“तुम में से कौन है कि उसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास जाकर उससे कहे, ‘हे मित्र; मुझे तीन रोटियाँ दे। क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिए मेरे पास कुछ नहीं है।’ … मैं तुम से कहता हूँ, यदि उसका मित्र होने पर भी उसे उठकर न दे, तौभी उसके लज्जा छोड़कर माँगने के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा। और मैं तुम से कहता हूँ कि माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा।” लूका 11:5-9
शायद हम सोचें कि परमेश्वर के बारे में बात करना उसके साथ हमारे सम्बन्ध की मुख्य अभिव्यक्ति होती है। तौभी हमारे लिए यह सम्भव है कि परमेश्वर को घनिष्ठता से जाने बिना भी, कि वह वास्तव में है कौन, हम उसके बारे में बात करते रह सकते हैं। परमेश्वर के साथ हमारे व्यक्तिगत सम्बन्ध का प्रमाण प्रायः हमारे सार्वजनिक शब्दों में नहीं, बल्कि हमारी निजी प्रार्थनाओं में पाया जाता है, अर्थात् इसमें नहीं कि हम उसके बारे में क्या कहते हैं, अपितु इसमें कि हम उस से क्या कहते हैं। निस्सन्देह, जैसा कि रॉबर्ट मुर्रे मैकाएन ने कहा था, “एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने घुटने टेकते समय जो होता है, वह वास्तव में वही होता है—उससे अधिक वह कुछ नहीं है।”
यहीं पर एक चुनौती भी है! क्योंकि यदि हम सच कहें, तो हमारी कई प्रार्थनाएँ एक गतिहीन या दूरस्थ सम्बन्ध को दर्शाती हैं, न कि उस गतिशीलता को जो एक स्नेह से भरी मित्रता की पहचान होनी चाहिए। परन्तु यदि यह हमारी सच्चाई है, तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि हम इस बात में अकेले नहीं हैं। यीशु के चेले भी अपने स्वर्गिक पिता के साथ घनिष्ठता बढ़ाना चाहते थे, किन्तु उन्हें पता था कि ऐसा कैसे करना सिखाने के लिए उन्हें प्रभु की आवश्यकता है (लूका 11:1)। और उत्तर के रूप में यीशु ने उन्हें वह प्रार्थना सिखाने के बाद, जिसे हम “प्रभु की प्रार्थना” कहते हैं, उन्हें एक मित्र के साहसिक निवेदन के बारे में एक दृष्टान्त सुनाया।
यीशु अपनी कहानी में दोनों व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध को स्थापित करते हुए अपना दृष्टान्त आरम्भ करता है। वह बताता है कि वे मित्र हैं। फिर वह आगे समझाता है कि कैसे पहला व्यक्ति, यात्रा करके आए एक अतिथि का आतिथ्य करने की इच्छा रखते हुए आधी रात को दूसरे के घर रोटी माँगने जाता है। यहाँ यह सम्भावना भी थी कि उसके निवेदन के कारण उसके मित्र का पूरा परिवार जाग जाता। यीशु कहता हैं कि उसके साहसिक हठ के कारण दूसरा व्यक्ति उठता है और पहले व्यक्ति को वह दे देता है, जिसकी उसे आवश्यकता होती है।
यीशु की कहानी से हमें यह समझने की आवश्यकता है कि यदि एक सच्ची मानवीय मित्रता ऐसी उदार प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है तो हम आश्वस्त हो सकते हैं कि जब हम प्रार्थना में परमेश्वर के पास आते हैं, तो वह हमें कभी भी वह वस्तु देने से मना नहीं करेगा जिसकी हमें सच में आवश्यकता है। उस व्यक्ति का निवेदन साहसिक तो है, किन्तु बोझ डालने वाला भी है, तौभी उसका मित्र उसकी सुनता है और उसके हठ के कारण स्वीकार भी करता है। तो फिर हम कितना अधिक आश्वस्त हो सकते हैं कि जब हम सच्चे, दीन हृदय से अपने स्वर्गिक पिता के पास जाएँगे, तो वह उत्तर देने के लिए तत्पर होगा।
परमेश्वर के सामने आश्वासन रखने का अर्थ गुस्ताखी करना नहीं है। इसके विपरीत, यीशु के द्वारा उसने हमारे साथ जो मित्रता स्थापित की है, उसके कारण हम उसके सिंहासन के सामने हियाव रख सकते हैं। यीशु के कारण हम अपने सृष्टिकर्ता से एक घनिष्ठ मित्र के समान “लज्जा छोड़कर” बात कर सकते हैं। कितना अद्भुत विचार है यह! परमेश्वर के लिए कोई भी समय आधी रात का समय नहीं होता और न ही कभी ऐसा क्षण आएगा, जब हमारे मित्र के रूप में उसके पास जाने से उसे असुविधा होगी। हमें केवल खटखटाना है।
इफिसियों 1:15-23