“क्योंकि हर एक महायाजक मनुष्यों में से लिया जाता है और मनुष्यों ही के लिए उन बातों के विषय में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, ठहराया जाता है कि भेंट और पाप बलि चढ़ाया करे . . . यह आदर का पद कोई अपने आप से नहीं लेता, जब तक कि हारून के समान परमेश्वर की ओर से ठहराया न जाए। वैसे ही मसीह ने भी महायाजक बनने की बड़ाई अपने आप से नहीं ली, पर उसको उसी ने दी, जिसने उससे कहा था, ‘तू मेरा पुत्र है, आज मैं ही ने तुझे उत्पन्न किया है’; इसी प्रकार वह दूसरी जगह में भी कहता है, ‘तू मलिकिसिदक की रीति पर सदा के लिए याजक है।’” इब्रानियों 5:1, 4-6
याजक पद और बलिदान पद्धति की अवधारणा हमारे समकालीन संसार से बहुत भिन्न है, किन्तु इसे समझना मसीही जीवन का आधार है। पुराने नियम के इस्राएल में पशु बलि की प्रथा कोई मानव निर्मित व्यवस्था नहीं थी जिसे परमेश्वर तक पहुँचने और मनुष्यों को उसके लिए स्वीकार्य बनाए जाने के निरर्थक प्रयास के रूप में ठहराया गया था। इसके विपरीत, इसका उद्देश्य परमेश्वर के वाचा के लोगों को उसके चरित्र, उसकी अपेक्षाओं और उसके छुटकारे की योजना की भव्यता को समझने में सहायता करना था (और वह आज भी इस तरह से हमारी सहायता कर सकती है)। इसके सभी सूक्ष्म विवरणों के द्वारा परमेश्वर अपने लोगों को प्रभु यीशु मसीह के पूर्ण और सिद्ध कार्य की ओर इंगित कर रहा था, जो उसके लोगों का महान महायाजक और उनकी ओर से चढ़ाए जाने वाले एक सिद्ध बलिदान दोनों के रूप में आने वाला था।
ऐतिहासिक रूप से इस्राएल का महायाजक मूसा के भाई हारून की वंशावली से आया होगा और उसे “अपने भाइयों में प्रमुख” माना जाता होगा (लैव्यव्यवस्था 21:10)। इस व्यक्ति ने उन्हीं सामाजिक परिस्थितियों, दबावों और परीक्षणों का अनुभव किया होगा, जिनका वह प्रतिनिधित्व कर रहा था जिससे उसे उनकी ओर से एक अति-करुणामय मध्यस्थ बनने में सहायता मिली होगी।
तथापि यीशु के आगमन से बहुत पहले हेरोदेस महान और अन्य शासकों ने महायाजकीय नियुक्तियों का ऐतिहासिक रूप भ्रष्ट कर दिया था, जो अपने लिए महायाजकों का चयन स्वयं किया करते थे। वे यह नहीं समझते थे कि महायाजक का पद मनुष्य द्वारा दिया जाने वाला कोई सम्मान नहीं होता अपितु परमेश्वर की ओर से एक बुलावा होता है, जैसा कि हारून के लिए ठहराया गया था। महायाजकों का काम किसी राजनीतिक समूह का प्रतिनिधित्व करना नहीं था; उनका कार्य था परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व स्वयं परमेश्वर के सामने करना।
यही एक कारक है जो यीशु को सबसे उत्कृष्ट महायाजक बनाता है: उसके महायाजक बनने की महिमा में उसकी पहल सम्मिलित नहीं थी; इसके विपरीत, उसे उसके पिता द्वारा ठहराया गया था। उसने स्वीकार किया कि “यदि मैं आप अपनी महिमा करूँ, तो मेरी महिमा कुछ नहीं; परन्तु मेरी महिमा करने वाला मेरा पिता है, जिसे तुम कहते हो कि ‘वह तुम्हारा परमेश्वर है’” (यूहन्ना 8:54)। उसने उन्हीं कठिनाइयों को सिद्धता के साथ सहन किया जिनका हम सामना करते हैं। पापरहित होने के बाद भी वह हमारे पापों के कारण सर्वशक्तिमान परमेश्वर के समक्ष गया। दीनता की आत्मा में होकर यीशु हमें धार्मिकता की ओर प्रेरित करता है। क्योंकि उसने वास्तव में सिद्ध बलिदान चढ़ाया, क्योंकि वह स्वयं सिद्ध बलिदान था, इस कारण आप और मैं अभी और सदा के लिए परमेश्वर की उपस्थिति का आनन्द उठा सकते हैं। कोई भी पाप या पीड़ा, कोई भी निराशा या हताशा, इस महिमामय वास्तविकता को नहीं बदल सकती कि आपके पास सदा के लिए एक याजक है, और इसलिए आपके पास सदा के लिए उसके साथ एक स्थान है।
इब्रानियों 4:14-5:10