“हमें परीक्षा में न ला।” लूका 11:4
बाइबल स्पष्ट रूप से सिखाती है कि परमेश्वर पाप और प्रलोभन का स्रोत नहीं है। वह आप किसी की परीक्षा नहीं करता है (याकूब 1:13)। जबकि ऐसा है तो हम क्यों प्रार्थना करके परमेश्वर से कहें कि वह हमें परीक्षा में न ले जाए? वास्तव में ऐसा करने के द्वारा हम परमेश्वर से क्या करने या न करने के लिए कह रहे हैं?
इसके लिए हमें परखे जाने और प्रलोभन में पड़ने के बीच के सूक्ष्म अन्तर को समझना होगा। जब हम प्रार्थना करते हैं, “हे प्रभु, हमें परीक्षा में न ला,” तो हम वास्तव में यह कह रहे होते हैं, “हे परमेश्वर, हमारी सहायता कर कि हम आपके द्वारा आने वाली परीक्षा को शैतान की ओर से बुराई करने का प्रलोभन न बनने दें।” उसी प्रकार हम उससे यह भी कह रहे होते हैं कि उसकी उपस्थिति और सामर्थ्य के बिना हमें परखा न जाए, जिनके द्वारा हमें उन परखे जाने के समयों में निराशा या अविश्वास में डूब जाने के विपरीत विश्वास और आनन्द में चलने में सहायता मिलेगी।
इसलिए प्रभु की प्रार्थना का यह वाक्यांश महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें प्रलोभन की वास्तविकता और निकटता स्मरण कराता है और ऐसा होना आवश्यक भी है। उत्पत्ति 4 में परमेश्वर कैन को चेतावनी देता है, “पाप द्वार पर छिपा रहता है; और उसकी लालसा तेरी ओर होगी, और”—यहीं पर उपदेश है—“तुझे उस पर प्रभुता करनी है” (उत्पत्ति 4:7)। दुख की बात यह है कि कैन ने परमेश्वर से यह नहीं माँगा कि वह उसे पाप पर प्रभुता करने के लिए वह सब दे जिसकी उसे आवश्यकता थी, बजाय इसके कि पाप उस पर प्रभुता करता और उसका विनाश कर देता। प्रभु की प्रार्थना में यीशु हमें वही भूल न दोहराने की शिक्षा देता है।
हमें नष्ट करने के पाप के प्रयासों को ध्यान में रखते हुए हम केवल इतना नहीं कर सकते कि हम परमेश्वर से कहें कि हमें परीक्षा में न ला और फिर मान लें कि इस समस्या का समाधान हो गया है। कदापि नहीं, हमारे कार्यों को हमारी प्रार्थनाओं के अनुरूप होना चाहिए। यदि हम वास्तव में प्रभु से उसकी पवित्र आज्ञाओं का उल्लंघन न करने के लिए सहायता माँग रहे हैं, तो हमें अपने आप को लापरवाही से, अनावश्यक रूप से, या जानबूझकर पाप की पहुँच में नहीं डालना चाहिए।
परमेश्वर प्रलोभन से लड़ने में हमारी सहायता करने के लिए इच्छुक है और पूरी तरह से सक्षम भी है। वह अपने प्रेम की वाचा में यह सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है कि उसकी सन्तानों में से कोई भी पाप के चंगुल में न फँस जाए। हमारे जीवन में ऐसा कभी नहीं होगा, जब पाप का प्रलोभन इतना प्रबल हो कि परमेश्वर का अनुग्रह और सामर्थ्य हमें इसे सहन करने में सक्षम न कर सके; जैसा कि पवित्रशास्त्र हमें स्मरण दिलाता है, “परमेश्वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10:13)। न ही प्रलोभन का विरोध करने में कभी कोई ऐसी विफलता होगी, जिसे मसीह के लहू से ढका न जा सके। इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में और प्रत्येक प्रलोभन का सामना करते हुए यह स्मरण रखें कि मसीह में हम “विजयी पक्ष में हैं।”[1] आप सामना कर सकते हैं क्योंकि आपके पास आपका मार्गदर्शन करने और आपकी रक्षा करने के लिए आत्मा स्वयं उपस्थित है। इस समय आप अवज्ञा के लिए कौन से नियमित प्रलोभनों का सामना कर रहे हैं? किन क्षेत्रों में या किन क्षणों में आपकी परीक्षाएँ प्रलोभनों में बदल जाती हैं? इसी क्षण परमेश्वर से उसकी सहायता माँगें, क्योंकि आपको इसकी आवश्यकता है और वह इसे प्रदान करने के लिए तैयार है। लूका 4:1-13