9 फरवरी : हियाव के साथ प्रार्थना करना

Alethia4India
Alethia4India
9 फरवरी : हियाव के साथ प्रार्थना करना
Loading
/

“क्योंकि जो कोई माँगता है, उसे मिलता है; और जो ढूँढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाएगा … अतः: जब तुम बुरे होकर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा!”  लूका 11:10, 13

जब कोई किशोरी, जिसको अभी-अभी अपना ड्राइविंग लाइसेंस मिला हो, अपनी माँ या पिता से गाड़ी की चाबियाँ माँगती है, तो सामान्यतः वह कोई अस्पष्ट, आधे-अधूरे मन से किया गया निवेदन नहीं होता। इसके विपरीत, उसका मन उसमें लगा हुआ होता है और उसकी इच्छा साफ दिखाई दे रही होती है, मानो वह कह रही हो, “कृपया मुझे गाड़ी की चाबियाँ दें। मुझे गाड़ी चाहिए। मैं गाड़ी ले जाना चाहती हूँ। मुझे यह आपसे अभी चाहिए।”

इसी प्रकार, यीशु अपने चेलों को प्रार्थना में परमेश्वर से निवेदन करने के तरीके सिखाने के लिए जिन क्रियाओं का उपयोग करता है, अर्थात् माँगना, ढूँढना, खटखटाना, वे तीव्र इच्छा, अनुरूपता और स्पष्टता को व्यक्त करते हैं। ऐसा लगता है, जैसे वह कह रहा हो कि मैं चाहता हूँ कि तुम इस प्रकार प्रार्थना करो जिसमें विनयपूर्ण, हठी संकल्प हो। मैं चाहता हूँ कि तुम ढूँढो और ढूँढते रहो, और मैं चाहता हूँ कि तुम आग्रहपूर्ण सत्यता के साथ खटखटाओ।

वह आपको और मुझे हमारे स्वर्गिक पिता के सामने आने और केवल अपनी माँग रखने के लिए आमन्त्रित कर रहा है।

हालाँकि हमें इस बारे में सावधान रहना चाहिए कि हम क्या  माँग रहे हैं। जब हम प्रभु के समक्ष अपने निवेदन प्रस्तुत कर रहे हों, तो उन्हें आत्मा द्वारा संयमित किया जाना चाहिए, जिसे जॉन कैल्विन “परमेश्वर के वचन की लगाम” कहते हैं।[1] दूसरे शब्दों में, बाइबल सिखाती है कि हम उन बातों को पूरे हियाव के साथ माँग सकते हैं जिन्हें परमेश्वर भली और उचित कहता है,  जैसे कि उसकी सहायता, जिससे कि हम अपने शरीरों को जीवित बलिदान के रूप में चढ़ा सकें, सुसमाचार के साक्षी के रूप में बढ़ सकें, या आराधना करने की अपनी अभिलाषा बढ़ा सकें। परन्तु हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि हम परमेश्वर से चालाकी से काम निकलवा सकते हैं, यह माँग करते हुए कि वह हमें वह सब कुछ दे, जो हमारे जीवन को सुगम या समृद्ध बनाए। यह भी सम्भव है, “माँगो और . . . पाओ नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग–विलास में उड़ा दो” (याकूब 4:3)।

हमें साहसपूर्वक तो माँगना है, किन्तु हमें दीनता के साथ भी माँगना है। हमें परमेश्वर से महान कार्य करने के लिए कहना है, और फिर हमें उसका उत्तर स्वीकार करना है। यह पहले से ही प्रमाणित हो चुका है कि परमेश्वर सदैव हमें वह नहीं देगा जो हम माँगते हैं, तब भी जब हम जो माँगते हैं वह अपने आप में भला और ईश्वरीय हो। हमारी प्रार्थनाएँ सदैव उसकी भली और सम्प्रभु इच्छा के अनुसार नहीं होती हैं। हम सदैव यह निर्धारित नहीं कर सकते कि हमारे लिए क्या भला है, किन्तु परमेश्वर सदैव जानता है कि उसकी सन्तानों के लिए सर्वोत्तम क्या है। इसलिए जब हम परमेश्वर के सामने अपनी विनतियों को लाते हैं, तो हमें उसके वचन को अपने मार्गदर्शक के रूप में देखना चाहिए और स्मरण रखना चाहिए कि वह हमारे जीवन के लिए अपनी योजनाओं को पूरा करने और हमें अपने पुत्र के स्वरूप के अनुरूप बनाने के लिए काम कर रहा है।

इसलिए परमेश्वर के सामने आएँ और केवल अपनी माँग रखें। आपके निवेदन विशिष्ट होने चाहिएँ, साहसिक होने चाहिएँ और परमेश्वर के वचन के अनुकूल होने चाहिएँ और तब आप आशा कर सकते हैं और निस्सन्देह चाहत रख सकते हैं कि परमेश्वर उनका ठीक वैसा ही उत्तर देगा, जैसा उसे उचित जान पड़ता है।
कुलुस्सियों 1:9-12

Leave A Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *