“मुझे नाओमी न कहो, मुझे मारा कहो, क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुख दिया है। मैं भरी पूरी चली गई थी, परन्तु यहोवा ने मुझे छूछी करके लौटाया है। इसलिए जब कि यहोवा ही ने मेरे विरुद्ध साक्षी दी, और सर्वशक्तिमान ने मुझे दुख दिया है, फिर तुम मुझे क्यों नाओमी कहती हो?” रूत 1:20-21
जब नाओमी मोआब में अपने पति और बेटों की कब्रों को पीछे छोड़कर बैतलहम लौटी, तो हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं कि वह अपने परिचित स्थानों और चेहरों के पास आकर कितना दर्द और शोक महसूस कर रही होगी। कौन सी सोच और यादें उसके सामने आई होंगी? ओह, मेरी पड़ोसन कैसी होगी, और ये तो उसके बेटे होंगे। देखो, वे बड़े हो गए हैं! मैं अपने बेटों को यहाँ लाया करती थी। यह वह रास्ता है जहाँ एलीमेलेक और मैं चलते थे. . .
जब उसकी स्थिति पर कड़वाहट छाने लगी, तो नाओमी ने, जिसके नाम का अर्थ “मनोहर” है, यह निर्णय लिया कि उसके लिए अधिक उपयुक्त नाम “मारा” है, जिसका अर्थ है “कड़वाहट।” उसने अपने जीवन की चुनौतियों को अनदेखा करके यह साबित करने की कोशिश नहीं की कि सब कुछ ठीक है। ऐसा करना ईमानदारी नहीं होता—यह उसकी थियोलॉजी के साथ विश्वासघात और उन परिस्थितियों के मध्य में उसके विश्वास का अपमान होता, जिसे भजन लेखक विलियम कूपर ने “एक कुपित हृदय के लिए किया गया प्रावधान” कहा था।[1]
नाओमी की स्थिति इस तथ्य को उजागर करती है कि परमेश्वर के लोगों के लिए भी जीवन में कुछ दर्द असहनीय लग सकता है, कुछ परिस्थितियाँ अन्यायपूर्ण प्रतीत हो सकती हैं, और कुछ प्रश्न बिना उत्तर के रह सकते हैं। उसकी प्रतिक्रिया एक सवाल उठाती है: जब शोक हमारे जीवन में आता है, तो हम क्या करेंगे? दुख की वास्तविकता मसीही लोगों के लिए एक समस्या है, लेकिन यह बाकी सभी लोगों के लिए भी तो एक समस्या है। सभी लोगों को दर्द की समस्या से जूझना पड़ता है। नास्तिक लोग इसका सामना सन्तोषजनक रूप से नहीं कर पाते, क्योंकि यदि परमेश्वर नहीं है, तो हम बस एक भाग्य के सहारे जी रहे हैं, जहाँ सब कुछ बस अपने आप घटित होता रहता है। लेकिन मसीही लोग यह सवाल कर सकते हैं—बल्कि हमें यह सवाल करना भी चाहिए—“इस परिस्थिति में परमेश्वर कहाँ हैं?”
नाओमी की ईमानदार भावना की अभिव्यक्ति उसकी थियोलॉजी से मेल खाती है। जो कुछ हुआ था, उसे वह संयोग नहीं मानती, बल्कि वह परमेश्वर के हाथ को काम करते हुए देखती और स्वीकार करती है। वह घोषणा करती है कि परमेश्वर उसके दर्द के बीच में सही है; वह उसे “शद्दाई,” “सर्वशक्तिमान,” सब कुछ प्रबन्ध करने वाला और सुरक्षा देने वाला परमेश्वर कहती है। शद्दाई का क्या अर्थ है? यह परमेश्वर का वह गुण है जिसका अर्थ है कि वह तब सबसे अच्छा होता है जब हम सबसे बुरे होते हैं।[2] नाओमी ने अकाल, हानि, शोक, सन्देह और जुदाई का सामना किया था—लेकिन क्योंकि वह परमेश्वर को शद्दाई के रूप में जानती थी, इसलिए वह इन कड़वे अनुभवों की व्याख्या और जिम्मेदारी को उसे सौंप सकती थी।
जब लहरें थपेड़े मारती हैं, जब पहिए सड़क से नीचे उतर जाते हैं, जब सब कुछ उलझ जाता है, तो आप कहाँ जाते हैं? आपको इस ज्ञान की ओर आना है कि परमेश्वर कौन है और वह अपने लोगों के साथ कैसे व्यवहार करता है। यह एक दृढ़ नींव है, जिस पर हमें खड़ा होना है। हम और कहाँ जा सकते हैं?
जब नाओमी ने बैतलहम छोड़ा, तो वहाँ अकाल था। जब वह लौटी, तो वहाँ फसल थी। शोक के बादलों के बीच उम्मीद की रौशनी फूटने लगी, क्योंकि परमेश्वर ने नाओमी और रूत के लिए प्रचुरता से प्रावधान करने के लिए मंच तैयार किया हुआ था। जब परमेश्वर काम कर रहा होता है, तो निराशा भी नए प्रारम्भ और नए अवसरों के लिए द्वार बन सकती है। एक दिन वह सारे अंधकार को समाप्त कर देगा। परमेश्वर आपका शद्दाई है। आपकी ज़िन्दगी के किस हिस्से में आज आपको यह सुनने की आवश्यकता है? और आपके आस-पास कौन है जिसे आपको यह सन्देश साझा करने की आवश्यकता है?
रूत 1