5 नवम्बर : उसके उठे हुए हाथ

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5 नवम्बर : उसके उठे हुए हाथ
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“तब वह उन्हें बैतनिय्याह तक बाहर ले गया, और अपने हाथ उठाकर उन्हें आशीष दी; और उन्हें आशीष देते हुए वह उनसे अलग हो गया और स्वर्ग पर उठा लिया गया।” लूका 24:50-51

यीशु के पृथ्वी पर के आगमन को उसके प्रस्थान की ओर बढ़ती हुई यात्रा के रूप में समझा जा सकता है; स्वर्ग छोड़कर पृथ्वी पर बालक बनकर जन्म लेने के बाद उसने मनुष्य के रूप में जीवन बिताया, शिक्षा दी, चमत्कार किए, लोगों को अपने पीछे चलने के लिए बुलाया, उनके उद्धारकर्ता के रूप में मरा, फिर जीवित हुआ—और फिर, ठहराए हुए समय पर, पिता के पास और महिमा में लौट गया। एक अर्थ में, यही वह क्षण था जिसकी ओर सब कुछ अग्रसर था।

पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से सिखाता है कि यीशु के प्रस्थान का क्षण अनादिकाल में ठहराया गया था (1 पतरस 1:19-20)। उदाहरण के लिए, लूका हमें बताता है कि जब यीशु “प्रार्थना करने के लिए पहाड़ पर गया” (लूका 9:28), तब दो पुरुष, मूसा और एलिय्याह, “महिमा सहित दिखाई दिए और उसके मरने की चर्चा कर रहे थे, जो यरूशलेम में होने वाला था” (पद 31)। आगे इसी अध्याय में हम पढ़ते हैं कि “जब उसके ऊपर उठाए जाने के दिन पूरे होने पर थे,” तो यीशु ने “यरूशलेम जाने का विचार दृढ़ किया” (पद 51)। यीशु के प्रस्थान का समय और रीति दोनों परमेश्वर द्वारा हमारे भले और उसकी महिमा के लिए ठहराए गए थे।

हमें इस तथ्य से प्रोत्साहन मिलना चाहिए कि यीशु निश्चयपूर्वक विदा हुआ। यदि उसके पुनरुत्थान के बाद उसका प्रकट होना धीरे-धीरे कम होता गया होता और फिर समाप्त हो गया होता, तो किसी को वास्तव में पता न चलता कि क्या हो रहा है। भ्रम, अव्यवस्था और फूट छा जाती। परन्तु इसके विपरीत, जैसा हम पढ़ते हैं, यीशु अपने चेलों के सामने दृश्यमान रूप से स्वर्ग में उठा लिया गया, जिससे किसी को भी यह सन्देह न रहा कि उसने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है।

प्रस्थान करते समय यीशु ने अपने हाथ उठाकर उन्हें आशीष दी। वे प्रारम्भिक विश्वासी इस संकेत को उस प्रकार समझते थे, जैसा आज हममें से अधिकांश नहीं समझते। उस समय, प्रतिष्ठा और महत्त्व वाले लोगों के लिए केवल बाहर निकल जाना प्रचलित नहीं था, बल्कि वे अपने संरक्षण में रहने वालों को आशीष देते थे। इसलिए यीशु के चेलों के लिए यह अत्यन्त अर्थपूर्ण और गहराई से आश्वस्त करने वाला रहा होगा कि उन्होंने अपने प्रिय गुरु को अन्तिम बार इसी परिचित संकेत के साथ देखा। वह अब उनके साथ नहीं रहने वाला था; परन्तु उसकी आशीष उनके साथ रहेगी। वे उसकी देखभाल में रह रहे उसके लोग थे, जबकि वह स्वर्ग से राज्य करने के लिए लौट रहा था।

हमारा प्रभु कितना अद्‌भुत है, जिसने पहले क्रूस पर कीलें ठुकवाने के लिए अपने हाथ उठाए, और अब अपने लोगों को आशीष देने के लिए अपने हाथ उठाता है। हमारे माँगने से अधिक यीशु हमें आशीष देने के लिए तत्पर है। ऐसा करना उसे पसन्द है। क्या आप मसीह के बारे में ऐसा ही सोचते हैं कि आपके जीवन को आशीषित करने के लिए उसने अपने हाथ उठाए हुए हैं? आप ऐसा सोच सकते हैं और आपको सोचना भी चाहिए!

  गिनती 6:24-26

◊ पूरे वर्ष में सम्पूर्ण बाइबल पढ़ने के लिए: हबक्कूक; कुलुस्सियों 3

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