“रूत बोली, ‘तू मुझ से यह विनती न कर, कि मुझे त्याग या छोड़कर लौट जा; क्योंकि जिधर तू जाए उधर मैं भी जाऊँगी; जहाँ तू टिके वहाँ मैं भी टिकूँगी; तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा।’” रूत 1:16
हमारे जीवनभर ऐसे क्षण आते हैं जो एक निर्णय की माँग करते हैं। और जैसा कि पासबान और लेखक रिको टाइस कहते हैं, “हम वह बन जाते हैं जो हम चुनाव करते हैं।”[1]
मोआब में अपने पति और दोनों बेटों को दफनाने की तिहरी त्रासदी का सामना करने के बाद नाओमी ने बैतलहम में अपने घर लौटने का निर्णय लिया। तौभी उसने अपनी बहुओं, रूत और ओर्पा, को मजबूर नहीं किया कि वे उसके साथ लौटें, बल्कि उन्हें अपनी मातृभूमि मोआब में रहने, अपने परिवारों के पास लौटने, पुनर्विवाह करने और भरपूर जीवन जीने का आग्रह किया (रूत 1:8-9)। रूत और ओर्पा के सामने अचानक एक जीवन-परिवर्तनकारी निर्णय आ खड़ा हुआ।
इन तीन महिलाओं के जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। उन्होंने एक साथ जीवन बिताया था, एक साथ हानि का अनुभव किया था, एक साथ शोक किया था और एक साथ रोया था। अन्ततः, ओर्पा ने अपने स्वदेश में ही रहने का चुनाव किया, जबकि रूत ने नाओमी के साथ बैतलहम जाने का निर्णय लिया। मूल रूप से, ओर्पा ने वही किया जो अपेक्षित था और समझदारी से भरा था। दूसरी ओर, रूत ने स्वदेश को छोड़ कर अनजान देश जाने को चुना। उसने पुनर्विवाह की सम्भावना को छोड़कर अपनी बूढ़ी, बेसहारा सास के साथ रहने का निर्णय लिया।
रूत जानती थी कि उसका निर्णय परिचितता, सुरक्षा या सम्बन्धों के दृष्टिकोण से प्रभावित नहीं होना चाहिए। यह पल उसके जीवन और उसके भाग्य को आकार देने वाला था। मोआब में रहना का मतलब था कि वह अपने समुदाय के झूठे देवताओं के साथ रहेगी और अपना सब कुछ त्याग कर नाओमी द्वारा जाने गए अब्राहम, इसहाक और याकूब के परमेश्वर की ओर मुड़ेगी। नाओमी का परमेश्वर अब रूत का परमेश्वर बन चुका था। यही कारण है कि उसने नाओमी के पास रहने का निर्णय लिया।
रूत द्वारा बैतलहम के मार्ग में लिया गया निर्णय हमारे लिए निर्णय की उस घाटी की ओर इशारा करता है, जिसमें खड़े होने का बुलावा यीशु हम सभी को देता है: क्या तुम मेरे चेले बनना चाहते हो, या क्या तुम उस ज़िन्दगी की ओर लौट जाना चाहते हैं जिसे तुम पहले से जानते हो? वह कौन है जो अपने पिता और माता और जो कुछ भी वह जानता है, जो सारी स्थिरता और सुरक्षा का प्रतीक है, सभी को मेरे लिए छोड़ देगा? (लूका 14:26 देखें)। क्या हम पूरे आत्मविश्वास से मसीह को यह कह सकते हैं, “जहाँ तुम जाओगे, मैं जाऊँगा”? क्या हम यह घोषणा कर सकते हैं, “हालाँकि आगे का रास्ता अपरिचित और अप्रिय है, फिर भी मैं अनुसरण करूँगा”?
यह ऐसा निर्णय नहीं है, जो हम केवल उद्धार के क्षण में करते हैं। हम इसे अपने जीवन के हर दिन करते हैं: क्या हम अपने पुराने, पापी मार्गों की ओर लौटेंगे, या क्या हम सत्य के मार्ग का अनुसरण करते रहेंगे? क्या हम परमेश्वर का अनुसरण करने और उसकी प्रजा की सेवा करने के लिए बलिदान करेंगे और जोखिम उठाएँगे? रूत का यह साहसी और विश्वासपूर्ण उत्तर इस निर्णायक विकल्प पर हमारे लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जब हम यह विचार करते हैं कि हमें कौन से डिग्री प्राप्त करनी चाहिए, कौन से पेशे का चयन करना चाहिए, अपना समय कैसे और किसके साथ बिताना चाहिए, हमारे पास कितना पैसा है और हमें इसका प्रबन्ध कैसे करना चाहिए, या हम कहाँ रहेंगे और सेवा करेंगे। ऐसे निर्णय, सही तरीके से किए गए निर्णय, हमें अलग बनाएँगे—जैसे यीशु मसीह का अनुसरण करने के लिए बिना किसी शंका के समर्पित होने का निर्णय, जिसमें हम सचमुच भरपूर जीवन पाते हैं (यूहन्ना 10:10)।
मरकुस 8:27-38