“मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो।” मत्ती 11:29
जब बच्चे स्कूल से घर पहुँचते हैं, तो उनके माता-पिता उनसे क्या पूछते हैं?
कुछ लोग पूछते होंगे कि “क्या तुमने आज कुछ सीखा?” किन्तु कई लोग कुछ ऐसा कहते होंगे कि “क्या तुमने आज मज़ा किया?”
स्कूली शिक्षा के सम्बन्ध में यह महत्त्व नहीं रखता कि कौन सा प्रश्न पूछा जाता है और उसके परिणामस्वरूप कौन सी प्राथमिकता उजागर होती है। किन्तु कलीसिया के बारे में भी प्रायः यही प्रश्न पूछा जाता है कि क्या हमने आज कलीसिया में मज़ा किया? क्या हमने कलीसिया का आनन्द लिया?
इसके विपरीत, हमें जो पूछना चाहिए वह यह है, “हम यीशु के बारे में और यीशु से क्या सीख रहे हैं?”
यीशु हमें उससे सीखने का अवसर देने का महान विशेषाधिकार प्रदान करता है। चारों सुसमाचारों में उसकी शिक्षा जीवन के बड़े प्रश्नों को सम्बोधित करती है, अर्थात् मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं कहाँ जा रहा हूँ? क्या जीवन का कोई महत्त्व है भी?
यीशु मसीह को व्यक्तिगत प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में जानना इन बड़े विषयों के बारे में लोगों के सोचने के तरीके को बदल देता है। यह समय के बारे में, संसाधनों के बारे में, आजीविका के बारे में, या फिर वे किस तरह के व्यक्ति से विवाह करना चाहेंगे या वे किस तरह का जीवनसाथी बनना चाहते हैं, इस बारे में उनके दृष्टिकोण को बदल देता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि यीशु को सच में जानने का अर्थ है उसे अपने जीवन पर अधिकारी बनने के लिए आमन्त्रित करना। जैसे-जैसे हम उससे सीखते हैं, सब कुछ बदल जाता है।
यीशु के पास आना इस बात को सीखने और उसके प्रति प्रत्युत्तर देने से आरम्भ होता है कि मसीह, अर्थात् अधर्मियों (जो कि हम हैं) के लिए धर्मी (जो कि वह है) ने पापों के कारण एक बार दुख उठाया ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुँचाए (1 पतरस 3:18)। केवल मस्तिष्क में इस बात की जानकारी का होना इस बात पर विश्वास करने, इस पर भरोसा करने और जिसने हमें यह सब दिया है उसका जूआ प्रसन्नता के साथ अपने ऊपर उठा लेने के बराबर नहीं है।
हम सभी ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने जीवन की पहेली को सुलझाने के प्रयास में लगे हैं और पहेली के टुकड़ों को जितना हो सके उतना एक साथ जोड़ने का यत्न कर रहे हैं, और हम सब भी कभी न कभी ऐसी परिस्थिति में रह चुके हैं। किन्तु जब तक हम परमेश्वर से सीखने के लिए तैयार नहीं होंगे तब तक वे टुकड़े एक साथ नहीं जुड़ सकेंगे। परन्तु अब हम वास्तव में परमेश्वर को जान सकते हैं, हमारी बौद्धिक क्षमता के कारण नहीं अपितु इसलिए क्योंकि परमेश्वर अपने वचन की सच्चाई के द्वारा यह चुनता है कि हम उसको जानें।
क्या आप अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यीशु से सीखने के लिए तैयार हैं? क्या आप उसकी शिक्षाओं का पालन करने और अपने आप को उसके अधिकार के अधीन रखने के काम को एक विशेषाधिकार के रूप में देखते हैं, न कि एक बोझ के रूप में? सुनिश्चित करें कि आप सुसमाचार के सत्य को सीखने के प्रत्येक अवसर का लाभ उठाएँगे, जो आपके हृदय की तृष्णा को तृप्त करेगा और दिन-प्रतिदिन आपके जीवन को परिवर्तित करता जाएगा।
इफिसियों 4:17 – 5:2