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19 April : विफल झालेंल्यांचे भविष्य

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19 April : विफल झालेंल्यांचे भविष्य
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“भिऊ नका, हे दुष्कर्म तुम्हीं केलें आहे खरे, पण आता परमेश्वराला अनुसरण्याचे सोडून दुसरीकडें वळू नका, तर मनोभावे परमेश्वराची सेवा करा; ज्या निरर्थक वस्तूंपासून तुम्हांला काहीं लाभ किंवा तुमचा उद्धार होणे शक्य नाहीं त्यांच्यामागे लागू नका, कारण त्या केवळ निरर्थक होत. परमेश्वर आपल्या थोर नामास्तव आपल्या लोकांचा त्याग करणार नाहीं, कारण परमेश्वराने कृपावंत होऊन तुम्हांला आपले प्रजाजन केलें आहे.” (1 शमुवेल 12:20-22).

जेव्हां इस्राएली लोकांना त्यांनी शमुवेलाला इतर राष्ट्रांप्रमाणे राजा मिळावा म्हणून अशी मागणी केल्याबद्दल भयभीत केलें केलें आणि त्यांनी केलेंल्या पापाबद्दल पश्चात्ताप करण्यास सांगितले, तेव्हां ही चांगली बातमी येतेः “भिऊ नका; हे दुष्कर्म तुम्हीं केलें आहे खरे.” ते किती उलट वाटते हे तुम्हीं ऐकता का – किती अद्भुतरित्या उलट? तुंम्हाला वाटेल त्यानें असे म्हणावयाला पाहिजे होते, “भीती बाळगा, कारण हे दुष्कर्म तुम्हीं केलें आहे.” हे घाबरण्याचे उत्तम कारण आहेः देवाशिवाय दुसरा राजा मागण्याचे मोठे दुष्कृत्य तुम्हीं केलें आहे! पण शमूवेलाने तसे म्हटलें नाहीं. “भिऊ नका; हे दुष्कर्म तुम्हीं केलें आहे खरे.”

पुढे तो असे म्हणतो, “पण आता परमेश्वराला अनुसरण्याचे सोडून दुसरीकडें वळू नका, तर मनोभावे परमेश्वराची सेवा करा; ज्या निरर्थक वस्तूंपासून तुम्हांला काहीं लाभ किंवा तुमचा उद्धार होणे शक्य नाहीं त्यांच्यामागे लागू नका, कारण त्या केवळ निरर्थक होत.”

ही ती सुवार्ता आहे: तुम्हीं महा पाप केलें खरे, आणि परमेश्वराचा भयंकर अनादर केला खरे, जरी तुम्हांला आता एक राजा मिळाला आहे ज्याची मागणी करण्याचे दुष्कर्म तुम्हीं केलें होते, जरी त्या पापास किंवा त्याचे दुःखदायक परिणाम जे अद्याप तुमच्यावर प्रगट झालें नाहींत, परत बदलता येत नाहीं, तरीही एक भविष्य आणि आशा आहे. तुम्हांवर दया केलीं जाईल.

भिऊ नका! भिऊ नका!

मग 1 शमुवेल 12:22 मध्ये सुवार्तेचा मोठा आधार येतो – सुवार्तेचा आधार आणि पाया. हे सर्व दुष्कर्म करूनही तुम्हांला भिण्याची गरज का नाहीं? “परमेश्वर आपल्या थोर नामास्तव आपल्या लोकांचा त्याग करणार नाहीं, कारण परमेश्वराने कृपावंत होऊन तुम्हांला आपले प्रजाजन केलें आहे.”

देवाची त्याच्या स्वतःच्या नामास्तव असलेली वचनबद्धता सुवार्तेचा आधार आहे. तुम्हांला हे कळलें का? तुम्हीं पाप केलें असले तरी भिऊ नका, “परमेश्वर आपल्या थोर नामास्तव आपल्या लोकांचा त्याग करणार नाहीं.” याचा तुमच्यावर दोनप्रकारे परिणाम घडून यायला पाहिजे : अंतःकरण विदारून टाकणारी नम्रता आणि पायांनी नृत्य करावा इतका आनंद. नम्रता कारण तुमच्या तारणाचा पाया तुमची योग्यता नाहीं. आनंद कारण तुमचे तारण हे देवाच्या स्वतःच्या थोर नामास्तव असलेल्या निष्ठेइतकेच खात्रीलायक आहे. हि खात्री आमच्यां कल्पनेपलीकडें आहे.

18 अप्रैल : परमेश्वर बेहतर जानता है

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18 अप्रैल : परमेश्वर बेहतर जानता है
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“हे यहोवा, न तो मेरा मन गर्व से और न मेरी दृष्‍टि घमण्ड से भरी है; और जो बातें बड़ी और मेरे लिए अधिक कठिन हैं, उनसे मैं काम नहीं रखता। निश्चय मैं ने अपने मन को शान्त और चुप कर दिया है, जैसा दूध छुड़ाया हुआ लड़का अपनी माँ की गोद में रहता है, वैसे ही दूध छुड़ाए हुए लड़के के समान मेरा मन भी रहता है।” भजन 131:1-2

एक बच्चे से उसकी माँ का दूध छुड़ाना उसके लिए पीड़ादायी हो सकता है, लेकिन यह स्वस्थ विकास और परिपक्वता के लिए आवश्यक होता है। आज के पश्चिमी समाज में यह प्रक्रिया बहुत छोटी उम्र में उसका व्यक्तित्व पूरी तरह से विकसित होने से पहले ही हो जाती है। जब यह भजन लिखा गया था, तब बच्चे से उसकी माँ का दूध छुड़ाने की प्रक्रिया आमतौर पर तीन वर्ष की उम्र के आसपास होती थी।

इसलिए बच्चे के लिए यह एक उलझन भरा संघर्ष हो सकता है, क्योंकि वह कुछ ऐसा छोड़ने की कोशिश कर रहा होता है, जिससे उसे पहले आनन्द मिलता था। लेकिन एक बार जब बच्चा दूध छोड़ देता है, तो वह “शान्त और स्थिर” हो जाता है; अब वह यह समझ जाता है कि उसकी जरूरत अब भी पूरी होगी, और अब वह अपनी माँ के साथ समय का आनन्द ले सकता है, और अब ऐसा वह उससे कुछ पाने के लिए नहीं करेगा, बल्कि इसलिए क्योंकि वह उसकी माँ है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि दूध छुड़ाया हुआ बच्चा यह भी सीख लेता है कि उसकी माँ जानती है कि उसके लिए सबसे अच्छा क्या है, भले ही उससे एक आरामदायक चीज़ को ले लिया गया हो और यह फैसला उसके तीन साल के नजरिए से उलझन भरा लग रहा हो।

दूध छुड़ाए हुए बच्चे के समान हमें भी आध्यात्मिक बच्चों के रूप में यह समझ लेना चाहिए कि हम हमेशा अपने लिए यह फैसला नहीं कर पाते कि हमारे लिए सबसे अच्छा क्या है। हमें भरोसा रखना चाहिए कि हमारा स्वर्गिक पिता बेहतर जानता है। फिर भी, बहुत बार हमारे गर्वीले हृदय हमें परमेश्वर के रहस्यमय तरीके पर सवाल उठाने के लिए उकसाते हैं। हम जानना चाहते हैं कि हम क्यों दर्द, परेशानी या हानि का सामना कर रहे हैं, लेकिन हम यह पहचान नहीं पाते कि हमारे सवाल हमारे अहंकार को प्रकट कर सकते हैं।

सवाल अवश्य होंगे; ये हमारी यात्रा का हिस्सा होते हैं। लेकिन सच्चा सन्तोष तब मिलता है, जब हम अपने सवालों को संयमित करना सीख लेते हैं। सन्तोष कहता है, “भले ही मैं समझ न सकूँ, फिर भी मैं भरोसा करूँगा।” हमें इसका ध्यान रखना चाहिए कि अपने अहंकार में हम यह न माँगने लग जाएँ कि कुम्हार हमें बताए कि उसने बर्तन को इस तरह से क्यों बनाया (यशायाह 45:9)। परमेश्वर की सिद्ध इच्छा और तरीके रहस्यमय होते हैं, लेकिन वे हमेशा अच्छे होते हैं, क्योंकि वह हमारा पिता है।

प्रभु की सहायता से, हम खुद को यह सिखा सकते हैं कि हम उसके प्रावधान पर ध्यान केन्द्रित करें और खुद को याद दिलाएँ कि हमारी परिस्थितियाँ अस्थाई हैं, कि हमारा पिता जानता है कि वह इनमें क्या कर रहा है, और यह भी कि ये परिस्थितियाँ हमारे आनन्द और महिमा को हमसे छीन नहीं सकतीं, जो अन्ततः मसीह में हमारे लिए हैं। इस प्रकार, हमारी आत्मा शान्त हो सकती है।

मसीही जीवन में, सन्तोष अक्सर भ्रम और असुविधा के अनुभव के माध्यम से पाया जाता है, जब हम यह कहना सीख जाते हैं, “मेरा पिता यहाँ प्रभारी है और मेरे अच्छे के लिए काम कर रहा है क्योंकि मैं उसकी सन्तान हूँ। मुझे समझने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं उस पर भरोसा कर सकता हूँ। मेरे पास वह है, और वह मेरे लिए पर्याप्त है। इस तूफान में भी मेरी आत्मा शान्त है।” यह कितनी अद्‌भुत सच्चाई है जिसे आज कहा जा सकता है!

भजन 34

18 April : देवा, आमच्यां अंतःकरणांस स्फूर्ती दे

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18 April : देवा, आमच्यां अंतःकरणांस स्फूर्ती दे
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शौलही गिबा येथे आपल्या घरी गेला. ज्या सैनिकांच्या मनांस देवाकडून स्फूर्ती झालीं ते त्याच्याबरोबर गेले. (1 शमुवेल 10:26).

या वचनात काय म्हटलें आहे यावर काहीं क्षण विचार करा. देवानें  त्यांना स्फूर्ती दिलीं, किंवा देवानें  त्यांना स्पर्श केला. बायकोने नाहीं. मुलाने नाहीं. पालकाने नाहीं. सल्लाकाराने नाहीं. तर देवानें. देवानें त्यांना स्फूर्ती दिलीं/स्पर्श केला.

त्यानें जो जो विश्वात अपरिमित सामर्थ्याचा धनी आहे. अनंत अधिकार आणि अनंत ज्ञान आणि अमर्याद प्रेम आणि अमर्याद चांगुलपणा आणि अमर्याद पवित्रता आणि अपरिमित न्याय असलेला. त्या देवानें त्यांच्या मनांस स्फूर्ती दिलीं.

बृहस्पतिचा परिघ रेणूच्या काठास कसा स्पर्श करतो? त्याच्या नाभीत प्रवेश करणे तर दूर राहिले?

देवाचा स्पर्श किंवा त्याचे मनांस स्फूर्ती देणे अद्भुत आहे, केवळ यामुळे नाहीं कीं स्पर्श करणारा वा स्फूर्ती देणारा देव आहे, तर यामुळे देखील कीं तो स्पर्श  आहे. हा एक वास्तविक संबंध आहे. त्या स्पर्शाचा संबंध आमच्यां मनांशी असणें हे अद्भुत आहे. स्पर्शाचा संबंध देवाबरोंबर आहे हे अद्भुत आहे. आणि तो वास्तविक स्पर्श आहे हे अद्भुत आहे.

शूर पुरुषांना उद्देशून फक्त बोलले जात नव्हते. त्यांच्यावर केवळ दैवी प्रभाव टाकींला जात नव्हता. त्यांची केवळ भेंट घेऊन निवड केलीं गेलेली नव्हती. देवानें, आपल्या अमर्याद कृपाळूतेने, त्यांच्या मनांस स्फूर्ती दिलीं. देव इतका जवळ होता. तरी ते भस्म झालें नाहींत.

मला तो स्पर्श आवडतो. मला तो आणखी हवा आहे. माझ्यासाठीं आणि तुम्हा सर्वांसाठीं. मी प्रार्थना करतो कीं देवानें मला त्याच्या गौरवाने आणि या गौरवाप्रीत्यर्थ नव्याने स्पर्श करावा. मी प्रार्थना करतो कीं त्यानें आम्हा सर्वांच्या मनांस स्फूर्ती द्यावी.

ओहो, देवाचा तो स्पर्श मिळावा! जर तो स्पर्श अग्नीसह करण्यांत आला, तर तसेच व्हावे. जर तो पाण्याने केला जात असेल तर असेच व्हावे. तो वाऱ्याने केला जात असेल तर तो तसाच व्हावा. जर तो मेघगर्जना आणि विजांच्या कडकडाटासह होत असेल, तर आपण तो समर्पित अंतकरणाने घेऊं.

हे परमेश्वरा, ये. इतक्या जवळ ये. भस्म कर आणि भिजव आणि वार कर आणि चुरगळा कर. किंवा शांत आणि मंदपणे, ये. ये. आमच्यां अंतःकरणास स्पर्श कर.

17 अप्रैल : डर से विश्वास की ओर

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17 अप्रैल : डर से विश्वास की ओर
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“मरियम मगदलीनी ने जाकर चेलों को बताया, ‘मैं ने प्रभु को देखा, और उसने मुझ से ये बातें कहीं।’” यूहन्ना 20:18

वह क्या है जो डर को विश्वास में बदल डालता है?

यीशु की क्रूस पर मृत्यु के बाद उसके चेले पूरी तरह से टूट चुके थे, और निराश तथा उत्पीड़न के डर से एक साथ इकट्ठे थे। उनमें से एक, यहूदा, पहले ही आत्महत्या करके मर चुका था। एक और, पतरस, दबाव में आकर अपने अगुवा और शिक्षक यीशु को नकार चुका था, जिसे उन्होंने निर्दयता से मारे जाते हुए देखा था। ऐसा लग रह था मानो उनकी आशाएँ और सपने उसी के साथ मर गए थे। फिर भी, कुछ ही सप्ताह बाद ये निराश लोग यरूशलेम की सड़कों पर खड़े होकर साहस के साथ ऐलान कर रहे थे कि यीशु मसीह मृतकों में से जी उठा है। इन लोगों का भयावह डर साहसिक विश्वास में कैसे बदल गया था? क्या हममें भी वही बदलाव आ सकता है? इसका उत्तर केवल मृतकों में से जी उठा यीशु है।

चेलों की यहूदी पृष्ठभूमि ने उन्हें यह विश्वास दिलाया था कि मसीह प्रकट होगा और हमेशा के लिए रहेगा। इस मान्यता के कारण आरम्भ में वे यीशु की मृत्यु से न केवल निराश हो गए थे, बल्कि यह उन्हें प्रतापी विजय के स्थान पर सम्पूर्ण पराजय प्रतीत हो रहा था। किन्तु यीशु की मृत्यु के बाद अब अचानक साहस के साथ यह प्रचार करने का, कि यीशु ही वास्तव में मसीह है, एक ही सम्भव कारण हो सकता था: उन्होंने मृतकों में से जी उठे मसीह को देख लिया था। यदि ऐसा न हुआ होता, तो वे या तो स्नेही भाव से या फिर कटु भाव से केवल इतना ही याद रखते कि यीशु उनका प्यारा शिक्षक था। एक मृत व्यक्ति में कैसी माफी और आशा प्राप्त की जा सकती है? लेकिन मृतकों में से जी उठे मसीह के साथ अब अचानक सब कुछ बदल जाता है।

बाइबल हमें प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ बताती है कि चेलों ने मृतकों में से जी उठे मसीह से मुलाकात की (जैसे यूहन्ना 20:11–21:23 में)। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि चेलों ने उनके ऊपर हावी हो चुके उनके विश्वास के कारण पैदा हुए भ्रम में यीशु को देखा था। लेकिन याद रखें कि आरम्भ में उन्होंने उसके जी उठने पर विश्वास नहीं किया था! वास्तव में, पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि वे बन्द दरवाजों के पीछे डर और निराशा में बैठे थे (20:19)। और यदि उन्होंने मृतकों में से जी उठे और शासन करते हुए मसीह की कल्पना कर भी ली होती, तो वे शायद ऐसे यीशु के बारे में नहीं सोचते, जो झील के किनारे पर मछली पका कर खा रहा था, जिसके शरीर पर क्रूस पर मारे जाने के निशान अभी भी थे, और जो सड़कों पर चलता था और कई तरीकों से उनसे मिलता था। न ही वे खुद को इतने डरपोक व्यक्तियों के रूप में चित्रित करते, और न ही उस समय के समाज में महिलाओं की गवाही को शामिल करते (जिसे उस संस्कृति में मान्य नहीं माना जाता था)। इसके बजाय, वे अपने को बहादुर और प्रमुख व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करते, जो खाली क़ब्र के पहले गवाह थे। खाली क़ब्र के लिए कोई भी वैकल्पिक व्याख्या उस विश्वास से भी अधिक “विश्वास” की माँग करती है, जो हमें परमेश्वर के वचन में प्रकट किया गया है।

पुनरुत्थान सब कुछ बदल देता है। हमें यीशु के मृतकों में से जी उठने के आस-पास के तथ्यों पर विचार करना चाहिए—लेकिन यह हमें जो शानदार शुभ समाचार देता है, उस पर भी हमें विचार करना चाहिए। यीशु के शारीरिक पुनरुत्थान के बिना मसीही आस्था निरर्थक है; “तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है” (1 कुरिन्थियों 15:17)। लेकिन चूंकि यीशु सचमुच मृतकों में से जी उठा है और सचमुच शासन कर रहा है, तो फिर माफी केवल उसी में मिलती है और किसी में नहीं, और आशा केवल उसी में मिलती है और किसी में नहीं। क्या आपने विश्वास की आँखों से प्रभु को मृतकों में से जी उठे हुए और शासन करते हुए देखा है? तो फिर आप, मरियम और चेलों के समान अपने सन्देहपूर्ण डर को विश्वास में बदलते हुए देखेंगे, क्योंकि आप इस आशा को अपने हृदय में और इस डरे हुए संसार में साहसिक रूप से घोषित करेंगे।

यूहन्ना 20:1-18

17 April : येशूला कवटाळणें

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17 April : येशूला कवटाळणें
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देवावर प्रीति करणे म्हणजें त्याच्या आज्ञा पाळणे होय; आणि त्याच्या आज्ञा कठीण नाहींत कारण जे काहीं देवापासून जन्मलेले आहे ते जगावर जय मिळवते; आणि ज्याने जगावर जय मिळवला तो म्हणजें आपला विश्वास. (1 योहान 5:3-4).

लक्ष द्याः देवावर प्रीति करणे हे केवळ त्याच्या आज्ञांचे पालन करणे नव्हे. तर देवावर प्रीति करणे देवासाठीं एका विशिष्ट प्रकारचे अंतःकरण बाळगणे कीं जेणेकरून आज्ञा पाळणे कठीण असणार नाहीं. योहान हेच म्हणतो. पण मग तो हे सत्य प्रीतिच्या संदर्भात न मांडता तो ते नवा जन्म व विश्वास या संदर्भात मांडतो: “जे काहीं देवापासून जन्मलेले आहे ते जगावर विजय मिळवते. म्हणून, नवा जन्म म्हणजें देवाच्या आज्ञा त्याला बोजड वाटत नाहीं आणि आज्ञेचे पालन करतांना जगीक अडचणींवर मात करतो.

आणि शेवटी तो पुढे म्हणतो, “आणि ज्याने जगावर जय मिळवला तो म्हणजें आपला विश्वास“ म्हणून, नवा जन्म भारमुक्त आज्ञापालनाप्रत येणाऱ्या सर्व जगीक अडचणींवर मात करतो, कारण नवा जन्म विश्वासात वाढ करतो. म्हणून, नव्या जन्माचा चमत्कार विश्वास उत्पन्न करतो, अत्यंत संतोषकारक म्हणून ख्रिस्तामध्ये आपल्यासाठीं देव जो काहीं आहे ते स्वीकारतो, जे जगाच्या परीक्षांपेक्षा देवाप्रत आज्ञाधारकतेस अधिक इच्छिण्यायोग्य बनवते. आणि देवावर प्रीति करण्याचा हाच अर्थ आहे.

अठराव्या शतकातील पाळक आणि पवित्र शास्त्राचे विद्वान जोनाथन एडवर्ड्स यांनी या वचनाशी संघर्ष केला आणि असा निष्कर्ष काढला, “तारणदायक विश्वास . . . प्रेम अभिव्यक्त करतो. . . देवावरील आमचे प्रेम आम्हांला देवाच्या आज्ञा पाळण्यात येणाऱ्या अडचणींवर मात करण्याचे सामर्थ्य देते – जे दर्शविते कीं तारणदायक विश्वासात, त्याचे जीवन आणि सामर्थ्य यात प्रेम ही मुख्य गोष्ट आहे, ज्याद्वारे ते मोठे परिणाम घडवून आणतात.”

माझ्या मते एडवर्डचे बरोबर आहे आणि बायबलमधील असंख्य वचने तो जे काहीं म्हणतो त्याचे समर्थन करतात.

असे म्हणण्याची आणखी एक पद्धत ही कीं ख्रिस्तावरील विश्वास देव आमच्यांसाठीं काय आहे याची केवळ सहमती देणेच नाहीं तर तो ख्रिस्तामध्ये आमच्यांसाठीं जो काहीं आहे त्या सर्वांचा स्वीकार करणे देखील आहे. “खरा विश्वास ख्रिस्ताचा त्याप्रकारे स्वीकार करतो ज्या प्रकारे पवित्र शास्त्र दरिद्री पापी लोकांप्रत त्यास सादर करतो” – हे एडवर्ड्सचे दुसरे उद्धरण आहे. हे “कवटाळणे” ख्रिस्तावरील एक प्रकारचे प्रेम आहे – असे प्रेम जे त्याला इतर सर्व गोष्टींपेक्षा अधिक मूल्यवान समजते.

म्हणून, एकींकडें 1 योहान 5:3, जे म्हणते देवासाठीं आमची प्रीति आम्हांला त्याच्या आज्ञांचे पालन करण्यास समर्थ बनविते, आणि दुसरीकडें, 4थे वचन जे म्हणते कीं आमचा विश्वास देवाच्या आज्ञांचे पालन करण्यापासून आम्हास रोखणाऱ्या अडखळणांवर मात करतो, यांत विरोधाभास नाहींच. देव आणि ख्रिस्त ह्यांच्यावर प्रीति विश्वासात गर्भित आहे.

मग योहान आज्ञा पाळणाऱ्या विश्वासाची अशा प्रकारे व्याख्या करतो “येशू देवाचा पुत्र आहे असा विश्वास जो धरतो” (1 योहान 5:5). हा विश्वास वर्तमान येशूला गौरवी दैवी व्यक्ती जो तो आहे असे म्हणून “स्वीकार करतो.” हे फक्त या सत्यास सहमति देणे नव्हे कीं येशू हा देवाचा पुत्र आहे, कारण दुरात्मेसुद्धा हे मान्य करतात. “तेव्हां पाहा, ते ओरडून म्हणाले, “हे येशू, देवाच्या पुत्रा, तू मध्ये का पडतोस? नेमलेल्या समयापूर्वी तू आम्हांला पिडण्यास येथे आला आहेस काय?” (मत्तय 8:29). येशू हा देवाचा पुत्र आहे हा विश्वास करण्याचा अर्थ त्या सत्याचे महत्व – वास्तविकतेचे मूल्य “स्वीकार करणे” होय. याचा अर्थ देवाचा पुत्र म्हणून ख्रिस्तासोबत आणि त्याच्याठायीं देव आमच्यांसाठीं जे काहीं आहे त्यात संतुष्ट होणे होय.

“देवाचा पुत्र” म्हणजें येशू हा त्याच्या पित्याच्या उजवीकडें असलेला विश्वातील सर्वात श्रेष्ठ व्यक्ती आहे. म्हणून, त्यानें जे काहीं शिकवले ते खरे आहे, आणि त्यानें जे काहीं अभिवचन दिलें ते स्थिर राहील आणि आत्म्यास संतुष्ट करणारी त्याची सर्व महानता कधीही बदलणार नाहीं.

म्हणून, तो देवाचा पुत्र आहे हा विश्वास धरणे, या सर्वांवर अवलंबून राहणे, आणि त्यात संतुष्ट होणे होय.

16 अप्रैल : कोई सामान्य मृत्यु नहीं

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16 अप्रैल : कोई सामान्य मृत्यु नहीं
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“जब यीशु ने वह सिरका लिया, तो कहा, ‘पूरा हुआ’; और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिए।” यूहन्ना 19:30

यीशु की मृत्यु के आस-पास की घटनाएँ मुख्य रूप से रोमी न्याय क्षेत्र के लिए सामान्य बात थी।

मुकद्दमे, पिटाई, अपमानजनक जुलूस, और दर्दनाक तरीके से क्रूस पर चढ़ाना, ये सभी अपराधियों को मृत्युदण्ड देने में शामिल सैनिकों के लिए सामान्य कार्य थे। फिर भी, जो सामान्य नहीं था, वह था वह अंधकार जो भरी दोपहर को पूरे घटनाक्रम पर छा गया (मत्ती 27:45), मानो परमेश्वर ने इस दुखद दृश्य पर अपनी आँखें बन्द कर ली हों। यह एक सामान्य मृत्युदण्ड होने के साथ-साथ सम्पूर्ण शाश्वतता में सबसे बड़ा मोड़ भी था।

इसे इतना महत्त्वपूर्ण बनाने वाली बात यह थी कि उस मध्य क्रूस पर लटका हुआ व्यक्ति कौन था: कोई और नहीं, बल्कि स्वयं देहधारी परमेश्वर। हमें इस पर कभी भी आश्चर्यचकित होने से नहीं रुकना चाहिए:

सूरज ने कैसे अंधकार में अपना चेहरा छिपा लिया,

और अपनी महिमा को बन्द कर लिया,

जब मसीह, महान सृष्टिकर्ता, मरा,

मनुष्य के पापों के लिए।[1]

पवित्रशास्त्र क्रूस पर मसीह की शारीरिक पीड़ा पर ज्यादा बल नहीं देता। उसने निश्चित रूप से भयानक शारीरिक दर्द सहा, लेकिन “उसके शरीर की पीड़ा उसके आत्मिक दुखों के सामने कुछ भी नहीं थी; यही उसके दुखों का वास्तविक रूप था।”[2] यीशु ने परमेश्वर पिता से सम्बन्ध के दृष्टिकोण से दूर हो जाने की पीड़ा और दर्द को पूरी तरह से अनुभव किया—शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से। आप अपने जीवन में जो भी अनुभव करते हैं, यह बात जान लीजिए कि यीशु ने इससे भी बुरा अनुभव किया है और इस प्रकार वह समझता है कि आप कैसा महसूस करते हैं। केवल इतना ही नहीं, उसने आपके लिए अकल्पनीय वेदना को भी सहा। जब समय सही आया, तब मसीह ने विजयपूर्वक कहा, “यह पूरा हुआ”—tetelestai : कर्ज चुका दिया गया और अब समाप्त हो चुका है।

मसीह की क्रूस पर मृत्यु को अक्सर ऊँचा उठाए गए क्रूस के साथ दिखाया जाता है, जिसके सामने एक भीड़ खड़ी है। जबकि वास्तविकता में, एक बार जब क्रूस को गड्ढे में खड़ा कर दिया गया था, तो उसके पैर ज़मीन के बहुत करीब रहे होंगे। इसी तरह, मसीह का जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान हमारे जीवन के ऊपर ऊँचा नहीं है, बल्कि हमारे जीवन से नजदीकी रूप से जुड़ा हुआ है। नहीं, यीशु की मृत्यु कोई सामान्य मृत्यु नहीं थी, बल्कि एक ऐसी मृत्यु थी जो विश्वास के माध्यम से सच्चा जीवन देने की प्रतिज्ञा करती है। सब कुछ बदल जाता है, जब हम उस क्रूस पर हुई सभी घटनाओं पर विचार करते हैं और अपने आप से कहते हैं:

मेरे लिए घायल, मेरे लिए घायल,

वह वहाँ क्रूस पर मेरे लिए घायल हुआ;

मेरे पाप समाप्त हो गए, और अब मैं स्वतन्त्र हूँ,

सिर्फ इसलिए क्योंकि यीशु मेरे लिए घायल हुआ।[3]

लूका 22:7-20

16 April : आजच्यासाठीं करुणा

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16 April : आजच्यासाठीं करुणा
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आम्हीं भस्म झालो नाहीं ही परमेश्वराची दया होय, कारण त्याच्या करुणेस खंड पडत नाहीं.ती रोज सकाळी नवी होते; तुझी सत्यता थोर आहे. (विलापगीत 3:22-23).

परमेश्वराची करुणा रोज सकाळी नवी होते कारण दररोज त्या दिवसासाठीं पुरेशी करुणा मुबलक प्रमाणांत उपलब्ध असते. देव प्रत्येक दिवसाचे दुःख ठरवितो. तसेंच देव प्रत्येक दिवसासाठीं करुणा देखील ठरवितो. त्याच्या मुलांच्या जीवनात, दु:ख व करुणा परिपूर्णपणे ठरविण्यात आलेलें आहेंत. येशूनें म्हटलें, ”ह्यास्तव उद्याची चिंता करू नका, कारण उद्याची चिंता उद्याला; ज्या दिवसाचे दुःख त्या दिवसाला पुरे.“ (मत्तय 6:34). ज्या दिवसाचे दुःख त्या दिवसाला पुरे. प्रत्येक दिवशी त्याची दया किंवा करुणा ठरविली आहे. प्रत्येक दिवस दर सकाळी नवा होतो.

परंतु जेव्हां आपल्याला वाटते कीं आजच्या साधनसामुग्रीवर उद्याचा भार आपल्याला सहन करावा लागू शकतो तेव्हां आपण कित्येकदा निराश होतो. देवाला वाटते कीं आपण हे जाणावे कीं असे होणार नाहीं. आजची करुणा आजच्या दुःखांसाठीं आहे. उद्याची करुणा ही उद्याच्या दुःखांसाठीं असणार आहे.

कधीकधी आपण विचार करतो कीं भयंकर परीक्षेत स्थिर उभे राहण्यासाठीं आम्हांवर करुणा केलीं जाईल कीं नाहीं. होय, केलीं जाईल. पेत्र म्हणतो, ”ख्रिस्ताच्या नावामुळे तुमची निंदा होत असल्यास तुम्हीं धन्य आहात; कारण गौरवाचा आत्मा म्हणजें ‘देवाचा आत्मा’ तुमच्यावर येऊन ‘राहिला आहे.’ त्यांच्याकडून त्याची निंदा होते, पण तुमच्याकडून तो गौरविला जातो“ (1 पेत्र 4:14). जेव्हां निंदा होते, तेव्हां गौरवाचा आत्मा येतो. स्तेफनाला दगडमार होत असतांना असे घडले. तुमच्यासाठीं देखील असेंच घडेल. जेव्हां आत्म्याची आणि गौरवाची गरज भासेल, तेव्हां ते येतील.

रानात मान्ना एका दिवसाला एकदाच दिला जात असे. साठवणूक करायची नव्हती. देवाच्या दयेवर आपण अशाच प्रकारे अवलंबून राहिले पाहिजे. उद्याची ओझी उचलण्याचे बळ तुम्हांला आज प्राप्त होणार नाहीं. आजच्या दुःखांसाठीं तुम्हांला करुणा देण्यात आली आहे.

उद्या करुणा नवी होईल. ”ज्याने स्वपुत्र येशू ख्रिस्त आपला प्रभू ह्याच्या सहभागीपणात तुम्हांला बोलावले तो देव विश्वसनीय आहे.“ (1 करिंथ 1:9). 

15 अप्रैल : एक चुनाव

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15 अप्रैल : एक चुनाव
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“पिलातुस ने एक दोष–पत्र लिखकर क्रूस पर लगा दिया, और उसमें यह लिखा हुआ था, ‘यीशु नासरी, यहूदियों का राजा।’” यूहन्ना 19:19

जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया, तो उसके क्रूस के ऊपर एक दोष-पत्र लिखकर लगाया गया, जिसमें उसे “यहूदियों का राजा” घोषित किया गया। यद्यपि यह दोष-पत्र एक व्यंग्य के रूप में लगाया गया था, तौभी यह एक सत्य को प्रकट कर रहा था, जिसे सभी देख पा रहे थे: यीशु वास्तव में एक राजा था और आज भी राजा है! फिर भी हमें स्वयं से यह सवाल पूछना चाहिए: क्या मैं सच में अपना जीवन ऐसे जीता हूँ जैसे यीशु मेरे  जीवन का राजा है?

पवित्रशास्त्र बताता है कि यह दोष-पत्र तीन भाषाओं में लिखा गया था—अरामी में, जो पहली सदी में यरूशलेम में और उसके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले अधिकांश यहूदियों की भाषा थी; लातिनी में, जो रोमी साम्राज्य की आधिकारिक भाषा थी; और यूनानी में, जो व्यापार और संस्कृति की लोकप्रिय भाषा थी (यूहन्ना 19:20)। इन तीन भाषाओं में, उस समय के ज्ञात संसार के गवाहों को यह पढ़ने का अवसर मिला कि यीशु राजा है। इस चिह्न को पढ़ने के बाद सारे संसार को यह निर्णय करना पड़ा कि यीशु उनके लिए कौन था।

हम यीशु की मृत्यु की कहानी में लोगों के विभिन्न रूपों में उस संसार का और हमारे अपने संसार का एक छोटा सा दृष्टिकोण देखते हैं। पिलातुस में हम गर्वीले, संकोची और गणनात्मक राजनेता को देखते हैं। उन सैनिकों में जो यीशु को क्रूस पर कीलों से जड़ रहे थे, हम उन्हें देखते हैं जो अपने नियमित कारोबार को अंजाम देने में लगे हुए हैं। उन लोगों में जो प्रभु का उपहास कर रहे थे, हम ऐसे लोगों को देखते हैं, जिनका ईश्वर से सम्पर्क सिर्फ इतना है कि वे उसका मजाक उड़ाते हैं। दर्शकों की उस भीड़ में, हम उन लोगों को देखते हैं जिनकी किसी भी शाश्वत बात में कोई रुचि नहीं है। लेकिन फिर, अंधेरे के बीच, पास के एक क्रूस पर हम एक निराश और मरते हुए चोर को देखते हैं, जो उद्धारकर्ता की ओर आशा से देखता है—और उसे पा लेता है। और यीशु के पास खड़े उसके परिवार और दोस्तों में हम शोकित लेकिन वफादार अनुयायी देखते हैं, जो मसीह और उसके दावों के साथ खड़े हैं—और जो उसके शव को एक कब्र में रखा जाते हुए देखते हैं, जो जल्द ही खाली होने वाली थी।

इन सभी लोगों ने उस चिह्न को देखा: “यीशु नासरी, यहूदियों का राजा।” सभी ने उस चिह्न के नीचे क्रूस पर उस व्यक्ति को भी देखा। चाहे घृणा से या आशा से, सभी ने इस ऐतिहासिक घटना को देखा, और उन सभी को इसके और मसीह के व्यक्तित्व के प्रकाश में अपने जीवन को देखना था। जैसे वह चिह्न मसीह के राजत्व की घोषणा करता था, वैसे ही यीशु संसार के सर्वाधिक शक्तिशाली प्रेम की घोषणा कर रहा था।

सवाल अब भी बना हुआ है: हम इस प्रेम के साथ क्या करेंगे? हममें से प्रत्येक व्यक्ति उस भीड़ में उपस्थित चेहरों में से किसी एक के समान है, चाहे वह गर्वीला हो, निष्क्रिय हो, या वफादार हो। हम सभी को यीशु मसीह के जीवन बदलने वाले व्यक्तित्व से सामना करना पड़ता है।

क्रूस और खाली कब्र आपके रिश्तों, आपके काम, आपके उद्देश्य या आपकी पहचान को कैसे प्रभावित करते हैं? यदि यीशु आप पर राज्य करता है, तो उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान आपके जीवन जीने के तरीके और आपके जीवन के अर्थ को पूरी तरह से बदल देता है। इस व्यक्ति को देखने और उस चिह्न से सहमत हो जाने से हमें अनन्तकाल के लिए आशा और आज के लिए उद्देश्य मिल जाते हैं। “यीशु राजा है”—यहूदियों और अन्यजातियों का राजा, सारे संसार का राजा, और आपके तथा मेरे जीवन का राजा।

लूका 23:32-56

15 April : खेचरासारखे होऊ नका

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15 April : खेचरासारखे होऊ नका
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निर्बुद्ध घोडा किंवा खेचर ह्यांसारखे होऊ नका; त्यांना आवरण्यासाठीं लगाम व ओठाळी अशी सामग्री पाहिजे, नसली तर ती तुझ्याजवळ येणार नाहीं.” (स्तोत्र 32:9).

असे कल्पनाचित्र रंगवा कीं देवाचे लोक सर्व प्रकारच्या प्राण्यांचे खळे आहे. देव त्याच्या प्राण्यांची काळजी घेतो, त्यांना कोठे जायचे आहे ते दाखवतो, आणि त्यांच्या जीवनासाठीं धान्याचे कोठार बांधतो.

परंतु प्राण्यांच्या ह्या खळ्यांत एक जनावर आहे जे देवाला भयंकर त्रास देते, ते म्हणजें खेचर. ते मूर्ख आहे आणि ते हट्टी आहे आणि यांपैकीं कोणता अवगुण प्रथम आहे हे तुम्हीं ओळखू शकत नाहीं – हट्टीपणा कीं मूर्खपणा.

आता देव ज्या प्रकारे त्याच्या प्राण्यांना अन्न देण्यासाठीं आणि त्यांना निवारा देण्यासाठीं कोठारात नेतो ते हे शिकवून कीं त्यांना सर्वांना एक वैयक्तिक नाव आहे आणि नंतर त्यांना नावाने हाक मारणे.  ”मी तुला बोध करीन; ज्या मार्गाने तुला गेले पाहिजे त्याचे शिक्षण तुला देईन” (स्तोत्र 32:9).

पण खेचर त्या प्रकारच्या बोधाला किंवा मार्गदर्शनाला प्रतिसाद देणार नाहीं. त्याला समज नाहीं. म्हणून देव त्याच्या पिक-अप ट्रकमध्ये बसतो आणि शेतात जातो, खेचराच्या तोंडात ओठाळी आणि लगाम घालतो, त्याला ट्रकला जुंपतो आणि त्याला ओडत खळ्यात नेतो जेथे तो ताठ पायांनी आणि फुरफुरत जातो.

देवाची अशी पद्धत नाहीं कीं त्याच्या प्राण्यांनी त्याच्याकडें आशीर्वाद आणि संरक्षणासाठीं अशाप्रकारे यावे.

पण एक दिवस असा येईल जेव्हां त्या खेचराला खूप उशीर झालेंला असेल. त्याच्यावर गारांचा वार होणार आहे आणि विजेचा कडकडाट होणार आहे, आणि जेव्हां तो धावत येईल तेव्हां खळ्याचे दार बंद झालेंलें असेल.

म्हणून, खेचरांसारखे होऊ नका. “निर्बुद्ध घोडा किंवा खेचर ह्यांसारखे होऊ नका; त्यांना आवरण्यासाठीं लगाम व ओठाळी अशी सामग्री पाहिजे, नसली तर ती तुझ्याजवळ येणार नाहींत.”

त्याऐवजी, देव पावण्याची संधी आहे तोच प्रत्येक भक्ताने त्याला प्रार्थना करावी (स्तोत्र 32:6).

खेचरासारखे न होणें म्हणजें स्वतःला नम्र करणे, प्रार्थनेत देवाकडें येणे, आपली पापे कबुल करणे आणि शेतातील गरजू लहान पिल्लांप्रमाणे त्याच्या संरक्षणाच्या आणि तरतूदीच्या खळ्यात जाण्यासाठीं देवाचे मार्गदर्शन स्वीकारणे.

14 अप्रैल : कायरतापूर्ण समझौता

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14 अप्रैल : कायरतापूर्ण समझौता
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“जब प्रधान याजकों और प्यादों ने उसे देखा, तो चिल्लाकर कहा, ‘उसे क्रूस पर चढ़ा, क्रूस पर!’ पिलातुस ने उनसे कहा, ‘तुम ही उसे लेकर क्रूस पर चढ़ाओ, क्योंकि मैं उसमें कोई दोष नहीं पाता।’ यहूदियों ने उसको उत्तर दिया, ‘हमारी भी व्यवस्था है और उस व्यवस्था के अनुसार वह मारे जाने के योग्य है, क्योंकि उसने अपने आप को परमेश्‍वर का पुत्र बनाया।’ जब पिलातुस ने यह बात सुनी तो और भी डर गया।” यूहन्ना 19:6-8

आप किसकी प्रशंसा के लिए जीएँगे?

जब पिलातुस के सामने मसीह पर मुकद्दमा चलाया गया, तो रोमी राज्यपाल ने बार-बार उसकी निर्दोषता की घोषणा तो की, किन्तु इस घोषणा के बावजूद उसने यीशु के खिलाफ भयानक कृत्य किए।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—और फिर यीशु को बर्बर तरीके से कोड़े मारे जाने के लिए सौंप दिया, एक ऐसी मार जो इतनी भयंकर होती थी कि कभी-कभी इससे नसें, धमनियाँ और आन्तरिक अंग बाहर आ जाते थे।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—और फिर सैनिकों को अनुमति दी कि वे यीशु का मजाक उड़ाने के लिए उसे एक दिखावटी राजगद्दी पर बैठाएँ, उसके सिर पर काँटों का मुकुट रखें, उसे एक राजा जैसे कपड़े पहनाएँ और उसका उपहास करते हुए उसके आगे “दण्डवत” करें।

पिलातुस ने कहा, “मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता”—लेकिन क्या उसने यीशु को रिहा किया? नहीं, उसने यीशु को मृत्युदण्ड देने वाले एक निर्दयी दस्ते के हवाले कर दिया।

पिलातुस सम्भवतः मसीह से मिलने वाला ऐसा व्यक्ति था, जो सबसे अधिक पीड़ित था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जिसके पास बड़ी ताकत तो थी, लेकिन जो अपनी कायलता पर खड़ा होने का साहस नहीं रखता था। वह एक ऐसा व्यक्ति था, जिसने बड़ी सफलता तो हासिल की थी, लेकिन जिसने अपने पद की शोभा में समझौता किया था और खुद को एक कायर के रूप में दिखाया था। वह एक ऐसा राज्यपाल था, जो अपनी खुद की कमजोरियों के अधीन था।

हम इस बारे में निष्क्रिय या उदासीन नहीं हो सकते कि मसीह हमारे लिए कौन है। क्या वह उद्धारकर्ता हैं या क्या वह कोई नहीं हैं? पिलातुस के समान यह फैसला लेने से बचने का अर्थ है कि हम मसीह को पूरी तरह से अनदेखा कर रहे हैं।

पिलातुस हमारे लिए एक चुनौती के रूप में खड़ा है। उसका आचरण हमें यह पूछने के लिए मजबूर करता है: किन परिस्थितियों में मैं, पिलातुस की तरह, जानता हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए, फिर भी मैं डरता हूँ कि यदि मैंने ऐसा किया तो लोग क्या कहेंगे? क्या मेरे शब्द या आचरण उन लोगों की अपेक्षाओं और प्रतिक्रियाओं, या सम्पत्ति, स्थिति, या पदोन्नति के विचारों से अधिक प्रभावित हैं, बजाय इसके कि वे मसीह के आदेशों से प्रभावित हों?

आइए हम मसीह के बारे में अपने दृष्टिकोण पर समझौता न करें। यदि हम अपने साथियों, पड़ोसियों या परिवार की राय की चिन्ता में बहुत ज्यादा खो जाते हैं, तो हो सकता है कि हम पाएँ कि हम माफी, शान्ति, स्वर्ग और स्वयं मसीह को त्याग कर एक आसान जीवन चुन रहे हैं। इसके बजाय, आइए हम साहस दिखाएँ।

फिर से मसीह को देखें: पीटा गया, उपहासित हुआ, और आपके लिए प्रेम के कारण मारा गया। फिर उन लोगों को देखें, जो शायद विरोध के साथ या शायद शालीनता के साथ उसके सत्य का मजाक उड़ाते हैं। आप किसे नाराज करना चाहेंगे? आप किसकी “शाबाशी” को सुनना चाहेंगे?

मसीह हमें अपने पास बुला रहा है, ताकि हम जाएँ और उसके लिए जीएँ। क्या आप आएँगे, और क्या आप जाएँगे?

यूहन्ना 19:1-16