादार अनुयायी देखते हैं, जो मसीह और उसके दावों के साथ खड़े हैं—और जो उसके शव को एक कब्र में रखा जाते हुए देखते हैं, जो जल्द ही खाली होने वाली थी।

इन सभी लोगों ने उस चिह्न को देखा: “यीशु नासरी, यहूदियों का राजा।” सभी ने उस चिह्न के नीचे क्रूस पर उस व्यक्ति को भी देखा। चाहे घृणा से या आशा से, सभी ने इस ऐतिहासिक घटना को देखा, और उन सभी को इसके और मसीह के व्यक्तित्व के प्रकाश में अपने जीवन को देखना था। जैसे वह चिह्न मसीह के राजत्व की घोषणा करता था, वैसे ही यीशु संसार के सर्वाधिक शक्तिशाली प्रेम की घोषणा कर रहा था।

सवाल अब भी बना हुआ है: हम इस प्रेम के साथ क्या करेंगे? हममें से प्रत्येक व्यक्ति उस भीड़ में उपस्थित चेहरों में से किसी एक के समान है, चाहे वह गर्वीला हो, निष्क्रिय हो, या वफादार हो। हम सभी को यीशु मसीह के जीवन बदलने वाले व्यक्तित्व से सामना करना पड़ता है।

क्रूस और खाली कब्र आपके रिश्तों, आपके काम, आपके उद्देश्य या आपकी पहचान को कैसे प्रभावित करते हैं? यदि यीशु आप पर राज्य करता है, तो उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान आपके जीवन जीने के तरीके और आपके जीवन के अर्थ को पूरी तरह से बदल देता है। इस व्यक्ति को देखने और उस चिह्न से सहमत हो जाने से हमें अनन्तकाल के लिए आशा और आज के लिए उद्देश्य मिल जाते हैं। “यीशु राजा है”—यहूदियों और अन्यजातियों का राजा, सारे संसार का राजा, और आपके तथा मेरे जीवन का राजा।

लूका 23:32-56

14 अप्रैल : कायरतापूर्ण समझौता

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14 अप्रैल : कायरतापूर्ण समझौता
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“जब प्रधान याजकों और प्यादों ने उसे देखा, तो चिल्लाकर कहा, ‘उसे क्रूस पर चढ़ा, क्रूस पर!’ पिलातुस ने उनसे कहा, ‘तुम ही उसे लेकर क्रूस पर चढ़ाओ, क्योंकि मैं उसमें कोई दोष नहीं पाता।’ यहूदियों ने उसको उत्तर दिया, ‘हमारी भी व्यवस्था है और उस व्यवस्था के अनुसार वह मारे जाने के योग्य है, क्योंकि उसने अपने आप को परमेश्‍वर का पुत्र बनाया।’ जब पिलातुस ने यह बात सुनी तो और भी डर गया।” यूहन्ना 19:6-8

आप किसकी प्रशंसा के लिए जीएँगे?

जब पिलातुस के सामने मसीह पर मुकद्दमा चलाया गया, तो रोमी राज्यपाल ने बार-बार उसकी निर्दोषता की घोषणा तो की, किन्तु इस घोषणा के बावजूद उसने यीशु के खिलाफ भयानक कृत्य किए।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—और फिर यीशु को बर्बर तरीके से कोड़े मारे जाने के लिए सौंप दिया, एक ऐसी मार जो इतनी भयंकर होती थी कि कभी-कभी इससे नसें, धमनियाँ और आन्तरिक अंग बाहर आ जाते थे।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—और फिर सैनिकों को अनुमति दी कि वे यीशु का मजाक उड़ाने के लिए उसे एक दिखावटी राजगद्दी पर बैठाएँ, उसके सिर पर काँटों का मुकुट रखें, उसे एक राजा जैसे कपड़े पहनाएँ और उसका उपहास करते हुए उसके आगे “दण्डवत” करें।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—लेकिन क्या उसने यीशु को रिहा किया? नहीं, उसने यीशु को मृत्युदण्ड देने वाले एक निर्दयी दस्ते के हवाले कर दिया।

पिलातुस सम्भवतः मसीह से मिलने वाला ऐसा व्यक्ति था, जो सबसे अधिक पीड़ित था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जिसके पास बड़ी ताकत तो थी, लेकिन जो अपनी कायलता पर खड़ा होने का साहस नहीं रखता था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जिसने बड़ी सफलता तो हासिल की थी, लेकिन जिसने अपने पद की शोभा में समझौता किया था और खुद को एक कायर के रूप में दिखाया था। वह एक ऐसा राज्यपाल था, जो अपनी खुद की कमजोरियों के अधीन था।

हम इस बारे में निष्क्रिय या उदासीन नहीं हो सकते कि मसीह हमारे लिए कौन है। क्या वह उद्धारकर्ता हैं या क्या वह कोई नहीं हैं? पिलातुस के समान यह फैसला लेने से बचने का अर्थ है कि हम मसीह को पूरी तरह से अनदेखा कर रहे हैं।

पिलातुस हमारे लिए एक चुनौती के रूप में खड़ा है। उसका आचरण हमें यह पूछने के लिए मजबूर करता है: किन परिस्थितियों में मैं, पिलातुस की तरह, जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए, फिर भी मैं डरता हूँ कि यदि मैंने ऐसा किया तो लोग क्या कहेंगे? क्या मेरे शब्द या आचरण उन लोगों की अपेक्षाओं और प्रतिक्रियाओं, या सम्पत्ति, स्थिति, या पदोन्नति के विचारों से अधिक प्रभावित हैं, बजाय इसके कि वे मसीह के आदेशों से प्रभावित हों?

आइए हम मसीह के बारे में अपने दृष्टिकोण पर समझौता न करें। यदि हम अपने साथियों, पड़ोसियों या परिवार की राय की चिन्ता में बहुत ज्यादा खो जाते हैं, तो हो सकता है कि हम पाएँ कि हम माफी, शान्ति, स्वर्ग और स्वयं मसीह को त्याग कर एक आसान जीवन चुन रहे हैं। इसके बजाय, आइए हम साहस दिखाएँ।

फिर से मसीह को देखें: पीटा गया, उपहासित हुआ, और आपके लिए प्रेम के कारण मारा गया। फिर उन लोगों को देखें, जो शायद विरोध के साथ या शायद शालीनता के साथ उसके सत्य का मजाक उड़ाते हैं। आप किसे नाराज करना चाहेंगे? आप किसकी “शाबाशी” को सुनना चाहेंगे?

मसीह हमें अपने पास बुला रहा है, ताकि हम जाएँ और उसके लिए जीएँ। क्या आप आएँगे, और क्या आप जाएँगे?

यूहन्ना 19:1-16

13 अप्रैल : अतुलनीय विनम्रता

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13 अप्रैल : अतुलनीय विनम्रता
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“यीशु काँटों का मुकुट और बैंजनी वस्त्र पहने हुए बाहर निकला; और पिलातुस ने उनसे कहा, ‘देखो, यह पुरुष!’” यूहन्ना 19:5

वहाँ खड़ा था मसीह—सिर काँटों के मुकुट से छिदा हुआ, किसी दूसरे के कपड़े पहने हुए, हाथ में एक सरकण्डे की छड़ी पकड़े हुए, सब उसके राजा होने का मजाक उड़ाने के लिए—और रोमी राज्यपाल पिलातुस ने हँसी उड़ाते हुए भीड़ से कहा, “देखो, यह पुरुष!” जबकि वह शब्द तिरस्कार के साथ कहे गए थे, परन्तु विडम्बना यह है कि वे उपयुक्त थे; वहाँ खड़ा था संसार का उद्धारकर्ता, जो अतुलनीय विनम्रता में सुसज्जित था, और संसार के लिए एक अपार प्रेम से सजा हुआ था।

हमारे पास मसीह के उदाहरण से बहुत कुछ सीखने को है। जब विनम्र राजा ने शाही अपमान और मृत्यु से पहले कोड़ों की क्रूर मार की “पूर्व-मृत्यु” को सहन किया, उसने अपनी आत्म-रक्षा में एक भी शब्द नहीं कहा। और वे उसे किस लिए दोषी ठहरा रहे थे? 18 साल से अपंग एक महिला को चंगा करने के लिए (लूका 13:10-13)? नाईन की विधवा के मरे हुए बेटे को जीवित करने के लिए (लूका 7:11-17)? लाजर को जीवित करके कब्र से बाहर लाने के लिए (यूहन्ना 11:1-44)? बच्चों को अपनी गोदी में बैठाने और अपने शिष्यों को यह समझाने के लिए कि “स्वर्ग का राज्य ऐसों ही का है” (मत्ती 19:14)? मसीह के अभियोगी कैसे इस नतीजे पर पहुँचे कि वे उसे इस तरह अपमानित करें? इसका कोई आधार नहीं था। फिर भी उन्होंने ऐसा किया।

जब हमारा विनम्र प्रभु अपने मुकद्दमे के दौरान चुप रहा, तो पिलातुस को ठेस लगी और उसने अपमानित महसूस किया। यहाँ एक बड़ी विडम्बना है, क्योंकि यह रोमी राज्यपाल समस्त सृष्टि के राजा को अपमानित करने का प्रयास कर रहा था! और फिर भी, उस राजा ने अपने अधिकार को साबित करने या अपनी जान बचाने के लिए कुछ भी नहीं किया। उसने विनम्रता से एक अन्यायपूर्ण मुकद्दमा सहा, जब सवाल किए गए तो सत्य बोला, और हमारे स्थान पर मृत्यु को गले लगाने के लिए आगे बढ़ा।

मैं खुद से पूछता हूँ: क्या मैं सच में उस पुरुष को देखता हूँ, जो पिलातुस के सामने खड़ा है, जो भीड़ के सामने खड़ा है—जो मेरे  सामने खड़ा है? यह कोई असहाय व्यक्ति नहीं है, जो अपनी मदद आप नहीं कर सकता। यह तो देहधारी परमेश्वर है।

क्या मैं सचमुच समझता हूँ कि वह इस अपमानित मार्ग पर क्यों चला? “ओह, वह प्रेम जिसने उद्धार की योजना बनाई”[1]—आपके और मेरे लिए प्रेम और उद्धार की योजना! दो हजार साल पहले, वहाँ रोम राज्यपाल के महल के बाहर एक दुखद दृश्य खड़ा था, और इसका एक कारण यह था कि यीशु की आँखों के सामने हमारे नाम थे—हमारे नाम जिन्हें उसने अपने हाथों की हथेलियों पर उकेरा था, जिन हाथों को निर्दयी कीलें चीरने वाली थीं (यशायाह 49:16 देखें)।

हम कभी भी उस बगावती भीड़ की तरह न बनें, जो मसीह की विनम्रता का मजाक उड़ाती है, न ही पिलातुस की तरह बनें, जो मसीह प्रभावित करना चाहता है। इसके बजाय, इस पुरुष को उसकी सम्पूर्ण विनम्रता में देखो—यह सरकण्डा पकड़े हुए, यह मुकुट धारण किए हुए, यह वस्त्र पहने हुए, उस क्रूस पर लटके हुए—और देखो उसे आह्वान करते हुए। इस पुरुष को देखो, और बिना किसी सन्देह के जान लो कि आपके लिए उसका प्रेम कभी समाप्त नहीं होगा।

यशायाह 52:13 – 53:12

12 अप्रैल : आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

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12 अप्रैल : आप यीशु के साथ क्या करेंगे?
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“मेरा राज्य इस संसार का नहीं . . . तू कहता है कि मैं राजा हूँ। मैंने इसलिए जन्म लिया और इसलिए संसार में आया हूँ कि सत्य की गवाही दूँ। जो कोई सत्य का है, वह मेरा शब्द सुनता है।” यूहन्ना 18:36-37

आप यीशु के साथ क्या करेंगे? उस पहले गुड फ्राईडे की सुबह यहूदी धार्मिक अधिकारी यीशु को रोमी राज्यपाल पुन्तियुस पिलातुस के पास ले गए, ताकि उसका मुकद्दमा जारी रखा जा सके। हम सुसमाचारों के विवरण में देख सकते हैं कि कैसे परमेश्वर ने इन घटनाओं को पूरी तरह से अपनी योजना के अनुसार नियोजित किया। यहूदी नेताओं का यीशु को क्रूस पर मरवाने का निर्णय दरअसल परमेश्वर की शाश्वत योजना को पूरा कर रहा था। इस दिव्य योजना में यीशु का पिलातुस के साथ संवाद भी शामिल था, और जब वे एक-दूसरे के सामने खड़े हुए, पिलातुस ने यीशु की पहचान और अधिकार के बारे में कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल पूछे, जो अनन्त महत्त्व रखते थे, और हममें से हर एक को इसका उत्तर देना चाहिए। एक भजनकार के शब्दों पर विचार करें:

यीशु पिलातुस के महल में खड़ा है—

मित्रविहीन, त्यागा हुआ, सभी से धोखा खाया हुआ;

सुनो! इस अचानक हुई पुकार का क्या अर्थ है?

आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

पिलातुस ने सोचा कि वह केवल एक बौद्धिक और राजनीतिक परीक्षा ले रहा था। लेकिन “यीशु कौन हैं?” यह सवाल हमेशा एक आत्मिक और पारलौकिक सवाल होता है। यीशु एक राजनीतिक राजा नहीं था, जैसा पिलातुस सोच रहा था; बल्कि वह तो स्वर्गिक राजा था। यीशु ने पिलातुस से कहा, मेरा राज्य इस संसार का है ही नहीं। मेरा राज्य तो मेरे लोगों के हृदयों में आत्मिक परिवर्तन लाने से सम्बन्धित है। पृथ्वी पर एक राजा के तौर पर जन्म लेने का मेरा उद्देश्य परमेश्वर के सत्य की गवाही देना है। लेकिन पिलातुस अपने अविश्वास में अंधा होकर पहले ही अपना निर्णय ले चुका था। निराश और उदासीन होकर वह इस मूलभूत सवाल से बचने की कोशिश कर रहा था, जिसका उत्तर हम सभी को देना चाहिए: “मैं यीशु के साथ क्या करूँगा?” लेकिन इस सवाल से बचने की कोशिश करते हुए पिलातुस ने अपना जवाब दे दिया। उसका उत्तर था: मैं अपने ऊपर यीशु के दावे को और अपने ऊपर उसके शासन को नकारता हूँ, और ऐसा करके मेरा उद्धार करने के उसके प्रस्ताव को भी ठुकराता हूँ।

आप यीशु के साथ क्या करेंगे?

उदासीन आप नहीं हो सकते;

एक दिन आपका दिल पूछेगा,

वह मेरे साथ क्या करेगा?”[1]

उदासीन आप नहीं हो सकते। आप या तो उनके राज्य के अधीन जीवन जीएँगे, या फिर आप उसे नकार देंगे। इसलिए सुबह जब आप सुबह अपनी बाइबल पढ़कर बन्द करते हैं, तो यह सोचकर अपने दिन का आरम्भ न करें कि यह संसार, इसकी चिन्ताएँ और इसके अस्थायी शासक ही सब कुछ हैं और केवल यही मायने रखता है। इस सोच के साथ अपने दिन का आरम्भ न करें कि इस संसार में आपके जीवन में यीशु की कोई जगह या रुचि नहीं है। यीशु पिलातुस के सामने मित्रविहीन और त्यागा हुआ खड़ा था, ताकि आप उसके मित्र बनकर उनके शाश्वत राज्य में स्वागत किए जा सकें। उदासीनता का कोई विकल्प नहीं है—तो फिर हम इसे क्यों चाहेंगे?

 यूहन्ना 18:28-40

11 अप्रैल : अपनी तलवार म्यान में रख

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11 अप्रैल : अपनी तलवार म्यान में रख
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“तब शमौन पतरस ने तलवार, जो उसके पास थी, खींची और महायाजक के दास पर चलाकर उसका दाहिना कान उड़ा दिया . . . तब यीशु ने पतरस से कहा, ‘अपनी तलवार म्यान में रख। जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे न पीऊँ?’” यूहन्ना 18:10-11

यीशु की गतसमनी के बग़ीचे में गिरफ्तारी अन्ततः उसके पिता के प्रति उसके समर्पण को प्रकट करती है। जब सैनिक उसे पकड़ने आए, यीशु पहले ही यह निश्चय कर चुका था कि वह कष्ट का प्याला पीएगा—अर्थात क्रूस पर उसकी मृत्यु—ताकि यह हमारे लिए उद्धार का प्याला बन सके।

लेकिन कौन से शिष्य ने तुरन्त कदम बढ़ाया, जैसे कि यह सब एक संकेत था? बेशक, आवेगी शमौन पतरस—जो तलवार लहराते हुए आया! भावुकता में आकर काम करना और कुछ बोल देना पतरस के लिए कोई नई बात नहीं थी। उसने यीशु के पास पानी पर चलकर जाने की कोशिश की थी। उसने मसीह को फटकारने की कोशिश की थी। उसने मसीह के लिए अपने प्राणों की आहुति देने का प्रस्ताव दिया था। और फिर, यीशु की रक्षा के लिए कदम बढ़ाने के तुरन्त बाद उसने डर के मारे यीशु को जानने से भी इनकार कर दिया।

अपने प्रभु को गिरफ्तार होते देखकर पतरस द्वारा की गई प्रतिक्रिया पूरी तरह से समझने योग्य थी, लेकिन पूरी तरह से गलत थी। जबकि पतरस यहाँ यीशु के लिए लड़ा था, वह वास्तव में यीशु के खिलाफ ही लड़ रहा था। वह परमेश्वर की इच्छा के खिलाफ लड़ रहा था, जो यह चाहता था कि मनुष्यों के पापों के लिए यीशु प्रायश्चित बलि बने। पतरस का यह उदाहरण हमें एक महत्त्वपूर्ण शिक्षा देता है; जैसा कि कैल्विन कहते हैं, “आओ हम अपने आवेग को संयमित करना सीखें। और जैसा कि हमारे शरीर की इच्छाएँ हमें परमेश्वर के आदेशों से अधिक करने के लिए उकसाती हैं, हम यह सीखें कि हमारे आवेग का परिणाम तब गलत हो जाएगा जब हम परमेश्वर के वचन से आगे बढ़ने की हिम्मत करेंगे।”[1]

पतरस के इस काम को सही करने की आवश्यकता को जानकर यीशु ने उससे एक प्रश्न पूछा: “जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे न पीऊँ?” वह परमेश्वर की इच्छा के उस हिस्से को स्वीकार कर रहा था, जिसे उसने अभी प्रार्थना में स्वीकार किया था, और जिसके कारण बाद में उसने क्रूस पर यह पुकारा था, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46)। उसकी पीड़ा के माध्यम से उसकी महिमा प्रकट हुई और विश्वास करने वाले सभी लोगों के लिए उद्धार मुक्त रूप से प्रस्तुत किया गया। पतरस द्वारा निकाला गया कोई भी मार्ग इस मार्ग से बेहतर नहीं हो सकता था, और वह इसे नकार कर गलत कर रहा था।

जब हमारी अधीरता परमेश्वर की योजनाओं में हस्तक्षेप करने का प्रयास करती है, तो हमें अपनी आभासी तलवारें छोड़ देनी चाहिएँ। हमें परमेश्वर की योजना पर विश्वास करना चाहिए, उसके समय का इंतजार करना चाहिए, और उसके आदेशों पर चलना चाहिए। जितना अधिक हम पवित्रशास्त्र से परिचित होंगे—उसमें पाई जाने वाली महान कहानी, प्रतिज्ञाओं और सच्चाइयों को जानेंगे—हम उसकी योजनाओं को उतना ही बेहतर समझ पाएँगे। लेकिन फिर भी, ऐसे समय आएँगे जब उसके मार्ग हमारे लिए रहस्यमय होंगे और हम जिस मार्ग पर वह हमें ले जा रहा है, उसके खिलाफ लड़ने का प्रलोभन होगा। शायद आप अभी भी ऐसा कर रहे हैं।

पतरस से कहे गए यीशु के शब्दों को दिल से लें: “अपनी तलवार म्यान में रख।” परमेश्वर के प्रेमी हाथ पर विश्वास करें, उसके आदेशों का पालन करें, और उसके मार्गदर्शन का अनुसरण करें। वह हमारे विश्वास का “कर्ता और सिद्ध करने” वाला है (इब्रानियों 12:2), और जिस कहानी को वह लिख रहा है, वह आपकी कल्पना से कहीं अधिक शानदार है।

भजन संहिता 23