31 जनवरी : लज्जित न हो

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31 जनवरी : लज्जित न हो
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“हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझसे जो उसका कैदी हूँ, लज्जित न हो, पर उस परमेश्‍वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा जिसने हमारा उद्धार किया और पवित्र बुलाहट से बुलाया, और यह हमारे कामों के अनुसार नहीं; पर उसके उद्देश्य और उस अनुग्रह के अनुसार है जो मसीह यीशु में सनातन से हम पर हुआ है।”  2 तीमुथियुस 1:8-9

स्वामी के कारण, स्वामी के सेवकों के कारण और स्वामी के सन्देश के कारण लज्जित होना एक बहुत ही सहज बात है। इसलिए यह सुनना एक बड़ी चुनौती है कि पौलुस कैसे तीमुथियुस को और हमें “लज्जित न होने” के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

पश्चिमी संस्कृति में धर्म, परमेश्वर और आत्मिकता के बारे में अस्पष्ट बातचीत व्यापक रूप से सहनीय मानी जाती है; हम कई बार कई तरह के अस्पष्ट कथनों को सुनते या पढ़ते हैं, जो सुसमाचार के साथ शिथिल रूप से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। तथापि समाज के मानकों के अनुसार यह पूर्ण रूप से अस्वीकार्य है कि यीशु मसीह के अतिरिक्त किसी और के द्वारा उद्धार नहीं है। यदि हम पतरस के साथ यह दावा करने के लिए तैयार हैं कि “स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों के काम 4:12), तो यहाँ पौलुस के तीमुथियुस को लिखे शब्द हमारे लिए भी उपयुक्त होंगे कि “सुसमाचार के लिए मेरे साथ दुख उठा।”

सुसमाचार के लिए दुख उठाने के विशेषाधिकार में सम्मिलित होने के लिए पौलुस का निमन्त्रण, एक अर्थ में, हमें परेशान करने वाला है। यह हमारे समय के मसीही जयवन्तवाद के बिल्कुल विपरीत है, जो सदैव मसीही जीवन को भव्य तरीके से प्रस्तुत करना चाहता है। इस कारण बहुत से लोग केवल चंगा करने, चमत्कार करने और अपने लोगों को जीत की ओर ले जाने वाले परमेश्वर के सामर्थ्य की पुष्टि करना और स्वीकार करना चाहते हैं। तथापि, बाइबल और मानवीय अनुभव हमें बताते हैं कि—मृत्यु को परम चंगाई के रूप में अलग करके—जिन लोगों के लिए हमने प्रार्थना की है, उनमें से अधिकांश लोग पीड़ा में बने रहेंगे और कठिन दिनों में जीवन बिताएँगे। हमें सच बताना चाहिए। जॉन न्यूटन के शब्दों में, मसीही व्यक्ति को “बहुत सी विपत्तियों, कठिन कार्यों और प्रलोभन के फन्दों से होकर जाना होगा”[1] निकट भविष्य में हमारे लिए और भी परीक्षाएँ प्रतीक्षा कर रही हैं, विशेषकर यदि हमें पृथ्वी के अन्त तक सुसमाचार प्रचार करने के बुलावे के प्रति विश्वासयोग्य रहना है (प्रेरितों के काम 1:8)।

तो फिर हम सुसमाचार के लिए पीड़ा में कैसे स्थिर बने रहें? परमेश्वर के अनुग्रह के द्वारा मिलने वाला परमेश्वर का सामर्थ्य ही हमें अन्त तक स्थिर बनाए रखता है। न्यूटन के गीत के बोल इस वास्तविकता को बतलाते हैं, “अनुग्रह ही है जो मुझे अब तक सुरक्षित लाया है, और अनुग्रह ही मुझे घर ले जाएगा।” यह एक अद्‌भुत सत्य है!

परमेश्वर ने आपको बचाया है और वही आपको पीड़ा के समय में दृढ़ता से थामे रख सकता है। परमेश्वर ने आपको नियुक्त किया है और जब आपको उसके बारे में सच्चाई की साक्षी देने के लिए बुलाया जाए, तो वही आपको हियाव दे सकता है। उसके सम्भालने वाले सामर्थ्य की सच्चाई आपके हृदय में हलचल उत्पन्न कर सकती है और आपके जीवन को बदल सकती है। कठिन और सन्देह से भरे दिनों में आप अपनी आत्मा के लिए एक गढ़ के रूप में इस वास्तविकता को थामे रह सकते हैं। और जब आप उस स्वामी, उसके सेवकों या उसके सन्देश के लिए खड़े होने से पीछे हटने के लिए प्रलोभित हो रहे हों, तो जैसे ही आप बोलने के लिए अपना मुँह खोलें, आप उसके सामर्थ्य की ओर देखते हुए अपनी साक्षी के प्रभावी होने के लिए एक मौन प्रार्थना कर सकते हैं। “लज्जित न हों।”

रोमियों 1:8-17

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